15.4. परमेश्वर और मनुष्य के कार्य के बीच अंतर पर

451. स्वयं परमेश्वर के कार्य में सम्पूर्ण मनुष्यजाति का कार्य समाविष्ट है, और यह सम्पूर्ण युग के कार्य का भी प्रतिनिधित्व करता है। कहने का तात्पर्य है कि, परमेश्वर का स्वयं का कार्य पवित्र आत्मा के सभी कार्य की चाल और प्रवृत्ति का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि प्रेरितों का कार्य परमेश्वर के स्वयं के कार्य का अनुसरण करता है और युग की अगुवाई नहीं करता है, न ही यह पूरे युग में पवित्र आत्मा के कार्य की प्रवृत्ति का प्रतिनिधित्व करता है। वे केवल वही कार्य करते हैं जो मनुष्य को अवश्य करना चाहिए, जो प्रबंधन कार्य को बिलकुल भी समाविष्ट नहीं करता है। परमेश्वर का स्वयं का कार्य प्रबंधन कार्य के भीतर एक परियोजना है। मनुष्य का कार्य केवल उपयोग किए जा रहे मनुष्यों का कर्तव्य है और इसका प्रबंधन कार्य से कोई सम्बन्ध नहीं है। कार्य की विभिन्न पहचान और कार्य के विभिन्न प्रतिनिधित्वों के कारण, इस तथ्य के बावजूद कि वे दोनों पवित्र आत्मा के कार्य हैं, परमेश्वर के कार्य और मनुष्य के कार्य के बीच स्पष्ट और सारभूत अन्तर हैं। इसके अतिरिक्त, विभिन्न पहचानों वाली कार्य वस्तुओं पर पवित्र आत्मा के द्वारा किए गए कार्य की सीमा भिन्न होती है। ये पवित्र आत्मा के कार्य के सिद्धान्त और दायरे हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य' से उद्धृत

452. देहधारी परमेश्वर के वचन एक नया युग आरंभ करते हैं, समस्त मानवजाति का मार्गदर्शन करते हैं, रहस्य प्रकट करते हैं, और मनुष्य को वह दिशा दिखाते हैं, जो उसे नए युग में ग्रहण करनी है। मनुष्य द्वारा प्राप्त की गई प्रबुद्धता अभ्यास या ज्ञान के लिए सरल निर्देश मात्र हैं। वह एक नए युग में समस्त मानवजाति को मार्गदर्शन नहीं दे सकती या स्वयं परमेश्वर के रहस्य प्रकट नहीं कर सकती। अंतत: परमेश्वर, परमेश्वर है और मनुष्य, मनुष्य। परमेश्वर में परमेश्वर का सार है और मनुष्य में मनुष्य का सार।

— "वचन देह में प्रकट होता है" की 'प्रस्तावना' से उद्धृत

453. देहधारी परमेश्वर उन लोगों से मौलिक रूप से भिन्न है जो परमेश्वर द्वारा उपयोग किए जाते हैं। देहधारी परमेश्वर दिव्यता का कार्य करने में समर्थ है, जबकि परमेश्वर के द्वारा उपयोग किए जाने वाले लोग समर्थ नहीं हैं। प्रत्येक युग के आरंभ में, नया युग शुरू करने के लिए और मनुष्य को एक नई शुरुआत में लाने के लिए परमेश्वर का आत्मा व्यक्तिगत रूप से बोलता है। जब वह वचन बोलना पूरा कर लेता है, तो यह प्रकट करता है कि परमेश्वर की दिव्यता के भीतर उसका कार्य पूरा हो गया है। उसके बाद, सभी लोग अपने जीवन अनुभव में प्रवेश करने के लिए उन लोगों के पदचिह्नों का अनुसरण करते हैं जो परमेश्वर के द्वारा उपयोग किए जाते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारी परमेश्वर और परमेश्वर द्वारा उपयोग किए गए लोगों के बीच महत्वपूर्ण अंतर' से उद्धृत

454. देहधारी परमेश्वर का कार्य एक नये विशेष युग का आरम्भ करता है, और जो लोग उसके कार्य को निरन्तर जारी रखते हैं वे ऐसे मनुष्य हैं जिन्हें उसके द्वारा उपयोग किया जाता है। मनुष्य के द्वारा किया गया समस्त कार्य देहधारी परमेश्वर की सेवकाई के भीतर होता है, और वह इस दायरे के परे जाने में असमर्थ होता है। यदि देहधारी परमेश्वर अपने कार्य को करने के लिए नहीं आए, तो मनुष्य पुराने युग का समापन करने और नए विशेष युग की शुरुआत करने में समर्थ नहीं है। मनुष्य के द्वारा किया गया कार्य मात्र उसके कर्तव्य के दायरे के भीतर होता है जो मानवीय रूप से संभव है, और परमेश्वर के कार्य का प्रतिनिधित्व नहीं करता है। केवल देहधारी परमेश्वर ही आकर उस कार्य को पूरा कर सकता है जो उसे करना चाहिए, और उसके अलावा, कोई भी उसकी ओर से इस कार्य को नहीं कर सकता है। निस्संदेह, मैं जिस बारे में बात करता हूँ वह देधारण के कार्य के सम्बन्ध में है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर द्वारा उद्धार की अधिक आवश्यकता है' से उद्धृत

455. परमेश्वर के द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले व्यक्ति के द्वारा किए जाने वाले कार्य, मसीह या पवित्र आत्मा के कार्य के साथ सहयोग के लिए है। यह मनुष्य परमेश्वर के द्वारा अन्य मनुष्यों के बीच में ऊँचा उठाया गया है, वह परमेश्वर के चुने हुए सभी लोगों का नेतृत्व करने के लिए है, और परमेश्वर ने उसे मानवीय सहयोग का कार्य करने के लिए भी उठाया है। इस तरह का व्यक्ति, जो मानवीय सहयोग का कार्य करने में सक्षम है, उसके माध्‍यम से, मनुष्य से परमेश्वर की अपेक्षाओं और जो कार्य पवित्र आत्मा के द्वारा मनुष्यों के बीच किया जाना चाहिए, वह अधिक से अधिक पूरा किया जा सकता है। इसे दूसरे शब्दों में यूँ कहा जा सकता है : इस मनुष्य को इस्तेमाल करने में परमेश्वर का उद्देश्य यह है कि वे सब जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, परमेश्वर की इच्छा को अच्छी तरह समझ सकें, और परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा कर सकें। क्योंकि लोग परमेश्वर के वचन को या परमेश्वर की इच्छा को स्वयं समझने में असमर्थ हैं, इसलिए परमेश्वर ने किसी ऐसे को खड़ा किया है जो इस तरह का कार्य करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। यह व्यक्ति जो परमेश्वर के द्वारा इस्तेमाल किया गया है, उसका वर्णन एक ऐसे माध्यम के रूप में किया जा सकता है जिसके द्वारा परमेश्वर लोगों का मार्गदर्शन करता है, एक "अनुवादक" जो परमेश्वर और लोगों के बीच में संप्रेषण बनाए रखता है। इस प्रकार, यह व्यक्ति उनकी तरह नहीं है जो परमेश्वर के घराने में काम करते हैं या जो उसके प्रेरित हैं। यह कहा जा सकता है कि वह उनकी ही तरह परमेश्वर की सेवा करता है, फिर भी परमेश्वर के द्वारा उसके उपयोग की पृष्ठभूमि में और उसके कार्य के सार के विषय में, वह दूसरे कार्यकर्ताओं और प्रेरितों से बिलकुल अलग है। जो व्यक्ति परमेश्वर द्वारा इस्तेमाल किया जाता है, वह अपने कार्य के सार और अपने उपयोग की पृष्ठभूमि के विषय में परमेश्वर के द्वारा खड़ा किया जाता है, वह परमेश्वर के कार्य के लिए परमेश्वर के द्वारा तैयार किया जाता है, और वह स्वयं परमेश्वर के कार्य में सहयोग करता है। कोई भी व्यक्ति उसकी जगह उसका कार्य नहीं कर सकता—यह मनुष्य का सहयोग है जो दिव्य कार्य के साथ अपरिहार्य है। इस दौरान, दूसरे कार्यकर्ताओं या प्रेरितों द्वारा किया गया कार्य, कुछ और नहीं बल्कि हर अवधि के दौरान कलीसियाओं के लिए व्यवस्थाओं के कई पहलुओं को लाना और उन्हें पूरा करना है, या फिर कलीसियाई जीवन को बनाए रखने के लिए जीवन के सरल प्रावधान का कार्य करना है। ये कार्यकर्ता और प्रेरित परमेश्वर द्वारा नियुक्त नहीं किए जाते हैं, न ही यह कहा जा सकता है कि वे पवित्र आत्मा द्वारा इस्तेमाल किए जाते हैं। वे कलीसिया में से चुने जाते हैं और, कुछ समय तक प्रशिक्षण और तौर-तरीके सिखाने के बाद, जो उपयुक्त होते हैं उन्हें रखा जाता है, जबकि जो उपयुक्त नहीं होते हैं उन्हें वहीं वापस भेज दिया जाता है जहाँ से वे आए थे। क्योंकि ये लोग कलीसियाओं में से चुने जाते हैं, कुछ अपना असली रंग अगुवा बनने के बाद दिखाते हैं, और कुछ तो बहुत बुरे काम करते हैं और अंत में निकाल दिए जाते हैं। दूसरी ओर, जो मनुष्य परमेश्वर के द्वारा इस्तेमाल किया जाता है, वह परमेश्वर के द्वारा तैयार किया जाता है, और उसके भीतर निश्चित योग्यता और मानवता होती है। उसे पहले से ही पवित्र आत्मा द्वारा तैयार और पूर्ण कर दिया जाता है और पूर्णरूप से पवित्र आत्मा द्वारा चलाया जाता है, और विशेषकर तब जब उसके कार्य की बारी आती है, उसे पवित्र आत्मा द्वारा निर्देश और आदेश दिए जाते हैं—परिणामस्वरुप परमेश्वर के चुने हुए लोगों की अगुवाई के मार्ग में कोई भटकाव नही आता, क्योंकि परमेश्वर निश्चित रूप से अपने कार्य का उत्तरदायित्व लेता है, और परमेश्वर हर समय अपना कार्य करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर द्वारा मनुष्य को इस्तेमाल करने के विषय में' से उद्धृत

