8. परमेश्वर के कार्य को जानने पर वचन

284. परमेश्वर ने मनुष्यों का सृजन किया और उन्हें पृथ्वी पर रखा और तब से उनकी अगुआई की। फिर उसने उन्हें बचाया और मानवता के लिये पापबलि बना। अंत में, उसे अभी भी मानवता को जीतना होगा, मनुष्यों को पूरी तरह से बचाना होगा और उन्हें उनकी मूल समानता में वापस लौटाना होगा। यही वह कार्य है, जिसे वह आरंभ से करता रहा है—मनुष्य को उसकी मूल छवि और उसकी मूल समानता में वापस लौटाना। परमेश्वर अपना राज्य स्थापित करेगा और मनुष्य की मूल समानता बहाल करेगा, जिसका अर्थ है कि परमेश्वर पृथ्वी और समस्त सृष्टि पर अपने अधिकार को बहाल करेगा। मानवता ने शैतान से भ्रष्ट होने के बाद परमेश्वर के प्राणियों के साथ-साथ अपने धर्मभीरु हृदय भी गँवा दिए, जिससे वह परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण और अवज्ञाकारी हो गया। तब मानवता शैतान के अधिकार क्षेत्र में रही और शैतान के आदेशों का पालन किया; इस प्रकार, अपने प्राणियों के बीच कार्य करने का परमेश्वर के पास कोई तरीक़ा नहीं था और वह अपने प्राणियों से भयपूर्ण श्रद्धा पाने में असमर्थ हो गया। मनुष्यों को परमेश्वर ने बनाया था और उन्हें परमेश्वर की आराधना करनी चाहिए थी, पर उन्होंने वास्तव में परमेश्वर से मुँह मोड़ लिया और इसके बजाय शैतान की आराधना करने लगे। शैतान उनके दिलों में बस गया। इस प्रकार, परमेश्वर ने मनुष्य के हृदय में अपना स्थान खो दिया, जिसका मतलब है कि उसने मानवता के सृजन के पीछे का अर्थ खो दिया। इसलिए मानवता के सृजन के अपने अर्थ को बहाल करने के लिए उसे उनकी मूल समानता को बहाल करना होगा और मानवता को उसके भ्रष्ट स्वभाव से मुक्ति दिलानी होगी। शैतान से मनुष्यों को वापस प्राप्त करने के लिए, उसे उन्हें पाप से बचाना होगा। केवल इसी तरह परमेश्वर धीरे-धीरे उनकी मूल समानता और भूमिका को बहाल कर सकता है और अंत में, अपने राज्य को बहाल कर सकता है। अवज्ञा करने वाले उन पुत्रों का अंतिम तौर पर विनाश भी क्रियान्वित किया जाएगा, ताकि मनुष्य बेहतर ढंग से परमेश्वर की आराधना कर सकें और पृथ्वी पर बेहतर ढंग से रह सकें। चूँकि परमेश्वर ने मानवों का सृजन किया, इसलिए वह मनुष्य से अपनी आराधना करवाएगा; क्योंकि वह मानवता के मूल कार्य को बहाल करना चाहता है, वह उसे पूर्ण रूप से और बिना किसी मिलावट के बहाल करेगा। अपना अधिकार बहाल करने का अर्थ है, मनुष्यों से अपनी आराधना कराना और समर्पण कराना; इसका अर्थ है कि वह अपनी वजह से मनुष्यों को जीवित रखेगा और अपने अधिकार की वजह से अपने शत्रुओं के विनाश करेगा। इसका अर्थ है कि परमेश्वर किसी प्रतिरोध के बिना, मनुष्यों के बीच उस सब को बनाए रखेगा जो उसके बारे में है। जो राज्य परमेश्वर स्थापित करना चाहता है, वह उसका स्वयं का राज्य है। वह जिस मानवता की आकांक्षा रखता है, वह है, जो उसकी आराधना करेगी, जो उसे पूरी तरह समर्पण करेगी और उसकी महिमा का प्रदर्शन करेगी। यदि परमेश्वर भ्रष्ट मानवता को नहीं बचाता, तो उसके द्वारा मानवता के सृजन का अर्थ खत्म हो जाएगा; उसका मनुष्यों के बीच अब और अधिकार नहीं रहेगा और पृथ्वी पर उसके राज्य का अस्तित्व अब और नहीं रह पाएगा। यदि परमेश्वर उन शत्रुओं का नाश नहीं करता, जो उसके प्रति अवज्ञाकारी हैं, तो वह अपनी संपूर्ण महिमा प्राप्त करने में असमर्थ रहेगा, वह पृथ्वी पर अपने राज्य की स्थापना भी नहीं कर पाएगा। ये उसका कार्य पूरा होने और उसकी महान उपलब्धि के प्रतीक होंगे : मानवता में से उन सबको पूरी तरह नष्ट करना, जो उसके प्रति अवज्ञाकारी हैं और जो पूर्ण किए जा चुके हैं, उन्हें विश्राम में लाना। जब मनुष्यों को उनकी मूल समानता में बहाल कर लिया जाएगा, और जब वे अपने-अपने कर्तव्य निभा सकेंगे, अपने उचित स्थानों पर बने रह सकेंगे और परमेश्वर की सभी व्यवस्थाओं को समर्पण कर सकेंगे, तब परमेश्वर ने पृथ्वी पर उन लोगों का एक समूह प्राप्त कर लिया होगा, जो उसकी आराधना करते हैं और उसने पृथ्वी पर एक राज्य भी स्थापित कर लिया होगा, जो उसकी आराधना करता है। पृथ्वी पर उसकी अनंत विजय होगी और वे सभी जो उसके विरोध में हैं, अनंतकाल के लिए नष्ट हो जाएँगे। इससे मनुष्य का सृजन करने की उसकी मूल इच्छा बहाल होगी; इससे सब चीज़ों के सृजन की उसकी मूल इच्छा बहाल होगी और इससे पृथ्वी पर सभी चीज़ों पर और शत्रुओं के बीच उसका अधिकार भी बहाल हो जाएगा। ये उसकी संपूर्ण विजय के प्रतीक होंगे। इसके बाद से मानवता विश्राम में प्रवेश करेगी और ऐसे जीवन में प्रवेश करेगी, जो सही मार्ग पर है। मानवता के साथ परमेश्वर भी अनंत विश्राम में प्रवेश करेगा और मनुष्यों और स्वयं के साथ एक अनंत जीवन का आरंभ करेगा। पृथ्वी पर से गंदगी और अवज्ञा ग़ायब हो जाएगी, पृथ्वी पर से सारा विलाप भी समाप्त हो जाएगा और परमेश्वर का विरोध करने वाली प्रत्येक चीज़ का अस्तित्व नहीं रहेगा। केवल परमेश्वर और वही लोग बचेंगे, जिनका उसने उद्धार किया है; केवल उसकी सृष्टि ही बचेगी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे' से उद्धृत

285. मेरी संपूर्ण प्रबंधन योजना, छह-हज़ार-वर्षीय प्रबंधन योजना, के तीन चरण या तीन युग हैं : आरंभ में व्यवस्था का युग; अनुग्रह का युग (जो छुटकारे का युग भी है); और अंत के दिनों का राज्य का युग। इन तीनों युगों में मेरे कार्य की विषयवस्तु प्रत्येक युग के स्वरूप के अनुसार अलग-अलग है, परंतु प्रत्येक चरण में यह कार्य मनुष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप है—या, ज्यादा सटीक रूप में, यह शैतान द्वारा उस युद्ध में चली जाने वाली चालों के अनुसार किया जाता है, जो मैं उससे लड़ रहा हूँ। मेरे कार्य का उद्देश्य शैतान को हराना, अपनी बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता व्यक्त करना, शैतान की सभी चालों को उजागर करना और परिणामस्वरूप समस्त मानवजाति को बचाना है, जो शैतान के अधिकार-क्षेत्र के अधीन रहती है। यह मेरी बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता दिखाने के लिए और शैतान की असहनीय विकरालता प्रकट करने के लिए है; इससे भी अधिक, यह सृजित प्राणियों को अच्छे और बुरे के बीच अंतर करने देने के लिए है, यह जानने देने के लिए कि मैं सभी चीज़ों का शासक हूँ, यह देखने देने के लिए कि शैतान मानवजाति का शत्रु है, अधम है, दुष्ट है; और उन्हें पूरी निश्चितता के साथ अच्छे और बुरे, सत्य और झूठ, पवित्रता और मलिनता के बीच का अंतर बताने देने के लिए है, और यह भी कि क्या महान है और क्या हेय है। इस तरह, अज्ञानी मानवजाति मेरी गवाही देने में समर्थ हो जाएगी कि वह मैं नहीं हूँ जो मानवजाति को भ्रष्ट करता है, और केवल मैं—सृष्टिकर्ता—ही मानवजाति को बचा सकता हूँ, लोगों को उनके आनंद की वस्तुएँ प्रदान कर सकता हूँ; और उन्हें पता चल जाएगा कि मैं सभी चीज़ों का शासक हूँ और शैतान मात्र उन प्राणियों में से एक है, जिनका मैंने सृजन किया है, और जो बाद में मेरे विरुद्ध हो गया। मेरी छह-हज़ार-वर्षीय प्रबंधन योजना तीन चरणों में विभाजित है, और मैं इस तरह इसलिए कार्य करता हूँ, ताकि सृजित प्राणियों को मेरी गवाही देने, मेरी इच्छा समझ पाने, और मैं ही सत्य हूँ यह जान पाने के योग्य बनाने का प्रभाव प्राप्त कर सकूँ।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'छुटकारे के युग के कार्य के पीछे की सच्ची कहानी' से उद्धृत

286. परमेश्वर के 6,000 वर्षों के प्रबधंन-कार्य को तीन चरणों में बाँटा जाता है : व्यवस्था का युग, अनुग्रह का युग और राज्य का युग। कार्य के ये तीनों चरण मानव-जाति के उद्धार के वास्ते हैं, अर्थात् ये उस मानव-जाति के उद्धार के लिए हैं, जिसे शैतान द्वारा बुरी तरह से भ्रष्ट कर दिया गया है। किंतु, साथ ही, वे इसलिए भी हैं, ताकि परमेश्वर शैतान के साथ युद्ध कर सके। इस प्रकार, जैसे उद्धार के कार्य को तीन चरणों में बाँटा जाता है, ठीक वैसे ही शैतान के साथ युद्ध को भी तीन चरणों में बाँटा जाता है, और परमेश्वर के कार्य के ये दो पहलू एक-साथ संचालित किए जाते हैं। शैतान के साथ युद्ध वास्तव में मानव-जाति के उद्धार के वास्ते है, और चूँकि मानव-जाति के उद्धार का कार्य कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसे एक ही चरण में सफलतापूर्वक पूरा किया जा सकता हो, इसलिए शैतान के साथ युद्ध को भी चरणों और अवधियों में बाँटा जाता है, और मनुष्य की आवश्यकताओं और मनुष्य में शैतान की भ्रष्टता की सीमा के अनुसार शैतान के साथ युद्ध छेड़ा जाता है। कदाचित् मनुष्य अपनी कल्पना में यह विश्वास करता है कि इस युद्ध में परमेश्वर शैतान के विरुद्ध शस्त्र उठाएगा, वैसे ही, जैसे दो सेनाएँ आपस में लड़ती हैं। मनुष्य की बुद्धि मात्र यही कल्पना करने में सक्षम है; यह अत्यधिक अस्पष्ट और अवास्तविक सोच है, फिर भी मनुष्य यही विश्वास करता है। और चूँकि मैं यहाँ कहता हूँ कि मनुष्य के उद्धार का साधन शैतान के साथ युद्ध करने के माध्यम से है, इसलिए मनुष्य कल्पना करता है कि युद्ध इसी तरह से संचालित किया जाता है। मनुष्य के उद्धार के कार्य के तीन चरण हैं, जिसका तात्पर्य है कि शैतान को हमेशा के लिए पराजित करने हेतु उसके साथ युद्ध को तीन चरणों में विभाजित किया गया है। किंतु शैतान के साथ युद्ध के समस्त कार्य की भीतरी सच्चाई यह है कि इसके परिणाम कार्य के अनेक चरणों में हासिल किए जाते हैं : मनुष्य को अनुग्रह प्रदान करना, मनुष्य के लिए पापबलि बनना, मनुष्य के पापों को क्षमा करना, मनुष्य पर विजय पाना और मनुष्य को पूर्ण बनाना। वस्तुतः शैतान के साथ युद्ध करना उसके विरुद्ध हथियार उठाना नहीं है, बल्कि मनुष्य का उद्धार करना है, मनुष्य के जीवन में कार्य करना है, और मनुष्य के स्वभाव को बदलना है, ताकि वह परमेश्वर के लिए गवाही दे सके। इसी तरह से शैतान को पराजित किया जाता है। मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव को बदलने के माध्यम से शैतान को पराजित किया जाता है। जब शैतान को पराजित कर दिया जाएगा, अर्थात् जब मनुष्य को पूरी तरह से बचा लिया जाएगा, तो अपमानित शैतान पूरी तरह से लाचार हो जाएगा, और इस तरह से, मनुष्य को पूरी तरह से बचा लिया जाएगा। इस प्रकार, मनुष्य के उद्धार का सार शैतान के विरुद्ध युद्ध है, और यह युद्ध मुख्य रूप से मनुष्य के उद्धार में प्रतिबिंबित होता है। अंत के दिनों का चरण, जिसमें मनुष्य को जीता जाना है, शैतान के साथ युद्ध का अंतिम चरण है, और यह शैतान के अधिकार-क्षेत्र से मनुष्य के संपूर्ण उद्धार का कार्य भी है। मनुष्य पर विजय का आंतरिक अर्थ मनुष्य पर विजय पाने के बाद शैतान के मूर्त रूप—मनुष्य, जिसे शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है—का अपने जीते जाने के बाद सृजनकर्ता के पास वापस लौटना है, जिसके माध्यम से वह शैतान को छोड़ देगा और पूरी तरह से परमेश्वर के पास वापस लौट जाएगा। इस तरह मनुष्य को पूरी तरह से बचा लिया जाएगा। और इसलिए, विजय का कार्य शैतान के विरुद्ध युद्ध में अंतिम कार्य है, और शैतान की पराजय के वास्ते परमेश्वर के प्रबंधन में अंतिम चरण है। इस कार्य के बिना मनुष्य का संपूर्ण उद्धार अंततः असंभव होगा, शैतान की संपूर्ण पराजय भी असंभव होगी, और मानव-जाति कभी भी अपनी अद्भुत मंज़िल में प्रवेश करने या शैतान के प्रभाव से छुटकारा पाने में सक्षम नहीं होगी। परिणामस्वरूप, शैतान के साथ युद्ध की समाप्ति से पहले मनुष्य के उद्धार का कार्य समाप्त नहीं किया जा सकता, क्योंकि परमेश्वर के प्रबधंन के कार्य का केंद्रीय भाग मानव-जाति के उद्धार के वास्ते है। आदिम मानव-जाति परमेश्वर के हाथों में थी, किंतु शैतान के प्रलोभन और भ्रष्टता की वजह से, मनुष्य को शैतान द्वारा बाँध लिया गया और वह इस दुष्ट के हाथों में पड़ गया। इस प्रकार, परमेश्वर के प्रबधंन-कार्य में शैतान पराजित किए जाने का लक्ष्य बन गया। चूँकि शैतान ने मनुष्य पर कब्ज़ा कर लिया था, और चूँकि मनुष्य वह पूँजी है जिसे परमेश्वर संपूर्ण प्रबंधन पूरा करने के लिए इस्तेमाल करता है, इसलिए यदि मनुष्य को बचाया जाना है, तो उसे शैतान के हाथों से वापस छीनना होगा, जिसका तात्पर्य है कि मनुष्य को शैतान द्वारा बंदी बना लिए जाने के बाद उसे वापस लेना होगा। इस प्रकार, शैतान को मनुष्य के पुराने स्वभाव में बदलावों के माध्यम से पराजित किया जाना चाहिए, ऐसे बदलाव, जो मनुष्य की मूल विवेक-बुद्धि को बहाल करते हैं। और इस तरह से मनुष्य को, जिसे बंदी बना लिया गया था, शैतान के हाथों से वापस छीना जा सकता है। यदि मनुष्य शैतान के प्रभाव और बंधन से मुक्त हो जाता है, तो शैतान शर्मिंदा हो जाएगा, मनुष्य को अंततः वापस ले लिया जाएगा, और शैतान को हरा दिया जाएगा। और चूँकि मनुष्य को शैतान के अंधकारमय प्रभाव से मुक्त किया जा चुका है, इसलिए एक बार जब यह युद्ध समाप्त हो जाएगा, तो मनुष्य इस संपूर्ण युद्ध में जीत के परिणामस्वरूप प्राप्त हुआ लाभ बन जाएगा, और शैतान वह लक्ष्य बन जाएगा जिसे दंडित किया जाएगा, जिसके पश्चात् मानव-जाति के उद्धार का संपूर्ण कार्य पूरा कर लिया जाएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मनुष्य के सामान्य जीवन को बहाल करना और उसे एक अद्भुत मंज़िल पर ले जाना' से उद्धृत

