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प्रश्न 1: आप लोगों ने ये गवाही दी है कि जब प्रभु अंत के दिनों में लौटेंगे तब, पहले वो देहधारण करके गुप्त रूप में आएंगे, और विजेताओं का समूह बनाने के बाद, प्रत्यक्ष रूप से लोगों के सामने प्रकट होने के लिए बादलों के साथ अवतरित होंगे। ऐसा संवाद कुछ मतलब रखता है। परंतु 2000 सालों से, प्रभु में आस्था रखने वाले ज्यादातर लोग उनका इंतजार कर रहे हैं कि वे बादलों के साथ अवतरित होंगे। धार्मिक पादरी और एल्डर्स अक्सर ऐसा कहते हैं। हम बाइबल की भविष्यवाणी के अनुसार इंतजार करके गलत कैसे हो सकते हैं? धार्मिक पादरी और एल्डर्स ऐसे लोग हैं जो प्रभु की सेवा करते हैं। वे इस प्रकार से प्रभु की वापसी की राह देख रहे हैं। मैं यह नहीं मानता वापस लौटे प्रभु इन सभी धार्मिक पादरियों और एल्डर्स को छोड़ देंगे। यह निश्चित रूप से असंभव है!

उत्तर: वैसा कुछ कहने के लिए आप लोगों के पास किस प्रकार का आधार है? जो आप लोगों ने कहा है क्या वह प्रभु यीशु के वचनों के मुताबिक है? क्या वह परमेश्वर के वचनों पर आधारित है? अगर आप लोग जो कह रहे हैं वह पूरी तरह से इन्सान की अवधारणाओं और कल्पनाओं के आधार पर है, तो वह प्रभु का विरोध होगा! आइए देखते हैं कि कैसे फरीसियों ने मसीहा के आगमन का इंतज़ार किया और क्यों उन्होने प्रभु यीशु को सूली पर चढ़ा दिया आरंभ में यहूदी फरीसी, मसीहा के विषय में अवधारणाओं और कल्पनाओं से भरे हुए थे। उन्होंने बाइबल की भविष्यवाणी देखी थी: "क्योंकि हमारे लिये एक बालक उत्पन्न हुआ, हमें एक पुत्र दिया गया है: और प्रभुता उसके काँधे पर होगी" (यशायाह 9:6)। "हे बैतलहम एप्राता, यदि तू ऐसा छोटा है कि यहूदा के हज़ारों में गिना नहीं जाता, तौ भी तुझ में से मेरे लिये एक पुरुष निकलेगा, जो इस्राएलियों में प्रभुता करनेवाला होगा; और उसका निकलना प्राचीनकाल से, वरन् अनादि काल से होता आया है" (मीका 5:2)। बाइबल की भविष्यवाणियों और मसीहा के आगमन के विषय की दीर्घकाल की कल्पनाओं एवं अनुमानों के आधार पर, फरीसियों ने यह निष्कर्ष निकाला कि निश्चित ही प्रभु मसीहा कहलाएंगे और यकीनन एक दौलतमंद परिवार में जन्म लेंगे। आगे, वे दाऊद जैसे होंगे यरूशलेम के राजा बनेंगे, और उनको रोमन शासन से अलग होने के लिए प्रोत्साहित करेंगे। अधिकांश यरूशलेम वासी इसी प्रकार की अवधारणा रखते थे। परंतु परमेश्वर