558 स्वयं को परमेश्वर के वचनों के अनुसार समझें

1 लोगों का स्वयं की प्रकृतियों का ज्ञान बहुत सतही है, न्याय और प्रकटन के परमेश्वर के वचनों से बहुत दूर तक हटा हुआ है। लोगों को स्वयं की मौलिक या सारभूत समझ नहीं है, इसके बजाय, वे अपनी ऊर्जा को अपने कार्यों और बाहरी अभिव्यक्तियों पर केंद्रित और समर्पित करते हैं। भले ही किसी ने कभी कभार स्वयं को समझने के बारे में कुछ कहा हो, यह बहुत अधिक गहरा नहीं होगा। किसी ने कभी भी नहीं सोचा है कि इस प्रकार की चीज़ के होने के कारण या कुछ प्रकट करने के कारण वह इस तरह का व्यक्ति है या उसकी इस प्रकार की प्रकृति है। परमेश्वर ने मनुष्य की प्रकृति और सार को प्रकट किया है, परंतु मनुष्य समझते हैं कि उनका चीज़ों को करने का तरीका और बोलने का तरीका दोषपूर्ण और ख़राब है; इसलिए लोगों के लिए सत्य को अभ्यास में लाना बहुत श्रमसाध्य कार्य होता है।

2 लोग सोचते हैं कि उनकी गलतियाँ बस क्षणिक अभिव्यक्तियाँ हैं, जो उनकी प्रकृति के प्रकटन होने की बजाय लापरवाही से प्रकट हो जाती हैं। जो लोग स्वयं को इस तरह से समझते हैं वे सत्य को अभ्यास में लाने में सक्षम नहीं होते हैं, क्योंकि वे सत्य को सत्य की तरह स्वीकार नहीं कर पाते हैं और सत्य के प्यासे नहीं होते हैं; इसलिए, सत्य को अभ्यास में लाते समय, वे केवल लापरवाही से नियमों का पालन करते हैं। लोग अपनी स्वयं की प्रकृतियों को अत्यधिक भ्रष्ट के रूप नहीं देखते हैं, और मानते हैं कि वे इतने बुरे नहीं है कि उन्हें नष्ट या दंडित किया जाना चाहिए। उन्हें लगता है कि कभी-कभी झूठ बोलना कोई बड़ी बात नहीं है, और वे स्वयं को अतीत की अपेक्षा बहुत बेहतर मानते हैं; हालाँकि, वास्तव में, मानकों के अनुसार, इसमें एक बड़ा अंतर है, क्योंकि लोगों के केवल कुछ कृत्य होते हैं जो बाहर से सत्य का उल्लंघन नहीं करते हैं, जब वे सत्य को वास्तव में अभ्यास में नहीं ला रहे होते हैं।

— "मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "अपनी प्रकृति को समझना और सत्य को व्यवहार में शामिल करना" से रूपांतरित

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