7. परमेश्वर के स्वभाव और जो उसके पास है और जो वह स्वयं है पर वचन
255. स्वयं परमेश्वर के पास अपनी वस्तुएँ और अस्तित्व है। जो कुछ वह व्यक्त और प्रकट करता है, वह उसके अपने सार और उसकी अपनी पहचान को दर्शाता है। इन वस्तुओं और इस अस्तित्व के साथ ही यह सार और पहचान ऐसी चीजें हैं, जिनका स्थान कोई मनुष्य नहीं ले सकता है। उसके स्वभाव में मानवजाति के प्रति उसका प्रेम, मानवजाति के प्रति उसकी दिलासा, मानवजाति के प्रति उसकी नफरत और इससे भी बढ़कर, मानवजाति के बारे में उसकी संपूर्ण समझ शामिल है। जबकि मनुष्य का व्यक्तित्व उल्लासपूर्ण, जीवंत या निष्ठुर हो सकता है। परमेश्वर का स्वभाव वह है जो सभी चीजों और जीवित प्राणियों के संप्रभु के पास होता है; यह वह है जो सारी सृष्टि के प्रभु के पास होता है। उसका स्वभाव सम्माननीयता, सामर्थ्य, कुलीनता, महानता और सबसे बढ़कर, सर्वोच्चता को दर्शाता है। उसका स्वभाव अधिकार का प्रतीक है, उस सबका प्रतीक है जो न्यायोचित है, उस सबका प्रतीक है जो सुंदर और अच्छा है। इससे भी बढ़कर, उसका स्वभाव अंधकार या किसी शत्रु-बल से परास्त होने या आक्रमण होने के विरुद्ध सुरक्षा का प्रतीक है, साथ ही यह किसी सृजित प्राणी से अपमानित होने (और अपमान न सहने) के प्रति सुरक्षा का प्रतीक है। उसका स्वभाव सर्वोच्च सामर्थ्य का प्रतीक है। कोई एक या अधिक व्यक्ति उसके कार्य या उसके स्वभाव को बाधित नहीं कर सकते। किंतु मनुष्य का व्यक्तित्व पशुओं से थोड़ा बेहतर होने के प्रतीक से अधिक कुछ नहीं है। मनुष्य के पास या उसका अपना कोई अधिकार नहीं है, कोई स्वायत्तता नहीं है, अपना अतिक्रमण करने की योग्यता नहीं है, बल्कि अपने सार में वह ऐसा है जो हर प्रकार के व्यक्तियों, घटनाओं और वस्तुओं के नियंत्रण में दुबका रहता है। परमेश्वर का आनंद न्याय और प्रकाश की उपस्थिति और आविर्भाव के कारण है; अंधकार और बुराई के विनाश के कारण है। उसे मानवजाति के लिए प्रकाश और अच्छा जीवन लाने में आनंद आता है; उसका आनंद न्यायसंगत आनंद है, वह हर सकारात्मक चीज के अस्तित्व का प्रतीक है, और इससे भी बढ़कर, वह मंगल का प्रतीक है। परमेश्वर के क्रोध का कारण उसकी मानवजाति को अन्याय के अस्तित्व और विघ्न के कारण पहुँचने वाली हानि है; बुराई और अंधकार के अस्तित्व के कारण है, और ऐसी चीजों के अस्तित्व के कारण है जो सत्य को निकाल बाहर करती हैं, और इनसे भी बढ़कर, उन चीजों के अस्तित्व के कारण है जो अच्छे और सुंदर का विरोध करती हैं। उसका क्रोध इस बात का प्रतीक है कि सभी नकारात्मक चीजें अब अस्तित्व में नहीं हैं, और इससे भी बढ़कर, यह उसकी पवित्रता का प्रतीक है। उसका दुःख मानवजाति के कारण है, जिसके लिए उसकी आशाएँ हैं, किंतु जो अंधकार में गिर गई है, ऐसा इसलिए है कि जो कार्य वह मनुष्यों पर करता है, वह उसके इरादों पर खरा नहीं उतरता, जिस मानवजाति से वह प्रेम करता है, वह समस्त मानवजाति रोशनी में नहीं जी सकती। वह मासूम मानवजाति के लिए, ईमानदार किंतु अज्ञानी मनुष्य के लिए, उस मनुष्य के लिए जो अच्छा तो है लेकिन जिसमें अपने विचारों की कमी है, दुःख अनुभव करता है। उसका दुःख उसकी अच्छाई और करुणा का प्रतीक है, सुंदरता और दया का प्रतीक है। उसकी प्रसन्नता बेशक अपने शत्रुओं को हराने और मनुष्यों का सच्चा विश्वास प्राप्त करने से आती है। इससे भी बढ़कर, वह सभी शत्रु ताकतों के निष्कासन और विनाश से और मनुष्यों द्वारा अच्छा और शांतिपूर्ण जीवन प्राप्त करने से उत्पन्न होती है। परमेश्वर की प्रसन्नता मनुष्य के आनंद के समान नहीं है; उसके बजाय, वह अच्छे फल एकत्र करने का एहसास है, ऐसा एहसास जो आनंद से भी बढ़कर है। उसकी प्रसन्नता मानवजाति के दुखों से मुक्त होने की प्रतीक है, और वह मानवजाति के प्रकाश के संसार में प्रवेश करने की प्रतीक है। दूसरी ओर, मनुष्यों की समस्त भावनाएँ उनके अपने हितों की खातिर उपजती हैं, न कि न्याय, प्रकाश, या उसके लिए जो कि सुंदर है, और स्वर्ग द्वारा प्रदत्त अनुग्रह के लिए तो बिल्कुल भी नहीं। मानवजाति की भावनाएँ स्वार्थी हैं और अंधकार के संसार से वास्ता रखती हैं। वे परमेश्वर की इच्छा के कारण नहीं पैदा होतीं, परमेश्वर की योजना के लिए तो बिल्कुल नहीं होतीं, और इसलिए मनुष्य और परमेश्वर की तुलना नहीं की जा सकती। परमेश्वर हमेशा सर्वोच्च और हमेशा आदरणीय है, जबकि मनुष्य हमेशा नीच और हमेशा निकम्मा है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि परमेश्वर हमेशा खुद को मनुष्यों के लिए समर्पित करता है और खपाता है, जबकि मनुष्य हमेशा सिर्फ अपने लिए माँगता और प्रयास करता है। परमेश्वर सदा से मानवजाति के अस्तित्व के लिए कष्ट उठा रहा है, लेकिन मनुष्य कभी भी न्याय या प्रकाश की खातिर कोई योगदान नहीं करता, और अगर मनुष्य कोई क्षणिक प्रयास करता भी है, तो भी वह हलके-से झटके का भी सामना नहीं कर सकता, क्योंकि मनुष्य का प्रयास केवल अपने लिए होता है, दूसरों के लिए नहीं; मनुष्य हमेशा स्वार्थी होता है, जबकि परमेश्वर हमेशा निस्स्वार्थ होता है। परमेश्वर उस सबका स्रोत है जो न्यायोचित, अच्छा और सुंदर है, जबकि मनुष्य वह है जो सारी कुरूपता और बुराई विरासत में पाता और अभिव्यक्त करता है। परमेश्वर अपने न्याय और सुंदरता का सार कभी नहीं बदलेगा, जबकि मनुष्य किसी भी समय और किसी भी स्थिति में न्याय से विश्वासघात कर सकता है और खुद को परमेश्वर से दूर कर सकता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के स्वभाव को समझना बहुत महत्वपूर्ण है
256. मैं धार्मिक हूँ, मैं विश्वासयोग्य हूँ, और मैं वो परमेश्वर हूँ जो मनुष्यों के अंतरतम हृदय की पड़ताल करता है! मैं एक क्षण में इसे प्रकट कर दूँगा कि कौन सच्चा और कौन झूठा है। घबराओ मत; सभी चीजें मेरे समय के अनुसार काम करती हैं। कौन मुझे ईमानदारी से चाहता है और कौन नहीं—मैं एक-एक करके तुम सब को बता दूँगा। तुम लोग वचनों को खाने-पीने का ध्यान रखो और जब तुम मेरी उपस्थिति में आओ तो मेरे करीब आ जाओ, और मैं अपना काम स्वयं करूँगा। तात्कालिक परिणामों के लिए बहुत चिंतित न हो जाओ; मेरा काम ऐसा नहीं है जो सारा एक साथ पूरा किया जा सके। इसके भीतर मेरे चरण और मेरी बुद्धि निहित है, इसलिए ही मेरी बुद्धि प्रकट की जा सकती है। मैं तुम सभी को देखने दूँगा कि मेरे हाथों द्वारा क्या किया जाता है—बुराई को दण्डित और भलाई को पुरस्कृत किया जाता है। मैं निश्चय ही किसी से पक्षपात नहीं करता। तुम जो मुझे पूरी निष्ठा से प्रेम करते हो, मैं भी तुम्हें निष्ठा से प्रेम करूँगा, और जहाँ तक उनकी बात है जो मुझे निष्ठा से प्रेम नहीं करते, उन पर मेरा क्रोध हमेशा रहेगा, ताकि वे अनंतकाल तक याद रख सकें कि मैं सच्चा परमेश्वर हूँ, ऐसा परमेश्वर जो मनुष्यों के अंतरतम हृदय की पड़ताल करता है। लोगों के सामने एक तरह से और उनकी पीठ पीछे दूसरी तरह से काम न करो; तुम जो कुछ भी करते हो, उसे मैं स्पष्ट रूप से देखता हूँ, तुम दूसरों को भले ही मूर्ख बना लो, लेकिन तुम मुझे मूर्ख नहीं बना सकते। मैं यह सब स्पष्ट रूप से देखता हूँ। तुम्हारे लिए कुछ भी छिपाना संभव नहीं है; सबकुछ मेरे हाथों में है। अपनी क्षुद्र और छोटी-छोटी गणनाओं को अपने फायदे के लिए कर पाने के कारण खुद को बहुत चालाक मत समझो। मैं तुमसे कहता हूँ : इंसान चाहे जितनी योजनाएँ बना ले, हजारों या लाखों, लेकिन अंत में मेरी पहुँच से बच नहीं सकता। सभी चीज़ें और घटनाएं मेरे हाथों से ही नियंत्रित होती हैं, एक इंसान की तो बिसात ही क्या! मुझसे बचने या छिपने की कोशिश मत करो, फुसलाने या छिपाने की कोशिश मत करो। क्या ऐसा हो सकता है कि तुम अभी भी नहीं देख सकते कि मेरा महिमामय मुख, मेरा क्रोध और मेरा न्याय सार्वजनिक रूप से प्रकट किये गए हैं? मैं तत्काल और निर्ममता से उन सभी का न्याय करूँगा जो मुझे निष्ठापूर्वक नहीं चाहते। मेरी दया समाप्त हो गई है; अब और शेष नहीं रही। अब और पाखंडी मत बनो, और अपने असभ्य एवं लापरवाह चाल-चलन को रोक लो।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आरंभ में मसीह के कथन, अध्याय 44
