555 तुम्हें सकारात्मक प्रगति की कोशिश करनी चाहिए

परमेश्वर को उम्मीद है कि लोग उसकी इच्छा समझने में सक्षम हैं, और वे साझा आदर्शों की खातिर उसे संतुष्ट करने में एक मन हो सकते हैं और राज्य के मार्ग पर एक साथ अग्रसर हो सकते हैं। अनावश्यक धारणाएँ बनाने की क्या आवश्यकता है? आज तक किसका अस्तित्व परमेश्वर की खातिर नहीं रहा है? और यह चूँकि ऐसा है तो दुःख, संताप और आह की क्या आवश्यकता है? यह किसी के लिए लाभप्रद नहीं है। लोगों का पूरा जीवन परमेश्वर के हाथों में हैं और अगर परमेश्वर के सामने लिया गया उनका संकल्प नहीं होता, तो मनुष्यों की इस खोखली दुनिया में व्यर्थ रहने के लिए कौन तैयार होता? कोई क्यों परेशानी उठाता? दुनिया में अंदर और बाहर भागते हुए, अगर वो परमेश्वर के लिए कुछ न करे, तो क्या उसका पूरा जीवन व्यर्थ नहीं चला जाएगा? यहाँ तक कि अगर परमेश्वर तुम्हारे कर्मों को उल्लेखनीय नहीं मानता, तो भी क्या तुम अपनी मौत के क्षण में आभार की एक मुस्कान नहीं दोगे? तुम्हें सकारात्मक प्रगति का पालन करना चाहिए, नकारात्मक अवनति का नहीं—क्या यह बेहतर अभ्यास नहीं है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों के रहस्य की व्याख्या' के 'अध्याय 39' से रूपांतरित

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