वचन देह में प्रकट होता है

विषय-वस्तु

सत्य का अभ्यास कीजिए जब एक बार आप लोग उसे समझ जाते हैं

परमेश्वर के कार्य और वचन का अभिप्राय तुम लोगों के स्वभाव में एक परिवर्तन लाना है; उसका उद्देश्य मात्र यह नहीं है कि तुम लोग उन्हें समझो या पहचानो और उन्हें अंत तक रखे रहो। उस व्यक्ति के समान जिसके पास प्राप्त करने की योग्यता है, तुम लोगों को परमेश्वर के वचन को समझने में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए, क्योंकि परमेश्वर के अधिकतर वचन मानवीय भाषा में लिखे गए हैं जो समझने में बहुत आसान हैं। उदाहरण के लिए, तुम लोग जान सकते हो जो परमेश्वर तुमसे चाहता है कि तुम समझो और उसका अभ्यास करो; यह कुछ ऐसा है जिसे एक उचित व्यक्ति, जिसके पास समझने की क्षमता है, उसके करने योग्य होना चाहिए। परमेश्वर अब जो कहता है वह विशेष रूप से स्पष्ट और पारदर्शी है, और परमेश्वर बहुत सी चीज़ों, जिस पर लोगों ने विचार नहीं किया है, या मनुष्य की विभिन्न परिस्थितियों की ओर संकेत करता है। उसके वचन सभी के द्वारा स्वीकार किये जाते हैं। पूर्ण चाँद की रोशनी के समान साफ साफ। इसलिए अब, लोग बहुत से मामलों को समझते हैं; उनमें बस उसके वचन का अभ्यास करने की कमी है। लोगों को विस्तार से सत्य के सभी पहलुओं का अनुभव करना होगा, और अधिक विस्तार से उसकी छानबीन एवं खोज करनी होगी। बस यों ही उसे लेने का इन्तजार नहीं करना है जो उन्हें तत्परता से दिया जाता है; अन्यथा वे बेगारों से कुछ बढ़कर ही रह जाते हैं। वे परमेश्वर के वचन को जानते हैं, किन्तु उसे अभ्यास में नहीं लाते हैं। इस किस्म के व्यक्ति में सत्य का प्रेम नहीं होता है, और उसे अंततः निकाल दिया जाएगा। नब्बे के दशक के पतरस की शैली को धारण करने का तात्पर्य है कि तुम लोगों में से प्रत्येक को परमेश्वर के वचन का अभ्यास करना चाहिए। अपने अनुभवों में सही रीति से प्रवेश करना चाहिए और परमेश्वर के साथ अपने सहयोग में और अधिक तथा और बड़ा प्रबोधन प्राप्त करना चाहिए और अपने जीवन में उसका और भी अधिक सहयोग लेना चाहिए। यदि तुम सबों ने बहुतायत से परमेश्वर का वचन पढ़ा है किन्तु सिर्फ पाठ का अर्थ समझते हो और तुम लोगों के पास अपने अपने व्यावहारिक अनुभवों के जरिए परमेश्वर का अपने व्यावहारिक अनुभव से प्राप्त प्राथमिक ज्ञान नहीं है, तो तुम परमेश्वर के वचन को नहीं जान पाओगे। जहाँ तक यह बात तुम से सम्बंधित है, परमेश्वर का वचन तुम्हारे लिए जीवन नहीं है, किन्तु बस निर्जीव अक्षर हैं। और यदि तुम केवल निर्जीव अक्षरों को थामें रहोगे, तो तुम परमेश्वर के वचन का सार समझ नहीं सकते हो, न ही तुम उसकी इच्छा को समझोगे। जब तुम अपने वास्तविक अनुभवों में उसके वचन का अनुभव करते हो केवल तभी परमेश्वर के वचन का आध्यात्मिक अर्थ स्वयं को तुम्हारे लिए खोल देगा, और यह केवल अनुभव में होता है कि तुम बहुत सारे सत्य के आध्यात्मिक अर्थ को समझ सकते हो। और केवल अनुभव के जरिए तुम परमेश्वर के वचन के भेदों का खुलासा कर सकते हो। यदि तुम इसे अभ्यास में न लाओ, तो भले ही परमेश्वर के वचन कितने स्पष्ट हों, एकमात्र चीज़ जो तुम समझते हो वह है खोखले अक्षर एवं सिद्धांत, जो तुम्हारे लिए धार्मिक रीति विधियाँ बन चुकी हैं। क्या फरीसियों ने भी ऐसा ही नहीं किया था? यदि तुम लोग परमेश्वर के वचन का अभ्यास और उसका अनुभव करते हो, तो यह तुम लोगों के लिए व्यावहारिक बन जाता है; यदि तुम इसका अभ्यास करने की कोशिश नहीं करते हो, तो परमेश्वर का वचन तुम्हारे लिए तीसरे स्वर्ग की पौराणिक गाथा से बस कुछ अधिक होता है। वास्तव में, परमेश्वर में विश्वास करने की प्रक्रिया तुम सभी के द्वारा उसके वचन का अनुभव करने और साथ ही साथ उसके द्वारा ग्रहण किए जाने की प्रक्रिया है, या अधिक स्पष्टता से कहें, परमेश्वर में विश्वास करना उसके वचन का ज्ञान एवं समझ रखना है और उसके वचन का अनुभव करना एवं उसे जीना है; यह परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास की वास्तविकता है। यदि तुम लोग परमेश्वर में विश्वास करते हो और परमेश्वर के वचन को तुम भीतर उपस्थित किसी चीज़ की तरह अभ्यास में लाने की कोशिश किए बिना अनन्त जीवन की आशा करते हो, तो तुम लोग मूर्ख हो। यह एक भोज में जाने के समान है कि जाकर सिर्फ ध्यान दो कि वहां पर खाने को क्या क्या है और वास्तव में उसे चखकर न देखो। क्या ऐसा व्यक्ति मूर्ख नहीं है?