257. मैं ही आदि हूँ, और मैं ही अंत हूँ। मैं ही पुनर्जीवित और संपूर्ण एकमात्र सच्चा परमेश्वर हूँ। मैं तुम लोगों के सामने अपने वचन बोलता हूँ और जो मैं कहता हूँ, तुम लोगों को उस पर दृढ़ता से विश्वास करना चाहिए। स्वर्ग और पृथ्वी टल सकते हैं, लेकिन मैं जो कहता हूँ, उसका एक अक्षर या एक रेखा भी कभी नहीं टलेगी। यह याद रखना! इसे याद रखना! मेरे बोल चुकने के बाद एक वचन भी कभी वापस नहीं लिया गया है, और प्रत्येक वचन पूरा होगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आरंभ में मसीह के कथन, अध्याय 53
258. ब्रह्मांड और सभी चीज़ें मेरे हाथों में हैं। मैं जो भी कहूँगा वही होगा। मेरा आदेश पूरा होगा। शैतान मेरे पैरों के तले है; वह एक अथाह कुंड में है! मेरे एक आदेश के जारी होने पर तो आकाश और पृथ्वी गायब हो जाएंगे और उनका कोई अस्तित्व नहीं रहेगा! सभी चीज़ें नवीनीकृत हो जाएंगी; यह एक अटल सत्य है, जो पूरी तरह सही है। मैंने दुनिया को जीत लिया है, सभी बुरों पर विजय प्राप्त की है। मैं यहाँ बैठा तुम लोगों से बात कर रहा हूँ; जिनके पास कान हैं, उन्हें सुनना चाहिए और जो जीवित हैं, उन्हें स्वीकार करना चाहिए।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आरंभ में मसीह के कथन, अध्याय 15
259. मैं जो कहता हूँ उसका मतलब वही होता है और जो कहता है वही होगा और कोई इसे बदल नहीं सकता—यह परम सिद्धांत है। चाहे वे मेरे द्वारा अतीत में कहे गए वचन हों या भविष्य में कहे जाने वाले, वे सभी एक-एक करके सच होते जाएँगे और मैं समस्त मानवजाति को उन्हें सच होते हुए देखने की अनुमति दूँगा। यह मेरे वचनों और कार्य के पीछे का सिद्धांत है। ... ब्रह्मांड में घटित होने वाली समस्त चीजों में से ऐसी कोई चीज नहीं है, जिसमें मेरी बात आखिरी न हो। क्या कोई ऐसी चीज है, जो मेरे हाथ में न हो? जो कुछ मैं कहता हूँ, वह किया जाता है, और मनुष्यों के बीच ऐसा कौन है, जो मेरा संकल्प बदल सकता है? क्या यह मेरे द्वारा पृथ्वी पर बनाई गई वाचा हो सकती है? कोई भी चीज मेरी योजना के आगे बढ़ने में बाधा नहीं डाल सकती। हर समय, मैं अपना कार्य कर रहा हूँ, और हर समय मैं अपने प्रबंधन की योजना बना रहा हूँ। मनुष्यों में से कौन इसमें हस्तक्षेप कर सकता है? क्या मैं ही वह नहीं हूँ जिसने व्यक्तिगत रूप से सब कुछ की योजना बनाई है? आज इस क्षेत्र में प्रवेश करना अभी भी मेरी योजना या मेरे पूर्वानुमान से बाहर नहीं है; यह मेरे द्वारा बहुत पहले ही पूर्व-निर्धारित कर दिया गया था। तुम लोगों में से कौन इस चरण की थाह ले सकता है? मेरे लोग निश्चित ही मेरी आवाज सुनेंगे, और हर वह आदमी, जो ईमानदारी से मुझसे प्रेम करता है, निश्चित ही मेरे सिंहासन के सामने लौट आएगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन, अध्याय 1
260. मैं उन सभी से प्यार करता हूँ, जो ईमानदारी से मेरे लिए स्वयं को खपाते हैं और खुद को मेरे प्रति समर्पित करते हैं। मैं उन सभी से घृणा करता हूँ, जो मुझसे जन्मे हैं, फिर भी, मुझे नहीं जानते, यहाँ तक कि मेरा प्रतिरोध भी करते हैं। मैं ऐसे किसी भी व्यक्ति का परित्याग नहीं करूँगा, जो ईमानदारी से मेरे प्रति समर्पित है; बल्कि मैं उसके आशीष दोगुने कर दूँगा। जो लोग जिस थाली में खाते हैं उसी में छेद करते हैं, उन्हें मैं दोगुनी सजा दूँगा और आसानी से नहीं छोड़ूँगा। मेरे राज्य में कोई कुटिलता या छल नहीं है, और कोई सांसारिकता नहीं है; अर्थात् वहाँ मृतकों की कोई गंध नहीं है। बल्कि सब-कुछ सत्यपरायणता और धार्मिकता है; सब-कुछ शुद्धता और खुलापन है, और कुछ भी छिपाया या गुप्त नहीं रखा गया है। सब-कुछ ताजा है, सब-कुछ आनंद है, और सब-कुछ आत्मिक उन्नति है। जिस किसी से अभी भी मृतकों की दुर्गंध आती है, वह किसी भी तरीके से मेरे राज्य में नहीं रह सकता, बल्कि उसे मेरी लोहे की छड़ द्वारा शासित किया जाएगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आरंभ में मसीह के कथन, अध्याय 70
261. मैं एक सर्वभक्षी अग्नि हूँ और मैं अपमान बरदाश्त नहीं करता। क्योंकि सभी मानव मेरे द्वारा बनाए गए थे, इसलिए मैं जो कुछ कहता और करता हूँ, उसके प्रति उन्हें समर्पण करना चाहिए और वे विरोध नहीं कर सकते। लोगों को मेरे कार्य में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है, और वे इस बात का विश्लेषण करने के योग्य तो बिल्कुल नहीं हैं कि मेरे कार्य और मेरे वचनों में क्या सही या ग़लत है। मैं सृष्टिकर्ता हूँ, और सृजित प्राणियों को मेरा भय मानने वाले हृदय के साथ वह सब-कुछ हासिल करना चाहिए, जिसकी मुझे अपेक्षा है; उन्हें मेरे साथ बहस नहीं करनी चाहिए, और विशेष रूप से उन्हें मेरा विरोध नहीं करना चाहिए। मैं अपने अधिकार के साथ अपने लोगों पर शासन करता हूँ, और वे सभी लोग जो मेरी सृष्टि का हिस्सा हैं, उन्हें मेरे अधिकार के प्रति समर्पण करना चाहिए। यद्यपि आज तुम लोग मेरे सामने दबंग और धृष्ट हो, यद्यपि तुम उन वचनों के खिलाफ विद्रोह करते हो जिनसे तुम लोगों को शिक्षा देता हूँ और डरना नहीं जानते हो, फिर भी मैं तुम लोगों की विद्रोहशीलता का केवल सहिष्णुता से सामना करता हूँ; मैं अपना आपा नहीं खोऊँगा और अपने कार्य को इसलिए प्रभावित नहीं करूँगा, क्योंकि छोटे, तुच्छ भुनगों ने गोबर के ढेर में हलचल मचा दी है। मैं अपने पिता की इच्छा के लिए उन सभी चीजों का अविरत अस्तित्व सहता हूँ जिनसे मैं घृणा करता हूँ और उन सभी चीजों को भी जिनसे मैं घिन्न करता हूँ, और मैं अपने कथन पूरे होने तक, अपने अंतिम क्षण तक ऐसा करूँगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जब झड़ते हुए पत्ते अपनी जड़ों की ओर लौटेंगे, तो तुम्हें अपनी की हुई सभी बुराइयों पर पछतावा होगा
262. चूँकि तुम पहले ही मेरी सेवा करने का संकल्प ले चुके हो, इसलिए मैं तुम्हें जाने नहीं दूँगा। मैं ऐसा परमेश्वर हूँ जो बुराई से घृणा करता है, और मैं वह परमेश्वर हूँ, जो मनुष्य के प्रति ईर्ष्या रखता है। चूँकि तुमने पहले ही अपने शब्दों को वेदी पर रख दिया है, इसलिए मैं यह बरदाश्त नहीं करूँगा कि तुम मेरी ही आँखों के सामने से भाग जाओ, न ही मैं यह बरदाश्त करूँगा कि तुम दो स्वामियों की सेवा करो। क्या तुम्हें लगता है कि मेरी वेदी पर और मेरी आँखों के सामने अपने शब्दों को रखने के बाद तुम किसी दूसरे से प्रेम कर सकते हो? मैं लोगों को इस तरह से मुझे मूर्ख कैसे बनाने दे सकता हूँ? क्या तुम्हें लगता था कि तुम अपनी जीभ से यूँ ही मेरे लिए प्रतिज्ञा और शपथ ले सकते हो? तुम मेरे सिंहासन की शपथ कैसे ले सकते हो, मेरा सिंहासन, मैं जो सबसे ऊँचा हूँ? क्या तुम्हें लगा कि तुम्हारी शपथ पहले ही खत्म हो चुकी है? मैं तुम लोगों को बता दूँ : तुम्हारी देह भले ही खत्म हो जाए, पर तुम्हारी शपथ खत्म नहीं हो सकती। अंत में, मैं तुम लोगों की शपथ के आधार पर तुम्हें दंड दूंगा। हालाँकि तुम लोगों को लगता है कि अपने शब्द मेरे सामने रखकर लापरवाही से मेरा सामना कर लोगे, और तुम लोगों के दिल अशुद्ध और बुरी आत्माओं की सेवा कर सकते हैं। मेरा क्रोध उन कुत्ते और सुअर जैसे लोगों को कैसे सहन कर सकता है, जो मुझे धोखा देते हैं? मुझे अपने प्रशासनिक आदेश कार्यान्वित करने होंगे, और अशुद्ध आत्माओं के हाथों से उन सभी पाखंडी, “पवित्र” लोगों को वापस खींचना होगा जिनका मुझमें विश्वास है, ताकि वे एक अनुशासित प्रकार से मेरे लिए “सेवारत” हो सकें, मेरे बैल बन सकें, मेरे घोड़े बन सकें, मेरे संहार की दया पर रह सकें। मैं तुमसे तुम्हारा पिछला संकल्प फिर से उठवाऊँगा और एक बार फिर से अपनी सेवा करवाऊँगा। मैं ऐसे किसी भी सृजित प्राणी को बरदाश्त नहीं करूँगा, जो मुझे धोखा दे। तुम्हें क्या लगा कि तुम बस बेहूदगी से अनुरोध कर सकते हो और मेरे सामने झूठ बोल सकते हो? क्या तुम्हें लगा कि मैंने तुम्हारे वचन और कर्म सुने या देखे नहीं? तुम्हारे वचन और कर्म मेरी दृष्टि में कैसे नहीं आ सकते? मैं लोगों को इस तरह अपने को धोखा कैसे देने दे सकता हूँ?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम सभी कितने नीच चरित्र के हो!
