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अध्याय 6 विभेदन के कई रूप जिन्हें परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास में तुम्हें धारण करना चाहिए

3. तुम सच्चे मसीह और झूठे मसीहों के बीच अंतर को कैसे बता सकते हो?

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

परमेश्वर देहधारी हुआ और मसीह कहलाया, और इसलिए वह मसीह, जो लोगों को सत्य दे सकता है, परमेश्वर कहलाता है। इसमें कुछ भी अतिशयोक्ति नहीं है, क्योंकि वह परमेश्वर के तत्व को स्वयं में धारण किए रहता है, और अपने कार्य में परमेश्वर के स्वभाव और बुद्धि को धारण करता है, और ये चीजें मनुष्य के लिये अप्राप्य हैं। जो अपने आप को मसीह कहते हैं, फिर भी परमेश्वर का कार्य नहीं कर सकते, वे सभी धोखेबाज़ हैं। मसीह पृथ्वी पर केवल परमेश्वर की अभिव्यक्ति नहीं है, बल्कि वह देह है जिसे धारण करके परमेश्वर लोगों के बीच रहकर कार्य पूर्ण करता है। यह वह देह नहीं है जो किसी भी मनुष्य के द्वारा प्रतिस्थापित कियाजा सके, बल्कि वह देह है, जो परमेश्वर के कार्य को पृथ्वी पर अच्छी तरह से करता है और परमेश्वर के स्वभाव को अभिव्यक्त करता है, और अच्छी प्रकार से परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करता है, और मनुष्य को जीवन प्रदान करता है। कभी न कभी, उन धोखेबाज़ मसीह का पतन होगा, हालांकि वे मसीह होने का दावा करते हैं, किंतु उनमें किंचितमात्र भी मसीह का सार-तत्व नहीं होता। इसलिए मैं कहता हूं कि मसीह की प्रमाणिकता मनुष्य के द्वारा परिभाषित नहीं की जा सकती है, परन्तु स्वयं परमेश्वर के द्वारा उत्तर दिया और निर्णय लिया जा सकता है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "केवल अंतिम दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनन्त जीवन का मार्ग दे सकता है" से

जो देहधारी परमेश्वर है, वह परमेश्वर का सार धारण करेगा, और जो देहधारी परमेश्वर है, वह परमेश्वर की अभिव्यक्ति धारण करेगा। चूँकि परमेश्वर देहधारी हुआ, वह उस कार्य को प्रकट करेगा जो उसे अवश्य करना चाहिए, और चूँकि परमेश्वर ने देह धारण किया, तो वह उसे अभिव्यक्त करेगा जो वह है, और मनुष्यों के लिए सत्य को लाने के समर्थ होगा, मनुष्यों को जीवन प्रदान करने, और मनुष्य को मार्ग दिखाने में सक्षम होगा। जिस शरीर में परमेश्वर का सार नहीं है, निश्चित रूप से वह देहधारी परमेश्वर नहीं है; इस बारे में कोई संदेह नहीं है। यह पता लगाने के लिए कि क्या यह देहधारी परमेश्वर है, मनुष्य को इसका निर्धारण उसके द्वारा अभिव्यक्त स्वभाव से और उसके द्वारा बोले वचनों से अवश्य करना चाहिए। कहने का अभिप्राय है, कि वह परमेश्वर का देहधारी शरीर है या नहीं, और यह सही मार्ग है या नहीं, इसे परमेश्वर के सार से तय करना चाहिए। और इसलिए, यह निर्धारित करने[क] में कि यह देहधआरी परमेश्वर का शरीर है या नहीं, बाहरी रूप-रंग के बजाय, उसके सार (उसका कार्य, उसके वचन, उसका स्वभाव और बहुत सी अन्य बातें) पर ध्यान देना ही कुंजी है। यदि मनुष्य केवल उसके बाहरी रूप-रंग को ही देखता है, उसके तत्व की अनदेखी करता है, तो यह मनुष्य की अज्ञानता और उसके अनाड़ीपन को दर्शाता है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "प्रस्तावना" से

देहधारी परमेश्वर मसीह कहलाता है, तथा मसीह परमेश्वर के आत्मा के द्वारा धारण किया गया देह है। यह देह किसी भी मनुष्य की देह से भिन्न है। यह भिन्नता इसलिए है क्योंकि मसीह मांस तथा खून से बना हुआ नहीं है बल्कि आत्मा का देहधारण है। उसके पास सामान्य मानवता तथा पूर्ण परमेश्वरत्व दोनों हैं। उसकी दिव्यता किसी भी मनुष्य द्वारा धारण नहीं की जाती है। उसकी सामान्य मानवता देह में उसकी समस्त सामान्य गतिविधियों को बनाए रखती है, जबकि दिव्यता स्वयं परमेश्वर के कार्य करती है। चाहे यह उसकी मानवता हो या दिव्यता, दोनों स्वर्गिक परमपिता की इच्छा के प्रति समर्पित हैं। मसीह का सार पवित्र आत्मा, अर्थात्, दिव्यता है। इसलिए, उसका सार स्वयं परमेश्वर का है; यह सार उसके स्वयं के कार्य में बाधा उत्पन्न नहीं करेगा, तथा वह संभवतः कोई ऐसा कार्य नहीं कर सकता है जो उसके स्वयं के कार्य को नष्ट करता हो, ना वह ऐसे वचन कहेगा जो उसकी स्वयं की इच्छा के विरूद्ध जाते हों।...

