8. परमेश्वर के स्वभाव और उसके स्वरूप पर अत्यावश्यक वचन

196. परमेश्वर वो है जो वो है और उसके पास वो है जो उसके पास है। जो कुछ वह प्रकट और उजागर करता है वह उसके सार और उसकी पहचान के निरूपण हैं। उसका स्वरूप, उसका सार और उसकी पहचान ऐसी चीज़ें हैं जिनकी जगह कोई मनुष्य नहीं ले सकता है। उसका स्वभाव मानवजाति के प्रति उसके प्रेम, मानवजाति के लिए उसकी दिलासा, मानवजाति के प्रति नफरत, और उस से भी बढ़कर, मानवजाति की सम्पूर्ण समझ को समेटे हुए है। जबकि, मुनष्य का व्यक्तित्व आशावादी, जीवन्त, या निष्ठुर हो सकता है। परमेश्वर का स्वभाव सभी चीज़ों और जीवित प्राणियों के शासक, सारी सृष्टि के प्रभु का स्वभाव है। उसका स्वभाव सम्मान, सामर्थ, कुलीनता, महानता, और सब से बढ़कर, सर्वोच्चता को दर्शाता है। उसका स्वभाव अधिकार का प्रतीक है, उन सबका प्रतीक है जो धर्मी, सुन्दर, और अच्छा है। इस के अतिरिक्त, यह उस परमेश्वर का भी प्रतीक है जिसे अंधकार और शत्रु बल के द्वारा हराया या आक्रमण नहीं किया जा सकता है,[क] साथ ही उस परमेश्वर का प्रतीक भी है जिसे किसी भी सृजे गए प्राणी के द्वारा ठेस नहीं पहुंचाई जा सकती है (न ही वह ठेस पहुंचाया जाना बर्दाश्त करेगा)।[ख] उसका स्वभाव सब से ऊँची सामर्थ का प्रतीक है। कोई भी मनुष्य या लोग उसके कार्य और उसके स्वभाव को बाधित नहीं कर सकते हैं। परन्तु मनुष्य का व्यक्तित्व, पशुओं से थोड़ा बेहतर होने के चिह्न से बढ़कर कुछ भी नहीं है। मनुष्य के पास अपने आप में और स्वयं में कोई अधिकार नहीं है, कोई स्वायत्तता नहीं है, स्वयं को श्रेष्ठ बनाने की कोई योग्यता नहीं है, बल्कि उसके सार में यह है कि वो हर प्रकार के व्यक्तियों, घटनाओं, या वस्तुओं के नियंत्रण में रहता है। परमेश्वर का आनन्द, धार्मिकता और ज्योति की उपस्थिति और अभ्युदय के कारण है; अँधकार और बुराई के विनाश के कारण है। वह मानवजाति तक ज्योति और अच्छा जीवन पहुंचाने में आनन्दित होता है; उसका आनन्द धार्मिक आनंद है, हर सकारात्मक चीज़ के अस्तित्व में होने का प्रतीक, और सब से बढ़कर कल्याण का प्रतीक है। परमेश्वर के क्रोध का कारण मानवजाति को अन्याय की मौजूदगी और उसके हस्तक्षेप के कारण पहुँचने वाली हानि है; बुराई और अँधकार है, और ऐसी चीज़ों का अस्तित्व है जो सत्य को निकाल बाहर करती हैं, और उस से भी बढ़कर इसका कारण ऐसी चीज़ों का अस्तित्व है जो उसका विरोध करती हैं जो भला और सुन्दर है। उसका क्रोध एक चिह्न है कि वे सभी चीज़ें जो नकारात्मक हैं आगे से अस्तित्व में न रहें, और इसके अतिरिक्त यह उसकी पवित्रता का प्रतीक है। उसका दुखः मानवजाति के कारण है, जिसके लिए उसने आशा की है परन्तु वह अंधकार में गिर गई है, क्योंकि जो कार्य वह मनुष्यों पर करता है, वह उसकी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरता और क्योंकि वह जिस मानवजाति से प्रेम करता है वह समस्त मानवजाति ज्योति में जीवन नहीं जी सकती। वह दुखः की अनुभूति करता है अपनी निष्कपट मानवजाति के लिए, ईमानदार किन्तु अज्ञानी मनुष्य के लिए, और उस मनुष्य के लिए जो भला तो है लेकिन जिसमें खुद के विचारों की कमी है। उसका दुखः, उसकी भलाई और उसकी करूणा का चिह्न है, सुन्दरता और उदारता का चिह्न है। उसकी प्रसन्नता वास्तव में, उसके शत्रुओं को हराने और मनुष्यों के भले विश्वास को प्राप्त करने से आती है। इसके अतिरिक्त, सभी शत्रु ताकतों को भगाने और उनके विनाश से उपजती है और मनुष्यों के भले और शांतिपूर्ण जीवन को प्राप्त करने से आती है। परमेश्वर की प्रसन्नता, मनुष्य के आनंद के समान नहीं है; उसके बजाए, यह मनोहर फलों को एकत्र करने का एहसास है, एक एहसास जो आनंद से भी बढ़कर है। उसकी प्रसन्नता इस बात का चिह्न है कि मानवजाति दुखः की जंज़ीरों को तोड़कर अब आज़ाद हो गयी है, यह मानवजाति के ज्योति के संसार में प्रवेश करने का चिह्न है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के स्वभाव को समझना अति महत्वपूर्ण है' से उद्धृत

197. मैं शुरुआत हूं, और मैं अंत हूं। मैं ही पुनर्जीवित और पूर्ण सच्चा परमेश्वर हूं। मैं तुम लोगों के सामने अपने वचन बोलता हूं, और जो मैं कहता हूं तुम लोगों को उस पर दृढ़ता से विश्वास करना चाहिए। आकाश और धरती समाप्त हो सकते हैं, लेकिन जो भी मैं कहता हूं उसका एक अक्षर या एक रेखा भी कभी समाप्त नहीं होगी। यह याद रखना! यह याद रखना! एक बार जब मैं बोल देता हूं, तो एक वचन भी कभी वापस नहीं लिया जाएगा और प्रत्येक वचन पूरा होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 53' से उद्धृत

198. ब्रह्मांड और सभी चीज़ें मेरे हाथों में हैं। मैं जो भी कहूंगा वही होगा। मेरा आदेश पूरा होगा। शैतान मेरे पैरों के तले है, वह एक अथाह गड्ढे में है! मेरे एक आदेश के जारी होने पर तो आकाश और पृथ्वी टल जाएंगे और उनका कोई अस्तित्‍व नहीं रहेगा! सभी चीज़ें नवीनीकृत हो जाएंगी और यह एक अटल सत्य है, जो अत्‍यधिक सत्य है। मैंने दुनिया को जीत लिया है, सभी दुष्टों पर विजय प्राप्त की है। मैं यहाँ बैठा तुम लोगों से बात कर रहा हूँ; जिनके पास कान हैं, उन्हें सुनना चाहिए और जो जीवित हैं उन्हें स्वीकार करना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 15' से उद्धृत

199. मैं जो कहता हूँ, उस पर दृढ़ रहता हूँ, और जिस पर मैं दृढ़ रहता हूँ, उसे पूरा जरूर करता हूँ, और कोई इसे बदल नहीं सकता—यह असंदिग्ध है। चाहे वे मेरे द्वारा अतीत में कहे गए वचन हों या भविष्य कहे जाने वाले, मैं उन सबको एक-एक करके सच कर दूँगा, और समस्त मानव-जाति को इसे सच होते दिखाऊँगा। यह मेरे वचनों और कार्य के पीछे का सिद्धांत है। ... संसार में घटित होने वाली समस्त चीज़ों में से ऐसी कोई चीज़ नहीं है, जिसमें मेरी बात आखिरी न हो। क्या कोई ऐसी चीज़ है, जो मेरे हाथ में न हो? जो कुछ मैं कहता हूँ, वही होता है, और मनुष्यों के बीच कौन है, जो मेरे मन को बदल सकता है? क्या यह मेरे द्वारा पृथ्वी पर बनाई गई वाचा हो सकती है? कोई भी चीज़ मेरी योजना के आगे बढ़ने में बाधा नहीं डाल सकती; मैं अपने कार्य में और साथ ही अपनी प्रबंधन योजना में भी हमेशा उपस्थित हूँ। मनुष्यों में से कौन इसमें हस्तक्षेप कर सकता है? क्या मैंने ही इन व्यवस्थाओं को व्यक्तिगत रूप से नहीं बनाया है? आज इस क्षेत्र में प्रवेश करना मेरी योजना या मेरे पूर्वानुमान से बाहर नहीं है; यह सब बहुत पहले मेरे ही द्वारा निर्धारित किया गया था। तुम लोगों में से कौन मेरी योजना के इस चरण की थाह पा सकता है? मेरे लोग निश्चित ही मेरी आवाज़ सुनेंगे, और हर वह आदमी, जो ईमानदारी से मुझसे प्रेम करता है, निश्चित ही मेरे सिंहासन के सामने लौट आएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन' के 'अध्याय 1' से उद्धृत

200. मैं धार्मिक हूँ, मैं विश्वासयोग्य हूँ, और मैं वो परमेश्वर हूँ जो मनुष्यों के अंतरतम हृदय की जाँच करता है! मैं एक क्षण में इसे प्रकट कर दूँगा कि कौन सच्चा और कौन झूठा है। घबराओ मत; सभी चीजें मेरे समय के अनुसार काम करती हैं। कौन मुझे ईमानदारी से चाहता है और कौन नहीं—मैं एक-एक करके तुम सब को बता दूँगा। तुम लोग वचनों को खाने-पीने का ध्यान रखो और जब तुम मेरी उपस्थिति में आओ तो मेरे करीब आ जाओ, और मैं अपना काम स्वयं करूँगा। तात्कालिक परिणामों के लिए बहुत चिंतित न हो जाओ; मेरा काम ऐसा नहीं है जो सारा एक साथ पूरा किया जा सके। इसके भीतर मेरे चरण और मेरी बुद्धि निहित है, इसलिए ही मेरी बुद्धि प्रकट की जा सकती है। मैं तुम सभी को देखने दूँगा कि मेरे हाथों द्वारा क्या किया जाता है—बुराई को दण्डित और भलाई को पुरस्कृत किया जाता है। मैं निश्चय ही किसी से पक्षपात नहीं करता। तुम जो मुझे पूरी निष्ठा से प्रेम करते हो, मैं भी तुम्हें निष्ठा से प्रेम करूँगा, और जहाँ तक उनकी बात है जो मुझे निष्ठा से प्रेम नहीं करते, उन पर मेरा क्रोध हमेशा रहेगा, ताकि वे अनंतकाल तक याद रख सकें कि मैं सच्चा परमेश्वर हूँ, ऐसा परमेश्वर जो मनुष्यों के अंतरतम हृदय की जाँच करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 44' से उद्धृत