263. मैं स्वयं अद्वितीय परमेश्वर हूँ, इसके अतिरिक्त मैं परमेश्वर का एकमात्र प्रतिनिधि हूँ। इतना ही नहीं, मैं, देह की समग्रता के साथ परमेश्वर की पूर्ण अभिव्यक्ति हूँ। जो कोई मेरा भय न मानने का साहस करता है, जो कोई अपनी आँखों में प्रतिरोध प्रदर्शित करने का साहस करता है, और जो कोई मेरे विरुद्ध अवज्ञा के शब्द बोलने की धृष्टता करता है, वह निश्चित रूप से मेरे शापों और कोप से मारा जाएगा (मेरे कोप के कारण शाप दिए जाएँगे)। इतना ही नहीं, जो कोई मेरे प्रति निष्ठावान अथवा संतानोचित नहीं होता, और जो कोई मुझसे चालबाज़ी करने का प्रयास करता है, वह निश्चित रूप से मेरी घृणा से मर जाएगा। मेरी धार्मिकता, प्रताप और न्याय सदा-सदा के लिए कायम रहेंगे। पहले मैं प्रेममय और दयालु था, परंतु यह मेरी पूरी दिव्यता का स्वभाव नहीं है; केवल धार्मिकता, प्रताप और न्याय ही मेरे, स्वयं पूर्ण परमेश्वर के, स्वभाव में शामिल हैं। अनुग्रह के युग में मैं प्रेममय और दयालु था। जो कार्य मुझे पूरा करना था, उसके कारण मुझमें प्रेममय-कृपालुता और दयालुता थी; उसके बाद ऐसी चीज़ों की कोई आवश्यकता न रही (और तबसे कोई भी नहीं रही है)। यह सब धार्मिकता, प्रताप और न्याय है और यह मेरी सामान्य मानवता के साथ जुड़ी मेरी पूर्ण दिव्यता का संपूर्ण स्वभाव है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आरंभ में मसीह के कथन, अध्याय 79
264. मैं सभी चीजों पर शासन करता हूँ, मैं वह बुद्धिमान परमेश्वर हूँ जो पूर्ण अधिकार का उपयोग करता है, और मैं किसी के प्रति भी उदार नहीं हूँ; मैं अत्यंत निष्ठुर हूँ, व्यक्तिगत भावनाओं से पूरी तरह रहित हूँ। मैं हर किसी से अपनी धार्मिकता, सत्यपरायणता और प्रताप के साथ व्यवहार करता हूँ (चाहे कोई कितना भी अच्छा क्यों न बोलता हो, मैं उसे नहीं छोड़ूँगा), और इस बीच मैं हर किसी को अपने कर्मों का चमत्कार बेहतर ढंग से देखने और साथ ही अपने कर्मों का अर्थ समझने में सक्षम बनाता हूँ। एक-एक करके मैंने दुष्ट आत्माओं को उनके द्वारा किए जाने वाले सभी प्रकार के कर्मों के लिए दंडित किया, और प्रत्येक को अथाह कुंड में फेंक दिया। यह काम मैंने समय के शुरू होने से पहले किया, और उनके लिए न कोई पद छोड़ा, न ही कार्य करने की कोई जगह छोड़ी। मेरे चुने हुए लोगों—मेरे द्वारा पूर्वनियत किए गए और चुने गए लोगों—में से कोई भी कभी किसी दुष्टात्मा द्वारा ग्रस्त नहीं किया जा सकता, और वे हमेशा पवित्र रहेंगे। जहाँ तक उनकी बात है, जिन्हें मैंने पूर्वनियत नहीं किया और चुना नहीं है, उन्हें मैं शैतान को सौंप दूँगा और उन्हें अब रहने नहीं दूँगा। सभी पहलुओं में, मेरे प्रशासनिक आदेशों में मेरी धार्मिकता और मेरा प्रताप शामिल हैं। मैं उन लोगों में से एक को भी नहीं छोडूँगा, जिन पर शैतान कार्य करता है, बल्कि उन्हें सशरीर रसातल में डाल दूँगा, क्योंकि मैं शैतान से घृणा करता हूँ। मैं उसे किसी भी तरह आसानी से नहीं छोड़ूँगा, बल्कि उसे पूरी तरह से नष्ट कर दूँगा, और उसे अपना कार्य करने का जरा-सा भी मौका नहीं दूँगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आरंभ में मसीह के कथन, अध्याय 70
265. मैं अपने समस्त कोप, अपने असीम सामर्थ्य और अपनी पूरी बुद्धि को प्रकट करने के लिए, मुझसे जन्मे हर उस व्यक्ति को ताड़ना दूँगा जो अभी तक मुझे नहीं जानता है। मुझमें सब कुछ धार्मिक है, कोई अधार्मिकता, कोई धोखेबाज़ी और कोई कुटिलता नहीं है; जो कोई भी कुटिल और धोखेबाज़ है, वह अवश्य ही अधोलोक में पैदा हुआ नरक का पुत्र होगा। मुझमें सब कुछ प्रत्यक्ष है; जो कुछ भी मैं कहता हूँ कि पूरा होगा, वह यकीनन पूरा होगा; जो कुछ भी मैं कहता हूँ कि स्थापित होगा, वह ज़रूर स्थापित होगा, और कोई भी इन चीज़ों को बदल नहीं सकता या इनकी नकल नहीं कर सकता, क्योंकि मैं ही एकमात्र स्वयं परमेश्वर हूँ।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आरंभ में मसीह के कथन, अध्याय 96
266. मैं बुरे लोगों को दंड दूँगा और अच्छे लोगों को इनाम दूँगा, और मैं अपनी धार्मिकता को लागू करूँगा, अपने न्याय को कार्यान्वित करूँगा, और मैं हर चीज़ पूरी करने के लिए अपने वचनों का उपयोग करूँगा, और सभी लोगों और सभी चीज़ों को अपने ताड़ना देने वाले हाथ का अनुभव करवाऊँगा। मैं निश्चित रूप से सभी लोगों को अपनी पूरी महिमा, अपनी पूरी बुद्धि, अपनी पूरी उदारता दिखवाऊँगा। कोई भी व्यक्ति आलोचना करने के लिए उठने का साहस नहीं करेगा, क्योंकि मेरे लिए सभी चीज़ें पूरी हो गई हैं, और यहाँ, हर आदमी मेरी पूरी गरिमा देखे और मेरी पूरी जीत का स्वाद ले, क्योंकि मेरे लिए सभी चीज़ें अभिव्यक्त हो गई हैं। यह मेरे महान सामर्थ्य और मेरे अधिकार को दर्शाने के लिए पर्याप्त है। कोई मुझे अपमानित करने का साहस नहीं करेगा, और कोई मुझे बाधित करने का साहस नहीं करेगा। मेरे लिए सब कुछ खुला हुआ है—कौन कुछ भी छिपाने का साहस करेगा? मैं निश्चित रूप से उसे नहीं छोडूँगा! ऐसे अभागों को मेरी गंभीर सजा मिलनी चाहिए और ऐसे बदमाशों को मेरी नजरों से दूर कर दिया जाना चाहिए। मैं ज़रा-सी भी दया न दिखाते हुए और उनकी भावनाओं का ज़रा भी ध्यान न रखते हुए, उन पर लोहे की छड़ी से शासन करूँगा और मैं उनका न्याय करने के लिए अपने अधिकार का उपयोग करूँगा, क्योंकि मैं स्वयं परमेश्वर हूँ, जो दैहिक भावनाओं से रहित है और प्रतापी है और जिसका अपमान नहीं किया जा सकता। सभी को यह समझना और देखना चाहिए, कहीं ऐसा न हो कि “बिना कारण या तर्क” के मेरे द्वारा मार डाले और नष्ट कर दिए जाएँ, क्योंकि मेरी छड़ी उन सभी को मार डालेगी, जो मुझे अपमानित करते हैं। मुझे इस बात की परवाह नहीं वे मेरी प्रशासनिक आज्ञाओं को जानते हैं या नहीं; इसका मेरे लिए कोई महत्व नहीं होगा, क्योंकि मेरा व्यक्तित्व किसी के भी द्वारा अपमानित किया जाना बरदाश्त नहीं करता। इसी कारण से ऐसा कहा जाता है कि मैं एक शेर हूँ; जिस किसी को भी छूता हूँ, उसे मार डालता हूँ। इसी कारण से ऐसा कहा जाता है कि अब यह कहना कि मैं करुणा और प्रेम का परमेश्वर हूँ, मेरी निंदा करना है। सारांश यह कि मैं मेमना नहीं, बल्कि शेर हूँ। कोई मुझे अपमानित करने का साहस नहीं करता; जो कोई मेरा अपमान करेगा, मैं उसकी भावनाओं की फ़िक्र किए बिना तुरंत उसे मृत्युदंड दूँगा!
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आरंभ में मसीह के कथन, अध्याय 120
267. मेरी आवाज़ न्याय और कोप है; इसमें किसी के भी साथ नरमी नहीं बरती जाती और किसी के भी प्रति दया नहीं दिखाई जाती, क्योंकि मैं धार्मिक परमेश्वर स्वयं हूँ, और मैं कोप से युक्त हूँ; मैं ज्वलन, प्रक्षालन, और विनाश से युक्त हूँ। मुझमें कुछ भी छिपा हुआ नहीं है और कोई दैहिक भावनाएँ नहीं हैं, बल्कि इसके विपरीत, खुलापन, धार्मिकता, न्याय और निष्पक्षता है। चूँकि मेरे ज्येष्ठ पुत्र पहले ही सिंहासन पर मेरे साथ हैं, असंख्य राष्ट्रों और सभी लोगों के ऊपर शासन कर रहे हैं, इसलिए जो चीज़ें और लोग अन्यायी और अधार्मिक हैं, उनका अब न्याय किया जाना शुरू हो रहा है। मैं एक-एक कर उनकी जाँच-पड़ताल करूँगा, कुछ भी नहीं छोड़ूँगा, और उन्हें पूर्णतः प्रकट करूँगा। चूँकि मेरा न्याय पूरी तरह प्रकट हो गया है और पूरी तरह खोल दिया गया है, और मैंने बिल्कुल कुछ भी छिपाया नहीं है; इसलिए मैं उन सबको निकाल फेंकूँगा जो मेरे इरादों के अनुरूप नहीं है, और उन्हें अथाह कुंड में अनंत काल के लिए नष्ट हो जाने दूँगा। वहाँ मैं उन्हें सदा के लिए जलने दूँगा। यही मेरी धार्मिकता है; यही मेरा खरापन है। कोई भी इसे बदल नहीं सकता है, और सबको मेरी प्रभुता के अधीन होना ही चाहिए।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आरंभ में मसीह के कथन, अध्याय 103
