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अध्याय 6 विभेदन के कई रूप जिन्हें परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास में तुम्हें धारण करना चाहिए

2. तुम्हें पवित्र आत्मा के और दुष्ट आत्माओं के कार्य के बीच में कैसे विभेद करना चाहिए?

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

पवित्र आत्मा का कार्य कुल मिलाकर लोगों को इस योग्य बनाना है कि वे लाभ प्राप्त कर सकें; यह कुल मिलाकर लोगों की उन्नति के विषय में है; ऐसा कोई कार्य नहीं है जो लोगों को लाभान्वित न करता हो। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि सत्य गहरा है या उथला, और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि उन लोगों की क्षमता किसके समान है जो सत्य को स्वीकार करते हैं, जो कुछ भी पवित्र आत्मा करता है, यह सब लोगों के लिए लाभदायक है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का काम" से

पवित्र आत्मा का कार्य सक्रिय अगुवाई करना और सकारात्मक प्रकाशन है। यह लोगों को निष्क्रिय नहीं बनने देता है। यह उनको राहत पहुँचाता है, उन्हें विश्वास और दृढ़ निश्चय देता है और यह परमेश्वर के द्वारा सिद्ध किए जाने का अनुसरण करने के लिए उन्हें योग्य बनाता है। जब पवित्र आत्मा कार्य करता है, तो लोग सक्रिय रूप से प्रवेश कर सकते हैं; वे निष्क्रिय नहीं होते और उन्हें बाध्य भी नहीं किया जाता, बल्कि वे सक्रिय रहते हैं। जब पवित्र आत्मा कार्य करता है तो लोग प्रसन्न और इच्छापूर्ण होते हैं, और वे आज्ञा मानने के लिए तैयार होते हैं, और स्वयं को दीन करने में प्रसन्न होते हैं, और यद्यपि भीतर से पीड़ित और दुर्बल होते हैं, फिर भी उनमें सहयोग करने का दृढ़ निश्चय होता है, वे ख़ुशी-ख़ुशी दुःख सह लेते हैं, वे आज्ञा मान सकते हैं, और वे मानवीय इच्छा से निष्कलंक रहते हैं, मनुष्य की विचारधारा से निष्कलंक रहते हैं, और निश्चित रूप से मानवीय अभिलाषाओं और अभिप्रेरणाओं से निष्कलंक रहते हैं। जब लोग पवित्र आत्मा के कार्य का अनुभव करते हैं, तो वे भीतर से विशेष रूप से पवित्र हो जाते हैं। जो पवित्र आत्मा के कार्य को अपने अंदर रखते हैं वे परमेश्वर के प्रेम को और अपने भाइयों और बहनों के प्रेम को अपने जीवनों से दर्शाते हैं, और ऐसी बातों में आनंदित होते हैं जो परमेश्वर को आनंदित करती हैं, और उन बातों से घृणा करते हैं जिनसे परमेश्वर घृणा करता है। ऐसे लोग जो पवित्र आत्मा के कार्य के द्वारा स्पर्श किए जाते हैं, उनमें सामान्य मनुष्यत्व होता है, और वे मनुष्यत्व को रखते हैं और निरंतर सत्य का अनुसरण करते हैं। जब पवित्र आत्मा लोगों के भीतर कार्य करता है, तो उनकी परिस्थितियाँ और अधिक बेहतर हो जाती हैं और उनका मनुष्यत्व और अधिक सामान्य हो जाता है, और यद्यपि उनका कुछ सहयोग मूर्खतापूर्ण हो सकता है, परंतु फिर भी उनकी प्रेरणाएँ सही होती हैं, उनका प्रवेश सकारात्मक होता है, वे रूकावट बनने का प्रयास नहीं करते और उनमें कुछ भी दुर्भाव नहीं होता। पवित्र आत्मा का कार्य सामान्य और वास्तविक होता है, पवित्र आत्मा मनुष्य के भीतर मनुष्य के सामान्य जीवन के नियमों के अनुसार कार्य करता है, और वह सामान्य लोगों के वास्तविक अनुसरण के अनुसार लोगों को प्रकाशित करता है और उन्हें अगुवाई देता है। जब पवित्र आत्मा लोगों में कार्य करता है तो वह सामान्य लोगों की आवश्यकता के अनुसार अगुवाई करता और प्रकाशित करता है, वह उनकी आवश्यकताओं के अनुसार उनकी जरूरतों को पूरा करता है, और वह सकारात्मक रूप से उनकी कमियों और अभावों के आधार पर उनकी अगुवाई करता है और उनको प्रकाशित करता है; जब पवित्र आत्मा कार्य करता है, तो यह कार्य मनुष्य के सामान्य जीवन के नियमों के साथ सांमजस्यपूर्ण होता है, और यह केवल वास्तविक जीवन में ही होता है कि लोग पवित्र आत्मा के कार्य को देख सकते हैं। यदि अपने दिन-प्रतिदिन के जीवन में लोग सकारात्मक अवस्था में हों और उनके पास एक सामान्य आत्मिक जीवन हो, तो उनमें पवित्र आत्मा के कार्य पाए जाते हैं। ऐसी अवस्था में, जब वे परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हैं तो उनमें विश्वास आता है, जब वे प्रार्थना करते हैं, तो वे प्रेरित होते हैं, जब उनके साथ कुछ घटित होता है तो वे निष्क्रिय नहीं होते, और उनके साथ कुछ घटित होते समय वे उन सबकों या सीखों को देख सकते हैं जो परमेश्वर चाहता है कि वे सीखें, और वे निष्क्रिय, या कमजोर नहीं होते, और यद्यपि उनके जीवन में वास्तविक कठिनाइयाँ होती हैं, फिर भी वे परमेश्वर के सभी प्रबंधनों की आज्ञा मानने के लिए तैयार रहते हैं।

...