456. यहाँ तक कि कोई मनुष्य जिसे पवित्र आत्मा के द्वारा उपयोग किया जाता है वह भी परमेश्वर स्वयं का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है। अर्थात न केवल यह व्यक्ति परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है, बल्कि उसका काम भी सीधे तौर पर परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है। दूसरे शब्दों में, मनुष्य के अनुभव को सीधे तौर पर परमेश्वर के प्रबंधन के अंतर्गत नहीं रखा जा सकता है, और यह परमेश्वर के प्रबंधन का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है। वह समस्त कार्य जिसे परमेश्वर स्वयं करता है वह ऐसा कार्य है जिसे वह अपनी स्वयं की प्रबंधन योजना में करने का इरादा करता है और जो बड़े प्रबंधन से संबंधित है। मनुष्य के द्वारा किया गया कार्य उसके व्यक्तिगत अनुभव की आपूर्ति करने से युक्त होता है। वह अनुभव का एक नया मार्ग खोजता है जिस पर उससे पहले के लोग नहीं चले थे और पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन के अधीन अपने भाईयों और बहनों की अगुवाई करता है। इस तरह के लोग अपना व्यक्तिगत अनुभव या आध्यात्मिक मनुष्यों की आध्यात्मिक रचनाएँ प्रदान करते हैं। यद्यपि पवित्र आत्मा के द्वारा उनका उपयोग किया जाता है, फिर भी ऐसे मनुष्यों का कार्य छ:-हज़ार-वर्षों की योजना के बड़े प्रबंधन कार्य से असम्बद्ध है। वे सिर्फ ऐसे लोग हैं जिन्हें विभिन्न अवधियों में पवित्र आत्मा के द्वारा उभारा गया ताकि वे तब तक पवित्र आत्मा की मुख्यधारा में लोगों की अगुवाई करें जब तक कि वे अपने कार्य को पूरा न कर लें या उनकी ज़िन्दगियों का अंत न हो जाए। जिस कार्य को वे करते हैं वह केवल परमेश्वर स्वयं के लिए एक उचित मार्ग तैयार करने के लिए है या पृथ्वी पर परमेश्वर स्वयं की प्रबंधन योजना में एक अंश को निरन्तर जारी रखने के लिए है। ऐसे मनुष्य उसके प्रबंधन में बड़े-बड़े कार्य करने में असमर्थ होते हैं, और वे नए मार्गों की शुरुआत भी नहीं कर सकते हैं, और वे पूर्व युग के परमेश्वर के सभी कार्यों का समापन तो बिल्कुल भी नहीं कर सकते हैं। इसलिए, जिस कार्य को वे करते हैं वह केवल एक सृजित प्राणी का प्रतिनिधित्व करता है जो अपने कार्यों को क्रियान्वित कर रहा है और स्वयं परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है जो अपनी सेवकाई को कार्यान्वित कर रहा हो। ऐसा इसलिए है क्योंकि जिस कार्य को वे करते हैं वह परमेश्वर स्वयं के द्वारा किए जाने वाले कार्य के असदृश है। एक नए युग के सूत्रपात का कार्य परमेश्वर के स्थान पर मनुष्य के द्वारा नहीं किया जा सकता है। इसे परमेश्वर स्वयं के अलावा किसी अन्य के द्वारा नहीं किया जा सकता है। मनुष्य के द्वारा किया गया समस्त कार्य सृजित प्राणी के रूप में उसके कर्तव्य का निर्वहन है और तब किया जाता है जब पवित्र आत्मा के द्वारा उसे प्रेरित या प्रबुद्ध किया जाता है। ऐसे मनुष्य द्वारा प्रदान किया जाने वाला समस्त मार्गदर्शन यह होता है कि मनुष्य को दैनिक जीवन में किस प्रकार अभ्यास करना चाहिए और उसको किस प्रकार परमेश्वर की इच्छा के साथ समरसता में कार्य करना चाहिए। मनुष्य का कार्य न तो परमेश्वर की प्रबंधन योजना को सम्मिलित करता है और न ही पवित्रात्मा के कार्य का प्रतिनिधित्व करता है। ... चूँकि पवित्र आत्मा के द्वारा उपयोग किए गए मनुष्यों का कार्य परमेश्वर स्वयं के द्वारा किए गए कार्य के असदृश है, इसलिए उनकी पहचान और वे जिनकी ओर से कार्य करते हैं वे भी उसी तरह से भिन्न हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि पवित्र आत्मा जिस कार्य को करने का इरादा करता है वह भिन्न है, फलस्वरूप कार्य करने वाले सभी को अलग-अलग पहचानें और हैसियतें प्रदान की जाती है। पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए गए लोग कुछ ऐसे कार्य भी कर सकते हैं जो नये हों और वे पूर्व युग में किये गए कुछ कार्यों को हटा भी सकते हैं, किन्तु उनका कार्य नए युग में परमेश्वर के स्वभाव और इच्छा को व्यक्त नहीं कर सकता है। वे केवल पूर्व युग के कार्य को हटाने के लिए कार्य करते हैं, और सीधे तौर पर परमेश्वर स्वयं के स्वभाव का प्रतिनिधित्व करने के उद्देश्य से कोई नया कार्य करने के लिए नहीं करते हैं। इस प्रकार, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वे पुराने पड़ चुके कितने अभ्यासों का उन्मूलन करते हैं या वे कितने नए अभ्यासों को आरंभ करते हैं, वे तब भी मनुष्य और सृजित प्राणियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। जबकि परमेश्वर स्वयं जब कार्य को करता है, तो वह प्राचीन युग के अभ्यासों के उन्मूलन की खुलकर घोषणा नहीं करता है या सीधे तौर पर नए युग की शुरुआत की घोषणा नहीं करता है। वह अपने कार्य में प्रत्यक्ष और स्पष्ट है। वह उस कार्य को करने में निष्कपट है जिसका उसने इरादा किया है; अर्थात्, वह उस कार्य को सीधे तौर पर व्यक्त करता है जिसे उसने साकारकिया है, वह सीधे तौर पर अपना कार्य करता है जैसा उसने मूलतः इरादा किया था, और अपने अस्तित्व एवं स्वभाव को व्यक्त करता है। जैसा मनुष्य इसे देखता है, उसका स्वभाव और उसी प्रकार उसका कार्य भी बीते युगोंके असदृश है। हालाँकि, परमेश्वर स्वयं के दृष्टिकोण से, यह मात्र उसके कार्य की निरन्तरता और आगे का विकास है। जब परमेश्वर स्वयं कार्य करता है, तो वह अपने वचन को व्यक्त करता है और सीधे तौर पर नया कार्य लाता है। इसके विपरीत, जब मनुष्य काम करता है, तो यह विचार-विमर्श एवं अध्ययन के माध्यम से होता है, या यह दूसरों के कार्य की बुनियाद पर निर्मित ज्ञान का विकास और अभ्यास का व्यवस्थापन है। कहने का अर्थ है, कि मनुष्य के द्वारा किए गए कार्य का सार पहले से स्थापित व्यवस्था को बनाए रखना और "नए जूतों में पुराने मार्ग पर चलना" है। इसका अर्थ है कि पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए गए मनुष्यों द्वारा चला गया मार्ग भी उस पर बना है जिसे स्वयं परमेश्वर के द्वारा खोला गया था। अंततः मनुष्य आख़िरकर मनुष्य है, और परमेश्वर परमेश्वर है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारण का रहस्य (1)' से उद्धृत

457. नबियों और पवित्र आत्मा द्वारा इस्तेमाल किए गए लोग बोलते और कार्य करते थे, तो यह मनुष्य के कर्तव्य निभाने के लिए था, यह एक सृजित प्राणी का कार्य करने के लिए था, जिसे मनुष्य को करना चाहिए। किंतु देहधारी परमेश्वर के वचन और कार्य उसकी सेवकाई करने के लिए थे। यद्यपि उसका बाहरी स्वरूप एक सृजित प्राणी का था, किंतु उसका काम अपना कार्य करने के लिए नहीं, बल्कि अपनी सेवकाई करने के लिए था। "कर्तव्य" शब्द सृजित प्राणियों के संबंध में इस्तेमाल किया जाता है, जबकि "सेवकाई" देहधारी परमेश्वर के देह के संबंध में। इन दोनों के बीच एक अनिवार्य अंतर है; इन दोनों की अदला-बदली नहीं की जा सकती। मनुष्य का कार्य केवल अपना कर्तव्य निभाना है, जबकि परमेश्वर का कार्य अपनी सेवकाई का प्रबंधन करना और उसे कार्यान्वित करना है। इसलिए, यद्यपि कई प्रेरित पवित्र आत्मा द्वारा इस्तेमाल किए गए और कई नबी उसके साथ थे, किंतु फिर भी उनका कार्य और उनके वचन केवल सृजित प्राणियों के रूप में अपना कर्तव्य निभाने के लिए थे। हो सकता है, उनकी भविष्यवाणियाँ देहधारी परमेश्वर द्वारा कहे गए जीवन के मार्ग से बढ़कर रही हों, और उनकी मानवता देहधारी परमेश्वर की मानवता का अतिक्रमण करती हो, पर फिर भी वे अपना कर्तव्य ही निभा रहे थे, सेवकाई पूरी नहीं कर रहे थे। मनुष्य का कर्तव्य उसके कार्य को संदर्भित करता है; मनुष्य के लिए केवल यही प्राप्य है। जबकि, देहधारी परमेश्वर द्वारा की जाने वाली सेवकाई उसके प्रबंधन से संबंधित है, और यह मनुष्य द्वारा अप्राप्य है। चाहे देहधारी परमेश्वर बोले, कार्य करे, या चमत्कार करे, वह अपने प्रबंधन के अंतर्गत महान कार्य कर रहा है, इस प्रकार का कार्य उसके बदले मनुष्य नहीं कर सकता। मनुष्य का कार्य केवल सृजित प्राणी के रूप में परमेश्वर के प्रबंधन के कार्य के किसी दिए गए चरण में केवल अपना कर्तव्य पूरा करना है। परमेश्वर के प्रबंधन के बिना, अर्थात्‌, यदि देहधारी परमेश्वर की सेवकाई खो जाती है, तो सृजित प्राणी का कर्तव्य भी खो जाएगा। अपनी सेवकाई करने में परमेश्वर का कार्य मनुष्य का प्रबंधन करना है, जबकि मनुष्य द्वारा अपने कर्तव्य की पूर्ति स्रष्टा की माँगें पूरी करने के लिए अपने दायित्वों की पूर्ति है, और उसे किसी भी तरह से अपनी सेवकाई करना नहीं माना जा सकता। परमेश्वर के अंतर्निहित सार के लिए—उसके पवित्रात्मा के लिए—परमेश्वर का कार्य उसका प्रबंधन है, किंतु देहधारी परमेश्वर के लिए, जो एक सृजित प्राणी का बाहरी रूप धारण करता है, उसका कार्य अपनी सेवकाई करना है। वह जो कुछ भी कार्य करता है, अपनी सेवकाई करने के लिए करता है, और मनुष्य जो अधिकतम कर सकता है, वह है उसके प्रबंधन के क्षेत्र के भीतर और उसकी अगुआई के अधीन अपना सर्वश्रेष्ठ देना।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर' से उद्धृत

