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अध्याय 6 विभेदन के कई रूप जिन्हें परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास में तुम्हें धारण करना चाहिए

1.तुम्हें परमेश्वर के कार्य और मनुष्य के कार्य में कैसे विभेद करना चाहिए?

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

अनुग्रह के युग में, यीशु ने भी काफ़ी बातचीत की और काफ़ी कार्य किया। वह यशायाह से किस प्रकार भिन्न था? वह दानिय्येल से किस प्रकार भिन्न था? क्या वह कोई भविष्यद्वक्ता था? ऐसा क्यों कहा जाता है कि वह मसीह है? उनके मध्य क्या भिन्नताएँ हैं? वे सभी मनुष्य थे जिन्होंने वचन बोले थे, और मनुष्य को उनके वचन लगभग एक से प्रतीत होते थे। उन सभी ने बातें की और कार्य किए। पुराने विधान के भविष्यवद्क्ताओं ने भविष्यवाणियाँ की, और उसी तरह से, यीशु भी वैसा ही कर सका। ऐसा क्यों है? यहाँ कार्य की प्रकृति के आधार पर भिन्नता है। इस मामले को समझने के लिए, तुम देह की प्रकृति पर विचार नहीं कर सकते हो और तुम्हें किसी व्यक्ति के वचनों की गहराई या सतहीपन पर विचार नहीं करना चाहिए। तुम्हें अवश्य हमेशा सबसे पहले उसके कार्य पर और उन प्रभावों पर विचार करना चाहिए जिसे उसका कार्य मनुष्य में प्राप्त करता है। उस समय यशायाह के द्वारा कही गई भविष्यवाणियों ने मनुष्य का जीवन प्रदान नहीं किया, और दानिय्येल जैसे लोगों द्वारा प्राप्त किए गए संदेश मात्र भविष्यवाणियाँ थीं न कि जीवन का मार्ग थीं। यदि यहोवा की ओर से प्रत्यक्ष प्रकाशन नहीं होता, तो कोई भी इस कार्य को नहीं कर सकता था, क्योंकि यह नश्वरों के लिए सम्भव नहीं है। यीशु, ने भी, बहुत बातें की, परन्तु वे वचन जीवन का मार्ग थे जिसमें से मनुष्य अभ्यास का मार्ग प्राप्त कर सकता था। कहने का अर्थ है, कि सबसे पहले, वह लोगों में जीवन प्रदान कर सकता था, क्योंकि यीशु जीवन है; दूसरा, वह मनुष्यों के विचलनों को पलट सकता था; तीसरा, युग को आगे बढ़ाने के लिए उसका कार्य यहोवा के कार्य का उत्तरवर्ती हो सकता था; चौथा, वह मनुष्य के भीतर की आवश्यकता को समझ सकता था और समझ सकता था कि मनुष्य में किस चीज का अभाव है; पाँचवाँ, वह नए युग का सूत्रपात कर सकता था और पुराने का समापन कर सकता था। यही कारण है कि उसे परमेश्वर और मसीह कहा जाता है; वह न सिर्फ़ यशायाह से भिन्न है परन्तु अन्य भविष्यद्वक्ताओं से भी भिन्न है। भविष्यवद्क्ताओं के कार्य के लिए तुलना के रूप में यशायाह को लें। सबसे पहले, वह मानव का जीवन प्रदान नहीं कर सकता था; दूसरा, वह नए युग का सूत्रपात नहीं कर सकता था। वह यहोवा की अगुआई के अधीन और न कि नए युग का सूत्रपात करने के लिए कार्य कर रहा था। तीसरा, उसने जिसके बारे में स्वयं बोला वह उसकी ही समझ से परे था। वह परमेश्वर के आत्मा से प्रत्यक्षतः प्रकाशनों को प्राप्त कर रहा था, और दूसरे उन्हें सुन कर भी, उसे नहीं समझे होंगे। ये कुछ ही बातें अकेले यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं कि उसके वचन भविष्यवाणियों की अपेक्षा अधिक नहीं थे, यहोवा के बदले किए गए कार्य के एक पहलू से ज़्यादा कुछनहीं थे। हालाँकि, वह यहोवा का प्रतिनिधित्व पूरी तरह से नहीं कर सकता था। वह यहोवा का नौकर था, यहोवा के काम में एक उपकरण था। वह केवल व्यवस्था के युग के भीतर और यहोवा के कार्य के क्षेत्र के भीतर ही कार्य कर रहा था; उसने व्यवस्था के युग से परे कार्य नहीं किया। इसके विपरीत, यीशु का कार्य भिन्न था। उसने यहोवा के कार्य क्षेत्र से बाहर जाकर कार्य किया; उसने देहधारी परमेश्वर के रूप में कार्य किया और सम्पूर्ण मानवजाति का उद्धार करने के लिए सलीब पर चढ़ गया। अर्थात्, उसने यहोवा के द्वारा किए गए कार्य से परे नया कार्य किया। यह नए युग का सूत्रपात करना था। दूसरी स्थिति यह है कि वह उस बारे में बोलने में समर्थ था जिसे मनुष्य प्राप्त नहीं कर सकता था। उसका कार्य परमेश्वर के प्रबंधन के भीतर कार्य था और सम्पूर्ण मानवजाति को समाविष्ट करता था। उसने मात्र कुछ ही मनुष्यों में कार्य नहीं किया, न ही उसका कार्य कुछ सीमित संख्या के लोगों की अगुआई करना था। जहाँ तक इस बात का संबंध है कि कैसे परमेश्वर मनुष्य बनने के लिए देहधारी हुआ था, कैसे उस समय पवित्र आत्मा ने प्रकाशनों को दिया, और कैसे पवित्रात्मा ने कार्य करने के लिए मनुष्य पर अवरोहण किया, ये ऐसी बातें हो जिन्हें मनुष्य देख नहीं सकता है या स्पर्श नहीं कर सकता है। इन सत्यों के लिए इस बात के साक्ष्य के रूप में कार्य करना सर्वथा असंभव है कि वही देहधारी परमेश्वर है। वैसे तो, परमेश्वर के केवल उन वचनों और कार्य पर ही अंतर किया जा सकता है, जो मनुष्य के लिए स्पर्शगोचर हो। केवल यही वास्तविक है। यह इसलिए है क्योंकि पवित्र आत्मा के मामले तुम्हारे लिए दृष्टिगोचर नहीं हैं और केवल परमेश्वर स्वयं को ही स्पष्ट रूप से ज्ञात हैं, और यहाँ तक कि परमेश्वर का देहधारी देह भी सब बातों को नहीं जानता है; तुम सिर्फ़ उसके द्वारा किए गए कार्य से इस बात की पुष्टि कर सकते हो कि वह परमेश्वर है[क]। उसके कार्यों से, यह देखा जा सकता है, सबसे पहले, वह एक नए युग का मार्ग प्रशस्त करने में समर्थ है; दूसरा, वह मनुष्य का जीवन प्रदान करने और अनुसरण करने का मार्ग मनुष्य को दिखाने में समर्थ है। यह इस बात को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि वह परमेश्वर स्वयं है। कम से कम, जो कार्य वह करता है वह पूरी तरह से परमेश्वर का आत्मा का प्रतिनिधित्व कर सकता है, और ऐसे कार्य से यह देखा जा सकता है कि परमेश्वर का आत्मा उसके भीतर है। चूँकि देहधारी परमेश्वर के द्वारा किया गया कार्य मुख्य रूप से नए युग का सूत्रपात करना, नए कार्य की अगुआई करना और नई परिस्थितियों को पैदा करना था, इसलिए ये कुछ स्थितियाँ अकेले ही यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं कि वह परमेश्वर स्वयं है। इस प्रकार यह उसे यशायाह, दानिय्येल और अन्य महान भविष्यद्वक्ताओं से भिन्नता प्रदान करता है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर" से