शैतान की ओर से कौनसे कार्य आते हैं? उस कार्य में जो शैतान की ओर से आता है, ऐसे लोगों में दर्शन अस्पष्ट और धुंधले होते हैं, और वे सामान्य मनुष्यत्व के बिना होते हैं, उनमें उनके कार्यों के पीछे की प्रेरणाएँ गलत होती हैं, और यद्यपि वे परमेश्वर से प्रेम करना चाहते हैं, फिर भी उनके भीतर सैदव दोषारोपण रहते हैं, और ये दोषारोपण और विचार उनमें सदैव हस्तक्षेप करते रहते हैं, जिससे वे उनके जीवन की बढ़ोतरी को सीमित कर देते हैं और परमेश्वर के समक्ष सामान्य परिस्थितियों को रखने से उन्हें रोक देते हैं। कहने का अर्थ है कि जैसे ही लोगों में शैतान का कार्य आरंभ होता है, तो उनके हृदय परमेश्वर के समक्ष शांत नहीं हो सकते, उन्हें नहीं पता होता कि वे स्वयं के साथ क्या करें, सभा का दृश्य उन्हें वहाँ से भाग जाने को बाध्य करता है, और वे तब अपनी आँखें बंद नहीं रख पाते जब दूसरे प्रार्थना करते हैं। दुष्ट आत्माओं का कार्य मनुष्य और परमेश्वर के बीच के सामान्य संबंध को तोड़ देता है, और लोगों के पहले के दर्शनों और उस मार्ग को बिगाड़ देता है जिनमें उनके जीवन ने प्रवेश किया था, अपने हृदयों में वे कभी परमेश्वर के करीब नहीं आ सकते, ऐसी बातें निरंतर होती रहती हैं जो उनमें बाधा उत्पन्न करती हैं और उन्हें बंधन में बाँध देती हैं, और उनके हृदय शांति प्राप्त नहीं कर पाते, जिससे उनमें परमेश्वर से प्रेम करने की कोई शक्ति नहीं बचती, और उनकी आत्माएँ पतन की ओर जाने लगती हैं। शैतान के कार्यों के प्रकटीकरण ऐसे हैं। शैतान का कार्य निम्न रूपों में प्रकट होता है: अपने स्थान और गवाही में स्थिर खड़े नहीं रह सकना, तुम्हें ऐसा बना देना जो परमेश्वर के समक्ष दोषी हो, और जिसमें परमेश्वर के प्रति कोई विश्वासयोग्यता न हो। शैतान के हस्तक्षेप के समय तुम अपने भीतर परमेश्वर के प्रति प्रेम और वफ़ादारी को खो देते हो, तुम परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध से वंचित कर दिए जाते हो, तुम सत्य या स्वयं के सुधार का अनुसरण नहीं करते, तुम पीछे हटने लगते हो, और निष्क्रिय बन जाते हो, तुम स्वयं को आसक्त कर लेते हो, तुम पाप के फैलाव को खुली छूट दे देते हो, और पाप से घृणा भी नहीं करते; इससे बढ़कर, शैतान का हस्तक्षेप तुम्हें स्वच्छंद बना देता है, यह तुम्हारे भीतर से परमेश्वर के स्पर्श को हटा देता है, और तुम्हें परमेश्वर के प्रति शिकायत करने और उसका विरोध करने को प्रेरित करता है, जिससे तुम परमेश्वर पर सवाल उठाते हो, और फिर तुम परमेश्वर को त्यागने तक को तैयार होने लगते हो। यह सब शैतान का कार्य है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "पवित्र आत्मा का कार्य और शैतान का कार्य" से

यदि यह पवित्र आत्मा का कार्य है, तो मनुष्य हमेशा से अधिक सामान्य बन जाता है, और उसकी मानवता हमेशा से अधिक सामान्य बन जाती है। मनुष्य को अपने स्वभाव का, जिसे शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है और मनुष्य के सार का बढ़ता हुआ ज्ञान होता है, और उसकी सत्य के लिए हमेशा से अधिक ललक होती है। अर्थात्, मनुष्य का जीवन अधिकाधिक बढ़ता जाता है और मनुष्य का भ्रष्ट स्वभाव अधिकाधिक बदलावों में सक्षम हो जाता है – जिस सब का अर्थ है परमेश्वर का मनुष्य का जीवन बनना। यदि एक मार्ग उन चीजों को प्रकट करने में असमर्थ है जो मनुष्य का सार हैं, मनुष्य के स्वभाव को बदलने में असमर्थ है, और, इसके अलावा, उसे परमेश्वर के सामने लाने में असमर्थ है या उसे परमेश्वर की सच्ची समझ प्रदान कराने में असमर्थ है, और यहाँ तक कि उसकी मानवता का हमेशा से अधिक निम्न होने और उसकी भावना का हमेशा से अधिक असामान्य होने का कारण बनता है, तो यह मार्ग अवश्य सच्चा मार्ग नहीं होना चाहिए और यह दुष्टात्मा का कार्य, या पुराना मार्ग हो सकता है। संक्षेप में, यह पवित्र आत्मा का वर्तमान का कार्य नहीं हो सकता है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "जो परमेश्वर को और उसके कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर को सन्तुष्ट कर सकते हैं" से

परमेश्वर से उत्पन्न होने वाली चीज़ें तुम्हें दर्शन के बारे में अधिक स्पष्ट करती हैं, और वे तुम्हें परमेश्वर के करीब और करीब पहुंचाती हैं, और सच्चाई से भाइयों और बहनों के साथ प्रेम साझा करने में मदद करती हैं; तुम परमेश्वर के बोझ की ओर ध्यान देने के काबिल हो, और परमेश्वर-प्रेमी तुम्हारा दिल रुकता नहीं है; तुम्हारे चलने के लिए एक रास्ता होता है। शैतान से उत्पन्न होने वाली चीज़ों के कारण तुम दर्शन खो देते हो और जो कुछ भी तुम्हारे पास पहले था वह सब चला जाता है; तुम परमेश्वर से दूर हो जाते हो, भाइयों और बहनों के लिए तुम्हारे दिल में कोई प्रेम नहीं रहता और तुम्हारे दिल में घृणा भर जाती है। तुम हताश हो जाते हो, तुम कलीसिया का जीवन व्यतीत नहीं करना चाहते हो, और अब तुम्हारा दिल परमेश्वर-प्रेमी नहीं रहता। यह शैतान का काम है और यह बुरी आत्माओं के काम का परिणाम भी है।

"आरंभ में मसीह के कथन और गवाहियाँ" से

का ज्ञान देता है, और उनकी सच्ची प्रविष्टि और सच्ची अवस्था का ज्ञान देता है, और वह उन्हें संकल्प भी देता है, उन्हें परमेश्वर के उत्सुक इरादे और उसकी मनुष्य से वर्तमान अपेक्षाओं के बारे में समझने देता है, वह उन्हें हर तरह से खुलने का संकल्प देता है। यहाँ तक ​​कि जब लोग रक्तपात और बलिदान से गुजरते हैं, उन्हें फिर भी परमेश्वर के लिए कार्य करना चाहिए, और जब वे उत्पीड़न और प्रतिकूल परिस्थितियों से मिलें, तब भी उन्हें परमेश्वर से प्रेम करना चाहिए, और उन्हें कोई अफ़सोस नहीं होना चाहिए, और परमेश्वर की गवाही देनी चाहिए। इस तरह का संकल्प पवित्र आत्मा की प्रेरणा है, और पवित्र आत्मा का कार्य है—लेकिन जान लो कि तुम हर गुजरते पल में इस तरह की प्रेरणा से संपन्न नहीं हो।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "अभ्यास (1)" से