458. मेरी बोली मेरे अस्तित्व को दर्शाती है, परन्तु जो मैं कहता हूँ वह मनुष्य की पहुँच से परे है। जो मैं कहता हूँ यह वह नहीं है जिसका मनुष्य अनुभव करता है, और यह कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसे मनुष्य देख सकता है, यह कोई ऐसी चीज़ भी नहीं है जिसे मनुष्य स्पर्श कर सकता है, बल्कि यह वह है जो मैं हूँ। कुछ लोग केवल इतना ही स्वीकार करते हैं कि जो मैं संगति करता हूँ यह वह है जिसका मैंने अनुभव किया है, परन्तु वे इस बात को नहीं पहचानते हैं कि यह पवित्रात्मा की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है। निस्संदेह, जो मैं कहता हूँ वह मैंने अनुभव किया है। यह मैं ही हूँ जिसने छः हजार वर्षों से प्रबंधन का कार्य किया है। मैंने मनुष्यजाति के सृजन के आरम्भ से लेकर अभी तक हर चीज़ का अनुभव किया है; कैसे मैं इसके बारे में बात नहीं कर पाऊँगा? जब मनुष्य की प्रकृति की बात आती है, तो मैंने इसे स्पष्ट रूप से देखा है, और मैंने लम्बे समय से इसका अवलोकन किया है; कैसे मैं इसके बारे में स्पष्ट रूप से बात नहीं कर पाऊँगा? चूँकि मैंने मनुष्य के सार को स्पष्टता से देखा है, इसलिए मैं मनुष्य को ताड़ना देने और उसका न्याय करने के योग्य हूँ, क्योंकि सभी मनुष्य मुझ से ही आए हैं परन्तु उन्हें शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है। निस्संदेह, मैं उस कार्य का आँकलन करने के भी योग्य हूँ जिसे मैंने किया है। यद्यपि इस कार्य को मेरी देह के द्वारा नहीं किया जाता है, फिर भी यह पवित्रात्मा की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है, और यह मेरा स्वरूप है। इसलिए, मैं इसे व्यक्त करने और उस कार्य को करने के योग्य हूँ जो मुझे अवश्य करना चाहिए। जो कुछ मनुष्य कहते हैं यह वही है जिसे उन्होंने अनुभव किया है। यह वही है जो उन्होंने देखा है, जिस तक उनके दिमाग पहुँच सकते हैं और जो उनकी इंद्रियाँ महसूस कर सकती हैं। यह वही है जिसकी वे संगति कर सकते हैं। देहधारी परमेश्वर के देह द्वारा कहे गए वचन पवित्रात्मा की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति हैं और उस कार्य को अभिव्यक्त करते हैं जो पवित्रात्मा के द्वारा किया गया है। देह ने इसे अनुभव किया या देखा नहीं है, परन्तु तब भी उसके अस्तित्व को व्यक्त करता है क्योंकि देह का सार पवित्रात्मा है, और वह पवित्रात्मा के कार्य को व्यक्त करता है। यद्यपि देह इस तक पहुँचने में असमर्थ है, फिर भी यह ऐसा कार्य है जिसे पवित्रात्मा के द्वारा पहले से ही किया गया है। देहधारण के पश्चात्, देह की अभिव्यक्ति के माध्यम से, वह लोगों को परमेश्वर के अस्तित्व को जानने में सक्षम बनाता है और लोगों को परमेश्वर के स्वभाव और उस कार्य को देखने देता है जो उसने किया है। मनुष्य का कार्य लोगों को इस बारे में अधिक स्पष्ट होने में सक्षम बनाता है कि उन्हें किसमें प्रवेश करना चाहिए और उन्हें क्या समझना चाहिए; इसमें लोगों की सत्य को समझने और अनुभव करने के लिए अगुवाई करना शामिल है। मनुष्य का कार्य लोगों को बनाए रखना है; परमेश्वर का कार्य मानवजाति के लिए नए मार्गों को प्रशस्त करना और नए युगों को प्रशस्त करना, और लोगों को परमेश्वर के स्वभाव को जानने में सक्षम बनाते हुए, उनके सामने वह प्रकट करना है जिसे नश्वर मनुष्यों के द्वारा नहीं जाना जाता है। परमेश्वर का कार्य सम्पूर्ण मानवजाति की अगुवाई करना है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य' से उद्धृत

459. मनुष्य का कार्य उसके अनुभव और उसकी मानवता का प्रतिनिधित्व करता है। जो कुछ मनुष्य प्रदान करता है और मनुष्य जिस कार्य को करता है वह उसका प्रतिनिधित्व करता है। मनुष्य का देखना, मनुष्य की विवेक-बुद्धि, मनुष्य का तर्क और उसकी समृद्ध कल्पना सभी उसके कार्य में शामिल होते हैं। विशेष रूप में, मनुष्य का अनुभव उसके कार्य का प्रतिनिधित्व करने में अधिक समर्थ है, और जो कुछ किसी व्यक्ति ने अनुभव किए हैं वे उसके कार्य के घटक होंगे। मनुष्य का कार्य उसके अनुभव को व्यक्त कर सकता है। जब कुछ लोग निष्क्रिय अवस्था में अनुभव कर रहे होते हैं, तो उनकी अधिकांश संगति नकारात्मक तत्वों से युक्त होती है। यदि कुछ समयावधि तक उनका अनुभव सकारात्मक है और विशेष रूप से उनका मार्ग सकारात्मक पक्ष पर है, तो जिसकी वे संगति करते हैं वह अत्यंत प्रोत्साहक होता है, और लोग उनसे सकारात्मक आपूर्ति को प्राप्त कर पाएँगे। यदि कोई कार्यकर्ता कुछ समयावधि तक निष्क्रिय हो जाता है, तो उसकी संगति हमेशा नकारात्मक तत्वों को वहन करेगी। इस प्रकार की संगति निराशाजनक होती है, और अन्य लोग उसकी संगति का अनुसरण करके अवचेतन रूप से निराश हो जाएँगे। अगुवे के आधार पर अनुयायियों की अवस्था बदलती है। एक कार्यकर्ता भीतर से वैसा होता है जैसा वह व्यक्त करता है, और पवित्र आत्मा का कार्य प्रायः मनुष्य की अवस्था के साथ बदल जाता है। वह मनुष्य के अनुभव के आधार पर कार्य करता है और उसे बाध्य नहीं करता है बल्कि मनुष्य के अनुभव के सामान्य मार्ग के अनुसार उससे माँग करता है। कहने का तात्पर्य है कि मनुष्य की संगति परमेश्वर के वचन से भिन्न होती है। जो कुछ मनुष्य संगति करते हैं वह उनके व्यक्तिगत देखने और अनुभव को सूचित करती है, और परमेश्वर के कार्य के आधार पर जो कुछ उन्होंने देखा और अनुभव किया है उन्हें व्यक्त करती है। उनकी ज़िम्मेदारी, परमेश्वर के कार्य करने या बोलने के पश्चात्, यह पता लगाना है कि उन्हें किसका अभ्यास करना चाहिए, या किसमें प्रवेश करना चाहिए, और तब इसे अनुयायियों को सौंपना है। इसलिए, मनुष्य का कार्य उसके प्रवेश और अभ्यास का प्रतिनिधित्व करता है। निस्संदेह, ऐसा कार्य मानवीय सबकों और अनुभव या कुछ मानवीय विचारों के साथ मिश्रित होता है। चाहे पवित्र आत्मा किसी भी तरह से कार्य क्यों न करे, चाहे वह मनुष्यों में कार्य करे या देहधारी परमेश्वर में, ये हमेशा कार्यकर्ता ही होते हैं जो व्यक्त करते हैं कि वे क्या हैं। यद्यपि यह पवित्र आत्मा ही होता है जो कार्य करता है, फिर भी मनुष्य अंतर्निहित रूप से जैसा होता है कार्य उस पर आधारित होता है, क्योंकि पवित्र आत्मा बिना आधार के कार्य नहीं करता है। दूसरे शब्दों में, कार्य को शून्य में से नहीं किया जाता है, बल्कि यह हमेशा वास्तविक परिस्थितियों और वास्तविक स्थितियों के अनुसार होता है। केवल इसी तरह से ही मनुष्य के स्वभाव को रूपान्तरित किया जा सकता है, कि उसकी पुरानी अवधारणाओं और पुराने विचारों को बदला जा सकता है। जो कुछ मनुष्य देखता, अनुभव करता, और कल्पना कर सकता है वह उसे अभिव्यक्त करता है। भले ही ये सिद्धान्त या अवधारणाएँ हों, इन सभी तक मनुष्य की सोच पहुँच सकती है। भले ही मनुष्य के कार्य का आकार कुछ भी हो, यह मनुष्य के अनुभव के दायरे, जो मनुष्य देखता है, या जिसकी मनुष्य कल्पना या जिसका विचार कर सकता है, उनसे बढ़कर नहीं हो सकता है। जो कुछ परमेश्वर प्रकट करता है परमेश्वर स्वयं वही है, और यह मनुष्य की पहुँच से परे, अर्थात्, मनुष्य की सोच से परे है। वह सम्पूर्ण मानवजाति की अगुवाई करने के अपने कार्य को व्यक्त करता है, और यह मानव अनुभव के विवरणों के प्रासंगिक नहीं है, बल्कि इसके बजाए यह उसके अपने प्रबंधन से सम्बन्धित है। मनुष्य अपने अनुभव को व्यक्त करता है, जबकि परमेश्वर अपने अस्तित्व को व्यक्त करता है—यह अस्तित्व उसका अंतर्निहित स्वभाव है और यह मनुष्य की पहुँच से परे है। मनुष्य का अनुभव उसका देखना और परमेश्वर की अपने अस्तित्व की अभिव्यक्ति के आधार पर प्राप्त किया गया उसका ज्ञान है। ऐसा देखना और ज्ञान मनुष्य का अस्तित्व कहलाता है। ये मनुष्य के अंतर्निहित स्वभाव और उसकी वास्तविक क्षमता के आधार पर व्यक्त होते हैं; इसलिए इन्हें मनुष्य का अस्तित्व भी कहा जाता है। जो कुछ मनुष्य देखता और अनुभव करता है वह उसकी संगति कर पाता है। जो कुछ उसने अनुभव नहीं किया है या देखा नहीं है या जिस तक उसका मन नहीं पहुँच सकता है, अर्थात्, ऐसी चीज़ें जो उसके भीतर नहीं हैं, वह उसकी संगति करने में असमर्थ है। यदि जो कुछ मनुष्य व्यक्त करता है वह उसका अनुभव नहीं है, तो यह उसकी कल्पना या सिद्धान्त है। एक शब्द में, उसके वचनों में कोई वास्तविकता नहीं होती है। यदि तुमने समाज की चीज़ों से कभी संपर्क नहीं किया है, तो तुम समाज के जटिल सम्बन्धों की स्पष्टता से संगति करने में समर्थ नहीं होगे। यदि तुम्हारा कोई परिवार नहीं है परन्तु अन्य लोग परिवारिक मुद्दों के बारे में बात कर रहे हैं, तो जो कुछ वे कह रहे हैं तुम उनकी अधिकांश बातों को नहीं समझ सकते हो। इसलिए, जो कुछ मनुष्य संगति करता है और जिस कार्य को वह करता है वह उसके भीतरी अस्तित्व का प्रतिनिधित्व करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य' से उद्धृत