268. हर एक वाक्य जो मैं कहता हूँ, उसमें अधिकार और न्याय होता है, और कोई मेरे वचनों को बदल नहीं सकता। एक बार जब मेरे वचन निर्गत हो जाते हैं, तो चीज़ें मेरे वचनों के अनुसार संपन्न होनी निश्चित हैं; यह मेरा स्वभाव है। मेरे वचन अधिकार हैं और जो कोई उन्हें संशोधित करता है, वह मेरी ताड़ना को अपमानित करता है, और मुझे उन्हें मार गिराना होगा। गंभीर मामलों में वे अपने जीवन पर बरबादी लाते हैं और वे अधोलोक में या अथाह गड्ढे में जाते हैं। यही एकमात्र तरीका है, जिससे मैं मानवजाति से निपटता हूँ, और मनुष्य के पास इसे बदलने का कोई तरीका नहीं है—यह मेरा प्रशासनिक आदेश है। इसे याद रखना! किसी को भी मेरे आदेश का उल्लंघन करने की अनुमति नहीं है; चीज़ें मेरे इरादों के अनुसार की जानी चाहिए! अतीत में, मैं तुम लोगों के प्रति बहुत नरम था और तुमने केवल मेरे वचनों का सामना किया था। लोगों को मार गिराने के बारे में मैंने जो वचन बोले थे, वे अभी तक घटित नहीं हुए हैं। किंतु आज से, उन सभी लोगों पर सभी आपदाएँ (मेरे प्रशासनिक आदेशों से संबंधित) एक-एक करके पड़ेंगी, जो मेरे इरादों से मेल नहीं खाते हैं। तथ्यों का आगमन अवश्य होना चाहिए—अन्यथा लोग मेरे कोप को देखने में सक्षम नहीं होंगे, बल्कि बार-बार व्यभिचार में लिप्त होंगे। यह मेरी प्रबंधन योजना का एक चरण है, और यह वह तरीका है, जिससे मैं अपने कार्य का अगला चरण करता हूँ। मैं तुम लोगों से यह अग्रिम रूप से कहता हूँ, ताकि तुम लोग सदैव के लिए अपराध करने और नरक-यंत्रणा भुगतने से बच सको। अर्थात्, आज से मैं अपने ज्येष्ठ पुत्रों को छोड़कर सभी लोगों को मेरे इरादों के अनुसार अपनी उचित जगह लेने के लिए मजबूर कर दूँगा, और मैं उन्हें एक-एक करके ताड़ना दूँगा। मैं उनमें से एक को भी दोषमुक्त नहीं करूँगा। तुम लोग ज़रा फिर से लंपट होने की हिम्मत तो करो! तुम लोग ज़रा फिर से विद्रोही होने की हिम्मत तो करो! मैं पहले कह चुका हूँ कि मैं सभी के लिए धार्मिक हूँ, कि मुझमें भावना का लेशमात्र भी नहीं है, जो यह दिखाता है कि मेरे स्वभाव को ठेस नहीं पहुँचाई जानी चाहिए। यह मेरा व्यक्तित्व है। इसे कोई नहीं बदल सकता। सभी लोग मेरे वचनों को सुनते हैं और सभी लोग मेरे गौरवशाली चेहरे को देखते हैं। सभी लोगों को पूर्णतया और सर्वथा मेरे प्रति समर्पण करना चाहिए—यह मेरा प्रशासनिक आदेश है। पूरे ब्रह्मांड में और पृथ्वी के छोरों तक सभी लोगों को मेरी प्रशंसा करनी चाहिए और मुझे गौरवान्वित करना चाहिए, क्योंकि मैं स्वयं अद्वितीय परमेश्वर हूँ, क्योंकि मैं परमेश्वर का व्यक्तित्व हूँ। कोई मेरे वचनों और कथनों को, मेरे भाषण और तौर-तरीकों को नहीं बदल सकता, क्योंकि ये केवल मेरे अपने मामले हैं, और ये वे चीज़ें हैं, जो मुझमें प्राचीनतम काल से हैं और हमेशा रहेंगी।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आरंभ में मसीह के कथन, अध्याय 100
269. सब-कुछ मेरे वचनों से पूरा हो जाएगा; कोई मनुष्य इसमें भाग नहीं ले सकता, और कोई मनुष्य वह काम नहीं कर सकता जिसे मैं करूँगा। मैं सभी देशों की हवा साफ करूँगा और पृथ्वी पर से दुष्टात्माओं के सभी निशान मिटा दूँगा। मैं पहले ही शुरू कर चुका हूँ, और मैं अपने ताड़ना के कार्य का पहला कदम बड़े लाल अजगर के निवास-स्थान में आरंभ करूँगा। इस प्रकार यह देखा जा सकता है कि मेरी ताड़ना पूरे ब्रह्मांड पर आ गई है, और बड़ा लाल अजगर और सभी प्रकार की अशुद्ध आत्माएँ मेरी ताड़ना से बच पाने में असमर्थ होंगी, क्योंकि मैं सभी देशों पर निगाह रखता हूँ। जब पृथ्वी पर मेरा कार्य पूरा हो जाएगा, अर्थात् जब न्याय का युग समाप्त होगा, तब मैं औपचारिक रूप से बड़े लाल अजगर को ताड़ना दूँगा। मेरे लोग बड़े लाल अजगर को दी जाने वाली मेरी धार्मिक ताड़ना अवश्य देखेंगे, मेरी धार्मिकता के कारण स्तुति अवश्य बरसाएँगे, और मेरी धार्मिकता के कारण सदा मेरे पवित्र नाम की बड़ाई अवश्य करेंगे। इसलिए तुम लोग औपचारिक रूप से अपने कर्तव्य निभाओगे, और औपचारिक रूप से सभी देशों में मेरी स्तुति करोगे, हमेशा-हमेशा के लिए!
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन, अध्याय 28
270. अब वह समय है जब मैं प्रत्येक व्यक्ति का परिणाम निर्धारित करता हूँ, न कि वह चरण जिसमें मैंने मनुष्य पर काम करना आरंभ किया था। मैं अपनी अभिलेख-पुस्तक में एक-एक करके प्रत्येक व्यक्ति के शब्द और कार्य, मेरा अनुसरण करने में उनका मार्ग, उनके अंतर्निहित गुण, उन लोगों द्वारा किया गया आचरण लिखता हूँ। इस तरह, चाहे वे किसी भी तरह के व्यक्ति हों, कोई भी मेरे हाथ से नहीं बच पाएगा, और मेरे आवंटन के आधार पर सभी अपने किस्म के अनुसार छाँटे जाएँगे। मैं प्रत्येक व्यक्ति की मंजिल उसकी आयु, वरिष्ठता और उसके द्वारा सही गई पीड़ा की मात्रा के आधार पर तय नहीं करता और सबसे कम इस आधार पर तय नहीं करता कि वह किस हद तक दया का पात्र है, बल्कि इस बात के अनुसार तय करता हूँ कि उनके पास सत्य है या नहीं। इसके अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नहीं है। तुम लोगों को यह समझना चाहिए कि जो लोग परमेश्वर की इच्छा का अनुसरण नहीं करते, वे सब निरपवाद रूप से दंडित किए जाएँगे। यह एक ऐसा तथ्य है जिसे कोई व्यक्ति नहीं बदल सकता। इसलिए जो लोग दंडित किए जाते हैं, वे सब इस तरह परमेश्वर की धार्मिकता के कारण और अपने अनगिनत बुरे कार्यों के प्रतिफल के रूप में दंडित किए जाते हैं।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अपनी मंजिल के लिए पर्याप्त अच्छे कर्म तैयार करो
271. यदि तुम काफी वर्षों से विश्वासी रहे हो और लंबे समय से मुझसे जुड़े हुए हो, किंतु फिर भी मुझसे दूर हो, तो मैं कहता हूँ कि अवश्य ही तुम प्रायः परमेश्वर के स्वभाव का अपमान करते हो, और तुम्हारे अंत का अनुमान लगाना बहुत मुश्किल होगा। यदि मेरे साथ कई वर्षों का संबंध न केवल तुम्हें ऐसा मनुष्य बनाने में असफल रहा है जिसमें मानवता और सत्य हो, बल्कि, इससे भी अधिक, उसने तुम्हारे दुष्ट तौर-तरीकों को तुम्हारी प्रकृति में बद्धमूल कर दिया है, और न केवल तुम्हारा अहंकार पहले से दोगुना हो गया है, बल्कि मेरे बारे में तुम्हारी गलतफहमियाँ भी कई गुना बढ़ गई हैं, यहाँ तक कि तुम मुझे अपना छोटा सह-अपराधी मान लेते हो, तो मैं कहता हूँ कि तुम्हारा रोग अब त्वचा में ही नहीं रहा, बल्कि तुम्हारी हड्डियों तक में घुस गया है। तुम्हारे लिए बस यही शेष बचा है कि तुम अपने अंतिम संस्कार की व्यवस्था किए जाने की प्रतीक्षा करो। तब तुम्हें मुझसे प्रार्थना करने की आवश्यकता नहीं है कि मैं तुम्हारा परमेश्वर बनूँ, क्योंकि तुमने मृत्यु के योग्य पाप किया है, एक अक्षम्य पाप किया है। मैं तुम पर दया कर भी दूँ, तो भी स्वर्ग का परमेश्वर तुम्हारा जीवन लेने पर जोर देगा, क्योंकि परमेश्वर के स्वभाव के प्रति तुम्हारा अपराध कोई साधारण समस्या नहीं है, बल्कि बहुत ही गंभीर प्रकृति का है। जब समय आएगा, तो मुझे दोष मत देना कि मैंने तुम्हें पहले नहीं बताया था। मैं फिर से कहता हूँ : जब तुम मसीह—पृथ्वी के परमेश्वर—से एक साधारण मनुष्य के रूप में जुड़ते हो, अर्थात् जब तुम यह मानते हो कि यह परमेश्वर एक व्यक्ति के अलावा कुछ नहीं है, तो तुम नष्ट हो जाओगे। तुम सबके लिए मेरी यही एकमात्र चेतावनी है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पृथ्वी के परमेश्वर को कैसे जानें
272. मेरी दया उन पर अभिव्यक्त होती है, जो मुझसे प्रेम करते हैं और स्वयं को मुक्त करते हैं। इस बीच, कुकर्मियों को मिला दंड निश्चित रूप से मेरे धार्मिक स्वभाव का प्रमाण है, और उससे भी बढ़कर, मेरे क्रोध की गवाही है। जब आपदा आएगी, तो मेरा विरोध करने वाले सभी अकाल और महामारी के शिकार हो जाएँगे और विलाप करेंगे। जिन्होंने सभी तरह के कुकर्म किए हैं किंतु कई वर्षों तक मेरा अनुसरण किया है, वे अपने पापों का फल भुगतने से नहीं बचेंगे; वे भी लाखों वर्षों में कभी-कभार ही दिखने वाली आपदा में डुबा दिए जाएँगे, और वे लगातार आंतक और भय की स्थिति में जिएँगे। और मेरे वे अनुयायी, जिन्होंने मेरे प्रति परम निष्ठा दर्शाई है, मेरी शक्ति का आनंद लेंगे और उसका गुणगान करेंगे। वे अवर्णनीय तृप्ति का अनुभव करेंगे और ऐसे आनंद में रहेंगे, जो मैंने मानवजाति को पहले कभी प्रदान नहीं किया है। क्योंकि मैं मनुष्यों के अच्छे कर्मों को सँजोकर रखता हूँ और उनके बुरे कर्मों से घृणा करता हूँ। जबसे मैंने पहली बार मानवजाति की अगुआई करनी आरंभ की, तबसे मैं उत्सुकतापूर्वक मनुष्यों के ऐसे समूह को पाने की आशा करता रहा हूँ, जो मेरे साथ एकचित्त हों। इस बीच मैं उन लोगों को कभी नहीं भूलता, जो मेरे साथ एकचित्त नहीं हैं; अपने हृदय में मैं हमेशा उनसे घृणा करता हूँ, उन्हें कुकर्मों के जवाब देने को मजबूर करने के अवसर की प्रतीक्षा करता हूँ, जो कुछ ऐसा है जिसे देखकर मुझे खुशी होगी। अब अंततः मेरा दिन आ गया है, और मुझे अब और प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है!