कुछ लोग कहते हैं कि पवित्र आत्मा हर समय उनमें कार्य कर रहा है। यह असंभव है। यदि वे कहते कि पवित्र आत्मा हमेशा उनके साथ है, तो यह यथार्थ पर आधारित होता। यदि वे कहते कि उनकी सोच और उनका बोध हर समय सामान्य है, तो यह भी यथार्थ पर आधारित होता और यह दिखाता कि पवित्र आत्मा उनके साथ है। यदि तुम कहते हो कि पवित्र आत्मा हमेशा तुम्हारे भीतर कार्य कर रहा है, कि तुम परमेश्वर द्वारा प्रबुद्ध किए गए हो और हर पल पवित्र आत्मा द्वारा स्पर्श किए जाते हो, और हर समय नया ज्ञान प्राप्त करते हो, तो यह सामान्य नहीं है। यह नितान्त अलौकिक है! बिना किसी संदेह के, ऐसे लोग बुरी आत्माएँ हैं! यहाँ तक कि जब परमेश्वर का आत्मा देह में आता है, तब ऐसे समय होते हैं जब उसे भी अवश्य आराम करना चाहिए और भोजन करना चाहिए—तुम्हारी तो बात ही छोड़ो। जो लोग बुरी आत्माओं द्वारा ग्रस्त हो गए हैं, वे देह की कमजोरी से रहित प्रतीत होते हैं। वे सब कुछ त्यागने और छोड़ने में सक्षम हैं, वे संयमशील होते हैं, यातना को सहने में सक्षम होते हैं, वे जरा सी भी थकान महसूस नहीं करते हैं, मानो कि वे देहातीत हैं चुके हों। क्या यह नितान्त अलौकिक नहीं है? दुष्ट आत्मा का कार्य अलौकिक है, और ये चीजें मनुष्य के द्वारा अप्राप्य हैं। जो लोग विभेद नहीं कर सकते हैं वे जब ऐसे लोगों को देखते हैं, तो ईर्ष्या करते हैं, और कहते हैं कि परमेश्वर पर उनका विश्वास बहुत मजबूत है, और बहुत अच्छा है, और यह कि वे कभी कमजोर नहीं पड़ते हैं। वास्तव में, यह दुष्ट आत्मा के कार्य की अभिव्यक्ति है। इसका कारण यह है कि एक सामान्य अवस्था के लोगों में अनिवार्य रूप से मानवीय कमजोरियाँ होती हैं; यह उन लोगों की सामान्य अवस्था है जिनमें पवित्र आत्मा की उपस्थिति होती है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "अभ्यास (4)" से

दुष्ट आत्माएँ अवसरवादी होते हैं। वे तुम्हारे भीतर से बोल सकते हैं या तुम्हारे कान में, या फिर वे तुम्हारे विचारों और मन को भ्रम में डाल सकते हैं, वे पवित्र आत्मा के कार्य को पीछे धकेल देते हैं ताकि तुम इसे महसूस न कर सको, जिसके बाद वे तुम्हारे साथ हस्तक्षेप करना शुरू करते हैं, जिससे तुम्हारी सोच भ्रमित हो जाती है और तुम्हारा दिमाग़ ख़राब हो जाता है, और तुम बेचैन और उखड़े-से रह जाते हो। दुष्ट आत्माओं का काम ऐसा है।

"मसीह की बातचीतों के अभिलेख" से "परमेश्वर द्वारा दुनिया की पीड़ा का अनुभव करने का मतलब" से

क्या तुम अपनी आत्मा को महसूस करने के योग्य हो? क्या तुम अपनी आत्मा को छूने के योग्य हो? क्या तुम सब यह जानने के योग्य हो कि तुम सब की आत्मा क्या कर रही है? तुम सब नहीं जानते हो, है ना? यदि तुम ऐसी बातों को महसूस करने और समझने के योग्य हो, तो यह तुम्हारे भीतर एक अन्य आत्मा बलपूर्वक कुछ करवा रहा है-तुम्हारे कार्यों और शब्दों को नियन्त्रित कर रहा है। तुम में यह कुछ बाहर का है-यह तुम्हारा नहीं है। वे लोग जिनमें दुष्टतात्मा होती है, उन्हें इसका बहुत अनुभव होता है।

"मसीह की बातचीतों के अभिलेख" से "परमेश्वर की देह और आत्मा के एकत्व को कैसे समझें" से

निश्चित रूप से, आज कुछ दुष्ट आत्माएँ हैं जो मनुष्य को धोखा देने के लिए अलौकिक चीजों के माध्यम से कार्य करती हैं; यह ऐसे कार्य के द्वारा मनुष्य को धोखा देने के लिए जो वर्तमान में पवित्र आत्मा द्वारा नहीं किया जाता है, उनकी ओर से नक़ल के अलावा और कुछ नहीं है। कई बुरी आत्माएँ चमत्कारों के कार्य और बीमारी को चंगा करने की नक़ल करती हैं; वे बुरी आत्माओं के कार्य के अलावा और कुछ नहीं हैं, क्योंकि पवित्र आत्मा वर्तमान में ऐसा कार्य अब और नहीं करता है। वे सभी जो बाद में पवित्र आत्मा के कार्य की नकल करते हैं—वे बुरी आत्माएँ हैं।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "देहधारण का रहस्य (1)" से

पवित्र आत्मा का कार्य लोगों को सत्य समझने देता है, यह उन्हें शैतान के भ्रष्ट सार को जानने देता है, और यह उन्हें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में एक सच्चा ज्ञान देता है। इसके प्रभाव पूरी तरह से सकारात्मक होते हैं। आज, हम जानते हैं कि सत्य क्या है, कि सत्य परमेश्वर से आता है, कि सकारात्मक चीजें परमेश्वर से आती हैं, सामान्य मानवता वाले लोगों के द्वारा क्या धारण किया जाना चाहिए, परमेश्वर की इच्छा क्या है, और सच्चा जीवन क्या है। ये सब सकारात्मक चीजें हैं, और सकारात्मक चीजों की वास्तविकता सत्य है। परमेश्वर के कार्य का प्रभाव ऐसा ही होता है, और हम इसे सिर्फ पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता और रोशनी के कारण समझते हैं। दुष्ट आत्माओं का कार्य लोगों को सकारात्मक चीजों का ज्ञान नहीं दे सकते हैं। तुम्हे स्पष्ट हो जाना चाहिए कि जिन लोगों में दुष्ट आत्माएँ कार्य करती हैं वे किसी भी सत्य को नहीं समझते या उसका अर्थ नहीं समझते है। दुष्ट आत्माओं का कार्य लोगों को केवल अधिकाधिक दुष्ट ही बना सकता है, यह सिर्फ उनके हृदय में बहुत अधिक अंधकार ही ला सकता है, उनके स्वभाव को बहुत अधिक भ्रष्ट, और उनकी अवस्था को बहुत बदतर बना सकता है, अंत में तबाही और विनाश कर देता है। पवित्र आत्मा का कार्य लोगों को बहुत सामान्य बनाता है, यह उन्हें सत्य की एक बहुत अधिक समझ और परमेश्वर में बहुत विश्वास देता है, और वे परमेश्वर का आज्ञापालन करने में बहुत समर्थ हो जाते हैं। अंत में, यह उन्हें परमेश्वर को पूरी तरह से जानने और परमेश्वर की आराधना करने की अनुमति देता है। यह पवित्र आत्मा के कार्य का प्रभाव है, और यह दुष्ट आत्माओं के कार्य के पूरी तरह से विपरीत है।

"जीवन में प्रवेश के विषय में संगति एवं प्रवचन (II)" में "पवित्र आत्मा के कार्य को जानना मनुष्य के उद्धार के लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण है" से