460. मनुष्य के कार्य का एक विस्तार और सीमाएँ हैं। एक व्यक्ति केवल किसी निश्चित चरण के कार्य को करने में समर्थ होता है और सम्पूर्ण युग के कार्य को नहीं कर सकता हैं—अन्यथा, वह लोगों को नियमों के भीतर ले जाएगा। मनुष्य के कार्य को केवल एक विशेष समय या चरण पर ही लागू किया जा सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि मनुष्य के अनुभव का एक दायरा होता है। कोई व्यक्ति परमेश्वर के कार्य के साथ मनुष्य के कार्य की तुलना नहीं कर सकता है। मनुष्य के अभ्यास करने के तरीके और सत्य का उसका ज्ञान ये सभी एक विशेष दायरे में लागू होते हैं। तुम नहीं कह सकते हो कि जिस मार्ग पर मनुष्य चलता है वह पूरी तरह से पवित्र आत्मा की इच्छा है, क्योंकि मनुष्य को केवल पवित्र आत्मा के द्वारा ही प्रबुद्ध किया जा सकता है और उसे पवित्र आत्मा से पूरी तरह से भरा नहीं जा सकता है। जिन चीज़ों को मनुष्य अनुभव कर सकता है वे सभी सामान्य मानवता के दायरे के भीतर हैं और वे सामान्य मानवीय मन में विचारों की सीमाओं से आगे नहीं बढ़ सकती हैं। वे सभी लोग, जो सत्य की वास्तविकता को जी सकते हैं, इस सीमा के भीतर अनुभव करते हैं। जब वे सत्य का अनुभव करते हैं, तो यह हमेशा पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता के अधीन सामान्य मानवीय जीवन का एक अनुभव होता है, उस तरह से अनुभव करना नहीं है जो सामान्य मानवीय जीवन से भटक जाता है। वे अपने मानवीय जीवन को जीने की बुनियाद पर पवित्र आत्मा के द्वारा प्रबुद्ध किए गए सत्य का अनुभव करते हैं। इसके अतिरिक्त, यह सत्य अलग-अलग व्यक्तियों पर अलग-अलग होता है, और इसकी गहराई उस व्यक्ति की अवस्था से सम्बन्धित होती है। कोई केवल इतना ही कह सकता है कि जिस मार्ग पर वे चलते हैं वह ऐसे मनुष्य का सामान्य जीवन है जो सत्य की खोज कर रहा है, और यह कि यह किसी ऐसे सामान्य व्यक्ति के द्वारा चला गया मार्ग है जिसके पास पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता है। तुम नहीं कह सकते हो कि जिस मार्ग पर वे चलते हैं वह ऐसा मार्ग है जिसे पवित्र आत्मा द्वारा लिया गया है। सामान्य मानवीय अनुभव में, क्योंकि जो लोग अनुसरण करते हैं वे एक समान नहीं होते हैं, इसलिए पवित्र आत्मा का कार्य भी एक समान नहीं होता है। इसके अतिरिक्त, क्योंकि जिन परिवेशों का वे अनुभव करते हैं और उनके अनुभव की सीमाएँ एक समान नहीं होती हैं, इसलिए उनके मन और विचारों के मिश्रण की वजह से, उनका अनुभव विभिन्न अंशों तक मिश्रित हो जाता है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत विभिन्न परिस्थितियों के अनुसार ही किसी सच्चाई को समझता है। सत्य के वास्तविक अर्थ की उनकी समझ पूर्ण नहीं होती है और यह इसका केवल एक या कुछ ही पहलू होते हैं। जिस दायरे के द्वारा मनुष्य के द्वारा सत्य का अनुभव किया जाता है वह हमेशा ही व्यक्तित्वों की विभिन्न परिस्थितियों पर आधारित होता है और इसलिए यह एक समान नहीं होता है। इस तरह, एक ही सत्य के बारे में विभिन्न लोगों के द्वारा व्यक्त किया गया ज्ञान एक समान नहीं होता है। कहने का तात्पर्य है कि, मनुष्य के अनुभव में हमेशा सीमाएँ होती हैं और यह पवित्र आत्मा की इच्छा को पूरी तरह से नहीं दर्शा सकता है, और मनुष्य के कार्य का परमेश्वर के कार्य के समान अर्थ नहीं लगाया जा सकता है, भले ही जो कुछ मनुष्य के द्वारा व्यक्त किया जाता है वह बहुत नज़दीक से परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप हो, भले ही मनुष्य का अनुभव पवित्र आत्मा के द्वारा किए जाने वाले सिद्ध करने के कार्य के बेहद करीब हो। मनुष्य केवल परमेश्वर का सेवक हो सकता है, केवल उस कार्य को कर सकता है जो परमेश्वर उसे सौंपता है। मनुष्य केवल पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता के अधीन ही ज्ञान को और अपने व्यक्तिगत अनुभवों से अर्जित सच्चाईयों को व्यक्त कर सकता है। मनुष्य अयोग्य है और उसके पास पवित्र आत्मा का अभिव्यक्ति-मार्ग बनने की स्थितियाँ नहीं हैं। वह यह कहने का हक़दार नहीं है कि मनुष्य का कार्य परमेश्वर का कार्य है। मनुष्य के पास मनुष्य के कार्य करने के सिद्धान्त हैं, और सभी मनुष्यों के पास भिन्न-भिन्न अनुभव होते हैं और उनकी अलग-अलग स्थितियाँ होती हैं। मनुष्य के कार्य में पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता के अधीन उसके सभी अनुभव शामिल होते हैं। ये अनुभव केवल मनुष्य के अस्तित्व का प्रतिनिधित्व करते हैं और परमेश्वर के अस्तित्व या पवित्र आत्मा की इच्छा का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं। इसलिए, मनुष्य के द्वारा चले गए मार्ग को पवित्र आत्मा के द्वारा चला गया मार्ग नहीं कहा जा सकता है क्योंकि मनुष्य का कार्य परमेश्वर के कार्य का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता और मनुष्य का कार्य और मनुष्य का अनुभव पवित्र आत्मा की सम्पूर्ण इच्छा नहीं हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य' से उद्धृत

461. ऐसे लोगों के कार्य में बहुत कम विचलन होता है, जो काट-छाँट, निपटने, न्याय, और ताड़ना से होकर गुज़र चुके हैं, और उनके कार्य की अभिव्यक्ति बहुत अधिक सटीक होती है। जो लोग कार्य करने के लिए अपनी स्वाभाविकता पर निर्भर होते हैं वे काफी बड़ी ग़लतियाँ करते हैं। जो लोग सिद्ध नहीं हैं उनके कार्य में बहुत अधिक स्वाभाविकता होती है, जो पवित्र आत्मा के कार्य में बड़ा अवरोध उत्पन्न करती है। किसी व्यक्ति की क्षमता कितनी ही अच्छी क्यों न हो, उसे परमेश्वर के आदेश का कार्य करने से पहले काट-छाँट, व्यवहार और न्याय का अनुभव अवश्य करना चाहिए। यदि वे ऐसे न्याय से होकर नहीं गुज़रे हैं, तो चाहे वे कितना ही अच्छा करें, यह सत्य के सिद्धान्तों के अनुरूप नहीं हो सकता है और यह पूरी तरह से स्वाभाविकता और मानवीय भलाई है। काट-छाँट, निपटने और न्याय से होकर गुज़र चुके लोगों का कार्य उन लोगों के कार्य से कहीं अधिक सटीक होता है, जिनकी काट-छाँट, निपटना और न्याय नहीं किया गया है। जो लोग न्याय से होकर नहीं गुज़रे हैं वे मानवीय देह और विचारों के सिवाए और कुछ भी व्यक्त नहीं करते हैं, जिसमें बहुत सारी मानवीय बुद्धि और जन्मजात प्रतिभाएँ मिली हुई होती हैं। यह परमेश्वर के कार्य की मनुष्य की परिशुद्ध अभिव्यक्ति नहीं है। जो लोग उनका अनुसरण करते हैं उन्हें उनकी जन्मजात क्षमता के द्वारा उनके सामने लाया जाता है। क्योंकि वे मनुष्य के बहुत दृष्टि-बोधों और अनुभवों को व्यक्त करते हैं, जो परमेश्वर के मूल इरादे से लगभग वियोजित हैं, और इससे बहुत दूर भटक जाते हैं, इसलिए इस प्रकार के व्यक्ति का कार्य लोगों को परमेश्वर के सम्मुख लाने में असमर्थ है, परन्तु अपने सामने लाने में समर्थ है। इसलिए जो लोग न्याय और ताड़ना से होकर नहीं गुज़रे हैं वे परमेश्वर के आदेश के कार्य को कार्यान्वित करने में असमर्थ हैं। ... यदि किसी मनुष्य को सिद्ध नहीं किया गया है और उसके भ्रष्ट स्वभाव की काट-छाँट नहीं की गई है और उसके साथ निपटा नहीं गया है, तो जो कुछ वह व्यक्त करता है और सच्चाई के बीच एक बहुत बड़ा अन्तराल होगा; यह उसकी कल्पना और एक-तरफा अनुभव, इत्यादि जैसी अस्पष्ट चीज़ों के साथ घुल मिल जाएगा। इसके अतिरिक्त, भले ही वह किसी भी प्रकार से कार्य करे, लोग महसूस करते हैं कि यहाँ कुल मिला कर ऐसा कोई लक्ष्य और कोई सत्य नहीं है जो सभी लोगों के प्रवेश के लिए उपयुक्त हो। लोगों पर डाली गई माँगें अपेक्षा करती हैं कि वे वह करें जो उनके बस के बाहर है, यह एक बत्तख को उसके मचान में हाँकना है। यह मनुष्य की इच्छा-शक्ति का कार्य है। मनुष्य का भ्रष्ट स्वभाव, उसके विचार और उसकी अवधारणाएँ उसके शरीर के सभी अंगों में व्याप्त हैं। मनुष्य सत्य का अभ्यास करने के सहज-ज्ञान के साथ पैदा नहीं होता है, न ही उसके पास सीधे तौर पर सत्य को समझने का सहज-ज्ञान होता है। इसे मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव के साथ जोड़ने पर, जब इस प्रकार का प्राकृतिक व्यक्ति कार्य करता है, तो क्या इससे व्यवधान नहीं होते? परन्तु ऐसा मनुष्य जिसे सिद्ध किया जा चुका है उसके पास सत्य का अनुभव होता है जिसे लोगों को समझना चाहिए, और उनके भ्रष्ट स्वभाव का ज्ञान होता है, ताकि उसके कार्य की अस्पष्ट और अवास्तविक चीज़ें धीरे-धीरे कम हो जाती हैं, मानवीय मिलावटें कम हो जाती हैं और उसका काम और सेवा परमेश्वर द्वारा अपेक्षित मानकों के और भी करीब पहुँच जाता है। इस प्रकार, उसका काम सत्य की वास्तविकता में प्रवेश कर गया है और वास्तविक भी बन गया है। मनुष्य के मन के विचार विशेष रूप से पवित्र आत्मा के कार्य को अवरुद्ध करते हैं। मनुष्य के पास एक समृद्ध कल्पना और न्यायसंगत तर्क और मामलों से निपटने के पुराने अनुभव होते हैं। यदि ये काट-छाँट और सुधार से होकर नहीं गुज़रते हैं, तो कार्य में वे सभी बाधाएँ हैं। इसलिए मनुष्य का कार्य सबसे परिशुद्ध स्तर तक नहीं पहुँच सकता है, विशेष रूप से ऐसे लोगों का कार्य जो सिद्ध नहीं हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य' से उद्धृत