देहधारी परमेश्वर का कार्य एक नये विशेष युग (काल) को प्रारम्भ करता है, और ऐसे लोग जो उसके कार्य को निरन्तर जारी रखते हैं वे ऐसे मनुष्य हैं जिन्हें उसके द्वारा उपयोग किया जाता है। मनुष्य के द्वारा किया गया समस्त कार्य देहधारी परमेश्वर की सेवकाई के अन्तर्गत होता है, और इस दायरे के परे जाने में असमर्थ होता है। यदि देहधारी परमेश्वर अपने कार्य को करने के लिए नहीं आता, तो मनुष्य पुराने युग को समापन की ओर लाने में समर्थ नहीं होता, और नए विशेष युग की शुरुआत करने के समर्थ नहीं होता। मनुष्य के द्वारा किया गया कार्य महज उसके कर्तव्य के दायरे के भीतर होता है जो मानवीय रूप से संभव है, और परमेश्वर के कार्य का प्रतिनिधित्व नहीं करता है। केवल देहधारी परमेश्वर ही आ सकता है और उस कार्य को पूरा कर सकता है जो उसे करना चाहिए, और उसके अलावा, कोई भी उसके स्थान पर इस कार्य को नहीं कर सकता है। निश्चित रूप से, जो कुछ मैं कहता हूँ वह देधारण के कार्य के सम्बन्ध में है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "भ्रष्ट मानवजाति को देह धारण किए हुए परमेश्वर के उद्धार की अत्यधिक आवश्यकता है" से

कुछ लोग आश्चर्य कर सकते हैं, युग का सूत्रपात स्वयं परमेश्वर के द्वारा क्यों किया जाना चाहिए? क्या उसके स्थान पर कोई सृजित प्राणी नहीं खड़ा हो सकता है? तुम लोग अच्छी तरह से अवगत हो कि एक नए युग का सूत्रपात करने के उद्देश्य से स्पष्ट रूप से परमेश्वर देह बनता है, और, वास्तव में, जब वह नए युग का सूत्रपात करता है, तो वह उसके साथ-साथ ही पूर्व युग का समापन करता है। परमेश्वर आदि और अंत है; यही वह स्वयं है जो अपने कार्य को चलाता है और इसलिए यह अवश्य वह स्वयं होना चाहिए जो पहले के युग का समापन करता है। यही वह प्रमाण है कि वह शैतान को पराजित करता है और संसार को जीत लेता है। प्रत्येक बार जब वह स्वयं मनुष्य के बीच कार्य करता है, तो यह एक नए युद्ध की शुरुआत होती है। नए कार्य की शुरुआत के बिना, प्राकृतिक रूप से पुराने का कोई समापन नहीं होगा। और पुराने का समापन न होना इस बात का प्रमाण है कि शैतान के साथ युद्ध अभी तक समाप्त नहीं हुआ है। यदि स्वयं परमेश्वर मनुष्यों के बीच में आता है और एक नया कार्य करता है केवल तभी मनुष्य शैतान के अधिकार क्षेत्र को तोड़कर पूरी तरह से स्वतन्त्र हो सकता है और एक नया जीवन एवं नई शुरुआत प्राप्त कर सकता है। अन्यथा, मनुष्य सदैव ही पुराने युग में जीएगा और हमेशा शैतान के पुराने प्रभाव के अधीन रहेगा। परमेश्वर के द्वारा अगुवाई किए गए प्रत्येक युग के साथ, मनुष्य के एक भाग को स्वतन्त्र किया जाता है, और इस प्रकार परमेश्वर के कार्य के साथ-साथ मनुष्य एक नए युग की ओर आगे बढ़ता है। परमेश्वर की विजय उन सबकी विजय है जो उसका अनुसरण करते हैं। यदि सृष्टि की मानवजाति को युग के समापन का कार्यभार दिया जाता, तब चाहे यह मनुष्य के दृष्टिकोण से हो या शैतान के, यह एक ऐसे कार्य से बढ़कर नहीं है जो परमेश्वर का विरोध या परमेश्वर के साथ विश्वासघात करता है, न कि परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता का एक कार्य है, और इस प्रकार मनुष्य का कार्य शैतान को अवसर देगा। मनुष्य केवल परमेश्वर के द्वारा सूत्रपात किए गए एक युग में परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन और अनुसरण करता है केवल तभी शैतान पूरी तरह से आश्वस्त होगा, क्योंकि यह सृजित प्राणी का कर्तव्य है। और इसलिए मैं कहता हूँ कि तुम लोगों को केवल अनुसरण और आज्ञापालन कंरने की आवश्यकता है, और इससे अधिक तुम लोगों से नहीं कहा गया है। प्रत्येक व्यक्ति के द्वारा अपने कर्तव्य का पालन करने और अपने कार्य को क्रियान्वित करने का अर्थ यही है। परमेश्वर स्वयं अपना काम करता है और उसे मनुष्य की कोई आवश्यकता नहीं है कि उसके स्थान पर काम करे, और न ही वह सृजित प्राणियों के काम में अपने आपको शामिल करता है। मनुष्य अपना स्वयं का कर्तव्य करता है और परमेश्वर के कार्य में हस्तक्षेप नहीं करता है, और यही सच्ची आज्ञाकारिता है और सबूत है कि शैतान पराजित है। जब परमेश्वर स्वयं ने नए युग का आरम्भ कर दिया उसके पश्चात्, वह मानवों के बीच अब और कार्य नहीं करता है। यह तभी है कि एक सृजित प्राणी के रूप में मनुष्य अपने कर्तव्य को करने और अपने ध्येय को सम्पन्न करने के लिए आधिकारिक रूप से नए युग में कदम रखता है। कार्य करने के सिद्धान्त ऐसे ही हैं जिनका उल्लंघन किसी के द्वारा नहीं किया जा सकता है। केवल इस तरह से कार्य करना ही विवेकपूर्ण और तर्कसंगत है। परमेश्वर का कार्य परमेश्वर स्वयं के द्वारा किया जाता है। यह वही है जो अपने कार्य को चलाता है, और साथ ही वही उसका समापन करता है। यह वही है जो कार्य की योजना बनाता है, और साथ ही वही है जो उसका प्रबंधन करता है, और उससे भी बढ़कर, यह वही है जो उस कार्य को सफल करता है। यह ऐसा ही है जैसा बाइबल में कहा गया है "मैं ही आदि और अंत हूँ; मैं ही बोनेवाला और काटनेवाला हूँ।" सब कुछ जो उसके प्रबंधन के कार्य से संबंधित है स्वयं उसी के द्वारा किया जाता है। वह छ:-हज़ार-वर्षों की प्रबंधन योजना का शासक है; कोई भी उसके स्थान पर उसका काम नहीं कर सकता है या उसके कार्य का समापन नहीं कर सकता है, क्योंकि यह वही है जो सबको नियन्त्रण में रखता है। चूँकि उसने संसार का सृजन किया है, वह संपूर्ण संसार की अगुवाई करेगा ताकि सब उसके प्रकाश में जीवन जीएँ, और वह अपनी सम्पूर्ण योजना को सफल करने के लिए संपूर्ण युग का समापन करेगा!