यद्यपि मसीह देह में परमेश्वर स्वयं का प्रतिनिधित्व करता है तथा व्यक्तिगत रूप में वह कार्य करता है जिसे परमेश्वर स्वयं को करना चाहिए, किन्तु वह स्वर्ग में परमेश्वर के अस्तित्व को नहीं नकारता है, ना ही वह उत्तेजनापूर्वक अपने स्वयं के कर्मों की घोषणा करता है। बल्कि, वह विनम्रतापूर्वक अपनी देह के भीतर छिपा रहता है। मसीह के अलावा, जो मसीह होने का झूठा दावा करते हैं उनके पास उसकी विशेषताएँ नहीं होती हैं। अभिमानी तथा आत्म-प्रशंसा करने के स्वभाव वाले झूठे मसीहों से तुलना करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि किस प्रकार की देह में वास्तव में मसीह है। जितने अधिक वे झूठे होते हैं, उतना ही अधिक इस प्रकार के झूठे मसीहे स्वयं का दिखावा करते हैं, तथा लोगों को धोखा देने के लिये वे और अधिक संकेतों और चमत्कारों को करने में समर्थ होते हैं। झूठे मसीहों के पास परमेश्वर के गुण नहीं होते हैं; मसीह पर झूठे मसीहों से संबंधित किसी भी तत्व का दाग नही लगता है। परमेश्वर केवल देह का कार्य पूर्ण करने के लिये देहधारी होता है, मात्र सब मनुष्यों को उसे देखने देने की अनुमति देने के लिए नहीं। बल्कि, वह अपने कार्य से अपनी पहचान की पुष्टि होने देता है, तथा जो वह प्रकट करता है उसे अपने सार को प्रमाणित करने की अनुमति देता है। उसका सार निराधार नहीं है; उसकी पहचान उसके हाथ द्वारा जब्त नहीं की गई है; यह उसके कार्य तथा उसके सार द्वारा निर्धारित की जाती है। ...

मसीह का कार्य तथा अभिव्यक्ति उसके सार को निर्धारित करते हैं। वह अपने सच्चे हृदय से उस कार्य को पूर्ण करने में सक्षम है जो उसे सौंपा गया है। वह सच्चे हृदय से स्वर्ग में परमेश्वर की आराधना करने में सक्षम है, तथा सच्चे हृदय से परमपिता परमेश्वर की इच्छा खोजने में सक्षम है। यह सब उसके सार द्वारा निर्धारित किया जाता है। और इसी प्रकार से उसका प्राकृतिक प्रकाशन भी उसके सार द्वारा निर्धारित किया जाता है; उसके स्वाभाविक प्रकाशन का ऐसा कहलाना इस वजह से है कि उसकी अभिव्यक्ति कोई नकल नहीं है, या मनुष्य द्वारा शिक्षा का परिणाम, या मनुष्य द्वारा अनेक वर्षों संवर्धन का परिणाम नहीं है। उसने इसे सीखा या इससे स्वयं को सँवारा नहीं; बल्कि, यह उसके अन्दर अंतर्निहित है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "स्वर्गिक परमपिता की इच्छा के प्रति आज्ञाकारिता ही मसीह का वास्तविक सार है" से