ने उनकी अवधारणाओं और कल्पनाओं के अनुसार इन भविष्यवाणियों की पूर्ति नहीं की, इस लिए फरीसियों ने प्रभु यीशु के खिलाफ सभी प्रकार के आरोपों को खोजने की कोशिश की और प्रभु यीशु का तिरस्कार और निंदा करी। भले ही प्रभु यीशु ने उस समय कई सत्य व्यक्त किए और चमत्कार दिखाए, परमेश्वर की पूर्ण सामर्थ्‍य और शक्ति का प्रदर्शन किया, फरीसियों ने प्रभु यीशु के अथाह वचनों की गंभीरता और उनकी महान सामर्थ्‍य की कोई परवाह नहीं की। जब तक वो उनकी अवधारणाओं और कल्पनाओं के अनुरूप नहीं होते, जब तक वे दौलतमंद परिवार में पैदा न हुए होते और उनका अवतार महान और प्रतिष्ठित न होता, जब तक उनका नाम मसीहा न होता, वे उनकी निंदा और विरोध करते। अपने सत्य से घृणा करने वाले स्वभाव के कारण, उन्होंने सत्य अभिव्यक्त कर उद्धार का कार्य करने वाले प्रभु यीशु को सूली पर चढ़ा दिया! भाइयों और बहनों, क्या फरीसी घृणा के लायक हैं? क्या उन्हें शापित करना चाहिए! प्रभु यीशु का विरोध और उनकी निंदा करने के फरीसियों के पापों ने उनके सत्य से घृणा और नफ़रत करने वाले शैतानी स्वभाव को पूरी तरह से उजागर कर दिया है। इससे पता चलता है कि कि उनके हृदय मसीहा द्वारा उनको पापों से बचाए जाने को लेकर आशान्वित नहीं थे, बल्कि इसके बजाय उनकी आशा क्या थी? वे चाहते थे कि यहूदियों का राजा उन्हें रोमन सरकार के शासन से छुटकारा दिला दे, ताकि उन्हें गुलामी जैसा कष्ट न भोगना पड़े! उन्हें परमेश्वर में विश्वास था और वे मसीहा के आने की प्रतीक्षा कर रहे थे सिर्फ इसलिए क्योंकि वे अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं की पूर्ति और अपनी प्रतिष्ठा की रक्षा करना चाहते थे। आइए इसके बारे में सोचते हैं। यीशु के आने की प्रतीक्षा करने में फरीसियों ने कौन सी गलतियां की? वे परमेश्वर द्वारा शापित और दंडित क्यों हुए? यह बात वाकई विचार करने लायक है! जब प्रभु यीशु अपना कार्य करने आए तो क्यों फरीसियों ने उनका विरोध किया और उनकी निंदा की? फरीसियों की कौन सी प्रकृति और गुण यहां प्रदर्शित हुए? ये ऐसी समस्याएं हैं जिन्हें परमेश्वर के प्रकटन की चाह रखने वाले लोगों को समझना चाहिए! अगर हम इन समस्याओं के परे ही नहीं देख पाते हैं, तो जब प्रभु यीशु के पुनरागमन पर उनका स्वागत करने की बात आएगी, तब शायद हम भी उसी प्रकार परमेश्वर विरोधी मार्ग पर चले जाएंगे जैसा फरीसियों ने किया!