287. परमेश्वर आदि और अंत है; स्वयं वही है, जो अपने कार्य को गति प्रदान करता है और इसलिए स्वयं उसी को पिछले युग का समापन करने वाला भी होना चाहिए। यही उसके द्वारा शैतान को पराजित करने और संसार को जीतने का प्रमाण है। हर बार जब स्वयं वह मनुष्य के बीच कार्य करता है, तो यह एक नए युद्ध की शुरुआत होती है। नए कार्य की शुरुआत के बिना स्वाभाविक रूप से पुराने कार्य का समापन नहीं होगा। और पुराने का समापन न होना इस बात का प्रमाण है कि शैतान के साथ युद्ध अभी तक समाप्त नहीं हुआ है। केवल स्वयं परमेश्वर के मनुष्यों के बीच आने और एक नया कार्य करने पर ही मनुष्य शैतान के अधिकार-क्षेत्र को तोड़कर पूरी तरह से स्वतंत्र हो सकता है और एक नया जीवन तथा एक नई शुरुआत प्राप्त कर सकता है। अन्यथा, मनुष्य सदैव पुराने युग में जीएगा और हमेशा शैतान के पुराने प्रभाव के अधीन रहेगा। परमेश्वर द्वारा लाए गए प्रत्येक युग के साथ मनुष्य के एक भाग को मुक्त किया जाता है, और इस प्रकार परमेश्वर के कार्य के साथ-साथ मनुष्य एक नए युग की ओर बढ़ता है। परमेश्वर की विजय का अर्थ उन सबकी विजय है, जो उसका अनुसरण करते हैं। यदि सृजित मानवजाति को युग के समापन का कार्यभार दिया जाता, तब चाहे यह मनुष्य के दृष्टिकोण से हो या शैतान के, यह परमेश्वर के विरोध या परमेश्वर के साथ विश्वासघात के कार्य से बढ़कर न होता, यह परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता का कार्य न होता, और मनुष्य का कार्य शैतान का साधन बन जाता। केवल जब मनुष्य स्वयं परमेश्वर द्वारा सूत्रपात किए गए युग में परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन और उसका अनुसरण करता है, तभी शैतान पूरी तरह से आश्वस्त हो सकता है, क्योंकि यह सृजित प्राणी का कर्तव्य है। इसलिए मैं कहता हूँ कि तुम लोगों को केवल अनुसरण और आज्ञापालन कंरने की आवश्यकता है, और इससे अधिक तुम लोगों से किसी बात की अपेक्षा नहीं की जाती। प्रत्येक व्यक्ति के द्वारा अपने कर्तव्य का पालन करने और अपने कार्य को क्रियान्वित करने का यही अर्थ है। परमेश्वर अपना काम करता है और उसे कोई आवश्यकता नहीं है कि मनुष्य उसके स्थान पर काम करे, और न ही वह सृजित प्राणियों के काम में भाग लेता है। मनुष्य अपना कर्तव्य निभाता है और परमेश्वर के कार्य में हस्तक्षेप नहीं करता। केवल यही सच्ची आज्ञाकारिता और शैतान की पराजय का सबूत है। स्वयं परमेश्वर द्वारा नए युग के सूत्रपात का कार्य पूरा कर देने के पश्चात्, वह मानवों के बीच अब और कार्य करने नहीं आता। केवल तभी एक सृजित प्राणी के रूप में मनुष्य अपना कर्तव्य और ध्येय पूरा करने के लिए आधिकारिक रूप से नए युग में कदम रखता है। ये वे सिद्धांत हैं, जिनके द्वारा परमेश्वर कार्य करता है, जिनका उल्लंघन किसी के द्वारा नहीं किया जा सकता। केवल इस तरह से कार्य करना ही विवेकपूर्ण और तर्कसंगत है। परमेश्वर का कार्य स्वयं परमेश्वर द्वारा किया जाना है। वही है, जो अपने कार्य को गति प्रदान करता है, और वही है, जो अपने कार्य का समापन करता है। वही है, जो कार्य की योजना बनाता है, और वही है, जो उसका प्रबंधन करता है, और इतना ही नहीं, वही है, जो उस कार्य को सफल बनाता है। जैसा कि बाइबल में कहा गया है, "मैं ही आदि और अंत हूँ; मैं ही बोनेवाला और काटनेवाला हूँ।" वह सब-कुछ, जो उसके प्रबंधन के कार्य से संबंधित है, स्वयं परमेश्वर द्वारा किया जाता है। वह छह-हज़ार-वर्षीय प्रबंधन योजना का शासक है; कोई भी उसके स्थान पर उसका काम नहीं कर सकता और कोई भी उसके कार्य का समापन नहीं कर सकता, क्योंकि वही है, जो सब-कुछ अपने हाथ में रखता है। संसार का सृजन करने के कारण वह संपूर्ण संसार को अपने प्रकाश में रखने के लिए उसकी अगुआई करेगा, और वह संपूर्ण युग का समापन भी करेगा और इस प्रकार अपनी संपूर्ण योजना को सफल बनाएगा!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारण का रहस्य (1)' से उद्धृत

288. परमेश्वर की संपूर्ण प्रबंधन योजना का कार्य व्यक्तिगत रूप से स्वयं परमेश्वर द्वारा किया जाता है। प्रथम चरण—संसार का सृजन—परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से किया गया था, और यदि ऐसा न किया जाता, तो कोई भी मनुष्य का सृजन कर पाने में सक्षम न हुआ होता; दूसरा चरण संपूर्ण मानव-जाति के छुटकारे का था, और उसे भी देहधारी परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से कार्यान्वित किया गया था; तीसरा चरण स्वत: स्पष्ट है : परमेश्वर के संपूर्ण कार्य के अंत को स्वयं परमेश्वर द्वारा किए जाने की और भी अधिक आवश्यकता है। संपूर्ण मानव-जाति के छुटकारे, उस पर विजय पाने, उसे प्राप्त करने, और उसे पूर्ण बनाने का समस्त कार्य स्वयं परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से किया जाता है। यदि वह व्यक्तिगत रूप से इस कार्य को न करता, तो मनुष्य द्वारा उसकी पहचान नहीं दर्शाई जा सकती थी, न ही उसका कार्य मनुष्य द्वारा किया जा सकता था। शैतान को हराने, मानव-जाति को प्राप्त करने, और मनुष्य को पृथ्वी पर एक सामान्य जीवन प्रदान करने के लिए वह व्यक्तिगत रूप से मनुष्य की अगुआई करता है और व्यक्तिगत रूप से मनुष्यों के बीच कार्य करता है; अपनी संपूर्ण प्रबधंन योजना के वास्ते और अपने संपूर्ण कार्य के लिए उसे व्यक्तिगत रूप से इस कार्य को करना चाहिए। यदि मनुष्य केवल यह विश्वास करता है कि परमेश्वर इसलिए आया था कि मनुष्य उसे देख सके, या वह मनुष्य को खुश करने के लिए आया था, तो ऐसे विश्वास का कोई मूल्य, कोई महत्व नहीं है। मनुष्य की समझ बहुत ही सतही है! केवल इसे स्वयं कार्यान्वित करके ही परमेश्वर इस कार्य को अच्छी तरह से और पूरी तरह से कर सकता है। मनुष्य इसे परमेश्वर की ओर से करने में असमर्थ है। चूँकि उसके पास परमेश्वर की पहचान या उसका सार नहीं है, इसलिए वह पमेश्वर का कार्य करने में असमर्थ है, और यदि मनुष्य इसे करता भी, तो इसका कोई प्रभाव नहीं होता। पहली बार जब परमेश्वर ने देहधारण किया था, तो वह छुटकारे के वास्ते था, संपूर्ण मानव-जाति को पाप से छुटकारा देने के लिए था, मनुष्य को शुद्ध किए जाने और उसे उसके पापों से क्षमा किए जाने में सक्षम बनाने के लिए था। विजय का कार्य भी परमेश्वर द्वारा मनुष्यों के बीच व्यक्तिगत रूप से किया जाता है। इस चरण के दौरान यदि परमेश्वर को केवल भविष्यवाणी ही करनी होती, तो किसी भविष्यवक्ता या किसी प्रतिभाशाली व्यक्ति को उसका स्थान लेने के लिए ढूँढ़ा जा सकता था; यदि केवल भविष्यवाणी ही कहनी होती, तो मनुष्य परमेश्वर की जगह ले सकता था। किंतु यदि मनुष्य व्यक्तिगत रूप से स्वयं परमेश्वर का कार्य करने की कोशिश करता और मनुष्य के जीवन का कार्य करने का प्रयास करता, तो उसके लिए इस कार्य को करना असंभव होता। इसे व्यक्तिगत रूप से स्वयं परमेश्वर द्वारा ही किया जाना चाहिए : इस कार्य को करने के लिए परमेश्वर को व्यक्तिगत रूप से देह बनना चाहिए। वचन के युग में, यदि केवल भविष्यवाणी ही कही जाती, तो इस कार्य को करने के लिए नबी यशायाह या एलिय्याह को ढूँढ़ा जा सकता था, और इसे व्यक्तिगत रूप से करने के लिए स्वयं परमेश्वर की कोई आवश्यकता न होती। चूँकि इस चरण में किया जाने वाला कार्य मात्र भविष्यवाणी कहना नहीं है, और चूँकि इस बात का अत्यधिक महत्व है कि वचनों के कार्य का उपयोग मनुष्य पर विजय पाने और शैतान को पराजित करने के लिए किया जाता है, इसलिए इस कार्य को मनुष्य द्वारा नहीं किया जा सकता, और इसे स्वयं परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से किया जाना चाहिए। व्यवस्था के युग में यहोवा ने अपने कार्य का एक भाग किया था, जिसके पश्चात् उसने कुछ वचन कहे और नबियों के जरिये कुछ कार्य किया। ऐसा इसलिए है, क्योंकि मनुष्य यहोवा के कार्य में उसका स्थान ले सकता था, और भविष्यद्रष्टा उसकी ओर से चीज़ों की भविष्यवाणी और कुछ स्वप्नों की व्याख्या कर सकते थे। आरंभ में किया गया कार्य सीधे-सीधे मनुष्य के स्वभाव को परिवर्तित करने का कार्य नहीं था, और वह मनुष्य के पाप से संबंध नहीं रखता था, और मनुष्य से केवल व्यवस्था का पालन करने की अपेक्षा की गई थी। अतः यहोवा देह नहीं बना और उसने स्वयं को मनुष्य पर प्रकट नहीं किया; इसके बजाय उसने मूसा और अन्य लोगों से सीधे बातचीत की, उनसे बुलवाया और अपने स्थान पर कार्य करवाया, और उनसे मानव-जाति के बीच सीधे तौर पर कार्य करवाया। परमेश्वर के कार्य का पहला चरण मनुष्य की अगुआई का था। यह शैतान के विरुद्ध युद्ध का आरंभ था, किंतु यह युद्ध आधिकारिक रूप से शुरू होना बाक़ी था। शैतान के विरुद्ध आधिकारिक युद्ध परमेश्वर के प्रथम देहधारण के साथ आरंभ हुआ, और यह आज तक जारी है। इस युद्ध की पहली लड़ाई तब हुई, जब देहधारी परमेश्वर को सलीब पर चढ़ाया गया। देहधारी परमेश्वर के सलीब पर चढ़ाए जाने ने शैतान को पराजित कर दिया, और यह युद्ध में प्रथम सफल चरण था। जब देहधारी परमेश्वर ने मनुष्य के जीवन में सीधे कार्य करना आरंभ किया, तो यह मनुष्य को पुनः प्राप्त करने के कार्य की आधिकारिक शुरुआत थी, और चूँकि यह मनुष्य के पुराने स्वभाव को परिवर्तित करने का कार्य था, इसलिए यह शैतान के साथ युद्ध करने का कार्य था। आरंभ में यहोवा द्वारा किए गए कार्य का चरण पृथ्वी पर मनुष्य के जीवन की अगुआई मात्र था। यह परमेश्वर के कार्य का आरंभ था, और हालाँकि इसमें अभी कोई युद्ध या कोई बड़ा कार्य शामिल नहीं हुआ था, फिर भी इसने आने वाले युद्ध के कार्य की नींव डाली थी। बाद में, अनुग्रह के युग के दौरान दूसरे चरण के कार्य में मनुष्य के पुराने स्वभाव को परिवर्तित करना शामिल था, जिसका अर्थ है कि स्वयं परमेश्वर ने मनुष्य के जीवन को गढ़ा था। इसे परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से किया जाना था : इसमें अपेक्षित था कि परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से देह बन जाए। यदि वह देह न बनता, तो कार्य के इस चरण में कोई अन्य उसका स्थान नहीं ले सकता था, क्योंकि यह शैतान के विरुद्ध सीधी लड़ाई के कार्य को दर्शाता था। यदि परमेश्वर की ओर से मनुष्य ने यह कार्य किया होता, तो जब मनुष्य शैतान के सामने खड़ा होता, तो शैतान ने समर्पण न किया होता और उसे हराना असंभव हो गया होता। देहधारी परमेश्वर को ही उसे हराने के लिए आना था, क्योंकि देहधारी परमेश्वर का सार फिर भी परमेश्वर है, वह फिर भी मनुष्य का जीवन है, और वह फिर भी सृजनकर्ता है; कुछ भी हो, उसकी पहचान और सार नहीं बदलेगा। और इसलिए, उसने देहधारण किया और शैतान से संपूर्ण समर्पण करवाने के लिए कार्य किया। अंत के दिनों के कार्य के चरण के दौरान, यदि मनुष्य को यह कार्य करना होता और उससे सीधे तौर पर वचनों को बुलवाया जाता, तो वह उन्हें बोलने में असमर्थ होता, और यदि भविष्यवाणी कही जाती, तो यह भविष्यवाणी मनुष्य पर विजय पाने में असमर्थ होती। देहधारण करके परमेश्वर शैतान को हराने और उससे संपूर्ण समर्पण करवाने के लिए आता है। जब वह शैतान को पूरी तरह से पराजित कर लेगा, पूरी तरह से मनुष्य पर विजय पा लेगा और मनुष्य को पूरी तरह से प्राप्त कर लेगा, तो कार्य का यह चरण पूरा हो जाएगा और सफलता प्राप्त कर ली जाएगी। परमेश्वर के प्रबधंन में मनुष्य परमेश्वर का स्थान नहीं ले सकता। विशेष रूप से, युग की अगुआई करने और नया कार्य आरंभ करने का काम स्वयं परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से किए जाने की और भी अधिक आवश्यकता है। मनुष्य को प्रकाशन देना और उसे भविष्यवाणी प्रदान करना मनुष्य द्वारा किया जा सकता है, किंतु यदि यह ऐसा कार्य है जिसे व्यक्तिगत रूप से परमेश्वर द्वारा किया जाना चाहिए, अर्थात् स्वयं परमेश्वर और शैतान के बीच युद्ध का कार्य, तो इस कार्य को मनुष्य द्वारा नहीं किया जा सकता। कार्य के प्रथम चरण के दौरान, जब शैतान के साथ कोई युद्ध नहीं था, तब यहोवा ने नबियों द्वारा बोली गई भविष्यवाणियों का उपयोग करके व्यक्तिगत रूप से इस्राएल के लोगों की अगुआई की थी। उसके बाद, कार्य का दूसरा चरण शैतान के साथ युद्ध था, और स्वयं परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से देह बना और इस कार्य को करने के लिए देह में आया। जिस भी चीज़ में शैतान के साथ युद्ध शामिल होता है, उसमें परमेश्वर का देहधारण भी शामिल होता है, जिसका अर्थ है कि यह युद्ध मनुष्य द्वारा नहीं किया जा सकता। यदि मनुष्य को युद्ध करना पड़ता, तो वह शैतान को पराजित करने में असमर्थ होता। उसके पास उसके विरुद्ध लड़ने की ताक़त कैसे हो सकती है, जबकि वह अभी भी उसके अधिकार-क्षेत्र के अधीन है? मनुष्य बीच में है : यदि तुम शैतान की ओर झुकते हो तो तुम शैतान से संबंधित हो, किंतु यदि तुम परमेश्वर को संतुष्ट करते हो, तो तुम परमेश्वर से संबंधित हो। यदि इस युद्ध के कार्य में मनुष्य को प्रयास करना होता और उसे परमेश्वर का स्थान लेना होता, तो क्या वह कर पाता? यदि वह युद्ध करता, तो क्या वह बहुत पहले ही नष्ट नहीं हो गया होता? क्या वह बहुत पहले ही नरक में नहीं समा गया होता? इसलिए, परमेश्वर के कार्य में मनुष्य उसका स्थान लेने में अक्षम है, जिसका तात्पर्य है कि मनुष्य के पास परमेश्वर का सार नहीं है, और यदि तुम शैतान के साथ युद्ध करते, तो तुम उसे पराजित करने में अक्षम होते। मनुष्य केवल कुछ कार्य ही कर सकता है; वह कुछ लोगों को जीत सकता है, किंतु वह स्वयं परमेश्वर के कार्य में परमेश्वर का स्थान नहीं ले सकता। मनुष्य शैतान के साथ युद्ध कैसे कर सकता है? तुम्हारे शुरुआत करने से पहले ही शैतान ने तुम्हें बंदी बना लिया होता। केवल जब स्वयं परमेश्वर ही शैतान के साथ युद्ध करता है और मनुष्य इस आधार पर परमेश्वर का अनुसरण और आज्ञापालन करता है, तभी परमेश्वर द्वारा मनुष्य को प्राप्त किया जा सकता है और वह शैतान के बंधनों से बच सकता है। मनुष्य द्वारा अपनी स्वयं की बुद्धि और योग्यताओं से प्राप्त की जा सकने वाली चीज़ें बहुत ही सीमित हैं; वह मनुष्य को पूर्ण बनाने, उसकी अगुआई करने, और, इसके अतिरिक्त, शैतान को हराने में असमर्थ है। मनुष्य की प्रतिभा और बुद्धि शैतान के षड्यंत्रों को नाकाम करने में असमर्थ हैं, इसलिए मनुष्य उसके साथ युद्ध कैसे कर सकता है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मनुष्य के सामान्य जीवन को बहाल करना और उसे एक अद्भुत मंज़िल पर ले जाना' से उद्धृत