वह सत्य जिसे मनुष्य को धारण करने की आवश्यकता है उसे परमेश्वर के वचन में पाया जाता है, यह एक सत्य है जो मानवजाति के लिए सबसे अधिक लाभदायक और सहायक है। यह वह शक्तिवर्धक पेय और भरण-पोषण है जिसकी जरूरत तुम लोगों के शरीर को है। कुछ ऐसा जो तुम्हारे सामान्य मानवता को बहाल करने में सहायता करता है। अर्थात् एक सत्य जिससे तुम लोगों को सुसज्जित किया जाना चाहिए। तुम लोग परमेश्वर के वचन का जितना अधिक अभ्यास करते हो, उतनी ही जल्दी तुम लोगों का जीवन फूल की तरह खिलेगा; तुम लोग परमेश्वर के वचन का जितना अधिक अभ्यास करते हो, सत्य उतना ही अधिक स्पष्ट हो जाता है। जैसे जैसे तुम्हारी उच्चता बढ़ती है, तुम लोग आध्यात्मिक संसार की चीज़ों को और भी अधिक साफ साफ देखोगे, और तुम लोग शैतान के ऊपर विजय पाने के लिए और भी अधिक शक्तिशाली होगे। जब तुम परमेश्वर के वचन का अभ्यास करते हो तब बहुत से सत्य जिन्हें तुम नहीं समझते हो, उन्हें स्पष्ट कर दिया जाएगा। बहुत से लोग मात्र परमेश्वर के वचन के पाठ को समझकर ही संतुष्ट हो जाते हैं और उसकी गहराई के अनुभव का अभ्यास किये बगैर अपने आपको सिद्धान्तों से सुसज्जित करने की ओर ध्यान केन्द्रित करते हैं; क्या यह फरीसियों का तरीका नहीं है? तब, किस प्रकार यह वाक्यांश कि "परमेश्वर का वचन जीवन है" उनके लिए सही हो सकता है? जब मनुष्य परमेश्वर के वचन का अभ्यास करता है, केवल तभी उसका जीवन सचमुच में फूल के समान खिल सकता है; यह बस यूं ही उसके वचन को पढ़ने के द्वारा नहीं हो सकता है। यदि यह तुम्हारा विश्वास है कि केवल जीवन पाने और उच्चता पाने के लिए ही परमेश्वर के वचन को समझने की आवश्यकता है, तो तुम्हारी समझ विकृत हो गई है। जब तुम सत्य का अभ्यास करते हो तभी परमेश्वर का वचन सही ढंग से समझ आता है, और तुझे यह समझना होगा कि "केवल सत्य का अभ्यास करने के द्वारा ही इसे समझा जा सकता है"। आज, परमेश्वर के वचन को पढ़ने के बाद, तू बस यह कह सकता है कि तू परमेश्वर के वचन को जानता है, किन्तु तू यह नहीं कह सकता है कि तू इसे समझता है। कुछ लोग कहते हैं कि सत्य के अभ्यास का एकमात्र तरीका है कि पहले उसे समझा जाए, किन्तु यह केवल अर्ध सत्य है और पूरी तरह सटीक नहीं है। इससे पहले कि तुझे सत्य का ज्ञान हो, तूने उस सत्य का अनुभव नहीं किया है। यह महसूस करना कि जो तू सुनता है उसे तू समझता है। यह सही रीति से समझने के समान नहीं है। अपने आपको उस सत्य से सुसज्जित करना जैसा वह पाठ में दिखता है। यह उसमें निहित सत्य को समझने के समान नहीं है। सिर्फ इसलिए क्योंकि तुम्हारे पास सत्य का उथला ज्ञान है। इसका मतलब यह नहीं है कि तू वास्तव में इसे समझता है या पहचानता