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प्रश्न 7: आप लोग यह गवाही देते हैं कि प्रभु यीशु पहले ही आ चुके हैं और वे सर्वशक्तिमान परमेश्वर हैं। और यह कि उन्होंने कई सत्य व्यक्त किए हैं और वे अंतिम दिनों का न्याय का कार्य कर रहे हैं। मुझे लगता है कि यह असंभव है। हमने हमेशा यही कहा है कि परमेश्वर के वचन एवं कार्य बाइबिल में लिखे हुए हैं, और यह कि परमेश्वर के शब्द और कार्य बाइबिल के बाहर विद्यमान नहीं हैं। बाइबल में पहले से ही परमेश्वर द्वारा उद्धार की पूर्णता समाविष्ट है, बाइबिल परमेश्वर की प्रतिनिधि है। जब तक कोई व्यक्ति बाइबल का पालन करता है, तब तक वह स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करेगा। प्रभु में हमारा विश्वास बाइबल पर आधारित है, बाइबल से भटकना प्रभु को इनकार तथा उनसे विश्वासघात करने का गठन करता है! क्या इस समझ में कुछ गलत है?

उत्तर: आप लोगों अभी-अभी कहा कि परमेश्वर के सभी वचन एवं कार्य, बाइबल के अंदर समाविष्ट हैं, कि बाइबल में परमेश्वर द्वारा उद्धार के बारे में सब है, और यह कि परमेश्वर के शब्द और कार्य बाइबल के बाहर कहीं नहीं दिखेंगे। संपूर्ण धार्मिक विश्व भी यह मानता है। ऐसा लगता है कि कोई भी इस दृष्टिकोण की मान्यता वास्तव में सुनिश्चित नहीं कर सकता है। अतीत में, हम सभी मुद्दों पर बाइबल के अनुसार विचार करते थे। अब मैं पूछता हूँ: क्या धार्मिक विश्व का यह दृष्टिकोण बाइबल से मेल खाता है? क्या यह परमेश्वर के वचन के अनुरूप है? प्रभु यीशु ने बाइबल में इस प्रकार की कोई बात कभी नहीं कही। पवित्र आत्मा ने भी कभी ऐसा कुछ नहीं कहा। तो यह विचार कहाँ से आया? असल में, इस मुद्दे को समझाना इतना कठिन नहीं है। यह निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है कि धार्मिक विश्व की यह अवधारणा पूरी तरह मनुष्य के मत और उसकी कल्पना की उपज है। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? हम सभी जानते हैं, बाइबल के न्यू व ओल्ड टेस्टामेंट परमेश्वर के कार्य के दो चरणों का अभिलेख मात्र हैं। जहाँ तक व्यवस्था के युग और अनुग्रह के युग के दौरान के ईश्वर के वचनों और कार्य का प्रश्न है, क्या यहाँ कोई यह कहने का साहस कर सकता है कि बाइबल में संपूर्ण अभिलेख मौजूद है? क्या यहाँ कोई यह कहने का साहस कर सकता है कि परमेश्वर के सभी वचन व्यवस्था के युग के दौरान भविष्यद्वक्ताओं के माध्यम से प्रदान किए गए थे तथा अनुग्रह के युग के दौरान के प्रभु यीशु के सभी वचन बाइबल में अभिलिखित हैं? वस्तुतः आप सभी लोग अच्छी तरह जानते हैं कि व्यवस्था के युग के कई भविष्यद्वक्ताओं की पुस्तकें बाइबल में शामिल नहीं की गई हैं। यह बात तो सभी स्वीकार करते हैं! प्रभु यीशु के कई वचन बाइबल में अभिलिखित नहीं हैं। बाइबल में अभिलिखित प्रभु यीशु के वचन तो हिमखंड का शीर्ष मात्र हैं! मुझे युहन्ना के सुसमाचार का एक अंश याद आया है: "और कई अन्य कार्य हैं जिन्हें यीशु ने निष्पादित किया, जिसमें से अगर प्रत्येक कार्य को लिखा जाए, तो मुझे लगता है कि स्वयं संसार भी उन पुस्तकों को समाविष्ट नहीं कर पाएगा" (यूहन्ना 21:25)। बाइबल के इस अंश में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि बाइबल प्रभु यीशु के सभी वचनों एवं कार्यों का अभिलेख नहीं है। बाइबल एक अतिसीमित वृत्तांत मात्र है। आप लोग यह कैसे कह सकते हैं कि परमेश्वर के सभी वचन एवं कार्य, बाइबल में अभिलिखित हैं? क्या यह सत्य से साफ विरोधाभास नहीं है? इस अर्थ में तो, क्या आप लोग झूठे नहीं हैं? प्रभु यीशु ने कई बार यह भविष्यवाणी की थी कि वे दोबारा आएँगे। लौट कर आए प्रभु यीशु के वचन, उनके आने से पहले ही बाइबल में कैसे लिखे जा सकते थे? यह असंभव है! हमें बिल्कुल साफ होना चाहिए। बाइबल अतीत में परमेश्वर के कार्य का अभिलेख है। इसलिए ओल्ड टेस्टामेंट लिखने के कई वर्षों बाद, प्रभु यीशु आए और अनुग्रह के युग के दौरान छुटकारा दिलाने का कार्य किया। मुझे बताएँ, क्या प्रभु यीशु के वचन स्वतः बाइबल में लिखे गए? ऐसा असंभव होगा! परमेश्वर के वचनों और कार्य को पहले संकलित किया गया होगा, उसके बाद ही वे बाइबल की विषय-वस्तु बन सकते थे। अंतिम दिनों में, सर्वशक्तिमान परमेश्वर, परमेश्वर के घर से आरंभ करते हुए न्याय का कार्य करने आए हैं, और उन्होंने मानवजाति को शुद्ध करने और बचाने के लिए सभी सत्य व्यक्त किए हैं। क्या ये सत्य स्वतः बाइबल में प्रकट हो सकते थे? असंभव! सर्वशक्तिमान परमेश्वर का कलीसिया ने सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा व्यक्त सभी सत्यों का राज्य के युग की बाइबल, अर्थात्, वचन देह में प्रकट हुआ में संकलन किया। राज्य के युग की इस बाइबल में केवल परमेश्वर की अभिव्यक्तियाँ ही समाविष्ट हैं, इसके अंदर किसी भी मनुष्य के वचन नहीं हैं। आप कह सकते हैं कि वचन देह में प्रकट हुआ वह जीवन का शाश्वत तरीका है जिसे अंतिम दिनों में परमेश्वर द्वारा मनुष्य को उपहारस्वरूप दिया गया है। अतः यह विचार कि परमेश्वर के सभी वचन एवं कार्य, बाइबल में अभिलिखित हैं और परमेश्वर के शब्द और कार्य बाइबल के बाहर कहीं भी नहीं दिखेंगे त्रुटिपूर्ण, बेतुका और पूरी तरह मनुष्य के मतों और कल्पनाओं की उपज है।

