356 परमेश्वर के हृदय को कौन समझ सकता है?

1

धरती पर ईश्वर हमेशा ख़ामोश है।

चाहे मानव कितना भी बेरहम हो,

ईश्वर कुछ भी दिल पर नहीं लेता है,

पूरा करता है कार्य जो परमपिता ने है दिया।

किसने पहचानी ईश्वर की सुन्दरता?

किसे है परवाह परमेश्वर पिता के बोझ की उसके पुत्र से ज़्यादा?

कौन जानता है पिता की इच्छा को?

ओ मानव! कब तुम सब ईश्वर के दिल की परवाह करोगे,

या समझोगे कि ईश्वर क्या चाहता है?

जब ईश्वर आता है ज़मीं पर, वो मानव के कष्टों को झेलता है।

पर ईश्वर खुद निर्दोष है, क्यों उसे मानव की तरह दर्द झेलना पड़ता है?

कौन ईश्वर का दिल समझता है? वो मानव को इतना देता है।

उसके दिल का कैसे मानव प्रतिदान देगा?

उसके दिल का कैसे मानव प्रतिदान देगा?

2

ईश्वर का आत्मा स्वर्ग में अशांत है।

धरती पर पुत्र करता है प्रार्थना निरन्तर

परमपिता की इच्छा के लिए, उसका दिल बेहद बेचैन रहता है।

बेटे के लिए परमपिता का प्रेम कौन जानता है,

कितना याद करता है पुत्र परमपिता को?

स्वर्ग और धरती के बीच बँटा, आत्मा से जुड़े, वे निहारते एक-दूजे को।

3

पिता और पुत्र एक दूजे पर सदा निर्भर हैं।

फिर वे क्यों अलग हुए, एक स्वर्ग में और एक ज़मीं पर?

पिता पुत्र से, और पुत्र पिता से प्रेम करता है।

क्यों उसे व्यग्रता से प्रतीक्षा करनी चाहिए?

कई दिनों तक परमपिता तड़पा है,

हालांकि वे बहुत दिनों से जुदा नहीं हैं,

वो करता है इंतज़ार अपने पुत्र के लौटने का।

4

वो ख़ामोशी से बैठा देखता है, अपने पुत्र के लौटने की राह।

कब वो फिर से मिलेगा अपने पुत्र से जो ज़मीं पर भटकता है?

जब वे दोबारा साथ होंगे, तो ये होगा सदा के लिए।

पर वो कैसे हज़ारों दिन और रात

सह सकता है जब हो एक स्वर्ग में और एक ज़मीं पर?

जब ईश्वर आता है ज़मीं पर, वो मानव के कष्टों को झेलता है।

पर ईश्वर खुद निर्दोष है, क्यों उसे मानव की तरह दर्द झेलना पड़ता है?

कौन ईश्वर का दिल समझता है? वो मानव को इतना देता है।

उसके दिल का कैसे मानव प्रतिदान देगा?

उसके दिल का कैसे मानव प्रतिदान देगा?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (4)' से रूपांतरित

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