201. मैं उन सभी से प्यार करता हूँ जो ईमानदारी से मेरे लिए खुद को व्यय करते हैं और खुद को मेरे प्रति समर्पित करते हैं। मैं उन सभी से नफ़रत करता हूँ जो मुझ से जन्मे तो हैं, मगर मुझे नहीं जानते हैं, यहाँ तक कि मेरा विरोध भी करते हैं। मैं ऐसे किसी भी व्यक्ति का परित्याग नहीं करूँगा जो ईमानदारी से मेरे लिए है; बल्कि मैं उसके आशीषों को दुगुना कर दूँगा। जो लोग कृतघ्न हैं और मेरी दयालुता का अपमान करते हैं, उन्हें मैं दुगुनी सजा दूँगा और हल्के में नहीं छोड़ूँगा। मेरे राज्य में कोई कुटिलता या छल नहीं है, कोई सांसारिकता नहीं है; अर्थात् मृतकों की कोई गंध नहीं है। बल्कि सारी सत्यपरायणता, धार्मिकता है, सारी शुद्धता और सारा खुलापन है, कुछ भी छुपाया गया या परदे में रखा गया नहीं है। सब कुछ ताज़ा है, आनंदपूर्ण है, सब कुछ आत्मिक उन्नति है। अगर किसी से अभी भी मृतकों की गंध आती है, तो वह किसी भी तरीके से मेरे राज्य में नहीं रह सकता है, बल्कि मेरे लौहदण्ड द्वारा उसका फैसला किया जाएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 70' से उद्धृत

202. मैं एक सर्वभक्षी अग्नि हूँ और मैं अपमान बरदाश्त नहीं करता। क्योंकि सभी मानव मेरे द्वारा बनाए गए थे, इसलिए मैं जो कुछ कहता और करता हूँ, उन्हें उसका पालन करना चाहिए और वे विद्रोह नहीं कर सकते। लोगों को मेरे कार्य में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है, और वे इस बात का विश्लेषण करने के योग्य तो बिलकुल नहीं है कि मेरे कार्य और मेरे वचनों में क्या सही या ग़लत है। मैं सृष्टि का प्रभु हूँ, और सृजित प्राणियों को मेरे प्रति श्रद्धापूर्ण हृदय के साथ वह सब-कुछ प्राप्त करना चाहिए, जिसकी मुझे आवश्यकता है; उन्हें मेरे साथ बहस नहीं करनी चाहिए, और विशेष रूप से उन्हें मेरा विरोध नहीं करना चाहिए। मैं अपने अधिकार के साथ अपने लोगों पर शासन करता हूँ, और वे सभी लोग जो मेरी सृष्टि का हिस्सा हैं, उन्हें मेरे अधिकार के प्रति समर्पण करना चाहिए। यद्यपि आज तुम लोग मेरे सामने दबंग और धृष्ट हो, यद्यपि तुम उन वचनों की अवज्ञा करते हो जिनसे मैं तुम लोगों को शिक्षा देता हूँ, और कोई डर मानते, फिर भी मैं तुम लोगों की विद्रोहशीलता का केवल सहिष्णुता से सामना करता हूँ; मैं अपना आपा नहीं खोऊँगा और अपने कार्य को इसलिए प्रभावित नहीं करूँगा, क्योंकि छोटे, तुच्छ भुनगों ने गोबर के ढेर में गंदगी मचा दी है। मैं अपने पिता की इच्छा के वास्ते हर उस चीज़ के अविरत अस्तित्व को सहता हूँ जिससे मैं घृणा करता हूँ, और और उन सभी चीज़ों को बरदाश्त करता हूँ, जिनसे में नफ़रत करता हूँ, और मैं अपने कथन पूरे होने तक, अपने अंतिम क्षण तक ऐसा करूँगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जब झड़ते हुए पत्ते अपनी जड़ों की ओर लौटेंगे, तो तुम्हें अपनी की हुई सभी बुराइयों पर पछतावा होगा' से उद्धृत

203. चूँकि तुम पहले ही मेरी सेवा करने का संकल्प ले चुके हो, इसलिए मैं तुम्हें जाने नहीं दूँगा। मैं वह परमेश्वर हूँ, जो बुराई से घृणा करता है, और मैं वह परमेश्वर हूँ, जो मनुष्य के प्रति शंकालु है। चूँकि तुमने पहले ही अपने शब्दों को वेदी पर रख दिया है, इसलिए मैं यह बरदाश्त नहीं करूँगा कि तुम मेरी ही आँखों के सामने से भाग जाओ, न ही मैं यह बरदाश्त करूँगा कि तुम दो स्वामियों की सेवा करो। क्या तुम्हें लगता है कि मेरी वेदी पर और मेरी आँखों के सामने अपने शब्दों को रखने के बाद तुम किसी दूसरे से प्रेम कर सकते हो? मैं लोगों को इस तरह से मुझे मूर्ख कैसे बनाने दे सकता हूँ? क्या तुम्हें लगता था कि तुम अपनी जीभ से यूँ ही मेरे लिए प्रतिज्ञा और शपथ ले सकते हो? तुम मेरे सिंहासन की शपथ कैसे ले सकते हो, मेरा सिंहासन, मैं जो सबसे ऊँचा हूँ? क्या तुम्हें लगा कि तुम्हारी शपथ पहले ही खत्म हो चुकी है? मैं तुम लोगों को बता दूँ : तुम्हारी देह भले ही खत्म हो जाए, पर तुम्हारी शपथ खत्म नहीं हो सकती। अंत में, मैं तुम लोगों की शपथ के आधार पर तुम्हें दंड दूंगा। हालाँकि तुम लोगों को लगता है कि अपने शब्द मेरे सामने रखकर मेरा सामना कर लोगे, और तुम लोगों के दिल अशुद्ध और बुरी आत्माओं की सेवा कर सकते हैं। मेरा क्रोध उन कुत्ते और सुअर जैसे लोगों को कैसे सहन कर सकता है, जो मुझे धोखा देते हैं? मुझे अपने प्रशासनिक आदेश कार्यान्वित करने होंगे, और अशुद्ध आत्माओं के हाथों से उन सभी पाखंडी, "पवित्र" लोगों को वापस खींचना होगा जिनका मुझमें विश्वास है, ताकि वे एक अनुशासित प्रकार से मेरे लिए "सेवारत" हो सकें, मेरे बैल बन सकें, मेरे घोड़े बन सकें, मेरे संहार की दया पर रह सकें। मैं तुमसे तुम्हारा पिछला संकल्प फिर से उठवाऊँगा और एक बार फिर से अपनी सेवा करवाऊँगा। मैं ऐसे किसी भी सृजित प्राणी को बरदाश्त नहीं करूँगा, जो मुझे धोखा दे। तुम्हें क्या लगा कि तुम बस बेहूदगी से अनुरोध कर सकते हो और मेरे सामने झूठ बोल सकते हो? क्या तुम्हें लगा कि मैंने तुम्हारे वचन और कर्म सुने या देखे नहीं? तुम्हारे वचन और कर्म मेरी दृष्टि में कैसे नहीं आ सकते? मैं लोगों को इस तरह अपने को धोखा कैसे देने दे सकता हूँ?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम सभी कितने नीच चरित्र के हो!' से उद्धृत

204. मैं स्वयं अद्वितीय परमेश्वर हूँ, इसके अतिरिक्त मैं परमेश्वर का एकमात्र प्रतिनिधि हूँ। इतना ही नहीं, मैं, देह की समग्रता के साथ परमेश्वर की पूर्ण अभिव्यक्ति हूँ। जो कोई मेरा सम्मान न करने का साहस करता है, जो कोई अपनी आँखों में प्रतिरोध प्रदर्शित करने का साहस करता है, और जो कोई मेरे विरुद्ध अवज्ञा के शब्द बोलने की धृष्टता करता है, वह निश्चित रूप से मेरे शापों और कोप से मारा जाएगा (मेरे कोप के कारण शाप दिए जाएँगे)। इतना ही नहीं, जो कोई मेरे प्रति निष्ठावान अथवा संतानोचित नहीं होता, और जो कोई मुझसे चालबाज़ी करने का प्रयास करता है, वह निश्चित रूप से मेरी घृणा से मर जाएगा। मेरी धार्मिकता, प्रताप और न्याय सदा-सदा के लिए कायम रहेंगे। पहले मैं प्रेममय और दयालु था, परंतु यह मेरी पूरी दिव्यता का स्वभाव नहीं है; केवल धार्मिकता, प्रताप और न्याय ही मेरे, स्वयं पूर्ण परमेश्वर के, स्वभाव में शामिल हैं। अनुग्रह के युग में मैं प्रेममय और दयालु था। जो कार्य मुझे पूरा करना था, उसके कारण मुझमें प्रेममय-कृपालुता और दयालुता थी; उसके बाद ऐसी चीज़ों की कोई आवश्यकता न रही (और तबसे कोई भी नहीं रही है)। यह सब धार्मिकता, प्रताप और न्याय है और यह मेरी सामान्य मानवता के साथ जुड़ी मेरी पूर्ण दिव्यता का संपूर्ण स्वभाव है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 79' से उद्धृत

205. मैं सभी चीज़ों पर शासन करता हूँ, मैं ही वह बुद्धिमान परमेश्वर हूँ जो पूर्ण अधिकार का उपयोग करता है, और मैं किसी भी व्यक्ति के प्रति उदार नहीं हूँ; मैं अत्यंत निष्ठुर हूँ, व्यक्तिगत भावना से पूरी तरह रहित हूँ। मैं हर किसी के साथ अपनी धार्मिकता, सत्यपरायणता, और अपने प्रताप के साथ व्यवहार करता हूँ (चाहे कोई कितना भी अच्छा क्यों न बोलता हो, मैं उसे नहीं छोड़ूँगा), और इस बीच मैं हर किसी को मेरे कर्मों के चमत्कार को बेहतर ढंग से देखने, मेरे कर्मों के अर्थ को समझने देता हूँ। मैंने दुष्ट आत्माओं के सभी प्रकार के कर्मों को एक-एक करके दण्डित किया, उन्हें एक-एक करके अथाह गड्ढे में डाल दिया। उनके लिए कोई पद न छोड़ते हुए, उनके लिए उनके कार्य करने की कोई जगह न छोड़ते हुए, समय शुरू होने से पहले ही इस कार्य को मैंने पूरा कर लिया था। मेरे चुने लोगों में से—जो मेरे द्वारा पूर्वनियत और चयनित हैं—कोई दुष्टात्माओं के कब्ज़े में नहीं हो सकता है, बल्कि वो हमेशा पवित्र रहेगा। जहाँ तक उनकी बात है जिन्हें मैंने पूर्वनियत और चयनित नहीं किया है, उन्हें मैं शैतान को सौंप दूँगा और उन्हें अब और नहीं रहने दूँगा। सभी पहलुओं में, मेरे प्रशासनिक आदेशों में मेरी धार्मिकता, मेरा प्रताप शामिल हैं। मैं उन लोगों में से एक को भी नहीं जाने दूँगा जिन पर शैतान कार्य करता है बल्कि उन्हें सशरीर अधोलोक में डाल दूँगा, क्योंकि मैं शैतान से नफ़रत करता हूँ। मैं इसे किसी भी तरह से आसानी से नहीं छोड़ूँगा बल्कि इसे पूरी तरह से नष्ट कर दूँगा और इसके लिए कार्य को करने का ज़रा-सा भी मौका नहीं छोड़ूँगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 70' से उद्धृत

