वचन देह में प्रकट होता है

विषय-वस्तु

मात्र सत्य का अभ्यास करना ही वास्तविकता रखना है

परमेश्वर के वचनों की निर्लज्जतापूर्वक व्याख्या करने के योग्य होने का अर्थ यह नहीं है कि वास्तविकता पर तुम्हारा अधिकार है—बातें इतनी भी साधारण नहीं है जितनी तुम ने कल्पना की थी। वास्तविकता पर तुम्हारा अधिकार है या नहीं, यह उस बात पर आधारित नहीं है, जो तुम कहते हो, अपितु यह उस बात पर आधारित है, जो तुम जीते हो। जब परमेश्वर के वचन तुम्हारा जीवन और तुम्हारी स्वाभाविक अभिव्यक्ति बन जाती है, मात्र इसे ही वास्तविकता गिना जाता है और मात्र इसे ही तुम्हारे ज्ञान पर अधिकार रखने और तुम्हारी वास्तविक कद-काठी के रूप में गिना जाता है। तुम्हें लम्बे समय तक परीक्षा का सामना करना अनिवार्य है, और तुम्हें उस समानता से जीवनयापन करने के योग्य होना अनिवार्य है, जिसकी अपेक्षा परमेश्वर तुम से करता है; यह मात्र दिखावा नहीं होना चाहिए; परन्तु तुम में यह स्वाभाविक रूप से प्रवाहित हो। मात्र तभी तुम में वस्तुतः वह वास्तविकता होगी, और तुम जीवन प्राप्त कर चुके होगे। मैं सेवकों का उदाहरण देना चाहता हूँ, जिससे सभी अच्छी तरह से अवगत हैं। सेवकों के विषय में शानदार सिद्धांतों के बारे में कोई भी वार्तालाप कर सकता है; इस विषय के बारे में तुम सभी को अच्छा ज्ञान है, और तुम में से प्रत्येक व्यक्ति पिछले विषय के स्थान पर इस विषय में वार्तालाप करने के लिए और अधिक कुशल भी है, जैसे कि यह कोई प्रतियोगिता हो। परन्तु, यदि मनुष्य किसी मुख्य परीक्षा से न गुजरा हो, तो यह कहना कठिन होगा कि उसकी एक अच्छी गवाही है। संक्षेप में, मनुष्य के जीवन जीने में अभी भी बहुत कमी है, और यह उसके ज्ञान के अनुसार नहीं है। इसलिए इसका, मनुष्य की वास्तविक कद-काठी बनना अभी शेष है, और अभी तक यह मनुष्य का जीवन नहीं है। क्योंकि मनुष्य के ज्ञान को वास्तविकता में नहीं लाया गया है, उसकी कद-काठी रेत पर निर्मित एक किले के समान है, जो लड़खड़ा रहा है और ढह जाने की कगार पर है। मनुष्य में बहुत कम वास्तविकता है—मनुष्य में कोई भी वास्तविकता पाना लगभग असम्भव है। मनुष्य से स्वाभाविक रूप से बहुत ही अल्प वास्तविकता प्रवाहित हो रही है और उसके जीवन में समस्त वास्तविकता ज़बरदस्ती लाई गई है, इसीलिए मैं कहता हूँ कि मनुष्य में कोई वास्तविकता नहीं है। मनुष्य में यह कह कर अत्यधिक भरोसा न करो कि परमेश्वर के प्रति उनका प्रेम कभी परिवर्तित नहीं होता—ऐसा वे परीक्षाओं से उनका सामना होने से पहले ही कहते हैं। अचानक परीक्षाओं से सामना हो जाने पर, जो बातें वे कहते हैं, वे फिर से वास्तविकता से मेल नहीं रखती हैं, और यह फिर से प्रमाणित करेगा कि मनुष्य में वास्तविकता नहीं है। यह कहा जा सकता है कि जब कभी तुम्हारा सामना उन बातों से होता है, जो तुम्हारे विचारों से मेल नहीं रखती और यह माँग करती हैं कि तुम स्वयं को अलग कर लो, ये ही तुम्हारी परीक्षाएँ हैं। परमेश्वर की इच्छा को प्रकट किए जाने से पहले, प्रत्येक मनुष्य के लिए एक धर्मी परीक्षा, प्रत्येक के लिए एक बहुत बड़ी परीक्षा होती है—क्या तुम इस विषय को सुस्पष्टता से देख सकते हो? जब परमेश्वर मनुष्य की परीक्षा लेना चाहता है, तो वह हमेशा सत्य के तथ्यों को प्रकट करने से पहले मनुष्य को उनके चुनाव करने देता है। कहने का अर्थ यह है कि जब परमेश्वर तुम्हारी परीक्षा ले रहा होता है, वह कभी भी तुम्हें सत्य नहीं बताएगा, और इसी प्रकार मनुष्य को उजागर किया जा सकता है। यह एक विधि है, जिससे परमेश्वर यह जानने के लिए अपना कार्य करता है कि क्या तुम वर्तमान परमेश्वर को जानते हो और तुम में कोई वास्तविकता है या नहीं। क्या