वचन देह में प्रकट होता है

विषय-वस्तु

मानव जाति के प्रबंधन का उद्देश्य

यदि लोग वास्तव में मानव जीवन के सही मार्ग को और साथ ही परमेश्वर के मानव जाति के प्रबंधन के उद्देश्य को पूरी तरह से समझ सकते हैं, तो वे अपने व्यक्तिगत भविष्य और भाग्य को अपने दिल में एक खजाने के रूप में थामे नहीं रहेंगे। वे अब और अपने माता-पिता की सेवा करना नहीं चाहेंगे, जो सूअरों और कुत्तों से भी बदतर हैं। क्या मनुष्य के भविष्य और भाग्य ठीक वर्तमान समय के पतरस के तथाकथित "माता-पिता" नहीं हैं? वे मनुष्य के अपने मांस और रक्त की तरह हैं। क्या देह का गंतव्य, उसका भविष्य, जीवित रहते हुए परमेश्वर का दर्शन करना होगा, या मौत के बाद परमेश्वर से आत्मा के मिल पाने की खातिर होगा? क्या कल देह का अंत विपत्तियों की तरह भयावह भट्ठी में होगा, या यह आग की जलन में होगा? क्या इस तरह के प्रश्न जो इससे सम्बंधित हैं कि क्या मनुष्य का देह दुर्भाग्य को या पीड़ा को सहन कर पाएगा, सबसे बड़ी खबर नहीं जिससे अभी इस धारा में रहा कोई भी जो एक दिमाग रखता है और जो अपनी सही मनःस्थिति में है, सबसे ज्यादा चिंतित है? (यहाँ, पीड़ा को सहन करने का मतलब आशीर्वाद पाने से है, पीड़ा का अर्थ है कि भविष्य के परीक्षण मनुष्य के गंतव्य के लिए लाभदायक होते हैं। दुर्भाग्य का मतलब है दृढ़ता से खड़ा नहीं रह पाना या धोखा खाना; या इसका मतलब है कि कोई घोर आपदाओं के बीच दुर्भाग्यपूर्ण संकटों से टकराता है और उसके जीवन का संरक्षित रहना मुश्किल है, और यह कि आत्मा के लिए कोई उपयुक्त गंतव्य नहीं है)। मनुष्य ठोस विवेक से लैस हैं, लेकिन संभवतः वे जो सोचते हैं वह उससे पूरी तरह मेल नहीं खाता जिससे उनका विवेक सुसज्जित होना चाहिए। इसका कारण यह है कि वे अपेक्षाकृत अनजान हैं और आँख बंद करके चीजों का अनुसरण करते हैं। उन सभी को इसकी पूरी तरह से समझ होनी चाहिए कि वे किस में प्रवेश करें, और उन्हें विशेष रूप से तय करना चाहिए कि विपत्ति के दौरान किस में प्रवेश करें (यानी, भट्ठी में शुद्धिकरण के दौरान), और उन्हें आग के परीक्षण में किस-किस से लैस होना चाहिए। हमेशा अपने माता-पिता (अर्थात देह) की, जो सूअरों और कुत्तों की तरह हैं और चींटियों और कीड़ों से भी बदतर हैं, सेवा न करो। इस पर दुखी होने का, इतनी चिंता करने और अपने दिमागों को परेशान करने का, क्या मतलब है? यह देह तेरा अपना नहीं है, बल्कि वह परमेश्वर के हाथों में है जो न केवल तुझे नियंत्रित करता है बल्कि शैतान को भी आज्ञा देता है (मूलतः इसका मतलब यह था कि यह देह शैतान का था। क्योंकि शैतान भी परमेश्वर के हाथों में है, यह केवल उसी तरह कहा जा सकता है। क्योंकि यह इस तरह कहने में अधिक प्रेरक है—यह बताता है कि मानव पूरी तरह से शैतान के अधिकार क्षेत्र में नहीं, बल्कि परमेश्वर के हाथों में हैं।) तू देह के उत्पीड़न तले जी रहा है, लेकिन क्या देह तेरा है? क्या यह तेरे नियंत्रण में है? इस पर परेशान होकर क्यों अपने दिमाग ख़राब करें? क्यों पागलों की तरह परेशान हों परमेश्वर से आग्रह करने में, अपने उस बदबूदार देह के लिए आसक्त होकर, जो लंबे समय से निन्दित और शापित है, साथ ही अशुद्ध आत्माओं द्वारा मलिन किया गया है? क्यों परेशान हों हमेशा अपने दिल के करीब शैतान के सहयोगियों को थाम कर? क्या तुझे चिंता नहीं है कि देह तेरे वास्तविक भविष्य को, अद्भुत आशाओं को और तेरे जीवन के सही गंतव्य को बर्बाद कर सकता है?

