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परमेश्वर के देहधारण से ही इंसान उसका विश्वासपात्र बन सकता है

I

जब परमेश्वर बनाता है खुद को विनम्र

और देहधारण कर रहता है इंसानों के बीच,

तभी इंसां बन सकते हैं उसके हमराज़,

और हो सकती है दोस्ती उनके बीच।

जब परमेश्वर बनाता है खुद को विनम्र

और देहधारण कर रहता है इंसानों के बीच,

तभी इंसां बन सकते हैं उसके हमराज़,

और हो सकती है दोस्ती उनके बीच।

परमेश्वर है असाधारण, आत्मा का और समझ से परे,

इंसां उसका हमराज़ बने भी तो कैसे बने?

परमेश्वर के देहधारण से ही इंसां उसका विश्वासपात्र बन सकता है।

परमेश्वर के देहधारण से ही इंसां उसका विश्वासपात्र बन सकता है।

जब ले लेता है वो उसी मानव देह का रूप, केवल तब ही,

इंसां समझ पाता है उसकी मर्ज़ी, और परमेश्वर को होती है उसकी प्राप्ति।

II

देह में ही परमेश्वर बोलता और कार्य करता है,

इंसां के क्लेश, गम और खुशियों को साझा करता है,

उनके संसार में जीते हुए, उनकी रक्षा करता और मार्ग दिखाता है,

और वे उसकी कृपा और मुक्ति पा सकें इसलिए उन्हें शुद्ध बनाता है।

परमेश्वर है असाधारण, आत्मा का और समझ से परे,

इंसां उसका हमराज़ बने भी तो कैसे बने?

परमेश्वर के देहधारण से ही इंसां उसका विश्वासपात्र बन सकता है।

III

इसके द्वारा ही इंसां सच में समझ पाता है परमेश्वर की इच्छा,

और बन जाता है उसका हमराज़; यही तो है व्यावहारिकता।

अगर परमेश्वर हो अदृश्य और हो दूर इंसां की पहुँच से,

तो इंसां परमेश्वर का हमराज़ बने कैसे?

ये सिद्धांत बेमतलब नहीं तो क्या है?

परमेश्वर के देहधारण से ही इंसां उसका विश्वासपात्र बन सकता है।

परमेश्वर के देहधारण से ही इंसां उसका विश्वासपात्र बन सकता है।

परमेश्वर के देहधारण से ही इंसां उसका विश्वासपात्र बन सकता है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से

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