"वचन देह में प्रकट होता है" से "देहधारण का रहस्य (1)" से

 कई प्रकार के लोगों और अनेक विभिन्न परिस्थितियों के माध्यम से पवित्र आत्मा के कार्य को सम्पन्न एवं पूरा किया जाता है। हालाँकि देहधारी परमेश्वर का कार्य एक समूचे युग के कार्य का प्रतिनिधित्व कर सकता है, और एक समूचे युग में लोगों के प्रवेश का प्रतिनिधित्व कर सकता है, फिर भी मनुष्यों के विस्तृत प्रवेश के कार्य को अभी भी पवित्र आत्मा के द्वारा उपयोग किए गए मनुष्यों के द्वारा किए जाने की आवश्यकता है और इसे देहधारी परमेश्वर के द्वारा किए जाने की आवश्यकता नहीं है। अतः, परमेश्वर का कार्य, या परमेश्वर के स्वयं की सेवकाई, परमेश्वर के देहधारी शरीर का कार्य है और इसे उसके स्थान पर मनुष्य के द्वारा नहीं किया जा सकता है। पवित्र आत्मा के कार्य को विभिन्न प्रकार के मनुष्यों के द्वारा पूरा किया गया है और इसे केवल एक ही व्यक्ति विशेष के द्वारा पूर्ण नहीं किया जा सकता है या एक ही व्यक्ति विशेष के द्वारा पूरी तरह से स्पष्ट नहीं किया जा सकता है। ऐसे लोग जो कलीसियाओं की अगुवाई करते हैं वे भी पूरी तरह से पवित्र आत्मा के कार्य का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते हैं; वे सिर्फ अगुवाई का कुछ कार्य ही कर सकते हैं। इस रीति से, पवित्र आत्मा के कार्य को तीन भागों में बांटा जा सकता हैः परमेश्वर का स्वयं का कार्य, उपयोग में लाए गए मनुष्यों का कार्य, और उन सभी लोगों पर किया गया कार्य जो पवित्र आत्मा की मुख्य धारा में हैं। इन तीनों में, परमेश्वर का स्वयं का कार्य सम्पूर्ण युग की अगुवाई करने के लिए है; जिन्हें उपयोग किया जाता है उन मनुष्यों का काम परमेश्वर के स्वयं के कार्य के पश्चात् भेजे जाने या महान आदेशों को प्राप्त करने के द्वारा सभी अनुयायियों की अगुवाई करने के लिए है, और ये मनुष्य ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर के कार्य के साथ सहयोग करते हैं; वह कार्य जिसे पवित्र आत्मा के द्वारा उन लोगों पर किया जाता है जो इस मुख्य धारा में हैं वह उसके स्वयं के कार्य को बनाए रखने के लिए है, अर्थात्, सम्पूर्ण प्रबंधन को बनाए रखने के लिए है और अपनी गवाही को बनाए रखने के लिए है, जबकि ठीक उसी समय उन लोगों को सिद्ध किया जाता है जिन्हें सिद्ध किया जा सकता है। ये तीनों भाग पवित्र आत्मा के सम्पूर्ण कार्य हैं, किन्तु स्वयं परमेश्वर के कार्य के बिना, सम्पूर्ण प्रबंधकीय कार्य रूक जाएगा। स्वयं परमेश्वर के कार्य में सम्पूर्ण मानवजाति का कार्य सम्मिलित है, और यह सम्पूर्ण युग के कार्य का भी प्रतिनिधित्व करता है। कहने का तात्पर्य है, परमेश्वर का स्वयं का कार्य पवित्र आत्मा के सभी कार्य की गति एवं प्रवृत्ति का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि प्रेरितों का कार्य परमेश्वर के स्वयं के कार्य का अनुसरण करता है और युग की अगुवाई नहीं करता है, न ही यह सम्पूर्ण युग में पवित्र आत्मा के कार्य करने की प्रवृत्ति का प्रतिनिधित्व करता है। वे केवल वही कार्य करते हैं जिसे मनुष्य को अवश्य करना चाहिए, जो प्रबंधकीय कार्य को बिलकुल भी शामिल नहीं करता है। परमेश्वर का स्वयं का कार्य प्रबंधकीय कार्य के भीतर एक परियोजना है। मनुष्य का कार्य केवल उन मनुष्यों का कर्तव्य है जिन्हें उपयोग किया जाता है और इसका प्रबंधकीय कार्य से कोई सम्बन्ध नहीं है। कार्य के विभिन्न पहचान एवं विभिन्न प्रतिनिधित्व के कारण, तथा इस तथ्य के बावजूद कि वे दोनों ही पवित्र आत्मा के कार्य हैं, परमेश्वर के कार्य और मनुष्य के काम के मध्य स्पष्ट एवं ठोस अन्तर हैं। इसके अतिरिक्त, विभिन्न पहचानों के साथ पवित्र आत्मा के द्वारा कार्य के विषयों पर किए गए कार्य का विस्तार भिन्न होता है। ये पवित्र आत्मा के कार्य के सिद्धान्त एवं दायरे हैं।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का काम" से

परमेश्वर के द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले व्यक्ति के द्वारा किए जाने वाले कार्य का इस्तेमाल परमेश्वर, मसीह और पवित्र आत्मा के कार्य के साथ सहयोग करने के लिए करता है। यह मनुष्य परमेश्वर के द्वारा मनुष्य के बीच में खड़ा किया गया है, वह परमेश्वर के चुने हुए लोगों का नेतृत्व करने के लिए है, और परमेश्वर ने उसे मानवीय सहयोग का कार्य करने के लिए भी खड़ा किया है। इस तरह का व्यक्ति, जो मानवीय सहयोग का कार्य करने में सक्षम है, मनुष्य से परमेश्वर की अपेक्षाओं और जो कार्य पवित्र आत्मा के द्वारा किया जाना चाहिए, वह उसके माध्यम से पूरा किया जाता है। इसे दूसरे शब्दों में कहने का तरीका यह है : इस मनुष्य को इस्तेमाल करने में परमेश्वर का उद्देश्य यह है कि वे सब जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं परमेश्वर की इच्छा को और अच्छी तरह समझ सकें, और परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा कर सकें। क्योंकि लोग परमेश्वर के वचन को या परमेश्वर की इच्छा को स्वयं समझने में असमर्थ हैं, इसलिए परमेश्वर ने किसी एक को खड़ा किया है जो इस तरह का कार्य करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। यह व्यक्ति जो परमेश्वर के द्वारा इस्तेमाल किया गया है, इसकी व्याख्या एक माध्यम के रूप में की जा सकती है जिसके द्वारा परमेश्वर लोगों का मार्गदर्शन करता है, जैसे "अनुवादक" जो परमेश्वर और लोगों के बीच में संप्रेषण बनाए रखता है। इस प्रकार, यह व्यक्ति उनकी तरह नहीं है जो परमेश्वर के घराने में काम करते हैं या जो उसके प्रेरित हैं। यह कहा जा सकता है कि वह उनकी तरह परमेश्वर की सेवा करता है, फिर भी परमेश्वर के द्वारा उसकी पृष्ठभूमि के उपयोग में और उसके कार्य के विषय में वह दूसरे कार्यकर्ताओं और प्रेरितों से बिलकुल अलग है। जो व्यक्ति उसके कार्य और उसकी पृष्ठभूमि के उपयोग के विषय में परमेश्वर द्वारा इस्तेमाल किया जाता है, वह उसी के द्वारा खड़ा किया जाता है, वह परमेश्वर के कार्य के लिए परमेश्वर के द्वारा तैयार किया जाता है, और वह परमेश्वर के कार्य में सहयोग करता है। कोई भी व्यक्ति उसके कार्य के लिए कभी खड़ा नहीं हो सकता, यह मनुष्य का सहयोग है जो दैवीय कार्य का अभिन्न अंग है। इस दौरान, दूसरे कार्यकर्ताओं या प्रेरितों द्वारा किया गया कार्य कुछ और नहीं बल्कि हर अवधि के दौरान कलीसियाओं के लिए व्यवस्थाओं के कई पहलुओं को लाना और उन्हें पूरा करना है, या फिर कलीसियाई जीवन को बनाए रखने के लिए जीवन की मूलभूत चीजों की उपलब्धता के लिए कार्य करना है। ये कार्यकर्ता और प्रेरित परमेश्वर द्वारा नियुक्त नहीं किए जाते हैं, न ही यह कहा जा सकता है कि वे पवित्र आत्मा द्वारा इस्तेमाल किए जाते हैं। वे कलीसिया में से चुने गए और, कुछ समय की अच्छी शिक्षा और प्रशिक्षण के बाद, जो उपयुक्त होतेहैं उन्हें रखा जाता, जबकि जो उपयुक्त नहीं होते उन्हें वहीं वापस भेज दिया जाता है जहाँ से वे आए थे। क्योंकि ये लोग कलीसिया में से चुने जाते हैं, कुछ अपना असली रंग अगुवा बनने के बाद दिखाते हैं, और कुछ तो बहुत बुरे काम करते हैं और अंत में निकाल दिए जाते हैं। दूसरी ओर, जो परमेश्वर के द्वारा इस्तेमाल किया जाता है वह परमेश्वर के द्वारा तैयार किया जाता है, और जिसके भीतर कुछ योग्यता और मानवता होती है। उसेपहले से पवित्र आत्मा द्वारा तैयार औरसिद्ध कर दिया जाता हैऔर पूर्णरूप से पवित्र आत्मा द्वारा चलाया जाता है, और विशेषकर तब जब उसके कार्य की बारी आती है, उसे पवित्र आत्मा द्वारा निर्देश और आदेश दिए जाते हैं – परिणामस्वरुप परमेश्वर के चुने हुए लोगों की अगुवाई के मार्ग में कोई परिवर्तन नही आता, क्योंकि परमेश्वर निश्चित रूप से अपने कार्य का उत्तरदायित्व लेता है, और परमेश्वर हर समय अपना कार्य करता है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर द्वारा मनुष्य को इस्तेमाल करने के विषय में" से