289. भिन्न-भिन्न युगों के आने-जाने के साथ छह हज़ार वर्षों के दौरान किए गए कार्य की समग्रता धीरे-धीरे बदलती गई है। इस कार्य में आए बदलाव समस्त संसार की परिस्थितियों और एक इकाई के तौर पर मानवजाति की विकासात्मक प्रवृत्ति पर आधारित रहे हैं। परमेश्वर का प्रबंधन का कार्य इसके अनुसार केवल धीरे-धीरे बदला है। सृष्टि के आरंभ से इस सबकी योजना नहीं बनाई गई थी। संसार का सृजन होने से पहले, या इस सृजन के ठीक बाद तक, यहोवा ने कार्य के प्रथम चरण, व्यवस्था का कार्य; कार्य के दूसरे चरण, अनुग्रह का कार्य; और कार्य के तीसरे चरण, विजय का कार्य की योजना नहीं बनाई थी। विजय के कार्य के दौरान वह पहले मोआब के कुछ वंशजों से शुरुआत करेगा और इसके माध्यम से समस्त ब्रह्मांड को जीतेगा। संसार का सृजन करने के बाद, उसने कभी ये वचन नहीं कहे; न ही उसने ये मोआब के बाद कहे, दरअसल लूत से पहले उसने इन्हें कभी नहीं कहा। परमेश्वर का समस्त कार्य अनायास तरीके से ही किया जाता है। उसका छह-हजार-वर्षों का प्रबंधन कार्य इसी तरह से विकसित हुआ है; किसी भी हाल में, संसार का सृजन करने से पहले उसने "मानवजाति के विकास के लिए सारांश चार्ट" के रूप में कोई योजना नहीं रची थी। परमेश्वर अपने कार्य में, प्रत्यक्ष रूप से व्यक्त करता है कि वह क्या है; वह किसी योजना को बनाने पर मगजपच्ची नहीं करता है। निस्संदेह, बहुत से नबियों ने बहुत सी भविष्यवाणियाँ की हैं, परंतु फिर भी यह नहीं कहा जा सकता है कि परमेश्वर का कार्य सदैव एक सटीक योजना पर आधारित रहा है; वे भविष्यवाणियाँ परमेश्वर के उस समय के कार्य के अनुसार की गई थीं। वह जो भी कार्य करता है वह सब सर्वाधिक वास्तविक कार्य होता है। वह प्रत्येक युग के विकास के अनुसार अपने कार्य को संपन्न करता है, और यह इस बात पर आधारित होता है कि चीज़ें कैसे बदलती हैं। उसके लिए, कार्य को संपन्न करना किसी बीमारी के लिए दवा देने के सदृश है; अपना कार्य करते समय वह अवलोकन करता है और अपने अवलोकनों के अनुसार कार्य जारी रखता है। अपने कार्य के प्रत्येक चरण में, परमेश्वर अपनी प्रचुर बुद्धि और अपनी योग्यता को व्यक्त करने में सक्षम है; वह किसी युग विशेष के कार्य के अनुसार अपनी प्रचुर बुद्धि और अधिकार को प्रकट करता है, और उस युग के दौरान अपने द्वारा वापस लाए गए सभी लोगों को अपना समस्त स्वभाव देखने देता है। प्रत्येक युग में जिस कार्य के किए जाने की आवश्यकता है उसके अनुसार वह लोगों की आवश्यकताओं की आपूर्ति करता है, वह सब कार्य जो उसे करना चाहिए। वह लोगों की आवश्यकताओं की आपूर्ति इस आधार पर करता है कि शैतान ने उन्हें किस हद तक भ्रष्ट कर दिया है। ... मानवजाति के बीच परमेश्वर का कोई भी कार्य संसार के सृजन के समय पहले से तैयार नहीं किया गया था; बल्कि, यह चीजों का विकास है जिसने परमेश्वर को मानवजाति के बीच अधिक वास्तविक एवं व्यवहारिक रूप से कदम-दर-कदम अपना कार्य करने दिया है। उदाहरण के लिए, यहोवा परमेश्वर ने स्त्री को प्रलोभित करने के लिए साँप का सृजन नहीं किया था। यह उसकी कोई विशिष्ट योजना नहीं थी, न ही यह कुछ ऐसा था जिसे उसने जानबूझकर पूर्वनियत किया था। यह कहा जा सकता है कि यह अनपेक्षित घटना थी। इस प्रकार, इसी कारण से यहोवा ने आदम और हव्वा को अदन की वाटिका से निष्कासित किया और फिर कभी मनुष्य का सृजन न करने की शपथ ली। परंतु लोगों को केवल इसी आधार पर परमेश्वर की बुद्धि का पता चलता है। यह वैसा ही है जैसा मैंने पहले कहा था : "मैं अपनी बुद्धि शैतान के षडयंत्रों के आधार पर प्रयोग में लाता हूँ।" चाहे मानवजाति कितनी भी भ्रष्ट हो जाए या साँप उन्हें कैसे भी प्रलोभित करे, यहोवा के पास तब भी अपनी बुद्धि है; इस तरह, जबसे उसने संसार का सृजन किया है, वह नए-नए कार्य में लगा रहा है और उसके कार्य का कोई भी कदम कभी भी दोहराया नहीं गया है। शैतान ने लगातार षड्यंत्र किए हैं; मानवजाति लगातार शैतान के द्वारा भ्रष्ट की गई है, और यहोवा परमेश्वर ने अपने बुद्धिमत्तापूर्ण कार्य को लगातार संपन्न किया है। वह कभी भी असफल नहीं हुआ है, और संसार के सृजन से लेकर अब तक उसने कार्य करना कभी नहीं रोका है। शैतान द्वारा मानवजाति को भ्रष्ट करने के बाद से, परमेश्वर अपने उस शत्रु को परास्त करने के लिए उनके बीच लगातार कार्य करता रहा है जो भ्रष्टता का स्रोत है। यह लड़ाई आरंभ से शुरू हुई है और संसार के अंत तक चलती रहेगी। यह सब कार्य करते हुए, यहोवा परमेश्वर ने न केवल शैतान द्वारा भ्रष्ट की जा चुकी मनुष्यजाति को अपने द्वारा महान उद्धार को प्राप्त करने की अनुमति दी है, बल्कि उसे अपनी बुद्धि, सर्वशक्तिमत्ता और अधिकार को देखने की अनुमति भी दी है। इसके अलावा, अंत में वह मानवजाति को दुष्टों को दंड, और अच्छों को पुरस्कार देने वाला अपना धार्मिक स्वभाव देखने देगा। उसने आज के दिन तक शैतान के साथ युद्ध किया है और कभी भी पराजित नहीं हुआ है। इसलिए, क्योंकि वह एक बुद्धिमान परमेश्वर है, वह अपनी बुद्धि शैतान के षड्यंत्रों के आधार पर प्रयोग करता है। और इसलिए परमेश्वर न केवल स्वर्ग की सब चीजों से अपने अधिकार का पालन करवाता है; बल्कि वह पृथ्वी की सभी चीज़ों को अपने पाँव रखने की चौकी के नीचे रखवाता है, और एक अन्य महत्वपूर्ण बात है, वह दुष्टों को, जो मानवजाति पर आक्रमण करते हैं और उसे सताते हैं, अपनी ताड़ना के अधीन करता है। इन सभी कार्यों के परिणाम उसकी बुद्धि के कारण प्राप्त होते हैं। उसने मानवजाति के अस्तित्व से पहले कभी भी अपनी बुद्धि को प्रकट नहीं किया था, क्योंकि स्वर्ग में, और पृथ्वी पर, या समस्त ब्रह्मांड में उसके कोई शत्रु नहीं थे, और कोई अंधकार की शक्तियाँ नहीं थीं जो प्रकृति में मौजूद किसी भी चीज पर आक्रमण करती थीं। प्रधान स्वर्गदूत द्वारा उसके साथ विश्वासघात किए जाने के बाद, उसने पृथ्वी पर मानवजाति का सृजन किया, और यह मानवजाति के कारण ही था कि उसने औपचारिक रूप से प्रधान स्वर्गदूत, शैतान के साथ अपना सहस्राब्दी जितना लंबा युद्ध आरंभ किया, ऐसा युद्ध जो हर उत्तरोत्तर चरण के साथ और अधिक घमासान होता जाता है। इनमें से प्रत्येक चरण में उसकी सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि उपस्थित रहती है। केवल तभी स्वर्ग और पृथ्वी में हर चीज परमेश्वर की बुद्धि, सर्वशक्तिमत्ता, और विशेषकर परमेश्वर की यथार्थता को देख सकती है। वह आज भी अपने कार्य को उसी यथार्थवादी तरीके से संपन्न करता है; इसके अतिरिक्त, जब वह अपने कार्य को करता है, तो वह अपनी बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता को भी प्रकट करता है; वह तुम लोगों को प्रत्येक चरण के भीतरी सत्य को देखने की अनुमति देता है, यह देखने की अनुमति देता है कि परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता की आखिर कैसे व्याख्या की जाए, और इससे भी बढ़कर परमेश्वर की वास्तविकता की निर्णायक व्याख्या को देखने देता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम्हें पता होना चाहिए कि समस्त मानवजाति आज के दिन तक कैसे विकसित हुई' से उद्धृत

290. पवित्र आत्मा का कार्य सदैव अनायास किया जाता है; वह किसी भी समय अपने कार्य की योजना बना सकता है, और कभी भी उसे संपन्न कर सकता है। मैं क्यों सदैव कहता हूँ कि पवित्र आत्मा का कार्य यथार्थवादी होता है, और वह सदैव नया होता है, कभी पुराना नहीं होता, और सदैव सबसे अधिक ताजा होता है? जब संसार का सृजन किया गया था, तब उसके कार्य की योजना पहले से नहीं बनाई गई थी; ऐसा बिलकुल भी नहीं हुआ था! कार्य का हर कदम अपने सही समय पर समुचित परिणाम प्राप्त करता है, और वे एक-दूसरे में हस्तक्षेप नहीं करते। बहुत बार तुम्हारे मन की योजनाएँ पवित्र आत्मा के नवीनतम कार्य के साथ बिलकुल मेल नहीं खातीं। उसका कार्य मनुष्य की तर्कबुद्धि जैसा सरल नहीं है, न ही वह मनुष्य की कल्पनाओं जैसा जटिल है—इसमें किसी भी समय और स्थान पर लोगों को उनकी वर्तमान आवश्यकताओं के अनुसार आपूर्ति करना शामिल है। कोई भी मनुष्यों के सार के बारे में उतना स्पष्ट नहीं है, जितना वह है, और ठीक इसी कारण से कोई भी चीज लोगों की यथार्थपरक आवश्यकताओं के उतनी अनुकूल नहीं हो सकती, जितना उसका कार्य है। इसलिए, मनुष्य के दृष्टिकोण से, उसका कार्य कई सहस्राब्दी पूर्व अग्रिम रूप से योजनाबद्ध किया गया प्रतीत होता है। अब जबकि वह तुम लोगों के बीच कार्य करता है, इस पूरे समय में कार्य करते और बोलते हुए जब वह उन स्थितियों को देखता है जिनमें तुम हो, तो हर प्रकार की परिस्थिति से सामना होने पर उसके पास बोलने के लिए बिलकुल सही वचन होते हैं, वह ठीक वे ही वचन बोलता है, जिनकी लोगों को आवश्यकता होती है। उसके कार्य के पहले कदम को लो : ताड़ना का समय। उसके बाद, लोगों ने सभी तरह का व्यवहार प्रदर्शित किया और कुछ तरीकों से विद्रोहपूर्ण ढंग से कार्य किया; विभिन्न सकारात्मक स्थितियाँ उभरीं, वैसे ही कुछ नकारात्मक स्थितियाँ भी उभरीं। वे अपनी नकारात्मकता के एक बिंदु तक पहुँच गए और उन्होंने वे निम्नतम सीमाएँ दिखाईं, जिन तक वे गिर सकते थे। परमेश्वर ने इन सब चीजों के आधार पर अपना कार्य किया, और इस प्रकार अपने कार्य से अधिक बेहतर परिणाम प्राप्त करने के लिए उन्हें पकड़ लिया। अर्थात, वह लोगों के बीच किसी समय-विशेष में उनकी वर्तमान स्थिति के अनुसार चिरस्थायी कार्य करता है; वह अपने कार्य का हर कदम लोगों की वास्तविक स्थितियों के अनुसार संपन्न करता है। समस्त सृष्टि उसके हाथों में है, वह उन्हें कैसे नहीं जान सकता? परमेश्वर लोगों की स्थितियों के अनुसार, किसी भी समय और स्थान पर, कार्य के उस अगले कदम को कार्यान्वित करता है, जो किया जाना चाहिए। यह कार्य किसी भी तरह से हजारों वर्ष पहले से योजनाबद्ध नहीं किया गया था; यह एक मानवीय धारणा है! वह अपने कार्य के परिणाम देखकर कार्य करता है, और उसका कार्य लगातार अधिक गहन और विकसित होता जाता है; प्रत्येक बार, अपने कार्य के परिणामों का अवलोकन करने के बाद वह अपने कार्य के अगले कदम को कार्यान्वित करता है। वह धीरे-धीरे एक स्थिति से दूसरी स्थिति में जाने के लिए और समय के साथ लोगों को अपना नया कार्य दृष्टिगोचर कराने के लिए कई चीजों का उपयोग करता है। कार्य का यह तरीका लोगों की आवश्यकताओं की आपूर्ति करने में समर्थ हो सकता है, क्योंकि परमेश्वर सभी लोगों को बहुत अच्छी तरह से जानता है। वह अपने कार्य को स्वर्ग से इसी तरह संपन्न करता है। इसी प्रकार, देहधारी परमेश्वर भी, वास्तविक परिस्थितियों के अनुसार व्यवस्था करते हुए और मनुष्यों के बीच कार्य करते हुए अपना कार्य इसी तरह संपन्न करता है। उसका कोई भी कार्य संसार के सृजन से पहले व्यवस्थित नहीं किया गया था, न ही उसकी पहले से ध्यानपूर्वक योजना बनाई गई थी। संसार के सृजन के दो हजार वर्षों के बाद, यहोवा ने देखा कि मानवजाति इतनी भ्रष्ट हो गई है कि उसने यह भविष्यवाणी करने के लिए नबी यशायाह के मुख का उपयोग किया कि व्यवस्था के युग का अंत होने के बाद यहोवा अनुग्रह के युग में मानवजाति को छुटकारा दिलाने का अपना कार्य करेगा। निस्संदेह, यह यहोवा की योजना थी, किंतु यह योजना भी उन परिस्थितियों के अनुसार बनाई गई थी जिनका वह उस समय अवलोकन कर रहा था; उसने निश्चित रूप से आदम का सृजन करने के तुरंत बाद इस बारे में नहीं सोचा था। यशायाह ने केवल भविष्यवाणी कही, किंतु यहोवा ने व्यवस्था के युग के दौरान इस कार्य के लिए अग्रिम तैयारियाँ नहीं की थीं; बल्कि उसने अनुग्रह के युग के आरंभ में इस कार्य की शुरुआत की, जब दूत यूसुफ के स्वप्न में उसे इस संदेश से प्रबुद्ध करने के लिए दिखाई दिया कि परमेश्वर देहधारी बनेगा, और केवल तभी देहधारण का उसका कार्य आरंभ हुआ। परमेश्वर ने संसार के सृजन के ठीक बाद अपने देहधारण के कार्य के लिए तैयारी नहीं कर ली थी, जैसा कि लोग कल्पना करते हैं; इसका निर्णय केवल मानवजाति के विकास की मात्रा और शैतान के साथ परमेश्वर के युद्ध की स्थिति के आधार पर लिया गया था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम्हें पता होना चाहिए कि समस्त मानवजाति आज के दिन तक कैसे विकसित हुई' से उद्धृत

291. परमेश्वर का संपूर्ण प्रबंधन तीन चरणों में विभाजित है, और प्रत्येक चरण में मनुष्य से यथोचित अपेक्षाएँ की जाती हैं। इसके अतिरिक्त, जैसे-जैसे युग बीतते और आगे बढ़ते जाते हैं, परमेश्वर की समस्त मानवजाति से अपेक्षाएँ और अधिक ऊँची होती जाती हैं। इस प्रकार, कदम-दर-कदम परमेश्वर का प्रबंधन अपने चरम पर पहुँचता जाता है, जब तक कि मनुष्य "वचन का देह में प्रकट होना" नहीं देख लेता, और इस तरह मनुष्य से की गई अपेक्षाएँ अधिक ऊँची हो जाती हैं, जैसे कि मनुष्य से गवाही देने की अपेक्षाएँ अधिक ऊँची हो जाती हैं। मनुष्य परमेश्वर के साथ वास्तव में सहयोग करने में जितना अधिक सक्षम होता है, उतना ही अधिक परमेश्वर महिमा प्राप्त करता है। मनुष्य का सहयोग वह गवाही है, जिसे देने की उससे अपेक्षा की जाती है, और जो गवाही वह देता है, वह मनुष्य का अभ्यास है। इसलिए, परमेश्वर के कार्य का उचित प्रभाव हो सकता है या नहीं, और सच्ची गवाही हो सकती है या नहीं, ये अटूट रूप से मनुष्य के सहयोग और गवाही से जुड़े हुए हैं। जब कार्य समाप्त हो जाएगा, अर्थात् जब परमेश्वर का संपूर्ण प्रबंधन अपनी समाप्ति पर पहुँच जाएगा, तो मनुष्य से अधिक ऊँची गवाही देने की अपेक्षा की जाएगी, और जब परमेश्वर का कार्य अपनी समाप्ति पर पहुँच जाएगा, तब मनुष्य का अभ्यास और प्रवेश अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच जाएँगे। अतीत में मनुष्य से व्यवस्था और आज्ञाओं का पालन करना अपेक्षित था, और उससे धैर्यवान और विनम्र बनने की अपेक्षा की जाती थी। आज मनुष्य से अपेक्षा की जाती है कि वह परमेश्वर के समस्त प्रबंधन का पालन करे और परमेश्वर के प्रति सर्वोच्च प्रेम रखे, और अंततः उससे अपेक्षा की जाती है कि वह क्लेश के बीच भी परमेश्वर से प्रेम करे। ये तीन चरण वे अपेक्षाएँ हैं, जो परमेश्वर अपने संपूर्ण प्रबंधन के दौरान कदम-दर-कदम मनुष्य से करता है। परमेश्वर के कार्य का प्रत्येक चरण पिछले चरण की तुलना में अधिक गहरे जाता है, और प्रत्येक चरण में मनुष्य से की जाने वाली अपेक्षाएँ पिछले चरण की तुलना में और अधिक गंभीर होती हैं, और इस तरह, परमेश्वर का संपूर्ण प्रबंधन धीरे-धीरे आकार लेता है। यह ठीक इसलिए है, क्योंकि मनुष्य से की गई अपेक्षाएँ हमेशा इतनी ऊँची होती है कि मनुष्य का स्वभाव परमेश्वर द्वारा अपेक्षित मानकों के निरंतर अधिक नज़दीक आ जाता है, और केवल तभी संपूर्ण मानवजाति धीरे-धीरे शैतान के प्रभाव से अलग होना शुरू करती है; जब तक परमेश्वर का कार्य पूर्ण समाप्ति पर आएगा, संपूर्ण मानवजाति शैतान के प्रभाव से बचा ली गई होगी। जब वह समय आएगा, तो परमेश्वर का कार्य अपनी समाप्ति पर पहुँच चुका होगा, और अपने स्वभाव में परिवर्तन हासिल करने के लिए परमेश्वर के साथ मनुष्य का सहयोग अब नहीं होगा, और संपूर्ण मानवजाति परमेश्वर के प्रकाश में जीएगी, और तब से परमेश्वर के प्रति कोई विद्रोहशीलता या विरोध नहीं होगा। परमेश्वर भी मनुष्य से कोई माँग नहीं करेगा, और मनुष्य और परमेश्वर के बीच अधिक सामंजस्यपूर्ण सहयोग होगा, ऐसा सहयोग जो मनुष्य और परमेश्वर दोनों का एक-साथ जीवन होगा, ऐसा जीवन, जो परमेश्वर के प्रबंधन का पूरी तरह से समापन होने और परमेश्वर द्वारा मनुष्य को शैतान के शिकंजों से पूरी तरह से बचा लिए जाने के बाद आता है। जो लोग परमेश्वर के पदचिह्नों का निकट से अनुसरण नहीं कर सकते, वे ऐसा जीवन पाने में अक्षम होते हैं। उन्होंने अपने आपको अंधकार में नीचे गिरा दिया होगा, जहाँ वे रोएँगे और अपने दाँत पीसेंगे; वे ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर में विश्वास तो करते हैं किंतु उसका अनुसरण नहीं करते, जो परमेश्वर में विश्वास तो करते हैं किंतु उसके संपूर्ण कार्य का पालन नहीं करते। चूँकि मनुष्य परमेश्वर में विश्वास करता है, इसलिए उसे परमेश्वर के पदचिह्नों का, कदम-दर-कदम, निकट से अनुसरण करना चाहिए; और उसे "जहाँ कहीं मेमना जाता है, उसका अनुसरण करना" चाहिए। केवल ऐसे लोग ही सच्चे मार्ग को खोजते हैं, केवल ऐसे लोग ही पवित्र आत्मा के कार्य को जानते हैं। जो लोग शाब्दिक अर्थों और सिद्धांतों का ज्यों का त्यों अनुसरण करते हैं, वे ऐसे लोग हैं जिन्हें पवित्र आत्मा के कार्य द्वारा निष्कासित कर दिया गया है। प्रत्येक समयावधि में परमेश्वर नया कार्य आरंभ करेगा, और प्रत्येक अवधि में मनुष्य के बीच एक नई शुरुआत होगी। यदि मनुष्य केवल इन सत्यों का ही पालन करता है कि "यहोवा ही परमेश्वर है" और "यीशु ही मसीह है," जो ऐसे सत्य हैं, जो केवल उनके अपने युग पर ही लागू होते हैं, तो मनुष्य कभी भी पवित्र आत्मा के कार्य के साथ कदम नहीं मिला पाएगा, और वह हमेशा पवित्र आत्मा के कार्य को हासिल करने में अक्षम रहेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास' से उद्धृत

