558 परमेश्वर के वचनों के अनुसार स्वयं को समझो

1

इंसान अपनी प्रकृति अच्छे से जानता नहीं,

जो न्याय और प्रकाशन के ईश-वचनों से बहुत दूर है।

गहरी और सारभूत नहीं है। बाहरी कामों पर ध्यान वो देता है।

वो कहे वो जाने खुद को, तो भी, ये ज्ञान गहरा नहीं।

लोगों ने न सोचा कि वे ऐसे ही हैं, कि यही उनकी प्रकृति है,

क्योंकि उन्होंने ऐसा काम किया या कुछ प्रकट किया।

परमेश्वर ने इंसान की प्रकृति प्रकट की,

लेकिन लोग जानें कि वास्तव में गलत है

उनके काम करने और बोलने का तरीका,

इसलिए उन्हें सत्य का अभ्यास कठिन लगे।

2

लोगों को लगे कि उनकी गलतियाँ

हैं कुछ पलों की लापरवाह अभिव्यक्तियाँ, वे उनकी प्रकृति का सच नहीं।

जो अपनी प्रकृति को ऐसे देखते वो सत्य का अभ्यास नहीं कर सकते,

क्योंकि उनमें सत्य की प्यास नहीं, न वे सत्य को सत्य मानते हैं।

लापरवाही से बस नियम का पालन करते।

लोगों ने न सोचा कि वे ऐसे ही हैं, कि यही उनकी प्रकृति है,

क्योंकि उन्होंने ऐसा काम किया या कुछ प्रकट किया।

परमेश्वर ने इंसान की प्रकृति प्रकट की,

लेकिन लोग जानें कि वास्तव में गलत है

उनके काम करने और बोलने का तरीका,

इसलिए उन्हें सत्य का अभ्यास कठिन लगे।

3

लोगों को अपनी प्रकृति बहुत भ्रष्ट नहीं लगती,

वे खुद को इतना बुरा नहीं मानते कि हों काबिल सज़ा पाने या तबाही के,

उन्हें लगे कि कभी-कभी झूठ बोलना ठीक है,

कि वे पहले से ज़्यादा बेहतर हैं। लेकिन वे तो मानकों के पास भी नहीं हैं।

सत्य को अभ्यास में न लाने से,

लोगों के कुछ ही काम ऐसे हैं जो सत्य का विरोध न करें।

परमेश्वर ने इंसान की प्रकृति प्रकट की,

लेकिन लोग जानें कि वास्तव में गलत है

उनके काम करने और बोलने का तरीका,

इसलिए उन्हें सत्य का अभ्यास कठिन लगे।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपनी प्रकृति को समझना और सत्य को व्यवहार में लाना' से रूपांतरित

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