आज के मार्ग पर चलना आसान नहीं है। कोई कह सकता है कि इसे पाना कठिन है और यह युग-युगों के दौरान बहुत ही दुर्लभ है। फिर भी, किसने सोचा होगा कि मनुष्य का देह अकेले ही उसे तुरंत नष्ट करने के लिए पर्याप्त है? आज का कार्य निश्चित रूप से वसंत की बारिश की तरह कीमती है और मनुष्य की ओर परमेश्वर की दया की तरह मूल्यवान है। फिर भी, अगर मनुष्य आज अपने काम के उद्देश्य को नहीं जानता है या मानव जाति के तत्व को नहीं समझता है, तो इसके कीमती और अमूल्य होने की बात भी कैसे की जा सकती है? देह मनुष्यों के अपने नहीं हैं, इसलिए कोई भी स्पष्ट रूप से यह नहीं देख सकता है कि इसका गंतव्य वास्तव में कहाँ होगा। फिर भी, तुझए यह जानना चाहिए कि सृष्टि का प्रभु मानव जाति को, जिसे बनाया गया था, उसकी मूल स्थिति में वापस लौटाएगा, और उसकी रचना के समय की उसकी मूल छवि को पुनर्स्थापित कर देगा। वह पूरी तरह से उस साँस को वापस ले लेगा जो साँस उसने मनुष्य में ली थी, और उसके हाड़-मांस को वापस ले सब कुछ सृष्टि के स्वामी को लौटा देगा। वह पूरी तरह से मानवता को परिवर्तित और नवीकृत करेगा, और मनुष्य से उस पूरी विरासत को वापस ले लेगा, जो मूल रूप से मानव जाति की थी ही नहीं, बल्कि परमेश्वर की थी। वह अब और इसे मानव जाति को नहीं सौंपेगा। क्योंकि उनमें से कुछ भी मूल रूप से मानव जाति का नहीं था। वह वो सब कुछ वापस ले लेगा—यह अन्यायपूर्ण लूट नहीं है, बल्कि स्वर्ग और पृथ्वी को उनकी मूल अवस्था में पुनर्स्थापित करने के लिए है, और मनुष्य को परिवर्तित और नवीकृत करने के लिए है। यह मनुष्य के लिए उचित गंतव्य है, हालांकि शायद यह देह को ताड़ना देने के बाद इसे वापस ले लेना नहीं जिस तरह कि लोग कल्पना करते हैं। परमेश्वर देह के विनाश के बाद उसके कंकालों को नहीं, बल्कि मनुष्य के मूल तत्व को जो शुरुआत में परमेश्वर के ही थे, चाहता है। इसलिए, वे मानवता को नष्ट नहीं करेगा, न ही मनुष्यों के देह को पूरी तरह खत्म करेगा, क्योंकि मनुष्य का देह कोई निजी संपत्ति नहीं है जो मनुष्य की अपनी हो। बल्कि, यह अनुलग्न है परमेश्वर का जो मानव जाति का प्रबंधन करता है। वह अपने "आनंद" के लिए मनुष्य का देह कैसे नष्ट कर सकता है? इस समय, क्या तूने सचमुच अपने उस देह की सब चीज़ों को त्याग दिया है जो एक सिक्के का भी नहीं है? यदि तू आखिरी दिनों के तीस प्रतिशत कार्य को समझ सकता है (केवल तीस प्रतिशत, अर्थात्, आज पवित्र आत्मा के काम को समझना, साथ ही वचन के कार्य को समझना जो परमेश्वर अंतिम दिनों में करता है), तो तू अपने उस देह की "सेवा" करना जो कई वर्षों से भ्रष्ट हो गया है या उसके साथ "संतानोचित" व्यवहार करना जारी नहीं रखेगा जैसा कि आज करता है। तुझे अच्छी तरह समझना चाहिए कि मनुष्य अब एक अभूतपूर्व स्थिति में आगे बढ़ चुके हैं और अब इतिहास के पहियों की तरह प्रगति करना जारी नहीं रखेंगे। तेरा फफूंदी लगा हुआ देह मक्खियों से लंबे समय से आच्छादित है, तो कैसे इसमें इतिहास के उन पहियों को उलटाने की शक्ति हो सकती है जिन्हें परमेश्वर ने आज तक कायम रहने में समर्थ बनाया है? कैसे यह देह आखिरी दिनों की घड़ी को जो एक मूक की तरह