292. स्वयं परमेश्वर युग का सूत्रपात करने के लिए आता है, और स्वयं परमेश्वर युग का अंत करने के लिए आता है। युग का आरंभ और युग का समापन करने का कार्य करने में मनुष्य असमर्थ है। यदि आने के बाद यीशु यहोवा का कार्य समाप्त नहीं करता, तो यह इस बात का सबूत होता कि वह मात्र एक मनुष्य है और परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने में असमर्थ है। ठीक इसलिए, क्योंकि यीशु आया और उसने यहोवा के कार्य का समापन किया, यहोवा के कार्य को जारी रखा और, इसके अलावा, उसने अपना स्वयं का कार्य, एक नया कार्य किया, इससे साबित होता है कि यह एक नया युग था, और कि यीशु स्वयं परमेश्वर था। उन्होंने कार्य के स्पष्ट रूप से भिन्न दो चरण पूरे किए। एक चरण मंदिर में कार्यान्वित किया गया, और दूसरा मंदिर के बाहर संचालित किया गया। एक चरण व्यवस्था के अनुसार मनुष्य के जीवन की अगुआई करना था, और दूसरा, पापबलि चढ़ना था। कार्य के ये दो चरण स्पष्ट रूप से भिन्न थे; यह नए युग को पुराने से विभाजित करता है, और यह कहना पूर्णतः सही है कि ये दो भिन्न युग हैं! उनके कार्य का स्थान भिन्न था, उनके कार्य की विषय-वस्तु भिन्न थी, और उनके कार्य का उद्देश्य भिन्न था। इस तरह उन्हें दो युगों में विभाजित किया जा सकता है : नए और पुराने विधानों में, अर्थात् नए और पुराने युगों में। जब यीशु आया, तो वह मंदिर में नहीं गया, जिससे साबित होता है कि यहोवा का युग समाप्त हो गया था। उसने मंदिर में प्रवेश नहीं किया, क्योंकि मंदिर में यहोवा का कार्य पूरा हो गया था, और उसे फिर से करने की आवश्यकता नहीं थी, और उसे पुनः करना उसे दोहराना होता। केवल मंदिर को छोड़ने, एक नया कार्य शुरू करने और मंदिर के बाहर एक नए मार्ग का सूत्रपात करके ही वह परमेश्वर के कार्य को उसके शिखर पर पहुँचा सकता था। यदि वह अपना कार्य करने के लिए मंदिर से बाहर नहीं गया होता, तो परमेश्वर का कार्य मंदिर की बुनियाद पर रुक गया होता, और फिर कभी कोई नए परिवर्तन नहीं होते। और इसलिए, जब यीशु आया तो उसने मंदिर में प्रवेश नहीं किया, और अपना कार्य मंदिर में नहीं किया। उसने अपना कार्य मंदिर से बाहर किया, और शिष्यों की अगुआई करते हुए स्वतंत्र रूप से अपना कार्य किया। अपना कार्य करने के लिए मंदिर से परमेश्वर के प्रस्थान का अर्थ था कि परमेश्वर की एक नई योजना है। उसका कार्य मंदिर के बाहर कार्यान्वित किया जाना था, और इसे नया कार्य होना था, जो अपने कार्यान्वयन के तरीके में अप्रतिबंधित था। जैसे ही यीशु आया, उसने पुराने विधान के युग के दौरान यहोवा के कार्य को समाप्त किया। यद्यपि उन्हें दो भिन्न-भिन्न नामों से बुलाया गया, फिर भी यह एक ही पवित्रात्मा था, जिसने कार्य के दोनों चरण संपन्न किए, और जो कार्य किया जाना था, वह सतत था। चूँकि नाम भिन्न था, और कार्य की विषय-वस्तु भिन्न थी, इसलिए युग भिन्न था। जब यहोवा आया, तो वह यहोवा का युग था, और जब यीशु आया, तो वह यीशु का युग था। और इसलिए, हर आगमन के साथ परमेश्वर को एक नाम से बुलाया जाता है, वह एक युग का प्रतिनिधित्व करता है, और वह एक नए मार्ग का सूत्रपात करता है; और हर नए मार्ग पर वह एक नया नाम अपनाता है, जो दर्शाता है कि परमेश्वर हमेशा नया रहता है और कभी पुराना नहीं पड़ता, और कि उसका कार्य आगे की दिशा में प्रगति करने से कभी नहीं रुकता। इतिहास हमेशा आगे बढ़ रहा है, और परमेश्वर का कार्य हमेशा आगे बढ़ रहा है। उसकी छह-हज़ार-वर्षीय प्रबंधन योजना को अंत तक पहुँचने के लिए उसे आगे की दिशा में प्रगति करते रहना चाहिए। हर दिन उसे नया कार्य करना चाहिए, हर वर्ष उसे नया कार्य करना चाहिए; उसे नए मार्गों का सूत्रपात करना चाहिए, नए युगों का सूत्रपात करना चाहिए, नया और अधिक बड़ा कार्य आरंभ करना चाहिए, और इनके साथ, नए नाम और नया कार्य लाना चाहिए। क्षण-प्रतिक्षण परमेश्वर का आत्मा नया कार्य कर रहा है, कभी भी पुराने तरीकों या नियमों से चिपका नहीं रहता। न ही उसका कार्य कभी रुका है, बल्कि हर गुज़रते पल के साथ घटित होता रहता है। ... यहोवा के कार्य से लेकर यीशु के कार्य तक, और यीशु के कार्य से लेकर इस वर्तमान चरण तक, ये तीन चरण परमेश्वर के प्रबंधन के पूर्ण विस्तार को एक सतत सूत्र में पिरोते हैं, और वे सब एक ही पवित्रात्मा का कार्य हैं। दुनिया के सृजन से परमेश्वर हमेशा मानवजाति का प्रबंधन करता आ रहा है। वही आरंभ और अंत है, वही प्रथम और अंतिम है, और वही एक है जो युग का आरंभ करता है और वही एक है जो युग का अंत करता है। विभिन्न युगों और विभिन्न स्थानों में कार्य के तीन चरण अचूक रूप में एक ही पवित्रात्मा का कार्य हैं। इन तीन चरणों को पृथक करने वाले सभी लोग परमेश्वर के विरोध में खड़े हैं। अब तुम्हारे लिए यह समझना उचित है कि प्रथम चरण से लेकर आज तक का समस्त कार्य एक ही परमेश्वर का कार्य है, एक ही पवित्रात्मा का कार्य है। इस बारे में कोई संदेह नहीं हो सकता।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)' से उद्धृत

293. जब प्रभु यीशु आया, तो उसने लोगों को यह बताने के लिए अपने व्यावहारिक कार्यों का उपयोग किया कि परमेश्वर ने व्यवस्था के युग को अलविदा कह दिया है और नया कार्य शुरू किया है, और इस नए कार्य में सब्त का पालन करना आवश्यक नहीं है। परमेश्वर का सब्त के दिन की सीमाओं से बाहर आना उसके नए कार्य का बस एक पूर्वाभास था; वास्तविक और महान कार्य अभी आना बाकी था। जब प्रभु यीशु ने अपना कार्य प्रारंभ किया, तो उसने व्यवस्था की बेड़ियों को पहले ही पीछे छोड़ दिया था, और उस युग के विनियम और सिद्धांत तोड़ दिए थे। उसमें व्यवस्था से जुड़ी किसी भी बात का कोई निशान नहीं था; उसने उसे पूरी तरह से छोड़ दिया था और अब उसका पालन नहीं करता था, और उसने मानवजाति से आगे उसका पालन करने की अपेक्षा नहीं की थी। इसलिए तुम यहाँ देखते हो कि प्रभु यीशु सब्त के दिन मकई के खेतों से होकर गुज़रा, और प्रभु ने आराम नहीं किया; वह बाहर काम कर रहा था और आराम नहीं कर रहा था। उसका यह कार्य लोगों की धारणाओं के लिए एक आघात था और इसने उन्हें सूचित किया कि वह अब व्यवस्था के अधीन नहीं रह रहा था, और उसने सब्त की सीमाओं को छोड़ दिया था और एक नई कार्यशैली के साथ वह मानवजाति के सामने और उनके बीच एक नई छवि में प्रकट हुआ था। उसके इस कार्य ने लोगों को बताया कि वह अपने साथ एक नया कार्य लाया है, जो व्यवस्था के अधीन रहने से उभरने और सब्त से अलग होने से आरंभ हुआ था। जब परमेश्वर ने अपना नया कार्य किया, तो वह अतीत से चिपका नहीं रहा, और वह अब व्यवस्था के युग की विधियों के बारे में चिंतित नहीं था, न ही वह पूर्ववर्ती युग के अपने कार्य से प्रभावित था, बल्कि उसने सब्त के दिन भी उसी तरह से कार्य किया, जैसे वह दूसरे दिनों में करता था, और सब्त के दिन जब उसके चेले भूखे थे, तो वे मकई की बालें तोड़कर खा सकते थे। यह सब परमेश्वर की निगाहों में बिलकुल सामान्य था। परमेश्वर अपना बहुत-सा नया कार्य करने के लिए, जिसे वह करना चाहता है, और नए वचन कहने के लिए, जिन्हें वह कहना चाहता है, एक नई शुरुआत कर सकता है। जब वह एक नई शुरुआत करता है, तो वह न तो अपने पिछले कार्य का उल्लेख करता है, न ही उसे जारी रखता है। क्योंकि परमेश्वर के पास उसके कार्य के अपने सिद्धांत हैं, जब वह नया कार्य शुरू करना चाहता है, तो यह तब होता है जब वह मानवजाति को अपने कार्य के एक नए चरण में ले जाना चाहता है, और जब उसका कार्य एक उच्चतर चरण में प्रवेश करता है। यदि लोग पुरानी कहावतों या नियमों के अनुसार काम करते रहते हैं या उनसे चिपटे रहते हैं, तो वह इसे याद नहीं रखेगा या इसका अनुमोदन नहीं करेगा। ऐसा इसलिए है, क्योंकि वह पहले ही एक नया कार्य ला चुका है, और अपने कार्य के एक नए चरण में प्रवेश कर चुका है। जब वह नया कार्य आरंभ करता है, तो वह मानवजाति के सामने पूर्णतः नई छवि में, पूर्णतः नए कोण से और पूर्णतः नए तरीके से प्रकट होता है, ताकि लोग उसके स्वभाव के विभिन्न पहलुओं और उसके स्वरूप को देख सकें। यह उसके नए कार्य में उसके लक्ष्यों में से एक है। परमेश्वर पुरानी चीज़ों से चिपका नहीं रहता या पुराने मार्ग पर नहीं चलता; जब वह कार्य करता और बोलता है, तो यह उतना निषेधात्मक नहीं होता, जितना लोग कल्पना करते हैं। परमेश्वर में सब-कुछ स्वतंत्र और मुक्त है, और कोई निषेध नहीं है, कोई बाधा नहीं है—वह मानवजाति के लिए आज़ादी और मुक्ति लाता है। वह एक जीवित परमेश्वर है, ऐसा परमेश्वर, जो वास्तव में, सच में मौजूद है। वह कोई कठपुतली या मिट्टी की मूर्ति नहीं है, और वह उन मूर्तियों से बिलकुल भिन्न है, जिन्हें लोग प्रतिष्ठापित करते हैं और जिनकी आराधना करते हैं। वह जीवित और जीवंत है और उसके कार्य और वचन मनुष्यों के लिए संपूर्ण जीवन और ज्योति, संपूर्ण स्वतंत्रता और मुक्ति लेकर आते हैं, क्योंकि वह सत्य, जीवन और मार्ग धारण करता है—वह अपने किसी भी कार्य में किसी भी चीज़ के द्वारा विवश नहीं होता। लोग चाहे कुछ भी कहें और चाहे वे उसके नए कार्य को किसी भी प्रकार से देखें या कैसे भी उसका आकलन करें, वह बिना किसी आशंका के अपना कार्य पूरा करेगा। अपने कार्य और वचनों के संबंध में वह किसी की भी धारणाओं या उस पर उठी उँगलियों की, यहाँ तक कि अपने नए कार्य के प्रति उनके कठोर विरोध और प्रतिरोध की भी चिंता नहीं करेगा। परमेश्वर जो करता है, उसे मापने या परिभाषित करने, उसके कार्य को बदनाम करने, नष्ट-भ्रष्ट करने या उसे नुकसान पहुँचाने के लिए संपूर्ण सृष्टि में कोई भी मानवीय तर्क या मानवीय कल्पनाओं, ज्ञान या नैतिकता का उपयोग नहीं कर सकता। उसके कार्य में और जो वह करता है उसमें, कोई निषेध नहीं है, वह किसी मनुष्य, घटना या चीज़ द्वारा लाचार नहीं किया जाएगा, न ही उसे किसी विरोधी ताक़त द्वारा नष्ट-भ्रष्ट किया जाएगा। जहाँ तक उसके नए कार्य का संबंध है, वह एक सर्वदा विजयी राजा है, और सभी विरोधी ताक़तें और मानवजाति के सभी पाखंड और भ्रांतियाँ उसकी चरण-पीठ के नीचे कुचल दिए जाते हैं। वह अपने कार्य का चाहे जो भी नया चरण संपन्न कर रहा हो, उसे निश्चित रूप से मानवजाति के बीच विकसित और विस्तारित किया जाएगा, और उसे निश्चित रूप से संपूर्ण विश्व में तब तक अबाध रूप से कार्यान्वित किया जाएगा, जब तक कि उसका महान कार्य पूरा नहीं हो जाता। यह परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि, उसका अधिकार और सामर्थ्य है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

294. परमेश्वर भिन्न-भिन्न युगों के अनुसार अपने वचन कहता है और अपना कार्य करता है, तथा भिन्न-भिन्न युगों में वह भिन्न-भिन्न वचन कहता है। परमेश्वर नियमों से नहीं बँधता, और एक ही कार्य को दोहराता नहीं है, और न अतीत की बातों को याद करके खिन्न होता है; वह ऐसा परमेश्वर है जो सदैव नया है और कभी पुराना नहीं होता, और वह हर दिन नए वचन बोलता है। तुम्हें उसका पालन करना चाहिए, जिसका आज पालन किया जाना चाहिए; यही मनुष्य की जिम्मेदारी और कर्तव्य है। यह महत्वपूर्ण है कि वर्तमान समय में अभ्यास परमेश्वर की रोशनी और वचनों के आस-पास केंद्रित हो। परमेश्वर नियमों का पालन नहीं करता, और अपनी बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता प्रकट करने के लिए विभिन्न परिप्रेक्ष्यों से बोलने में सक्षम है। यह मायने नहीं रखता कि वह आत्मा के परिप्रेक्ष्य से बोलता है, या मनुष्य के, या तृतीय पुरुष के परिप्रेक्ष्य से—परमेश्वर सदैव परमेश्वर है, और तुम उसके मनुष्य के परिप्रेक्ष्य से बोलने की वजह से यह नहीं कह सकते कि वह परमेश्वर नहीं है। परमेश्वर के विभिन्न परिप्रेक्ष्यों से बोलने के परिणामस्वरूप कुछ लोगों में धारणाएँ उभर आई हैं। ऐसे लोगों में परमेश्वर का कोई ज्ञान नहीं है, और उसके कार्य का कोई ज्ञान नहीं है। यदि परमेश्वर सदैव किसी एक ही परिप्रेक्ष्य से बोलता, तो क्या मनुष्य परमेश्वर के बारे में नियम निर्धारित न कर देता? क्या परमेश्वर मनुष्य को इस तरह से कार्य करने दे सकता था? परमेश्वर चाहे किसी भी परिप्रेक्ष्य से बोले, उसके पास वैसा करने का प्रयोजन है। यदि परमेश्वर सदैव आत्मा के परिप्रेक्ष्य से बोलता, तो क्या तुम उसके साथ जुड़ने में सक्षम होते? इसलिए, तुम्हें अपने वचन प्रदान करने और वास्तविकता में तुम्हारा मार्गदर्शन करने के लिए कभी-कभी वह तृतीय पुरुष में बोलता है। परमेश्वर जो कुछ भी करता है, उपयुक्त होता है। संक्षेप में, यह सब परमेश्वर द्वारा किया जाता है और तुम्हें इस पर संदेह नहीं करना चाहिए। वह परमेश्वर है, और इसलिए वह चाहे किसी भी परिप्रेक्ष्य से बोले, वह हमेशा परमेश्वर ही रहेगा। यह एक अडिग सत्य है। वह जैसे भी कार्य करे, वह फिर भी परमेश्वर है, और उसका सार नहीं बदलेगा! पतरस परमेश्वर से बहुत प्रेम करता था और वह परमेश्वर का हमख़याल व्यक्ति था, किंतु परमेश्वर ने उसके प्रभु या मसीह होने की गवाही नहीं दी, क्योंकि किसी प्राणी का सार वही होता है, जो वह है, और वह कभी नहीं बदल सकता। अपने कार्य में परमेश्वर नियमों का पालन नहीं करता, किंतु वह अपने कार्य को प्रभावी बनाने और अपने बारे में मनुष्य के ज्ञान को गहरा करने के लिए भिन्न-भिन्न तरीके उपयोग में लाता है। उसका कार्य करने का प्रत्येक तरीका मनुष्य की उसे जानने में सहायता करता है, और वह मनुष्य को पूर्ण करने के लिए है। चाहे वह कार्य करने का कोई भी तरीका उपयोग में लाए, प्रत्येक तरीका मनुष्य को बनाने और उसे पूर्ण करने के लिए है। भले ही उसके तरीकों में से कोई एक तरीका बहुत लंबे समय तक चला हो, यह परमेश्वर में मनुष्य के विश्वास को दृढ़ बनाने के लिए है। इसलिए तुम्हारे हृदय में कोई संदेह नहीं होना चाहिए। ये सभी परमेश्वर के कार्य के चरण हैं, और तुम्हें इनका पालन करना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के वचन के द्वारा सब-कुछ प्राप्त हो जाता है' से उद्धृत