भविष्यद्वक्ताओं और जिन्हें पवित्र आत्मा के द्वारा उपयोग किया गया है उनके वचन और कार्य सभी मनुष्य का कर्तव्य कर रहे थे, एक सृजित प्राणी के रूप में अपना कार्य कर रहे थे और वह कर रहे थे जो मनुष्य को करना चाहिए। हालाँकि, देहधारी परमेश्वर के वचन और कार्य उसकी सेवकाई को करने के लिए थे। यद्यपि उसका बाहरी स्वरूप एक सृजन किए गए प्राणी का था, किन्तु उसका कार्य अपने प्रकार्य को नहीं बल्कि अपनी सेवकाई को पूरा करना था। "कर्तव्य" शब्द सृजन किए गए प्राणियों के सम्बन्ध में उपयोग किया जाता है, जबकि "सेवकाई" देहधारी परमेश्वर की देह के संबंध में है। इन दोनों के बीच एक महत्वपूर्ण अन्तर है, और ये दोनों परस्पर विनिमय करने योग्य नहीं हैं। मनुष्य का कार्य केवल अपना कर्तव्य करना है, जबकि परमेश्वर का कार्य अपनी सेवकाई का प्रबंधन करना, और उसे पूरा करना है। इसलिए, यद्यपि पवित्र आत्मा के द्वारा कई प्रेरितों का उपयोग किया गया और उसके साथ कई भविष्यद्वक्ता भरे थे, किन्तु उनका कार्य और उनकेवचन केवल सृजन किए गए प्राणी के रूप में केवल अपना कर्तव्य करने के लिए थे। यद्यपि उनकी भविष्यवाणियाँ देहधारी परमेश्वर के द्वारा कहे गए जीवन के मार्ग की अपेक्षा बढ़कर हो सकती थीं, और उनकी मानवता देहधारी परमेश्वर की अपेक्षा अधिक उत्युत्तम थी, किन्तु वे अभी भी अपना कर्तव्य निभा रहे थे, और अपनी सेवकाई को पूर्ण नहीं कर रहे थे। मनुष्य का कर्तव्य उसके प्रकार्य को संदर्भित करता है, और कुछ ऐसा है जो मनुष्य के लिए प्राप्य है। हालाँकि, देहधारी परमेश्वर के द्वारा की जाने वाली सेवकाई उसके प्रबंधन से संबंधित है, और यह मनुष्य के द्वारा अप्राप्य है। चाहे देहधारी परमेश्वर बोले, कार्य करे, या चमत्कार प्रकट करे, वह अपने प्रबंधन के अंतर्गत महान कार्य कर रहा है, और इस प्रकार का कार्य उसके बदले मनुष्य नहीं कर सकता है। मनुष्य का कार्य केवल सृजन किए गए प्राणी के रूप में परमेश्वर के प्रबंधन के कार्य के किसी दिए गए चरण में सिर्फ़ अपना कर्तव्य करना है। इस प्रकार के प्रबंधन के बिना, अर्थात्‌, यदि देहधारी परमेश्वर की सेवकाई खो जाती है, तो सृजित प्राणी का कर्तव्य भी खो जायेगा। अपनी सेवकाई को करने में परमेश्वर का कार्य मनुष्य का प्रबंधन करना है, जबकि मनुष्य का कर्तव्य करना सृष्टा की माँगों को पूरा करने के लिए अपने स्वयं के दायित्वों का प्रदर्शन है और किसी भी तरह से किसी की सेवकाई करना नहीं माना जा सकता है। परमेश्वर, अर्थात्‌, पवित्रात्मा के अंतर्निहित सार के लिए, परमेश्वर का कार्य उसका प्रबंधन है, किन्तु एक सृजन किए गए प्राणी का बाह्य स्वरूप पहने हुए देहधारी परमेश्वर के लिए, उसका कार्य अपनी सेवकाई को पूरा करना है। वह जो कुछ भी कार्य करता है वह अपनी सेवकाई को करने के लिए करता है, और मनुष्य केवल उसके प्रबंधन के क्षेत्र के भीतर और उसकी अगुआई के अधीन ही अपना सर्वोत्तम कर सकता है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर" से