फरीसियों ने मसीहा के आने का इंतजार कैसे किया था? उन्होंने प्रभु यीशु को सूली पर क्यों चढ़ा दिया? इन सवालों का स्रोत क्या है? आइए देखते हैं कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर का क्या कहना है? सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं: "फरीसियों ने यीशु का विरोध क्यों किया, क्या तुम लोग उसका कारण जानना चाहते हो? क्या तुम फरीसियों के सार को जानना चाहते हो? वे मसीहा के बारे में कल्पनाओं से भरे हुए थे। इससे ज्यादा और क्या, उन्होंने केवल इस बात पर विश्वास किया कि मसीहा आएगा, मगर जीवन के इस सत्य की खोज नहीं की। और इसलिए, वे आज भी मसीहा की प्रतीक्षा करते हैं, क्यों उन्हें जीवन के मार्ग के बारे में कुछ भी ज्ञान नहीं है, और नहीं जानते कि सत्य का मार्ग क्या है? तुम लोग कैसे कहते हो कि ऐसे मूर्ख, हठधर्मी और अज्ञानी लोग परमेश्वर के आशीष प्राप्त करेंगे? वे मसीहा को कैसे देख सकते हैं? वे यीशु का विरोध करते थे क्योंकि वे पवित्र आत्मा के कार्य की दिशा को नहीं जानते थे, क्योंकि वे यीशु के द्धारा कहे गए सत्य के मार्ग को नहीं जानते थे, और, ऊपर से, क्योंकि उन्होंने मसीहा को नहीं समझा था। और क्योंकि उन्होंने मसीहा को कभी नहीं देखा था, और कभी भी मसीहा के साथ नहीं रहे थे, उन्होंने सिर्फ़ मसीहा के नाम को खोखली श्रद्धांजलि देने की गलती की जबकि किसी न किसी ढंग से मसीहा के सार का विरोध करते रहे। ये फरीसी सार रूप से हठधर्मी एवं अभिमानी थे और सत्य का पालन नहीं करते थे। परमेश्वर में उनके विश्वास का सिद्धांत है: इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम्हारा उपदेश कितना गहरा है, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम्हारा अधिकार कितना ऊँचा है, तुम मसीह नहीं हो जब तक तुम्हें मसीहा नहीं कहा जाता। क्या ये दृष्टिकोण हास्यास्पद और मूर्खतापूर्ण नहीं हैं?" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "जब तुम यीशु के आध्यात्मिक शरीर को देख रहे होगे ऐसा तब होगा जब परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी को नये सिरे से बना चुका होगा")। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों को पढ़ने के बाद, मसीहा के इंतजार में प्रभु यीशु के प्रति फरीसियों के विरोध का सार और स्रोत अब हमें पूरी तरह से स्पष्ट हो जाना चाहिए। इसलिए, प्रभु की वापसी का स्वागत करने के संबंध में, अगर मनुष्य उनकी धारणाओं और कल्पनाओं पर भरोसा करता है, और मूर्खों की तरह सिर्फ प्रभु के बादलों के साथ अवतरित होने का इंतजार करता रहता है, बजाए इसके कि सत्य की खोज की जाए और परमेश्वर की आवाज को सुना जाए, तो क्या वे भी फरीसियों की तरह परमेश्वर का विरोध करने के उसी मार्ग पर नहीं चलने लगेंगे? तो फिर उनका परिणाम क्या होगा?