206. मैं पवित्र परमेश्वर हूँ, और मैं एक गंदे मंदिर में नहीं रहूँगा! मैं केवल ईमानदार और बुद्धिमान लोगों का उपयोग करता हूँ जो मेरे प्रति पूरी तरह वफ़ादार और मेरे बोझ के प्रति विचारशील हो सकते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि ऐसे लोगों को मेरे द्वारा पूर्वनिर्धारित किया गया था। कोई भी दुष्ट आत्मा उन पर बिलकुल काम नहीं करता है। मुझे यह बात स्पष्ट करने दो: अब से, वे सब जिनके पास पवित्र आत्मा का कार्य नहीं है, उन लोगों के पास दुष्ट आत्माओं का काम है। मैं दोहरा दूँ: मैं एक भी ऐसे व्यक्ति को नहीं चाहता जिस पर दुष्ट आत्माओं का काम होता है। वे सभी अपने शरीर के साथ नरक में डाल दिए जाएँगे!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 76' से उद्धृत

207. मैं अपना समस्त कोप दिखाने, अपनी महान सामर्थ्य दिखाने, और अपनी पूरी बुद्धि दिखाने के लिए, मुझसे जन्मे उस हर एक को ताड़ना दूँगा जो अभी तक मुझे नहीं जानता है। मुझ में सब कुछ धार्मिक है और कोई अधार्मिकता, कोई छल, और कोई कुटिलता बिल्कुल भी नहीं है; जो कोई भी कुटिल और धोखेबाज है वह अवश्य नरक का पुत्र होना चाहिए अधोलोक में पैदा हुआ होना चाहिए। मुझमें सब कुछ प्रत्यक्ष है; जो कुछ भी मैं पूरा करने के लिए कहता हूँ वह पूरा हो जाता है और जो कुछ भी मैं स्थापित करने के लिए कहता हूँ वह स्थापित हो जाता है, और कोई भी इन चीज़ों को बदल नहीं सकता है या इनकी बराबरी नहीं कर सकता है क्योंकि मैं स्वयं ही एकमात्र परमेश्वर हूँ।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 96' से उद्धृत

208. मैं दुष्टों को दंड दूँगा और अच्छे लोगों को इनाम दूँगा, और मैं अपनी धार्मिकता को लागू करूँगा और अपने न्याय को कार्यान्वित करूँगा। मैं हर चीज़ पूरी करने के लिए अपने वचनों का उपयोग करूँगा, और सभी लोगों और सभी चीज़ों को अपने ताड़ना देने वाले हाथ का अनुभव करवाऊँगा, और मैं सभी लोगों को अपनी पूरी महिमा, अपनी पूरी बुद्धि, अपनी पूरी उदारता दिखवाऊँगा। कोई भी व्यक्ति आलोचना करने के लिए उठने का साहस नहीं करेगा, क्योंकि मुझमें सभी चीज़ें पूरी होती हैं, और यहाँ, हर आदमी मेरी पूरी गरिमा देखे और मेरी पूरी जीत का स्वाद ले, क्योंकि मुझमें सभी चीज़ें अभिव्यक्त होती हैं। इससे मेरे महान सामर्थ्य और मेरे अधिकार को देखना संभव है। कोई मुझे अपमानित करने का साहस नहीं करेगा, और कोई मुझे बाधित करने का साहस नहीं करेगा। मुझमें सब खुला हुआ है। कौन कुछ छिपाने का साहस करेगा? मैं निश्चित रूप से उस व्यक्ति पर दया नहीं दिखाऊँगा! ऐसे अभागों को मेरी गंभीर सजा मिलनी चाहिए और ऐसे बदमाशों को मेरी नजरों से दूर कर दिया जाना चाहिए। मैं ज़रा-सी भी दया न दिखाते हुए और उनकी भावनाओं का ज़रा भी ध्यान न रखते हुए, उन पर लोहे की छड़ी से शासन करूँगा और मैं उनका न्याय करने के लिए अपने अधिकार का उपयोग करूँगा, क्योंकि मैं स्वयं परमेश्वर हूँ, जो भावना से रहित है और प्रतापी है और जिसका अपमान नहीं किया जा सकता। सभी को यह समझना और देखना चाहिए, कहीं ऐसा न हो कि "बिना कारण या तर्क" के मेरे द्वारा मार डाले और नष्ट कर दिए जाएँ, क्योंकि मेरी छड़ी उन सभी को मार डालेगी, जो मुझे अपमानित करते हैं। मुझे इस बात की परवाह नहीं वे मेरी प्रशासनिक आज्ञाओं को जानते हैं या नहीं; इसका मेरे लिए कोई महत्व नहीं होगा, क्योंकि मेरा व्यक्तित्व किसी के भी द्वारा अपमानित किया जाना बरदाश्त नहीं करता। इसी कारण से ऐसा कहा जाता है कि मैं एक शेर हूँ; जिस किसी को भी छूता हूँ, उसे मार डालता हूँ। इसी कारण से ऐसा कहा जाता है कि अब यह कहना कि मैं करुणा और प्रेम का परमेश्वर हूँ, मेरी निंदा करना है। सारांश यह कि मैं मेमना नहीं, बल्कि शेर हूँ। कोई मुझे अपमानित करने का साहस नहीं करता; जो कोई मेरा अपमान करेगा, मैं बिना दया के तुरंत उसे मृत्युदंड दूँगा!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 120' से उद्धृत

209. मेरी आवाज़ न्याय और कोप है; मैं किसी के प्रति नरमी से पेश नहीं आता हूँ और किसी के प्रति भी दया नहीं दिखाता हूँ, क्योंकि मैं स्वयं धार्मिक परमेश्वर हूँ, और मैं कोप से संपन्न हूँ, मैं अग्न, शुद्धिकरण, विनाश से संपन्न हूँ। मुझमें छुपा हुआ कुछ भी नहीं है, भावनात्मक कुछ भी नहीं है, बल्कि सब कुछ स्पष्ट, धार्मिक और निष्पक्ष है। क्योंकि मेरे ज्येष्ठ पुत्र पहले से ही मेरे साथ सिंहासन पर हैं, सभी राष्ट्रों और सभी लोगों पर शासन कर रहे हैं, इसलिए अन्यायपूर्ण और अनैतिक चीज़ों और लोगों का न्याय किया जाना शुरू हो रहा है। मैं एक-एक करके उनकी जाँच करूँगा, कुछ भी नहीं छोड़ूँगा, उन्हें पूर्णतः प्रकट करूँगा। क्योंकि मेरा न्याय पूरी तरह से प्रकट हो गया है और पूरी तरह से स्पष्ट कर दिया गया है, और कुछ भी रोक कर नहीं रखा गया है; इसलिए जो कुछ भी मेरी इच्छा के अनुकूल नहीं होता है मैं उसे बाहर फेंक दूँगा और उसे अथाह गड्ढे में सदैव के लिए नष्ट होने दूँगा; मैं उसे अथाह गड्ढे में सदा के लिए जलने दूँगा। यह मेरी धार्मिकता है; यह मेरी ईमानदारी है। कोई भी इसे बदल नहीं सकता है, और यह अवश्य मेरे आदेश पर होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 103' से उद्धृत

210. हर एक वाक्य जो मैं कहता हूँ, उसमें अधिकार और न्याय होता है, और कोई मेरे वचनों को बदल नहीं सकता। एक बार जब मेरे वचन निर्गत हो जाते हैं, तो चीज़ें मेरे वचनों के अनुसार संपन्न होनी निश्चित हैं; यह मेरा स्वभाव है। मेरे वचन अधिकार हैं और जो कोई उन्हें संशोधित करता है, वह मेरी ताड़ना को अपमानित करता है, और मुझे उन्हें मार गिराना होगा। गंभीर मामलों में वे अपने जीवन पर बरबादी लाते हैं और वे अधोलोक में या अथाह गड्ढे में जाते हैं। यही एकमात्र तरीका है, जिससे मैं मानवजाति से निपटता हूँ, और मनुष्य के पास इसे बदलने का कोई तरीका नहीं है—यह मेरा प्रशासनिक आदेश है। इसे याद रखना! किसी को भी मेरे आदेश का उल्लंघन करने की अनुमति नहीं है; चीज़ें मेरी इच्छा के अनुसार की जानी चाहिए! अतीत में, मैं तुम लोगों के प्रति बहुत नरम था और तुमने केवल मेरे वचनों का सामना किया था। लोगों को मार गिराने के बारे में मैंने जो वचन बोले थे, वे अभी तक घटित नहीं हुए हैं। किंतु आज से, उन सभी लोगों पर सभी आपदाएँ (मेरे प्रशासनिक आदेशों से संबंधित) एक-एक करके पड़ेंगी, जो मेरी इच्छा के अनुरूप नहीं हैं। तथ्यों का आगमन अवश्य होना चाहिए—अन्यथा लोग मेरे कोप को देखने में सक्षम नहीं होंगे, बल्कि बार-बार व्यभिचार में लिप्त होंगे। यह मेरी प्रबंधन योजना का एक चरण है, और यह वह तरीका है, जिससे मैं अपने कार्य का अगला चरण करता हूँ। मैं तुम लोगों से यह अग्रिम रूप से कहता हूँ, ताकि तुम लोग सदैव के लिए अपराध करने और नरक-यंत्रणा भुगतने से बच सको। अर्थात्, आज से मैं अपने ज्येष्ठ पुत्रों को छोड़कर सभी लोगों को मेरी इच्छा के अनुसार अपनी उचित जगह लेने के लिए मजबूर कर दूँगा, और मैं उन्हें एक-एक करके ताड़ना दूँगा। मैं उनमें से एक को भी दोषमुक्त नहीं करूँगा। तुम लोग ज़रा फिर से लंपट होने की हिम्मत तो करो! तुम लोग ज़रा फिर से विद्रोही होने की हिम्मत तो करो! मैं पहले कह चुका हूँ कि मैं सभी के लिए धार्मिक हूँ, कि मुझमें भावना का लेशमात्र भी नहीं है, जो यह दिखाता है कि मेरे स्वभाव को ठेस नहीं पहुँचाई जानी चाहिए। यह मेरा व्यक्तित्व है। इसे कोई नहीं बदल सकता। सभी लोग मेरे वचनों को सुनते हैं और सभी लोग मेरे गौरवशाली चेहरे को देखते हैं। सभी लोगों को पूर्णतया और सर्वथा मेरा आज्ञापालन करना चाहिए—यह मेरा प्रशासनिक आदेश है। पूरे ब्रह्मांड में और पृथ्वी के छोरों तक सभी लोगों को मेरी प्रशंसा करनी चाहिए और मुझे गौरवान्वित करना चाहिए, क्योंकि मैं स्वयं अद्वितीय परमेश्वर हूँ, क्योंकि मैं परमेश्वर का व्यक्तित्व हूँ। कोई मेरे वचनों और कथनों को, मेरे भाषण और तौर-तरीकों को नहीं बदल सकता, क्योंकि ये केवल मेरे अपने मामले हैं, और ये वे चीज़ें हैं, जो मुझमें प्राचीनतम काल से हैं और हमेशा रहेंगी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 100' से उद्धृत

