650 तुम्हें अपनी वर्तमान पीड़ा का अर्थ समझना होगा

1 अधिकांश लोग अब परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, लेकिन अभी तक सही रास्ते पर प्रवेश नहीं किया है। वे अभी भी बहुत खाली और कमज़ोर महसूस करते हैं, कभी-कभी यह भी महसूस करते हैं कि सभी जीवित पीड़ित हैं, खालीपन महसूस करते हैं—मरने के इच्छा भी करते हैं। दर्शन से पहले व्यक्ति ऐसा ही रहता है। इस तरह के व्यक्ति ने सत्य प्राप्त नहीं किया है और अभी तक परमेश्वर को नहीं जान पाया है, इसलिए उसे अभी भी भीतरी आनंद महसूस नहीं होता है। विशेष रूप से तुम सभी ने उत्पीड़न और घर लौटने में कठिनाई का सामना किया है, तुम लोग दुखी होते हो और तुम लोगों को मृत्यु के विचार आते हैं और जीने की इच्छा नहीं रहती; यह देह की कमज़ोरी है। कुछ लोग यह भी सोचते हैं: हम परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, और हमें अपने भीतर आनंद महसूस करना चाहिए। आज परमेश्वर में विश्वास करना बहुत परेशान करता है।

2 तुम केवल यह जानते हो कि देह का सुख ही सब कुछ है। तुम नहीं जानते कि आज परमेश्‍वर क्या कर रहा है। परमेश्‍वर को तुम्‍हारी देह को कष्‍ट उठाने की अनुमत‍ि देनी पड़ती है ताकि तुम्‍हारे स्वभाव को बदल सके। भले ही तुम्‍हारी देह कष्‍ट उठाती है, पर तुम्‍हारे पास परमेश्‍वर का वचन है और तुम्‍हारे पास परमेश्‍वर का आशीर्वाद है। अगर तुम चाहो तो भी तुम मर नहीं सकते हो: क्या तुम यह स्‍वीकार कर सकते हो कि मर जाने पर तुम परमेश्‍वर को नहीं जानोगे और सत्‍य को नहीं पाओगे? अब, मुख्य रूप से, बस इतना है कि लोगों ने अब तक सत्‍य नहीं पाया है, और उनके पास जीवन नहीं है। अब लोग उद्धार पाने की प्रक्रिया के बीच में हैं, इसलिए उन्हें इस अवधि के दौरान कुछ कष्‍ट उठाना होगा।

3 आज दुनिया भर में हर किसी की परीक्षा ली जाती है: परमेश्‍वर अब भी कष्‍ट उठा रहा है—क्या यह उचित है कि तुम कष्‍ट न उठाओ? भयानक आपदाओं के माध्यम से परिशोधन के बिना वास्तविक विश्वास उत्पन्न नहीं हो सकता, और सत्य और जीवन प्राप्त नहीं किया जा सकता। आज़माइशों और परिशोधन के बिना कुछ हासिल नहीं किया जाएगा। पतरस को अंत में सात सालों के लिए आज़माया गया था। उन सात सालों में वह सैकड़ों परीक्षणों से गुज़रा था, और केवल उन्हीं तीन और तीन और एक साल बाद ही उसने जीवन और अपने स्वभाव में परिवर्तन प्राप्त किया। तो, जब तुम वास्तव में सत्य प्राप्त करते हो और परमेश्वर को जान पाते हो, तो तुम्हें लगता है कि जीवन को परमेश्वर के लिए व्यतीत किया जाना चाहिए। परमेश्वर के लिए जीवन व्यतीत न करना बहुत अफ़सोस की बात है: तुम कड़वे पछतावे और अत्यंत पश्चाताप के साथ अपना जीवन व्यतीत करोगे।

— "मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "मनुष्य का स्वभाव कैसे जानें" से रूपांतरित

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