295. अंत के दिनों का देहधारी परमेश्वर मुख्य रूप से अपने वचनों को कहने, वह सब समझाने जो मनुष्य के जीवन के लिए आवश्यक है, वह बताने जिसमें मनुष्य को प्रवेश करना चाहिए, मनुष्य को परमेश्वर के कर्मों को दिखाने, और मनुष्य को परमेश्वर की बुद्धि, सर्वशक्तिमत्ता और चमत्कारिकता दिखाने के लिए आया है। परमेश्वर जिन कई तरीक़ों से बातचीत करता है, उनके माध्यम से मनुष्य परमेश्वर की सर्वोच्चता, परमेश्वर की महत्ता, और इतना ही नहीं, परमेश्वर की विनम्रता और अदृश्यता को निहारता है। मनुष्य देखता है कि परमेश्वर सर्वोच्च है, परंतु वह विनम्र और छिपा हुआ है, और सबसे छोटा हो सकता है। उसके कुछ वचन सीधे पवित्रात्मा के दृष्टिकोण से कहे गए हैं, कुछ सीधे मनुष्य के दृष्टिकोण से, और कुछ तीसरे व्यक्ति के दृष्टिकोण से। इसमें यह देखा जा सकता है कि परमेश्वर के कार्य करने का ढंग बहुत भिन्न-भिन्न है, और वह इसे वचनों के माध्यम से ही मनुष्य को देखने देता है। अंत के दिनों के दौरान परमेश्वर का कार्य सामान्य और वास्तविक दोनों है, और इस प्रकार अंत के दिनों में लोगों के समूह को समस्त परीक्षणों में से सबसे बड़े परीक्षण से गुज़ारा जाता है। परमेश्वर की सामान्यता और वास्तविकता के कारण, सभी लोग ऐसे परीक्षणों में प्रविष्ट हुए हैं; अगर मनुष्य परमेश्वर के परीक्षणों में उतरा है, तो उसका कारण परमेश्वर की सामान्यता और वास्तविकता ही है। यीशु के युग के दौरान कोई धारणाएँ या परीक्षण नहीं थे। चूँकि यीशु द्वारा किया गया अधिकांश कार्य मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप था, इसलिए लोगों ने उसका अनुसरण किया, और उसके बारे में उनकी कोई धारणाएँ नहीं थीं। आज के परीक्षण मनुष्य द्वारा अब तक झेले गए परीक्षणों में सबसे बड़े हैं, और जब यह कहा जाता है कि ये लोग दारुण दुःख से निकल आए हैं, तो उसका अर्थ यही दारुण दुःख है। आज परमेश्वर इन लोगों में विश्वास, प्रेम, पीड़ा की स्वीकृति और आज्ञाकारिता उत्पन्न करने के लिए बोलता है। अंत के दिनों के देहधारी परमेश्वर द्वारा कहे गए वचन मनुष्य के प्रकृति-सार, मनुष्य के व्यवहार, और आज जिसमें मनुष्य को प्रवेश करना चाहिए, उसके अनुरूप हैं। उसके वचन वास्तविक और सामान्य दोनों हैं : वह आने वाले कल की बात नहीं करता है, न ही वह पीछे मुड़कर बीते हुए कल को देखता है; वह केवल उसी की बात करता है जिसमें आज प्रवेश करना चाहिए, जिसे आज अभ्यास में लाना चाहिए और जिसे आज समझना चाहिए। यदि वर्तमान समय में ऐसा कोई व्यक्ति उभरे, जो चिह्न और चमत्कार प्रदर्शित करने, दुष्टात्माओं को निकालने, बीमारों को चंगा करने और कई चमत्कार दिखाने में समर्थ हो, और यदि वह व्यक्ति दावा करे कि वह यीशु है जो आ गया है, तो यह बुरी आत्माओं द्वारा उत्पन्न नकली व्यक्ति होगा, जो यीशु की नकल उतार रहा होगा। यह याद रखो! परमेश्वर वही कार्य नहीं दोहराता। कार्य का यीशु का चरण पहले ही पूरा हो चुका है, और परमेश्वर कार्य के उस चरण को पुनः कभी हाथ में नहीं लेगा। परमेश्वर का कार्य मनुष्य की धारणाओं के साथ मेल नहीं खाता; उदाहरण के लिए, पुराने नियम ने मसीहा के आगमन की भविष्यवाणी की, और इस भविष्यवाणी का परिणाम यीशु का आगमन था। चूँकि यह पहले ही घटित हो चुका है, इसलिए एक और मसीहा का पुनः आना ग़लत होगा। यीशु एक बार पहले ही आ चुका है, और यदि यीशु को इस समय फिर आना पड़ा, तो यह गलत होगा। प्रत्येक युग के लिए एक नाम है, और प्रत्येक नाम में उस युग का चरित्र-चित्रण होता है। मनुष्य की धारणाओं के अनुसार, परमेश्वर को सदैव चिह्न और चमत्कार दिखाने चाहिए, सदैव बीमारों को चंगा करना और दुष्टात्माओं को निकालना चाहिए, और सदैव ठीक यीशु के समान होना चाहिए। परंतु इस बार परमेश्वर इसके समान बिल्कुल नहीं है। यदि अंत के दिनों के दौरान, परमेश्वर अब भी चिह्नों और चमत्कारों को प्रदर्शित करे, और अब भी दुष्टात्माओं को निकाले और बीमारों को चंगा करे—यदि वह बिल्कुल यीशु की तरह करे—तो परमेश्वर वही कार्य दोहरा रहा होगा, और यीशु के कार्य का कोई महत्व या मूल्य नहीं रह जाएगा। इसलिए परमेश्वर प्रत्येक युग में कार्य का एक चरण पूरा करता है। ज्यों ही उसके कार्य का प्रत्येक चरण पूरा होता है, बुरी आत्माएँ शीघ्र ही उसकी नकल करने लगती हैं, और जब शैतान परमेश्वर के बिल्कुल पीछे-पीछे चलने लगता है, तब परमेश्वर तरीक़ा बदलकर भिन्न तरीक़ा अपना लेता है। ज्यों ही परमेश्वर ने अपने कार्य का एक चरण पूरा किया, बुरी आत्माएँ उसकी नकल कर लेती हैं। तुम लोगों को इस बारे में स्पष्ट होना चाहिए। आज परमेश्वर का कार्य यीशु के कार्य से भिन्न क्यों है? आज परमेश्वर चिह्नों और चमत्कारों का प्रदर्शन, पिशाचों का बहिष्करण और बीमारों को चंगा क्यों नहीं करता? यदि यीशु का कार्य व्यवस्था के युग के दौरान किए गए कार्य के समान ही होता, तो क्या वह अनुग्रह के युग के परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर पाता? क्या वह सलीब पर चढ़ने का कार्य पूरा कर पाता? यदि व्यवस्था के युग की तरह यीशु मंदिर में गया होता और उसने सब्त को माना होता, तो उसे कोई नहीं सताता और सब उसे गले लगाते। यदि ऐसा होता, तो क्या उसे सलीब पर चढ़ाया जा सकता था? क्या वह छुटकारे का कार्य पूरा कर सकता था? यदि अंत के दिनों का देहधारी परमेश्वर यीशु के समान चिह्न और चमत्कार दिखाता, तो इसमें भला कौन-सी खास बात होती? यदि परमेश्वर अंत के दिनों के दौरान अपने कार्य का दूसरा भाग करता है, जो उसकी प्रबंधन योजना के भाग का प्रतिनिधित्व करता है, तो केवल तभी मनुष्य परमेश्वर का अधिक गहरा ज्ञान प्राप्त कर सकता है, और केवल तभी परमेश्वर की प्रबंधन योजना पूर्ण हो सकती है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आज परमेश्वर के कार्य को जानना' से उद्धृत

296. अंत के दिनों में परमेश्वर वचन का उपयोग मुख्यत: मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए करता है। वह मनुष्य का दमन करने या उन्हें कायल करने के लिए संकेतों और चमत्कारों का उपयोग नहीं करता; यह परमेश्वर के सामर्थ्य को स्पष्ट नहीं कर सकता। यदि परमेश्वर केवल संकेत और चमत्कार दिखाता, तो परमेश्वर की वास्तविकता स्पष्ट करना असंभव होता, और इस तरह मनुष्य को पूर्ण बनाना भी असंभव होता। परमेश्वर संकेतों और चमत्कारों से मनुष्य को पूर्ण नहीं बनाता, अपितु उसे सींचने और उसकी चरवाही करने के लिए वचन का उपयोग करता है, जिसके बाद मनुष्य की पूर्ण आज्ञाकारिता हासिल होती है और मनुष्य को परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त होता है। यही उसके द्वारा किए जाने वाले कार्य और बोले जाने वाले वचनों का उद्देश्य है। परमेश्वर मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए संकेत एवं चमत्कार दिखाने की विधि का उपयोग नहीं करता—वह मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए वचनों और कार्य की कई भिन्न विधियों का उपयोग करता है। चाहे वह शुद्धिकरण, व्यवहार, काँट-छाँट या वचनों का पोषण हो, मनुष्य को पूर्ण बनाने और उसे परमेश्वर के कार्य, उसकी बुद्धि और चमत्कारिकता का और अधिक ज्ञान देने के लिए परमेश्वर कई भिन्न-भिन्न परिप्रेक्ष्यों से बोलता है। अंत के दिनों में परमेश्वर द्वारा युग का समापन करने के समय जब मनुष्य को पूर्ण बना दिया जाएगा, तब वह संकेत और चमत्कार देखने योग्य हो जाएगा। जब तुम परमेश्वर को जान लेते हो और इस बात की परवाह किए बिना कि वह क्या करता है, उसका आज्ञापालन करने में सक्षम हो जाते हो, तब संकेत और चमत्कार देखकर तुम परमेश्वर के बारे में कोई धारणा नहीं बनाते। इस समय तुम भ्रष्ट हो और परमेश्वर की पूर्ण आज्ञाकारिता में अक्षम हो—तुम क्या अपने को संकेत और चमत्कार देखने योग्य समझते हो? जब परमेश्वर संकेत और चमत्कार दिखाता है, तो यह तब होता है, जब वह मनुष्य को दंड देता है, और तब भी, जब युग बदलता है, और इसके अलावा, जब युग का समापन होता है। जब परमेश्वर का कार्य सामान्य रूप से किया जा रहा हो, तो वह संकेत और चमत्कार नहीं दिखाता। संकेत और चमत्कार दिखाना उसके लिए बाएँ हाथ का खेल है, किंतु वह परमेश्वर के कार्य का सिद्धांत नहीं है, न ही वह परमेश्वर के मनुष्यों के प्रबंधन का लक्ष्य है। यदि मनुष्य संकेत और चमत्कार देखता, और यदि परमेश्वर की आत्मिक देह को मनुष्य पर प्रकट होना होता, तो क्या सभी लोग परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते? मैं पहले कह चुका हूँ कि पूर्व से विजेताओं का एक समूह प्राप्त किया जा रहा है, ऐसे विजेताओं का, जो भारी क्लेश के बीच से आते हैं। इन वचनों का क्या अर्थ है? इनका अर्थ है कि केवल इन प्राप्त किए गए लोगों ने ही न्याय और ताड़ना, और व्यवहार और काँट-छाँट, और सभी प्रकार के शुद्धिकरण से गुजरने के बाद वास्तव में आज्ञापालन किया। इन लोगों का विश्वास अस्पष्ट और अमूर्त नहीं, बल्कि वास्तविक है। उन्होंने कोई संकेत और चमत्कार, या अचंभे नहीं देखे हैं; वे गूढ़ शाब्दिक अर्थों और सिद्धांतों या गहन अंर्तदृष्टियों की बात नहीं करते; इसके बजाय उनके पास वास्तविकता और परमेश्वर के वचन और परमेश्वर की वास्तविकता का सच्चा ज्ञान है। क्या ऐसा समूह परमेश्वर के सामर्थ्य को स्पष्ट करने में अधिक सक्षम नहीं है? अंत के दिनों के दौरान परमेश्वर का कार्य वास्तविक कार्य है। यीशु के युग के दौरान, वह मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए नहीं, बल्कि छुटकारा दिलाने के लिए आया, और इसलिए उसने लोगों से अपना अनुसरण करवाने के लिए कुछ चमत्कार प्रदर्शित किए। क्योंकि वह मुख्य रूप से सलीब पर चढ़ने का कार्य पूरा करने आया था, और संकेत दिखाना उसकी सेवकाई का हिस्सा नहीं था। इस प्रकार के संकेत और चमत्कार ऐसे कार्य थे, जो उसके कार्य को कारगर बनाने के लिए किए गए थे; वे अतिरिक्त कार्य थे, और संपूर्ण युग के कार्य का प्रतिनिधित्व नहीं करते थे। पुराने विधान के व्यवस्था के युग के दौरान भी परमेश्वर ने कुछ संकेत और चमत्कार दिखाए—किंतु आज परमेश्वर जो कार्य करता है, वह वास्तविक कार्य है, और वह अब निश्चित रूप से संकेत और चमत्कार नहीं दिखाएगा। यदि उसने संकेत और चमत्कार दिखाए, तो उसका वास्तविक कार्य अस्तव्यस्त हो जाएगा, और वह कोई और कार्य करने में असमर्थ होगा। यदि परमेश्वर ने मनुष्य को पूर्ण करने हेतु वचन का उपयोग करने के लिए कहा, किंतु संकेत और चमत्कार भी दिखाए, तब क्या यह स्पष्ट किया जा सकता है कि मनुष्य वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करता है या नहीं? इसलिए परमेश्वर इस तरह की चीजें नहीं करता। मनुष्य के भीतर धर्म की अतिशय बातें हैं; अंत के दिनों में परमेश्वर मनुष्य के भीतर से सभी धार्मिक धारणाओं और अलौकिक बातों को बाहर निकालने और मनुष्य को परमेश्वर की वास्तविकता का ज्ञान कराने के लिए आया है। वह एक ऐसे परमेश्वर की छवि दूर करने आया है, जो अमूर्त और काल्पनिक है—दूसरे शब्दों में, एक ऐसे परमेश्वर की छवि, जिसका कोई अस्तित्व ही नहीं है। और इसलिए, अब तुम्हारे लिए जो एकमात्र बहुमूल्य चीज़ है, वह है वास्तविकता का ज्ञान होना! सत्य सभी चीज़ों पर प्रबल है। आज तुम्हारे पास कितना सत्य है? क्या वे सब, जो संकेत और चमत्कार दिखाते हैं, परमेश्वर हैं? दुष्टात्माएँ भी संकेत और चमत्कार दिखा सकते हैं; तो क्या वे सब परमेश्वर हैं? परमेश्वर पर अपने विश्वास में मनुष्य जिस चीज की खोज करता है, वह सत्य है, और वह जिसका अनुसरण करता है, वह संकेतों और चमत्कारों के बजाय, जीवन है। जो लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, उन सबका यही लक्ष्य होना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के वचन के द्वारा सब-कुछ प्राप्त हो जाता है' से उद्धृत

297. यहोवा का कार्य दुनिया का सृजन था, वह आरंभ था; कार्य का यह चरण कार्य का अंत है, और यह समापन है। आरंभ में, परमेश्वर का कार्य इस्राएल के चुने हुए लोगों के बीच किया गया था और यह सभी जगहों में से सबसे पवित्र जगह पर एक नए युग का उद्भव था। कार्य का अंतिम चरण दुनिया का न्याय करने और युग को समाप्त करने के लिए सभी देशों में से सबसे अशुद्ध देश में किया जा रहा है। पहले चरण में, परमेश्वर का कार्य सबसे प्रकाशमान स्थान पर किया गया था और अंतिम चरण सबसे अंधकारमय स्थान पर किया जा रहा है, और इस अंधकार को बाहर निकालकर प्रकाश को प्रकट किया जाएगा और सभी लोगों पर विजय प्राप्त की जाएगी। जब इस सबसे अशुद्ध और सबसे अंधकारमय स्थान के लोगों पर विजय प्राप्त कर ली जाएगी और समस्त आबादी स्वीकार कर लेगी कि परमेश्वर है, जो कि सच्चा परमेश्वर है और हर व्यक्ति को पूरी तरह से विश्वास हो जाएगा, तब समस्त ब्रह्मांड में विजय का कार्य करने के लिए इस तथ्य का उपयोग किया जाएगा। कार्य का यह चरण प्रतीकात्मक है : एक बार इस युग का कार्य समाप्त हो गया, तो प्रबंधन का छह हजार वर्षों का कार्य पूरी तरह से समाप्त हो जाएगा। एक बार सबसे अंधकारमय स्थान के लोगों को जीत लिया गया, तो कहने की आवश्यकता नहीं कि अन्य जगह पर भी ऐसा ही होगा। इस तरह, केवल चीन में ही विजय का कार्य सार्थक प्रतीकात्मकता रखता है। चीन अंधकार की सभी शक्तियों का मूर्त रूप है और चीन के लोग उन सभी लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं जो देह के हैं, शैतान के हैं, मांस और रक्त के हैं। चीनी लोग ही बड़े लाल अजगर द्वारा सबसे ज़्यादा भ्रष्ट किए गए हैं, वही परमेश्वर के सबसे कट्टर विरोधी हैं, उन्हीं की मानवता सर्वाधिक अधम और अशुद्ध है, इसलिए वे समस्त भ्रष्ट मानवता के मूल आदर्श हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि अन्य देशों में कोई समस्या नहीं है; मनुष्य की अवधारणाएँ समान हैं, यद्यपि इन देशों के लोग अच्छी क्षमता वाले हो सकते हैं, किन्तु यदि वे परमेश्वर को नहीं जानते, तो वे अवश्य ही उसके विरोधी होंगे। यहूदियों ने भी परमेश्वर का विरोध और उसकी अवहेलना क्यों की? फ़रीसियों ने भी उसका विरोध क्यों किया? यहूदा ने यीशु के साथ विश्वासघात क्यों किया? उस समय, बहुत-से अनुयायी यीशु को नहीं जानते थे। यीशु को सूली पर चढ़ाये जाने और उसके फिर से जी उठने के बाद भी, लोगों ने उस पर विश्वास क्यों नहीं किया? क्या मनुष्य की अवज्ञा पूरी तरह से समान नहीं है? बात बस इतनी है कि चीन के लोग इसके एक उदाहरण के रूप में पेश किए जाते हैं, जब उन पर विजय प्राप्त कर ली जाएगी तो वे एक आदर्श और नमूना बन जाएँगे और दूसरों के लिए संदर्भ का काम करेंगे। मैंने हमेशा क्यों कहा है कि तुम लोग मेरी प्रबंधन योजना के सहायक हो? चीन के लोगों में भ्रष्टता, अशुद्धता, अधार्मिकता, विरोध और विद्रोहशीलता पूरी तरह से व्यक्त और विविध रूपों में प्रकट होते हैं। एक ओर, वे खराब क्षमता के हैं और दूसरी ओर, उनका जीवन और उनकी मानसिकता पिछडी हुई है, उनकी आदतें, सामाजिक वातावरण, जिस परिवार में वे जन्में हैं—सभी गरीब और सबसे पिछड़े हुए हैं। उनकी हैसियत भी निम्न है। इस स्थान में कार्य प्रतीकात्मक है, एक बार जब यह परीक्षा-कार्य पूरी तरह से संपन्न हो जाएगा, तो परमेश्वर का बाद का कार्य अधिक आसान हो जाएगा। यदि कार्य के इस चरण को पूरा किया जा सका, तो इसके बाद का कार्य अच्छी तरह से आगे बढ़ेगा। एक बार जब कार्य का यह चरण सम्पन्न हो जायेगा, तो बड़ी सफलता प्राप्त हो जाएगी और समस्त ब्रह्माण्ड में विजय का कार्य पूरी तरह समाप्त हो जायेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के कार्य का दर्शन (2)' से उद्धृत