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अपनी मंजिल के लिए पर्याप्त अच्छे कर्म तैयार करो
273. मैं मानव संसार के अन्यायों को ठीक करूँगा। मैं समूचे संसार में स्वयं अपने हाथों से अपना कार्य करूँगा, अपने लोगों को पुनः हानि पहुँचाने से शैतान को रोकूँगा, शत्रुओं को पुनः उनका मनचाहा करने से रोकूँगा। अपने सभी शत्रुओं को धराशायी करते हुए और अपने सामने उनसे उनके अपराध स्वीकार करवाते हुए, मैं पृथ्वी पर राजा बन जाऊँगा और अपना सिंहासन वहाँ ले जाऊँगा। अपनी उदासी में, जिसमें क्रोध मिला हुआ है, मैं समूचे ब्रह्माण्ड को सपाट रौंद दूँगा, किसी को नहीं छोड़ूँगा, और अपने शत्रुओं के हृदय में आतंक बरपा दूँगा। मैं समूची पृथ्वी को खण्डहरों में बदल दूँगा, और अपने शत्रुओं को उन खण्डहरों में पटक दूँगा, ताकि उसके बाद मानवजाति को वे अब और भ्रष्ट नहीं कर सकें। मेरी योजना पहले से ही निश्चित है, और किसी को भी, वे चाहे जो हों, इसे बदलना नहीं चाहिए। जब मैं प्रतापी ठाट-बाट से ब्रह्माण्ड के ऊपर घूमूँगा, तब समस्त मानवजाति नई बना दी जाएगी, और सब कुछ पुनः जी उठेगा। मनुष्य अब और नहीं रोएगा, सहायता के लिए मुझे अब और नहीं पुकारेगा। तब मेरा हृदय आनंदित होगा, और लोग उत्सव मनाते हुए मेरे पास लौट आएँगे। समूचा ब्रह्माण्ड, ऊपर से नीचे तक, हर्षोल्लास में झूमेगा ...।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन, अध्याय 27
274. सिय्योन! ख़ुशी मनाओ! सिय्योन! गाओ-बजाओ! मैं जीतकर लौटा हूँ, मैं विजयी होकर लौटा हूँ! सभी लोगो! जल्दी से सही ढंग से पंक्तिबद्ध हो जाओ! सृष्टि की सभी चीज़ो! अब रुक जाओ, क्योंकि मेरा व्यक्तित्व पूरे ब्रह्मांड के सामने है और दुनिया के पूर्व में प्रकट हो रहा है! कौन आराधना में घुटने नहीं टेकने का साहस करता है? कौन मुझे सच्चा परमेश्वर नहीं कहने का साहस करता है? कौन भय मानने वाले हृदय से नहीं देखने का साहस करता है? कौन स्तुति नहीं करने का साहस करता है? कौन ख़ुशी नहीं मनाने का साहस करता है? मेरे लोग निश्चित रूप से मेरी आवाज सुनेंगे, और मेरे पुत्र निश्चित रूप से मेरे राज्य में जीवित रहेंगे! पर्वत, नदियाँ और सभी चीज़ें निरंतर जयजयकार करेंगी, और बिना रुके छलाँग लगाएँगी। इस समय कोई पीछे हटने का साहस नहीं करेगा, और कोई भी प्रतिरोध में उठने का साहस नहीं करेगा। यह मेरा अद्भुत कर्म है, और इससे भी बढ़कर, यह मेरा महान सामर्थ्य है! मैं सबके हृदयों में अपने प्रति भय पैदा करवाऊँगा और इससे भी बढ़कर, मैं सबसे अपनी स्तुति करवाऊँगा। यह मेरी छह हजार वर्षीय प्रबंधन योजना का अंतिम उद्देश्य है, और यही मैंने नियत किया है। एक भी व्यक्ति, वस्तु या घटना मेरे प्रतिरोध में उठने या मेरा विरोध करने का साहस नहीं करती। मेरे सभी लोग मेरे पर्वत पर (दूसरे शब्दों में, उस दुनिया में, जिसे मैं बाद में बनाऊँगा) चले जाएँगे और वे निश्चित रूप से मेरे सामने झुकेंगे, क्योंकि मुझमें प्रताप और न्याय है, और मैं अधिकार रखता हूँ। (इसका आशय तब से है, जब मैं शरीर में होता हूँ। मेरे पास देह में भी अधिकार है, किंतु चूँकि देह में समय और स्थान की सीमाओं का अतिक्रमण नहीं किया जा सकता, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि मैंने पूरी महिमा प्राप्त कर ली है। यद्यपि मैं देह में ज्येष्ठ पुत्रों को प्राप्त करता हूँ, फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि मैंने महिमा प्राप्त कर ली है। केवल जब मैं सिय्योन लौटूँगा और अपना रूप बदलूँगा, तभी यह कहा जा सकेगा कि मैं अधिकार रखता हूँ—अर्थात् यह कि मैंने महिमा प्राप्त कर ली है।) मेरे लिए कुछ भी मुश्किल नहीं होगा। मेरे मुँह के वचनों से सब नष्ट हो जाएँगे, और मेरे मुँह के वचनों से सभी डटे रहेंगे और प्रवीण हो जाएँगे। ऐसा महान मेरा सामर्थ्य है और ऐसा मेरा अधिकार है। चूँकि मैं सामर्थ्य से भरपूर और अधिकार से परिपूर्ण हूँ, इसलिए कोई व्यक्ति मुझे बाधित करने का साहस नहीं कर सकता। मैंने बहुत पहले ही हर चीज पर विजय प्राप्त कर ली है, और मैंने विद्रोह के सभी पुत्रों पर जीत हासिल कर ली है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आरंभ में मसीह के कथन, अध्याय 120
275. परमेश्वर ने मानवजाति की सृष्टि की; इसकी परवाह किए बगैर कि उन्हें भ्रष्ट किया गया है या वे उसका अनुसरण करते हैं, परमेश्वर मनुष्यों से अपने सबसे प्रियजनों के समान व्यवहार करता है—या जैसा मानव कहेंगे, ऐसे लोग जो उसके सबसे निकट हैं—और उसके खिलौनों जैसा नहीं। भले ही परमेश्वर कहता है कि वह सृष्टिकर्ता है और मनुष्य उसका सृजित प्राणी है, जो सुनने में ऐसा लग सकता है कि यहाँ पद में थोड़ा अंतर है, फिर भी वास्तविकता यह है कि जो कुछ भी परमेश्वर ने मानवजाति के लिए किया है, वह इस प्रकार के रिश्ते से कहीं बढ़कर है। परमेश्वर मानवजाति से प्रेम करता है, मानवजाति की देखभाल करता है, मानवजाति के लिए चिंता दिखाता है, इसके साथ ही साथ लगातार और बिना रुके मानवजाति के लिए आपूर्तियाँ करता है। वह कभी अपने हृदय में यह महसूस नहीं करता कि यह एक अतिरिक्त कार्य है या जिसे ढेर सारा श्रेय मिलना चाहिए। न ही वह कभी यह महसूस करता है कि मानवता को बचाना, उनके लिए आपूर्तियाँ करना, और उन्हें सब कुछ देना, मानवजाति के लिए एक बहुत बड़ा योगदान है। वह मानवजाति को खामोशी और चुपचाप, अपने तरीके से और अपने सार, अपने पास जो है और जो वह स्वयं है, इनके माध्यम से प्रदान करता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मानवजाति को उससे कितना प्रावधान और कितनी सहायता प्राप्त होती है, परमेश्वर कभी भी श्रेय लेने के बारे में नहीं सोचता और न ही वह ऐसा करने की कोशिश करता है। यह परमेश्वर के सार द्वारा निर्धारित होता है और साथ ही यह परमेश्वर के स्वभाव की बिल्कुल सही अभिव्यक्ति भी है।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I
276. मानवजाति के लिए कार्य हेतु परमेश्वर ने कई रातें बिना सोए गुजारी हैं। वह गहन ऊँचाई से लेकर अनंत गहराई तक जीते-जागते नरक में जहाँ मनुष्य रहता है, वहाँ पृथ्वी के दोनों छोरों के बीच मनुष्य के साथ अपने दिन गुजारने के लिए उतर आया है, फिर भी उसने कभी मनुष्य के बीच पसरी फटेहाली की शिकायत नहीं की है, मनुष्य के विद्रोहीपन के लिए कभी भी उसे फटकारा नहीं है, बल्कि वह व्यक्तिगत रूप से अपना कार्य करते हुए सर्वाधिक अपमान सहन करता है। परमेश्वर नरक का अंग कैसे हो सकता है? वह नरक में अपना जीवन कैसे बिता सकता है? लेकिन समस्त मानवजाति के लिए, ताकि पूरी मानवजाति को जल्द ही आराम मिल सके, उसने अपमान सहा है और पृथ्वी पर आने का अन्याय झेला है, मनुष्य को बचाने की खातिर व्यक्तिगत रूप से “नरक” और “रसातल” में, शेर की माँद में, प्रवेश किया है। मनुष्य परमेश्वर का विरोध करने योग्य कैसे हो सकता है? परमेश्वर से शिकायत करने का उसके पास क्या कारण है? वह परमेश्वर के सामने जाने की हिम्मत कैसे कर सकता है? स्वर्ग का परमेश्वर व्यभिचार की इस सबसे गंदी भूमि में आया है, और कभी भी उसने अपने कष्टों की शिकायत नहीं की है, बल्कि वह चुपचाप मनुष्य द्वारा किए गए विनाश[1] और अत्याचार को स्वीकार करता है। उसने कभी मनुष्य की अनुचित माँगों का प्रतिकार नहीं किया है, कभी भी उसने मनुष्य से अत्यधिक माँगें नहीं की हैं, और कभी भी उसने मनुष्य से गैरवाजिब तकाजे नहीं किए हैं; वह, तमाम कठिनाइयाँ झेलते हुए बिना शिकायत किए, बस मनुष्य की जरूरत के सभी कार्य करता है : शिक्षा देना, प्रबुद्ध करना, डाँटना-फटकारना, शब्दों का परिष्कार करना, याद दिलाना, प्रोत्साहन देना, सांत्वना देना, न्याय करना और उजागर करना। उसका कौन-सा कदम मनुष्य के जीवन की खातिर नहीं है? यद्यपि उसने मनुष्यों की संभावनाओं और नियति को हटा दिया है, फिर भी परमेश्वर द्वारा उठाया गया कौन-सा कदम मनुष्य के भाग्य के लिए नहीं रहा है? उनमें से कौन-सा कदम मनुष्य के अस्तित्व के लिए नहीं रहा है? उनमें से कौन-सा कदम मनुष्य को इस दुःख और अँधेरी ताकतों के अत्याचार से मुक्त कराने के लिए नहीं रहा है, जो इतनी काली हैं जितनी कि रात? उनमें से कौन-सा कदम मनुष्य की खातिर नहीं है? परमेश्वर के हृदय को, जो ममतामयी माँ के हृदय जैसा है, कौन समझ सकता है? परमेश्वर के उत्सुक हृदय को कौन समझ सकता है?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, कार्य और प्रवेश (9)
फुटनोट :
1. “विनाश” का इस्तेमाल मानवजाति का विद्रोहीपन उजागर करने के लिए किया गया है।