462. मनुष्य के कार्य का झुकाव नियम में पड़ने की ओर होता है, और उसके कार्य करने की पद्धति आसानी से एक सीमित दायरे में सीमित हो जाती है और यह लोगों की स्वतंत्र मार्ग में अगुवाई करने में असमर्थ है। अधिकांश अनुयायी एक सीमित दायरे में जीवन बिताते हैं, और उनके अनुभव करने का तरीका भी अपने आप के दायरे में सीमित होता है। मनुष्य का अनुभव हमेशा सीमित होता है; उसके कार्य करने की पद्धति भी कुछ प्रकारों तक ही सीमित होती है और पवित्र आत्मा के कार्य से या स्वयं परमेश्वर के कार्य से इसकी तुलना नहीं की जा सकती है—ऐसा इसलिए है क्योंकि अंततः मनुष्य का अनुभव सीमित होता है। परमेश्वर अपना कार्य जिस भी तरह से करता है, इसके लिए कोई नियम नहीं है; इसे किसी भी तरह से किया जाता है, यह एक तरीके तक सीमित नहीं है। परमेश्वर के कार्य के लिए किसी भी प्रकार के कोई नियम नहीं हैं—उसका समस्त कार्य मुक्त और स्वतंत्र होता है। भले ही मनुष्य उसका अनुसरण करते हुए कितना ही समय क्यों न बिताएँ, वे उसके कार्य करने के किसी भी नियम का सार नहीं निकाल सकते हैं। यद्यपि उसका कार्य सैद्धांतिक है, फिर भी इसे हमेशा नए तरीकों से किया जाता है और इसमें हमेशा नये-नये विकास होते रहते हैं, जो मनुष्य की पहुँच से परे है। एक समयावधि के दौरान, परमेश्वर के पास भिन्न-भिन्न प्रकार के कार्य और भिन्न-भिन्न तरीकों की अगुवाई हो सकती है, जो लोगों को अनुमति देती हो कि उनके पास हमेशा नए-नए प्रवेश और नए-नए परिवर्तन हों। तुम उसके कार्य के नियमों का पता नहीं लगा सकते हो क्योंकि वह हमेशा नए तरीकों से कार्य कर रहा है। केवल इस तरह से ही परमेश्वर के अनुयायी नियमों में नहीं पड़ते हैं। स्वयं परमेश्वर का कार्य हमेशा लोगों की अवधारणाओं से परहेज करता है और उनकी अवधारणाओं का विरोध करता है। केवल ऐसे लोग ही अपने स्वभावों को रूपान्तरित करवा सकते हैं और किसी भी प्रकार के नियमों के अधीन किए गए बिना या किसी भी धार्मिक अवधारणाओं के द्वारा अवरुद्ध किए गए बिना स्वतन्त्रता से जीवन जी पाते हैं जो एक सच्चे हृदय से उसका अनुसरण करते हैं और उसकी खोज करते हैं। जो माँगें मनुष्य का कार्य लोगों से करता है वे उसके स्वयं के अनुभव और उस चीज़ पर आधारित होती हैं जिन्हें वह स्वयं प्राप्त कर सकता है। इन अपेक्षाओं का स्तर एक निश्चित दायरे के भीतर सीमित होता है, और अभ्यास के तरीके भी बहुत सीमित होते हैं। इसलिए अनुयायी सीमित दायरे के भीतर अवचेतन रूप से जीवन बिताते हैं; जैसे-जैसे समय गुज़रता है, वे नियम और रिवाज़ बन जाते हैं। यदि एक अवधि के कार्य की अगुवाई ऐसे व्यक्ति के द्वारा की जाती है जो परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से सिद्ध किए जाने से होकर नहीं गुज़रा है और जिसने न्याय प्राप्त नहीं किया है, तो उसके सभी अनुयायी कट्टर धर्मावलम्बी बन जाएँगे और परमेश्वर का विरोध करने में माहिर हो जाएँगे। इसलिए, यदि कोई योग्य अगुवा है, तो उसे न्याय से होकर अवश्य गुज़रा होना और सिद्ध किए जाने को अवश्य स्वीकार किया होना चाहिए। जो लोग न्याय से होकर नहीं गुज़रे हैं, भले ही उनमें पवित्र आत्मा का कार्य हो, वे केवल अस्पष्ट और अवास्तविक चीज़ों को ही व्यक्त करते हैं। समय के साथ, वे लोगों को अस्पष्ट और अलौकिक नियमों की ओर ले जाएँगे। जो कार्य परमेश्वर क्रियान्वित करता है वह मनुष्य की देह के साथ मेल नहीं खाता है; यह मनुष्य के विचारों के साथ मेल नहीं खाता है बल्कि मनुष्य की अवधारणाओं का विरोध करता है; यह अस्पष्ट धार्मिक रंग के साथ मिश्रित नहीं होता है। उसके कार्य के परिणामों को ऐसे व्यक्ति के द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता है जो उसके द्वारा सिद्ध नहीं किया गया है और वे मनुष्य की सोच से परे होते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य' से उद्धृत

463. जो कार्य मनुष्य के मन में होता है उसे बहुत ही आसानी से मनुष्य के द्वारा प्राप्त किया जाता है। उदाहरण के लिए, धार्मिक संसार के पादरी और अगुवे अपने कार्य को करने के लिए अपनी प्रतिभाओं और पदों पर भरोसा रखते हैं। जो लोग लम्बे समय तक उनका अनुसरण करेंगे वे उनकी प्रतिभाओं के द्वारा संक्रमित हो जाएँगे और जो वे हैं उसमें से कुछ के द्वारा प्रभावित हो जाएँगे। वे लोगों की प्रतिभाओं, योग्यताओं और ज्ञान पर ध्यान केन्द्रित करते हैं, और वे कुछ अलौकिक चीज़ों और अनेक गम्भीर अवास्तविक सिद्धान्तों पर ध्यान देते हैं (निस्संदेह, ये गम्भीर सिद्धान्त अप्राप्य हैं)। वे लोगों के स्वभाव में परिवर्तनों पर ध्यान केन्द्रित नहीं करते हैं, बल्कि इसके बजाए वे लोगों के उपदेश देने और कार्य करने की योग्यताओं को प्रशिक्षित करने, लोगों के ज्ञान और उनके प्रचुर धार्मिक सिद्धांतों को सुधारने पर ध्यान केन्द्रित करते हैं। वे इस बात पर ध्यान केन्द्रित नहीं करते हैं कि लोगों के स्वभाव में कितना परिवर्तन हुआ है या लोग सत्य को कितना समझते हैं। वे लोगों के सार के साथ अपने आपको नहीं जोड़ते हैं, और वे लोगों की सामान्य और असामान्य दशाओं को जानने की कोशिश तो बिल्कुल भी नहीं करते हैं। वे लोगों की धारणाओं का विरोध नहीं करते, न ही वे अपनी धारणाओं को प्रकट करते हैं, और वे लोगों की कमियों या भ्रष्टताओं के लिए उनकी काट-छाँट तो बिल्कुल भी नहीं करते। अनुसरण करने वाले अधिकांश लोग अपनी प्रतिभाओं के द्वारा सेवा करते हैं, और जो कुछ वे प्रदर्शित करते हैं वह ज्ञान धार्मिक धारणाएँ और धर्मविधि-संबंधी सिद्धान्त हैं, जिनका वास्तविकता के साथ कोई नाता नहीं है और वे लोगों को जीवन प्रदान करने में पूरी तरह से असमर्थ हैं। वास्तव में, उनके कार्य का सार प्रतिभाओं का पोषण करना, शून्य वाले किसी व्यक्ति का पोषण करके उसे एक योग्य सेमेनरी स्नातक बनना है जो बाद में कार्य और अगुवाई करने के लिए जाता है। परमेश्वर के छः हज़ार वर्षों के कार्य में क्या तुम इसके किसी नियम का पता लगा सकते हो? मनुष्य जिस कार्य को करता है उसमें बहुत से नियम और प्रतिबन्ध होते हैं, और मानवीय मस्तिष्क बहुत ही कट्टर है। इसलिए जो कुछ मनुष्य व्यक्त करता है वह उसके समस्त अनुभवों के भीतर उसका थोड़ा सा ज्ञान और एहसास होता है। मनुष्य इसके अलावा कुछ भी व्यक्त करने में असमर्थ है। मनुष्य के अनुभव या उसका ज्ञान उसकी जन्मजात प्रतिभाओं या सहज प्रवृत्ति से उत्पन्न नहीं होते हैं; वे परमेश्वर के मार्गदर्शन और परमेश्वर की प्रत्यक्ष चरवाही की वजह से उत्पन्न होते हैं। मनुष्य के पास केवल इस चरवाही को स्वीकार करने का अंग है और उसके पास वह अंग नहीं है जिससे वह सीधे तौर पर यह अभिव्यक्त करे कि दिव्यता क्या है। मनुष्य स्रोत बनने में असमर्थ है, वह केवल ऐसा पात्र हो सकता है जो स्रोत से पानी को स्वीकार करता है; यह मनुष्य की सहज प्रवृत्ति है, ऐसा अंग है जो मनुष्य होने के नाते उसके पास होना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर के वचन को ग्रहण करने वाले उस अंग को गँवा देता है और मानवीय सहज प्रवृत्ति को गँवा देता है, तो वह व्यक्ति उसे भी खो देता है जो अत्यंत बहुमूल्य है, और सृजित किए गए मनुष्य के कर्तव्य को गँवा देता है। यदि किसी मनुष्य के पास परमेश्वर के वचन या कार्य का ज्ञान या अनुभव नहीं है, तो वह व्यक्ति अपने कर्तव्य को, ऐसे कर्तव्य को जो उसे एक सृजित किए गए प्राणी के रूप में निभाना चाहिए, गँवा देता है, और वह एक सृजित किए गए प्राणी के रूप में अपनी गरिमा को गँवा देता है। यह व्यक्त करना परमेश्वर की सहज प्रवृत्ति है कि दिव्यता क्या है, इसे देह में या सीधे तौर पर पवित्रात्मा के द्वारा व्यक्त किया जाता है; यह परमेश्वर की सेवकाई है। मनुष्य परमेश्वर के कार्य के दौरान या उसके बाद अपने स्वयं के अनुभवों या ज्ञान (अर्थात्, जो वह है उसे व्यक्त करता है) को व्यक्त करता है; यह मनुष्य की सहज प्रवृत्ति और मनुष्य का कर्तव्य है, यह वही है जिसे मनुष्य को प्राप्त करना चाहिए। यद्यपि मनुष्य की अभिव्यक्ति उससे बहुत कम पड़ती है जो परमेश्वर व्यक्त करता है, और जो कुछ मनुष्य व्यक्त करता है उसमें बहुत से नियम होते हैं, फिर भी मनुष्य को उसके द्वारा निभाए जाने वाले कर्तव्य को अवश्य निभाना चाहिए और उसे उस कार्य को करना चाहिए जो उसे अवश्य करना है। मनुष्य को अपने कर्तव्य को निभाने के लिए हर उस चीज़ को करना चाहिए जो मानवीय रूप से सम्भव है, और उसमें थोड़ा सा भी सन्देह नहीं होना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य' से उद्धृत

464. कुछ लोग पूछेंगे, "देहधारी परमेश्वर के द्वारा किये गए कार्य और अतीत के भविष्यद्वक्ताओं और प्रेरितों के द्वारा किये गए कार्य में क्या अन्तर है?" दाऊद को भी प्रभु कहकर पुकारा गया था, और उसी प्रकार यीशु को भी; यद्यपि उन्होंने जो कार्य किया वह भिन्न था, फिर भी उन्हें एक जैसे ही नाम से पुकारा गया था। तुम क्यों कहते हो कि उनकी पहचान एक जैसी नहीं थी? जिसकी यूहन्ना ने गवाही दी थी वह एक दर्शन था, ऐसा दर्शन जो पवित्र आत्मा से भी आया था, और वह उन वचनों को कहने में समर्थ था जो पवित्र आत्मा ने कहने का इरादा किया था; तो यूहन्ना की पहचान यीशु से भिन्न क्यों है? यीशु के द्वारा कहे गए वचन परमेश्वर का पूरी तरह से प्रतिनिधित्व करने, और परमेश्वर के कार्य का पूरी तरह से प्रतिनिधित्व करने में समर्थ थे। जो यूहन्ना ने देखा वह एक दर्शन था, और वह परमेश्वर के कार्य का पूरी तरह से प्रतिनिधित्व करने में असमर्थ था। ऐसा क्यों है कि यूहन्ना, पतरस, और पौलुस ने बहुत से वचन कहे—जैसे यीशु ने कहे थे—फिर भी उनके पास यीशु के समान पहचान नहीं थी? मुख्य रूप से ऐसा इसलिए है क्योंकि उन्होंने जो कार्य किया वह भिन्न था। यीशु ने परमेश्वर के आत्मा का प्रतिनिधित्व किया, और वह परमेश्वर का आत्मा था जो सीधे तौर पर कार्य कर रहा था। उसने नये युग का कार्य किया, ऐसा कार्य जिसे पहले कभी किसी ने नहीं किया था। उसने एक नया मार्ग प्रशस्त किया, उसने यहोवा का प्रतिनिधित्व किया, और उसने स्वयं परमेश्वर का प्रतिनिधित्व किया। जबकि पतरस, पौलुस और दाऊद, इस बात की परवाह किए बिना कि उन्हें क्या कहकर पुकारा जाता था, उन्होंने केवल परमेश्वर के एक प्राणी की पहचान का प्रतिनिधित्व किया था, और उन्हें सिर्फ यीशु या यहोवा के द्वारा भेजा गया था। इसलिए भले ही उन्होंने कितना ही काम क्यों न किया हो, भले ही उन्होंने कितने ही बड़े चमत्कार क्यों न किये हों, वे तब भी बस परमेश्वर के प्राणी ही थे, और परमेश्वर के आत्मा का प्रतिनिधित्व करने में असमर्थ थे। उन्होंने परमेश्वर के नाम पर या परमेश्वर के द्वारा भेजे जाने के बाद ही कार्य किया था; इससे भी बढ़कर, उन्होंने यीशु या यहोवा के द्वारा शुरू किए गए युगों में कार्य किया था, और उन्होंने जो कार्य किया वह पृथक नहीं था। आख़िरकार, वे मात्र परमेश्वर के प्राणी ही थे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'उपाधियों और पहचान के सम्बन्ध में' से उद्धृत