तुम परमेश्वर के कार्यों से सम्बन्धित सन्देहों से सचमुच स्वतन्त्र हो? जब तुम पर एक बड़ी परीक्षा आती है तो क्या तुम स्थिर रहने योग्य होगे? कौन ऐसे शब्द कहने की हिम्मत कर सकता है "मैं आश्वासन देता हूँ कि कोई समस्या नहीं आएगी?" कौन ऐसे शब्द कहने की हिम्मत कर सकता है, "हो सकता है दूसरों को सन्देह हो, परन्तु मैं कभी भी सन्देह नहीं करूँगा?" ठीक जैसे जिन समयों में पतरस परीक्षाओं में था—वह सर्वदा ही सत्य के प्रकट किए जाने से पहले बड़ी-बड़ी बातें करता था। यह पतरस की ही एक अनोखी गलती नहीं थी; यह सब से बड़ी कठिनाई है, जिसका अभी भी प्रत्येक मनुष्य सामना कर रहा है। यदि परमेश्वर के आज के कार्य के तुम्हारे ज्ञान को देखने के लिए मैं अनेक स्थानों पर जाता, और यदि मैं अनेक भाइयों और बहनों से भेंट करता, तो तुम सब निश्यत: तुम्हारे अनेक प्रकार के ज्ञान के विषय में बात करने के योग्य होते, और ऐसा प्रतीत होता कि तुम्हारे पास कोई सन्देह नहीं है। यदि मैं तुम से पूछता: "क्या तुम वास्तव में संकल्प ले सकते हो कि आज का कार्य स्वयं परमेश्वर के द्वारा किया जा रहा है? बिना किसी सन्देह के?" क्या तुम नि उत्तर दोगे: "बिना किसी सन्देह के, यही कार्य परमेश्वर के आत्मा के द्वारा किया जा रहा है।" एक बार जब तुम इस प्रकार से उत्तर दे चुके हो, तो तुम में थोड़ा सा भी सन्देह नहीं होगा और हो सकता है तुम बहुत आनन्द का अनुभव कर रहे हो—तुम्हें अनुभव हो सकता है कि तुम ने वास्तविकता के एक अंश को प्राप्त के लिया है। वे जो बातों को इस रीति से समझते हैं, वे, वे लोग हैं, जिनमें बहुत कम वास्तविकता है; एक व्यक्ति जितना अधिक सोचता है कि उसने इसे प्राप्त कर लिया है, वह परीक्षाओं में उतना ही कम स्थिर खड़ा रहने के योग्य होता है। हाय है उन पर जो अहंकारी और घमण्डी हैं, और हाय है उन पर जिन्हें स्वयं का कोई ज्ञान नहीं है। ऐसे लोग बातें करने में सर्वोत्तम होते हैं, परन्तु अपने कार्यों में बहुत ही बुरे होते हैं। जब समस्या का छोटा सा भी चिह्न दिखाई देता है, ये लोग सन्देह करना आरम्भ कर देते हैं और त्याग देने का विचार उनके मस्तिष्क में प्रवेश कर जाता है। उनका वास्तविकता पर कोई अधिकार नहीं होता; उनके पास जो है वह मात्र सिद्धान्त हैं, जो धर्म से भी हल्के हैं, और ये उन समस्त वास्तविकताओं से रहित हैं, जिनकी परमेश्वर माँग करता है। मुझे उनपर सब से अधिक चिढ़ आती है, जो मात्र सिद्धान्तों की बात करते हैं और उनमें कोई वास्तविकता नहीं होती है। जब वे कोई कार्य करते हैं तो जोर-जोर से चिल्लाते हैं, परन्तु जैसे ही उनका सामना वास्तविकता से होता है, वे बिखर जाते हैं। क्या यह, यह नहीं दर्शाता कि इन लोगों के पास कोई वास्तविकता नहीं है? इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हवा और लहरें कितनी भी भयंकर क्यों न हों, यदि तुम अपने मन में थोड़ा सा भी सन्देह किए बिना खड़े रह सकते हो और तुम स्थिर रह सकते हो और उस समय भी इन्कार करने की स्थिति में नहीं रहते हो, जब कोई और शेष ही नहीं रहता है, तब इसे तुम्हारे पास वास्तविक ज्ञान होने और वस्तुतः तुम्हारे पास वास्तविकता होने के रूप में गिना जाएगा। जिधर हवा बहती है यदि तुम भी उधर ही बह जाते हो, यदि तुम बहुसंख्या के पीछे जाते हो और वही कहते हो, जो अन्य लोग भी कह रहे हैं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम ऐसी बातों को कितनी उत्तम रीति से कहते हो, यह कोई प्रमाण नहीं है कि तुम में वास्तविकता है। इसलिए मैं तुम्हें परामर्श देता हूँ, कि निरर्थक शब्द बोलने में तुम अपरिपक्व न बनो। क्या तुम वह कार्य जानते हो जो परमेश्वर करेगा? एक और पतरस जैसा