298. परमेश्वर ने लोगों के इस समूह को समस्त ब्रह्माण्ड भर में अपने कार्य का एकमात्र केंद्रबिंदु बनाया है। उसने तुम लोगों के लिए अपने हृदय का रक्त तक निचोड़कर दे दिया है; उसने ब्रह्माण्ड भर में पवित्रात्मा का समस्त कार्य पुनः प्राप्त करके तुम लोगों को दे दिया है। इसी कारण से तुम लोग सौभाग्यशाली हो। इतना ही नहीं, वह अपनी महिमा इस्राएल, उसके चुने हुए लोगों से हटाकर तुम लोगों के ऊपर ले आया है, और वह इस समूह के माध्यम से अपनी योजना का उद्देश्य पूर्ण रूप से प्रत्यक्ष करेगा। इसलिए तुम लोग ही वह हो जो परमेश्वर की विरासत प्राप्त करोगे, और इससे भी अधिक, तुम परमेश्वर की महिमा के वारिस हो। तुम सब लोगों को शायद ये वचन स्मरण हों : "क्योंकि हमारा पल भर का हल्का सा क्लेश हमारे लिये बहुत ही महत्वपूर्ण और अनन्त महिमा उत्पन्न करता जाता है।" तुम सब लोगों ने पहले भी ये वचन सुने हैं, किंतु तुममें से कोई भी इनका सच्चा अर्थ नहीं समझा। आज, तुम उनकी सच्ची महत्ता से गहराई से अवगत हो। ये वचन परमेश्वर द्वारा अंत के दिनों के दौरान पूरे किए जाएँगे, और वे उन लोगों में पूरे किए जाएँगे जिन्हें बड़े लाल अजगर द्वारा निर्दयतापूर्वक उत्पीड़ित किया गया है, उस देश में जहाँ वह कुण्डली मारकर बैठा है। बड़ा लाल अजगर परमेश्वर को सताता है और परमेश्वर का शत्रु है, और इसीलिए, इस देश में, परमेश्वर में विश्वास करने वाले लोगों को इस प्रकार अपमान और अत्याचार का शिकार बनाया जाता है, और परिणामस्वरूप, ये वचन तुम लोगों में, लोगों के इस समूह में, पूरे किए जाते हैं। चूँकि परमेश्वर का कार्य उस देश में आरंभ किया जाता है जो परमेश्वर का विरोध करता है, इसलिए परमेश्वर के कार्य को भयंकर बाधाओं का सामना करना पड़ता है, और उसके बहुत-से वचनों को संपन्न करने में समय लगता है; इस प्रकार, परमेश्वर के वचनों के परिणामस्वरूप लोग शुद्ध किए जाते हैं, जो कष्ट झेलने का भाग भी है। परमेश्वर के लिए बड़े लाल अजगर के देश में अपना कार्य करना अत्यंत कठिन है—परंतु इसी कठिनाई के माध्यम से परमेश्वर अपने कार्य का एक चरण पूरा करता है, अपनी बुद्धि और अपने अद्भुत कर्म प्रत्यक्ष करता है, और लोगों के इस समूह को पूर्ण बनाने के लिए इस अवसर का उपयोग करता है। लोगों की पीड़ा के माध्यम से, उनकी क्षमता के माध्यम से, और इस कुत्सित देश के लोगों के समस्त शैतानी स्वभावों के माध्यम से परमेश्वर अपना शुद्धिकरण और विजय का कार्य करता है, ताकि इससे वह महिमा प्राप्त सके, और ताकि उन्हें प्राप्त कर सके जो उसके कर्मों की गवाही देंगे। इस समूह के लोगों के लिए परमेश्वर द्वारा किए गए सारे त्यागों का संपूर्ण महत्व ऐसा ही है। अर्थात, परमेश्वर विजय का कार्य उन्हीं लोगों के माध्यम से करता है जो उसका विरोध करते हैं, और केवल इसी प्रकार परमेश्वर की महान सामर्थ्य प्रत्यक्ष की जा सकती है। दूसरे शब्दों में, केवल अशुद्ध देश के लोग ही परमेश्वर की महिमा का उत्‍तराधिकार पाने के योग्य हैं, और केवल यही परमेश्वर की महान सामर्थ्‍य को उभारकर सामने ला सकता है। इसी कारणअशुद्ध देश से ही, और अशुद्ध देश में रहने वालों से ही परमेश्वर की महिमा प्राप्त की जाती है। ऐसी ही परमेश्वर की इच्छा है। यीशु के कार्य का चरण भी ऐसा ही था : वह केवल उन्हीं फरीसियों के बीच महिमा प्राप्त कर सकता था जिन्होंने उसे सताया था; यदि फरीसियों द्वारा किया गया उत्पीड़न और यहूदा द्वारा दिया गया धोखा नहीं होता, तो यीशु का उपहास नहीं उड़ाया जाता या उसे लांछित नहीं किया जाता, सलीब पर तो और भी नहीं चढ़ाया जाता, और इस प्रकार उसे कभी महिमा प्राप्त नहीं हो सकती थी। जहाँ परमेश्वर प्रत्येक युग में कार्य करता है, और जहाँ वह देह में काम करता है, वहीं वह महिमा प्राप्त करता है और वहीं वह उन्हें प्राप्त करता है जिन्हें वह प्राप्त करना चाहता है। यही परमेश्वर के कार्य की योजना है, और यही उसका प्रबंधन है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'क्या परमेश्वर का कार्य उतना सरल है जितना मनुष्य कल्पना करता है?' से उद्धृत

299. कई हज़ार वर्षों की परमेश्वर की योजना में, कार्य के दो भाग देह में किए गए हैं : पहला है सलीब पर चढ़ाए जाने का कार्य, जिसके लिए वह महिमा प्राप्त करता है; दूसरा है अंत के दिनों में विजय और पूर्णता का कार्य, जिसके लिए वह महिमा प्राप्त करता है। यही परमेश्वर का प्रबंधन है। इसलिए परमेश्वर के कार्य, या तुम लोगों को दिए गए परमेश्वर के आदेश को सीधी-सादी बात मत समझो। तुम सभी लोग परमेश्वर की कहीं अधिक असाधारण और अनंत महत्व की महिमा के वारिस हो, और यह परमेश्वर द्वारा विशेष रूप से निश्चित किया गया था। उसकी महिमा के दो भागों में से एक तुम लोगों में प्रत्यक्ष होता है; परमेश्वर की महिमा का एक समूचा भाग तुम लोगों को प्रदान किया गया है, जो तुम लोगों की विरासत हो सकता है। यही परमेश्वर द्वारा तुम्हारा उत्कर्ष है, और यह वह योजना भी है जो उसने बहुत पहले पूर्वनिर्धारित कर दी थी। जहाँ बड़ा लाल अजगर रहता है उस देश में परमेश्वर द्वारा किए गए कार्य की महानता को देखते हुए, यदि यह कार्य कहीं और ले जाया जाता, तो यह बहुत पहले अत्यंत फलदायी हो गया होता और मनुष्य द्वारा तत्परता से स्वीकार कर लिया जाता। यही नहीं, परमेश्वर में विश्वास करने वाले पश्चिम के पादरियों के लिए इस कार्य को स्वीकार कर पाना कहीं अधिक आसान होता, क्योंकि यीशु द्वारा किए गए कार्य का चरण एक पूर्ववर्ती मिसाल का काम करता है। यही कारण है कि परमेश्वर महिमा पाने के कार्य का यह चरण कहीं और पूरा कर पाने में असमर्थ है; जब कार्य का लोगों द्वारा समर्थन किया जाता है और उसे देशों द्वारा मान्यता प्राप्त होती है, तो परमेश्वर की महिमा प्रभावी नहीं हो सकती है। इस देश में कार्य के इस चरण का यही असाधारण महत्व है। तुम लोगों के बीच एक भी व्यक्ति नहीं है जो व्यवस्था द्वारा सुरक्षित है—इसके बजाय, तुम व्यवस्था द्वारा दण्ड के भागी ठहराए जाते हो। इससे भी अधिक समस्यात्मक यह है कि लोग, तुम लोगों को समझते नहीं हैं : चाहे वे तुम्हारे रिश्तेदार हों, तुम्हारे माता-पिता, तुम्हारे मित्र, या तुम्हारे सहकर्मी हों, उनमें से कोई भी तुम लोगों को समझता नहीं है। जब परमेश्वर द्वारा तुम लोगों को त्याग दिया जाता है, तब तुम लोगों के लिए पृथ्वी पर और रह पाना असंभव हो जाता है, किंतु फिर भी, लोग परमेश्वर से दूर होना सहन नहीं कर सकते हैं, जो परमेश्वर द्वारा लोगों पर विजय प्राप्त करने का महत्व है, और यही परमेश्वर की महिमा है। तुम लोगों ने आज के दिन जो विरासत पाई है वह युगों-युगों तक परमेश्वर के प्रेरितों और नबियों की विरासत से भी बढ़कर है और यहाँ तक कि मूसा और पतरस की विरासत से भी अधिक है। आशीष एक या दो दिन में प्राप्त नहीं किए जा सकते हैं; वे बड़े त्याग के माध्यम से ही कमाए जाने चाहिए। कहने का तात्पर्य यह है, तुम लोगों को उस प्रेम से युक्त होना ही चाहिए जो शुद्धिकरण से गुज़र चुका है, तुममें अत्यधिक आस्था होनी ही चाहिए, और तुम्हारे पास कई सत्य होने ही चाहिए जो परमेश्वर अपेक्षा करता है कि तुम प्राप्त करो; इससे भी बढ़कर, भयभीत हुए या टाल-मटोल किए बिना, तुम्हें न्याय की ओर जाना चाहिए, और परमेश्वर के प्रति मृत्युपर्यंत रहने वाला प्रेम रखना चाहिए। तुममें संकल्प होना ही चाहिए, तुम लोगों के जीवन स्वभाव में बदलाव आने ही चाहिए; तुम लोगों की भ्रष्टता का निदान होना ही चाहिए, तुम्हें परमेश्वर के सारे आयोजन बिना शिकायत स्वीकार करने ही चाहिए, और तुम्हें मृत्युपर्यंत आज्ञाकारी होना ही चाहिए। यह वह है जो तुम्हें प्राप्त करना ही है, यह परमेश्वर के कार्य का अंतिम लक्ष्य है, और यह वह है जो परमेश्वर लोगों के इस समूह से चाहता है। चूँकि वह तुम लोगों को देता है, इसलिए वह बदले में तुम लोगों से निश्चिय ही माँगेगा भी, और तुम लोगों से निश्चय ही उपयुक्त माँगें ही करेगा। इसलिए, परमेश्वर जो भी कार्य करता है उस सबका कारण होता है, जो दिखलाता है कि परमेश्वर बार-बार ऐसा कार्य क्यों करता है जो इतने उच्च मानक स्थापित करता और कड़ी अपेक्षाएँ करता है। यही कारण है कि परमेश्वर के प्रति विश्वास तुममें समाया होना चाहिए। संक्षेप में, परमेश्वर का समूचा कार्य तुम लोगों के लिए किया जाता है, ताकि तुम लोग उसकी विरासत पाने के योग्य बन सको। यह सब परमेश्वर की अपनी महिमा के वास्ते उतना नहीं है बल्कि तुम लोगों के उद्धार के लिए और इस देश में अत्यधिक सताए गए लोगों के इस समूह को पूर्ण बनाने के लिए है। तुम लोगों को परमेश्वर की इच्छा समझनी चाहिए। और इसलिए, मैं बहुत-से अज्ञानी लोगों को, जो किसी भी अंतर्दृष्टि या समझ से रहित हैं, उपदेश देता हूँ : परमेश्वर की परीक्षा मत लो, तथा अब और प्रतिरोध मत करो। परमेश्वर पहले ही उस पीड़ा से गुज़र चुका है जो कभी किसी मनुष्य ने नहीं सही, और यहाँ तक कि बहुत पहले मनुष्य के स्थान पर इससे भी अधिक अपमान सह चुका है। ऐसा और क्या है जो तुम लोग नहीं छोड़ सकते? परमेश्वर की इच्छा से अधिक महत्वपूर्ण और क्या हो सकता है? परमेश्वर के प्रेम से बढ़कर और क्या हो सकता है? परमेश्वर के लिए इस अशुद्ध देश में कार्य करना वैसे ही काफी कठिन है; उस पर यदि मनुष्य जानबूझकर और मनमाने ढंग से उल्लंघन करता है, तो परमेश्वर का कार्य और लंबा खींचना पड़ेगा। संक्षेप में, यह किसी के हित में नहीं है, और इसमें किसी का लाभ नहीं है। परमेश्वर समय से बंधा नहीं है; उसका कार्य और उसकी महिमा सबसे पहले आते हैं। इसलिए, वह अपने कार्य के लिए कोई भी क़ीमत चुकाएगा, चाहे इसमें जितना भी समय लगे। यह परमेश्वर का स्वभाव है : वह तब तक विश्राम नहीं करेगा जब तक उसका कार्य पूरा नहीं हो जाता है। उसका कार्य तभी समाप्त होगा जब वह अपनी महिमा का दूसरा भाग प्राप्त कर लेता है। समस्त ब्रह्माण्ड में यदि परमेश्वर महिमा पाने के काम का दूसरा भाग पूरा नहीं कर पाता है, तो उसका दिन कभी नहीं आएगा, उसका हाथ अपने चुने हुए लोगों पर से कभी नहीं हटेगा, उसकी महिमा इस्राएल पर कभी नहीं उतरेगी, और उसकी योजना कभी समाप्त नहीं होगी। तुम लोगों को परमेश्वर की इच्छा देख पाना चाहिए, और तुम्हें देखना चाहिए कि परमेश्वर का कार्य आकाश और पृथ्वी और अन्य सब वस्तुओं के सृजन जितना सीधा-सरल नहीं हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि आज का कार्य उन लोगों का कायापलट करना है जो भ्रष्ट किए जा चुके हैं, जो बेहद सुन्न हैं, यह उन्हें शुद्ध करने के लिए है जो सृजित तो किए गए थे किंतु शैतान द्वारा वशीभूत कर लिए गए। यह आदम और हव्वा का सृजन नहीं है, यह प्रकाश का सृजन, या प्रत्येक पौधे और पशु का सृजन तो और भी नहीं है। परमेश्वर शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दी गई चीज़ों को शुद्ध करता है और फिर उन्हें नए सिरे से प्राप्त करता है; वे ऐसी चीज़ें बन जाती हैं जो उसकी होती हैं, और वे उसकी महिमा बन जाती हैं। यह वैसा नहीं है जैसा मनुष्य कल्पना करता है, यह आकाश और पृथ्वी और उनमें निहित सभी वस्तुओं के सृजन जितना, या शैतान को अथाह कुण्ड में जाने का श्राप देने के कार्य जितना सीधा-सरल नहीं है; बल्कि, यह मनुष्य का कायापलट करने का कार्य है, उन चीज़ों को जो नकारात्मक हैं, और उसकी नहीं हैं, ऐसी चीजों में बदलने का कार्य है जो सकारात्मक हैं और उसकी हैं। परमेश्वर के कार्य के इस चरण के पीछे का यही सत्य है। तुम लोगों को यह समझना ही चाहिए, और विषयों को अत्यधिक सरलीकृत करने से बचना चाहिए। परमेश्वर का कार्य किसी भी साधारण कार्य के समान नहीं है। इसकी उत्कृष्टता और बुद्धिमता मनुष्य की सोच से परे है। परमेश्वर कार्य के इस चरण के दौरान सभी चीज़ों का सृजन नहीं करता है, किंतु वह उन्हें नष्ट भी नहीं करता है। इसके बजाय, वह अपनी सृजित की गई सभी चीज़ों का कायापलट करता है, और शैतान द्वारा दूषित कर दी गई सभी चीजों को शुद्ध करता है। और इस प्रकार, परमेश्वर एक महान उद्यम आरंभ करता है, जो परमेश्वर के कार्य का संपूर्ण महत्व है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'क्या परमेश्वर का कार्य उतना सरल है जितना मनुष्य कल्पना करता है?' से उद्धृत

300. परमेश्वर लोगों के प्रबंधन का उपयोग शैतान को पराजित करने के लिए करता है। लोगों को भ्रष्ट करके शैतान लोगों के भाग्य का अंत कर देता है और परमेश्वर के कार्य में व्यवधान उत्पन्न करता है। दूसरी ओर, परमेश्वर का कार्य मनुष्यों का उद्धार करना है। परमेश्वर के कार्य का कौनसा कदम मानवजाति को बचाने के अभिप्राय से नहीं है? कौनसा कदम लोगों को स्वच्छ बनाने, उनसे धार्मिक आचरण करवाने और उनके ऐसी छवि में ढल जाने के लिए नहीं है जिससे प्रेम किया जा सके? पर शैतान ऐसा नहीं करता है। वह मानवजाति को भ्रष्ट करता है; मानवजाति को भ्रष्ट करने के अपने कार्य को सारे ब्रह्मांड में निरंतर करता रहता है। निस्संदेह, परमेश्वर भी अपना स्वयं का कार्य करता है। वह शैतान की ओर जरा भी ध्यान नहीं देता है। इससे फर्क नहीं पड़ता कि शैतान के पास कितना अधिकार है, उसे यह अधिकार परमेश्वर द्वारा ही दिया गया था; परमेश्वर ने उसे अपना पूरा अधिकार नहीं दिया था, और इसलिए वह चाहे जो कुछ करे, वह परमेश्वर से आगे नहीं बढ़ सकता और सदैव परमेश्वर की पकड़ में रहेगा। परमेश्वर ने स्वर्ग में रहने के समय अपने क्रिया-कलाप को प्रकट नहीं किया। उसने शैतान को स्वर्गदूतों पर नियंत्रण रखने की अनुमति देने के लिए उसे अपने अधिकार में से मात्र कुछ हिस्सा ही दिया था। इसलिए वह चाहे जो कुछ करे, वह परमेश्वर के अधिकार से बढ़कर नहीं हो सकता है, क्योंकि परमेश्वर ने मूल रूप से उसे जो अधिकार दिया है वह सीमित है। जब परमेश्वर कार्य करता है, तो शैतान बाधा उत्पन्न करता है। अंत के दिनों में, उसकी बाधाएँ समाप्त हो जाएंगी; उसी तरह, परमेश्वर का कार्य भी पूरा हो जाएगा, और परमेश्वर जिस प्रकार के व्यक्ति को संपूर्ण बनाना चाहता है वह संपूर्ण बना दिया जाएगा। परमेश्वर लोगों को सकारात्मक रूप से निर्देशित करता है; उसका जीवन जीवित जल है, अगाध और असीम है। शैतान ने मनुष्य को एक हद तक भ्रष्ट किया है; अंत में, जीवन का जीवित जल मनुष्य को संपूर्ण बनाएगा, और शैतान के लिए हस्तक्षेप करना और अपना कार्य करना असंभव हो जायेगा। इस प्रकार, परमेश्वर इन लोगों को पूर्णतः प्राप्त करने में समर्थ हो जाएगा। शैतान अब भी इसे मानने से मना करता है; वह लगातार स्वयं को परमेश्वर के विरोध में खड़ा रखता है, परंतु परमेश्वर उस पर कोई ध्यान नहीं देता है। परमेश्वर ने कहा है, "मैं शैतान की सभी अँधेरी शक्तियों के ऊपर और उसके सभी अँधेरे प्रभावों के ऊपर विजय प्राप्त करूंगा।" यही वह कार्य है जो अब देह में अवश्य किया जाना चाहिए, और यही देहधारण को महत्वपूर्ण बनाता है : अर्थात अंत के दिनों में शैतान को पराजित करने के चरण को पूरा करना और शैतान से जुड़ी सभी चीज़ों को मिटाना। परमेश्वर की शैतान पर विजय अपरिहार्य है! वास्तव में शैतान बहुत पहले ही असफल हो चुका है। जब बड़े लाल अजगर के पूरे देश में सुसमाचार फैलने लगा, अर्थात्, जब देहधारी परमेश्वर ने कार्य करना आरंभ किया, और यह कार्य गति पकड़ने लगा, तो शैतान बुरी तरह परास्त हो गया था, क्योंकि देहधारण का मूल उद्देश्य ही शैतान को पराजित करना था। जैसे ही शैतान ने देखा कि परमेश्वर एक बार फिर से देह बन गया और उसने अपना कार्य करना भी आरंभ कर दिया, जिसे कोई भी शक्ति रोक नहीं सकती, तो जब उसने इस कार्य को देखा, तो वह अवाक रह गया और उसने कोई और शरारत करने का साहस नहीं किया। पहले-पहल तो शैतान ने सोचा कि उसके पास भी प्रचुर बुद्धि है, और उसने परमेश्वर के कार्य में बाधा और परेशानियाँ डालीं; लेकिन, उसने यह आशा नहीं की थी कि परमेश्वर एक बार फिर देह बन जाएगा, या अपने कार्य में, परमेश्वर शैतान के विद्रोहीपन को मानवजाति के लिए प्रकटन और न्याय के रूप में काम में लायेगा, और परिणामस्वरूप मानवजाति को जीतेगा और शैतान को पराजित करेगा। परमेश्वर शैतान की अपेक्षा अधिक बुद्धिमान है, और उसका कार्य शैतान के कार्य से बहुत बढ़कर है। इसलिए, जैसा मैंने पहले कहा था : "मैं जिस कार्य को करता हूँ वह शैतान की चालबाजियों के प्रत्युत्तर में किया जाता है; अंत में, मैं अपनी सर्वशक्तिमत्ता और शैतान की सामर्थ्यहीनता को प्रकट करूँगा।" परमेश्वर अपना कार्य सामने आकर करेगा तो शैतान पीछे छूट जाएगा, जब तक कि अंत में वह अंततः नष्ट नहीं हो जाता है—उसे पता भी नहीं चलेगा कि उस पर किसने प्रहार किया! कुचलकर चूर—चूर कर दिए जाने के बाद ही उसे सत्य का ज्ञान होगा; उस समय तक उसे पहले से ही आग की झील में जला दिया गया होगा। तब क्या वह पूरी तरह से विश्वस्त नहीं हो जाएगा? क्योंकि उसके पास चलने के लिए और कोई चालें नहीं होंगी!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम्हें पता होना चाहिए कि समस्त मानवजाति आज के दिन तक कैसे विकसित हुई' से उद्धृत