465. अनुग्रह के युग में यीशु ने भी कई वचन बोले और बहुत कार्य किया। वह यशायाह से कैसे अलग था? वह दानिय्येल से कैसे अलग था? क्या वह कोई नबी था? ऐसा क्यों कहा जाता है कि वह मसीह है? उनके मध्य क्या भिन्नताएँ हैं? वे सभी मनुष्य थे, जिन्होंने वचन बोले थे, और उनके वचन मनुष्य को लगभग एक-से प्रतीत होते थे। उन सभी ने वचन बोले और कार्य किए। पुराने विधान के नबियों ने भविष्यवाणियाँ कीं, और उसी तरह से, यीशु भी वैसा ही कर सकता था। ऐसा क्यों है? यहाँ भेद कार्य की प्रकृति के आधार पर है। इस मामले को समझने के लिए तुम्हें देह की प्रकृति पर विचार नहीं करना चाहिए, न ही तुम्हें उनके वचनों की गहराई या सतहीपन पर विचार करना चाहिए। तुम्हें हमेशा सबसे पहले उनके कार्य और उसके द्वारा मनुष्य में प्राप्त किए जाने वाले परिणामों पर विचार करना चाहिए। उस समय नबियों द्वारा की गई भविष्यवाणियों ने मनुष्य के जीवन की आपूर्ति नहीं की, यशायाह और दानिय्येल जैसे लोगों द्वारा प्राप्त की गई प्रेरणाएँ मात्र भविष्यवाणियाँ थीं, जीवन का मार्ग नहीं। यदि यहोवा की ओर से प्रत्यक्ष प्रकाशन नहीं होता, तो कोई भी इस कार्य को नहीं कर सकता था, जो नश्वर लोगों के लिए संभव नहीं है। यीशु ने भी कई वचन बोले, परंतु वे वचन जीवन का मार्ग थे, जिनमें से मनुष्य अभ्यास का मार्ग प्राप्त कर सकता था। दूसरे शब्दों में, एक तो वह मनुष्य के जीवन की आपूर्ति कर सकता था, क्योंकि यीशु जीवन है; दूसरे, वह मनुष्यों के विचलनों को उलट सकता था; तीसरे, युग को आगे बढ़ाने के लिए उसका कार्य यहोवा के कार्य का अनुवर्ती हो सकता था; चौथे, वह मनुष्य के भीतर की आवश्यकताएँ जान सकता था और समझ सकता था कि मनुष्य में किस चीज का अभाव है; पाँचवें, वह नए युग का सूत्रपात कर सकता था और पुराने युग का समापन कर सकता था। यही कारण है कि उसे परमेश्वर और मसीह कहा जाता है; वह न केवल यशायाह से भिन्न है, अपितु अन्य सभी नबियों से भी भिन्न है। नबियों के कार्य के लिए तुलना के रूप में यशायाह को लें। पहले तो वह मनुष्य के जीवन की आपूर्ति नहीं कर सकता था; दूसरे, वह नए युग का सूत्रपात नहीं कर सकता था। वह यहोवा की अगुआई के अधीन कार्य कर रहा था, न कि नए युग का सूत्रपात करने के लिए। तीसरे, उसके द्वारा बोले गए शब्द उससे परे थे। वह सीधे परमेश्वर के आत्मा से प्रकाशन प्राप्त कर रहा था, और दूसरे लोग उन्हें सुनकर भी नहीं समझे होंगे। ये कुछ चीज़ें अकेले ही यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं कि उसके वचन भविष्यवाणियों से अधिक और यहोवा के बदले किए गए कार्य के एक पहलू से ज़्यादा कुछ नहीं थे। वह पूरी तरह से यहोवा का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता था। वह यहोवा का सेवक था, यहोवा के काम में एक उपकरण। वह केवल व्यवस्था के युग के भीतर और यहोवा के कार्य-क्षेत्र के भीतर ही कार्य कर रहा था; उसने व्यवस्था के युग से आगे कार्य नहीं किया। इसके विपरीत, यीशु का कार्य भिन्न था। उसने यहोवा के कार्य-क्षेत्र को पार कर लिया; उसने देहधारी परमेश्वर के रूप में कार्य किया और संपूर्ण मानवजाति के छुटकारे के लिए सलीब पर चढ़ गया। दूसरे शब्दों में, उसने यहोवा द्वारा किए गए कार्य के बाहर नया कार्य किया। यह नए युग का सूत्रपात करना था। इसके अतिरिक्त, वह उस बारे में बोलने में सक्षम था, जिसे मनुष्य प्राप्त नहीं कर सकता था। उसका कार्य परमेश्वर के प्रबंधन के भीतर का कार्य था, जो संपूर्ण मानवजाति को समाविष्ट करता था। उसने मात्र कुछ ही मनुष्यों में कार्य नहीं किया, न ही उसका कार्य कुछ सीमित संख्या के लोगों की अगुआई करना था। जहाँ तक इस बात का संबंध है कि कैसे परमेश्वर मनुष्य के रूप में देहधारी हुआ, कैसे उस समय पवित्रात्मा ने प्रकाशन दिए, और कैसे पवित्रात्मा कार्य करने के लिए एक मनुष्य पर उतरा, तो ये ऐसी बातें हैं, जिन्हें मनुष्य देख या छू नहीं सकता। इन सत्यों का इस बात का साक्ष्य होना सर्वथा असंभव है कि वह देहधारी परमेश्वर है। इस प्रकार, अंतर केवल परमेश्वर के वचनों और कार्य में ही किया जा सकता है, जो मनुष्य के लिए दृष्टिगोचर हैं। केवल यही वास्तविक है। इसका कारण यह है कि पवित्रात्मा के मामले तुम्हारे लिए दृष्टिगोचर नहीं हैं और केवल स्वयं परमेश्वर को ही स्पष्ट रूप से ज्ञात हैं, यहाँ तक कि देहधारी परमेश्वर का देह भी सारी चीज़ें नहीं जानता; तुम केवल उसके द्वारा किए गए कार्य से ही सत्यापन कर सकते हो कि वह परमेश्वर है या नहीं? उसके कार्यों से यह देखा जा सकता है कि एक तो वह एक नए युग की शुरुआत करने में सक्षम है; दूसरे, वह मनुष्य के जीवन की आपूर्ति करने और मनुष्य को अनुसरण का मार्ग दिखाने में सक्षम है। यह इस बात को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि वह स्वयं परमेश्वर है। कम से कम, जो कार्य वह करता है, वह पूरी तरह से परमेश्वर के आत्मा का प्रतिनिधित्व कर सकता है, और ऐसे कार्य से यह देखा जा सकता है कि परमेश्वर का आत्मा उसके भीतर है। चूँकि देहधारी परमेश्वर द्वारा किया गया कार्य मुख्य रूप से नए युग का सूत्रपात करना, नए कार्य की अगुआई करना और नया राज्य खोलना था, इसलिए ये कुछ स्थितियाँ अकेले ही यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं कि वह स्वयं परमेश्वर है। इस प्रकार यह उसे यशायाह, दानिय्येल और अन्य महान नबियों से भिन्नता प्रदान करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर' से उद्धृत

466. अनुग्रह के युग में, यूहन्ना ने यीशु का मार्ग प्रशस्त किया। वह स्वयं परमेश्वर का कार्य नहीं कर सकता था और उसने मात्र मनुष्य का कर्तव्य पूरा किया था। यद्यपि यूहन्ना प्रभु का अग्रदूत था, फिर भी वह परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने में असमर्थ था; वह पवित्र आत्मा के द्वारा उपयोग किया गया मात्र एक मनुष्य था। यीशु के बपतिस्मा के बाद पवित्र आत्मा कबूतर के समान उस पर उतरा। तब यीशु ने अपना काम आरम्भ किया, अर्थात्, उसने मसीह की सेवकाई करना प्रारम्भ किया। इसीलिए उसने परमेश्वर की पहचान को अपनाया, क्योंकि वह परमेश्वर से आया था। इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि इससे पहले उसका विश्वास कैसा था—कदाचित् कभी-कभी यह दुर्बल रहा हो, या कभी-कभी यह मज़बूत—यह सब अपनी सेवकाई को करने से पहले के उसके सामान्य मानव जीवन से संबंधित था। उसका बपतिस्मा (अभिषेक) होने के पश्चात्, उसके पास तुरन्त ही परमेश्वर की सामर्थ्य और महिमा आ गयी थी, और इस प्रकार उसने अपनी सेवकाई आरंभ की। वह चिह्न का प्रदर्शन और अद्भुत काम कर सकता था, चमत्कार कर सकता था, उसके पास सामर्थ्य और अधिकार था, क्योंकि वह सीधे स्वयं परमेश्वर की ओर से काम कर रहा था; उसने पवित्र आत्मा के बदले में उसका काम किया और पवित्रात्मा की आवाज़ को व्यक्त किया; इसलिए वह स्वयं परमेश्वर था। यह निर्विवादित है। पवित्र आत्मा के द्वारा यूहन्ना का उपयोग किया गया था। वह परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता था, न ही परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करना उसके लिए सम्भव था। यदि उसने ऐसा करने की इच्छा की होती, तो पवित्र आत्मा ने इसकी अनुमति नहीं दी होती, क्योंकि वह उस काम को नहीं कर सकता था जिसे स्वयं परमेश्वर ने सम्पन्न करने का इरादा रखता था। कदाचित् उसमें बहुत कुछ ऐसा था जो मनुष्यों की इच्छा का था, या उसमें कुछ विसामान्य था; वह किसी भी परिस्थिति में प्रत्यक्ष रूप से परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता था। उसकी अशुद्धि और ग़लतियाँ केवल उसका ही प्रतिनिधित्व करती थीं, किन्तु उसका काम पवित्र आत्मा का प्रतिनिधि था। फिर भी, तुम नहीं कह सकते हो कि उसका सर्वस्व परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करता था। क्या उसकी विसामान्यता और त्रुटियुक्त होना परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकता है? मनुष्य का प्रतिनिधित्व करने में त्रुटि होना सामान्य है, परन्तु यदि कोई परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने में विसामान्य होता है, तो क्या वह परमेश्वर के प्रति अनादर नहीं होगा? क्या वह पवित्र आत्मा के विरुद्ध ईशनिंदा नहीं होगी? पवित्र आत्मा मनुष्य को आसानी से परमेश्वर के स्थान पर खड़े होने की अनुमति नहीं देता है, भले ही दूसरों के द्वारा उसे बड़ा ठहराया गया हो। यदि वह परमेश्वर नहीं है, तो वह अंत में खड़े रहने में असमर्थ होगा। पवित्र आत्मा मनुष्य को जैसा मनुष्य चाहे वैसे परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने की अनुमति नहीं देता है! उदाहरण के लिए, पवित्र आत्मा ने यूहन्ना की गवाही दी और उसे यीशु के लिए मार्ग प्रशस्त करने वाले व्यक्ति के रूप में भी प्रकट किया, परन्तु पवित्र आत्मा के द्वारा उसमें किए गए कार्य को अच्छी तरह से नपा-तुला था। यूहन्ना से कुल इतना कहा गया था कि वह यीशु के लिए मार्ग तैयार करने वाला बने, उसके लिए मार्ग तैयार करे। कहने का अभिप्राय है, कि पवित्र आत्मा ने केवल मार्ग बनाने में उसके कार्य का समर्थन किया था और केवल इसी प्रकार के कार्य को करने की उसे अनुमति दी, अन्य किसी कार्य के लिए नहीं। यूहन्ना ने एलिय्याह का प्रतिनिधित्व किया था, उस भविष्यद्वक्ता का प्रतिनिधत्व करता था जिसने मार्ग प्रशस्त किया था। पवित्र आत्मा के द्वारा इसमें उसका समर्थन किया गया था; जब तक उसका कार्य मार्ग प्रशस्त करने का था, तब तक पवित्र आत्मा ने उसका समर्थन किया। हालाँकि, यदि उसने दावा किया होता कि वह स्वयं परमेश्वर है और छुटकारे के कार्य को पूरा करने के लिए आया है, तो पवित्र आत्मा को अवश्य उसे अनुशासित करना पड़ता। यूहन्ना का काम चाहे जितना भी बड़ा था, और चाहे पवित्र आत्मा ने उसे समर्थन दिया था, फिर भी उसका काम सीमाओं के अंतर्गत था। यह वास्तव में सत्य है कि पवित्र आत्मा के द्वारा उसके कार्य का समर्थन किया गया था, परन्तु उस समय उसे जो सामर्थ्य दी गई थी वह केवल उसके मार्ग तैयार करने तक ही सीमित थी। वह अन्य कोई काम बिल्कुल नहीं कर सकता था, क्योंकि वह सिर्फ यूहन्ना था जो मार्ग प्रशस्त करता था, वह यीशु नहीं था। इसलिए, पवित्र आत्मा की गवाही मुख्य है, किन्तु वह कार्य जिसको करने के लिए पवित्र आत्मा मनुष्य को अनुमति देता है वह और भी अधिक महत्वपूर्ण है। क्या यूहन्ना के लिए उस समय बड़ी गवाही नहीं दी गई थी? क्या उसका काम भी महान नहीं था? किन्तु जो काम उसने किया वह यीशु के काम से बढ़ कर नहीं हो सका, क्योंकि वह पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति से अधिक नहीं था और वह सीधे परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता था, और इस तरह उसने जो काम किया वह सीमित था। उसके मार्ग प्रशस्त करने का काम समाप्त करने के बाद, पवित्र आत्मा अब उसकी गवाही का समर्थन नहीं करता था, कोई भी नया काम फिर उसके पास नहीं आया, और जब परमेश्वर स्वयं का काम शुरू हुआ तो वह चला गया।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारण का रहस्य (1)' से उद्धृत