नीचे, आइये हम दुष्ट आत्माओं के विभिन्न कार्यों और पवित्र आत्मा के कार्य के कुछ और स्पष्ट अंतरों को देखें, और देखें कि कैसे वे विषेश रूप से व्यक्त होते हैं। पवित्र आत्मा उन लोगों का चुनाव करता है जो सत्य को खोजते हैं, जिनके पास अंत:करण और विवेक है, और वे जो सत्यनिष्ठा से संपन्न हैं। वे ऐसे लोग हैं जिनमें वह कार्य करता है। दुष्ट आत्माएँ उन लोगों का चुनाव करती हैं जो कपटी और बेहूदे होते हैं, जिन्हें सत्य के लिए कोई प्रेम नहीं होता है, और जो अंत:करण या विवेक रहित होते हैं। ये ऐसे लोग हैं जिनमें दुष्ट आत्माएँ कार्य करती हैं। जब हम उन लोगों की तुलना करते हैं जो पवित्र आत्मा के कार्य के लिए चुने जाते हैं, और जो दुष्ट आत्माओं के कार्य के लिए चुने जाते हैं तो हम क्या देखते हैं? हम देख सकते हैं कि परमेश्वर पवित्र, और धार्मिक है, कि जो परमेश्वर के द्वारा चुने जाते हैं वे सत्य को खोजते हैं, और अंत:करण और विवेक से संपन्न होते हैं, कि उनमें सत्यनिष्ठा होती है, और प्रेम होता है जो यूँ ही होता है। जो दुष्ट आत्माओं के द्वारा चुने जाते हैं वे कपटी होते हैं, वे स्वार्थी और नीच होते हैं, उनके पास सत्य के लिए कोई प्रेम नहीं होता है, वे अंत:करण और विवेक रहित होते हैं, और वे सत्य को नहीं खोजते हैं। दुष्ट आत्माएँ सिर्फ नकारात्मक चीज़ों और उन लोगों को चुनती हैं जो सच्चे नहीं होते हैं, जिससे हम देखते हैं कि दुष्ट आत्माएँ दुष्टता और अंधकार को पसंद करती हैं, और यह कि वे उनसे एक मील दूर भागती हैं जो सत्य को खोजते हैं, और जो अधार्मिकता से आसक्त होते हैं, और आसानी से मोहित किए जा सकते हैं उन पर शीघ्रता से काबू पा लेती हैं। जिनमें दुष्ट आत्माएँ कार्य करना चुनती हैं वे बचाये नहीं जा सकते हैं, और वे परमेश्वर के द्वारा निकाल दिए गए जाते हैं। दुष्ट आत्माएँ कब, और किस पृष्ठभूमि के विरोध में कार्य करती हैं? वे तब कार्य करती हैं जब लोग परमेश्वर से दूर भटक जाते हैं और परमेश्वर के प्रति विद्रोह कर देते हैं। दुष्ट आत्माओं का कार्य लोगों को मोहित कर लेता है, और जब वे पाप करते हैं तब उसका फायदा उठा कर ये ऐसा करती हैं। जब लोग अपने-आप में सबसे अधिक निर्बल होते हैं, विशेष रूप से जब उनके हृदय में बहुत पीड़ा होती है, जब वे व्याकुल और भ्रमित महसूस कर रहे होते हैं, तब दुष्ट आत्मा उन्हें मोहित और भ्रष्ट करने, उनमें और परमेश्वर के बीच में कलह बोने के लिए इस अवसर का उपयोग करती है। पवित्र आत्मा के कार्य का एक समय होता हैः जब लोग परमेश्वर को पुकारते हैं, जब उनके हृदय परमेश्वर की ओर मुड़ते हैं, जब उन्हें परमेश्वर की आवश्यकता होती है, जब वे परमेश्वर के सामने पश्चाताप करते हैं, और जब वे सत्य को खोजते हैं, तब पवित्र आत्मा उनमें कार्य करना शुरू करता है। देखो कि कैसे पवित्र आत्मा के कार्य का प्रत्येक पहलू मनुष्य को बचाने के लिए है, कैसे वह मनुष्य को बचाने के लिए अवसर ढूँढ़ता है, जबकि दुष्ट आत्माएँ लोगों को भ्रष्ट करने और उनके साथ छल करने के लिए अवसरों की खोज में रहती हैं। दुष्ट आत्माएँ नीच और दुष्ट होती हैं, वे घातक और भयावह होती हैं, वे जो कुछ भी करती हैं वह मनुष्य को भ्रष्ट करने, और मनुष्य को नुकसान पहुँचाने, और मनुष्य को निगलने करने के लिए होता है। जब लोगों को आवश्यकता होती है, जब वे परमेश्वर को अत्यावश्यक रूप से पुकारते हैं, जब उन्हें परमेश्वर द्वारा उद्धार की आवश्यकता होती, और जब वे अपने हृदय में परमेश्वर के निकट आने की कामना करते हैं, तब पवित्र आत्मा उन पर प्रकट होता है और उद्धार का कार्य करता है। परमेश्वर प्रेम है, और दुष्ट आत्माएँ घृणा हैं—यह तुम्हें स्पष्ट है, हाँ? दुष्ट आत्माएँ जो कुछ भी करती हैं वह मनुष्य को निगलने और भ्रष्ट करने के लिए होता है, और पवित्र आत्मा जो कुछ भी करता है वह मनुष्य के लिए प्रेम और उद्धार के लिए होता है। पवित्र आत्मा के कार्य के प्रभाव लोगों को शुद्ध करने, उन्हें उनकी भ्रष्टता से बचाने, उन्हें अपने-आप को जानने और शैतान को जानने की अनुमति देने, शैतान के विरुद्ध विद्रोह करने में समर्थ होने, सत्य की खोज करने, और अंततः मनुष्य की सदृशता में जीने में समर्थ बनाने के लिए होते हैं। दुष्ट आत्माएँ लोगों को भ्रष्ट करती हैं, दूषित करती हैं, और जकड़ती हैं, वे उन्हें हमेशा पाप में और गहरा डुबा देती हैं, और हमेशा उनके जीवन में बहुत दर्द लाती हैं, और इसलिए जब दुष्ट आत्माएँ लोगों में कार्य करती हैं, तो वे ख़त्म हो जाते हैं; अंततः, वे शैतान के द्वारा निगल लिए जाते हैं, जो कि दुष्ट आत्माओं के कार्य का परिणाम होता है। पवित्र आत्मा के कार्य का प्रभाव अंततः लोगों को बचाना, उन्हें एक वास्तविक जीवन जीने के योग्य बनाना, पूरी तरह से मुक्त और स्वतंत्र बनाना और परमेश्वर के आशीषों को प्राप्त करना है। देखो: दुष्ट आत्माएँ मनुष्य को अंधकार में ले जाती हैं, वे उसे रसातल में ले जाती हैं; पवित्र आत्मा मनुष्य को अंधकार से प्रकाश में, स्वतंत्रता में ले जाता है। पवित्र आत्मा का कार्य लोगों को प्रबुद्ध करता है और उनका मार्गदर्शन करता है, वह उन्हें अवसर देता है, और जब वे निर्बल होते और पाप करते हैं तब वह उनके लिए सांत्वना लाता है। वह लोगों को अपने-आप को जानने देता है, उन्हें सत्य को खोजने देता है, और वह लोगों को चीज़ों को करने के लिए विवश नहीं करता है, बल्कि उन्हें अपना खुद का मार्ग अपने आप चुनने देता है, और अंततः उन्हें प्रकाश में ले जाता है। दुष्ट आत्माएँ चीज़ों को करने के लिए लोगों को विवश करती हैं और उन पर आदेश चलाती हैं। वे जो कुछ भी कहती हैं वह झूठ होता है और लोगों को मोहित करता हैं, उन्हें धोखा देता है, और उन्हें जकड़ता है; दुष्ट आत्माएँ लोगों को स्वतंत्रता नहीं देती हैं, वे उन्हें चुनने की आजादी नहीं देती हैं, वे उन्हें विनाश के मार्ग पर विवश करती हैं, और अंततः उन्हें पाप में बहुत गहरा डुबो देती हैं, उन्हें मृत्यु तक ले जाती हैं। उन बुरे लोगों को, उन दुष्ट प्रकार के लोगों को देखो: वे दूसरे लोगों को गंदे नाले में खींचते हैं, वे उन्हें अपराध में खींचते हैं, और उन्हें जुए के अड्डों में खींचते हैं। अंततः, जब वे लोगों के परिवारों को बर्बाद कर देते हैं और उनका जीवन ले लेते हैं, तो वे खुश हो जाते हैं, उनका कार्य पूरा हो जाता है, और उन्होंने अपना लक्ष्य पा लिया होता है। क्या वे राक्षस नहीं हैं? जबकि जो सचमुच में अच्छे होते हैं और परमेश्वर का भय मानते हैं वे लोगों को परमेश्वर के निकट लाते हैं, और उन्हें परमेश्वर में विश्वास करवाने, सत्य की समझ प्राप्त करने, एक वास्तविक जीवन की खोज करने, और अंततः उन्हें मनुष्य की सदृशता में जीने की ओर ले जाते हैं। इन सकारात्मक और नकारात्मक चीजों के बीच में कितना स्पष्ट विरोध है! पवित्र आत्मा के सिद्धांतों, साधनों, और कार्य के अंतिम प्रभाव की दुष्ट आत्माओं के सिद्धांतों, साधनों, और कार्य के अंतिम प्रभाव के साथ तुलना करने पर, हम देखते हैं कि परमेश्वर मनुष्य को बचाता है, उससे प्रेम करता है, और मनुष्य को सत्य देता है, कि वह मनुष्य को प्रकाश में ले जाता है, और अंततः मनुष्य को धन्य बनने और और एक वास्तविक व्यक्ति बनने और सच्चा जीवन जीने देता है। शैतान मानवजाति को भ्रष्ट करता है, यह मानवजाति को जकड़ता है, यह मानवजाति को निगलने की कोशिश करता है, और अंततः मानवजाति को तबाही और विनाश तक ले जाता है। पवित्र आत्मा के कार्य को जानने के माध्यम से, हम दुष्ट आत्माओं के कार्य को पहचानने और मानवजाति की शैतान की भ्रष्टता के सत्य को जानने में समर्थ हो जाते हैं। आज, परमेश्वर में हमारे विश्वास में हम यह जानते हैं कि हमें किसकी खोज करनी चाहिए, कि परमेश्वर प्यारा है, और कि हमें परमेश्वर को जानना चाहिए, परमेश्वर की आराधना करनी चाहिए, और परमेश्वर का आज्ञापालन करना चाहिए। हमारे जीवन में हमारे उद्देश्य हैं, और हमें उद्धार की आशा है। ये पवित्र आत्मा के कार्य के प्रभाव हैं। आज, यदि तुमसे कहा जाता कि बताओ कि शैतान क्या है, तो क्या तुम बता पाते? शैतान का भ्रष्ट स्वभाव किन तरीकों से व्यक्त होता है? शैतान का स्वभाव दुष्ट, अंतर्घाती, पापी, कुरूप, नीच, समस्त बुराई के प्रति कृतज्ञ, और पूरी तरह से विषैला है। वह सब क्या है जो परमेश्वर का स्वरूप है? यह धार्मिकता, पवित्रता, आदर, सर्वशक्ति, बुद्धि, और करुणा और प्रेम है। जो भावना शैतान लोगों को देता है वह घृणित और अभिशप्त होती है। जो भावना परमेश्वर लोगों को देता है वह मिलनसार, प्यारी, और आदरणीय होती है।