हम सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों के कुछ अंश पढ़कर इस मुद्दे को और स्पष्ट कर सकते हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं: "वह सब जो बाइबिल में लिखा है वह सीमित है और परमेश्वर के सम्पूर्ण कार्य का प्रतिनिधित्व करने में असमर्थ है। सुसमाचार की चारों पुस्तकों में कुल मिलाकर एक सौ से भी कम अध्याय हैं जिनमें एक सीमित संख्या में घटनाएँ लिखी हैं, जैसे यीशु का अंजीर के वृक्ष को शाप देना, पतरस का तीन बार प्रभु का इनकार करना, यीशु का सलीब पर चढ़ने और पुनरुत्थान के बाद चेलों को दर्शन देना, उपवास के बारे में शिक्षा देना, प्रार्थना के बारे में शिक्षा देना, तलाक के बारे में शिक्षा देना, यीशु का जन्म और वंशावली, यीशु द्वारा चेलों की नियुक्ति, इत्यादि। ये बस कुछ रचनाएँ ही हैं, फिर भी मनुष्य इन्हें ख़ज़ाने के रूप में महत्व देता है, यहाँ तक कि उनके विरुद्ध आज के काम को भी सत्यापित करता है। वे यहाँ तक कि यह भी विश्वास करते हैं कि यीशु ने अपने जन्म के बाद के समय में सिर्फ इतना ही किया। यह ऐसा है मानो कि वे विश्वास करते हैं कि परमेश्वर केवल इतना ही कर सकता है, यह कि और अधिक कार्य नहीं हो सकता है। क्या यह हास्यास्पद नहीं है?" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "देहधारण का रहस्य (1)")।