301. बड़े लाल अजगर के देश में मैंने कार्य का एक ऐसा चरण पूरा कर लिया है, जिसकी थाह मनुष्य नहीं पा सकते, इसके कारण वे हवा में डोलने लगते हैं, जिसके बाद कई लोग हवा के वेग में चुपचाप बह जाते हैं। सचमुच, यह एक ऐसी "खलिहान" है जिसे मैं साफ़ करने वाला हूँ, यही मेरी लालसा है और यही मेरी योजना है। क्योंकि जब मैं कार्य कर रहा होता हूँ, तो कई दुष्ट लोग चोरी-छिपे आ घुसे हैं, लेकिन मुझे इन्हें खदेड़ कर निकालने की कोई जल्दी नहीं है। इसके बजाय, सही समय आने पर मैं उन्हें छिन्न-भिन्न कर दूँगा। केवल इसके बाद ही मैं जीवन का सोता बनूँगा, और उन लोगों को जो मुझे सच में प्रेम करते हैं, मुझसे अंजीर के पेड़ का फल और कुमुदिनी की सुगंध प्राप्त करने दूँगा। उस देश में जहाँ शैतान का डेरा है, जो गर्दो-गुबार का देश है, वहाँ अब शुद्ध सोना नहीं रहा, सिर्फ रेत ही रेत है, और इसलिए इन हालत को देखते हुए, मैं कार्य का ऐसा चरण पूरा करता हूँ। तुम्हें यह पता होना चाहिए कि मैं जो प्राप्त करता हूँ वह रेत नहीं बल्कि शुद्ध, परिष्कृत सोना है। दुष्ट लोग मेरे घर में कैसे रह सकते हैं? मैं लोमड़ियों को अपने स्वर्ग में परजीवी कैसे बनने दे सकता हूँ। मैं इन चीज़ों को खदेड़ने के लिए हर संभव तरीका अपनाता हूँ। मेरी इच्छा प्रकट होने से पहले कोई भी यह नहीं जानता कि मैं क्या करने वाला हूँ। इस अवसर का लाभ उठाते हुए, मैं उन दुष्टों को दूर खदेड़ देता हूँ, और वे मेरी उपस्थिति को छोड़कर जाने के लिए मजबूर हो जाते हैं। मैं दुष्टों के साथ यही करता हूँ, लेकिन फिर भी उनके लिए एक ऐसा दिन होगा जब वे मेरे लिए सेवा कर पाएंगे। मनुष्यों की आशीष पाने की इच्छा अत्यंत प्रबल है; इसलिए मैं उनकी ओर घूम जाता हूँ और अन्यजातियों को अपना महिमामयी मुखमंडल दिखाता हूँ, ताकि सभी मनुष्य अपनी दुनिया में जी सकें और अपने आपको आंक सकें, इस दौरान मैं वे वचन कहता रहता हूँ जो मुझे कहने चाहिए, और मनुष्यों को वह सब कुछ देता रहता हूँ जिसकी उन्हें आवश्यकता है। जब तक मनुष्यों को होश आएगा, उससे बहुत पहले ही मैं अपने कार्य को फैला चुका हूँगा। उसके बाद मैं मनुष्यों के सामने अपनी इच्छा व्यक्त करूँगा और मनुष्यों पर अपने कार्य का दूसरा भाग शुरू करूँगा, मैं सभी लोगों को करीब से अपना अनुसरण करने दूँगा ताकि वे मेरे कार्य के साथ तालमेल बिठा सकें। मैं मनुष्यों को उनकी क्षमता के अनुसार वो सब कुछ करने दूँगा, जिससे वे मेरे साथ मिलकर उस कार्य को कर सकें जो मुझे अवश्य करना है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सात गर्जनाएँ गूँजती हैं—भविष्यवाणी करती हैं कि राज्य के सुसमाचार पूरे ब्रह्मांड में फैल जाएँगे' से उद्धृत

302. मेरी योजना में, शैतान आरंभ से ही, प्रत्येक कदम का पीछा करता आ रहा है। मेरी बुद्धि की विषमता के रूप में, हमेशा मेरी वास्तविक योजना को बाधित करने के तरीक़े और उपाय खोजने की कोशिश करता रहा है। परंतु क्या मैं उसके कपटपूर्ण कुचक्रों के आगे झुक सकता हूँ? स्वर्ग में और पृथ्वी पर सब कुछ मेरी सेवा करते हैं; शैतान के कपटपूर्ण कुचक्र क्या कुछ अलग हो सकते हैं? ठीक यही वह जगह है जहाँ मेरी बुद्धि बीच में काटती है; ठीक यही वह है जो मेरे कर्मों के बारे में अद्भुत है, और यही मेरी पूरी प्रबंधन योजना के परिचालन का सिद्धांत है। राज्य के निर्माण के युग के दौरान भी, मैं शैतान के कपटपूर्ण कुचक्रों से बचता नहीं हूँ, बल्कि वह कार्य करता रहता हूँ जो मुझे करना ही चाहिए। ब्रह्माण्ड और सभी वस्तुओं के बीच, मैंने अपनी विषमता के रूप में शैतान के कर्मों को चुना है। क्या यह मेरी बुद्धि का आविर्भाव नहीं है? क्या यह ठीक वही नहीं है जो मेरे कार्यों के बारे में अद्भुत है? राज्य के युग में प्रवेश के अवसर पर, स्वर्ग में और पृथ्वी पर सभी चीज़ों का पूर्णतः कायापलट हो जाता है, और वे उत्सव मनाती और आनंदित हो उठती हैं। क्या तुम लोग कुछ अलग हो? किसके हृदय में शहद की मिठास नहीं है? कौन अपने हृदय में आनंद से नहीं भर उठता है? कौन खुशी से नृत्य नहीं करता है? कौन स्तुति के वचन नहीं बोलता है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन' के 'अध्याय 8' से उद्धृत

303. जब सभी लोगों को संपूर्ण बना लिया गया होगा और पृथ्वी के सभी राष्ट्र मसीह का राज्य बन गए होंगे, तब वह समय होगा जब सात गर्जनाएँ गूँजेंगी। वर्तमान दिन उस चरण की दिशा में एक लंबा कदम है; आने वाले उस दिन की ओर बढ़ने के लिए धावा बोल दिया गया है। यह परमेश्वर की योजना है, और निकट भविष्य में ये साकार हो जाएगा। हालाँकि, परमेश्वर ने जो कुछ भी कहा है, वह सब पहले ही पूरा कर दिया है। इस प्रकार, यह स्पष्ट है कि धरती के देश केवल रेत के किले हैं जो ज्वार आने पर काँप जाते हैं : अंत का दिन सन्निकट है और बड़ा लाल अजगर परमेश्वर के वचन के नीचे गिर जाएगा। यह सुनिश्चित करने के लिए कि परमेश्वर की योजना का सफलतापूर्वक क्रियान्वन होता है, परमेश्वर को संतुष्ट करने का भरपूर प्रयास करते हुए, स्वर्गदूत पृथ्वी पर उतर आए हैं। स्वयं देहधारी परमेश्वर दुश्मन से लड़ाई करने के लिए युद्ध के मैदान में तैनात हुआ है। जहाँ कहीं भी देहधारण प्रकट होता है, उस जगह से दुश्मन पूर्णतया विनष्ट किया जाता है। सबसे पहले चीन का सर्वनाश होगा; यह परमेश्वर के हाथों बर्बाद कर दिया जाएगा। परमेश्वर वहाँ कोई भी दया बिलकुल नहीं दिखाएगा। बड़े लाल अजगर के उत्तरोत्तर ढहने का सबूत लोगों की निरंतर परिपक्वता में देखा जा सकता है; इसे कोई भी स्पष्ट रूप से देख सकता है। लोगों की परिपक्वता दुश्मन की मृत्यु का संकेत है। यह "प्रतिस्पर्धा करने" के अर्थ का थोड़ा स्पष्टीकरण है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों के रहस्य की व्याख्या' के 'अध्याय 10' से उद्धृत

304. मैं राज्य में शासन करता हूँ, और इतना ही नहीं, मैं पूरे ब्रह्मांड में शासन करता हूँ; मैं राज्य का राजा और ब्रह्मांड का मुखिया दोनों हूँ। अब से मैं उन सभी को इकट्ठा करूँगा, जो चुने हुए नहीं हैं और अन्यजातियों के बीच अपना कार्य आरंभ करूँगा, और मैं पूरे ब्रह्मांड के लिए अपनी प्रशासनिक आज्ञाओं की घोषणा करूँगा, ताकि मैं सफलतापूर्वक अपने कार्य के अगले चरण की शुरुआत कर सकूँ। अन्यजातियों के बीच अपने कार्य को फैलाने के लिए मैं ताड़ना का उपयोग करूँगा, जिसका अर्थ है कि मैं उन सभी के विरूद्ध बल का उपयोग करूँगा, जो अन्यजातियाँ हैं। स्वाभाविक रूप से, यह कार्य उसी समय किया जाएगा, जिस समय मेरा कार्य चुने हुओं के बीच किया जाएगा। जब मेरे लोग पृथ्वी पर शासन करेंगे और सामर्थ्य का उपयोग करेंगे, तो यही वह दिन भी होगा जब पृथ्वी के सभी लोगों को जीत लिया जाएगा, और, इससे भी बढ़कर, यही वह समय होगा जब मैं विश्राम करूँगा—और केवल तभी मैं उन सबके सामने प्रकट होऊँगा, जिन्हें जीता जा चुका है। मैं पवित्र राज्य के लिए प्रकट होता हूँ, और अपने आपको मलिनता की भूमि से छिपा लेता हूँ। वे सभी, जिन्हें जीता जा चुका है और जो मेरे सामने आज्ञाकारी बन गए हैं, अपनी आँखों से मेरे चेहरे को देखने और अपने कानों से मेरी आवाज़ सुनने में समर्थ हैं। यह उन लोगों के लिए आशीष है, जो अंत के दिनों में पैदा हुए हैं, यह मेरे द्वारा पहले से ही नियत किया गया आशीष है, और यह किसी भी मनुष्य के द्वारा अपरिवर्तनीय है। आज मैं भविष्य के कार्य के वास्ते इस तरीके से कार्य करता हूँ। मेरा समस्त कार्य परस्पर-संबंधित है, इस सबमें एक आह्वान और अनुक्रिया है : कभी भी कोई चरण अचानक नहीं रुका है, और कभी भी किसी भी कदम को किसी भी अन्य कदम से स्वतंत्र रूप से नहीं किया गया है। क्या यह ऐसा नहीं है? क्या अतीत का कार्य आज के कार्य की नींव नहीं है? क्या अतीत के वचन आज के वचनों के अग्रदूत नहीं हैं? क्या अतीत के चरण आज के चरणों के उद्गम नहीं हैं? जब मैं औपचारिक रूप से पुस्तक खोलता हूँ, तो ऐसा तब होता है जब संपूर्ण ब्रह्मांड में लोगों को ताड़ना दी जाती है, जब दुनिया भर के लोगों को परीक्षणों के अधीन किया जाता है, और यह मेरे काम की पराकाष्ठा है; सभी लोग एक प्रकाशरहित भूमि में रहते हैं, और सभी लोग अपने वातावरण द्वारा खड़े किए गए ख़तरे के बीच रहते हैं। दूसरे शब्दों में, यही वह जीवन है, जिसे मनुष्य ने सृष्टि की उत्पत्ति के समय से आज के दिन तक कभी अनुभव नहीं किया है, और युगों-युगों से किसी ने भी इस प्रकार के जीवन का "आनंद" नहीं लिया है, और इसलिए मैं कहता हूँ कि मैंने वह कार्य किया है, जो पहले कभी नहीं किया गया है। यह मामलों की वास्तविक स्थिति है, और यही आंतरिक अर्थ है। चूँकि मेरा दिन समस्त मानवजाति के नज़दीक आ रहा है, चूँकि यह दूर प्रतीत नहीं होता, परंतु यह मनुष्य की आँखों के बिल्कुल सामने ही है, तो परिणामस्वरूप कौन भयभीत नहीं हो सकता? और कौन इसमें आनंदित नहीं हो सकता? बेबिलोन का गंदा शहर अंततः अपने अंत पर आ गया है; मनुष्य फिर से एक बिलकुल नए संसार से मिला है, और स्वर्ग और पृथ्वी परिवर्तित और नवीकृत कर दिए गए हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन' के 'अध्याय 29' से उद्धृत

305. जब पृथ्वी पर सीनियों का देश साकार होगा—जब राज्य साकार होगा—तो पृथ्वी पर और युद्ध नहीं होंगे; फिर कभी सूखा, महामारी और भूकंप नहीं आएँगे, लोग हथियारों का उत्पादन बंद कर देंगे; सभी शांति और स्थिरता में रहेंगे; लोगों के बीच सामान्य व्यवहार होंगे और देशों के बीच भी सामान्य व्यवहार होंगे। फिर भी वर्तमान की इससे कोई तुलना नहीं है। स्वर्ग के नीचे सब कुछ अराजक है और हर देश में धीरे-धीरे तख़्तापलट की शुरुआत हो रही है। परमेश्वर के कथनों की वजह से, लोग धीरे-धीरे बदल रहे हैं और आंतरिक रूप से, हर देश धीरे-धीरे टूट रहा है। रेत के महल की तरह बेबीलोन की स्थिर नींव हिलनी शुरू हो गयी है, और जैसे ही परमेश्वर की इच्छा में बदलाव होता है, दुनिया में अनजाने में भारी बदलाव होने लगते हैं, और किसी भी समय हर तरह के चिह्न प्रकट होने लगते हैं, जो दिखाता है कि दुनिया के अंत का दिन आ गया है! यह परमेश्वर की योजना है; वह इन्हीं कदमों के ज़रिए कार्य करता है, और निश्चित रूप से हर देश टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर जाएगा, पुराने सदोम का दूसरी बार सर्वनाश होगा, और इस प्रकार परमेश्वर कहता है, "संसार का पतन हो रहा है! बेबीलोन गतिहीनता की स्थिति में है!" स्वयं परमेश्वर के अलावा और कोई इसे पूरी तरह से समझ नहीं सकता; आख़िरकार, लोगों की जागरूकता की एक सीमा है। उदाहरण के लिए, आंतरिक मामलों के मंत्रियों को पता हो सकता है कि वर्तमान परिस्थितियाँ अस्थिर और अराजक हैं, लेकिन वे उनका समाधान करने में असमर्थ हैं। वे केवल धारा के संग बह सकते हैं, अपने हृदय में उस दिन की आस लगाए हुए, जब वे अपने मस्तक उन्नत रख सकेंगे, जब सूर्य एक बार फिर से पूर्व में उगेगा, देश भर में चमकेगा और इस दुःखद स्थिति को पलट देगा। लेकिन उन्हें पता नहीं कि जब सूर्य दूसरी बार उगता है, तो उसका उदय पुरानी व्यवस्था को बहाल करने के उद्देश्य से नहीं होता, यह एक पुनरुत्थान होता है, एक संपूर्ण परिवर्तन। पूरे ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर की योजना ऐसी ही है। वह एक नई दुनिया को अस्तित्व में लाएगा लेकिन सबसे पहले वह इंसान का नवीनीकरण करेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों के रहस्य की व्याख्या' के 'अध्याय 22 और अध्याय 23' से उद्धृत

306. यह कहा जा सकता है कि आज के सभी कथन भावी मामलों की भविष्यवाणी करते हैं; ये कथन बताते हैं कि परमेश्वर अपने कार्य के अगले चरण के लिए किस प्रकार व्यवस्थाएँ कर रहा है। परमेश्वर ने कलीसिया के लोगों में अपना काम लगभग पूरा कर लिया है, और बाद में वह सभी लोगों के सामने क्रोध के साथ प्रकट होगा। जैसा कि परमेश्वर कहता है, "मैं धरती के लोगों से अपने कार्यों को स्वीकार करवाऊंगा और 'न्यायपीठ' के सामने मेरे कर्म साबित होंगे, ताकि उन्हें पृथ्वी के लोगों के बीच स्वीकार किया जाए, जो सभी मानेंगे।" क्या तुम लोगों ने इन वचनों में कुछ देखा? इनमें परमेश्वर के कार्य के अगले हिस्से का सारांश है। पहले, परमेश्वर उन सभी संरक्षक कुत्तों को, जो राजनीतिक शक्ति को संचालित करते हैं, गंभीरता से विश्वास कराएगा और उन्हें बाध्य करेगा कि वे इतिहास के मंच से स्वयं पीछे हट जाएँ, और फिर कभी प्रतिष्ठा के लिए लड़ाई न करें, और फिर कभी कुचक्रों और षड्यंत्रों में संलग्न न हों। यह कार्य परमेश्वर द्वारा पृथ्वी पर विभिन्न आपदाएँ ढाकर किया जाना चाहिए। परंतु यह ऐसा मामला बिलकुल नहीं है कि परमेश्वर प्रकट होगा। क्योंकि, इस समय, बड़े लाल अजगर का राष्ट्र अभी भी मलिनता की भूमि होगा, और इसलिए परमेश्वर प्रकट नहीं होगा, परंतु केवल ताड़ना के रूप में उभरेगा। ऐसा है परमेश्वर का धर्मी स्वभाव, जिससे कोई बच नहीं सकता। इस दौरान, बड़े लाल अजगर के राष्ट्र में बसे सभी व्यक्ति विपत्तियों का सामना करेंगे, जिसमें स्वाभाविक रूप से पृथ्वी पर राज्य (कलीसिया) भी शामिल है। यह वही समय है, जब तथ्य सामने आएँगे, और इसलिए इसका अनुभव सभी लोगों द्वारा किया जाएगा, और कोई बच नहीं पाएगा। यह परमेश्वर द्वारा पूर्वनिर्धारित किया गया है। यह ठीक कार्य के इस चरण के कारण है, जिसके बारे में परमेश्वर कहता है, "यही समय है महान योजनाओं को पूरा करने का।" क्योंकि भविष्य में पृथ्वी पर कोई कलीसिया नहीं होगा, और तबाही के आगमन के कारण लोग केवल उसी के बारे में सोच पाएँगे, जो उनके सामने होगा, और बाकी हर चीज़ को वे नज़रअंदाज़ कर देंगे, और तबाही के बीच परमेश्वर का आनंद लेना उनके लिए मुश्किल होगा। इसलिए, लोगों से कहा जाता है कि इस अद्भुत समय के दौरान अपने पूरे दिल से परमेश्वर से प्रेम करें, ताकि वे इस अवसर को गँवा न बैठें। जब यह तथ्य गुज़र जाएगा, तो परमेश्वर ने बड़े लाल अजगर को पूरी तरह हरा दिया होगा, और इस प्रकार परमेश्वर के लोगों की गवाही का कार्य समाप्त हो गया होगा; इसके बाद परमेश्वर कार्य के अगले चरण की शुरुआत करेगा, वह बड़े लाल अजगर के देश को तबाह कर देगा, और अंततः ब्रह्मांड के सभी लोगों को सलीब पर उलटा लटका देगा, जिसके बाद वह पूरी मानवजाति को नष्ट कर देगा—ये परमेश्वर के कार्य के भावी चरण हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों के रहस्य की व्याख्या' के 'अध्याय 42' से उद्धृत