है, दोबारा चालू कर सकता है और उसकी सुइयों का घड़ी की दिशा में आगे बढ़ना जारी रख सकता है? घने कोहरे में डूबी-सी दुनिया को कैसे यह पुनः परिवर्तित कर सकता है? क्या तेरा शरीर पहाड़ों और नदियों को फिर से जीवित कर सकता है? क्या तेरा देह, जिसका काम छोटा-सा ही है, वास्तव में मानव की वैसी दुनिया को बहाल कर सकता है जिसकी तूने उत्कंठा की है? क्या तू वास्तव में अपने वंशजों को "मानव" बनने के लिए शिक्षित कर सकता है? क्या तुझे अब समझ में आया? वास्तव में तेरा देह किसके लिए है? मानव में कार्य करने का, उसे परिपूर्ण करने का और परिवर्तित करने का परमेश्वर का मूल इरादा तुझे एक खूबसूरत मातृभूमि देना या मनुष्य के देह को शांतिपूर्ण आराम प्रदान करना नहीं था। इसके बजाय, यह उनकी महिमा और उनकी गवाही के लिए था, भविष्य में मानव जाति के बेहतर आनंद के लिए, और इसलिए कि वह शीघ्र ही आराम का आनंद ले सके। फिर भी, यह तेरे शरीर के लिए नहीं है, क्योंकि मनुष्य परमेश्वर के प्रबंधन की पूँजी है और मनुष्य का देह एक सहायक मात्र है। (एक मानव आत्मा और शरीर दोनों का पिंड है, जबकि देह केवल एक विकारशील वस्तु है। इसका मतलब है कि प्रबंधन योजना के लिए देह एक उपकरण है)। तुझे यह जानना चाहिए कि मनुष्यों को पूर्ण बनाने का, मनुष्यों को पूरा करने और मनुष्यों को जीतने का परिणाम हुआ है केवल तलवारें और उनके देह के लिए मार-काट, और साथ आई हैं अंतहीन पीड़ा, आग की जलन, निर्दयी न्याय, ताड़ना और अभिशाप, साथ ही असीम परीक्षण भी। ऐसी है अन्दर की कहानी और सच्चाई मानव के प्रबंधन के कार्य की। फिर भी, इन सब बातों का उद्देश्य मनुष्य के देह के विरोध में है, और शत्रुता के भालों की सभी नोकें निर्दयता से मनुष्य के देह के प्रति निर्देशित हैं (क्योंकि मनुष्य मूल रूप से निर्दोष था)। ये सब उसकी महिमा और गवाही के लिए और उसके प्रबंधन के लिए हैं। इसका कारण यह है कि उसका कार्य पूरी तरह से केवल मानव जाति के लिए ही नहीं है, बल्कि यह पूरी योजना के लिए है और मानव जाति को बनाते समय उसकी जो मूल इच्छा थी, उसे पूरा करने के लिए है। इसलिए, शायद नब्बे प्रतिशत लोग जिन्हें अनुभव करते हैं, वे हैं पीड़ाएँ और अग्नि-परीक्षाएँ, लेकिन वो मीठे और खुशहाल दिन बहुत कम या बिलकुल नहीं हैं जिसके लिए मनुष्य के देह तड़पते हैं, और परमेश्वर के साथ खूबसूरत शामों को बिताकर उनके खुशहाल पलों का देह में आनंद लेने के लिए वे और भी अधिक असमर्थ हैं। देह भ्रष्ट है, इसलिए मनुष्य का देह जो देखता है या जिसका भोग करता है, वह परमेश्वर की ताड़ना के अलावा और कुछ नहीं जो मनुष्य को पसंद नहीं है, और यह ऐसा है मानो इसमें साधारण विवेक-बुद्धि की कमी हो। इसका कारण यह है कि वह अपने धर्मी स्वभाव को प्रकट करेगा जो मनुष्य को प्रिय नहीं है, जो मनुष्य के अपराधों को बर्दाश्त नहीं करता है, और दुश्मनों से घृणा करता है। परमेश्वर अपने स्वभाव को पूरी तरह प्रकाशित करता है चाहे जिस किसी माध्यम की आवश्यकता पड़े, इस तरह शैतान के साथ उसके छह हजार वर्षों के युद्ध के कार्य को समाप्त करते हुए—वह कार्य जो समग्र मानव-जाति की मुक्ति और पुराने शैतान के विनाश का है!