वचन देह में प्रकट होता है

विषय-वस्तु

तुम लोगों को अपने कार्यों पर विचार करना चाहिए

तुम्हारे जीवन के कार्यों से अनुमान लगता है, कि तुम लोगों को पोषण और पुन: आपूर्ति के लिए प्रतिदिन वचनों की आवश्यकता है, क्योंकि तुम लोगों में बहुत सारी कमियां हैं और तुम लोगों में ग्रहण करने की योग्यता और ज्ञान बहुत ही कम है। अपने दैनिक जीवन में तुम लोग एक ऐसे वातावरण में रहते हो जिसमें कोई सत्य या भला एहसास नहीं है। तुम में अस्तित्व में बने रहने के लिए प्रधान वस्तु की कमी है और मुझे या सत्य को जानने के लिए तुम लोगों के पास आधार नहीं है। तुम्हारा विश्वास महज एक ऐसे अस्पष्ट भरोसे पर या धार्मिक रीति-रिवाजों और ज्ञान के ऊपर बना हुआ है जो पूरी तरह सिद्धांतों पर टिका हुआ है। प्रतिदिन मैं तुम लोगों के क्रियाकलापों को देखता हूँ और तुम लोगों के इरादों और बुरे परिणामों की जाँच करता हूँ। मुझे कभी भी ऐसा कोई नहीं मिला जो सचमुच में अपना हृदय और अपनी आत्मा मेरी वेदी के ऊपर रखे, जिसे कभी हटाया न गया हो। इसलिए जिन्हें मैं ऐसी मानवजाति के ऊपर प्रकट करना चाहता हूँ, उन सभी वचनों को व्यर्थ में नहीं उण्डेलना चाहता। अपने हृदय में, मैं केवल अपने अपूर्ण कार्यों को पूरा करने और उस मानवजाति का उद्धार करने की योजना बना रहा हूँ जिन्हें मुझे बचाना है। तो भी, मैं उन सभी के लिए कामना करता हूँ जो मेरे उन वचनों से, जो मैं उन पर अर्पित करता हूं, उद्धार और सत्य प्राप्त करने हेतु मेरा अनुसरण करते हैं. मैं आशा करता हूँ कि एक दिन जब तुम अपनी आँखें बन्द करोगे, तो तुम एक ऐसे संसार को देखोगे जहाँ खुशबू हवा में फैल जाती है और जीवन के जल की धाराएँ बहती हैं, एक निराशाजनक और ठण्डे संसार को नहीं जहाँ अन्धकार आसमान को ढक लेता है और जहाँ चीख पुकार कभी नहीं थमती है।

प्रतिदिन उसके द्वारा प्रत्येक मनुष्य के कार्यों और विचारों पर चिंतन किया जाता है और साथ ही, वे अपने कल की तैयारी में जुट जाते हैं। यही वह मार्ग है जिस पर सभी जीवितों को चलना होगा और जिसे मैंने सभी के लिए पूर्वनिर्धारित कर दिया है। इससे कोई बच नहीं सकता और इसमें किसी के लिए कोई छूट नहीं है। मैंने अनगिनित वचन कहे हैं और इसके साथ-साथ मैंने अनगिनत कार्य किये हैं। प्रतिदिन मैं देखता हूँ जब प्रत्येक मनुष्य स्वाभाविक रूप से वह सब कुछ करता है जिसे उसे अपने अंतर्निहित स्वभाव के अनुसार करना है, और वह किस प्रकार विकसित होता जाता है। अनजाने में अनेक लोगों ने "सही मार्ग" पर पहले से ही चलना आरम्भ कर दिया है, जिसे मैंने हर प्रकार के मनुष्य के प्रकटन के लिए निर्धारित किया था। मैंने पहले से ही हर प्रकार के मनुष्य को अलग-अलग वातावरण में रखा है और अपने-अपने स्थानों में प्रत्येक मनुष्य अपनी अंतर्निहित विशेषताओं को प्रकट कर रहा है। उन्हें कोई बांध नहीं सकता और कोई उन्हें बहका नहीं सकता। वे सम्पूर्ण रूप से स्वतन्त्र हैं और वे जो अभिव्यक्त करते हैं वह स्वाभाविक रूप से अभिव्यक्त होता है। केवल एक ही चीज़ है जो उनको नियन्त्रण में रखती है और वह है मेरे वचन। इसलिए असंख्य मनुष्य अप्रसन्नता से मेरे वचनों को पढ़ते हैं ताकि उनका अंत कहीं उनकी मृत्यु न हो, परन्तु मेरे वचनों को कभी भी अभ्यास में लाते नहीं हैं। दूसरी ओर, कुछ लोगों के लिए मेरे वचनों के