211. सब कुछ मेरे वचनों के द्वारा पूरा हो जाएगा; कोई मनुष्य भागी न हो, और कोई मनुष्य वह काम नहीं कर सकता है जिसे मैं करूँगा। मैं सारी भूमि की हवा को स्वच्छ करूँगा और पृथ्वी पर से दुष्टात्माओं का पूर्ण रूप से नाश कर दूँगा। मैं पहले से ही शुरू कर चुका हूँ, और अपनी ताड़ना कार्य के पहले कदम को उस बड़े लाल अजगर के निवास स्थान में आरम्भ करूँगा। इस प्रकार यह देखा जा सकता है कि मेरी ताड़ना पूरे ब्रह्माण्ड के ऊपर आ गई है, और बड़ा लाल अजगर और सभी प्रकार की अशुद्ध आत्माएँ मेरी ताड़ना से बच पाने में असमर्थ होंगी क्योंकि मैं समूची भूमि पर निगाह रखता हूँ। जब मेरा कार्य पृथ्वी पर पूरा हो जाएगा अर्थात्, जब न्याय का युग समाप्त होगा, तब मैं औपचारिक रूप से उस बड़े लाल अजगर को ताड़ना दूँगा। मेरे लोग उस बड़े लाल अजगर की धर्मी ताड़ना को अवश्य देखेंगे, मेरी धार्मिकता के कारण स्तुति बरसाएँगे, और मेरी धार्मिकता के कारण सदा सर्वदा मेरे पवित्र नाम की बड़ाई करते रहेंगे। अब से तुम लोग अपने कर्तव्यों को औपचारिक तौर पर निभा पाओगे, और सारी धरती पर औपचारिक तौर पर मेरी स्तुति करोगे, हमेशा-हमेशा के लिए!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन' के 'अध्याय 28' से उद्धृत

212. मेरे सिय्योन लौटने के बाद, पृथ्वी के लोग उसी तरह मेरी स्तुति करते रहेंगे, जैसा कि वे अतीत में करते थे। वे वफ़ादार सेवाकर्मी मुझे सेवा प्रदान करने के लिए हमेशा की तरह प्रतीक्षा करेंगे, किंतु उनका कार्य समाप्त हो गया होगा। सर्वोत्तम चीज़ जो वे कर सकते हैं, वह है पृथ्वी पर मेरी उपस्थिति की परिस्थितियों पर चिंतन करना। उस समय मैं उन लोगों पर आपदा लाना शुरू कर दूँगा, जो विपदा से पीड़ित होंगे; फिर भी हर कोई विश्वास करता है कि मैं एक धार्मिक परमेश्वर हूँ। मैं निश्चित रूप से उन वफ़ादार सेवा-कर्मियों को दंडित नहीं करूँगा, बल्कि उन्हें केवल अपना अनुग्रह प्राप्त करने दूँगा। क्योंकि मैंने कहा है कि मैं सभी दुष्कर्मियों को दंड दूँगा, और कि अच्छे कर्म करने वालों को मेरे द्वारा प्रदान किए जाने वाले भौतिक आनंद मिलेंगे, जो यह प्रदर्शित करता है कि मैं स्वयं धार्मिकता और ईमानदारी का परमेश्वर हूँ।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 120' से उद्धृत

213. हमें विश्वास है कि परमेश्वर जो कुछ प्राप्त करना चाहता है, उसके मार्ग में कोई भी देश या शक्ति ठहर नहीं सकती। जो लोग परमेश्वर के कार्य में बाधा उत्पन्न करते हैं, परमेश्वर के वचन का विरोध करते हैं, और परमेश्वर की योजना में विघ्न डालते और उसे बिगाड़ते हैं, अंततः परमेश्वर द्वारा दंडित किए जाएँगे। जो परमेश्वर के कार्य की अवहेलना करता है, उसे नरक भेजा जाएगा; जो कोई राष्ट्र परमेश्वर के कार्य का विरोध करता है, उसे नष्ट कर दिया जाएगा; जो कोई राष्ट्र परमेश्वर के कार्य को अस्वीकार करने के लिए उठता है, उसे इस पृथ्वी से मिटा दिया जाएगा, और उसका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर संपूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियंता है' से उद्धृत

214. तुझे जानना होगा कि मैं किस प्रकार के लोगों की इच्छा करता हूँ; ऐसे लोग जो अशुद्ध हैं उन्हें राज्य में प्रवेश करने की अनुमति नहीं है, ऐसे लोग जो अशुद्ध हैं उन्हें पवित्र भूमि को गंदा करने की अनुमति नहीं है। भले ही तूने अधिक कार्य किया हो, और कई सालों तक कार्य किया हो, फिर भी अन्त में तू दुखदाई रूप से मैला है—यह स्वर्ग की व्यवस्था के लिए असहनीय है कि तू मेरे राज्य में प्रवेश करने की कामना करता है! संसार की स्थापना से लेकर आज तक, मैंने कभी भी उन लोगों को अपने राज्य में आसान प्रवेश नहीं दिया है जो अनुग्रह पाने के लिए मेरी खुशामद करते हैं। यह स्वर्गीय नियम है, और इसे कोई तोड़ नहीं सकता है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सफलता या असफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है' से उद्धृत

215. मैं प्रत्येक व्यक्ति की मंज़िल उसकी आयु, वरिष्ठता, पीड़ा की मात्रा के आधार पर नहीं और जिस हद तक वे दया आकर्षित करते हैं उस पर तो बिल्कल भी नहीं बल्कि इस बात के अनुसार तय करता हूँ कि वे सत्य को धारण करते हैं या नहीं। इसे छोड़कर अन्य कोई विकल्प नहीं है। तुम्हें यह अवश्य समझना चाहिए कि वे सब जो परमेश्वर की इच्छा का अनुसरण नहीं करते हैं, दण्डित किए जाएँगे। यह एक अडिग तथ्य है। इसलिए, वे सब जो दण्ड पाते हैं, वे परमेश्वर की धार्मिकता के कारण और अपने अनगिनत बुरे कार्यों के प्रतिफल के रूप में इस तरह से दण्ड पाते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अपनी मंज़िल के लिए पर्याप्त संख्या में अच्छे कर्मों की तैयारी करो' से उद्धृत

216. मेरी दया उन पर व्यक्त होती है जो मुझसे प्रेम करते हैं और अपने आपको नकारते हैं। दुष्टों को मिला दण्ड निश्चित रूप से मेरे धार्मिक स्वभाव का प्रमाण है, और उससे भी बढ़कर, मेरे क्रोध का साक्षी है। जब आपदा आएगी, तो उन सभी पर अकाल और महामारी आ पड़ेगी जो मेरा विरोध करते हैं और वे विलाप करेंगे। जो लोग सभी तरह की दुष्टता कर चुके हैं, किन्तु जिन्होंने बहुत वर्षों तक मेरा अनुसरण किया है, वे अपने पापों का फल भुगतने से नहीं बचेंगे; वे भी युगों-युगों तक कदाचित ही देखी गई आपदा में पड़ते हुए, लगातार आंतक और भय की स्थिति में जीते रहेंगे। केवल मेरे ऐसे अनुयायी जिन्होंने मेरे प्रति निष्ठा दर्शायी है मेरी सामर्थ्य का आनंद लेंगे और तालियाँ बजाएँगे। वे अवर्णनीय संतुष्टि का अनुभव करेंगे और ऐसे आनंद में रहेंगे जो मैंने पहले कभी मानवजाति को प्रदान नहीं किया है। क्योंकि मैं मनुष्यों के अच्छे कर्मों को सँजोए रखता हूँ और उनके बुरे कर्मों से घृणा करता हूँ। जबसे मैंने सबसे पहले मानवजाति की अगुवाई करनी आरंभ की, तब से मैं उत्सुकतापूर्वक मनुष्यों के ऐसे समूह को प्राप्त करने की आशा करता आ रहा हूँ जो मेरे साथ एक से मन वाले हों। मैं उन लोगों को नहीं भूला हूँ जो मेरे साथ एक से मन वाले नहीं हैं; केवल उन्हें अपना प्रतिफल देने के अवसर की प्रतीक्षा करते हुए, जिसे देखना मुझे आनंद देगा, मैंने उन्हें अपने हृदय में घृणा के साथ धारण किया हुआ है। अंततः आज मेरा दिन आ गया है, और मुझे अब और प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अपनी मंज़िल के लिए पर्याप्त संख्या में अच्छे कर्मों की तैयारी करो' से उद्धृत

217. मैं मानवीय संसार के इन अन्यायों को सही करूँगा। मैं अपने लोगों को फिर से नुकसान पहुँचाने से शैतान को रोकते हुए, शत्रु को पुनः जो चाहे वह करने से रोकते हुए, पूरे संसार में अपने स्वयं के हाथों से अपना कार्य करूँगा। मैं अपने सभी शत्रुओं को ज़मीन पर गिराते हुए और अपने सामने उनसे उनके अपराधों को अंगीकार करवाते हुए, पृथ्वी पर राजा बन जाऊँगा और वहाँ अपना सिंहासन ले जाऊँगा। अपने दुःख में, जिसमें क्रोध मिश्रित है, मैं किसी को नहीं छोड़ते हुए, और अपने शत्रुओं को भयभीत करते हुए समस्त विश्व को कुचल कर समतल कर दूँगा। मैं इस पृथ्वी को खण्डहर में बदल दूँगा, और अपने शत्रुओं को खण्डहर में गिरा दूँगा, ताकि अब से वे मानवजाति को अब और भ्रष्ट नहीं कर सकें। मेरी योजना पहले से ही निर्धारित है, और कोई भी, चाहे वह कोई भी हो, इसे बदलने में समर्थ नहीं होगा। जब मैं ब्रह्माण्ड के ऊपर प्रतापी ठाट-बाट के साथ चलूँगा, तो समस्त मानवजाति नए सिरे से बन जाएगी, और हर चीज़ पुनर्जीवित हो जाएगी। मनुष्य अब और नहीं रोएगा, और सहायता के लिए अब और मेरी दोहाई नहीं देगा। तब मेरा हृदय आनन्दित होगा, और लोग उत्सव मनाते हुए मेरे पास लौटेंगे। पूरा विश्व, ऊपर से नीचे तक, हर्षोल्लास में झूमेगा ...