"जीवन में प्रवेश के विषय में संगति एवं प्रवचन (II)" में "पवित्र आत्मा के कार्य को जानना मनुष्य के उद्धार के लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण है" से

मनुष्य में पवित्र आत्मा के कार्य का क्या प्रभाव होता है? यह मनुष्य को परमेश्वर के वचन, और सत्य को समझने की अनुमति देता है, और मनुष्य को परमेश्वर को जानने, और स्वयं को जानने देता है। सत्य का एक दोहरा प्रभाव होता है। एक तरीके से, सत्य को समझना लोगों को परमेश्वर के बारे में ज्ञान देता है, क्योंकि सत्य परमेश्वर के जीवन का सार है, यह वह है जो परमेश्वर का स्वरूप है, यह सकारात्मक चीजों की वास्तविकता है, और यह परमेश्वर के स्वभाव और जीवन का प्रतिनिधित्व करता है—और इसलिए यह कहना पूरी तरह से सही है कि, सत्य को समझने के द्वारा, हमें परमेश्वर के बारे में कुछ समझ प्राप्त होती है। उसके साथ-साथ, सत्य हमारी भ्रष्टता को भी प्रकट करता है, और इसलिए वे सब जो सत्य को समझते हैं उन्हें अपने बारे में एक सच्चा ज्ञान होता है, और उन्होने स्पष्ट रूप से अपना असली चेहरा और शैतान का असली चेहरा देख लिया होता है। सत्य के द्वारा सब कुछ प्रकट कर दिया जाता है। पवित्र आत्मा के कार्य के द्वारा सत्य को समझने का क्या प्रभाव होता है? एक तरीके से, हम अपने भ्रष्ट सार को जान जाते हैं, हम देखते हैं कि मनुष्य निर्धन, दयनीय, अंधा, नंगा, भ्रष्ट, दुष्ट, स्वार्थी और नीच है, कि वह जरा सा भी असली मनुष्य की सदृशता में नहीं है, कि वह शैतान से भिन्न नहीं है, कि उसका स्वभाव और सार वैसे हैं जैसे शैतान के हैं। क्या यह सत्य को समझने का प्रभाव नहीं है? इस बारे में कुछ भी गलत नहीं है। इतना ही नहीं, इस संबंध में हम पवित्र आत्मा के कार्य के प्रभाव के बारे पूरी तरह से स्पष्ट हैं। पवित्र आत्मा के कार्य के और भी कई प्रभाव हैं। पवित्र आत्मा का कार्य लोगों को सच्चा विश्वास दे सकता हैः परमेश्वर के सम्मुख हमारी हर एक प्रार्थना हमें महसूस करवाती है कि परमेश्वर में हमारा विश्वास बढ़ गया है, और कि यह और भी सच्चा हैं। ...यह कहना थोड़ा सा भी ग़लत नहीं है कि पवित्र आत्मा के कार्य के कई पहलू हैं, और इसके प्रभावों के कई पहलू हैं। ...पवित्र आत्मा का कार्य हमें परमेश्वर के स्वभाव, परमेश्वर की सर्वशक्ति और बुद्धि, हमारे हृदय के बारे में उसके सूक्ष्म परीक्षण की गहराई का एक सच्चा ज्ञान देता है, और यह हमें परमेश्वर के अद्भुत कर्मों और अगाधता का एक ज्ञान देता है। इसलिए भी, यह हमें सभी चीजों पर परमेश्वर की सर्वशक्ति और उसके प्रभुत्व को जानने और देखने देता है।

