अध्याय 4

हमें हमेशा चौकस रह बाट जोहनी चाहिए, आत्मा में शांत रहकर शुद्ध हृदय से ग्रहण करना चाहिए। हम पर चाहे जो भी बीते, हमें अंधेपन से सहभागिता नहीं करनी चाहिए, हमें परमेश्वर के सम्मुख शांत रहने और निरंतर उसकी संगति में रहने की आवश्यकता है और तब उसके उद्देश्य हम पर प्रकट होंगे। हमारी आत्मा हमेशा परख करने को तत्पर, उत्सुक और अडिग होनी चाहिए। हमें हमेशा जीवन का जल परमेश्वर के सम्मुख ग्रहण करना चाहिए, वह जल जो हमारी सूखी आत्माओं को पोषण देता और फिर से भर देता है। हमें हमेशा अपनी स्वधार्मिकता, अहंकार, आत्मसंतोष, आत्मतुष्टि से जो हमारे शैतानी स्वभाव से उत्पन्न होते हैं, शुद्ध होने को तैयार रहना चाहिए। हमें परमेश्वर के वचनों को स्वीकार करने हेतु अपने हृदय को खोलना चाहिए, अपने जीवन में हमें उसके वचनों पर भरोसा रखना चाहिए। हमें उसके वचनों का अनुभव करना और उनके प्रति आश्वस्त होना चाहिए और उसके वचन की समझ हासिल करनी चाहिए, उसके वचन को अपना जीवन बनने देना चाहिए। यही आह्वान है हमारा! तब ही हम जयवंत होते हैं।

अब हमारी अवधारणायें गंभीर हैं, हम पटुता से बोलते और उतावली से कार्य करते और आत्मा के पीछे चलने में असमर्थ है। आज का दिन बीते समय की तरह नहीं होगा; पवित्र आत्मा का कार्य तेजी से आगे बढ़ता है। हमें विस्तारपूर्वक परमेश्वर के वचनों का अनुभव करना ही चाहिए; हमें हर कल्पना और विचार, हर गतिविधि और प्रतिक्रिया को अपने हृदय में परखना चाहिए। किसी भी जन से हम उसके सामने या पीछे जो कुछ करते है वह सब यीशु के सिंहासन के सामने न्याय से बच नहीं सकता। पवित्र आत्मा हमें गहरे अनुभव के दायरे में मार्गदर्शन दे रहा है, और इस अनुभव के द्वारा हम सर्वसामर्थी के विषय में निश्चित होने के और समीप आ जाते हैं।

ब्रह्माण्ड के परमेश्वर ने हमारी आत्मिक आँखों को खोला है और आत्मिक रहस्य हम पर लगातार प्रकट हो रहे हैं। शुद्ध हृदय से ग्रहण करें! कीमत चुकाने को तैयार रहें, अपने सम्पूर्ण हृदय से आगे बढ़ें, खुद का इनकार करने को तैयार रहें, आगे से लालची ना रहें, पवित्र आत्मा का अनुसरण करें और परमेश्वर के वचनों का आनंद लें और तब एक सम्पूर्ण सार्वभौमिक नव मनुष्य प्रकट होगा। वह पल आ ही गया है, जब शैतान का अंत होगा, परमेश्वर की सभी इच्छा पूर्ण होगी, संसार के सारे देश मसीह के राज्य बन जायेंगे और मसीह राजा बन अनंत तक पृथ्वी पर राज्य करेगा!

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