मार्गदर्शन और आपूर्ति के बिना दिन गुज़ारना कठिन होता है, अतः वे स्वाभाविक तौर पर मेरे वचनों को हर समय थामे रहते हैं। जैसे-जैसे समय बीतता जाता है, वे मनुष्य के जीवन के रहस्य, मानवजाति की मंजिल, और मनुष्य होने के मूल्य की खोज करते जाते हैं। मानवजाति मेरे वचन की उपस्थिति में इससे अलग और कुछ नहीं है और मैं बस चीज़ों को उनके अपने हिसाब से होने देता हूं। मैं ऐसा कुछ नहीं करता हूँ जो मनुष्य को उनके अस्तित्व के आधार के रूप में मेरे वचन के अनुसार जीने के लिए बाध्य करे। इस प्रकार वे जिनमें कभी विवेक नहीं रहा है या जिनके अस्तित्व का मूल्य नहीं है, शांतचित्त होकर चीज़ों को घटित होते देखते हैं और बेधड़क मेरे वचनों को दरकिनार कर देते हैं और जो चाहते हैं करते हैं। वे सत्य से और उन सब से जो मुझसे आता है, उकताने लगते हैं। इसके अतिरिक्त, वे मेरे घर में रहते हुए भी उकता जाते हैं। ये लोग भले ही सेवकाई कर रहे हों, फिर भी अपने लक्ष्य के लिए और दण्ड से बचने के लिए मेरे घर में अस्थायीतौर पर रहते हैं। परन्तु उनके इरादे कभी नहीं बदलते हैं और न ही उनके कार्य। यह आशीषों के लिए उनकी इच्छा को और प्रोत्साहित करता है, यह उस राज्य में एकतरफा यात्रा के लिए जहां वे अनंतकाल के लिये रह सकें और अनंत स्वर्ग में यात्रा के लिये भी। जितना अधिक वे मेरे दिन के जल्दी निकट आने की लालसा करते हैं, वे उतना ही अधिक महसूस करते हैं कि सत्य उनके लिए एक अवरोध और उनके मार्ग के लिए एक रोड़ा बन गया है। वे सत्य का अनुसरण या न्याय तथा ताड़ना को स्वीकार किए बगैर, और उन सब से बढ़कर, मेरे घर में समर्पित रूप से रहने की जरूरत को समझे बिना और जो आज्ञा मैं देता हूँ उसका पालन किए बिना, सदा-सर्वदा स्वर्ग के राज्य का आनन्द उठाने और राज्य में कदम रखने के लिए इन्तज़ार नहीं कर पाते हैं। ये लोग मेरे घर में प्रवेश न तो ऐसे हृदय की संतुष्टि के लिए करते हैं जो सत्य की खोज करता है और न ही मेरे प्रबन्धन के साथ मिलकर कार्य करने के लिए। वे महज उनमें से एक होने का लक्ष्य रखते हैं जिसे आने वाले युग में नष्ट नहीं किया जाएगा। इसलिए उनके हृदय ने कभी नहीं जाना कि सत्य क्या है या सत्य को कैसे ग्रहण किया जाता है। यही कारण है कि ऐसे लोगों ने कभी भी सत्य का अभ्यास नहीं किया या न ही अपनी भ्रष्टता की गहराई के चरम का एहसास किया है, फिर भी वे मेरे घर में अंत तक "सेवकों" के रूप में रहे। वे "धीरज से" मेरे दिन के आने का इन्तज़ार करते हैं और जब वे मेरे कार्य के तरीके के द्वारा यहाँ वहाँ उछाले जाते हैं तो वे थकते नहीं हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनकी कोशिश कितनी बड़ी है और उन्होंने उसकी क्या कीमत चुकाई है, कोई नहीं देखेगा कि उन्होंने सत्य के लिए कष्ट सहा है या मेरे लिए बलिदान किया है। अपने हृदय में, वे उस दिन को देखने का इन्तज़ार नहीं कर सकते हैं जब मैं पुराने युग का अंत करूँगा, और इससे बढ़कर, वे यह जानने के लिए बेचैन हैं कि मेरी सामर्थ और मेरा अधिकार कितना विशाल है। यह वो एक चीज़ है जिसमें बदलाव लाने और सत्य का अनुसरण करने के लिए उन्होंने कभी भी शीघ्रता नहीं की है। वे उससे प्रेम करते हैं जिससे मैं उकता गया हूँ और वे उससे उकता गए हैं जिससे मैं प्रेम करता हूँ। वे उसकी चाह करते हैं जिससे मैं