अब, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के राज्य का सुसमाचार 20 वर्षों से भी अधिक समय से पूरे मेनलैंड चीन में फ़ैल रहा है। यह काफी समय से विभिन्न पंथों और संप्रदायों में फ़ैल रहा है। इस अवधि के दौरान, सीसीपी सरकार के भारी दबाव और शोषण के साथ-साथ, सीसीपी मीडिया के दुष्प्रचार अभियान के कारण, सर्वशक्तिमान परमेश्वर पहले ही एक ऐसा पारिवारिक नाम बन चुके हैं जिनके बारे में हर कोई जानता है। बाद में, सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा बोले गए सभी सत्य वचनों, और सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कलीसिया द्वारा प्रस्तुत विभिन्न वीडियो और फिल्मों को लगातार इंटरनेट पर जारी किया जा रहा है, जो दुनिया भर में फ़ैल रहा है। मेरा विश्वास है कि धार्मिक मंडली के सभी लोगों ने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कलीसिया की गवाही के विभिन्न तरीकों के बारे में सुना होगा। बहुत सारे लोगों ने गवाही दी है कि परमेश्वर आए हैं। यह प्रभु यीशु की इस भविष्यवाणी को अच्छी तरह से पूरा करता है: "आधी रात को धूम मची, देखो, दूल्हा आ रहा है! उससे भेंट करने के लिये चलो" (मत्ती 25:6)। तो फिर क्यों धार्मिक पादरी और एल्डर्स अभी भी प्रचंड रूप से अंत के दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य की निंदा और विरोध करते हैं। बाइबल में प्रभु की वापसी के बारे में अनेक भविष्यवाणियां हैं, तो फिर वे प्रभु के बादलों के साथ अवतरित होने की भविष्यवाणी पर इस तरह से क्यों अड़े हुए हैं? वे बिलकुल भी खोज क्यों नहीं करते हैं, जब वे यह सुनते हैं कि प्रभु के आने के प्रमाण मौजूद हैं? जब उन्हें यह पता है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने कई सत्य वचन कहे हैं और उन्होंने परमेश्वर के कार्य की वास्तविकता को देखा है, तो क्‍यों वे अभी भी जिद्दी बनकर अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य की निंदा और विरोध करने की अपनी धारणाओं और कल्पनाओं को सही मानते हैं? क्या ये लोग सत्य को पसंद करते हैं और वास्तव में प्रभु के आने का इंतजार करते हैं या नहीं? क्या वे बुद्धिमान कुंवारियां हैं या मूर्ख कुंवारियां? अगर वे बुद्धिमान कुंवारियां है और वास्तव में प्रभु की वापसी का इंतजार करते हैं, तो फिर, जब वे परमेश्वर के स्‍वर को सुनते हैं और राज्य के सुसमाचार को फैलते देखते हैं, तब भी क्‍यों अभी भी जिद्दी बनकर निंदा और विरोध करते हैं? क्या यह प्रभु के प्रकट होने की चाह और उम्मीद में उनकी ईमानदारी होगी? क्या यह प्रभु की वापसी का आनंद लेने में उनकी सही अभिव्यक्ति होगी? अंत में, साफ़ तौर पर कहें तो, प्रभु में उनका विश्वास और प्रभु यीशु की वापसी के लिए उनकी चाह नकली है, लेकिन उनकी आशीर्वाद पाने की और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने की चाह असली है! वे प्रभु में विश्वास करते हैं इसलिए नहीं कि वे सत्य की खोज कर जीवन पाएं, इसलिए भी नहीं कि उन्हें सत्य का लाभ मिले और पापों को दूर किया जाए। वे किस बात की सबसे अधिक परवाह करते हैं? यह इसलिए है कि जब प्रभु उनको सीधे स्वर्ग के राज्य में ले जाने के लिए अवतरित होंगे और उन्हें शरीर की पीड़ा से बचाकर निकालेंगे और वे स्वर्ग के राज्य की कृपा का आनंद उठाएंगे। यह परमेश्वर में विश्वास करने का उनका सही मकसद है! मुझे बताइए। इस कारण के अलावा, उन सर्वशक्तिमान परमेश्वर को अस्वीकार करने के लिए उनकी क्या वजह है जो मनुष्य को बचाने