"जीवन में प्रवेश के विषय में संगति एवं प्रवचन (II)" में "पवित्र आत्मा के कार्य को जानना मनुष्य के उद्धार के लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण है" से

करना है तो वे विशेष रूप से कुख्यात और दबंग होते हैं। कुछ तो सामान्य मानवता के शिष्टाचार और नैतिकता का भी उल्लंघना करते हैं। उनके वचन और क्रियाएँ लोगों को सम्मोहित करते हैं और उनके साथ हस्तक्षेप करते हैं, उन वचनों और क्रियाओं की प्रकृति कुरूप और क्रूर होती है, और वे लोगों को भ्रष्ट करते हैं, लोगों को नुकसान पहुँचाते हैं, और उनके लिए किसी लाभ के नहीं होते हैं। जैसे ही कोई दुष्ट आत्मा किसी में प्रकट होती है, वे भयभीत और चिन्तित महसूस करते हैं, और उनकी क्रियाओं की एक बड़ी अत्यावश्यकता होती है, मानो कि वे अधीरता से फूट रहे हों। इसका प्रकटन लोगों को विशेष रूप से अस्वाभाविक महसूस करवाता है, और दूसरों के लिए थोड़ा सा भी लाभ का नहीं होता है। दुष्ट आत्माओं के कार्य की प्राथमिक अभिव्यक्तियाँ: पहली है लोगों को ऐसा या वैसा करने का निर्देश देना, उन्हें चीजों को करने के लिए कहना, या उन्हें झूठी भविष्यवाणियाँ कहने के लिए निर्देश देना। दूसरी है तथाकथित "भाषाएँ"बोलना जिन्हें कोई नही समझता है; यहाँ तक कि बोलने वाले स्वयं भी नहीं समझ सकते हैं कि वे क्या कह रहे हैं, और कुछ इसका "अनुवाद"करने में समर्थ होते हैं। तीसरी है जब लोग हमेशा प्रकाशन प्राप्त करते हैं, जो विशेष आवृत्ति के साथ होता है। एक क्षण तो उन्हें एक चीज करने के लिए निर्देश दिया जाएगा, दूसरे ही क्षण उन्हें कुछ और करने के लिए कहा जाएगा, और वे लगातार घबराहट में रहते हैं। चौथी: जिन लोगों में दुष्ट आत्माएँ कार्य कर रही होती है वे ऐसा या वैसा करने के लिए व्यग्र होते हैं, और प्रतीक्षा करना सहन नहीं कर सकते हैं—इस बात की परवाह किए बिना कि उनके माहौल में इसकी अनुमति है या नहीं। यहाँ तक कि वे गहन रात्रि में भी बाहर चले जाते हैं; उनका आचरण बहुत असामान्य होता है। पाँचवीं: जिन लोगों में दुष्ट आत्मा कार्य कर रही होती है वे खासकर अहंकारी और दंभी होते हैं, वे जो कुछ भी करते हैं वह दूसरों को नीचा दिखाने वाला और दंभपूर्ण होता है, वे कोई भी सत्य बोलने में अक्षम होते हैं, यह लोगों को किंकर्तव्यविमूढ़ छोड़ देती है, और लोगों को एक राक्षस के समान समस्या में विवश कर देती है। छठी: जिन लोगों में दुष्ट आत्मा कार्य कर रही होती है उन्हें ऊपर की व्यवस्थाओं के बारे में थोड़ी सी भी समझ नहीं होती है, कार्य के सिद्धांतों की तो उन्हें बिल्कुल भी नहीं समझ नहीं होती है; वे परमेश्वर की हँसी उड़ाते हैं, वे लोगों को धोखा देने की कोशिश करते हैं, और उनके दुराचार कलीसिया की सामान्य व्यवस्था को अस्तव्यस्त कर देते हैं। सातवीं: जिन लोगों में दुष्ट आत्मा कार्य कर रही होती है वे अक्सर बिना किसी कारण के किसी विशेष आकृति का रूप धारण कर लेते हैं, या अन्यथा, लोगों को अपने वचनों को सुनवाने के लिए, किसी अन्य व्यक्ति के द्वारा भेजे गए होते हैं, और कोई भी नहीं जान सकता कि वे यहाँ तक कैसे पहुँचे। आठवीं: जिन लोगों में दुष्ट आत्मा कार्य कर रही होती है वे अक्सर अविवेकी होते हैं, और सत्य को नहीं समझते हैं; साधारणतया, उनमें समझ के लिए योग्यताओं की कमी होती है, और वे पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता से रहित होते हैं। लोगों को पता लगता है कि वे जो समझते हैं विशेष रूप से अनर्गल, और पूरी तरह से गलत होता है। नौवीं: जिन लोगों में दुष्ट आत्मा कार्य कर रही होती है वे बहुत आडंबरपूर्ण और अविवेकी होते हैं, वे कभी भी परमेश्वर को ऊँचा नहीं उठाते हैं या परमेश्वर के लिए गवाही नहीं देते हैं, किसी भी सत्य को बोलने में अक्षम होते हैं, और वे जो कुछ भी करते और कहते हैं वह लोगों पर तब तक आक्रमण करता है, उन्हें जकड़ता है, और उन्हें सीमित करता है, जब तक कि उनके हृदय चूर-चूर नहीं हो जाते हैं, और वे नकारात्मकता में हरा नहीं दिए जाते हैं और अपने आप को उठाने के अयोग्य नहीं हो जाते हैं, जब वे गुप्त रूप से खुश होते हैं—जो कि दुष्ट आत्माओं के कार्य का मुख्य लक्ष्य है। दसवीं: जो लोग दुष्ट आत्माओं के द्वारा ग्रस्त होते हैं—उनके जीवन पूरी तरह से पथभ्रष्ट होते हैं, उनकी चमक भीषण होती है, और उनके वचन विशेष रूप से भावशून्य होते हैं, मानो कि वे एक राक्षस हो जिसने संसार में प्रवेश कर लिया है। उनके दैनिक जीवन में कोई भी अनुशासन नहीं होता है, वे अत्यधिक अस्थिर होते हैं, वे एक बेलगाम, जंगली जानवर के समान अपूर्वानुमेय होते हैं, और लोग उन्हें अत्यधिक आपत्तिजनक पाते हैं। दुष्टात्माओं के द्वारा जकड़े गए लोगों की अभिव्यक्तियाँ ऐसी ही होती हैं। जो लोग दुष्ट आत्माओं से ग्रस्त होते हैं वे अक्सर उन लोगों के प्रति विशेष रूप से घृणास्पद और पृथक रहते हैं जिन में पवित्र आत्मा कार्य करता है और जो सत्य बोलने में समर्थ होते हैं। ऐसा अक्सर होता कि जितना बेहतर लोग होते हैं, उतना अधिक वे उन पर आक्रमण करते हैं और उनकी निंदा करते हैं, जबकि लोग जितना अधिक अव्यवस्थित और भ्रमित होते हैं, उतना ही अधिक वे फुसलाते और चापलूसी करते हैं, और विशेष रूप से उनके साथ संलग्न होने के इच्छुक होते हैं। दुष्ट आत्माओं का कार्य काले को सफेद में मरोड़ देता है, और सकारात्मक को नकारात्मक और नकारात्मक को सकारात्मक बनाता है। दुष्ट आत्माओं के कार्य ऐसे ही होते हैं।

