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परीक्षण माँग करते हैं आस्था की

I

इम्तहानों के वक्त कमज़ोर हो सकता है इन्सान,

आ सकते हैं मन में उसके गलत ख़्याल।

परमेश्वर की इच्छा को लेकर हो सकता है स्पष्टता का अभाव उसमें,

या कौन-सा मार्ग बेहतरीन है अमल वो जिस पर करे।

मगर अय्यूब की तरह होनी चाहिये परमेश्वर के कार्य में आस्था तुम्हारी,

कमज़ोर था वो, कोसा अपने जन्म के दिन को उसने,

मगर नकारा नहीं उसने कि देता है सबकुछ परमेश्वर,

कि ले भी लेता है सबकुछ परमेश्वर।

सहते हो जो भी शोधन परमेश्वर के वचनों से तुम,

आस्था तुम्हारी पूर्ण करता है परमेश्वर।

इसे छू न पाओ जब तुम, इसे देख न पाओ जब तुम,

तब चाहिये आस्था तुम्हारी। तब चाहिये आस्था तुम्हारी।

II

जब दिखे न कोई चीज़ तब आस्था चाहिये,

जब खुली आँखों से छिपी हो ये,

जब छोड़ न पाओ तुम धारणाएं अपनी,

जब स्पष्ट न हो तुम परमेश्वर के काम पर, तब तुम में आस्था हो,

और तब मजबूत रहकर तुम गवाही दो।

अय्यूब जब पहुँचा इस मुकाम पर,

तब परमेश्वर ने उससे बात की उसे दर्शन देकर।

आस्था ही कराती है परमेश्वर के दर्शन तुम्हें,

आस्था ही कराती है पूर्ण परमेश्वर से तुम्हें।

सहते हो जो भी शोधन परमेश्वर के वचनों से तुम,

आस्था तुम्हारी पूर्ण करता है परमेश्वर।

इसे छू न पाओ जब तुम, इसे देख न पाओ जब तुम,

तब चाहिये आस्था तुम्हारी। तब चाहिये आस्था तुम्हारी।

"वचन देह में प्रकट होता है" से

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