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन' के 'अध्याय 27' से उद्धृत

218. सिय्योन! ख़ुशी मनाओ! सिय्योन! गाओ-बजाओ! मैं जीतकर लौटा हूँ, मैं विजयी होकर लौटा हूँ! सभी लोगो! जल्दी से सही ढंग से पंक्तिबद्ध हो जाओ! सृष्टि की सभी चीज़ो! अब रुक जाओ, क्योंकि मेरा व्यक्तित्व पूरे ब्रह्मांड के सामने है और दुनिया के पूर्व में प्रकट हो रहा है! कौन आराधना में घुटने नहीं टेकने का साहस करता है? कौन मुझे सच्चा परमेश्वर नहीं कहने का साहस करता है? कौन श्रद्धा से नहीं देखने का साहस करता है? कौन स्तुति नहीं करने का साहस करता है? कौन ख़ुशी नहीं मनाने का साहस करता है? मेरे लोग मेरी आवाज सुनेंगे, और मेरे पुत्र मेरे राज्य में जीवित रहेंगे! पर्वत, नदियाँ और सभी चीज़ें निरंतर जयजयकार करेंगी, और बिना रुके छलाँग लगाएँगी। इस समय कोई पीछे हटने का साहस नहीं करेगा, और कोई भी प्रतिरोध में उठने का साहस नहीं करेगा। यह मेरा अद्भुत कर्म है, और इससे भी बढ़कर, यह मेरा महान सामर्थ्य है! मैं अपने आपको सबसे उनके हृदयों में सम्मानित करवाऊँगा और इससे भी बढ़कर, मैं सबसे अपनी स्तुति करवाऊँगा। यह मेरी छह हजार वर्षीय प्रबंधन योजना का अंतिम उद्देश्य है, और यही मैंने नियत किया है। एक भी व्यक्ति, वस्तु या घटना मेरे प्रतिरोध में उठने या मेरा विरोध करने का साहस नहीं करती। मेरे सभी लोग मेरे पर्वत पर (दूसरे शब्दों में, उस दुनिया में, जिसे मैं बाद में बनाऊँगा) चले जाएँगे और वे मेरे सामने समर्पण करेंगे, क्योंकि मुझमें प्रताप और न्याय है, और मैं अधिकार रखता हूँ। (इसका आशय तब से है, जब मैं शरीर में होता हूँ। मेरे पास देह में भी अधिकार है, किंतु चूँकि देह में समय और स्थान की सीमाओं का अतिक्रमण नहीं किया जा सकता, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि मैंने पूरी महिमा प्राप्त कर ली है। यद्यपि मैं देह में ज्येष्ठ पुत्रों को प्राप्त करता हूँ, फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि मैंने महिमा प्राप्त कर ली है। केवल जब मैं सिय्योन लौटूँगा और अपना रूप बदलूँगा, तभी यह कहा जा सकेगा कि मैं अधिकार रखता हूँ—अर्थात् यह कि मैंने महिमा प्राप्त कर ली है।) मेरे लिए कुछ भी मुश्किल नहीं होगा। मेरे मुँह के वचनों से सब नष्ट हो जाएँगे, और मेरे मुँह के वचनों से सब अस्तित्व में आ जाएँगे और पूर्ण बनाए जाएँगे। ऐसा महान मेरा सामर्थ्य है और ऐसा मेरा अधिकार है। चूँकि मैं सामर्थ्य से भरपूर और अधिकार से परिपूर्ण हूँ, इसलिए कोई व्यक्ति मुझे बाधित करने का साहस नहीं कर सकता। मैंने पहले ही हर चीज़ पर विजय प्राप्त कर ली है, और मैंने विद्रोह के सभी पुत्रों पर जीत हासिल कर ली है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 120' से उद्धृत

219. परमेश्वर के सार एवं स्वभाव में कुछ ऐसा है जिसे बड़ी आसानी से अनदेखा किया जा सकता है, ऐसी चीज़ जो केवल परमेश्वर के द्वारा ही धारण की जाती है और किसी व्यक्ति के द्वारा नहीं, उन लोगों समेत जिनके विषय में अन्य लोग सोचते हैं कि वे महान लोग, एवं अच्छे लोग हैं, या उनकी कल्पना का परमेश्वर है। यह चीज़ क्या है? यह परमेश्वर की निःस्वार्थता है। निःस्वार्थता के बारे में बोलते समय, शायद तुम सोचते हो कि तुम भी बहुत निःस्वार्थ हो, क्योंकि जब तुम्हारे बच्चों की बात आती है, तो तुम उनके साथ कभी मोलभाव नहीं करते हो और तुम उनके प्रति उदार होते हो, या तुम सोचते हो कि तुम तब भी बहुत निःस्वार्थ हो जब तुम्हारे माता पिता की बात आती है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि तुम क्या सोचते हो, कम से कम तुम्हारे पास "निःस्वार्थ" शब्द की एक अवधारणा तो है और तुम इसे एक सकारात्मक शब्द के रूप में सोचते हो, और ऐसा निःस्वार्थ व्यक्ति होना बहुत ही श्रेष्ठ है। जब तुम निःस्वार्थ होते हो, तो तुम सोचते हो कि तुम महान हो। परन्तु ऐसा कोई नहीं है जो सभी चीज़ों के मध्य, सभी लोगों, घटनाओं, एवं वस्तुओं के मध्य, और परमेश्वर के कार्य के जरिए परमेश्वर की निःस्वार्थता को देख सके। ऐसी स्थिति क्यों है? क्योंकि मनुष्य बहुत स्वार्थी है! मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? मानवजाति एक भौतिक संसार में रहती है। शायद तुम परमेश्वर का अनुसरण करते हो, किन्तु तुम कभी देखते नहीं या तारीफ नहीं करते हो कि किस प्रकार परमेश्वर तुम्हारी आपूर्ति करता है, तुम्हें प्रेम करता है, और तुम्हारे लिए चिन्ता दिखाता है। अतः तुम क्या देखते हो? तुम अपने खून के रिश्तेदारों को देखते हो जो तुम्हें प्रेम करते हैं या तुम्हें बहुत स्नेह करते हैं। तुम उन चीज़ों को देखते हो जो तुम्हारी देह के लिए लाभकारी हैं, तुम उन लोगों एवं चीज़ों के विषय में परवाह करते हो जिनसे तुम प्रेम करते हो। यह मनुष्य की तथाकथित निःस्वार्थता है। फिर भी ऐसे "निःस्वार्थ" लोग कभी भी उस परमेश्वर के विषय में परवाह नहीं करते हैं जो उन्हें जीवन देता है। परमेश्वर के विपरीत, मनुष्य की निःस्वार्थता मतलबी एवं निन्दनीय हो जाती है। वह निःस्वार्थता जिसमें मनुष्य विश्वास करता है वह खोखली एवं अवास्तविक, मिलावटी, परमेश्वर से असंगत, एवं परमेश्वर से असम्बद्ध है। मनुष्य की निःस्वार्थता सिर्फ उसके लिए है, जबकि परमेश्वर की निःस्वार्थता उसके सार का एक सच्चा प्रकाशन है। यह बिलकुल परमेश्वर की निःस्वार्थता की वजह से है कि मनुष्य उससे आपूर्ति की एक सतत धारा प्राप्त करता है। तुम लोग शायद इस विषय से, जिसके बारे में आज मैं बात कर रहा हूँ, अत्यंत गहराई से प्रभावित न हो और मात्र सहमति में सिर हिला रहे हो, परन्तु जब तुम अपने हृदय में परमेश्वर के हृदय की सराहना करने की कोशिश करते हो, तो तुम अनजाने में ही जान जाओगे: सभी लोगों, मुद्दों एवं चीज़ों के मध्य जिन्हें तुम इस संसार में महसूस कर सकते हो, केवल परमेश्वर की निःस्वार्थता ही वास्तविक एवं ठोस है, क्योंकि सिर्फ परमेश्वर का प्रेम ही तुम्हारे लिए बिना किसी शर्त के है और बेदाग है। परमेश्वर के अतिरिक्त, किसी भी व्यक्ति की तथाकथित निःस्वार्थता पूरी तरह से झूठी, ऊपरी एवं कपटपूर्ण है; इसका एक उद्देश्य, एवं इसके निश्चित इरादे हैं, यह एक समझौते को लिए हुए है, और परीक्षा लिए जाने पर स्थिर नहीं रह सकता है। तुम लोग यह भी कह सकते हो कि यह गन्दा, एवं घिनौना है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I' से उद्धृत

220. परमेश्वर ने मानवजाति की सृष्टि की; इसकी परवाह किये बगैर कि उन्हें भ्रष्ट किया गया है या नहीं या वे उसका अनुसरण करते है या नहीं करते, परमेश्वर मनुष्य से अपने सबसे अधिक दुलारे प्रियजनों के समान व्यवहार करता है—या जैसा मानव कहेंगे, ऐसे लोग जो उसके लिए अतिप्रिय हैं—और उसके खिलौने नहीं हैं। हालाँकि परमेश्वर कहता है कि वह सृष्टिकर्ता है और मनुष्य उसकी सृष्टि है, जो सुनने में ऐसा लग सकता है कि यहाँ पद में थोड़ा अन्तर है, फिर भी वास्तविकता यह है कि जो कुछ भी परमेश्वर ने मानवजाति के लिए किया है वह इस प्रकार के रिश्ते से कहीं बढ़कर है। परमेश्वर मानवजाति से प्रेम करता है, मानवजाति की देखभाल करता है, मानवजाति के लिए चिन्ता दिखाता है, इसके साथ ही साथ लगातार और बिना रुके मानवजाति की आपूर्ति करता है। वह कभी अपने हृदय में यह महसूस नहीं करता है कि यह एक अतिरिक्त कार्य है या कुछ ऐसा है जो ढेर सारे श्रेय के लायक है। न ही वह यह महसूस करता है कि मानवता को बचाना, उनकी आपूर्ति करना, और उन्हें सबकुछ देना, मानवजाति के लिए एक बहुत बड़ा योगदान देना है। अपने स्वयं के तरीके से और अपने स्वयं के सार और जो वह है उसके माध्यम से, वह बस खामोशी से एवं चुपचाप मानवजाति के लिए प्रदान करता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि मानवजाति उससे कितने प्रयोजन एवं कितनी सहायता प्राप्त करती है, क्योंकि परमेश्वर इसके बारे में कभी नहीं सोचता है या न ही श्रेय लेने की कोशिश करता है। यह परमेश्वर के सार के द्वारा निर्धारित होता है, और साथ ही यह परमेश्वर के स्वभाव की बिलकुल सही अभिव्यक्ति भी है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I' से उद्धृत