यहाँ तक कि कोई मनुष्य जिसे पवित्र आत्मा के द्वारा उपयोग किया जाता है वह भी परमेश्वर स्वयं का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है। और न केवल यह व्यक्ति परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है, बल्कि उसका काम भी सीधे तौर पर परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है। करने का अर्थ है, कि मनुष्य के अनुभव को सीधे तौर पर परमेश्वर के प्रबंधन के अंतर्गत नहीं रखा जा सकता है, और यह परमेश्वर के प्रबंधन का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है। वह समस्त कार्य जिसे परमेश्वर स्वयं करता है वह ऐसा कार्य है जिसे वह अपनी स्वयं की प्रबंधन योजना में करने का इरादा करता है और बड़े प्रबंधन से संबंधित है। मनुष्य (पवित्र आत्मा के द्वारा उपयोग किया गया मनुष्य) के द्वारा किया गया कार्य उसके व्यक्तिगत अनुभव की आपूर्ति करता है। वह उस मार्ग से अनुभव का एक नया मार्ग पाता है जिस पर उससे पहले के लोग चले थे और पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन के अधीन अपने भाईयों और बहनों की अगुवाई करता है। जो कुछ ये लोग प्रदान करते हैं वह उनका व्यक्तिगत अनुभव या आध्यात्मिक मनुष्यों की आध्यात्मिक रचनाएँ हैं। यद्यपि पवित्र आत्मा के द्वारा उनका उपयोग किया जाता है, फिर भी ऐसे मनुष्यों का कार्य छ:-हज़ार-वर्षों की योजना के बड़े प्रबंधन कार्य से असम्बद्ध है। उन्हें सिर्फ तब तक पवित्र आत्मा की मुख्यधारा में लोगों की अगुवाई करने के लिए विभिन्न अवधियों में पवित्र आत्मा के द्वारा उभारा गया है जब तक कि वे अपने कार्य को पूरा न कर लें या उनकी ज़िन्दगियों का अंत न हो जाए। जिस कार्य को वे करते हैं वह केवल परमेश्वर स्वयं के लिए एक उचित मार्ग तैयार करने के लिए है या पृथ्वी पर परमेश्वर स्वयं की प्रबंधन योजना में एक अंश को निरन्तर जारी रखने के लिए है। ऐसे मनुष्य उसके प्रबंधन में बड़े-बड़े कार्य करने में असमर्थ होते हैं, और वे नए मार्गों की शुरुआत नहीं कर सकते हैं, और वे पूर्व युग के परमेश्वर के सभी कार्यों का समापन तो बिलकुल भी नहीं कर सकते हैं। इसलिए, जिस कार्य को वे करते हैं वह केवल एक सृजित प्राणी का प्रतिनिधित्व करता है जो अपने कार्यों को क्रियान्वित कर रहा है और स्वयं परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है जो अपनी सेवकाई को कार्यान्वित कर रहा हो। ऐसा इसलिए है क्योंकि जिस कार्य को वे करते हैं वह परमेश्वर स्वयं के द्वारा किए जाने वाले कार्य के असदृश है। एक नए युग के सूत्रपात का कार्य परमेश्वर के स्थान पर मनुष्य के द्वारा नहीं किया जा सकता है। इसे परमेश्वर स्वयं के अलावा किसी अन्य के द्वारा नहीं किया जा सकता है। मनुष्य के द्वारा किया गया समस्त कार्य सृजित प्राणी के रूप में उसके कर्तव्य का निर्वहन है और तब किया जाता है जब पवित्र आत्मा के द्वारा प्रेरित या प्रबुद्ध किया जाता है। ऐसे मनुष्य द्वारा प्रदान किया जाने वाला मार्गदर्शन यह होता है कि मनुष्य के दैनिक जीवन में किस प्रकार अभ्यास किया जाए और मनुष्य को किस प्रकार परमेश्वर की इच्छा के साथ समरसता में कार्य करना चाहिए। मनुष्य का कार्य न तो परमेश्वर की प्रबंधन योजना को सम्मिलित करता है और न ही पवित्रात्मा के कार्य का प्रतिनिधित्व करता है। एक उदाहरण के रूप में, गवाह ली और वॉचमैन नी का कार्य मार्ग की अगुआई करना था। चाहे मार्ग नया हो या पुराना, कार्य बाइबल के सिद्धांतों से अधिक नहीं के आधार पर किया गया था। चाहे स्थानीय कलीसियाओं को पुनर्स्थापित किया गया था अथवा बनाया गया था, उनका कार्य कलीसियाओं की स्थापना करना था। जो कार्य उन्होंने किया उसने उस कार्य को आगे बढ़ाया जिसे यीशु और उसके प्रेरितों ने समाप्त नहीं किया था या अनुग्रह के युग में आगे विकसित नहीं किया था। उन्होंने अपने कार्य में जो कुछ किया, वह उसे बहाल करना था जिसे यीशु ने अपने कार्य में अपने बाद की पीढ़ियों से कहा था, जैसे कि अपने सिरों को ढक कर रखना, बपतिस्मा, रोटी साझा करना या वाइन पीना। यह कहा जा सकता है कि उनका कार्य केवल बाइबल को बनाए रखना था और केवल बाइबल के भीतर से मार्ग तलाशना था। उन्होंने कोई भी नई प्रगति बिल्कुल नहीं की। इसलिए, कोई उनके कार्य में केवल बाइबल के भीतर ही नए मार्गों की खोज सकता है, और साथ ही बेहतर और अधिक यथार्थवादी अभ्यासों को देख सकता है। किन्तु कोई उनके कार्य में परमेश्वर की वर्तमान इच्छा को नहीं खोज सकता है, उस कार्य को तो बिल्कुल नहीं खोज सकता है जिसे परमेश्वर अंत के दिनों में करेगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि जिस मार्ग पर वे चलते थे वह तब भी पुराना था; उसमें कोई प्रगति नहीं थी और कुछ नया नहीं था। उन्होंने "यीशु को सलीब पर चढ़ाना" की वास्तविकता को, "लोगों को पश्चाताप करने और अपने पापों को स्वीकार करने के लिए कहने", और इस उक्ति "जो अन्त तक सहन करता है बचा लिया जाएगा" और इस उक्ति "पुरुष स्त्री का सिर है" और "स्त्री को अपने पति का आज्ञापालन करना चाहिए" के अभ्यास को जारी रखा। इसके अलावा, उन्होंने परंपरागत धारणा को बनाए रखा कि "बहनें उपदेश नहीं दे सकती हैं, और वे केवल आज्ञापालन कर सकती हैं।" यदि इस तरह की अगुआई जारी रही होती, तो पवित्र आत्मा कभी भी नए कार्य को करने, पुरुषों को सिद्धांत से मुक्त करने, या पुरुषों को स्वतंत्रता और सुंदरता के क्षेत्र में ले जाने में समर्थ नहीं होता। इसलिए, युगों के परिवर्तन के लिए कार्य का यह चरण स्वयं परमेश्वर के द्वारा किया और बोला जाना चाहिए, अन्यथा कोई भी व्यक्ति उसके स्थान पर ऐसा नहीं कर सकता है। अभी तक, इस धारा के बाहर पवित्र आत्मा का समस्त कार्य एकदम रुक गया है, और जिन्हें पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किया गया था वे दिग्भ्रमित हो गए हैं। इसलिए, चूँकि पवित्र आत्मा के द्वारा उपयोग किए गए मनुष्यों का कार्य परमेश्वर स्वयं के द्वारा किए गए कार्य के असदृश है, इसलिए उनकी पहचान और वे जिनकी ओर से कार्य करते हैं वे भी उसी तरह से भिन्न हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि पवित्र आत्मा जिस कार्य को करने का इरादा करता है वह भिन्न है, फलस्वरूप कार्य करने वाले सभी को अलग-अलग पहचानें और हैसियतें प्रदान की जाती है। पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए गए लोग भी कुछ कार्य कर सकते हैं जो नया हो और वे पूर्व युग में किये गए कुछ कार्य को हटा भी सकते हैं, किन्तु उनका कार्य नए युग में परमेश्वर के स्वभाव और इच्छा को व्यक्त नहीं कर सकता है। वे केवल पूर्व युग के कार्य को हटाने के लिए कार्य करते हैं, और सीधे तौर पर परमेश्वर स्वयं के स्वभाव का प्रतिनिधित्व करने के लिए कोई नया कार्य नहीं करते हैं। इस प्रकार, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वे पुरानी पड़ चुके कितने अभ्यासों का उन्मूलन करते हैं या वे नए अभ्यासों को आरंभ करते हैं, वे तब भी मनुष्य और सृजित प्राणियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। फिर भी, जब परमेश्वर स्वयं कार्य को करता है, तो भी, वह प्राचीन युग के अभ्यासों के उन्मूलन की खुलकर घोषणा नहीं करता है या सीधे तौर पर नए युग की शुरुआत की घोषणा नहीं करता है। वह अपने कार्य में प्रत्यक्ष और स्पष्ट है। वह उस कार्य को करने में निष्कपट है जिसका उसने इरादा किया है; अर्थात्, वह उस कार्य को सीधे तौर पर व्यक्त करता है जिसे उसने घटित किया है, वह सीधे तौर पर अपना कार्य करता है जैसा उसने मूलतः इरादा किया था, और अपने अस्तित्व एवं स्वभाव को व्यक्त करता है। जैसा मनुष्य इसे देखता है, उसका स्वभाव और उसी प्रकार उसका कार्य भी बीते युगों के लोगों के असदृश है। हालाँकि, परमेश्वर स्वयं के दृष्टिकोण से, यह मात्र उसके कार्य की निरन्तरता और आगे का विकास है। जब परमेश्वर स्वयं कार्य करता है, तो वह अपने वचन को व्यक्त करता है और सीधे तौर पर नया कार्य लाता है। इसके विपरीत, जब मनुष्य काम करता है, तो यह विचार-विमर्श एवं अध्ययन के माध्यम से होता है, या यह दूसरों के कार्य की बुनियाद पर निर्मित ज्ञान का विकास और अभ्यास का व्यवस्थापन है। कहने का अर्थ है, कि मनुष्य के द्वारा किए गए कार्य का सार प्रथा को बनाए रखना और "नए जूतों में पुराने मार्ग पर चलना" है। इसका अर्थ है कि यहाँ तक कि पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए गए मनुष्यों द्वारा चला गया मार्ग भी उस पर बनाया गया है जिसे स्वयं परमेश्वर के द्वारा खोला गया था। अतः मनुष्य आख़िरकर मनुष्य है, और परमेश्वर परमेश्वर है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "देहधारण का रहस्य (1)" से