है; सत्य का सच्चा अर्थ उसका अनुभव करने से आता है। इसीलिए मैं कहता हूँ कि जब तू सत्य का अभ्यास करता है केवल तभी तू उसे समझ सकता है, और जब तू सत्य का अभ्यास करता है केवल तभी तू उसके छिपे हुए भागों को समझ सकता है। गहराई से उसका अनुभव करना ही सत्य के अतिरिक्त अर्थों को समझने, और उसके सार को समझने का एकमात्र तरीका है। इसलिए, तू सत्य के साथ हर जगह जा सकता है, किन्तु यदि तुम्हारे अंदर कोई सत्य नहीं है, तो धार्मिक लोगों को विश्वास दिलाने के विषय में सोचो भी नहीं, अपने परिवार को तो बिल्कुल भी नहीं। तू सत्य के बिना लुढ़कते बर्फ के समान होगा। किन्तु सत्य के साथ, तू प्रसन्न और स्वतंत्र होगा, जहाँ कोई तुझ पर आक्रमण नहीं कर सकता है। भले ही कोई सिद्धांत कितना भी मजबूत हो, यह सत्य पर विजय नहीं पा सकता है। सत्य के साथ, स्वयं संसार को डगमगाया जा सकता है तथा पर्वत और समुद्र खिसकाए जा सकते हैं, जबकि सत्य की कमी कीड़े-मकौडों के द्वारा की गई तबाही की ओर ले जाते हैं; यह मात्र तथ्य है।

अब महत्वपूर्ण यह है कि पहले सत्य को जानें, तब उसे अभ्यास में लाएं, और आगे से अपने आपको सत्य के सच्चे अर्थ से सुसज्जित करें। यह वही है जिस पर तुझे लक्ष्य साधना चाहिए, न केवल दूसरे लोगों से अपने वचनों का पालन करवा बल्कि उनसे अपने कार्यों का अनुसरण भी करवा, और सिर्फ इसमें ही तुझे कुछ अर्थपूर्ण मिल सकता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तेरे पर क्या गुजरती है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कैसे लोगों से तुम्हारा सामना होता है। तू केवल सत्य के साथ स्थिरता से खड़ा हो सकता है। परमेश्वर का वचन वह है जो मनुष्य के लिए जीवन लेकर आता है, मृत्यु नहीं। यदि परमेश्वर के वचन को पढ़ने के बाद तुम जीवित नहीं हो उठते हो, किन्तु उसके वचन को पढ़ने के बाद तुम फिर भी मरे हुए होते हो, तो तुझ में कुछ ग़लत है। यदि कुछ समय के बाद तूने परमेश्वर के अधिकतर वचन पढ़ लिया है और बहुत से व्यावहारिक सन्देशों को सुना है, किन्तु तू अभी भी मृत्यु की दशा में है, तो यह इस बात का प्रमाण है कि तू ऐसा इंसान नहीं है जो सत्य को महत्व देता है, और न ही तू ऐसा व्यक्ति है जो सत्य की खोज करता है। यदि तुम लोग सचमुच में परमेश्वर को पाने की खोज करते हो, तो तुम लोग ऊँचे सिद्धान्तों से अपने आपको सुसज्जित करने और दूसरों को प्रोत्साहित करने के लिए उनका उपयोग करने के ऊपर ध्यान केन्द्रित नहीं करोगे, किन्तु उसके बजाए परमेश्वर के वचन का अनुभव करने और सत्य को अभ्यास में लाने पर ध्यान केन्द्रित करोगे; क्या यह वास्तव में वह नहीं है जिसमें तुम लोगों को वर्तमान में प्रवेश करना चाहिए?