277. जब परमेश्वर पृथ्वी पर आया तो वह संसार का नहीं था और संसार का आनंद लेने के लिए वह देह नहीं बना था। जहाँ कहीं उसका कार्य उसके स्वभाव को प्रकट करेगा और सबसे अधिक सार्थक होगा वह वहीं जन्म लेगा, फिर चाहे यह एक पवित्र भूमि हो या गंदी। वह चाहे कहीं भी कार्य करे, वह पवित्र है। दुनिया में सारी चीजें उसके द्वारा बनाई गई थीं, हालाँकि वे शैतान द्वारा भ्रष्ट की जा चुकी हैं। फिर भी, सभी चीजें अभी भी उसकी हैं; वे सभी चीजें उसके हाथों में हैं। वह अपनी पवित्रता प्रकट करने के लिए एक गंदी भूमि में आता है और वहाँ कार्य करता है; वह केवल अपने कार्य की खातिर ऐसा करता है, अर्थात् वह ऐसा कार्य करने में अत्यधिक अपमान केवल इस गंदी भूमि के लोगों को बचाने के लिए ही सहता है। यह गवाही की खातिर, पूरी मानवजाति की खातिर किया जाता है। ऐसा कार्य लोगों को जो दिखाता है वह है परमेश्वर की धार्मिकता और यह कार्य ये दिखाने में बेहतर सक्षम है कि परमेश्वर सर्वोच्च है। उसकी महानता और शुचिता उन नीच लोगों के एक समूह के उद्धार के माध्यम से सटीक रूप से व्यक्त होती है जिनका अन्य लोग तिरस्कार करते हैं। एक गंदी भूमि में पैदा होना यह साबित नहीं करता कि वह नीच है; यह तो बस सभी सृजित प्राणियों को उसकी महानता और मानवजाति के लिए उसका सच्चा प्यार देखने देता है। जितना अधिक वह ऐसा करता है, उतना ही अधिक यह मनुष्य के लिए उसके शुद्ध प्रेम, उसके दोषरहित प्रेम को प्रकट करता है। परमेश्वर पवित्र और धार्मिक है, भले ही वह एक गंदी भूमि में पैदा हुआ था और भले ही वह उन लोगों के साथ रहता है जो गंदगी से भरे हुए हैं, ठीक वैसे ही जैसे अनुग्रह के युग में यीशु पापियों के साथ रहता था। क्या उसके कार्य का हर अंश संपूर्ण मानवजाति के जीवित रहने की खातिर नहीं किया जाता? क्या यह सब इसीलिए नहीं है ताकि मानवजाति महान उद्धार हासिल कर सके? दो हजार साल पहले वह कई वर्षों तक पापियों के साथ रहा। वह छुटकारे के लिए था। आज वह गंदे, नीच लोगों के एक समूह के साथ रह रहा है। यह उद्धार के लिए है। क्या उसका सारा कार्य तुम मनुष्यों के लिए नहीं है? यदि यह मानवजाति को बचाने के लिए न होता, तो क्यों वह एक नाँद में पैदा होने के बाद कई सालों तक पापियों के साथ रहता और कष्ट उठाता? और यदि यह मानवजाति को बचाने के लिए न होता, तो क्यों वह दूसरी बार देह में लौटकर आता, इस देश में पैदा होता जहाँ दुष्ट आत्माएँ इकट्ठी होती हैं, और इन लोगों के साथ रहता जिन्हें शैतान ने गहराई से भ्रष्ट कर रखा है? क्या परमेश्वर वफ़ादार नहीं है? उसके कार्य का कौन-सा भाग मानवजाति के लिए नहीं रहा है? कौन-सा भाग तुम लोगों की नियति के लिए नहीं रहा है? परमेश्वर पवित्र है—यह अपरिवर्तनीय है। वह गंदगी से प्रदूषित नहीं है, हालाँकि वह एक गंदे देश में आया है; इस सबका मतलब केवल यह हो सकता है कि मानवजाति के लिए परमेश्वर का प्रेम अत्यंत निस्वार्थ है और जो पीड़ा और अपमान वह सहता है, वह अत्यधिक है! क्या तुम लोग यह नहीं जानते कि वह तुम सभी के लिए, और तुम लोगों की नियति के लिए जो अपमान सहता है, वह कितना बड़ा है? वह बड़े लोगों या अमीर और शक्तिशाली परिवारों के पुत्रों को बचाने के बजाय विशेष रूप से उनको बचाता है, जो दीन-हीन हैं और नीची निगाह से देखे जाते हैं। क्या यह सब उसकी पवित्रता नहीं है? क्या यह सब उसकी धार्मिकता नहीं है? समस्त मानवजाति के अस्तित्व के लिए वह एक दूषित भूमि में पैदा होगा और हर अपमान सहेगा। परमेश्वर बहुत वास्तविक है—वह कोई मिथ्या कार्य नहीं करता। क्या उसके कार्य का हर चरण इतने व्यावहारिक रूप से नहीं किया गया है? यद्यपि सब लोग उसकी निंदा करते हैं और कहते हैं कि वह पापियों के साथ मेज पर बैठता है, यद्यपि सब लोग उसका मज़ाक उड़ाते हैं और कहते हैं कि वह गंदगी के पुत्रों के साथ रहता है, कि वह सबसे अधम लोगों के साथ रहता है, फिर भी वह निस्वार्थ रूप से अपने आपको समर्पित करता है, और वह अभी भी मानवजाति के बीच इस तरह नकारा जाता है। क्या जो कष्ट वह सहता है, वह तुम लोगों के कष्टों से बड़ा नहीं है? क्या जो कार्य वह करता है, वह तुम लोगों द्वारा चुकाई गई कीमत से ज्यादा नहीं है?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मोआब के वंशजों को बचाने का अर्थ
278. परमेश्वर ने स्वयं को इस स्तर तक विनम्र किया है कि वह अपना कार्य इन अशुद्ध और भ्रष्ट लोगों में करता है, और लोगों के इस समूह को पूर्ण बनाता है। परमेश्वर न केवल लोगों के बीच रहने और खाने-पीने, लोगों की चरवाही करने और जो उनकी जरूरतें हैं, उन्हें प्रदान करने के लिए देहधारी हुआ है। बल्कि इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि वह उद्धार और विजय का अपना प्रबल कार्य इन असहनीय रूप से भ्रष्ट लोगों पर करता है। वह इन सबसे अधिक भ्रष्ट लोगों को बचाने के लिए बड़े लाल अजगर के केंद्र में आया, जिससे सभी लोग परिवर्तित हो सकें और नए बनाए जा सकें। वह अत्यधिक कष्ट, जो परमेश्वर सहन करता है, मात्र वह कष्ट नहीं है जो देहधारी परमेश्वर सहन करता है, अपितु सबसे बढ़कर वह परम निरादर है, जो परमेश्वर का आत्मा सहन करता है—वह स्वयं को इतना अधिक विनम्र बनाता है और इतना अधिक छिपाए रखता है कि वह एक साधारण व्यक्ति बन जाता है। परमेश्वर ने देहधारण किया और देह का रूप लिया, ताकि लोग देखें कि उसका जीवन सामान्य मानवता का जीवन है और उसकी जरूरतें भी सामान्य मानवता की जरूरतें हैं। यह इस बात को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त है कि परमेश्वर ने स्वयं को बेहद विनम्र बनाया है। परमेश्वर का आत्मा देह में साकार होता है। उसका आत्मा इतना सर्वोच्च और महान है, लेकिन फिर भी वह अपने आत्मा का कार्य करने के लिए एक साधारण मानव, एक मामूली मानव का रूप धारण करता है। तुममें से हरेक व्यक्ति की काबिलियत, अंतर्दृष्टि, विवेक, मानवता और जीवन के लिहाज से तुम सब वास्तव में परमेश्वर के इस प्रकार के कार्य को स्वीकार करने के अयोग्य हो और तुम लोग वास्तव में इस योग्य नहीं हो कि परमेश्वर तुम्हारे लिए यह कष्ट उठाए। परमेश्वर इतना ऊँचा है। वह इस हद तक सर्वोच्च है और लोग इस स्तर तक नीच हैं, फिर भी वह उन पर कार्य करता है। उसने लोगों का भरण-पोषण करने, उनसे बात करने के लिए न केवल देहधारण किया, वह उनके साथ रहता भी है। परमेश्वर इतना विनम्र, इतना प्यारा है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल उन्हें ही पूर्ण बनाया जा सकता है जो अभ्यास पर ध्यान देते हैं
279. परमेश्वर जो कुछ भी करता है, उसका बड़ा गहरा महत्व होता है। उदाहरण के तौर पर यीशु के क्रूसीकरण को लो। यीशु को क्रूस पर क्यों चढ़ना पड़ा? क्या यह संपूर्ण मानवजाति को छुटकारा दिलाने के लिए नहीं था? वैसे ही, परमेश्वर के वर्तमान देहधारण का, और उसके द्वारा संसार की पीड़ा का अनुभव करने का भी बहुत बड़ा अर्थ है—यह मानवजाति की खूबसूरत मंजिल के लिए है। अपने कार्य में, परमेश्वर हमेशा ठीक वही करता है, जो सबसे अधिक व्यावहारिक है। ऐसा क्यों है कि परमेश्वर देखता है कि मनुष्य पापरहित है, और उसके पास परमेश्वर के सामने आने का अच्छा सौभाग्य हो सकता है? ऐसा इसलिए है, क्योंकि यीशु ने क्रूस पर चढ़कर मनुष्य के पाप अपने ऊपर ले लिए और मानवजाति को छुटकारा दिला दिया। तो फिर क्यों मानवजाति अब और कष्ट नहीं सहेगी, दुःख महसूस नहीं करेगी, आँसू नहीं बहाएगी, और आह नहीं भरेगी? इसका कारण यह है कि परमेश्वर के मौजूदा देहधारण ने यह समस्त कष्ट अपने ऊपर ले लिया है, और यह कष्ट अब मनुष्य की ओर से सहा जा चुका है। यह उस माँ के समान है, जो अपने बच्चे को बीमार होते देखती है और स्वर्ग से प्रार्थना करती है, यह इच्छा करती है कि उसका अपना जीवन छोटा हो जाए मगर उसका बच्चा ठीक हो जाए। परमेश्वर भी इसी तरह काम करता है, वह मानवजाति को भविष्य में मिलने वाली खूबसूरत मंजिल के बदले दर्द सहने की पेशकश करता है। अब कोई दुःख नहीं होगा, आँसू नहीं होंगे, आहें नहीं होंगी और कष्ट नहीं होगा। परमेश्वर मानवजाति को मिलने वाली खूबसूरत मंजिल के बदले में व्यक्तिगत रूप से दुनिया की पीड़ा अनुभव करने की कीमत—लागत—चुकाता है। यह कहने का कि यह “खूबसूरत मंजिल के बदले में” किया जाता है, यह अर्थ नहीं कि परमेश्वर के पास मानवजाति को खूबसूरत मंजिल प्रदान करने का सामर्थ्य या अधिकार नहीं है, बल्कि इसके बजाय परमेश्वर लोगों को पूरी तरह से आश्वस्त करने के लिए कहीं अधिक व्यावहारिक और शक्तिशाली प्रमाण ढूँढ़ना चाहता है। परमेश्वर ने पहले ही इस पीड़ा का अनुभव कर लिया है, इसलिए वह योग्य है, उसके पास वह सामर्थ्य है, और इससे भी बढ़कर, उसके पास मानवजाति को उस खूबसूरत मंजिल तक पहुँचाने, उसे वह खूबसूरत मंजिल और वादा प्रदान करने का अधिकार है। शैतान पूरी तरह आश्वस्त हो जाएगा; ब्रह्मांड की सभी रचनाएँ पूरी तरह आश्वस्त हो जाएंगी। अंत में, परमेश्वर मानवजाति को अपना वादा और प्रेम प्राप्त करने देगा। हर चीज जो परमेश्वर करता है वह व्यावहारिक है, वह ऐसा कुछ नहीं करता है जो खोखला हो, और वह सब कुछ स्वयं अनुभव करता है। परमेश्वर मानवजाति के गंतव्य के बदले में दुःख सहन करने के अपने अनुभव को कीमत के रूप में चुकाता है। क्या यह व्यावहारिक कार्य नहीं है? माता-पिता अपने