221. परमेश्वर ने मनुष्य को तुच्छ जाना था क्योंकि मनुष्य उसके प्रति शत्रुतापूर्ण था, लेकिन उसके हृदय में, मानवता के लिए उसकी देखभाल, चिंता एवं दया अपरिवर्तनीय बनी रही। यहाँ तक कि जब उसने मानवजाति का नाश किया, उसका हृदय अपरिवर्तनीय बना रहा। जब मानवता परमेश्वर के प्रति एक गंभीर हद तक भ्रष्टता एवं अवज्ञाकारिता से भर गई थी, परमेश्वर को अपने स्वभाव एवं अपने सार के कारण, और अपने सिद्धान्तों के अनुसार इस मानवता का विनाश करना पड़ा था। लेकिन परमेश्वर के सार के कारण, उसने तब भी मानवजाति पर दया की, और यहाँ तक कि वह मानवजाति को छुड़ाने के लिए विभिन्न तरीकों का उपयोग करना चाहता था ताकि वे निरन्तर जीवित रह सकें। इसके बदले में, मनुष्य ने परमेश्वर का विरोध किया, निरन्तर परमेश्वर की अनाज्ञाकारिता करता रहा, और परमेश्वर के उद्धार को स्वीकार करने से इंकार किया, अर्थात्, उसके अच्छे इरादों को स्वीकार करने से इंकार किया। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि परमेश्वर ने उन्हें कैसे पुकारा, उन्हें कैसे स्मरण दिलाया, कैसे उनकी आपूर्ति की, कैसे उनकी सहायता की, या कैसे उनको सहन किया, क्योंकि मनुष्य ने न तो इसे समझा न सराहा, न ही उन्होंने कुछ ध्यान दिया। अपनी पीड़ा में, परमेश्वर अब भी मनुष्य को अपनी सर्वाधिक सहनशीलता देना नहीं भूला था, वह मनुष्य के वापस मुड़ने का इन्तज़ार कर रहा था। अपनी सीमा पर पहुँचने के पश्चात्, उसने वह किया जो उसे बिना किसी हिचकिचाहट के करना था। दूसरे शब्दों में, उस घड़ी से जब से परमेश्वर ने मानवजाति का विनाश करने की योजना बनायी तब से उसके मानवजाति के विनाश के अपने कार्य की आधिकारिक शुरुआत करने तक, वहाँ एक विशेष समय अवधि एवं प्रक्रिया थी। यह प्रक्रिया मनुष्य को पीछे मुड़ने के योग्य बनाने के उद्देश्य के लिए अस्तित्व में थी, और यह वह आख़िरी मौका था जो परमेश्वर ने मनुष्य को दिया था। अतः परमेश्वर ने मानवजाति का विनाश करने से पहले इस अवधि में क्या किया था? परमेश्वर ने प्रचुर मात्रा में स्मरण दिलाने एवं उत्साहवर्धन करने का कार्य किया था। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि परमेश्वर का हृदय कितनी पीड़ा एवं दुःख में था, उसने मानवता पर अपनी देखभाल, चिंता और अत्यंत दया का अभ्यास करना जारी रखा। हम इससे क्या देखते हैं? बेशक, हम देखते हैं कि मानवजाति के लिए परमेश्वर का प्रेम वास्तविक है और कोई ऐसी चीज़ नहीं जिसके प्रति वह दिखावा कर रहा है। यह वास्तविक, स्‍पर्शगम्‍य एवं प्रशंसनीय है, जाली, मिलावटी, झूठा या कपटपूर्ण नहीं है। परमेश्वर कभी किसी छल का उपयोग नहीं करता है या झूठी तस्वीरें नहीं बनाता है कि लोगों को यह दिखाए कि वह कितना प्रेमयोग्य है। वह लोगों को अपनी मनोहरता दिखाने के लिए, या अपनी मनोहरता एवं पवित्रता के दिखावे के लिए झूठी गवाही का उपयोग नहीं करता है। क्या परमेश्वर के स्वभाव के ये पहलू मनुष्य के प्रेम के लायक नहीं हैं? क्या वे आराधना के योग्य नहीं हैं? क्या वे संजोकर रखने के योग्य नहीं हैं? इस बिन्दु पर, मैं तुम लोगों से पूछना चाहता हूँ: इन शब्दों को सुनने के बाद, क्या तुम लोग सोचते हो कि परमेश्वर की महानता कागज के टुकड़ों पर लिखे गए मात्र शब्द हैं? क्या परमेश्वर की मनोहरता केवल खोखले शब्द ही हैं? नहीं! बिलकुल भी नही! परमेश्वर की सर्वोच्चता, महानता, पवित्रता, सहनशीलता, प्रेम, इत्यादि—परमेश्वर के स्वभाव एवं सार के इन सब विभिन्न पहलुओं के हर विवरण को हर उस समय लागू किया जाता है जब वह अपना कार्य करता है, मनुष्य के प्रति उसकी इच्छा में मूर्त रूप दिया जाता है, और प्रत्येक व्यक्ति पर पूरा एवं प्रतिबिम्बित किया जाता है। इसकी परवाह किए बगैर कि तुमने इसे पहले महसूस किया है या नहीं, परमेश्वर हर संभव तरीके से प्रत्येक व्यक्ति की देखभाल कर रहा है, प्रत्येक व्यक्ति के हृदय को स्नेह देने, और प्रत्येक व्यक्ति के आत्मा को जगाने के लिए अपने निष्कपट हृदय, बुद्धि एवं विभिन्न तरीकों का उपयोग कर रहा है। यह एक निर्विवादित तथ्य है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I' से उद्धृत

222. परमेश्वर अपने मनुष्य-जाति के प्रबन्धन, और अपने मनुष्य-जाति के उद्धार की इस घटना को किसी भी अन्य चीज़ से कहीं ज़्यादा महत्पूर्ण के रूप में विचार करता है। वह इन चीज़ों को केवल अपने मस्तिष्क से नहीं करता है, और न ही उसे अपने वचनों से करता है, और वह विशेष रूप से इन चीज़ों को यूँ ही नहीं करता है—वह इन सभी चीज़ों को एक योजना के साथ, एक लक्ष्य के साथ, एक मानक के साथ, और अपनी इच्छा के साथ करता है। यह स्पष्ट है कि मनुष्यजाति को बचाने का यह कार्य परमेश्वर और मनुष्य दोनों के लिए बड़ा महत्व रखता है। वह कार्य चाहे कितना ही कठिन क्यों न हो, बाधाएँ कितनी ही बड़ी क्यों न हों, मनुष्य चाहे कितने ही कमज़ोर क्यों न हों, या मनुष्य-जाति की विद्रोहशीलता चाहे कितनी ही गहरी क्यों न हो, इसमें से कुछ भी परमेश्वर के लिए कठिन नहीं हैं। अपने परिश्रमी प्रयास व्यय करते हुए और जिस कार्य को वह स्वयं कार्यान्वित करना चाहता है उसका प्रबन्धन करते हुए, परमेश्वर अपने आप को व्यस्त रखता है। वह सभी चीज़ों की व्यवस्था भी कर रहा है, और सभी लोगों पर और उस कार्य पर जिसे वह पूर्ण करना चाहता है शासन कर रहा है—इसमें से कुछ भी पहले नहीं किया गया है। यह पहली बार है कि परमेश्वर ने इन पद्धतियों का उपयोग किया है और मनुष्यजाति को बचाने और उसका प्रबन्धन करने की मुख्य परियोजना के लिए एक बड़ी कीमत चुकाई। जब परमेश्वर इस कार्य को कार्यान्वित कर रहा होता है, तो वह थोड़ा-थोड़ा करके बिना छिपाव के मनुष्यों के सामने अपने मेहनती प्रयास को, अपने स्वरूप को, अपनी बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता को, और अपने स्वभाव के हर एक पहलू को मनुष्य-जाति के लिए व्यक्त और जारी कर रहा होता है। वह इन चीज़ों को उस तरह से जारी और व्यक्त करता है जैसे उसने पहले कभी भी नहीं किया है। इसलिए, पूरे विश्व में, परमेश्वर जिन लोगों को बचाने और जिनका प्रबन्धन करने का उद्देश्य रखता है उनके अलावा, कोई भी प्राणी परमेश्वर के इतना करीब नहीं रहा है, जिसका उसके साथ इतना अंतरंग रिश्ता हो। अपने हृदय में, जिस मनुष्यजाति का वह प्रबन्धन और उद्धार करना चाहता है, वह सबसे महत्वपूर्ण है, और वह इस मनुष्यजाति को अन्य सभी से अधिक मूल्य देता है; भले ही उसने उनके लिए एक बड़ी कीमत चुकाई है, और भले ही उनके द्वारा उसे लगातार ठेस पहुँचाई जाती है और उसकी अवज्ञा की जाती है, फिर भी वह उन्हें कभी भी नहीं त्यागता है और लगातार अथक रूप से बिना कोई शिकायत या पछतावे के अपने कार्य में लगा रहता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि वह जानता है कि आज नहीं तो कल मनुष्य एक न एक दिन उसके बुलावे के प्रति जागरूक हो जाएँगे और उस के वचनों से प्रेरित हो जाएँगे, और पहचान जाएँगे कि वही सृष्टि का प्रभु है, और उस की ओर लौट जाएँगे ...