मानव के जीवन में अपना कार्य करने के लिए परमेश्वर के पास सीमित समय है, किन्तु यदि तुम लोग उसके साथ सहयोग नहीं करते हो तो वहां क्या परिणाम हो सकता है? ऐसा क्यों है कि परमेश्वर हमेशा चाहता है कि तुम लोग उसके वचन को समझ लेने के बाद उसका अभ्यास करें? यह इसलिए है क्योंकि परमेश्वर ने अपने वचन तुम लोगों को प्रकट किया है, और तुम लोगों का अगला कदम वास्तव में उनका अभ्यास करना है, और जब तुम लोग इन वचनों का अभ्यास करते हो तो परमेश्वर विशेष प्रबोधन और मार्गदर्शन का कार्य पूरा करेंगे। यह ऐसा ही है। परमेश्वर के वचन का अभिप्राय मनुष्य को बिना किसी विचलन या नकारात्मकता के जीवन में फूल की तरह खिलने देना है। तुम कहते हो कि तूने परमेश्वर के वचन को पढ़ा है और उसका अभ्यास किया है, किन्तु तूने अभी भी पवित्र आत्मा के किसी भी कार्य को प्राप्त नहीं किया है-जो तू कहता है वह केवल एक बच्चे को धोखा दे सकता है। मनुष्य नहीं जानता कि तेरे इरादे उचित हैं कि नहीं, किन्तु तू क्या सोचता है कि परमेश्वर भी नहीं जानेगा? ऐसा कैसे है कि अन्य लोग परमेश्वर के वचन का अभ्यास करते हैं और पवित्र आत्मा का विशेष प्रबोधन प्राप्त करते हैं, और तू किसी न किसी तरह उसके वचन का अभ्यास करता है फिर भी पवित्र आत्मा का विशेष प्रबोधन प्राप्त नहीं करता है? क्या परमेश्वर भावुक है? यदि तेरे इरादे सचमुच में भले हैं और तू सहयोग करने वाला है, तो परमेश्वर की आत्मा तुम्हारे साथ होगा। ऐसा क्यों है कि कुछ लोग हमेशा अहम स्थान लेना चाहते हैं, और फिर भी परमेश्वर उन्हें ऊँचा उठने और कलीसिया की अगुवाई करने नहीं देता है? ऐसा क्यों है कि कुछ लोग मात्र अपने कार्य को अंजाम देते हैं और उसका एहसास किये बगैर, वे परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त कर लेते हैं? ऐसा कैसे हो सकता है? परमेश्वर हृदय को जांचता है, और वे लोग जो सत्य की खोज करते हैं उनको अच्छे इरादों के साथ ऐसा करना चाहिए - ऐसे लोग जिनके इरादे अच्छे नहीं हैं वे स्थिर खड़े नहीं रह सकते हैं। इसके केन्द्र में, तुम लोगों का लक्ष्य परमेश्वर के वचन को तुम लोगों के भीतर प्रभावी होने देना है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर के वचन की सही समझ रखना है कि तुम सब उसका अभ्यास कर सको। कदाचित् परमेश्वर के वचन को प्राप्त करने की तुम लोगों की योग्यता बहुत कमज़ोर है, किन्तु जब तुम लोग परमेश्वर के वचन का अभ्यास करते हो, तो वे प्राप्त करने की तुम सब की दुर्बल योग्यता की त्रुटि को सुधारने के लिए उसमें कुछ जोड़ सकते हो, अतः न केवल तुम लोगों को बहुत सा सत्य जानना होगा, बल्कि तुम लोगों को उनका अभ्यास भी करना होगा। यह सबसे बड़ा केंद्र-बिंदु है जिसको नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है। यीशु ने साढ़े तैंतीस सालों में बहुत कष्ट उठाया था क्योंकि उन्होंने सत्य का अभ्यास किया था। लेखों में हमेशा यह क्यों कहा जाता है कि उन्हें सताया गया? यह इस बात का वर्णन करने के लिए है कि उन्होंन सत्य का अभ्यास करने और परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने के लिए कितना कष्ट उठाया था। सत्य का अभ्यास किए बगैर यदि उन्होंने उस सत्य को जान लिया होता तो वह दुख से होकर नहीं गुज़रते। यदि यीशु ने यहूदियों की शिक्षाओं का अनुसरण किया होता, और फरीसियों का अनुगमन किया होता, तो उन्हें दुख उठाना नहीं पड़ता। तू यीशु के अभ्यास से सीख सकता है कि मनुष्य के ऊपर परमेश्वर के कार्य की प्रभावशीलता मनुष्य के सहयोग से आती है, और यह कुछ ऐसा है जिसे तुम सब को पहचानना होगा। क्या यीशु ने दुख सहा होता जैसा उन्होंन क्रूस पर सहा था यदि उन्होंने सत्य का अभ्यास नहीं किया होता? क्या वे ऐसी दुख भरी प्रार्थना कर सकते थे यदि उन्होंने परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप कार्य नहीं किया होता। इसका अर्थ है कि एक व्यक्ति को इसी प्रकार का कष्ट सहना चहिए।