आप मनुष्य के काम से क्या देख सकते हैं? मनुष्य के काम में मनुष्य के अनुभव के बहुत सारे तत्व होते हैं; मनुष्य जैसा अभिव्यक्त करता है वह वैसा ही होता है। परमेश्वर का स्वयं का कार्य भी उसे ही अभिव्यक्त करता है, परन्तु जो वह है वह मनुष्य से अलग है। मनुष्य जो कुछ है वह मनुष्य के अनुभव एवं जीवन का प्रतिनिधि है (जो कुछ मनुष्य अपने जीवन में अनुभव एवं सामना करता है, या जो उसके जीवन-दर्शन हैं), और विभिन्न वातावरणों में रहने वाले लोग विभिन्न प्राणियों को व्यक्त करते हैं। आपके पास सामाजिक अनुभव हैं या नहीं और आप वास्तव में किस प्रकार अपने परिवार में रहते एवं अनुभव करते हैं उसे जो कुछ आप अभिव्यक्त करते हैं उसमें देखा जा सकता है, जबकि आप देहधारी परमेश्वर के कार्य से यह नहीं देख सकते हैं कि उसके पास सामाजिक अनुभव हैं या नहीं। वह मनुष्य के सार-तत्व से अच्छी तरह से परिचित है, वह सभी प्रकार के अभ्यास को प्रगट कर सकता है जो सब प्रकार के लोगों से सम्बन्धित होते हैं। वह मानव के भ्रष्ट स्वभाव एवं विद्रोही आचरण को भी बेहतर ढंग से प्रगट कर सकता है। वह सांसारिक लोगों के मध्य नहीं रहता है, परन्तु वह नश्वर मनुष्यों के स्वभाव और सांसारिक लोगों की समस्त भ्रष्टता से भली भांति अवगत है। वह ऐसा ही है। हालाँकि वह संसार के साथ व्यवहार नहीं करता है, फिर भी वह संसार के साथ व्यवहार करने के नियमों को जानता है, क्योंकि वह मानवीय स्वभाव को पूरी तरह से समझता है। वह वर्तमान एवं अतीत दोनों के आत्मा के कार्य के विषय में जानता है जिसे मनुष्य की आंखें नहीं देख सकती हैं जिसे मनुष्य के कान नहीं सुन सकते हैं। इसमें बुद्धि शामिल है जो जीवन का दर्शनशास्त्र एवं आश्चर्य नहीं है जिसकी गहराई नापना मनुष्य को कठिन जान पड़ता है। वह ऐसा ही है, लोगों के लिए खुला और साथ ही लोगों से छिपा हुआ भी है। जो कुछ वह अभिव्यक्त करता है वह ऐसा नहीं है जैसा एक असाधारण मनुष्य होता है, परन्तु अंतर्निहित गुण एवं आत्मा का अस्तित्व है। वह संसार भर में यात्रा नहीं करता है परन्तु उसके विषय में हर एक चीज़ को जानता है। वह "वन-मानुषों" के साथ सम्पर्क करता है जिनके पास कोई ज्ञान या अंतर्दृष्टि नहीं है, परन्तु वह ऐसे शब्दों को व्यक्त करता है जो ज्ञान से ऊँचे और महान मनुष्यों से ऊपर हैं। वह कम समझ एवं सुन्न लोगों के समूह के मध्य रहता है जिनके पास मानवता नहीं है और जो मानवीय परम्पराओं एवं जीवनों को नहीं समझते हैं, परन्तु वह मानवजाति से सामान्य मानवता को जीने के लिए कह सकता है, ठीक उसी समय वह मानवजाति के नीच एवं घटिया मनुष्यत्व को प्रगट करता है। यह सब कुछ वही है जो वह है, वह किसी भी मांस और लहू के व्यक्ति की अपेक्षा अधिक ऊँचा है। उसके लिए, यह जरुरी नहीं है कि वह उस काम को करने के लिए जिसे उसे करने की आवश्यक है जटिल, बोझिल एवं पतित सामाजिक जीवन का अनुभव करे और भ्रष्ट मानवजाति के सार-तत्व को पूरी तरह से प्रगट करे। ऐसा पतित सामाजिक जीवन उसकी देह को उन्नत नहीं करता है। उसके कार्य एवं वचन मनुष्य केआज्ञालंघन को ही प्रगट करते हैं और संसार के साथ निपटने के लिए मनुष्य को अनुभव एवं शिक्षाएं प्रदान नहीं करते हैं। जब वह मनुष्य को जीवन की आपूर्ति करता है तो उसे समाज या मनुष्य के परिवार की जांच पड़ताल करने की कोई आवश्यकता नहीं होती है। मनुष्य का खुलासा एवं न्याय करना उसकी देह के अनुभवों की अभिव्यक्ति नहीं है; यह लम्बे समय तक मनुष्य के आज्ञालंघन को जानने के बाद उसकी अधार्मिकता को प्रगट करने और मानवता के भ्रष्ट स्वभाव से घृणा करने के लिए है। वह कार्य जिसे परमेश्वर करता है वह मनुष्य पर अपने स्वभाव को पूरी तरह से प्रगट करने और अपने अस्तित्व को अभिव्यक्त करने के लिए है। केवल वही इस कार्य को कर सकता है, यह ऐसी चीज़ नहीं है जिसे मांस और लहू का व्यक्ति हासिल कर सकता है। परमेश्वर के कार्य के लिहाज से, मनुष्य यह नहीं बता सकता कि वह किस प्रकार का व्यक्ति है। मनुष्य परमेश्वर के कार्य के आधार पर भी उसे एक सृजे गए व्यक्ति के रूप में वर्गीकृत करने में असमर्थ है। जो वह है उससे भी उसे एक सृजे गए प्राणी के रूप में वर्गीकृत नहीं किया जा सकता है। मनुष्य उसे केवल एक ग़ैर-मानव मान सकता है, किन्तु वह यह नहीं जानता है कि उसे किस श्रेणी में रखा जाए, अतः मनुष्य उसे परमेश्वर की श्रेणी में सूचीबद्ध रखने के लिए मजबूर है। मनुष्य के लिए ऐसा करना असंगत नहीं है, क्योंकि परमेश्वर ने लोगों के मध्य बहुत सारा कार्य किया है जिसे मनुष्य करने में असमर्थ है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का काम" से

वह कार्य जिसे परमेश्वर करता है वह उसकी देह के अनुभव का प्रतिनिधित्व नहीं करता है; वह कार्य जिसे मनुष्य करता है वह मनुष्य के अनुभव का प्रतिनिधित्व करता है। हर कोई अपने व्यक्तिगत अनुभव के विषय में बातचीत करता है। परमेश्वर सीधे तौर पर सत्य को अभिव्यक्त कर सकता है, जबकि मनुष्य केवल सत्य का अनुभव करने के पश्चात् ही उससे सम्बन्धित अनुभव को अभिव्यक्त कर सकता है। परमेश्वर के कार्य में कोई नियम नहीं होते हैं और यह समय या भौगोलिक अवरोधों के अधीन नहीं होता है। वह जो है उसे वह किसी भी समय, कहीं पर भी प्रगट कर सकता है। जो वह है उसे वह किसी भी समय एवं किसी भी स्थान पर व्यक्त कर सकता है। जैसा उसे अच्छा लगता है वह वैसा कार्य करता है। मनुष्य के काम में परिस्थितियां एवं सन्दर्भ होते हैं; अन्यथा, वह काम करने में असमर्थ होता है और वह परमेश्वर के विषय में अपने ज्ञान को व्यक्त करने या सत्य के विषय में अपने अनुभव को व्यक्त करने में असमर्थ होता है। आपको बस यह बताने के लिए उनके बीच के अन्तर की तुलना करनी है कि यह परमेश्वर का अपना कार्य है या मनुष्य का काम है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का काम" से