307. सभी लोगों को पृथ्वी पर मेरे कार्य के उद्देश्यों को समझने की आवश्यकता है, अर्थात् मैं अंतत: क्या प्राप्त करना कहता हूँ, और इस कार्य को पूरा करने से पहले मुझे इसमें कौन-सा स्तर प्राप्त कर लेना चाहिए। यदि आज तक मेरे साथ चलते रहने के बाद भी लोग यह नहीं समझते कि मेरा कार्य क्या है, तो क्या वे मेरे साथ व्यर्थ में नहीं चले? यदि लोग मेरा अनुसरण करते हैं, तो उन्हें मेरी इच्छा जाननी चाहिए। मैं पृथ्वी पर हज़ारों सालों से कार्य कर रहा हूँ और आज भी मैं अपना कार्य इसी तरह से जारी रखे हुए हूँ। यद्यपि मेरे कार्य में कई परियोजनाएँ शामिल हैं, किंतु इसका उद्देश्य अपरिवर्तित है; यद्यपि, उदाहरण के लिए, मैं मनुष्य के प्रति न्याय और ताड़ना से भरा हुआ हूँ, फिर भी मैं जो करता हूँ, वह उसे बचाने के वास्ते, और अपने सुसमाचार को बेहतर ढंग से फैलाने और मुनष्य को पूर्ण बना दिए जाने पर अन्यजाति देशों के बीच अपने कार्य को आगे बढ़ाने के वास्ते है। इसलिए आज, एक ऐसे वक्त, जब कई लोग लंबे समय से निराशा में गहरे डूब चुके हैं, मैं अभी भी अपना कार्य जारी रखे हुए हूँ, मैं वह कार्य जारी रखे हुए हूँ जो मनुष्य को न्याय और ताड़ना देने के लिए मुझे करना चाहिए। इस तथ्य के बावजूद कि जो कुछ मैं कहता हूँ, मनुष्य उससे उकता गया है और मेरे कार्य से जुड़ने की उसकी कोई इच्छा नहीं है, मैं फिर भी अपना कर्तव्य कर रहा हूँ, क्योंकि मेरे कार्य का उद्देश्य अपरिवर्तित है और मेरी मूल योजना भंग नहीं होगी। मेरे न्याय का कार्य मनुष्य को मेरी आज्ञाओं का बेहतर ढंग से पालन करने में सक्षम बनाना है, और मेरी ताड़ना का कार्य मनुष्य को अधिक प्रभावी ढंग से बदलने देना है। यद्यपि मैं जो करता हूँ, वह मेरे प्रबंधन के वास्ते है, फिर भी मैंने कभी ऐसा कुछ नहीं किया है, जो मनुष्य के लाभ के लिए न हो, क्योंकि मैं इस्राएल से बाहर के सभी देशों को इस्राएलियों के समान ही आज्ञाकारी बनाना चाहता हूँ, उन्हें वास्तविक मनुष्य बनाना चाहता हूँ, ताकि इस्राएल के बाहर के देशों में मेरे लिए पैर रखने की जगह हो सके। यही मेरा प्रबंधन है; यही वह कार्य है जिसे मैं अन्यजाति देशों के बीच पूरा कर रहा हूँ। अभी भी, बहुत-से लोग मेरे प्रबंधन को नहीं समझते, क्योंकि उन्हें ऐसी चीज़ों में कोई रुचि नहीं है, और वे केवल अपने स्वयं के भविष्य और मंज़िल की परवाह करते हैं। मैं चाहे कुछ भी कहता रहूँ, लोग उस कार्य के प्रति उदासीन हैं जो मैं करता हूँ, इसके बजाय वे अनन्य रूप से अपनी कल की मंज़िलों पर ध्यान केंद्रित करते हैं। अगर चीज़ें इसी तरह से चलती रहीं, तो मेरा कार्य कैसे फैल सकता है? मेरा सुसमाचार पूरे संसार में कैसे फैल सकता है? जान लो, कि जब मेरा कार्य फैलेगा, तो मैं तुम्हें तितर-बितर कर दूँगा और उसी तरह मारूँगा, जैसे यहोवा ने इस्राएल के प्रत्येक कबीले को मारा था। यह सब इसलिए किया जाएगा, ताकि मेरा सुसमाचार समस्त पृथ्वी पर फैल सके और अन्यजाति देशों तक पहुँच सके, ताकि मेरा नाम वयस्कों और बच्चों द्वारा समान रूप से बढ़ाया जा सके, और मेरा पवित्र नाम सभी कबीलों और देशों के लोगों के मुँह से गूँजता रहे। ऐसा इसलिए है, ताकि इस अंतिम युग में, मेरा नाम अन्यजाति देशों के बीच गौरवान्वित हो सके, मेरे कर्म अन्यजातियों द्वारा देखे जा सकें और वे मुझे मेरे कर्मों के आधार पर सर्वशक्तिमान कह सकें, और मेरे वचन शीघ्र ही साकार हो सकें। मैं सभी लोगों को ज्ञात करवाऊँगा कि मैं केवल इस्राएलियों का ही परमेश्वर नहीं हूँ, बल्कि अन्यजातियों के समस्त देशों का भी परमेश्वर हूँ, यहाँ तक कि उनका भी परमेश्वर हूँ जिन्हें मैंने शाप दिया है। मैं सभी लोगों को यह देखने दूँगा कि मैं समस्त सृष्टि का परमेश्वर हूँ। यह मेरा सबसे बड़ा कार्य है, अंत के दिनों के लिए मेरी कार्य-योजना का उद्देश्य है, और अंत के दिनों में पूरा किया जाने वाला एकमात्र कार्य है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सुसमाचार को फैलाने का कार्य मनुष्य को बचाने का कार्य भी है' से उद्धृत

308. क्या तुम लोगों ने देखा है कि इस समूह के लोगों में परमेश्वर कौन-सा कार्य पूरा करेगा? परमेश्वर ने एक बार कहा था कि सहस्राब्दि राज्य में भी लोगों को उसके कथनों का पालन करना चाहिए, और भविष्य में परमेश्वर के कथन मनुष्य के जीवन का कनान के उत्तम देश में सीधे तौर पर मार्गदर्शन करेंगे। जब मूसा निर्जन प्रदेश में था, तो परमेश्वर ने सीधे तौर पर उसे निर्देश दिया और उससे बात की। स्वर्ग से परमेश्वर ने लोगों के आनंद के लिए भोजन, पानी और मन्ना भेजा था, और आज भी ऐसा ही है : परमेश्वर ने लोगों के आनंद के लिए व्यक्तिगत रूप से खाने और पीने की चीजें भिजवाई हैं, और उसने लोगों को ताड़ना देने के लिए व्यक्तिगत तौर पर शाप भेजे हैं। और इसलिए, अपने कार्य का प्रत्येक कदम व्यक्तिगत तौर पर परमेश्वर द्वारा ही उठाया जाता है। आज लोग तथ्यों के घटित होने की लालसा करते हैं, वे चिह्न और चमत्कार देखने की कोशिश करते हैं, और यह संभव है कि ऐसे सभी लोग अलग कर दिए जाएँगे, क्योंकि परमेश्वर का कार्य तेजी से व्यावहारिक होता जा रहा है। कोई नहीं जानता कि परमेश्वर स्वर्ग से अवरोहण कर चुका है, वे इस बात से भी अनभिज्ञ हैं कि परमेश्वर ने स्वर्ग से भोजन और शक्तिवर्धक पेय भेजे हैं—किंतु परमेश्वर वास्तव में विद्यमान है, और सहस्राब्दि राज्य के रोमांचक दृश्य, जिनकी लोग कल्पना करते हैं, भी परमेश्वर के व्यक्तिगत कथन हैं। यह तथ्य है, और केवल इसे ही पृथ्वी पर परमेश्वर के साथ राज करना कहा जाता है। पृथ्वी पर परमेश्वर के साथ राज करना देह को संदर्भित करता है। जो देह का नहीं है, वह पृथ्वी पर विद्यमान नहीं है, और इसलिए वे सभी, जो तीसरे स्वर्ग में जाने पर ध्यान केंद्रित करते हैं, वे ऐसा व्यर्थ में करते है। एक दिन, जब संपूर्ण विश्व परमेश्वर के पास वापस लौट जाएगा, तो संपूर्ण ब्रह्मांड में उसके कार्य का केंद्र उसके कथनों का अनुसरण करेगा; अन्यत्र कुछ लोग टेलीफोन का उपयोग करेंगे, कुछ लोग विमान लेंगे, कुछ लोग समुद्र के पार एक नाव लेंगे, और कुछ लोग परमेश्वर के कथनों को प्राप्त करने के लिए लेज़र का उपयोग करेंगे। हर कोई प्रेममय और लालायित होगा, वे सभी परमेश्वर के निकट आएँगे और परमेश्वर की ओर एकत्र हो जाएँगे, और सभी परमेश्वर की आराधना करेंगे—और यह सब परमेश्वर के कर्म होंगे। इसे स्मरण रखो! परमेश्वर निश्चित रूप से कभी अन्यत्र कहीं फिर से आरंभ नहीं करेगा। परमेश्वर इस तथ्य को पूर्ण करेगा : वह संपूर्ण ब्रह्मांड के लोगों को अपने सामने आने के लिए बाध्य करेगा, और पृथ्वी पर परमेश्वर की आराधना करवाएगा, और अन्य स्थानों पर उसका कार्य समाप्त हो जाएगा, और लोगों को सच्चा मार्ग तलाशने के लिए मजबूर किया जाएगा। यह यूसुफ की तरह होगा : हर कोई भोजन के लिए उसके पास आया, और उसके सामने झुका, क्योंकि उसके पास खाने की चीज़ें थीं। अकाल से बचने के लिए लोग सच्चा मार्ग तलाशने के लिए बाध्य होंगे। संपूर्ण धार्मिक समुदाय गंभीर अकाल से ग्रस्त होगा, और केवल आज का परमेश्वर ही मनुष्य के आनंद के लिए हमेशा बहने वाले स्रोत से युक्त, जीवन के जल का स्रोत है, और लोग आकर उस पर निर्भर हो जाएँगे। यह वह समय होगा, जब परमेश्वर के कर्म प्रकट होंगे, और जब परमेश्वर महिमा प्राप्त करेगा; ब्रह्मांड भर के सभी लोग इस साधारण "मनुष्य" की आराधना करेंगे। क्या वह परमेश्वर की महिमा का दिन नहीं होगा? एक दिन, पुराने पादरी जीवन के जल के स्रोत से पानी की माँग करते हुए टेलीग्राम भेजेंगे। वे बुज़ुर्ग होंगे, फिर भी वे इस व्यक्ति की आराधना करने आएँगे, जिसे उन्होंने तिरस्कृत किया था। वे अपने मुँह से उसे स्वीकार करेंगे और अपने हृदय से उस पर भरोसा करेंगे—क्या यही चिह्न और चमत्कार नहीं है? जिस दिन संपूर्ण राज्य आनंद करेगा, वही दिन परमेश्वर की महिमा का होगा, और जो कोई तुम लोगों के पास आएगा और परमेश्वर के शुभ समाचार को स्वीकार करेगा, वह परमेश्वर द्वारा धन्य किया जाएगा, और जो देश तथा लोग ऐसा करेंगे, वे परमेश्वर द्वारा धन्य किए जाएँगे और उनकी देखभाल की जाएगी। भविष्य की दिशा इस प्रकार होगी : जो लोग परमेश्वर के मुख से कथनों को प्राप्त करेंगे, उनके पास पृथ्वी पर चलने के लिए मार्ग होगा, और चाहे वे व्यवसायी हों या वैज्ञानिक, या शिक्षक हों या उद्योगपति, जो लोग परमेश्वर के वचनों से रहित हैं, उनके लिए एक कदम चलना भी दूभर होगा, और उन्हें सच्चे मार्ग पर चलने के लिए बाध्य किया जाएगा। "सत्य के साथ तू संपूर्ण संसार में चलेगा; सत्य के बिना तू कहीं नहीं पहुँचेगा" से यही आशय है। तथ्य इस प्रकार हैं : संपूर्ण ब्रह्मांड को आदेश देने और मानवजाति को शासित करने और जीतने के लिए परमेश्वर मार्ग का उपयोग करेगा (जिसका अर्थ है उसके समस्त वचन)। लोग हमेशा उन साधनों में एक बड़े बदलाव की आशा करते हैं, जिनके द्वारा परमेश्वर कार्य करता है। स्पष्ट तौर पर कहें तो, वचनों के माध्यम से ही परमेश्वर लोगों को नियंत्रित करता है, और तुम्हें वह जो कहता है, उसे पूरा करना चाहिए, चाहे तुम्हारी वैसा करने की इच्छा हो या न हो; यह एक वस्तुनिष्ठ सत्य है, जिसका सभी के द्वारा पालन किया जाना चाहिए, और इसलिए भी, कि यह कठोर है, और सभी को ज्ञात है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सहस्राब्दि राज्य आ चुका है' से उद्धृत

309. परमेश्वर के वचन असंख्य घरों में फैलेंगे, वे सबको ज्ञात हो जाएँगे और केवल तभी उसका कार्य संपूर्ण ब्रह्मांड में फैलेगा। कहने का अर्थ है कि परमेश्वर का कार्य संपूर्ण ब्रह्मांड में फैलने के लिए उसके वचनों का फैलना आवश्यक है। परमेश्वर की महिमा के दिन, परमेश्वर के वचन अपना सामर्थ्य और अधिकार प्रदर्शित करेंगे। अनादि काल से लेकर आज तक का उसका हर एक वचन पूरा और घटित होगा। इस प्रकार से, पृथ्वी पर परमेश्वर की महिमा होगी—कहने का अर्थ है, कि उसके वचन पृथ्वी पर शासन करेंगे। सभी दुष्ट लोगों को परमेश्वर के मुँह से बोले गए वचनों से ताड़ित किया जाएगा, और सभी धार्मिक लोग उसके मुँह से बोले गए वचनों से धन्य होंगे, और उसके मुँह से बोले गए वचनों द्वारा स्थापित और पूर्ण किए जाएँगे। वह कोई चिह्न या चमत्कार नहीं दिखाएगा; सब-कुछ उसके वचनों के द्वारा पूर्ण होगा, और उसके वचन तथ्यों को उत्पन्न करेंगे। पृथ्वी पर हर कोई परमेश्वर के वचनों का उत्सव मनाएगा, चाहे वे वयस्क हों या बच्चे, पुरुष, स्त्री, वृद्ध या युवा हों, सभी लोग परमेश्वर के वचनों के नीचे झुक जाएँगे। परमेश्वर के वचन देह में प्रकट होते हैं, और स्वयं को पृथ्वी पर मनुष्यों को ज्वलंत और सजीव रूप में देखने देते हैं। वचन के देहधारी होने का यही अर्थ है। परमेश्वर पृथ्वी पर मुख्य रूप से "वचन देहधारी हुआ" के तथ्य को पूर्ण करने आया है, जिसका अर्थ है कि वह इसलिए आया है, ताकि उसके वचन देह से निर्गत हों (पुराने नियम में मूसा के समय की तरह नहीं, जब परमेश्वर की वाणी सीधे स्वर्ग से निर्गत होती थी)। इसके बाद, उसके समस्त वचन सहस्राब्दि राज्य के युग के दौरान पूर्ण होंगे, वे मनुष्यों की आँखों के सामने दिखाई देने वाले तथ्य बन जाएँगे, और लोग उन्हें अपनी आँखों से बिना किसी विषमता के देखेंगे। यही परमेश्वर के देहधारण का सर्वोच्च अर्थ है। कहने का अर्थ है कि पवित्रात्मा का कार्य देह के माध्यम से, और वचनों के माध्यम से पूर्ण होता है। यही "वचन देहधारी हुआ" और "वचन का देह में प्रकट होना" का सही अर्थ है। केवल परमेश्वर ही पवित्रात्मा की इच्छा को कह सकता है, और देह में परमेश्वर ही पवित्रात्मा की ओर से बात कर सकता है; परमेश्वर के वचन देहधारी परमेश्वर में स्पष्ट किए जाते हैं और अन्य सभी उनके द्वारा मार्गदर्शित होते हैं। कोई भी इससे छूटा नहीं है, सभी इसके दायरे के भीतर मौजूद हैं। केवल इन कथनों से ही लोग जागरूक हो सकते हैं; जो लोग इस तरह से लाभ नहीं उठाते, वे दिवास्वप्न देखते हैं, यदि वे सोचते हैं कि वे कथनों को स्वर्ग से प्राप्त कर सकते हैं। देहधारी परमेश्वर की देह में इस तरह का अधिकार प्रदर्शित होता है, जिससे सभी लोग उस पर पूरी आस्था के साथ विश्वास करते हैं। यहाँ तक कि सर्वाधिक सम्मानित विशेषज्ञ और धार्मिक पादरी भी इन वचनों को नहीं बोल सकते। उन सबको इनके नीचे झुकना चाहिए, और अन्य कोई भी दूसरी शुरुआत करने में सक्षम नहीं होगा। परमेश्वर ब्रह्मांड को जीतने के लिए वचनों का उपयोग करेगा। वह ऐसा अपने देहधारी शरीर के द्वारा नहीं, बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड के सभी लोगों को जीतने के लिए देहधारी हुए परमेश्वर के मुँह से कथनों के उपयोग द्वारा करेगा; केवल यही है वचन का देह बनना, और केवल यही है वचन का देह में प्रकट होना। शायद लोगों को ऐसा प्रतीत होता है, मानो परमेश्वर ने अधिक कार्य नहीं किया है—किंतु परमेश्वर को बस अपने वचन कहने हैं, और लोग पूरी तरह से आश्वस्त और स्तब्ध हो जाएँगे। बिना तथ्यों के, लोग चीखते और चिल्लाते हैं; परमेश्वर के वचनों से वे शांत हो जाते हैं। परमेश्वर इस तथ्य को निश्चित रूप से पूरा करेगा, क्योंकि यह परमेश्वर की लंबे समय से स्थापित योजना है : पृथ्वी पर वचन के आगमन के तथ्य का पूर्ण होना। वास्तव में, मुझे समझाने की कोई आवश्यकता नहीं है—पृथ्वी पर सहस्राब्दि राज्य का आगमन ही पृथ्वी पर परमेश्वर के वचनों का आगमन है। स्वर्ग से नए यरूशलेम का अवरोहण मनुष्य के बीच रहने, मनुष्य के प्रत्येक कार्य और उसके समस्त अंतरतम विचारों में साथ देने के लिए परमेश्वर के वचन का आगमन है। यह भी एक तथ्य है, जिसे परमेश्वर पूरा करेगा; यह सहस्राब्दि राज्य का सौंदर्य है। यह परमेश्वर द्वारा निर्धारित योजना है : उसके वचन एक हज़ार वर्षों तक पृथ्वी पर प्रकट होंगे, और वे उसके सभी कर्मों को व्यक्त करेंगे, और पृथ्वी पर उसके समस्त कार्य को पूरा करेंगे, जिसके बाद मानवजाति के इस चरण का अंत हो जाएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सहस्राब्दि राज्य आ चुका है' से उद्धृत

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