424 परमेश्वर की ओर देखना और उस पर भरोसा करना सबसे महान बुद्धिमत्ता है

1 चाहे कोई कितना भी सत्य समझता हो या उसने कितने ही कर्तव्यों को पूरा किया हो, उन कर्तव्यों को पूरा करते समय उसने कितने ही अनुभव किये हों, उसका आध्यात्मिक कद कितना ही बड़ा या छोटा हो या वो किसी भी परिवेश में हो, लेकिन अपने हर काम में परमेश्वर के प्रति श्रद्धा रखे और उस पर भरोसा किए बिना उसका काम नहीं चल सकता। यही सर्वोच्च प्रकार की बुद्धि है। किसी ने बहुत-से सत्य समझ भी लिए हों तो क्या परमेश्वर पर भरोसा किये बिना काम चल सकता है? कुछ लोगों ने, कुछ अधिक समय तक परमेश्वर में आस्था रखकर, कुछ सत्य समझ लिए हैं और वे कुछ परीक्षणों से भी गुज़रे हैं। उन्हें थोड़ा व्यावहारिक अनुभव हो सकता है, लेकिन वे नहीं जानते कि परमेश्वर पर भरोसा कैसे करना है और वे यह भी नहीं जानते कि परमेश्वर के प्रति श्रद्धा रखकर उस पर कैसे भरोसा करना है। क्या ऐसे लोगों में बुद्धि होती है? ऐसे लोग सबसे ज़्यादा मूर्ख होते हैं, और खुद को चतुर समझते हैं; वे परमेश्वर का भय नहीं मानते और बुराई से दूर नहीं रहते।

2 वचनों की शाब्दिक समझ रखने और कई आध्यात्मिक सिद्धांतों के बारे में बात कर लेने का अर्थ सत्य की समझ होना नहीं है, इसका यह अर्थ तो बिल्कुल नहीं है कि तुम्हें हर स्थिति में परमेश्वर की इच्छा की पूरी समझ है। इस तरह, यहाँ सीखने के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण सबक है : वो यह है कि लोगों को सभी बातों में परमेश्वर की ओर देखने की ज़रूरत है और ऐसा करके, लोग परमेश्वर पर भरोसा कर सकते हैं। परमेश्वर पर भरोसा रखने से ही लोगों को अनुसरण का मार्ग मिलेगा। यहाँ पर एक गंभीर समस्या है, वो यह है कि लोग अपने अनुभव और उन्होंने जो नियम समझे हैं उन पर, और कुछ मानवीय कल्पनाओं पर निर्भर रहकर बहुत से काम करते हैं। वे मुश्किल से ही सर्वोत्तम परिणाम प्राप्त कर सकते हैं, जो कि परमेश्वर की ओर देखने, उससे प्रार्थना करने, फिर परमेश्वर के कार्य और मार्गदर्शन पर भरोसा करके, परमेश्वर की इच्छा को साफ़-साफ़ समझने से प्राप्त होता है। इसलिए मैं कहता हूँ कि सबसे बड़ी बुद्धिमानी परमेश्वर की ओर देखना और सभी बातों में परमेश्वर पर भरोसा करना है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'विश्वासियों को संसार की दुष्ट प्रवृत्तियों की असलियत समझने से ही शुरुआत करनी चाहिए' से रूपांतरित

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