केवल युग की अगुवाई करने और एक नए कार्य को गतिमान करने के लिए परमेश्वर देह बनता है। तुम लोगों को इस बिन्दु को समझना होगा। यह मनुष्य के प्रकार्य से बहुत अलग है, और दोनों को लगभग एक साथ नहीं कहा जा सकता है। इससे पहले कि कार्य करने के लिए मनुष्य का उपयोग किया जाए, मनुष्य को विकसित होने एवं पूर्णता की एक लम्बी समयावधि की आवश्यकता है और एक विशेष रूप में बड़ी मानवता की आवश्यकता है। न केवल मनुष्य को अपनी सामान्य मानवीय समझ को बनाए रखने के योग्य अवश्य होना चाहिए, बल्कि मनुष्य को दूसरों के सामने व्यवहार के अनेक सिद्धान्तों और नियमों को अवश्य और भी अधिक समझना चाहिए, और इसके अतिरिक्त उसे अवश्य मनुष्य की बुद्धि और नैतिकता को और अधिक सीखना चाहिए। यह वह है जिससे मनुष्य को सुसज्जित अवश्य होना होगा। हालाँकि, परमेश्वर देह बनता है के लिए ऐसा नहीं है, क्योंकि उसका कार्य न तो मनुष्य का प्रतिनिधित्व करता है और न ही मनुष्यों का है; इसके बजाए, यह उसके अस्तित्व की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है और उस कार्य का प्रत्यक्ष कार्यान्वयन है जो उसे अवश्य करना चाहिए। (प्राकृतिक रूप से, उसका कार्य तब किया जाता है जब उसे किया जाना चाहिए, और इच्छानुसार यादृच्छिक रूप से नहीं किया जाता है। बल्कि, उसका कार्य तब शुरू होता है जब उसकी सेवकाई को पूरा करने का समय होता है।) वह मनुष्य के जीवन में या मनुष्य के कार्य में भाग नहीं लेता है, अर्थात्, उसकी मानवता इन में से किसी भी चीज़ से सुसज्जित नहीं है (परन्तु इससे उसका कार्य प्रभावित नहीं होता है)। वह केवल अपनी सेवकाई को पूरा करता है जब उसके लिए ऐसा करने का समय होता है; उसकी हैसियत कुछ भी हो, वह बस उस कार्य के साथ आगे बढ़ता है जो उसे अवश्य करना चाहिए। मनुष्य उसके बारे में जो कुछ भी जानता है या उसके बारे में उसकी जो कुछ भी राय हों, इससे उसके कार्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "देहधारण का रहस्य (3)" से

मसीह का कार्य तथा अभिव्यक्ति उसके सार को निर्धारित करते हैं। वह अपने सच्चे हृदय से उस कार्य को पूर्ण करने में सक्षम है जो उसे सौंपा गया है। वह सच्चे हृदय से स्वर्ग में परमेश्वर की आराधना करने में सक्षम है, तथा सच्चे हृदय से परमपिता परमेश्वर की इच्छा खोजने में सक्षम है। यह सब उसके सार द्वारा निर्धारित किया जाता है। और इसी प्रकार से उसका प्राकृतिक प्रकाशन भी उसके सार द्वारा निर्धारित किया जाता है; उसके स्वाभाविक प्रकाशन का ऐसा कहलाना इस वजह से है कि उसकी अभिव्यक्ति कोई नकल नहीं है, या मनुष्य द्वारा शिक्षा का परिणाम, या मनुष्य द्वारा अनेक वर्षों संवर्धन का परिणाम नहीं है। उसने इसे सीखा या इससे स्वयं को सँवारा नहीं; बल्कि, यह उसके अन्दर अंतर्निहित है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "स्वर्गिक परमपिता की इच्छा के प्रति आज्ञाकारिता ही मसीह का वास्तविक सार है" से

अगर मनुष्य को यह कार्य करना पड़ता, तो यह बहुत ही सीमित हो जाता; यह मनुष्य को एक निश्चित बिन्दु तक ले जा सकता था, परन्तु यह मनुष्य को अनंत मंज़िल पर ले जाने में सक्षम नहीं होता। मनुष्य की नियति को निर्धारित करने के लिए मनुष्य समर्थ नहीं है, इसके अतिरिक्त, न ही वह मनुष्य के भविष्य की संभावनाओं एवं भविष्य की मंज़िल को सुनिश्चित करने में सक्षम है। फिर भी, परमेश्वर के द्वारा किया गया कार्य भिन्न होता है। चूँकि उसने मनुष्य को सृजा था, इसलिए वह मनुष्य की अगुवाई करता है; चूँकि वह मनुष्य को बचाता है, इसलिए वह उसे पूरी तरह से बचाएगा, और उसे पूरी तरह प्राप्त करेगा; चूँकि वह मनुष्य की अगुवाई करता है, इसलिए वह उसे उस उपयुक्त मंज़िल पर पहुंचाएगा, और चूँकि उसने मनुष्य को सृजा था और उसका प्रबंध करता है, इसलिए उसे मनुष्य की नियति एवं उसकी भविष्य की संभावनाओं की ज़िम्मेदारी लेनी होगी। यही वह कार्य है जिसे सृष्टिकर्ता के द्वारा किया गया है। हालाँकि विजय के कार्य को भविष्य की संभावनाओं से मनुष्य को शुद्ध करने के द्वारा हासिल किया जाता है, फिर भी अन्ततः मनुष्य को उस उपयुक्त मंज़िल पर पहुंचाया जाना चाहिए जिसे परमेश्वर के द्वारा उसके लिए तैयार किया गया है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक बेहतरीन मंज़िल पर लेचलना" से