यदि, वर्तमान समय में, कोई व्यक्ति उभर कर आता है जो चिह्नों और चमत्कारों को प्रदर्शित करने, पिशाचों को निकालने, और चंगाई करने में और कई चमत्कारों को करने में समर्थ है, और यदि यह व्यक्ति दावा करता है कि यह यीशु का आगमन है, तो यह दुष्टात्माओं की जालसाजी और उसका यीशु की नकल करना होगा। इस बात को स्मरण रखें! परमेश्वर एक ही कार्य को दोहराता नहीं है। यीशु के कार्य का चरण पहले ही पूर्ण हो चुका है, और परमेश्वर फिर से उस चरण के कार्य को पुनः नहीं दोहराएगा। परमेश्वर का कार्य मनुष्य की सभी अवधारणाओं के असंगत है; उदाहरण के लिए, पुराने नियम में मसीहा के आगमन के बारे में पहले से ही बताया गया है, परन्तु यह पाया गया कि यीशु आया, इसलिए एक अन्य मसीहा का फिर से आना गलत होगा। यीशु एक बार आ चुका है, और इस समय यदि यीशु को फिर से आना होता तो यह गलत होता। प्रत्येक युग के लिए एक नाम है और प्रत्येक नाम युग के द्वारा चिन्हित किया जाता है। मनुष्य की अवधारणाओं में, परमेश्वर को अवश्य हमेशा चिह्न और चमत्कार दिखाने चाहिए, हमेशा चंगा करना और पिशाचों को निकालना चाहिए, और हमेशा यीशु के ही समान अवश्य होना चाहिए, फिर भी इस समय परमेश्वर इन सब के समान बिल्कुल भी नहीं है। यदि अंत के दिनों के दौरान, परमेश्वर अभी भी चिह्नों और चमत्कारों को प्रदर्शित करता है और अभी भी दुष्टात्माओं को निकालता और चंगा करता है—यदि वह यीशु के ही समान करता है—तो परमेश्वर एक ही कार्य को दोहरा रहा होगा, और यीशु के कार्य का कोई महत्व या मूल्य नहीं होगा। इस प्रकार, प्रत्येक युग में परमेश्वर कार्य के एक ही चरण को करता है । एक बार जब उसके कार्य का प्रत्येक चरण पूरा हो जाता है, तो शीघ्र ही इसकी दुष्टात्माओं के द्वारा नकल की जाती है, और शैतान द्वारा परमेश्वर का करीब से पीछा करने के बाद, परमेश्वर एक दूसरे तरीके में बदल देता है; एक बार परमेश्वर अपने कार्य का एक चरण पूर्ण कर लेता है, तो इसकी दुष्टात्माओं द्वारा नकल कर ली जाती है। तुम लोगों को इन बातों के बारे में अवश्य स्पष्ट हो जाना चाहिए।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "आज परमेश्वर के कार्य को जानना" से

कुछ ऐसे लोग हैं जो दुष्टात्माओं के द्वारा ग्रसित हैं और लगातार चिल्लाते रहते हैं, "मैं ईश्वर हूँ!" फिर भी अंत में, वे खड़े नहीं रह सकते हैं, क्योंकि वे गलत प्राणी की ओर से काम करते हैं। वे शैतान का प्रतिनिधित्व करते हैं और पवित्र आत्मा उन पर कोई ध्यान नहीं देता है। तुम अपने आपको कितना भी बड़ा ठहराओ या तुम कितनी भी ताकत से चिल्लाओ, तुम अभी भी एक सृजित प्राणी ही हो और एक ऐसे प्राणी हो जो शैतान से सम्बन्धित है। मैं कभी नहीं चिल्लाता हूँ, कि मैं ईश्वर हूँ, मैं परमेश्वर का प्रिय पुत्र हूँ! परन्तु जो कार्य मैं करता हूँ वह परमेश्वर का कार्य है। क्या मुझे चिल्लाने की आवश्यकता है? बड़ा ठहराने की कोई आवश्यकता नहीं है। परमेश्वर अपना काम स्वयं करता है और उसे मनुष्य से कोई आवश्यकता नहीं है कि वह उसे हैसियत या सम्मानसूचक पदवी प्रदान करें, और उसकी पहचान और हैसियत को दर्शाने के लिए उसका काम ही पर्याप्त है। उसके बपतिस्मा से पहले, क्या यीशु स्वयं परमेश्वर नहीं था? क्या वह परमेश्वर का देहधारी देह नहीं था? निश्चित रूप से यह नहीं कहा जा सकता है कि केवल उसके लिए गवाही दिए जाने के पश्चात् ही वह परमेश्वर का इकलौता पुत्र बना गया? क्या उसके द्वारा काम आरम्भ करने से बहुत पहले ही यीशु नाम का कोई व्यक्ति नहीं था? तुम नए मार्ग नहीं ला सकते हो या पवित्रात्मा का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते हो। तुम पवित्र आत्मा के कार्य को या उन वचनों को व्यक्त नहीं कर सकते हो जिन्हें वह कहता है। तुम परमेश्वर स्वयं के या पवित्रात्मा के कार्य को नहीं कर सकते हो। तुम परमेश्वर की बुद्धि, अद्भुत काम, और अगाधता को, या उस सम्पूर्ण स्वभाव को व्यक्त नहीं कर सकते हो जिसके द्वारा परमेश्वर मनुष्य को ताड़ना देता है। अतः परमेश्वर होने के तुम्हारे बार-बार के दावों से कोई फर्क नहीं पड़ता है; तुम्हारे पास सिर्फ़ नाम है और सार में से कुछ भी नहीं है। परमेश्वर स्वयं आ गया है, किन्तु कोई भी उसे नहीं पहचाता है, फिर भी वह अपना काम जारी रखता है और पवित्र आत्मा के प्रतिनिधित्व में ऐसा ही करता है। चाहे तुम उसे मनुष्य कहो या परमेश्वर, प्रभु कहो या मसीह, या उसे बहन कहो, सब सही है। परन्तु जिस कार्य को वह करता है वह पवित्रात्मा का है और स्वयं परमेश्वर के कार्य का प्रतिनिधित्व करता है। वह उस नाम के बारे में परवाह नहीं करता है जिसके द्वारा मनुष्य उसे पुकारते है। क्या वह नाम उसके काम का निर्धारण कर सकता है? इस बात की परवाह किए बिना कि तुम उसे क्या कहते हो, परमेश्वर के दृष्टिकोण से, वह परमेश्वर के आत्मा का देहधारी देह है; वह पवित्रात्मा का प्रतिनिधित्व करता है और उसके द्वारा अनुमोदित है। तुम एक नए युग के लिए मार्ग नहीं बना सकते हो, और तुम पुराने युग का समापन नहीं कर सकते हो और एक नए युग का सूत्रपात या नया कार्य नहीं कर सकते हो। इसलिए, तुम्हें परमेश्वर नहीं कहा जा सकता है!