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

223. मानव जाति के कार्य के लिए परमेश्वर ने बहुत सारी रातों को बिना नींद के गुजारना सहन किया है। बहुत ऊपर से सबसे नीची गहराई तक, जीवित नरक में जहाँ मनुष्य रहता है, वह मनुष्य के साथ अपने दिन गुजारने के लिए उतर आया है, कभी भी मनुष्य के बीच फटेहाली की शिकायत नहीं की है, उसकी अवज्ञा के लिए कभी भी मनुष्य को तिरस्कृत नहीं किया है, बल्कि वह व्यक्तिगत रूप से अपने कार्य को करते हुए सबसे बड़ा अपमान सहन करता है। परमेश्वर कैसे नरक से संबंधित हो सकता है? वह नरक में अपना जीवन कैसे बिता सकता है? लेकिन समस्त मानव जाति के लिए, पूरी मानवजाति को जल्द ही आराम मिल सके इसके लिए, उसने अपमान को सहन किया और पृथ्वी पर आने के अन्याय का सामना किया, और मनुष्य को बचाने की खातिर व्यक्तिगत रूप से "नरक" और "अधोलोक" में, बाघ की माँद में, प्रवेश किया। परमेश्वर का विरोध करने के लिए मनुष्य कैसे योग्य हो सकता है? परमेश्वर के बारे में शिकायत करने के लिए उसके पास क्या कारण है? कैसे वह परमेश्वर की ओर नज़र उठाकर देखने की हिम्मत कर सकता है? स्वर्ग का परमेश्वर बुराई की इस सबसे गंदी भूमि में आया है, और कभी भी उसने अपने कष्टों के बारे में शिकायत नहीं की है, या मनुष्य के बारे में गिला नहीं किया है, बल्कि वह चुपचाप मनुष्य द्वारा किये गए विनाश[1] और अत्याचार को स्वीकार करता है। कभी भी उसने मनुष्य की अनुचित मांगों का प्रतिकार नहीं किया, कभी भी उसने मनुष्य से अत्यधिक मांगें नहीं की, और कभी भी उसने मनुष्य से ग़ैरवाजिब तकाज़े नहीं किये; वह केवल बिना किसी शिकायत के मनुष्य द्वारा अपेक्षित सभी कार्य करता है: शिक्षा देना, ज्ञान प्रदान करना, डाँटना-फटकारना, शब्दों का परिशोधन करना, याद दिलाना, प्रोत्साहन देना, सांत्वना देना, न्याय करना, और प्रकट करना। उसका कौन-सा कदम मनुष्य के जीवन की खातिर नहीं है? यद्यपि उसने मनुष्यों की संभावनाओं और प्रारब्ध को हटा दिया है, परमेश्वर द्वारा उठाया गया कौन-सा कदम मनुष्य के भाग्य के लिए नहीं रहा हैं? उनमें से कौन-सा मनुष्य के अस्तित्व के लिए नहीं रहा है? उनमें से कौन-सा कदम रात की तरह काली अँधेरी ताकतों के इस उत्पीड़न से और अत्याचार से मनुष्य को मुक्त करने के लिए नहीं रहा है? उनमें से कौन-सा मनुष्य की खातिर नहीं है? परमेश्वर के हृदय को कौन समझ सकता है, जो एक प्रेमपूर्ण मां की तरह है? कौन परमेश्वर के उत्सुक हृदय को समझ सकता है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (9)' से उद्धृत

224. जब परमेश्वर पृथ्वी पर आया, तो वह संसार का नहीं था, और संसार का सुख भोगने के लिए वह देह नहीं बना था। जिस स्थान पर कार्य करना सबसे अच्छी तरह से उसके स्वभाव को प्रकट करता और जो सबसे अर्थपूर्ण होता, वह वही स्थान है, जहाँ वह पैदा हुआ। चाहे वह स्थल पवित्र हो या गंदा, और चाहे वह कहीं भी काम करे, वह पवित्र है। दुनिया में हर चीज़ उसके द्वारा बनाई गई थी, हालाँकि शैतान ने सब-कुछ भ्रष्ट कर दिया है। फिर भी, सभी चीजें अभी भी उसकी हैं; वे सभी चीजें उसके हाथों में हैं। वह अपनी पवित्रता प्रकट करने के लिए एक गंदे देश में आता है और वहाँ कार्य करता है; वह केवल अपने कार्य के लिए ऐसा करता है, अर्थात् वह इस दूषित भूमि के लोगों को बचाने के लिए ऐसा कार्य करने में बहुत अपमान सहता है। यह पूरी मानवजाति की खातिर, गवाही के लिए किया जाता है। ऐसा कार्य लोगों को परमेश्वर की धार्मिकता दिखाता है, और वह परमेश्वर की सर्वोच्चता प्रदर्शित करने में अधिक सक्षम है। उसकी महानता और शुचिता उन नीच लोगों के एक समूह के उद्धार के माध्यम से व्यक्त होती है, जिनका अन्य लोग तिरस्कार करते हैं। एक मलिन भूमि में पैदा होना यह बिलकुल साबित नहीं करता कि वह दीन-हीन है; यह तो केवल सारी सृष्टि को उसकी महानता और मानवजाति के लिए उसका सच्चा प्यार दिखाता है। जितना अधिक वह ऐसा करता है, उतना ही अधिक यह मनुष्य के लिए उसके शुद्ध प्रेम, उसके दोषरहित प्रेम को प्रकट करता है। परमेश्वर पवित्र और धर्मी है। यद्यपि वह एक गंदी भूमि में पैदा हुआ था, और यद्यपि वह उन लोगों के साथ रहता है जो गंदगी से भरे हुए हैं, ठीक वैसे ही जैसे यीशु अनुग्रह के युग में पापियों के साथ रहता था, फिर भी क्या उसका हर कार्य संपूर्ण मानवजाति के अस्तित्व की खातिर नहीं किया जाता? क्या यह सब इसलिए नहीं है कि मानवजाति महान उद्धार प्राप्त कर सके? दो हजार साल पहले वह कई वर्षों तक पापियों के साथ रहा। वह छुटकारे के लिए था। आज वह गंदे, नीच लोगों के एक समूह के साथ रह रहा है। यह उद्धार के लिए है। क्या उसका सारा कार्य तुम मनुष्यों के लिए नहीं है? यदि यह मानवजाति को बचाने के लिए न होता, तो क्यों वह एक नाँद में पैदा होने के बाद कई सालों तक पापियों के साथ रहता और कष्ट उठाता? और यदि यह मानवजाति को बचाने के लिए न होता, तो क्यों वह दूसरी बार देह में लौटकर आता, इस देश में पैदा होता जहाँ दुष्ट आत्माएँ इकट्ठी होती हैं, और इन लोगों के साथ रहता जिन्हें शैतान ने गहराई से भष्ट कर रखा है? क्या परमेश्वर वफ़ादार नहीं है? उसके कार्य का कौन-सा भाग मानवजाति के लिए नहीं रहा है? कौन-सा भाग तुम लोगों की नियति के लिए नहीं रहा है? परमेश्वर पवित्र है—यह अपरिवर्तनीय है। वह गंदगी से प्रदूषित नहीं है, हालाँकि वह एक गंदे देश में आया है; इस सबका मतलब केवल यह हो सकता है कि मानवजाति के लिए परमेश्वर का प्रेम अत्यंत निस्वार्थ है और जो पीड़ा और अपमान वह सहता है, वह अत्यधिक है! क्या तुम लोग यह नहीं जानते कि वह तुम सभी के लिए, और तुम लोगों की नियति के लिए जो अपमान वह सहता है, वह कितना बड़ा है? वह बड़े लोगों या अमीर और शक्तिशाली परिवारों के पुत्रों को बचाने के बजाय विशेष रूप से उनको बचाता है, जो दीन-हीन हैं और नीची निगाह से देखे जाते हैं। क्या यह सब उसकी पवित्रता नहीं है? क्या यह सब उसकी धार्मिकता नहीं है? समस्त मानवजाति के अस्तित्व के लिए वह एक दूषित भूमि में पैदा होगा और हर अपमान सहेगा। परमेश्वर बहुत वास्तविक है—वह कोई मिथ्या कार्य नहीं करता। क्या उसके कार्य का हर चरण इतने व्यावहारिक रूप से नहीं किया गया है? यद्यपि सब लोग उसकी निंदा करते हैं और कहते हैं कि वह पापियों के साथ मेज पर बैठता है, यद्यपि सब लोग उसका मज़ाक उड़ाते हैं और कहते हैं कि वह गंदगी के पुत्रों के साथ रहता है, कि वह सबसे अधम लोगों के साथ रहता है, फिर भी वह निस्वार्थ रूप से अपने आपको समर्पित करता है, और वह अभी भी मानवजाति के बीच इस तरह नकारा जाता है। क्या जो कष्ट वह सहता है, वह तुम लोगों के कष्टों से बड़ा नहीं है? क्या जो कार्य वह करता है, वह तुम लोगों द्वारा चुकाई गई कीमत से ज्यादा नहीं है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मोआब के वंशजों को बचाने का अर्थ' से उद्धृत

225. परमेश्वर ने इन अशुद्ध और भ्रष्ट लोगों में कार्य करने और इस समूह के लोगों को पूर्ण बनाने के लिए इस स्तर तक स्वयं को दीन किया है। परमेश्वर लोगों के मध्य जीने और खाने-पीने, वह लोगों की चरवाही करने, और लोगों की आवश्यकता को पूरा करने के लिए ही देह में नहीं आया। अधिक महत्वपूर्ण यह है कि वह उद्धार और जीतने का विशाल कार्य इन असहनीय रूप से भ्रष्ट लोगों पर करता है। वह इन सबसे अधिक भ्रष्ट लोगों को बचाने के लिए बड़े लाल अजगर के केन्द्र में आया, जिससे सभी लोग परिवर्तित हो सकें और नए बनाए जा सकें। वह अत्यधिक कष्ट, जो परमेश्वर सहन करता है, यह मात्र वह कष्ट नहीं है जो देहधारी परमेश्वर सहन करता है, परन्तु मुख्यतः यह वह अत्यधिक निरादर है जो परमेश्वर का आत्मा सहन करता है—वह स्वयं को इतना अधिक दीन करता है और छिपाए रखता है कि वह एक साधारण व्यक्ति बन जाता है। परमेश्वर ने देहधारण किया और देह का रूप ले लिया था ताकि लोग देखें कि उसका जीवन एक साधारण मानव-जीवन है, और उसकी साधारण मानवीय आवश्यकताएँ भी हैं। यह इस बात को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त है कि परमेश्वर ने स्वयं को हद से ज़्यादा दीन किया है। परमेश्वर का आत्मा देह में साकार होता है। उसका आत्मा सर्वोच्च और महान है, परन्तु फिर भी वह अपने आत्मा का कार्य करने के लिए एक सामान्य मानव, तुच्छ मनुष्य का रूप ले लेता है। तुम में से प्रत्येक व्यक्ति की क्षमता, अंतर्दृष्टि, समझ, मानवता और जीवन दर्शाते हैं कि तुम सब परमेश्वर के इस प्रकार के कार्य को स्वीकार करने के लिए वास्तव में अयोग्य हो। तुम सब परमेश्वर द्वारा तुम्हारे लिए इस कष्ट को सहन किए जाने के लिए वास्तव में अयोग्य हो। परमेश्वर अत्यधिक महान है। वह इतना सर्वोच्च है और लोग बहुत नीच हैं, फिर भी वह उन पर कार्य करता है। उसने न केवल इसलिए देहधारण किया कि लोगों की आवश्यकताओं को पूरा करे, लोगों से बात करे, अपितु वह लोगों के साथ रहता भी है। परमेश्वर इतना दीन और इतना प्रेम करने वाला है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मात्र उन्हें ही पूर्ण बनाया जा सकता है जो अभ्यास पर ध्यान देते हैं' से उद्धृत