467. यीशु के द्वारा किए गए कार्य और यूहन्ना के द्वारा किए गए कार्य के बीच वास्तव में क्या अंतर था? क्या यही एकमात्र कारण था कि यूहन्ना वह व्यक्ति था जिसने यीशु के लिए मार्ग प्रशस्त किया था? या इसलिए क्योंकि इसे परमेश्वर के द्वारा पहले से ही नियत कर दिया गया था? यद्यपि यूहन्ना ने भी कहा था, "मन फिराओ, क्योंकि स्वर्ग का राज्य निकट आ गया है," और स्वर्ग के राज्य के सुसमाचार का भी उपदेश दिया, उसका कार्य को आगे नहीं बढ़ाया गया था और उसने मात्र एक आरम्भ का गठन किया था। इसके विपरीत, यीशु ने एक नए युग का सूत्रपात किया, और पुराने युग का अंत किया, किन्तु उसने पुराने विधान की व्यवस्था को भी पूरा किया। जो कार्य उसने किया था वह यूहन्ना की अपेक्षा अधिक महान था, और वह समस्त मानवजाति को छुटकारा दिलाने के लिए आया—उसने कार्य के इस चरण को पूर्ण किया। जबकि यूहन्ना ने बस मार्ग तैयार किया। यद्यपि उसका कार्य महान था, उसके वचन बहुत थे, और वे चेले जो उसका अनुसरण करते थे वे बहुतेरे थे, फिर भी उसके कार्य ने लोगों तक एक नई शुरुआत को पहुँचाने से बढ़कर और कुछ नहीं किया। न ही कभी लोगों ने उससे जीवन, मार्ग, या गहरे सत्यों को प्राप्त किया, और न ही उन्होंने उसके जरिए परमेश्वर की इच्छा की समझ को प्राप्त किया। यूहन्ना एक बहुत बड़ा भविष्यद्वक्ता (एलिय्याह) था जिसने यीशु के कार्य के लिए नई भूमि को सामने लाया और चुने हुओं को तैयार किया; वह अनुग्रह के युग का अग्रदूत था। ऐसे मुद्दों को साधारण तौर पर उनके सामान्य मानवीय प्रकटन को देखकर नहीं जाना जा सकता है। विशेष रूप से इस कारण कि यूहन्ना ने भी बहुत बड़ा काम किया; इसके अतिरिक्त, वह पवित्र आत्मा की प्रतिज्ञा के द्वारा जन्मा था, और उसके कार्य को पवित्र आत्मा के द्वारा समर्थन दिया गया था। उसी प्रकार, केवल उनके कार्य के माध्यम से उनकी अपनी-अपनी अपनी पहचान के बीच अन्तर किया जा सकता है, क्योंकि किसी मनुष्य का बाहरी प्रकटन उसके सार के बारे में नहीं बताता है, न ही कोई ऐसा तरीका है जिससे मनुष्य पवित्र आत्मा की सच्ची गवाही को सुनिश्चित करने में समर्थ हो। यूहन्ना के द्वारा किया गया कार्य और यीशु के द्वारा किया गया कार्य समान नहीं थे साथ ही अलग-अलग प्रकृतियों के थे। इसी से यह निर्धारित करना चाहिए कि वह परमेश्वर है या नहीं। यीशु का कार्य शुरूआत करना, जारी रखना, समापन करना और सफल बनाना था। इनमें से प्रत्येक चरण यीशु के द्वारा सम्पन्न किया गया था, जबकि यूहन्ना का कार्य शुरुआत से अधिक और कुछ नहीं था। आरम्भ में, यीशु ने सुसमाचार को फैलाया और पश्चाताप के मार्ग का उपदेश दिया, फिर वह मनुष्य को बपतिस्मा देने लगा, बीमारों को चंगा करने लगा, और दुष्टात्माओं को निकालने लगा। अंत में, उसने मानवजाति को पाप से छुटकारा दिलाया और सम्पूर्ण युग के अपने कार्य को पूरा किया। उसने सभी स्थानों में मनुष्य को स्वर्ग के राज्य के सुसमाचार का उपदेश दिया और उसे फैलाया। इस लिहाज से यीशु और यूहन्ना समान थे, अन्तर यह था कि यीशु ने एक नए युग का सूत्रपात किया और वह मनुष्य के लिए अनुग्रह का युग लाया। उसके मुँह से वह वचन निकला जिसका मनुष्य को अभ्यास करना चाहिए और वह मार्ग निकला जिसका मनुष्य को अनुग्रह के युग में अनुसरण करना चाहिए, और अंत में, उसने छुटकारे के कार्य को पूरा किया। ऐसा कार्य यूहन्ना के द्वारा कभी सम्पन्न नहीं किया जा सकता थ। और इसलिए, यह यीशु ही था जिसने परमेश्वर स्वयं के कार्य को किया, और वही है जो परमेश्वर स्वयं है और जो प्रत्यक्ष रूप से परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारण का रहस्य (1)' से उद्धृत

468. तुम लोगों को जानना होगा कि कैसे परमेश्वर के कार्य और मनुष्य के कार्य में विभेद किया जाए। तुम मनुष्य के कार्य से क्या देख सकते हो? मनुष्य के कार्य में मनुष्य के अनुभव के बहुत से तत्व होते हैं; मनुष्य जैसा व्यक्त करता है वह वैसा ही होता है। परमेश्वर का स्वयं का कार्य भी वही अभिव्यक्त करता है जो वह है, परन्तु जो वह है वह उससे भिन्न है जो मनुष्य है। जो कुछ मनुष्य है वह मनुष्य के अनुभव और जीवन का प्रतिनिधि है (जो कुछ मनुष्य अपने जीवन में अनुभव और सामना करता है, या जो उसके जीने के फ़लसफ़े हैं), और भिन्न-भिन्न परिवेशों में रहने वाले लोग भिन्न-भिन्न प्राणियों को व्यक्त करते हैं। तुम्हारे पास सामाजिक अनुभव हैं या नहीं और तुम वास्तव में किस प्रकार अपने परिवार में रहते और अनुभव करते हो इसे जो कुछ तुम व्यक्त करते हैं उसमें देखा जा सकता है, जबकि तुम देहधारी परमेश्वर के कार्य से यह नहीं देख सकते हो कि उसके पास सामाजिक अनुभव हैं या नहीं। वह मनुष्य के सार से अच्छी तरह से अवगत है, वह सभी प्रकार के लोगों से सम्बन्धित सभी प्रकार के अभ्यासों को प्रकट कर सकता है। वह मानव के भ्रष्ट स्वभाव और विद्रोही व्यवहार को भी बेहतर ढंग से प्रकट करता है। वह सांसारिक लोगों के बीच नहीं रहता है, परन्तु वह नश्वरों की प्रकृति और सांसारिक लोगों की समस्त भ्रष्टता से अवगत है। यही वह है। यद्यपि वह संसार के साथ निपटता नहीं है, फिर भी वह संसार के साथ निपटने के नियमों को जानता है, क्योंकि वह मानवीय प्रकृति को पूरी तरह से समझता है। वह पवित्रात्मा के आज और अतीत दोनों के कार्य के बारे में जानता है जिसे मनुष्य की आँखें नहीं देख सकती हैं और जिसे मनुष्य के कान नहीं सुन सकते हैं। इसमें बुद्धि शामिल है जो कि जीने का फ़लसफ़ा और करामातें नहीं है जिनकी थाह पाना मनुष्य के लिए कठिन है। यही वह है, लोगों के लिए खुला और लोगों से छिपा हुआ भी। जो कुछ वह व्यक्त करता है वह ऐसा नहीं है जैसा एक असाधारण मनुष्य होता है, बल्कि पवित्रात्मा के अंतर्निहित गुण और अस्तित्व हैं। वह दुनिया भर में यात्रा नहीं करता है परन्तु उसकी हर चीज़ को जानता है। वह "वन-मानुषों" के साथ सम्पर्क करता है जिनके पास कोई ज्ञान या अंतर्दृष्टि नहीं होती है, परन्तु वह ऐसे वचनों को व्यक्त करता है जो ज्ञान से ऊँचे और महान मनुष्यों से ऊपर होते हैं। वह मंदबुद्धि और संवेदनशून्य लोगों के समूह के बीच रहता है जिनमें मानवता नहीं है और जो मानवीय परम्पराओं और जीवनों को नहीं समझते हैं, परन्तु वह मनुष्यजाति से सामान्य मानवता का जीवन जीने के लिए कह सकता है, साथ ही मनुष्यजाति की नीच और अधम मानवता को प्रकट करता है। यह सब कुछ वही है जो वह है, किसी भी माँस और लहू के व्यक्ति की अपेक्षा अधिक ऊँचा है। उसके लिए, यह अनावश्यक है कि वह उस कार्य को करने के लिए जिसे उसे करने की आवश्यकता है और भ्रष्ट मनुष्यजाति के सार को पूरी तरह से प्रकट करने के लिए जटिल, बोझिल और पतित सामाजिक जीवन का अनुभव करे। पतित सामाजिक जीवन उसकी देह को शिक्षित नहीं करता है। उसके कार्य और वचन मनुष्य की अवज्ञा को ही प्रकट करते हैं और संसार के साथ निपटने के लिए मनुष्य को अनुभव और सबक प्रदान नहीं करते हैं। जब वह मनुष्य को जीवन की आपूर्ति करता है तो उसे समाज या मनुष्य के परिवार की जाँच-पड़ताल करने की आवश्यकता नहीं होती है। मनुष्य को उजागर करना और उसका न्याय करना उसकी देह के अनुभवों की अभिव्यक्ति नहीं है; यह लम्बे समय तक मनुष्य की अवज्ञा को जानने के बाद मनुष्य की अधार्मिकता को प्रकट करने और मनुष्यजाति की भ्रष्टता से घृणा करने के लिए है। जिस कार्य को परमेश्वर करता है वह सब मनुष्य के सामने अपने स्वभाव को प्रकट करने और अपने अस्तित्व को व्यक्त करने के लिए है। केवल वही इस कार्य को कर सकता है, यह कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसे माँस और लहू का व्यक्ति प्राप्त कर सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य' से उद्धृत