"वचन देह में प्रकट होता है"से "देहधारण का रहस्य (1)" से

यदि कोई मनुष्य अपने आप को परमेश्वर कहता हो मगर अपनी दिव्यता को व्यक्त करने में, परमेश्वर स्वयं का कार्य करने में, या परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने में असमर्थ हो, तो वह निसंदेह ही परमेश्वर नहीं है, क्योंकि उसमें परमेश्वर का सार नहीं है, और परमेश्वर जो अंतर्निहित रूप से प्राप्त कर सकता है वह उसके भीतर विद्यमान नहीं है।

"वचन देह में प्रकट होता है"से "देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर" से

उन झूठे मसीहाओं, झूठे भविष्यवक्ताओं और धोखेबाजों के मध्य, क्या ऐसे लोग भी नहीं हैं जिन्हें परमेश्वर कहा जाता है? और क्यों वे परमेश्वर नहीं हैं? क्योंकि वे परमेश्वर का कार्य करने में असमर्थ हैं। मूल में वे मनुष्य ही हैं, लोगों को धोखा देने वाले हैं, न कि परमेश्वर; और इस प्रकार उनके पास परमेश्वर की पहचान नहीं है।

"वचन देह में प्रकट होता है"से "पद नामों एवं पहचान के सम्बन्ध में"से

मनुष्य की सहभागिता:

हम सब ने जिन्होंने अंत के दिनों के परमेश्वर के कार्य का अनुभव किया है एक तथ्य को स्पष्ट रूप से देखा हैः प्रत्येक बार जब परमेश्वर कार्य के नए चरण को करता है, शैतान और उसकी विभिन्न दुष्ट आत्माएँ, लोगों को बहकाने के लिए उसके कार्य का अनुकरण करते हुए और उसे झूठा ठहराते हुए, उसके कदमों के निशानों का अनुसरण करती हैं। यीशु ने चंगा किया, और दुष्ट आत्माओं को निकाला, और इसलिए, शैतान और दुष्ट आत्माएँ भी चंगा करती हैं और दुष्ट आत्माओं को निकालती हैं; पवित्र आत्मा ने मनुष्य को भाषाओं का वरदान दिया, और इसलिए, दुष्ट आत्माएँ भी लोगों से "भाषाएँ" बुलवाती हैं जिसे कोई नहीं समझता है। और फिर भी, यद्यपि दुष्ट आत्माएँ विभिन्न चीज़ों को करती हैं जो मनुष्य की जरूरतों में बढ़ावा देती हैं, और उसे ठगने के लिए कुछ अलौकिक क्रियाएँ करती हैं, क्योंकि न तो शैतान के पास और न ही दुष्ट आत्माओं के पास थोड़ा सा भी सत्य है, इसलिए वे कभी भी मनुष्य को सत्य देने में समर्थ नहीं होंगी। केवल इस बिन्दु से ही सच्चे मसीह और झूठे मसीहों के बीच अंतर करना संभव है।

