203 लोगों की ख़ुशामदी करने वाले एक व्यक्ति का आत्म-चिंतन

1

एक छोटी उम्र से ही मुझे एक शैतानी शिक्षा मिली, और शैतान का दर्शन मेरा पंथ था।

किसी को भी नाराज़ न करने का ध्यान रखते हुए, मैं मध्यम मार्ग पर चला करता था.

लोगों के साथ व्यवहार करते समय मेरे चेहरे पर मुस्कान रहती थी, और मेरा आचरण सदैव स्नेही होता था,

परन्तु कोई भी मेरे आंतरिक विचारों को नहीं जान पाता था।

मैं चीज़ों की असलियत जानता था, पर कभी भी उनकी बात नहीं करता था; हालाँकि मेरे होंठों पर शब्द आते थे, मैंने चुप्पी का चयन किया।

"समझदार लोग खुद की रक्षा करते हैं", दुनिया में लोगों से निपटने के लिए यही मेरा सिद्धांत बन गया था।

धार्मिकता और मेरे अपने हितों के बीच, मैं बेबस होकर अपने हितों को ही चुना करता था।

लोग मुझे "अच्छा" कहते थे, लेकिन मैं खुद को अपने दिल के अपराध बोध से मुक्त नहीं कर पाता था।


2

परमेश्वर में वर्षों से विश्वास करने के बाद, मैं अभी भी अपने स्वयं के ही जीवन-दर्शन के अनुसार अपने कर्तव्य को निभाता था।

मैंने कलीसिया के हितों को हो रहे नुकसान को देखा, लेकिन मैंने सिद्धांतों का पालन करने का साहस नहीं किया।

परमेश्वर के स्वभाव को ठेस पहुँचाते हुए, मैं खुद को बचाने के लिए दुष्टों की ढाल बना।

परमेश्वर से घृणित होकर, मैं अंधेरे में डूब गया था, जहाँ मैं पीड़ा में कराह रहा था।

परमेश्वर के न्याय का प्रत्येक वचन मेरी अंतरात्मा को प्रताड़ित करता था।

केवल उनके कठोर प्रकटन के माध्यम ही से मैंने अपने शैतानी स्वभाव को स्पष्ट रूप से देखा।

स्वार्थी और मतलबी, मैं एक पाखंडी था, जो किसी भी समय परमेश्वर को धोखा देने के लिए उद्यत रहता था।

वास्तव में, मैं शैतान की एक कठपुतली था, बिना किसी धार्मिकता के, जो खुद को और दूसरों को चोट पहुँचाता था।


3

न्याय का अनुभव करने के बाद, मैंने आखिरकार अपने सार को देख लिया: मैं लोगों का एक ख़ुशामदी था।

मैं फिसड्डी और धोखेबाज़ था, और मुझमें परमेश्वर के लिए कोई श्रद्धा नहीं थी। मैं बुराई, और परमेश्वर का प्रतिरोध, करने में सक्षम था।

इतना अधिक उल्लंघन करने के कारण कि उसे सुधारना ही मुश्किल हो जाए, मैंने अपने आप से नफ़रत की।

मैं अपने आप से और भी नफ़रत करने लगा, और जितनी जल्दी हो सके, पश्चाताप करने के लिए तरसने लगा।

परमेश्वर का सार विश्वसनीय और धर्मी है। वह उन लोगों से प्रेम करता है जो ईमानदार होते हैं।

मैं शैतान को अपनी पीठ दिखाना और पूरे दिल से परमेश्वर से प्रेम करना चाहता हूँ।

मैं एक ईमानदार व्यक्ति बनूँगा, सभी चीजों में सत्य की तलाश करूँगा और परमेश्वर के वचनों से जीवित रहूँगा।

ईमानदार होना, खुले दिल का होना, यह जानना कि किससे प्रेम करना है और किससे घृणा—यह परमेश्वर द्वारा सबसे अधिक धन्य होता है।

ईमानदार लोग मानव की सच्ची सदृशता होते हैं; वे सदा प्रकाश में जिएँगे।

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