469. इससे पहले कि कार्य करने के लिए मनुष्य का उपयोग किया जाए, मनुष्य को विकसित होने एवं पूर्ण किये जाने की एक लम्बी समयावधि की आवश्यकता होती है और एक विशेष रूप से उच्च-स्तर की मानवता की आवश्यकता है। मनुष्य को न केवल अपनी सामान्य मानवीय समझ को बनाए रखना चाहिए, बल्कि उसे दूसरों के सामने व्यवहार के अनेक सिद्धान्तों और नियमों को भी अधिक समझना चाहिए, और इसके अतिरिक्त उसे मनुष्य की बुद्धि और नैतिकता को और अधिक सीखना चाहिए। इंसान के अंदर ये तमाम बातें होनी चाहिये। लेकिन, देहधारी परमेश्वर के लिए ऐसा नहीं है, क्योंकि उसका कार्य न तो मनुष्य का प्रतिनिधित्व करता है और न ही मनुष्यों का है; बल्कि, यह उसके अस्तित्व की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है और उस कार्य का प्रत्यक्ष कार्यान्वयन है जो उसे करना चाहिए। (स्वभाविक है कि उसका कार्य उपयुक्त समय पर किया जाता है, न कि यूँ ही बेतरतीब तरीके से किया जाता है। और उसका कार्य तब शुरू होता है जब उसकी सेवकाई को पूरा करने का समय होता है।) वह मनुष्य के जीवन में या मनुष्य के कार्य में भाग नहीं लेता है, अर्थात्, उसकी मानवता में इनमें से कुछ भी नहीं होता (हालाँकि इससे उसका कार्य प्रभावित नहीं होता है)। वह अपनी सेवकाई को केवल तब पूरा करता है जब उसके लिए ऐसा करने का समय होता है; उसकी हैसियत कुछ भी हो, वह बस उस कार्य को करने के लिए आगे बढ़ता है जो उसे करना चाहिए। मनुष्य उसके बारे में जो कुछ भी जानता है या उसके बारे में उसकी जो भी राय रखता है इससे उसके कार्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारण का रहस्य (3)' से उद्धृत

470. जिस कार्य को परमेश्वर करता है वह उसके देह के अनुभव का प्रतिनिधित्व नहीं करता है; जिस कार्य को मनुष्य करता है वह मनुष्य के अनुभव का प्रतिनिधित्व करता है। हर कोई अपने व्यक्तिगत अनुभव के बारे में बात करता है। परमेश्वर सीधे तौर पर सत्य को व्यक्त कर सकता है, जबकि मनुष्य केवल सत्य का अनुभव करने के पश्चात् ही तदनुरूप अनुभव को व्यक्त कर सकता है। परमेश्वर के कार्य में कोई नियम नहीं हैं और यह समय या भौगोलिक अवरोधों के अधीन नहीं है। वह जो है उसे वह किसी भी समय, कहीं पर भी प्रकट कर सकता है। जो वह है उसे वह किसी भी समय और किसी भी स्थान पर व्यक्त कर सकता है। उसे जैसा अच्छा लगता है वह वैसा ही करता है। मनुष्य के कार्य में परिस्थितियाँ और सन्दर्भ होते हैं; अन्यथा, वह कार्य करने में असमर्थ होता है और वह परमेश्वर के बारे में अपने ज्ञान को व्यक्त करने या सत्य के बारे में अपने अनुभव को व्यक्त करने में असमर्थ होता है। यह बताने के लिए कि क्या यह परमेश्वर का अपना कार्य है या मनुष्य का कार्य है तुम्हें बस उनके बीच अन्तर की तुलना करनी है। यदि स्वयं परमेश्वर के द्वारा किया गया कोई कार्य नहीं है और केवल मनुष्य का कार्य ही है, तो तुम्हें आसानी से पता चल जाएगा कि मनुष्य की शिक्षाएँ ऊँची हैं, किसी की भी क्षमता से परे हैं; उनके बोलने के अन्दाज़, चीज़ों को सँभालने में उनके सिद्धान्त और कार्य करने में उनका अनुभवी और स्थिर तरीका दूसरों की पहुँच से बाहर हैं। तुम सभी अच्छी क्षमता और उत्कृष्ट ज्ञान वाले इन लोगों की सराहना करते हो, परन्तु तुम परमेश्वर के कार्य और वचनों से यह नहीं देख सकते हो कि उसकी मानवता कितनी उच्च है। इसके बजाए, वह साधारण है, और कार्य करते समय, वह सामान्य और वास्तविक है परन्तु नश्वरों के लिए अथाह भी है, जो लोगों को उसके बारे में एक प्रकार का आदर भाव महसूस कराता है। कदाचित् अपने कार्य में किसी व्यक्ति का अनुभव विशेष रूप से ऊँचा हो, या उसकी कल्पना और तर्कशक्ति विशेष रूप से ऊँची हो, और उसकी मानवता विशेष रूप से अच्छी हो; ये चीज़ें केवल लोगों की प्रशंसा ही अर्जित कर सकती हैं, परन्तु उनके भय-मिश्रित आदर या डर को जागृत नहीं कर सकती हैं। सभी लोग ऐसे लोगों की प्रशंसा करते हैं जिनमें कार्य करने की क्षमता होती है और जिनके पास विशेष रुप से गहरा अनुभव होता है और जो सत्य का अभ्यास कर सकते हैं, परन्तु वे कभी भी भय-मिश्रित आदर नहीं, बस प्रशंसा और ईर्ष्या प्राप्त कर सकते हैं। परन्तु जिन लोगों ने परमेश्वर के कार्य का अनुभव कर लिया है वे परमेश्वर की प्रशंसा नहीं करते हैं, इसके बजाय वे महसूस करते हैं कि उसका कार्य मनुष्य की पहुँच से परे है और यह मनुष्य के लिए अथाह है, और यह कि यह तरोताज़ा और अद्भुत है। जब लोग परमेश्वर के कार्य का अनुभव करते हैं, तो उसके बारे में उनका पहला ज्ञान यह होता है कि वह अथाह, बुद्धिमान और अद्भुत है, और वे अवचेतन रूप से उसका आदर करते हैं और उस कार्य के रहस्य को महसूस करते हैं जो वह करता है, जो कि मनुष्य के दिमाग की पहुँच से परे है। लोग बस परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा करने, उसकी इच्छाओं को संतुष्ट करने में समर्थ होना चाहते हैं; वे उससे बढ़कर होने की इच्छा नहीं करते हैं, क्योंकि जो कार्य परमेश्वर करता है वह मनुष्य की सोच और कल्पना से परे जाता है और उसके बदले मनुष्य के द्वारा नहीं किया जा सकता है। यहाँ तक कि मनुष्य अपनी स्वयं की कमियों को भी नहीं जानता है, जबकि परमेश्वर ने एक नया मार्ग प्रशस्त किया है और वह मनुष्य को एक अधिक नए और अधिक खूबसूरत संसार में ले जाने के लिए आया है, जिससे मनुष्यजाति ने नई प्रगति की है और उसकी एक नई शुरुआत की है। जो कुछ मनुष्य परमेश्वर के लिए महसूस करता है वह प्रशंसा नहीं है, या बल्कि, यह सिर्फ सराहना नहीं है। उनका गहनतम अनुभव भय-मिश्रित आदर और प्रेम है, और उनकी भावना यह है कि परमेश्वर वास्तव में अद्भुत है। वह ऐसा कार्य करता है जिसे करने में मनुष्य असमर्थ है, वह ऐसी बातें कहता है जिसे कहने में मनुष्य असमर्थ है। जिन लोगों ने परमेश्वर के कार्य का अनुभव किया है उन्हें हमेशा एक अवर्णनीय एहसास होता है। पर्याप्त गहरे अनुभव वाले लोग परमेश्वर के लिए प्रेम को समझ सकते हैं; वे हमेशा उसकी मनोरमता को महसूस कर सकते हैं, महसूस कर सकते हैं कि उसका कार्य बहुत बुद्धिमत्तापूर्ण, और बहुत अद्भुत है, और परिणामस्वरूप यह उनके बीच उपजी असीमित सामर्थ्य है। यह डर या कभी कभार का प्रेम और आदर नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के लिए परमेश्वर की करुणा और सहिष्णुता की गहरी भावना है। हालाँकि, जिन लोगों ने उसकी ताड़ना और उसके न्याय का अनुभव किया है वे महसूस करते हैं कि वह प्रतापी और अपमान नहीं किए जाने योग्य है। यहाँ तक कि जिन लोगों ने उसके बहुत सारे कार्य का अनुभव किया है वे भी उसकी थाह पाने में असमर्थ हैं; सभी लोग जो सचमुच में उसका आदर करते हैं, जानते हैं कि उसका कार्य लोगों की अवधारणाओं से मेल नहीं खाता है बल्कि हमेशा उनकी अवधारणाओं के विरुद्ध जाता है। उसे इस बात की आवश्यकता नहीं है कि लोगों के पास सम्पूर्ण प्रशंसा हो या वे उसके प्रति समर्पण के भाव का दिखावा करें, बल्कि वह चाहता है कि उनके अंदर सच्चा आदर और सच्चा समर्पण हो। उसके इतने सारे कार्य में, सच्चे अनुभव वाला कोई भी व्यक्ति उसके लिए आदर महसूस करता है, जो प्रशंसा से बढ़कर है। लोगों ने ताड़ना और न्याय के उसके कार्य के कारण उसके स्वभाव को देखा है, और इसलिए वे अपने हृदय से उसका आदर करते हैं। परमेश्वर श्रद्धेय और आज्ञापालन करने योग्य है, क्योंकि उसका अस्तित्व और उसका स्वभाव सृजित किए गए प्राणियों के समान नहीं है, और वे सृजित किए गए प्राणियों से ऊपर हैं। परमेश्वर स्वयं अस्तित्व में रहने वाला, चिरकालीन और गैर-सृजित प्राणी है, और केवल परमेश्वर ही आदर और समर्पण के योग्य है; मनुष्य इसके योग्य नहीं है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य' से उद्धृत

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