... देह में साकार हो कर, परमेश्वर का आत्मा विनम्रता से और गुप्त रूप से कार्य करता है, और जरा सी भी शिकायत के बिना मनुष्य की सारी पीड़ा का अनुभव करता है। मसीह के रूप में, परमेश्वर ने अपने आप में कभी इतराहट नहीं दिखाई है, या शेखी नहीं बघारी है, और उसने अपने पद का घमंड तो बिल्कुल भी नहीं किया है, या आत्मतुष्ट नहीं हुआ है, जो परमेश्वर की आदरणीयता और पवित्रता को पूरी तरह से जगमगाता है। यह परमेश्वर के जीवन के सर्वोच्च आदरणीय सार को प्रदर्शित करता है, और यह दर्शाता है कि वह प्रेम का मूर्त रूप है। झूठे मसीहों एवं दुष्ट आत्माओं का कार्य मसीह के कार्य के बिल्कुल विपरीत हैः किसी भी अन्य चीज़ से पहले, दुष्ट आत्माएँ हमेशा चिल्लाती हैं कि वे मसीह हैं, और वे कहती हैं कि यदि तुम उनकी बातों को नहीं सुनते हो तो तुम राज्य में प्रवेश नहीं कर सकते हो। लोग उन से मुलाकात करें इसके लिए वे वह सब कुछ करती हैं जो वे कर सकती हैं, वे शेखी बघारती हैं, स्वयं में इतराती हैं, और डींग मारती हैं, या फिर लोगों को ठगने के लिए कुछ चिन्हों अद्भुत कामों को करती हैं—और जब इन लोगों को ठग दिया जाता है तथा ये लोग उनका काम स्वीकार कर लेते हैं, तो उसके बाद वे बिना कानाफूसी किए एकाएक ढह जाते हैं क्योंकि उन्हें सत्य प्रदान किए हुए काफी समय बीत चुका है। इसके अनेकानेक उदाहरण हैं। क्योंकि झूठे मसीह सत्य, मार्ग और जीवन नहीं हैं, इसलिए उनके पास कोई मार्ग नहीं है, और जो उनका अनुसरण करते हैं वे आज नहीं तो कल अपमानित किए जाएँगे — किन्तु तब तक वापस जाने के लिए बहुत देर हो जाएगी। और इसलिए, यह एहसास करना सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण है कि केवल मसीह ही सत्य, मार्ग और जीवन है। झूठे मसीह एवं दुष्ट आत्माएँ निश्चित रूप से सत्य से विहीन हैं; इस से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वे कितना कहते हैं, या वे कितनी पुस्तकें लिखते हैं, उन में से किसी में भी थोड़ा सा भी सत्य नहीं है। यह परम सिद्धांत है। केवल मसीह ही सत्य को व्यक्त करने में समर्थ है, और यह सच्चे मसीह एवं झूठे मसीहों के बीच अंतर करने की कुंजी है। इतना ही नहीं, मसीह ने कभी भी लोगों को उसे अभिस्वीकृत करने या पहचानने के लिए बाध्य नहीं किया। क्योंकि जो उस पर विश्वास करते हैं, उनके लिए सत्य और भी अधिक स्पष्ट हो जाता है, और जिस मार्ग पर वे चलते हैं वह और भी अधिक प्रकाशमान हो जाता है, जिससे यह साबित होता है कि केवल मसीह ही लोगों को बचाने में समर्थ है, क्योंकि मसीह ही सत्य है। झूठे मसीह केवल कुछ वचनों की ही नक़ल कर सकते हैं, या ऐसी बातें कह सकते हैं जो काले को सफेद में मरोड़ती हैं। वे सत्य से रहित हैं, और वे लोगों के लिए केवल अंधकार, विनाश एवं दुष्ट आत्माओं के कार्य ला सकती हैं।

"झूठे मसीह एवं मसीह विरोधियों के द्वारा बहकाने के मामलों के सूक्ष्म परीक्षण की प्रस्तावना" से