के लिए सत्य वचन बोलते हैं? हर कोई इस पर विचार कर सकता है। जो कोई भी सत्य से प्रेम करते हैं और वास्तव में परमेश्वर के प्रकट होने की चाह रखते हैं, तो जब उन्‍हें यह सुनाई पड़ेगा कि प्रभु आ गए हैं, उनकी क्या प्रतिक्रिया होगी? क्या वे इसे नहीं सुनेंगे, नहीं देखेंगे, इसके संपर्क में नहीं आएंगे? क्या वे आँखें मूंदकर इनकार, निंदा और विरोध करेंगे? बिलकुल नहीं! क्योंकि ऐसा व्यक्ति जो ईमानदारी से परमेश्वर के प्रकट होने की चाह रखता है और परमेश्वर के आगमन का स्वागत करता है, अपने हृदय में सत्य और धार्मिकता की प्रधानता के साथ सही रोशनी के प्रकट होने का इंतजार करता है। वे मनुष्य जाति को बचाने के लिए और पापों से पूरी तरह बचाकर पवित्र करने के लिए और परमेश्वर द़वारा पाए जाने के लिए परमेश्वर के आगमन का इंतजार करते हैं। लेकिन ऐसे लोग जो सिर्फ प्रभु के बादलों के साथ अवतरित होने का इंतज़ार करते हैं, फिर भी सर्वशक्तिमान परमेश्वर का इनकार और अस्वीकार कर देते हैं, ख़ास तौर पर ऐसे धार्मिक नेता जो अपने रुतबे और आजीविका की रक्षा करने के लिए क्रोधावेश में सर्वशक्तिमान परमेश्वर की निंदा और विरोध करते हैं— ये सब ऐसे लोग हैं जो सत्य से दूर भागते हैं और सत्य से नफ़रत करते हैं। ये सब ऐसे अविश्वासी और यीशु विरोधी हैं जिन्हें अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य के द्वारा उजागर किया जाता है। जब देहधारी परमेश्वर अपना उद्धार का कार्य पूरा कर लेते हैं, ये लोग लाखों वर्षों में एक बार आने वाली आपदा में घिर जाते हैं, रोते हैं और अपने दांत पीसते रह जाते हैं। तब सार्वजनिक रूप से बादलों के साथ प्रभु के अवतरित होने की भविष्यवाणी बिलकुल पूरी हो जाएगी: "देखो, वह बादलों के साथ आनेवाला है; और हर एक आँख उसे देखेगी, वरन् जिन्होंने उसे बेधा था वे भी उसे देखेंगे: और पृथ्वी के सारे कुल उसके कारण छाती पीटेंगे" (प्रकाशितवाक्य 1:7)।

आइए हम एक नज़र देखें कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन क्या कहते हैं: "जो लोग सत्य को स्वीकार नहीं करते हैं, मगर अंधों की तरह यीशु के श्वेत बादलों पर आगमन का इंतज़ार करते हैं, निश्चित रूप से पवित्र आत्मा के विरोध में ईशनिंदा करेंगे, और ये वे प्रजातियाँ हैं जो नष्ट कर दी जाएँगीं। तुम लोग सिर्फ़ यीशु के अनुग्रह की कामना करते हो, और सिर्फ़ स्वर्ग के सुखद राज्य का आनंद लेना चाहता हो, मगर जब यीशु देह में लौटा, तो तुमने यीशु के द्वारा कहे गए वचनों का कभी भी पालन नहीं किया, और यीशु के द्वारा व्यक्त किये गए सत्य को कभी भी ग्रहण नहीं किया है। यीशु के एक श्वेत बादल पर वापस आने के तथ्य के बदले में तुम लोग क्या थामें रखना चाहोगे? क्या वही ईमानदारी जिसमें तुम लोग बार-बार पाप करते रहते हो, और फिर बार-बार उनकी स्वीकारोक्ति करते हो? एक श्वेत बादल पर वापस आने वाले यीशु के लिए तुम बलिदान में क्या अर्पण करोगे? क्या कार्य के वे वर्ष जिनकी तुम लोग स्वयं सराहना करते हो? लौट कर आये यीशु को तुम लोगों पर विश्वास कराने के लिए तुम लोग किस चीज को थाम कर रखोगे? क्या वह आपका अभिमानी स्वभाव है, जो किसी भी सत्य का पालन नहीं करता है?