226. हर चीज़ जो परमेश्वर करता है वह व्यावहारिक है, और वह ऐसा कुछ नहीं करता है जो खोखला हो। परमेश्वर मनुष्यों के मध्य आता है, सामान्य इंसान बनने के लिए स्वयं को दीन-हीन बनाता है। वह मात्र थोड़े-से काम करके, कुछ वचन वचन बोलकर नहीं चला जाता; बल्कि वह मनुष्यों के बीच संसार के दुखों का अनुभव करने वास्तव में आता है। मानवजाति के लिए गंतव्य के बदले में दु:ख सहन करने के अपने अनुभव को कीमत के रूप में चुकाता है। क्या यह व्यावहारिक कार्य नहीं है? माता-पिता अपने बच्चों की लिए एक सच्ची कीमत चुका सकते हैं और यह उनकी नेकनीयती को दर्शाता है। ऐसा करने में, देहधारी परमेश्वर ज़ाहिर तौर पर मानवता के प्रति अत्यधिक ईमानदार और वफादार है। परमेश्वर का सार विश्वसनीय है; जो वह कहता है उसे करता है और जो कुछ भी वह करता है वह पूरा होता है। हर चीज़ जो वह मनुष्य के लिए करता है वो निष्कपट है। वह मात्र कथनों की उक्ति नहीं करता; जब वह कहता है कि वह मूल्य चुकाएगा, तो वह यथार्थ में मूल्य चुकाता है; जब वह कहता है कि वह मनुष्य के दुःख को उठाएगा, तो वह यथार्थ में उनके बीच रहने के लिए आयेगा, व्यक्तिगत रूप से इस दु:ख को महसूस और अनुभव करेगा। उसके बाद, ब्रह्मांड की सभी चीज़ें मानेंगी कि हर चीज़ जो परमेश्वर करता है वह सही और धर्मी है, कि सब कुछ जो परमेश्वर करता है वह वास्तविक है : यह प्रमाण की सामर्थ्यवान मिसाल है। इसके अलावा, भविष्य में मानवजाति के पास एक ख़ूबसूरत मंज़िल होगी और वे सभी जो बचेंगे वे परमेश्वर की प्रशंसा करेंगे; वे बड़ाई करेंगे कि परमेश्वर के कार्य वास्तव में मानवता के लिए उसके प्रेम के कारण किए गए हैं। परमेश्वर की सुन्दरता और अच्छाई के सार को देह में उसके देहधारण के महत्व में देखा जा सकता है। जो कुछ भी वह करता है वह सच्चा है; जो कुछ भी वह कहता है वह गंभीर और विश्वसनीय है। वह जो भी चीज़ें करने का इरादा करता है, उन्हें वास्तव में करता है और मूल्य चुकाते हुए वास्तव में मूल्य चुकाता है; वह महज़ कथनों उक्ति नहीं करता। इसलिए, परमेश्वर एक धर्मी परमेश्वर है; परमेश्वर एक विश्वसनीय परमेश्वर है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'देहधारण के अर्थ का दूसरा पहलू' से उद्धृत

227. जब तुम परमेश्वर के विचारों और मनुष्यजाति के प्रति उसके रवैये को सचमुच में समझने में समर्थ होते हो, और जब तुम सचमुच में प्रत्येक प्राणी के प्रति परमेश्वर की भावनाओं और चिंता को समझ सकते हो, तो तुम सृजनकर्ता के द्वारा सृजित हर एक मनुष्य के ऊपर व्यय की गई लगन और प्रेम को समझने में भी समर्थ हो जाओगे। जब ऐसा होगा, तो तुम परमेश्वर के प्रेम का वर्णन करने के लिए दो शब्दों का उपयोग करोगे—वे दो शब्द क्या हैं? कुछ लोग कहते हैं "निःस्वार्थ," और कुछ लोग कहते हैं "लोकहितैषी।" इन दोनों में "लोकहितैषी" वह शब्द है जो परमेश्वर के प्रेम की व्याख्या करने के लिए सबसे कम उपयुक्त है। यह ऐसा शब्द है जिसे लोग किसी व्यक्ति के उदार विचारों और भावनाओं का वर्णन करने के लिए उपयोग करते हैं। मैं वास्तव में इस शब्द से घृणा करता हूँ, क्योंकि यह यूँ ही, विवेकहीनता से, और सिद्धांतों की परवाह किए बिना उदारता बाँटने की ओर संकेत करता है। यह मूर्ख और भ्रमित लोगों की अति भावनात्मक अभिव्यक्ति है। जब इस शब्द का उपयोग परमेश्वर के प्रेम को प्रदर्शित करने के लिए किया जाता है, तो इसमें अपरिहार्य रूप से एक ईशनिंदा का संकेतार्थ होता है। मेरे पास दो शब्द हैं जो अधिक उचित रूप से परमेश्वर के प्रेम का वर्णन करते हैं—वे दो शब्द क्या हैं? पहला है "विशाल" क्या यह शब्द बहुत उद्बोधक नहीं है? दूसरा है "असीम।" इन दोनों शब्दों के पीछे वास्तविक अर्थ है जिन्हें मैं परमेश्वर के प्रेम को दर्शाने के लिए उपयोग करता हूँ। शब्दशः लेने पर, "विशाल" किसी चीज़ के आयतन और क्षमता का वर्णन करता है, पर वह चीज़ कितनी ही बड़ी क्यों न हो—यह कुछ ऐसी है जिसे लोग छू और देख सकते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि वह अस्तित्व में है, यह कोई अमूर्त पदार्थ नहीं है, और यह लोगों को वह आभास देती है जो अपेक्षाकृत परिशुद्ध और व्यावहारिक होता है। इससे फर्क नहीं पड़ता है कि तुम इसे किसी समतल से देखो या त्रिआयामी कोण से; तुम्हें इसके अस्तित्व की कल्पना करने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह ऐसी चीज़ है जो वास्तव में अस्तित्व में है। यद्यपि परमेश्वर के प्रेम की व्याख्या करने के लिए "विशाल" शब्द का उपयोग करने से ऐसा महसूस होता है कि उसके प्रेम का परिमाण करना है, हालाँकि, यह इस बात का एहसास भी देता है कि परिमाणनीय नहीं है। मैं कहता हूँ कि परमेश्वर के प्रेम का परिमाण किया जा सकता है क्योंकि उसका प्रेम एक प्रकार से अनस्तित्व नहीं है, और न ही वह किसी पौराणिक कथा से निकलता है। बल्कि, यह कुछ ऐसा है जिसे परमेश्वर की अधीनता में सभी प्राणियों के द्वारा साझा किया जाता है, और यह कुछ ऐसा है जिसका आनंद सभी प्राणियों के द्वारा विभिन्न अंशों में और विभिन्न परिप्रेक्ष्यों से लिया जाता है। यद्यपि लोग इसे देख या छू नहीं सकते हैं, फिर भी यह प्रेम सभी चीज़ों के लिए जीवनाधार और जीवन लाता है क्यों कि यह थोड़ा-थोड़ा करके उनकी जिन्दगियों में प्रकट होता है, और वे परमेश्वर के उस प्रेम को गिनते हैं और उसकी गवाही देते हैं जिसका वे हर क्षण आनंद लेते हैं। मैं कहता हूँ कि परमेश्वर का प्रेम अपरिमाणनीय है क्योंकि परमेश्वर का सभी चीज़ों का भरण-पोषण और पालन-पोषण करने का रहस्य कुछ ऐसा है जिसकी थाह पाना मनुष्यजाति के लिए उतना ही कठिन है, जितना कि सभी चीज़ों के लिए परमेश्वर के विचारों की, और विशेष रूप से उन विचारों की जो मनुष्यजाति के लिए हैं। अर्थात्, उस लहू और आसूँओं को कोई नहीं जानता है जो परमेश्वर ने मनुष्यजाति के लिए बहाये हैं। उस मनुष्यजाति के लिए सृजनकर्ता के प्रेम की गहराई और महत्व को कोई नहीं बूझ सकता है, कोई नहीं समझ सकता है, जिसे उसने अपने हाथों से बनाया। परमेश्वर के प्रेम को अपार के रूप में वर्णन करना इसके अस्तित्व के विस्तार और इसकी सच्चाई की सराहना करने और समझने में लोगों की सहायता करना है। यह इसलिए भी है ताकि लोग "सृजनकर्ता" शब्द के वास्तविक अर्थ को अधिक गहराई से समझ सकें, और ताकि लोग संज्ञा "सृष्टि" के सच्चे अर्थ की एक गहरी समझ प्राप्त कर सकें। "असीम" शब्द सामान्यतः किस चीज़ का वर्णन करता है? यह साधारणतः महासागरों या ब्रह्माण्ड के लिए प्रयुक्त होता है, जैसे असीम ब्रह्माण्ड, या असीम महासागर। ब्रह्माण्ड की व्यापकता और शांत गहराई मनुष्य की समझ से परे है, और यह कुछ ऐसा है जो मनुष्य की कल्पनाओं को ऐसा आकर्षित करता है, कि वे उसके प्रति प्रशंसा से भर जाते हैं। उसका रहस्य और उसकी गहराई दृष्टि के तो भीतर हैं किन्तु पहुँच से बाहर हैं। जब तुम महासागर के बारे में सोचते हो, तुम उसके विस्तार के बारे में सोचते हो—तो वह असीम दिखाई देता है, और तुम उसकी रहस्यमयता और उसकी समग्रता को महसूस कर सकते हो। इसीलिए मैंने परमेश्वर के प्रेम का वर्णन करने के लिए "असीम" शब्द का उपयोग किया है। यह लोगों को इस बात को महसूस करने में कि वह कितना बहुमूल्य है, और उसके प्रेम की अगाध सुंदरता को महसूस करने में सहायता करने के लिए है, और यह कि परमेश्वर के प्रेम की ताक़त अनन्त और विस्तृत है। यह उसके प्रेम की पवित्रता, और परमेश्वर की प्रतिष्ठा और उसका अपमान नहीं किए जाने की योग्यता को महसूस करने में उनकी सहायता करता है जो उसके प्रेम के माध्यम से प्रकट होता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

फुटनोट:

1. मानव जाति की अवज्ञा का पर्दाफाश करने के लिए "विनाश" का प्रयोग किया गया है।

क. मूल पाठ में "यह असमर्थ होने का प्रतीक है" लिखा है।

ख. मूल पाठ में "साथ ही अपमान के अयोग्य (और अपमान सहन न करने) होने का भी प्रतीक है" लिखा है।

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