झूठे मसीहों को कैसे पहचाना जा सकता है? यह बहुत सरल है। तुम उन से कहो: "जारी रहो, बात करो। तुम्हें क्या चीज मसीह बनाती है? कुछ कहो कि परमेश्वर का स्वरूप कैसा है, और यदि तुम इसे नहीं कह सकते हो, तो लिख कर बताना भी ठीक है? दिव्यता द्वारा व्यक्त किए गए कुछ वचनों को बताओ—जारी रहो, मेरे लिए कुछ लिखो। तुम्हें मानवता के कुछ वचनों की नक़ल करने में कोई समस्या नहीं है। कुछ और कहो, तीन घण्टे तक बोलो और देखो कि क्या तुम ऐसा कर सकते हो। मेरे साथ तीन घण्टे तक सत्य की संगति करो, परमेश्वर क्या है उसके बारे में, और उसके कार्य के इस चरण के बारे में बात करो, मेरे लिए स्पष्ट रूप से बोलो, इसकी कोशिश करो और देखो। और यदि तुम नहीं बोल सकते हो, तो तुम नकली हो, और एक दुष्ट आत्मा हो। सच्चा मसीह कई दिनों तक बिना किसी समस्या के बोल सकता है, और सच्चे मसीह ने लाखों से भी अधिक वचनों को व्यक्त किया है—और उसने अभी तक समाप्त नहीं किया है। वह कितना बोल सकता है इसकी कोई सीमा नहीं है, वह किसी भी समय या किसी भी स्थान पर बोल सकता है, और संपूर्ण संसार में उसके वचनों को किसी भी मनुष्य के द्वारा लिखा नहीं जा सका है। क्या उन्हें किसी ऐसे के द्वारा लिखा जा सकता है जो दिव्य नहीं है? क्या ऐसा व्यक्ति इन वचनों को बोल सकता है? तुम जो झूठे मसीह हो दिव्यता से रहित हो, और तुम्हारे भीतर परमेश्वर का पवित्र आत्मा नहीं है। तुम परमेश्वर के वचनों को बोलने में कैसे समर्थ हो सकते हो? तुम परमेश्वर के कुछ वचनों की नक़ल कर सकते हो, किन्तु तुम इसके लिए कितनी दूर तक जा सकते हो? कोई भी व्यक्ति जिसके पास दिमाग है वह कुछ वचनों को स्मरण कर सकता है, इसलिए एक घण्टे तक बोलो, दो घण्टे तक सत्य की संगति करो—इसकी कोशिश करो और देखो|" यदि तुम उनके साथ इस प्रकार से डटे रहते हो, तो वे सभी को बेनकाब हो जाएँगे, वे सभी भौंचक्के हो जाएँगे, और वे भाग जाएँगे। क्या ऐसा मामला नहीं है? तुम लोग क्या कहते हो, क्या यह ऐसा ही नहीं है? उन से यह कहो: मसीह ही सत्य, मार्ग और जीवन है, अतः मेरे सुनने, या पढ़ने के लिए मसीह की सच्चाईयों को व्यक्त करो। यदि तुम व्यक्त कर सकते हो, तो तुम मसीह हो, और यदि तुम व्यक्त नहीं कर सकते हो, तो तुम दुष्ट आत्मा हो! सच्चे मसीह और झूठे मसीहों के बीच अंतर बताना आसान है। झूठे मसीह और मसीह विरोधी सत्य से रहित होते हैं; जो कोई भी सत्य से सम्पन्न है वह मसीह है, और जिस किसी में भी सत्य का अभाव है वह मसीह नहीं है। क्या ऐसा मामला नहीं है। उनसे कहो: "यदि तुम व्यक्त नहीं कर सकते हो कि मसीह क्या है, या परमेश्वर क्या है, और तुम कहते हो कि तुम मसीह हो, तो तुम झूठ बोल रहे हो। मसीह ही सत्य है—आओ देखें कि सत्य के कितने वचन तुम व्यक्त कर सकते हो। यदि तुम कुछ ही वचनों की नक़ल करते हो, तो तुम उन्हें जारी नहीं कर रहे हो, बल्कि तुम मात्र उनकी नक़ल कर रहे हो। तुमने उन्हें चुराया है, वे एक नक़ल हैं|" अब तुम यही चाहते थे—झूठे मसीह को पहचानने के लिए बस इतना ही लगता है। ... आओ हम एक तथ्य के बारे में बात करें: जब परमेश्वर प्रकट हुआ तो वह कैसे प्रकट हुआ। जब परमेश्वर ने कार्य करना प्रारम्भ किया, तब उसने यह नहीं कहा कि वह परमेश्वर है, उसने ऐसा नहीं कहा। परमेश्वर ने कई वचन व्यक्त किए, और जब उसने लाखों वचन व्यक्त किए, तब भी उसने नहीं कहा कि वह परमेश्वर है। लाखों वचन—यह एक सम्पूर्ण पुस्तक है, तीन या चार सौ पन्ने—और तब भी उसने नहीं कहा कि वह परमेश्वर है। पवित्र आत्मा के द्वारा प्रबुद्ध एवं रोशन किए जाने के बाद, कुछ लोगों ने कहाः "आहा, ये परमेश्वर के वचन हैं, यह पवित्र आत्मा की आवाज़ है!" शुरूआत में, उनका मानना था कि यह पवित्र आत्मा की आवाज़ है; बाद में, उन्होंने कहा कि यह सात पवित्रात्माओं की, सात गुना तीव्र पवित्रात्मा की आवाज़ है। उन्होंने इसे "सात पवित्रात्माओं की आवाज़", या "पवित्र आत्मा के कथन" कहा था। यही उन्होंने प्रारम्भ में विश्वास किया था। केवल बाद में ही, जब परमेश्वर ने बहुत से वचन, लाखों वचन कहे, उसके बाद ही, उसने गवाही देनी आरंभ की कि देहधारण क्या है, और वचन का देह में प्रकट होना क्या है—और केवल तभी लोगों ने, यह कहते हुए, जानना आरम्भ किया: "आहा! परमेश्वर देह बन गया है। यह उस परमेश्वर का देहधारण है जो हम से बात करता है!" देखो परमेश्वर का कार्य कितना अदृष्ट और विनम्र है। अंततः, जब परमेश्वर ने अपने सभी वचनों को व्यक्त करना समाप्त कर दिया जो उसे अवश्य व्यक्त करने चाहिए थे, उसके बाद, जब उसने कार्य किया और उपदेश दिए, तब भी उसने नहीं कहा था कि वह परमेश्वर है, तब भी उसने कभी नहीं कहा कि, "मैं परमेश्वर हूँ! तुम लोगों को मुझे अवश्य सुनना चाहिए।" उसने कभी भी ऐसा नहीं बोला। फिर भी झूठे मसीह थोड़े से वचनों को कहने से पहले ही कहते हैं कि वे मसीह हैं। क्या वे नकली नहीं हैं? सच्चा परमेश्वर अदृष्ट एवं विनम्र है, और कभी भी अपने आप पर इतराता नहीं है; दूसरी ओर, शैतान और दुष्ट आत्माएँ, अपने आप पर इतराते हैं, जो कि उनको पहचानने का एक अन्य तरीका है।

