229 आत्म-मंथन से मिलता है मार्ग मुझे अनुसरण का

I

पूरी तरह परमेश्वर का अनुसरण करके आज तक,

जाना मैंने प्रेम है परमेश्वर।

मेरे ग़मों में, मेरी नाकामियों में,

दिलासा देते हैं मुझे परमेश्वर के वचन।

देखकर परमेश्वर के वचनों के ज़रिये ख़ुद को,

जाना मैंने गहरी है भ्रष्टता मेरी।

जड़ें गहरी हैं मेरे शैतानी स्वभाव की,

इसकी वजह से पाप में रहता हूँ मैं।


II

मग़रूर हूँ, अभिमानी हूँ, झूठा हूँ, कपटी हूँ,

इंसान के समान गुण नहीं हैं मुझमें।

अपनी मर्ज़ी से काम करता हूँ मैं,

शायद ही कभी सत्य का अभ्यास करता हूँ मैं।

उसूल नहीं हैं कोई मेरे कामों के,

मगर लगता है मुझे सत्य की हकीकत है मुझमें।

महज़ पाखण्डी हूँ मैं,

परमेश्वर की बिल्कुल नहीं मानता हूँ मैं।


III

हैसियत और शोहरत पर ही

रहता है पूरा ध्यान मेरा।

सतही है जीवन में प्रवेश मेरा।

मुझमें नहीं है वो हौसला,

जो पतरस में था

इतना शर्मिंदा हूँ कि शब्द नहीं हैं,

इतना शर्मिंदा हूँ कि शब्द नहीं हैं।


IV

इम्तहानों और मुसीबतों से हो गया साबित,

मुझमें परमेश्वर के लिये प्यार नहीं है।

मुझे परवाह है बस अपनी देह की,

मुझे परमेश्वर की ज़रा भी परवाह नहीं है।

मुझे गिरफ़्तारी की यातना का ख़ौफ़ है,

मुझे यहूदा की तरह बन जाने का ख़ौफ़ है।

मुझे मौत का ख़ौफ़ है,

अधम ज़िंदगी जी है मैंने।


V

सच्चाइयों के उजागर होने से,

अपना असली कद देखा है मैंने।

सत्य की हकीकत के बग़ैर,

यकीनन दग़ा दे दूँगा परमेश्वर को मैं।

दिल में बग़ैर परमेश्वर के प्रेम के,

ख़ुद को कैसे अर्पित करता, परमेश्वर की मानता मैं?

बरसों की आस्था मेरी सत्य के लिये नहीं,

इसका मलाल है मुझे।


VI

पीड़ाओं, यातनाओं, इम्तहानों के ज़रिये

उजागर हुए जो,

उन ख़तरनाक हालात को

अपनी नज़रों से देखता हूँ मैं।

सत्य की वास्तविकता के बग़ैर,

कैसे दे सकता हूँ मज़बूत गवाही मैं?

कैसे दे सकता हूँ मज़बूत गवाही मैं?


VII

इम्तहानों, शुद्धिकरण, व्यवहार और काट-छाँट ने,

उजागर कर दिया मुझे और मेरे कामों को।

सिद्धांतों की व्याख्या करता हूँ मैं

ख़ुद को बचाने के लिये बहाने बनाता हूँ मैं।

छल-कपट दिल में लेकर,

सचमुच कैसे ईमानदार हो सकता हूँ मैं?

विचार करता हूँ तो पाता हूँ, बरसों की आस्था के बावजूद,

ज़्यादा नहीं बदला है स्वभाव मेरा।


VIII

मूर्ख हूँ जो खोज नहीं की सत्य की,

फिर भी राज्य में प्रवेश चाहता हूँ मैं!

निष्ठावान है, धार्मिक है स्वभाव परमेश्वर का,

बिना सत्य के परमेश्वर द्वारा, बाहर कर दिया जाऊँगा मैं।

बहुत कमियाँ हैं मुझमें,

शुद्ध नहीं हुआ है भ्रष्ट स्वभाव मेरा।

बिना सत्य का अनुसरण किये,

बरसों विश्वास रखा परमेश्वर में मैंने,

यही वजह है इतना दयनीय हो गया हूँ मैं।


IX

बिना आत्म-मंथन के, कैसे जान पाता

कि पौलुस के पथ पर चल रहा हूँ मैं?

पतरस की तरह बनने का,

परमेश्वर को प्रेम करने का

परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने का संकल्प लेता हूँ मैं,

संकल्प लेता हूँ मैं।

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