594 परमेश्वर उनका तिरस्कार करेगा जो अपने कर्तव्यों में चूक जाते हैं

1 मैंने मनुष्यों के संसार की ऊँच-नीच का अनुभव करते हुए, पर्वत-शृंखलायें और नदियों की घाटियाँ लाँघी है। मैं उनके बीच भटका हूँ और मैं उनके बीच कई वर्षों तक रहा हूँ, फिर भी ऐसा प्रतीत होता है कि मानवजाति का स्वभाव थोड़ा-सा ही बदला है। और यह ऐसा है मानो मनुष्य की पुरानी प्रकृति ने जड़ पकड़ ली हो और उसमें अंकुर आ गए हों। वे अपने पुराने स्वभाव को बदलने में कभी भी समर्थ नहीं रहे हैं, वे केवल उसकी मूल नींव पर थोड़ा-सा सुधार कर पाए हैं। जैसा कि लोग कहते हैं, सार नहीं बदला है, किन्तु रूप बहुत बदल गया है। लोग मुझे मूर्ख बनाने का प्रयास करते हुए प्रतीत होते हैं, ताकि वे इसका झाँसा देकर मेरी सराहना पा सकें।

2 चूँकि सभी मनुष्य, बेकार और अभागे हैं, जो स्वयं से प्रेम नहीं करते हैं, और जो स्वयं को बिलकुल भी संजोकर नहीं रखते हैं, तो फिर नए सिरे से दया और प्रेम प्रदर्शित करने के लिए उन्हें मेरी आवश्यकता भी क्यों होगी? बिना अपवाद के, मनुष्य स्वयं को नहीं जानते हैं, और ना ही अपने महत्व को समझते हैं। उन्हें अपने आप को तराजू में रखकर तौलना चाहिए। क्या यह तुम लोगों का, मेरे लोगों का वर्णन नहीं करता है? तुममें से किसने मेरे सम्मुख संकल्प लेकर उन्हें बाद में छोड़ा नहीं है? किसने बार-बार चीज़ों पर ध्यान देने के बजाय मेरे सामने दीर्घकालिक संकल्प लिए हैं? हमेशा, मनुष्य अपने सहूलियत के समय में मेरे सम्मुख संकल्प करते हैं और विपत्ति के समय उन्हें छोड़ देते हैं; बाद में वे अपना संकल्प दोबारा उठा लेते हैं और मेरे सम्मुख स्थापित कर देते हैं।

3 क्या मैं इतना अनादरणीय हूँ कि मनुष्य द्वारा कूड़े के ढेर से उठाये गए इस कचरे को यूँ ही स्वीकार कर लूँगा? कुछ मनुष्य अपने संकल्पों पर अडिग रहते हैं, कुछ पवित्र होते हैं और कुछ अपने बलिदान के रूप में मुझे अपनी सबसे बहुमूल्य चीज़ें अर्पित करते हैं। क्या तुम सभी लोग इसी तरह के नहीं हो? यदि, तुम राज्य में मेरे लोगों के एक सदस्य के रूप में, अपने कर्तव्य का पालन करने में असमर्थ हो, तो तुम लोग मेरे द्वारा तिरस्कृत और अस्वीकृत कर दिए जाओगे!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन' के 'अध्याय 14' से रूपांतरित

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