"जीवन में प्रवेश के विषय में संगति एवं प्रवचन (I)" में "प्रश्नों के उत्तर" से

अब, यदि लोग तुम लोगों को ठगने की कोशिश करें, तो देखो कि वे परमेश्वर की आवाज़ हो व्यक्त करने में समर्थ हैं या नहीं। इससे इस बात की पुष्टि हो जाएगी कि वे दिव्य सार से संपन्न हैं या नहीं। यदि वे परमेश्वर के स्वरूप के बारे में बोलने में असमर्थ हैं, और परमेश्वर की चीज़ों एवं उसकी आवाज़ को व्यक्त करने में असमर्थ हैं, तो वे निश्चित रूप से परमेश्वर के सार से रहित हैं, और इसलिए वे नक़ली हैं। ऐसे लोग भी हैं जो कहते हैं: हमने कुछ लोगों को ऐसे वचन बोलते हुए सुना है जिसे कोई नहीं कह सकता है। वे भविष्यवाणी बोल सकते हैं, और बिना किसी घबराहट के चीज़ों के बारे में बोल सकते हैं जिन्हें कोई जान या देख नहीं सकता है—इसलिए क्या वे परमेश्वर हैं? जब ऐसे लोगों की बात आती है तो तुम लोग अंतर को कैसे बता सकते हो? जैसा कि अभी-अभी कहा गया है, यदि वे परमेश्वर हैं, तो उन्हें परमेश्वर के स्वरूप के बारे में बोलने में समर्थ अवश्य होना चाहिए, और परमेश्वर के राज्य के रहस्यों के बारे में बोलने में समर्थ अवश्य होना चाहिए; केवल ऐसे किसी को ही परमेश्वर का देहधारण होना कहा जा सकता है। यदि ऐसे लोग हैं जो ऐसी चीज़ों को बोलने में समर्थ हैं जिन्हें अन्य लोग नहीं जानते हैं, तो कौन उन्हें उनके भविष्य के बारे में बता सकता है, और कह सकता है कि उनके देशों का क्या होगा, ये आवश्यक रूप से परमेश्वर के वचन नहीं हैं; दुष्ट आत्माएँ भी ऐसी चीज़ों को करने में सक्षम होती हैं। उदाहरण के लिए, यदि आज तुम उन से कहो: "भविष्य में मेरे साथ क्या होगा?" तो वे तुम्हें बताएँगी कि किस प्रकार की आपदा तुम्हारे ऊपर आएगी, या वे तुम्हें बताएँगी कि तुम कब मरोगे, या अन्यथा वे तुम्हें बताएँगी कि तुम्हारे परिवार के साथ क्या होगा। बहुत से उदाहरणों में, ये चीज़ें सच में हो जाती हैं। किन्तु इस प्रकार की चीज़ों को बोलने में समर्थ होना वह होना नहीं है जो परमेश्वर है, न ही परमेश्वर के कार्य का एक भाग होना है। तुम्हें इस बिन्दु के विषय में स्पष्ट अवश्य हो जाना चाहिए। ये तुच्छ मामले हैं जिनमें दुष्ट आत्माओं को महारत हासिल है; परमेश्वर ऐसी चीज़ों में शामिल नहीं होता है। देखो कि हर बार जब भी परमेश्वर ने देहधारण किया है तो उसने क्या कार्य किया है। परमेश्वर मानवजाति को बचाने का कार्य करता है, वह यह भविष्यवाणी नहीं करता है कि लोगो के साथ क्या होगा, वे कितने समय तक जीवित रहेंगे, उनके कितने बच्चे होंगे, या कब उन पर विपत्ति आएगी। क्या परमेश्वर ने कभी ऐसी चीज़ों की भविष्यवाणी की है? उसने नहीं की है। अब, तुम लोग क्या कहते हो, क्या परमेश्वर ऐसी चीज़ों को जानता है? निस्संदेह वह जानता है, क्योंकि उसने आकाश और पृथ्वी और सभी चीज़ों को बनाया है। केवल परमेश्वर ही उन्हें भली-भाँति जानता है, जबकि जो कुछ दुष्ट आत्माएँ जानती हैं उसकी एक सीमा है। दुष्ट आत्माएँ क्या जानने में सक्षम हैं? दुष्ट आत्माएँ किसी व्यक्ति, या एक देश, या एक जाति की नियति को जानती हैं। किन्तु वे परमेश्वर के प्रबन्धन के बारे में कुछ नहीं जानती हैं, वे नहीं जानते हैं कि मानवजाति का अंत क्या है, या मानवजाति की सच्ची मंज़िल कहाँ है, और