357 कोई नहीं समझता परमेश्वर की इच्छा

I

तुम लोगों के बीच परमेश्वर अपना कार्य करता रहा है।

लेकिन उसके दशमांश का नामोनिशान कहाँ है?

परम विश्वासी जो दसवाँ हिस्सा देते हैं,

दुष्ट उसे छीन लेते हैं।

क्या दूर नहीं हो गये तुम सब परमेश्वर से?

क्या खिलाफ नहीं हो गये तुम सब परमेश्वर के?

उन बुरे कर्मों को जो तुमने किये

कैसे मान सकता है परमेश्वर उन्हें प्रिय?

परमेश्वर ने निस्वार्थ तुम सबको दान दिए,

ताकि हो अगर पीड़ा में, तब भी पाओ,

सब कुछ जो लाया वो स्वर्ग से तुम लोगों के लिए।

फिर भी तुम उसे कुछ भी नहीं अर्पित करते हो।

अगर थोड़ा अर्पित किया भी तुम लोगों ने तो,

बाद में उसका हिसाब परमेश्वर से करते हो।

दिया क्या है तुमने, बस रेत का एक कण,

माँगते हो बदले में क्या, सोने का एक टन।

क्या तुम्हारा योगदान शून्य बराबर नहीं?

क्या तुम्हारी माँग अनुचित नहीं?


II

परमेश्वर का कार्य वास्तव में है किसके लिए?

क्या सिर्फ तुम सबको मार गिराने के लिए,

ताकि परमेश्वर का अधिकार प्रकट हो सके?

क्या तुम सबका जीवन, परमेश्वर के कहे एक वचन पर टिका नहीं है?

क्यों तुम्हें परमेश्वर वचनों से बस सिखाता है?

वचनों को तथ्यों में बदल क्यों नहीं तुम सबको मार गिराता है?

क्या परमेश्वर के वचन, कार्य हैं बस इन्सान को मारने के लिए?

क्या कभी वो मासूमों को यों ही मार डालता है?

कितने हैं तुममें से जो उसके सामने, सच्ची राह तलाशते हुए,

अपने पूर्ण सर्वस्व के साथ आते हैं?

तुम सबका शरीर ही है परमेश्वर के सामने,

लेकिन दिल दूर कहीं घूमता रहता है।

चूँकि तुम नहीं जानते परमेश्वर का कार्य क्या है,

तुममें से कई दूर चले जाना चाहते हैं उससे,

और चाहते हैं स्वर्ग में जीवन बिना न्याय के।

क्या यही नहीं जो इन्सान का दिल नहीं चाहता है?

परमेश्वर नहीं तुम पर कोई ज़ोर डालेगा।

जो चुनोगे वही रास्ता तुम्हारा होगा।

आज की राह में है श्राप भी और न्याय भी,

लेकिन ये जान लो परमेश्वर देता तुम्हें जो भी,

हो चाहे ताड़ना या न्याय ही,

है वो जिसकी सबसे अधिक ज़रूरत है, और है वही सर्वोत्तम भी।


"वचन देह में प्रकट होता है" से

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