बच्चों के लिए एक सच्ची कीमत चुका सकते हैं और यह अपने बच्चों के लिए उनका प्रेम दर्शाता है। ऐसा करने में, देहधारी परमेश्वर ज़ाहिर तौर पर मानवता के प्रति अत्यधिक ईमानदार और वफादार है। परमेश्वर का सार विश्वसनीय है; जो वह कहता है उसे करता है और जो कुछ भी वह करता है वह पूरा होता है। हर चीज जो वह मनुष्य के लिए करता है वह निष्कपट होती है—वह मात्र वचनों की उक्ति नहीं करता। जब वह कहता है कि वह मूल्य चुकाएगा, तो वह एक वास्तविक मूल्य चुकाता है; जब वह कहता है कि वह मनुष्य के कष्ट अपने ऊपर ले लेगा और उनके स्थान पर कष्ट उठाएगा, तो वह वास्तव में उनके बीच रहने के लिए आता है, व्यक्तिगत रूप से इस कष्ट को महसूस और अनुभव करता है। उसके बाद, ब्रह्मांड की सभी चीजें मानेंगी कि हर चीज जो परमेश्वर करता है वह सही और धर्मी है, कि सब कुछ जो परमेश्वर करता है वह वास्तविक है। यह सामर्थ्यवान प्रमाण है। इसके अलावा, भविष्य में मानवजाति के पास एक खूबसूरत मंजिल होगी और वे सभी जो बचेंगे वे परमेश्वर की प्रशंसा करेंगे; वे बड़ाई करेंगे कि परमेश्वर के कार्य वास्तव में मानवता के लिए उसके प्रेम के कारण किए गए हैं। परमेश्वर मानव के बीच एक साधारण व्यक्ति के रूप में विनम्रतापूर्वक आता है। वह केवल कुछ कार्य करके, कुछ वचनों को बोलकर, चला नहीं जाता है; बल्कि, वह संसार की पीड़ा का अनुभव करते हुए व्यावहारिक तौर पर बोलता और कार्य करता है। जब वह इस पीड़ा का अनुभव करना समाप्त कर लेगा, तभी वह जाएगा। परमेश्वर का कार्य इतना वास्तविक और इतना व्यावहारिक होता है; वे सब जो बाकी रहेंगे वे इसके कारण उसकी प्रशंसा करेंगे, और वे मनुष्य के प्रति परमेश्वर की निष्ठा और उसकी दयालुता को देखेंगे। परमेश्वर की सुन्दरता और अच्छाई के सार को उसके देहधारण के महत्व में देखा जा सकता है। जो कुछ भी वह करता है वह सच्चा है; जो कुछ भी वह कहता है वह सच्चा और विश्वसनीय है। वह जो भी चीजें करने का इरादा रखता है, व्यावहारिक तौर पर करता है; जब मूल्य चुकाना होता है, वह वास्तव में मूल्य चुकाता है; वह महज वचनों की उक्ति नहीं करता। परमेश्वर एक धर्मी परमेश्वर है; परमेश्वर एक विश्वासयोग्य परमेश्वर है।
—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, देहधारण के अर्थ का दूसरा पहलू
280. परमेश्वर अपने मानवजाति के प्रबंधन और उद्धार की इस घटना को किसी भी अन्य चीज से ज़्यादा महत्वपूर्ण समझता है। वह इन चीजों को केवल अपने मस्तिष्क से नहीं करता, केवल अपने वचनों से नहीं करता और निश्चित रूप से अनौपचारिक तरीके के साथ नहीं करता—वह इन चीजों को अपने इरादों से करता है और साथ ही उसके पास एक योजना होती है, एक लक्ष्य होता है और मानक होते हैं। यह देखा जा सकता है कि मानवजाति को बचाने के परमेश्वर के कार्य की यह घटना परमेश्वर और मनुष्य दोनों के लिए बड़ा महत्व रखती है। कार्य चाहे कितना भी कठिन क्यों न हो, इसकी राह में चाहे कितनी भी बड़ी अड़चनें क्यों न हों, मनुष्य चाहे कितने भी दुर्बल क्यों न हों या मानवजाति की विद्रोहशीलता चाहे कितनी भी गहन क्यों न हो, इनमें से कुछ भी परमेश्वर के लिए कठिन नहीं हैं। परमेश्वर अपने आप को व्यस्त रखता है, अपने दिल का खून खपा रहा है और वह जिस कार्य को कार्यान्वित करना चाहता है उसका प्रबंधन कर रहा है; वह हर चीज की व्यवस्था भी कर रहा है और जिन लोगों पर वह कार्य करना चाहता है और जो कार्य करना चाहता है, उन सब पर संप्रभु है—यह सब कुछ अभूतपूर्व है। यह पहली बार है जब परमेश्वर ने मानवजाति का प्रबंधन करने और उसे बचाने के लिए इस प्रमुख परियोजना को पूरा करने की खातिर इन तरीकों का उपयोग किया है और इतनी बड़ी कीमत चुकाई है। यह सारा कार्य करते समय परमेश्वर थोड़ा-थोड़ा करके बिना किसी लाग-लपेट के मानवजाति के लिए अपने दिल के खून को, जो उसके पास है और जो वह स्वयं है, अपनी बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता को और अपने स्वभाव के हर पहलू को व्यक्त और जारी कर रहा है। इन तरीकों की अभिव्यक्ति और विमोचन अभूतपूर्व है। इसलिए पूरे ब्रह्मांड में, उन लोगों को छोड़कर जिन्हें प्रबंधित करना और बचाना परमेश्वर का लक्ष्य है, कभी कोई प्राणी परमेश्वर के इतने करीब नहीं रहा है, जिसका उसके साथ इतना अंतरंग संबंध हो। परमेश्वर के हृदय में वह मानवजाति सर्वोपरि है, जिसका वह प्रबंधन करना और बचाना चाहता है, और वह इस मानवजाति को अन्य सभी से अधिक महत्व देता है। भले ही उसने इस मानवजाति के लिए एक बड़ी कीमत चुकाई है और भले ही यह उसे लगातार ठेस पहुँचाती है और उससे विद्रोह करती है, फिर भी उसे कोई शिकायत या पछतावा नहीं है, वह अभी भी उसे छोड़ता नहीं है या उस पर हार नहीं मानता है और वह बिना रुके अपना कार्य करना जारी रखता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि वह जानता है कि देर-सबेर लोग उसके वचनों की पुकार से जाग जाएँगे, उसके वचनों से द्रवित हो जाएँगे, पहचान जाएँगे कि वही सृष्टिकर्ता है और फिर उसकी ओर लौट आएँगे...।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III
281. जब तुम परमेश्वर के विचारों और मानवजाति के प्रति उसके रवैये को समझने में वास्तव में समर्थ होते हो, जब तुम प्रत्येक सृजित प्राणी के प्रति परमेश्वर की भावनाओं और चिंता को वास्तव में समझ सकते हो, तब तुम सृजनकर्ता द्वारा सृजित हर एक मनुष्य पर व्यय की गई उसकी लगन और प्रेम को समझने में भी समर्थ हो जाओगे। जब ऐसा होगा, तब तुम परमेश्वर के प्रेम का वर्णन करने के लिए दो शब्दों का उपयोग करोगे। वे कौन-से दो शब्द हैं? कुछ लोग कहते हैं “निस्स्वार्थ,” और कुछ लोग कहते हैं “परोपकारी।” इन दोनों में से “परोपकारी” शब्द परमेश्वर के प्रेम की व्याख्या करने के लिए सबसे कम उपयुक्त है। इस शब्द का उपयोग लोग किसी ऐसे व्यक्ति का वर्णन करने के लिए करते हैं, जो उदारमना या व्यापक सोच वाला हो। मैं इस शब्द से घृणा करता हूँ, क्योंकि यह यूँ ही, विवेकहीनता से, बिना सिद्धांतों की परवाह किए दान देने को संदर्भित करता है। यह एक भावना का उद्गार है, जो मूर्ख और भ्रमित लोगों के लिए आम है। जब इस शब्द का उपयोग परमेश्वर के प्रेम का वर्णन करने के लिए किया जाता है, तो इसमें अपरिहार्य रूप से ईशनिंदा का संकेतार्थ होता है। मेरे पास यहाँ दो शब्द हैं, जो अधिक उचित रूप से परमेश्वर के प्रेम का वर्णन करते हैं। वे दो शब्द कौन-से हैं? पहला शब्द है “विशाल।” क्या यह शब्द बहुत उद्बोधक नहीं है? दूसरा शब्द है “अनंत।” इन दोनों शब्दों में व्यावहारिक अर्थ निहित है, जिसका उपयोग मैं परमेश्वर के प्रेम का वर्णन करने के लिए करता हूँ। शब्दशः लेने पर, “विशाल” शब्द किसी चीज़ की मात्रा और क्षमता का वर्णन करता है, पर वह चीज़ कितनी ही बड़ी क्यों न हो, वह ऐसी होती है जिसे लोग छू और देख सकते हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि वह मौजूद है—वह कोई अमूर्त चीज़ नहीं है, बल्कि ऐसी चीज़ है, जो लोगों को अपेक्षाकृत सटीक और व्यावहारिक रूप में विचार दे सकती है। चाहे तुम इसे द्विआयामी दृष्टिकोण से देखो या त्रिआयामी दृष्टिकोण से; तुम्हें इसकी मौजूदगी की कल्पना करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह एक ऐसी चीज़ है जो वास्तव में मौजूद है। यद्यपि परमेश्वर के प्रेम का वर्णन करने के लिए “विशाल” शब्द का उपयोग करना उसके प्रेम का परिमाण निर्धारित करने का प्रयास लग सकता है, किंतु यह इस बात का एहसास भी देता है कि उसके प्रेम का परिमाण निर्धारित नहीं किया जा सकता। मैं कहता हूँ कि परमेश्वर के प्रेम का परिमाण निर्धारित किया जा सकता है, क्योंकि उसका प्रेम खोखला नहीं है, और न ही वह कोई किंवदंती है। बल्कि वह एक ऐसी चीज़ है, जिसे परमेश्वर द्वारा शासित सभी प्राणियों द्वारा साझा किया जाता है, ऐसी चीज़, जिसका सभी प्राणियों द्वारा विभिन्न मात्राओं में और विभिन्न परिप्रेक्ष्यों से आनंद लिया जाता है। यद्यपि लोग उसे देख या छू नहीं सकते, फिर भी यह प्रेम सभी के जीवन में थोड़ा-थोड़ा प्रकट होकर उनके लिए पोषण और जीवन लाता है, और वे हर क्षण परमेश्वर के जिस प्रेम का आनंद लेते हैं उसे गिनते और उसकी गवाही देते है। मैं कहता हूँ कि परमेश्वर के प्रेम का परिमाण निर्धारित नहीं किया जा सकता, क्योंकि परमेश्वर द्वारा सभी चीज़ों का भरण-पोषण और पालन-पोषण करने का रहस्य ऐसी चीज़ है, जिसकी थाह पाना मनुष्यों के लिए कठिन है, और ऐसे ही सभी चीज़ों के लिए, और विशेष रूप से मानवजाति के लिए, परमेश्वर के विचार हैं। अर्थात्, परमेश्वर द्वारा मानवजाति के लिए बहाए गए लहू और आसूँओं को कोई नहीं जानता। उस मानवजाति के लिए सृजनकर्ता के प्रेम की गहराई और वज़न को कोई नहीं बूझ सकता, कोई नहीं समझ सकता, जिसे उसने अपने हाथों से बनाया है। परमेश्वर के प्रेम को विशाल बताना उसके अस्तित्व के विस्तार और सच्चाई को समझने-बूझने में