नफरत करता हूँ लेकिन साथ ही वे उसे खोने से डरते हैं जिससे मैं घृणा करता हूँ। वे इस बुरे संसार में रहते तो हैं फिर भी इस संसार से कभी नफरत नहीं करते हैं और इस बात से बहुत भयभीत हैं कि इसे मेरे द्वारा नष्ट कर दिया जाएगा। उनके इरादे परस्पर विरोधी हैं: वे इस संसार से अतिप्रसन्न हैं जिससे मैं घृणा करता हूँ, फिर भी साथ ही वे मुझसे लालसा रखते हैं कि मैं इस संसार को शीघ्र नष्ट कर दूँ। इस रीति से वे विनाश के कष्ट से बचा लिए जाएँगे और इससे पहले कि वे सत्य के मार्ग से भटक जाएँ, वे अगले युग के स्वामियों के रूप में रूपान्तरित कर दिए जाएँगे। यह इसलिए है क्योंकि वे सत्य से प्रेम नहीं करते हैं और वह सब कुछ जो मुझ से आता है, वे उससे उकता गए हैं। शायद वे थोड़े से समय के लिए यह सोचकर "आज्ञाकारी लोग" बन जाएँगे कि कहीं आशीषों को खो न दें, लेकिन आशीषों के लिए उनकी चिंतित मानसिकता तथा जलती हुई आग की झील में प्रवेश करने और नाश होने का भय कभी धुंधला नहीं पड़ सकता। जैसे-जैसे मेरा दिन नज़दीक आता है, वैसे-वैसे उनकी इच्छा लगातार उत्कट होती जाती है। और विनाश जितना भयंकर होता है, उतना ही ज़्यादा यह उनको असहाय कर देता है और मुझे प्रसन्न करने के लिए एवं उन आशीषों को खोने से बचाने के लिए जिनकी उन्होंने लम्बे समय से लालसा की है, उसके लिए वे यह नहीं जानते हैं कि कहाँ से प्रारम्भ करें। एक बार जब मेरा हाथ अपना काम करना प्रारम्भ कर देता है तो ये लोग एक अग्रगामी सैन्य टुकड़ी के रूप में कार्य करने के लिए उत्सुक हो जाते हैं। वे बस सैन्य टुकड़ी की प्रथम पंक्ति में आने के बारे में सोचते हैं और यह सोचकर बहुत ज़्यादा भयभीत होते हैं कि मैं उन्हें नहीं देखूंगा। वे वही करते और कहते हैं जिसे वे सही समझते हैं; और यह नहीं जानते कि उनके कार्य कभी भी सत्य के अनुरूप नहीं रहे और वे मात्र मेरी योजनाओं में गड़बड़ी और हस्तक्षेप करने के लिए हैं। यद्यपि उन्होंने पुरजोर प्रयास किया है और शायद कठिनाई से होकर गुज़रने की उनकी इच्छा और इरादा सही हो, फिर भी जो कुछ वे करते हैं उनसे मेरा कोई लेना-देना नहीं है, क्योंकि मैंने कभी नहीं देखा कि उनके कार्य अच्छे इरादे के साथ किए गए हों और ऐसा तो बहुत ही कम हुआ जब मैंने उन्हें अपनी वेदी के ऊपर कुछ रखते हुए देखा हो। इन अनेक वर्षों में मेरे सामने उनके कार्य ऐसे ही हैं।

प्रारम्भ में मैं तुम लोगों को और अधिक सच्चाई प्रदान करना चाहता था, लेकिन चूंकि सत्य के प्रति तुम्हारी मनोवृत्ति इतनी नीरस और उदासीन है कि मुझे पीछे हटना पड़ा है। मैं नहीं चाहता कि मेरी कोशिशें व्यर्थ जाएँ, न ही मैं यह देखना चाहता हूँ कि लोग मेरे वचनों को थामे रहें और फिर हर जगह वह करें जिससे मेरा विरोध होता हो, मुझे कलंकित करता हो और मेरी निन्दा करता हो। मैं इंसानों की परख के तौर पर तुम्हें वचनों का एक छोटा-सा भाग ही प्रदान करता हूँ जो तुम्हारे लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। ऐसा अब तक नहीं हुआ है कि मैं सचमुच में इस बात की पुष्टि करुं कि जो निर्णय और योजनाएँ मैंने बनाई हैं वे तुम्हारी जरूरतों के अनुसार हैं, और इसके अतिरिक्त, यह प्रमाणित करुं कि मानवजाति के प्रति मेरी मनोवृत्ति सही है। मेरे सामने तुम्हारे इतने वर्षों के काम ने मुझे वह उत्तर दे दिया जो