मैं तुम लोगों बता दूँ, कि जो परमेश्वर में संकेतों की वजह से विश्वास करते हैं वे निश्चित रूप से उस श्रेणी के होंगे जो विनाश को झेलेगी। वे जो देह में लौटे यीशु के वचनों को स्वीकार करने में अक्षम हैं वे निश्चित रूप से नरक के वंशज, महान फ़रिश्ते के वंशज हैं, उस श्रेणी के हैं जो अनंत विनाश के अधीन की जाएगी। कई लोग मैं क्या कहता हूँ इसकी परवाह नहीं करते हैं, किंतु मैं ऐसे हर तथाकथित संत को बताना चाहता हूँ जो यीशु का अनुसरण करते हैं, कि जब तुम लोग यीशु को एक श्वेत बादल पर स्वर्ग से उतरते हुए अपनी आँखों से देखो, तो यह धार्मिकता के सूर्य का सार्वजनिक प्रकटन होगा। शायद वह तुम्हारे लिए एक बड़ी उत्तेजना का समय होगा, मगर तुम्हें पता होना चाहिए कि जिस समय तुम यीशु को स्वर्ग से उतरते हुए देखोगे तो यही वह समय भी होगा जब तुम दण्ड दिए जाने के लिए नीचे नरक चले जाओगे। यह परमेश्वर की प्रबंधन योजना की समाप्ति की घोषणा होगी, और यह तब होगा जब परमेश्वर सज्जन को पुरस्कार और दुष्ट को दण्ड देगा। क्योंकि परमेश्वर का न्याय मनुष्य के संकेतों को देखने से पहले ही समाप्त हो चुका होगा, जब वहाँ सिर्फ़ सत्य की अभिव्यक्ति ही होगी। वे जो सत्य को स्वीकार करते हैं तथा संकेतों की खोज नहीं करते हैं और इस प्रकार शुद्ध कर दिए जाते हैं, वे परमेश्वर के सिंहासन के सामने लौट चुके होंगे और सृष्टिकर्ता के आलिंगन में प्रवेश कर चुके होंगे। सिर्फ़ वे ही जो इस विश्वास में बने रहते हैं कि 'यीशु जो श्वेत बादल पर सवारी नहीं करता है एक झूठा मसीह है' अनंत दण्ड के अधीन कर दिए जाएँगे, क्योंकि वे सिर्फ़ उस यीशु में विश्वास करते हैं जो संकेतों को प्रदर्शित करता है, परन्तु उस यीशु को स्वीकार नहीं करते हैं जो गंभीर न्याय की घोषणा करता है और जीवन में सच्चे मार्ग को बताता है। और इसलिए केवल यही हो सकता है कि जब यीशु खुलेआम श्वेत बादल पर वापस लौटें तो वह उसके साथ व्यवहार करें। वे बहुत हठधर्मी, अपने आप में बहुत आश्वस्त, बहुत अभिमानी हैं। ऐसे अधम लोग यीशु द्वारा कैसे पुरस्कृत किए जा सकते हैं?" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "जब तुम यीशु के आध्यात्मिक शरीर को देख रहे होगे ऐसा तब होगा जब परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी को नये सिरे से बना चुका होगा")।

"मायाजाल को तोड़ दो" फ़िल्म की स्क्रिप्ट से लिया गया अंश

पिछला:प्रश्न 7: अगर प्रभु यीशु स्वयं परमेश्वर हैं, तो ऐसा क्यों है कि जब प्रभु यीशु प्रार्थना करते हैं, तो वे परमपिता परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं। यहाँ निश्चित रूप से एक रहस्य है जिसे उजागर करना जरूरी है। हमारे लिए चर्चा करें।

अगला:प्रश्न 2: कि पादरी और एल्डर्स सभी प्रभु द्वारा चुने और नियुक्त किए गए हैं, और यह कि ये सब वे लोग हैं जो प्रभु की सेवा करते हैं। पादरियों और एल्डर्स का आज्ञापालन करना प्रभु का आज्ञापालन करना है। यदि हम पादरियों और एल्डर्स का विरोध करते हैं और उनकी निंदा करते हैं, तो हम प्रभु का विरोध कर रहे हैं। इसके अलावा, केवल पादरी और एल्डर्स बाइबल को समझते हैं और बाइबल की व्याख्या कर सकते हैं। केवल वे हमारा मार्गदर्शन कर सकते हैं जब तक पादरियों और एल्डर्स का कथन बाइबल के अनुरूप है और उसका बाइबल में आधार है, तब तक हमें अनुपालन और आज्ञापालन करना चाहिए। जब तक पादरी और एल्डर्स जो करते हैं वह बाइबल के अनुरूप है, तब तक हमें स्वीकार और अनुकरण करना चाहिए। यह कैसे गलत हो सकता है?

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