"उस समय, यीशु ने अनुग्रह के युग में अपने अनुयायियों को उपदेशों की एक श्रृंखला कही, जैसे कि कैसे अभ्यास करें, कैसे एक साथ इकट्ठा हों, प्रार्थना में कैसे माँगें, दूसरों के साथ कैसे व्यवहार करें इत्यादि। जो कार्य उसने किया वह अनुग्रह के युग का था, और उन्होंने केवल यह प्रतिपादित किया कि शिष्य और वे जिन्होंने परमेश्वर का अनुसरण किया कैसे अभ्यास करें। उसने केवल अनुग्रह के युग का ही कार्य किया और अंत के दिनों का कोई कार्य नहीं किया। …प्रत्येक युग में परमेश्वर के कार्य की स्पष्ट सीमाएँ हैं; वह केवल वर्तमान युग का कार्य करता है और वह कभी भी कार्य का आगामी चरण अग्रिम में नहीं करता है। केवल इस तरह से उसका प्रत्येक युग का प्रतिनिधि कार्य सामने लाया जा सकता है। यीशु ने अंत के दिनों के केवल चिह्नों के बारे में बात की, इस बारे में बात की कि किस प्रकार से धैर्यवान बनें और कैसे बचाए जाएँ, कैसे पश्चाताप करें और स्वीकार करें, और साथ ही सलीब को कैसे सहें, और साथ ही पीड़ाओं को कैसे सहन करें; उन्होंने कभी भी नहीं कहा कि अंत के दिनों में मनुष्य को किस में प्रवेश करना चाहिए या परमेश्वर की इच्छा को किस प्रकार से संतुष्ट करें। वैसे तो, क्या अंत के दिनों के परमेश्वर के कार्य को बाइबल के अंदर खोजना भ्रान्ति का कार्य नहीं होगा? बाइबल को केवल अपने हाथों में पकड़कर तुम क्या विचार कर सकते हो? बाइबल का व्याख्याता हो या उपदेशक, आज के कार्य को कौन पहले से जान सकता है?" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "वह मनुष्य किस प्रकार परमेश्वर के प्रकटनों को प्राप्त कर सकता है जिसने उसे अपनी ही धारणाओं में परिभाषित किया है?")।

"यदि तुम व्यवस्था के युग के कार्य को देखने की इच्छा करते हो, और यह देखना चाहते हो कि इज़राइली किस प्रकार यहोवा के मार्ग का अनुसरण करते थे, तो तुम्हें पुराना विधान अवश्य पढ़ना चाहिए; यदि तुम अनुग्रह के युग के कार्य को समझना चाहते हो, तो तुम्हें नया विधान अवश्य पढ़ना चाहिए। किन्तु तुम अंतिम दिनों के कार्य को किस प्रकार देखते हो? तुम्हें आज के परमेश्वर की अगुआई को स्वीकार अवश्य करना चाहिए, और आज के कार्य में प्रवेश करना चाहिए, क्योंकि यह नया कार्य है, और किसी ने भी पूर्व में इसे बाइबल में दर्ज नहीं किया है। …आज का कार्य एक मार्ग है जिस पर मनुष्य कभी नहीं चला, और एक तरीका है जिसे किसी ने कभी नहीं देखा है। यह वह कार्य है जिसे पहले कभी नहीं किया गया है—यह पृथ्वी पर परमेश्वर का नवीनतम कार्य है। …कौन आज के कार्य के प्रत्येक अंश को, बिना किसी चूक के, पहले से ही दर्ज कर सका होगा? कौन इस अति पराक्रमी, अति बुद्धिमत्तापूर्ण कार्य को इस पुरानी घिसीपिटी पुस्तक में दर्ज कर सकता है जो परम्परा का अनादर करता है? आज का कार्य इतिहास नहीं है, और वैसे तो, यदि तुम आज के नए पथ पर चलने की इच्छा करते हो, तो तुम्हें बाइबल से दूर अवश्य जाना चाहिए, तुम्हें बाइबल की भविष्यवाणियों या इतिहास की पुस्तकों के परे अवश्य जाना चाहिए। केवल तभी तुम इस नए मार्ग पर उचित तरीके से चल पाओगे, और केवल तभी तुम एक नए राज्य और नए कार्य में प्रवेश कर पाओगे" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "बाइबल के विषय में (1)")।