"मसीह की बातचीतों के अभिलेख" से "दुष्ट आत्माओं के कार्य के मुख्य प्रकटीकरण" से

कोई भी आत्मा जिस का कार्य प्रकट रूप से अलौकिक है वह एक दुष्ट आत्मा है, और किसी भी आत्मा के कार्य और कथन जो लोगों में अलौकिक कार्य करती है एक दुष्ट आत्मा का कार्य है; सभी साधन जिनके द्वारा दुष्ट आत्माएँ कार्य करती हैं असामान्य और अलौकिक होते हैं, और मुख्य रूप से निम्नलिखित छह तरीकों से व्यक्त होते हैं:

1. लोगों की बोली पर सीधा नियंत्रण, जो स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि दुष्ट आत्मा बात कर रही है, न कि लोग स्वयं सामान्य रूप से बोल रहे हैं;

2. यह भावना कि दुष्ट आत्मा लोगों को निर्देश दे रही है और उन्हें यह और वह करने का आदेश दे रही है;

3. लोग जो, जब वे किसी कमरे में होते हैं, बता सकते हैं कि कब कोई व्यक्ति अंदर आने ही वाला है;

4. लोग जो प्रायः उनसे बात करती हुई आवाजे सुनते हैं जिसे दूसरे सुनने में नहीं सुन सकते हैं;

5. लोग जो ऐसी चीजों को देखने और सुनने में समर्थ हैं जो कि दूसरे नहीं देख और सुन सकते हैं;

6. लोग जो हमेशा उत्तेजित रहते हैं, और अपने-आप से बात करते रहते हैं, और लोगों के साथ सामान्य वार्तालाप या बातचीत करने में असमर्थ होते हैं।

जिन सभी में दुष्ट आत्मा कार्य कर रही होती है उनमें अनिवार्य रूप से ये छह अभिव्यक्तियाँ पायी जाती हैं। वे अविवेकी होते हैं, असमंजस में रहते हैं, लोगों के साथ सामान्य बातचीत करने में अक्षम होते हैं, ऐसा लगता है मानो कि वे तर्क के प्रति उत्तरदायी नहीं होते हैं, और उनके बारे में कुछ अनासक्त और पारलौकिक होता है। ऐसे लोग दुष्ट आत्मा के द्वारा ग्रस्त होते हैं या उनमें दुष्ट आत्मा कार्य कर रही होती है, दुष्ट आत्माओं का समस्त कार्य प्रत्यक्ष और अलौकिक होता है। दुष्ट आत्माओं का यह सबसे अधिक आसानी से पहचाना जाने वाला कार्य होता है। जब कोई दुष्ट आत्मा किसी पर कब्जा करती है, तो यह उनके साथ खेलती है ताकि वे पूरी तरह से गड़बड़ हो जाएँ। वे, एक प्रेत के जैसे, अविवेकी बन जाते हैं, जो साबित करता है कि सार रूप में, दुष्ट आत्माएँ बुरी आत्माएँ होती हैं जो लोगों को भ्रष्ट करती है और निगल जाती हैं। दुष्ट आत्माओं के कथनों तो पहचानना आसान है: उनके कथन पूरी तरह से उनके बुरे सार का प्रतीक हैं, वे निष्क्रिय, गंदे और बदबूदार होते हैं, उनसे मृत्यु की दुर्गन्ध टपकती है। उन लोगों के लिए जो अच्छी योग्यता के होते हैं, दुष्ट आत्माओं के वचन खोखले और अरुचिकर, अशोभनीय होते हैं, बस केवल झूठ और खोखली बातें होते हैं, वे निरर्थक वचनो के ढेर के समान अव्यवस्थित और पेचीदा महसूस होते हैं। यह दुष्ट आत्माओं के अनापशनाप में से कुछ सबसे अधिक पहचानने लायक होता है। लोगों को भरमाने के लिए, कुछ अधिक "ऊँचे स्तर" की दुष्ट आत्माएँ जब बोलती हैं तो परमेश्वर या मसीह होने का दिखावा करती हैं, जबकि दूसरी स्वर्गदूत या प्रसिद्ध व्यक्ति होने का दिखावा करती हैं। जब वे बोलती हैं, तो ये दुष्ट आत्माएँ परमेश्वर के कई वचनों और वाक्यांशों की या परमेश्वर की आवाज की नकल करने में निपुण होती हैं, और जो लोग सत्य को नहीं समझते हैं वे आसानी से "ऊँचे स्तर" की दुष्ट आत्माओं के झाँसे में आ जाते हैं। परमेश्वर के चुने लोगों को स्पष्ट होना चाहिए कि, सार रूप में, दुष्ट आत्माएँ बुरी और बेशर्म होती हैं, और कि भले ही वे "ऊँचे स्तर" की दुष्ट आत्माएँ हों, वे सत्य से सर्वथा विहीन होती हैं। दुष्ट आत्माएँ, आखिरकार, दुष्ट आत्माएँ ही होती हैं, दुष्ट आत्माओं का सार बुरा होता है, और वे एक तरह से शैतान के साथ जैसा होता हैं।

"कलीसिया के कार्य की सहभागिता और प्रबन्धों के वार्षिक वृतांत (II)" में "दुष्ट आत्माओं की निर्थकता और भ्रमों, झूठे मसीहों, और मसीह विरोधियों को कैसे पहचानें" से