मुझे मैंने पहले कभी नहीं मिला था। और इस उत्तर से यह प्रश्न सामने आता हैः "सच्चाई और सच्चे परमेश्वर के सामने मनुष्य की मनोवृत्ति क्या है?" जो प्रयास मैंने मनुष्य में प्रवाहित किया है मेरे मनुष्य से मेरे प्रेम के सार-तत्व को साबित करता है, और मेरे सामने मनुष्य के कार्यों ने सत्य से घृणा करने और मेरा विरोध करने के इंसान के मुख्य सार-तत्व को भी प्रमाणित कर दिया है। मैं हर समय उन सबके लिए चिंतित रहता हूँ जिन्होंने मेरा अनुसरण किया है, फिर भी ऐसा कोई समय नहीं होता है जब मेरा अनुसरण करने वाले मेरे वचनों को ग्रहण करने में समर्थ होते हों; वे मेरे किसी भी सुझाव को जो मुझसे आता है, स्वीकार करने में पूरी तरह असमर्थ हैं। यही वह बात है जो मुझे सबसे ज़्यादा उदास करती है। कोई भी मुझे समझने में समर्थ नहीं है, इसके अतिरिक्त, कोई भी मुझे ग्रहण करने में सक्षम नहीं है, भले ही मेरी मनोवृत्ति निष्कपट और मेरे वचन सौम्य हैं।सभी अपने मूल इरादों के अनुसार मेरे द्वारा सौंपे गए कार्य को कर रहे हैं; वे मेरे विचारों को नहीं खोजते हैं और मेरी अपेक्षाओं की खोज तो बहुत ही कम करते हैं। वे अभी भी दावा करते हैं कि वफादारी के साथ मेरी सेवा करते हैं, जबकि पूरे समय मुझसे विद्रोह करते रहते हैं। बहुत से लोग यह विश्वास करते हैं कि वे सच्चाइयां जो उन्हें स्वीकार्य नहीं हैं या जिन्हें वे व्यवहारमें नहीं ला सकते हैं वे सत्य ही नहीं हैं। ऐसे मनुष्यों के लिए, मेरी सच्चाइयां नकारने और दरकिनार करने के लिये हैं तब उसी समय, मैं वह बन जाता हूँ जिसे मनुष्य एकमात्र परमेश्वर के रूप में अपने शब्दों में स्वीकार करता है, परन्तु साथ ही मुझे एक ऐसे परदेशी के रूप में मानता है जो सत्य, मार्ग और जीवन नहीं है। कोई इस सत्य को नहीं जानता हैः मेरे वचन सदा-सर्वदा न बदलने वाली सच्चाइयां हैं। मैं मनुष्य के लिए जीवन की आपूर्ति हूँ और मानवजाति के लिए एकमात्र मार्गदर्शक हूँ। मेरे वचनों की कीमत और उसका अर्थ इसके द्वारा निर्धारित नहीं होता है कि उन्हें मानवजाति के द्वारा पहचाना और स्वीकारा गया है कि नहीं, परन्तु यह स्वयं वचनों के सार-तत्व के द्वारा होता है। भले ही इस पृथ्वी पर एक भी ऐसा इंसान मेरे वचनों को ग्रहण न कर पाए, फिर भी मेरे वचन का मूल्य और मानवजाति के प्रति उसकी सहायता का मूल्यांकन किसी मनुष्य के द्वारा नहीं किया जा सकता है। इसलिए जब बहुत सारे लोगों का सामना मेरे वचनों से होता है जो विद्रोह करते हैं, उनका खण्डन करते हैं, या उनसे पूरी तरह घृणा करते हैं, तो उन सब के प्रति मेरा रवैया यह हैः समय और तथ्यों को मेरी गवाही देने दो और यह दिखाने दो कि मेरे वचन सत्य, मार्ग और जीवन हैं। उन्हें यह दिखाने दो कि जो कुछ मैंने कहा है वह सही है, और वह ऐसा है जिसकी आपूर्ति लोगों को की जानी चाहिए, और इसके अतिरिक्त, जिसे मनुष्य को स्वीकार करना चाहिए। मैं उन सबको जो मेरा अनुसरण करते हैं, यह तथ्य ज्ञात करवाऊँगाः जो लोग पूरी तरह से मेरे वचनों को स्वीकार नहीं कर सकते, जो मेरे वचनों को अभ्यास में नहीं ला सकते, और जो मेरे वचनों के कारण उद्धार प्राप्त नहीं कर पाते, वे हैं जो मेरे वचनों के कारण निंदित हुए हैं और इसके अलावा, जिन्होंने मेरे उद्धार को खो दिया है, मेरी लाठी उन पर से कभी नहीं हटेगी।

16 अप्रैल 2003