लोगों की सहायता करना है। यह इसलिए भी है, ताकि लोग “सृजनकर्ता” शब्द के व्यावहारिक अर्थ को अधिक गहराई से समझ सकें, और ताकि लोग “सृजित प्राणी” नाम के सच्चे अर्थ की एक गहरी समझ प्राप्त कर सकें। “अनंत” शब्द आम तौर पर क्या बताता है? यह सामान्यतः महासागर या ब्रह्मांड के लिए प्रयुक्त होता है, जैसे “अनंत ब्रह्मांड”, या “अनंत महासागर”। ब्रह्मांड की व्यापकता और शांत गहराई मनुष्य की समझ से परे है; वह ऐसी चीज़ है, जो मनुष्य की कल्पना को पकड़ लेती है, जिसके प्रति वे बहुत प्रशंसा महसूस करते हैं। उसका रहस्य और गहराई दृष्टि के भीतर हैं, किंतु पहुँच से बाहर हैं। जब तुम महासागर के बारे में सोचते हो, तो तुम उसके विस्तार के बारे में सोचते हो—वह असीम दिखाई देता है, और तुम उसकी रहस्यमयता और चीज़ों को धारण करने की उसकी महान क्षमता महसूस कर सकते हो। इसीलिए मैंने परमेश्वर के प्रेम का वर्णन करने के लिए “अनंत” शब्द का उपयोग किया है, ताकि लोगों को यह महसूस करने में मदद मिल सके कि उसके प्रेम की अगाध सुंदरता महसूस करना कितना बहुमूल्य है, और कि परमेश्वर के प्रेम की ताक़त अनंत और व्यापक है। मैंने इस शब्द का प्रयोग लोगों को परमेश्वर के प्रेम की पवित्रता, और उसके प्रेम के माध्यम से प्रकट होने वाली उसकी गरिमा और अनुल्लंघनीयता महसूस करने में सहायता करने के लिए किया।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III
282. परमेश्वर के सार एवं स्वभाव में कुछ ऐसा है जिसे बड़ी आसानी से नज़रअंदाज़ किया सकता है, कुछ ऐसा जो केवल परमेश्वर के ही पास है और किसी व्यक्ति के पास नहीं, इनमें वे लोग भी शामिल हैं, जिन्हें अन्य महान, अच्छे लोग या अपनी कल्पना में परमेश्वर मानते हैं। यह चीज़ क्या है? यह परमेश्वर की निःस्वार्थता है। निःस्वार्थता के बारे में बोलते समय, शायद तुम सोचोगे कि तुम भी बहुत निःस्वार्थ हो क्योंकि जब तुम्हारे बच्चों की बात आती है, तो तुम उनके साथ कभी सौदा या मोलभाव नहीं करते या तुम्हें लगता है कि तुम तब भी बहुत निःस्वार्थ होते हो, जब तुम्हारे माता-पिता की बात आती है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि तुम क्या सोचते हो, कम से कम तुम्हारे पास “निःस्वार्थ” शब्द की एक अवधारणा तो है और तुम इसे एक सकारात्मक शब्द और यह तो मानते हो निःस्वार्थ व्यक्ति होना बहुत ही श्रेष्ठ होना है। जब तुम निःस्वार्थ होते हो, तो तुम स्वयं को अत्यधिक सम्मान देते हो। परंतु ऐसा कोई नहीं है, जो सभी चीज़ों के मध्य, सभी लोगों, घटनाओं एवं वस्तुओं के मध्य और उसके कार्य में परमेश्वर की निःस्वार्थता को देख सके। ऐसी स्थिति क्यों है? क्योंकि मनुष्य बहुत स्वार्थी है! मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? मानवजाति एक भौतिक संसार में रहती है। तुम परमेश्वर का अनुसरण तो करते हो, किंतु तुम कभी नहीं देखते या तारीफ नहीं करते कि किस प्रकार परमेश्वर तुम्हारे लिए आपूर्तियाँ करता है, तुम्हें प्रेम करता है और तुम्हारे लिए चिंता करता है। तो तुम क्या देखते हो? तुम अपने खून के रिश्तेदारों को देखते हो, जो तुम्हें प्रेम करते हैं या तुम्हें बहुत स्नेह करते हैं। तुम उन चीज़ों को देखते हो, जो तुम्हारी देह के लिए लाभकारी हैं, तुम उन लोगों एवं चीज़ों की परवाह करते हो, जिनसे तुम प्रेम करते हो। यह मनुष्य की तथाकथित निःस्वार्थता है। ऐसे “निःस्वार्थ” लोग कभी भी उस परमेश्वर की चिंता नहीं करते, जो उन्हें जीवन देता है। परमेश्वर के विपरीत, मनुष्य की निःस्वार्थता मतलबी एवं निंदनीय हो जाती है। वह निःस्वार्थता जिसमें मनुष्य विश्वास करता है, खोखली एवं अवास्तविक, मिलावटी, परमेश्वर से असंगत एवं परमेश्वर से असंबद्ध है। मनुष्य की निःस्वार्थता सिर्फ उसके लिए है, जबकि परमेश्वर की निःस्वार्थता उसके सार का सच्चा प्रकाशन है। यह बिल्कुल परमेश्वर की निःस्वार्थता की वजह से है कि मनुष्य उससे निरंतर आपूर्ति प्राप्त करता रहता है। तुम लोग शायद इस विषय से, जिसके बारे में आज मैं बात कर रहा हूँ, अत्यंत गहराई से प्रभावित न हो और मात्र सहमति में सिर हिला रहे हो, परंतु जब तुम अपने हृदय में परमेश्वर के हृदय की सराहना करने की कोशिश करते हो, तो तुम अनजाने में ही इसे जान जाओगे : सभी लोगों, मामलों एवं चीज़ों के मध्य, जिन्हें तुम इस संसार में महसूस कर सकते हो, केवल परमेश्वर की निःस्वार्थता ही वास्तविक एवं ठोस है, क्योंकि सिर्फ परमेश्वर का प्रेम ही तुम्हारे लिए बिना किसी शर्त के है और बेदाग है। परमेश्वर के अतिरिक्त, किसी भी व्यक्ति की तथाकथित निःस्वार्थता झूठी, सतही एवं अप्रामाणिक है; उसका एक उद्देश्य होता है, निश्चित इरादे होते हैं, समझौते होते हैं और वह परीक्षा में नहीं ठहर सकती। तुम यह तक कह सकते हो कि यह गंदी एवं घिनौनी है।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I
283. परमेश्वर मनुष्य से घृणा करता है क्योंकि मनुष्य उसके प्रति शत्रुभाव रखता है, लेकिन अपने हृदय में, मानवता के प्रति उसकी देखभाल, चिंता एवं दया कभी नहीं बदलती है। भले ही उसने मानवजाति को नष्ट किया, फिर भी उसका हृदय अपरिवर्तित रहता है। जब मानवजाति भ्रष्टता से भरपूर और परमेश्वर के प्रति गंभीर हद तक विद्रोही हो जाती है तो परमेश्वर को अपने स्वभाव और अपने सार के कारण और अपने सिद्धांतों के अनुसार इस मानवजाति को नष्ट करना पड़ता है। लेकिन अपने सार के कारण परमेश्वर अभी भी मानवजाति के लिए दया रखता है और यह तक चाहता है कि मानवजाति को वापस लाने के लिए विभिन्न तरीके इस्तेमाल करे ताकि वह जीना जारी रख सके। लेकिन, मनुष्य परमेश्वर का विरोध करता है, परमेश्वर से विद्रोह करना जारी रखता है और परमेश्वर के उद्धार को स्वीकार करने से इनकार करता है; अर्थात् मनुष्य परमेश्वर के अच्छे इरादों को स्वीकार करने से इनकार करता है—इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि परमेश्वर उसे कैसे पुकारता है, स्मरण दिलाता है, उसे आपूर्ति करता है, उसकी सहायता करता है या उसे सहन करता है, मनुष्य न तो इसे समझता है, न इसका आभारी होता है, न ही उस पर कुछ ध्यान देता है। अपनी पीड़ा में परमेश्वर अभी भी मनुष्य को अपनी अधिकतम सहनशीलता प्रदान करना नहीं भूलता, वह इंतजार करता है कि मनुष्य अपना रास्ता पलटे। परमेश्वर जब अपनी हद तक पहुँच जाता है तो वह बेहिचक वह करता है जो उसे करना है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर जब मानवजाति को नष्ट करने की योजना बनाता है तो उस क्षण से लेकर मानवजाति को नष्ट करने के अपने कार्य की औपचारिक शुरुआत तक एक विशिष्ट समयावधि और एक प्रक्रिया होती है। यह प्रक्रिया मनुष्य के राह पलटने की खातिर होती है और यह वह अंतिम मौका होता है जो परमेश्वर मनुष्य को देता है। तो मानवजाति का विनाश करने से पहले इस अवधि में परमेश्वर क्या करता है? परमेश्वर बहुत सारा स्मरण दिलाने और नसीहत देने का कार्य करता है। चाहे परमेश्वर का हृदय कितनी भी पीड़ा एवं दुःख में हो, फिर भी वह मानवजाति पर अपनी देखभाल, चिंता और भरपूर दया करना जारी रखता है। इससे हम क्या देखते हैं? यकीनन, हम यह देखते हैं कि मानवजाति के लिए परमेश्वर का प्रेम वास्तविक है न कि केवल ऐसे शब्द जिन्हें वह मात्र ज़ुबानी कह दे। यह वास्तविक, स्पर्शगम्य और अनुभवगम्य है, न कि जाली, मिलावटी, कपटपूर्ण या आडंबरयुक्त। परमेश्वर कभी किसी छल का उपयोग नहीं करता या झूठी छवियाँ नहीं बनाता कि लोगों को यह दिखाए कि वह कितना मनभावन है। वह लोगों को अपनी मनोहरता दिखाने के लिए या अपनी मनोहरता एवं पवित्रता के दिखावे के लिए झूठी गवाही का उपयोग कभी नहीं करता। क्या परमेश्वर के स्वभाव के ये पहलू मनुष्य के प्रेम के लायक नहीं हैं? क्या ये आराधना के योग्य नहीं हैं? क्या ये संजोकर रखने के योग्य नहीं हैं? इस बिंदु पर, मैं तुम लोगों से पूछना चाहता हूँ : इन शब्दों को सुनने के बाद, क्या तुम लोग सोचते हो कि परमेश्वर की महानता कागज के टुकड़ों पर लिखे गए खोखले शब्द मात्र है? क्या परमेश्वर की मनोहरता केवल खोखले शब्द ही है? नहीं! निश्चित रूप से नहीं! परमेश्वर की सर्वोच्चता, महानता, पवित्रता, सहनशीलता, प्रेम, इत्यादि—परमेश्वर के स्वभाव एवं सार के इन सब विभिन्न पहलुओं के हर विवरण को हर उस समय व्यावहारिक अभिव्यक्ति मिलती है, जब वह अपना कार्य करता है, ये सब मनुष्य के प्रति उसके इरादे में समाहित हैं और ये प्रत्येक व्यक्ति में भी साकार और प्रतिबिंबित होते हैं। चाहे तुमने इसे पहले महसूस किया हो या नहीं, परमेश्वर प्रत्येक व्यक्ति की हर संभव तरीके से देखभाल कर रहा है, वह प्रत्येक व्यक्ति के हृदय को स्नेह देने और प्रत्येक व्यक्ति की आत्मा को जगाने के लिए अपने निष्कपट हृदय, बुद्धि एवं विभिन्न तरीकों का उपयोग कर रहा है। यह एक निर्विवादित तथ्य है।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I