दुष्ट आत्माएँ जो कुछ भी करती हैं बहुत ही अलौकिक होता है, ये लोगों को प्रत्यक्ष रूप से ऐसा या वैसा करने का निर्देश देती हैं, ये उन्हें प्रत्यक्ष रूप से आदेश देती हैं, प्रत्यक्ष रूप से उन्हें चीजों को करने के लिए विवश करती हैं—यह दुष्ट आत्माओं के कार्य की अभिव्यक्ति है। पवित्र आत्मा के कार्य ने लोगों को कभी भी ऐसा या वैसा करने के लिए विवश नहीं किया है, इसने आसपास लोगों को कभी भी आदेश नहीं दिया है, यह कभी भी अलौकिक नहीं रहा है, इसने चीजों को करने हेतु लोगों को निर्देश देने के लिए कभी भी अलौकिक साधनों का उपयोग नहीं किया है, यह हमेशा लोगों में गहरा छुपा रहता है, और सत्य और परमेश्वर के वचनों के समझाने के लिए उनके अंत:करण के माध्यम से स्पर्श करता है, जिसके बाद यह सत्य को अभ्यास में लाने के लिए अंत:करण का उपयोग करता है। यही वह साधन है जिसके द्वारा पवित्र आत्मा कार्य करता है। पवित्र आत्मा ने लोगों को कभी भी विवश या बाध्य नहीं किया है, उसने कभी भी कुछ भी अलौकिक या प्रत्यक्ष नहीं किया है, और वह लोगों को प्रकट रूप से निर्देश नहीं देता है। हम इससे क्या जानते हैं? हम जानते हैं कि पवित्र आत्मा का कार्य विनम्र और छुपा हुआ होता है, यह विशेष रूप से छुपा हुआ होता है, और इसका कुछ भी प्रकट नहीं होता है। परमेश्वर सर्वशक्तिमान है और सभी चीजों पर प्रभुत्व रखता है, किन्तु पवित्र आत्मा मनुष्य को प्रत्यक्ष रूप से नहीं कहता है कि, "अरे, तुम्हें ऐसा या वैसा करना चाहिए।"पवित्र आत्मा ने कभी भी इस तरीके से कार्य नहीं किया है; वह तुम्हें स्पर्श करता है, प्रेम का उपयोग करते हुए तुम्हें स्पर्श करता है, और वह बहुत कोमल है, इतना कोमल कि तुम्हें महसूस भी नहीं होता कि कोई तुम्हें स्पर्श कर रहा है—किन्तु अपने हृदय की गहराईयों में तुम महसूस करते हो कि तुम्हें किसी विशेष ढंग से कार्य करना चाहिए है, और कि ऐसा करना सही है और उचित है। देखो परमेश्वर कितना ही प्यारा है! फिर उन लोगों की कुरूपता और दयनीय रूप को देखो जो दुष्ट आत्माओं के द्वारा ग्रस्त हैं, देखो कि कैसे, जैसे ही वे लोगों से मिलते हैं, वे कहते हैं, "आज आत्मा ने मुझे यह कहने का निर्देश दिया है, इसने मुझे वह करने के लिए कहा, इसने मुझसे ऐसा का ऐसा ही करवाया है," देखो वे सुसमाचार प्रचार करने, या प्रार्थना करने, या यह कहने के लिए कैसे कभी-कभी घोर रात में जाग जाते हैं कि वे कैसे स्पर्श किए गए हैं और उन्हें अपना कर्तव्य अवश्य पूरा करना है। देखो कि कैसे, जैसे ही लोग दुष्ट आत्मा के द्वारा जकड़े जाते हैं, यह उन्हें भयानक पीड़ा देती है, और उन्हें हड़बड़ी में डाल देती हैं, देखो कि कैसे उन्हें यह भी नहीं पता होता है कि कब खाना है या चीजों को करना है, कैसे उनका जीवन उलटा हो जाता है। जब दुष्ट आत्माएँ लोगों में कार्य करती हैं, तो वे उन्हें आगे-पीछे खींचती हैं, उन्हें थका हुआ और निढाल बना देती हैं। अंततः, उन्हें कुछ प्राप्त नहीं होता है: उनके जीवन स्वभाव में कोई भी बदलाव नहीं होता है, वे अभी भी उतने ही भ्रष्ट होते हैं जितने वे हुआ करते थे, वे जो पहले अहंकारी और दंभी हुआ करते थे अब भी अहंकारी और दंभी होते हैं, और वे जो पहले कपटी और साँठगाँठ करने वाले हुआ करते थे अब भी कपटी और साँठगाँठ करने वाले ही रहते हैं। दुष्ट आत्माओं का कार्य लोगों को भ्रष्ट करता है, और उन्हें मानसिक रूप से अपसामान्य बना देता है। दुष्ट आत्माओं की कार्य-प्रणाली से, हम देखते हैं कि वे केवल कितनी नीच, बुरी, अधम, और बुद्धिहीन होती हैं। वे लोगों को सताने और भ्रष्ट करने के अलावा और कुछ नही करती हैं, और इस वजह से वे लोगों के द्वारा घृणा और अभिशप्त की जाती हैं, जो कहते हैं कि वे नीच हैं। इस प्रकार, दुष्ट आत्माओं का कार्य शैतान का प्रतिनिधित्व करता है—इसमें कुछ भी त्रुटि नहीं है। जिस किसी ने उन लोगों को देखा है जिनमें दुष्ट आत्माएँ कार्य करती हैं, या जो किसी दुष्टात्मा के द्वारा ग्रस्त हैं, वे जानते हैं कि दुष्ट आत्माएँ कितनी घृणास्पद, अधम, दुष्ट, और भ्रष्ट होती हैं। क्या तुम लोग इसे देखते हो? तुम लोग इसमें से कुछ देखते हो, हाँ? क्या तुम लोगों ने देखा है कि दुष्ट आत्माएँ सत्य को धारण करती हैं? क्या दुष्ट आत्माओं को मनुष्य के लिए कोई प्रेम होता है? दुष्ट आत्माओं के कार्य से, यह देखा जा सकता है कि उनमें थोड़ा सा भी सत्य नहीं होता है, और कि उनकी प्रकृति वास्तव में बुरी होती है। यह देख कर कि दुष्ट आत्माएँ लोगों को कैसे भ्रष्ट करती हैं, तुमने देखा है कि कैसे शैतान लोगों को भ्रष्ट करता है—यह पूरी तरह से सही है। क्योंकि सभी दुष्ट आत्माएँ शैतान के साथ मिलीभगत में होती हैं, क्योंकि वे सब शैतान का अनुसरण करती हैं, और शैतान की सहभागी, मित्र, और सहयोगी हैं, इसलिए वे अति प्राचीन समय से ही शैतान के साथ हैं। परमेश्वर का विद्रोह करने में शैतान ने इन सब दुष्ट आत्माओं की अगुवाई की और इसे पृथ्वी पर गिरा दिया गया था। क्या कोई दुष्ट आत्मा—कोई दुष्ट आत्मा जो सत्य से रहित है और स्वभाववश पूरी तरह से परमेश्वर के प्रति विद्रोहशील है—किसी व्यक्ति में कोई भी सत्य ला सकती है जब यह उन्हें ग्रस्त करती है? क्या यह उनके स्वभाव में बदलाव ला सकती है? बिल्कुल नहीं।

"जीवन में प्रवेश के विषय में संगति एवं प्रवचन (II)" में "पवित्र आत्मा के कार्य को जानना मनुष्य के उद्धार के लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण है" से

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