आप कहती हैं कि केवल बाइबल का अनुसरण करके ही हम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश पा सकते हैं। अब मैं पूछता हूँ: क्या बाइबल में इस दृष्टिकोण के लिए कोई प्रमाण है? क्या प्रभु यीशु ने इस आशय से कभी कुछ कहा था? क्या पवित्र आत्मा ने कभी ऐसा कहा था? तो यह विचार कहाँ से आया? इस विचार के साथ एक गंभीर समस्या है! बाइबल का संकलन मनुष्यों ने किया था, परमेश्वर ने नहीं। यह देखते हुए कि इसका संकलन मनुष्यों ने किया था, यह स्वाभाविक है कि कुछ चीजें छूट गईं थी और कई त्रुटियाँ हुई थी क्योंकि मनुष्य को परमेश्वर द्वारा उद्धार एवं परिपूर्णता नहीं मिली थी, और उसके पास सत्य का अभाव था। मनुष्य यह भेद करने में असमर्थ था कि कौन-सी बात परमेश्वर से आई है और कौन-सी मनुष्य से। वे मनुष्यों के अनुभवों और उनकी गवाहियों में विचलनों को पहचानने में विशेष रूप से असमर्थ थे। इसके अतिरिक्त, सत्य एवं विवेक के अभाव में, मनुष्य ने प्रायः वह चुना जो उसे अपनी स्वयं की कल्पना एवं मत के अनुसार अच्छा लगा, और उन बातों को मिटा व समाप्त कर दिया जो परमेश्वर से आईं किंतु उसकी की स्वयं की सोच से मेल नहीं खाती थीं। इस प्रकार वह गलतियाँ करने की ओर अधिक प्रवण हो गया। तो, अपरिहार्य रूप से, मनुष्य ने बाइबिल का संकलन करते समय गलतियाँ की। यदि परमेश्वर में हमारा विश्वास एकमात्र बाइबिल पर आधारित है, तो हम इस बारे में निश्चित कैसे हो सकते हैं कि हमें बचा लिया जाएगा और हम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करेंगे? प्रभु यीशु ने यह कभी नहीं कहा कि केवल बाइबल का अनुसरण करके ही मनुष्य स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकता है। स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के संबंध में, प्रभु यीशु ने स्पष्ट रूप से कहा था: "जिन लोगों ने मुझसे कहा, हे प्रभु, हे प्रभु, उसमें से प्रत्येक स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं करेगा; परन्तु केवल वे स्वर्ग में प्रवेश करेंगे, जो मेरे पिता की इच्छा का पालन करते हैं" (मत्ती 7:21)। प्रभु यीशु ने बिल्कुल साफ-साफ यह कहा था : केवल परमपिता परमात्मा की इच्छानुसार कार्य करने वाले व्यक्ति ही स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करेंगे। जो अभी-भी इस बात पर जोर देते हैं कि केवल बाइबल का अनुसरण करने वाले व्यक्ति ही स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करेंगे, उनसे मैं पूछता हूँ: क्या बाइबल का अनुसरण करना परमपिता परमात्मा की इच्छानुसार कार्य करने के बराबर है? क्या बाइबल, पवित्र आत्मा के कार्य का स्थान ले सकती है? क्या पवित्र आत्मा के कार्य के बिना, मनुष्य केवल बाइबल का अनुसरण करके उद्धार पा सकता है? क्या केवल बाइबल पढ़ने के माध्यम से ही, मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव को स्वच्छ किया जा सकता है? क्या उसके जीवन स्वभाव को बदला जा सकता है? केवल बाइबल को समझने से, क्या मनुष्य परमेश्वर को जान सकता है? जैसा कि सभी जानते हैं, फरीसियों को बाइबिल की काफी अच्छी समझ थी। पर उन्होंने प्रभु यीशु को सूली पर क्यों चढ़ाया? जब प्रभु यीशु आए तो उन्होंने बाइबल के उन महान व्याख्याता फरीसियों को श्राप क्यों दिया? क्या बाइबल का अनुसरण करने का यह अर्थ है कि आप परमेश्वर की वाणी को पहचान सकते हैं? क्या इसका यह अर्थ है कि आपको स्वर्गारोहण कर परमेश्वर के राजसिंहासन के सामने पहुँचा दिया गया है? क्या इसका यह अर्थ है कि आप मेमने के विवाह भोज में आए हैं? क्या आप लोगों के पास इन प्रश्नों के उत्तर हैं? प्रभु ईशु ने कहा था: "धर्मग्रन्थ खोजें; क्योंकि तुम सोचते हो कि उनमें शाश्वत जीवन है: और वे वे हैं जो