वे यह तो बिल्कुल भी नहीं जानती हैं कि कब संसार का अंत होगा और परमेश्वर के राज्य का आगमन होगा, या राज्य के सुन्दर दृश्य किस के समान होंगे। वे इस बारे में कुछ भी नहीं जानती हैं, उन में कोई भी नहीं जानता है। केवल परमेश्वर ही ऐसे मामलों को जानता है, और इसलिए परमेश्वर सर्वज्ञ है, जबकि जो दुष्ट आत्माएँ जानती हैं वह बहुत ही सीमित हैं। हम जानते हैं कि संसार के सबसे बड़े भविष्यद्वक्ताओं ने कहा था कि अंत के दिनों में क्या होगा, और आज उनके वचन पूरे हो गए हैं—किन्तु वे नहीं जानते थे कि अंत के दिनों के दौरान परमेश्वर कौन सा काम करता है, और इस बारे में तो वे बिल्कुल भी नहीं जानते थे कि परमेश्वर क्या प्राप्त करने आया है, या सहस्राब्दि राज्य किस प्रकार आएगा, या कौन परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करेगा और जीवित रहेगा। इसके अतिरिक्त, न ही वे इस बारे में कुछ जानते थे कि बाद में परमेश्वर के राज्य में क्या होगा। कोई दुष्ट आत्मा ऐसे मामलों को नहीं जानती है; केवल परमेश्वर स्वयं ही जानता है, और इसलिए दुष्ट आत्माएँ ऐसा कुछ भी जानने में पूरी तरह से अक्षम हैं जो परमेश्वर की प्रबन्धन योजना से संबंधित है। यदि तुम उन से कहो कि, "मेरी नियति क्या है? मेरे परिवार के साथ क्या होगा?" तो कुछ दुष्ट आत्माएँ तुम्हें स्पष्ट उत्तर देने में समर्थ होंगी। किन्तु यदि तुम उन से कहो कि, "भविष्य में, क्या परमेश्वर पर विश्वास में मुझे कोई मंज़िल मिलेगी? क्या मैं जीवित बचा रहूँगा?" तो उन्हें पता नहीं होगा। दुष्ट आत्माएँ जो कुछ जानती हैं उसमें वे बहुत ही सीमित होती हैं। यदि कोई दुष्ट आत्मा केवल कुछ सीमित चीज़ों को ही बोल सकती है, तो क्या वह परमेश्वर हो सकती है? वह नहीं हो सकती है—वह एक दुष्ट आत्मा है। जब कोई दुष्ट आत्मा लोगों से ऐसी चीज़ें कह सकती है जिन्हें वे नहीं जानते हैं, उनके भविष्य के बारे में उन्हें बता सकती है, और यहाँ तक कि यह भी बता सकती है कि वे किसके समान हुआ करते थे और उन चीज़ों के बारे में बता सकती है जो उन्होंने की हैं, यदि ऐसे लोग हैं जो यह सोचते हैं कि यह वास्तव में दिव्य है, तो क्या ऐसे लोग हास्यास्पद नहीं हैं? इस से यह साबित होता है कि तुम परमेश्वर के बारे में पूरी तरह से अनजान हो। तुम दुष्ट आत्माओं के छोटे-मोटे कौशलों को अत्यंत दिव्य के रूप में देखते हो, और उनके साथ परमेश्वर के जैसे बर्ताव करते हो। क्या तुम परमेश्वर की सर्वशक्ति को जानते हो? इसलिए, यदि आज हमारे पास परमेश्वर की सर्वशक्ति और उसके कार्य का ज्ञान है, तो कोई भी दुष्ट आत्मा, इस बात की परवाह किए बिना कि वह कौन से चिन्हों एवं अद्भुत कामों को करती है, हमें ठग नहीं सकती है, क्योंकि हम न्यूनतम इस बारे में निश्चित हो सकते हैं कि: दुष्ट आत्माएँ सत्य नहीं हैं, वे परमेश्वर के कार्य को करने में समर्थ नहीं हैं, वे सृष्टिकर्त्ता नहीं हैं, वे मनुष्य को बचाने में अक्षम हैं, और वे मानवजाति को केवल भ्रष्ट कर सकती हैं।

"जीवन में प्रवेश के विषय में संगति एवं प्रवचन(II)" में "परमेश्वर के कार्य और मनुष्य के कार्य के बीच अंतर" से

फुटनोट्स:

क. मूलपाठ में "के लिए" पढा जाता है।

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