मनुष्य के काम में एक दायरा एवं सीमाएं होती हैं। कोई व्यक्ति केवल एक ही निश्चित अवस्था के कार्य को करने के लिए योग्य होता है और सम्पूर्ण युग के कार्य को नहीं कर सकता हैं - अन्यथा, वह लोगों को नियमों के भीतर ले जाएगा। मनुष्य के काम को केवल एक विशेष समय या अवस्था पर ही लागू किया जा सकता है। यह इसलिए है क्योंकि मनुष्य के अनुभव में एक दायरा होता है। कोई व्यक्ति परमेश्वर के कार्य के साथ मनुष्य के काम की तुलना नहीं कर सकता है। मनुष्य के अभ्यास करने के तरीके और सत्य के विषय में उसके समस्त ज्ञान को एक विशेष दायरे में लागू किया जाता है। आप नहीं कह सकते हैं कि वह मार्ग जिस पर कोई मनुष्य चलता है वह पूरी तरह से पवित्र आत्मा की इच्छा है, क्योंकि मनुष्य को केवल पवित्र आत्मा के द्वारा ही प्रकाशित किया जा सकता है और उसे पवित्र आत्मा से पूरी तरह से भरा नहीं जा सकता है। ऐसी चीज़ें जिन्हें मनुष्य अनुभव कर सकता है वे सभी सामान्य मानवता के दायरे के भीतर हैं और वे सामान्य मानवीय मस्तिष्क में विचारों की सीमाओं से आगे नहीं बढ़ सकती हैं। वे सभी जिनके पास व्यावहारिक अभिव्यक्ति है वे इस सीमा के अंतर्गत अनुभव करते हैं। जब वे सत्य का अनुभव करते हैं, तो यह हमेशा ही पवित्र आत्मा के अद्भुत प्रकाशन के अधीन सामान्य मानवीय जीवन का एक अनुभव है, और यह ऐसी रीति से अनुभव करना नहीं है जो सामान्य मानवीय जीवन से दूर हट जाता है। अपने मानवीय जीवन को जीने के आधार पर वे उस सच्चाई का अनुभव करते हैं जिसे पवित्र आत्मा के द्वारा प्रकाशित किया जाता है। इसके अतिरिक्त, यह सत्य एक व्यक्ति से लेकर दूसरे व्यक्ति तक भिन्न होता है, और इसकी गहराई उस व्यक्ति की दशा से सम्बन्धित होती है। कोई व्यक्ति केवल यह कह सकता है कि वह मार्ग जिस पर वे चलते हैं वह किसी मनुष्य का सामान्य जीवन है जो सत्य का अनुसरण कर रहा है, और यह कि यह वह मार्ग जिस पर किसी साधारण व्यक्ति के द्वारा चला गया है जिसके पास पवित्र आत्मा का अद्भुत प्रकाशन है। आप नहीं कह सकते हैं कि वह मार्ग जिस पर वे चलते हैं वह ऐसा मार्ग है जिसे पवित्र आत्मा द्वारा लिया गया है। सामान्य मानवीय अनुभव में, क्योंकि ऐसे लोग जो अनुसरण करते हैं वे एक समान नहीं होते हैं, इसलिए पवित्र आत्मा का कार्य भी एक समान नहीं होता है। इसके साथ ही, क्योंकि ऐसे वातावरण जिनका वे अनुभव करते हैं और उनके अनुभव की सीमाएं एक समान नहीं होती हैं, उनके मस्तिष्क एवं विचारों के मिश्रण के कारण, उनके अनुभव विभिन्न मात्राओं तक मिश्रित हो जाते हैं। प्रत्येक व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत विभिन्न परिस्थितियों के अनुसार ही किसी सच्चाई को समझ पाता है। सत्य के वास्तविक अर्थ के विषय में उनकी समझ पूर्ण नहीं है और यह इसका केवल एक या कुछ ही पहलु है। वह दायरा जिसके परिणामस्वरूप मनुष्य के द्वारा उस सच्चाई का अनुभव किया जाता है वह हमेशा ही व्यक्तित्वों की विभिन्न परिस्थितियों पर आधारित होता है और इसलिए यह एक समान नहीं होता है। इस रीति से, वह ज्ञान जिसे विभिन्न लोगों के द्वारा उसी सच्चाई से अभिव्यक्त किया जाता है वह एक समान नहीं है। कहने का तात्पर्य है, मनुष्य के अनुभव में हमेशा सीमाएं होती हैं और यह पवित्र आत्मा की इच्छा को पूरी तरह से दर्शा नहीं सकता है, और मनुष्य के काम को परमेश्वर के कार्य के समान महसूस नहीं किया जा सकता है, भले ही जो कुछ मनुष्य के द्वारा अभिव्यक्त किया जाता है वह परमेश्वर की इच्छा से नज़दीकी से सम्बन्ध रखता हो, भले ही मनुष्य का अनुभव सिद्ध करनेवाले कार्य के बेहद करीब हो जिसे पवित्र आत्मा के द्वारा किया जाना है। मनुष्य केवल परमेश्वर का सेवक हो सकता है, और उस कार्य को कर सकता है जिसे परमेश्वर ने उसे सौंपा है। मनुष्य केवल पवित्र आत्मा के अद्भुत प्रकाशन के अधीन उस ज्ञान को और उन सच्चाईयों को व्यक्त कर सकता है जिन्हें उसने अपने व्यक्तिगत अनुभवों से अर्जित किया है। मनुष्य अयोग्य है और उसके पास ऐसी स्थितियां नहीं हैं कि वह पवित्र आत्मा की अभिव्यक्ति का साधन बने। वह यह कहने का हकदार नहीं है कि मनुष्य का काम परमेश्वर का कार्य है। मनुष्य के पास मनुष्य के कार्य करने के सिद्धान्त होते हैं, और सभी मनुष्यों के पास विभिन्न अनुभव होते हैं और उनके पास अलग अलग स्थितियां होती हैं। मनुष्य का काम पवित्र आत्मा के अद्भुत प्रकाशन के अधीन उसके सभी अनुभवों को सम्मिलित करता है। ये अनुभव केवल मनुष्य के अस्तित्व का प्रतिनिधित्व करते हैं और परमेश्वर के अस्तित्व या पवित्र आत्मा की इच्छा का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं। इसलिए, वह मार्ग जिस पर मनुष्य के द्वारा चला जाता है उसे ऐसा मार्ग नहीं कहा जा सकता है जिस पर पवित्र आत्मा के द्वारा चला गया है क्योंकि मनुष्य का काम परमेश्वर के कार्य का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता और मनुष्य का काम एवं मनुष्य का अनुभव पवित्र आत्मा की सम्पूर्ण इच्छा नहीं है। मनुष्य के काम का झुकाव नियम के अंतर्गत आने के लिए होता है, और उसके कार्य करने के तरीके को आसानी से एक सीमित दायरे में सीमित किया जा सकता है और यह स्वतन्त्र रूप से लोगों की अगुवाई करने में असमर्थ है। अधिकांश अनुयायी एक सीमित दायरे में जीवन बिताते हैं, और उनके अनुभव करने का मार्ग भी इसके दायरे तक ही सीमित होता है। मनुष्य का अनुभव हमेशा सीमित होता है; उसके कार्य करने का तरीका भी कुछ प्रकारों तक ही सीमित होता है और पवित्र आत्मा के कार्य से या स्वयं परमेश्वर के कार्य से इसकी तुलना नहीं की जा सकती है - यह इसलिए है क्योंकि अंत में मनुष्य का अनुभव सीमित होता है। फिर भी परमेश्वर अपना कार्य करता है, इसके लिए कोई नियम नहीं है; फिर भी वह पूर्ण होता है, यह एक तरीके पर सीमित नहीं है। परमेश्वर के कार्य के लिए किसी भी प्रकार के नियम नहीं हैं, उसके समस्त कार्य को स्वतन्त्र रूप से मुक्त किया गया है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि मनुष्य उसका अनुसरण करते हुए कितना समय बिताता है, वे उसके कार्य करने के तरीकों के विषय में किसी भी प्रकार के नियमों का सार नहीं निकल सकते हैं। हालाँकि उसका कार्य सैद्धांतिक है, और इसे हमेशा नए तरीकों से किया जाता है और इसमें हमेशा नई नई प्रगति होती रहती है, जो मनुष्य की पहुंच से परे है। एक समय काल के दौरान, हो सकता है कि परमेश्वर के पास भिन्न भिन्न प्रकार के कार्य और भिन्न भिन्न प्रकार की अगुवाई हो, जो लोगों को अनुमति देती हो कि उनके पास हमेशा नए नए प्रवेश एवं नए नए परिवर्तन हों। आप उसके कार्य के नियमों का पता नहीं लगा सकते हैं क्योंकि वह हमेशा नए तरीकों से कार्य कर रहा है। केवल इस रीति से ही परमेश्वर के अनुयायी नियमों के अंतर्गत नहीं आते हैं। स्वयं परमेश्वर का कार्य हमेशा लोगों की धारणाओं से परहेज करता है और उनकी धारणाओं का विरोध करता है। ऐसे लोग जो एक सच्चे हृदय के साथ उसके पीछे पीछे चलते हैं और उसका अनुसरण करते हैं केवल उनका स्वभाव ही रूपान्तरित हो सकता है और वे किसी भी प्रकार के नियमों के अधीन हुए बिना या किसी भी प्रकार की धार्मिक धारणाओं के द्वारा अवरुद्ध हुए बगैर स्वतन्त्रता से जीवन जी सकते हैं। ऐसी मांगें जिन्हें मनुष्य का काम लोगों से करता है वे उनके स्वयं के अनुभव और उस चीज़ पर आधारित होते हैं जिन्हें वह स्वयं हासिल कर सकता है। इन अपेक्षाओं का स्तर एक निश्चित दायरे के भीतर सीमित होता है, और अभ्यास के तरीके भी बहुत ही सीमित होते हैं। इस प्रकार अनुयायी सीमित दायरे के भीतर अवचेतन रूप से जीवन बिताते हैं; जैसे जैसे समय गुज़रता है, वे नियम एवं रीति रिवाज बन जाते हैं।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का काम" से

मनुष्य की नियति के संबंध में परमेश्वर के कोई भी कार्य या वचन, मनुष्यों के मूलतत्व के आधार पर उचित रीति से प्रत्येक मनुष्य में कार्य करते हैं, वहाँ कोई संयोग नहीं है, और निश्चय ही लेशमात्र भी त्रुटि नहीं है। केवल जब एक मनुष्य कार्य करेगा तब मनुष्य की भावनाएँ या अर्थ उसमें मिश्रित होंगे। परमेश्वर जो कार्य करता है, वह सबसे अधिक उपयुक्त होता है, वह निश्चित तौर पर किसी प्राणी के विरुद्ध झूठे दावे नहीं करेगा।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे" से

फुटनोट:

क. मूल पाठ "चाहे वह परमेश्वर हो।" को छोड़ता है

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