मेरे बारे में गवाही देते हैं। और तुम मेरे पास नहीं आओगे, कि तुम जीवन पा सको" (युहन्ना 5:39-40)। आप बाइबल को प्रभु तथा प्रभु के दूसरे आगमन के वचनों और कार्यों के स्थान पर लें। क्या यह प्रभु से विश्वासघात नहीं है? क्या आप प्रभु के सेवक हैं या बाइबल के सेवक हैं? क्या आप प्रभु की सेवा कर रहे हैं या बाइबल की? यदि आप लोग बाइबल और प्रभु के बीच के संबंध को भी नहीं समझते हैं, तो आप प्रभु को जानने की अपेक्षा कैसे कर सकते हैं? आप बाइबल की उपासना करते हैं और उस पर अंधविश्वास करते हैं।आप मानते हैं कि बाइबल के जरिए शाश्वत जीवन पाया जा सकता है, और फिर भी आप प्रभु की आज्ञा का पालन और उनकी उपासना नहीं करते हैं। क्या यह ठीक वही मार्ग नहीं है जिस पर फरीसी चले थे? क्या फरीसियों ने प्रभु के स्थान पर बाइबल की उपासना नहीं की? क्या उन्होंने प्रभु यीशुको सूली पर नहीं चढ़ाया, जिससे उन्हें प्रभु का श्राप मिला? यह सत्य है, कोई इसे नकार नहीं रहा है! फिर भी यहाँ आप लोग कहते हैं कि बाइबल का अनुसरण करने से आप लोगों को स्वर्ग के राज्य में प्रवेश मिलेगा, क्या यह बेतुकी बात नहीं है? आप लोगों ने वर्षों प्रभु में विश्वास किया है, आप लोगों ने बुज़ुर्ग और पादरी के रूप में अपनी सेवाएँ दी हैं, और फिर भी आप लोग ऐसे बेतुके विचार धारण करते हैं। आप लोग उन पाखंडी फरीसियों से अलग कैसे हैं? आप लोगों ने वर्षों प्रभु में विश्वास किया है और आप लोगों को अभी तक इस मुद्दे की वास्तविक प्रकृति का एहसास नहीं हुआ? इतने वर्षों के विश्वास के बाद, हमें प्रभु की इच्छा समझ में आ जानी चाहिए। अंतिम दिनों में प्रभु सभी संतों को स्वर्ग के राज्य में पहुँचाने के लिए दोबारा आए हैं। वे संतों को किस प्रकार स्वर्ग राज्य में पहुँचाते हैं, कोई भी निश्चित नहीं है। पर प्रभु यीशु ने कहा है, कि दूल्हे की आवाज़ सुनने वाली बुद्धिमान कुँवारियाँ प्रभु के साथ भोज में जाएँगी। इससे सिद्ध होता है कि जब प्रभु अंतिम दिनों में दोबारा आएँगे, तो ऐसे लोग जिन्होंने उनकी वाणी सुन ली है तथा जो उनके साथ भोज में गए स्वर्ग के राज्य में पहुँचा दिए जाएँगे। प्रभु की वाणी सुनने वाले सर्वाधिक धन्य हैं। अब आइए एक पल के लिए सोचते हैं, क्या बाइबल को रटकर पढ़ लेने का अर्थ हमारी प्रभु की वाणी को पहचानने की सामर्थ्य है? क्या बाइबल को रटकर पढ़ लेने का अर्थ हमारा प्रभु की वाणी को जानना है? फरीसी बाइबल में गहन रूप से प्रवीण थे और प्रायः बाइबल के अंशों की दूसरों के लिए व्याख्या करते थे, और फिर भी उन्होंने प्रभु यीशु को सूली पर चढ़ा दिया। कहाँ गलती हुई? इस प्रकार, यह स्पष्ट है कि केवल सत्य को प्रेम करने वाले और परमेश्वर की वाणी सुन सकने वाले लोग ही प्रभु का स्वागत करेंगे, और उनसे जीवन प्राप्त करेंगे। केवल उन्हें ही स्वर्ग राज्य में पहुँचाया जाएगा।

"मेरा प्रभु कौन है" फ़िल्म की स्क्रिप्ट से लिया गया अंश

पिछला:प्रश्न 6: बाइबल बाइबल है, परमेश्‍वर परमेश्‍वर हैं। मैं समझ गयी हूँ कि बाइबल परमेश्‍वर का प्रतिनिधित्व बिल्कुल नहीं कर सकती है! लेकिन बाइबल और परमेश्‍वर के बीच संबंध क्या है? मैं अभी भी यह नहीं समझ पायी हूँ। कृपया हमारे साथ कुछ और चर्चा करें!

अगला:प्रश्न 8: 2,000 वर्षों तक, धार्मिक विश्व ने इस विश्वास का समर्थन किया है कि बाइबल परमेश्वर की प्रेरणा से दी गई है, कि यह पूरी तरह परमेश्वर का वचन है, इसलिए, बाइबल प्रभु का प्रतिनिधित्व करती है। जो इस बात से इनकार करते हैं कि बाइबल परमेश्वर की प्रेरणा से दी गई है और उनका वचन है धार्मिक विश्व निश्चित रूप से उनकी निंदा करेगा एवं उन्हें विधर्मी कहेगा। क्या इस समझ में कुछ गलत है?

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