व्यवहार मत करो, नहीं तो तुम स्वयं पर ही लज्जा ले आओगे और तुम अपनी प्रतिष्ठा को बनाए नहीं रख पाओगे—यह किसी के लिए कुछ भला नहीं करता है। अधिकतर व्यक्तियों के पास वास्तविक कद-काठी नहीं होती है। परमेश्वर ने एक बहुत बड़ा कार्य कर दिया है, परन्तु उसने लोगों पर वास्तविकता प्रकट नहीं की है; यदि सही-सही कहें तो, परमेश्वर ने कभी किसी को व्यक्तिगत रीति से ताड़ना नहीं दी है। अतः, उनमें से कुछ को उनके पाप के लता-तन्तुओं के और आगे बढ़ते जाने के साथ ऐसी परीक्षाओं के द्वारा अनावृत किया गया है, वे यह विचार करते हैं कि वे परमेश्वर से बिना विचारे व्यवहार कर सकते हैं और जो वे चाहें वह कर रहे हैं। इसलिए कि वे इस प्रकार की परीक्षा का ही सामना करने के योग्य नहीं हैं, अधिक चुनौतीपूर्ण परीक्षाओं का सवाल ही नहीं उठता है, और वास्तविकता का भी सवाल ही नहीं उठता है। क्या यह परमेश्वर को मूर्ख बनाने का प्रयास नहीं है? वास्तविकता रखना कुछ ऐसा नहीं है, जिसमें जालसाजी की जा सकती है, और न ही यह कुछ ऐसा है, जो तुम इसके तुम्हारे ज्ञान से प्राप्त कर सकते हो। यह तुम्हारी वास्तविक कद-काठी पर आधारित है, और यह इस बात पर भी आधारित है कि क्या तुम समस्त परीक्षाओं का सामना करने के योग्य हो। क्या अब तुम समझते हो?

मनुष्य से परमेश्वर की अपेक्षा मात्र वास्तविकता के विषय में बात करने के योग्य होना ही नहीं है। क्या वह अति सरल नहीं होगा? तब परमेश्वर जीवन में प्रवेश के विषय में बात क्यों करता है? वह रूपांतरण के विषय में बात क्यों करता है? यदि कोई वास्तविकता की खोखलीबातें करने के योग्य है, तो क्या स्वभाव में रूपांतरण प्राप्त किया जा सकता है? राज्य के अच्छे सैनिकों के समूह को प्रशिक्षित करना उन मनुष्यों को प्रशिक्षित करने के समान नहीं है, जो मात्र वास्तविकता के विषय में बात कर सकते हैं या वे व्यक्ति, जो मात्र डींगें मारते हैं, परन्तु यह उन व्यक्तियों को प्रशिक्षित करना है, जो हर समय परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीवनयापन कर सकते हैं, जो उन रुकावटों पर, जिनका वे सामना करते हैं, ध्यान दिए बिना झुकते नहीं हैं, और हर समय परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीवनयापन करते हैं और संसार में वापिस नहीं जाते हैं। यही वह वास्तविकता है जिसके विषय में परमेश्वर बात करता है, और मनुष्य से परमेश्वर की यही अपेक्षा है। इसलिए परमेश्वर द्वारा कही गई वास्तविकता को इतना सरल न लें। मात्र पवित्र आत्मा के द्वारा प्रबुद्ध होना वास्तविकता रखने के समान नहीं है: यह मनुष्य की कद-काठी नहीं, अपितु परमेश्वर का अनुग्रह है और इसमें मनुष्य की कोई उपलब्धि सम्मिलित नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति को पतरस की पीड़ाएँ सहना और इससे भी अधिक पतरस का सम्मान प्राप्त करना अनिवार्य होगा, इसी के द्वारा मनुष्य जीवनयापन करते हैं, जब उन्होंने परमेश्वर के कार्य को प्राप्त कर लिया होता है। मात्र इसे ही वास्तविकता कहा जा सकता है। यह विचार भी न करो कि तुम वास्तविकता प्राप्त कर लोगे, क्योंकि तुम वास्तविकता के विषय में बात कर सकते हो। यह एक भ्रम है, यह परमेश्वर की इच्छा के अनुसार नहीं है और इसका कोई वास्तविक महत्व भी नहीं है। भविष्य में ऐसी बातें मत करना—ऐसी बातों को समाप्त कर दो! वे सभी जो परमेश्वर के वचनों की गलत समझ रखते हैं, वे सभी अविश्वासी हैं। उनमें कोई भी वास्तविक ज्ञान नहीं है, वास्तविक कद-काठी का तो सवाल ही नहीं है; वे वास्तविकता रहित अज्ञानी लोग हैं। कहने का अर्थ यह है कि, वे सभी जो परमेश्वर के वचनों के ज्ञान से बाहर जीवन जीते हैं, वे सभी अविश्वासी हैं। जिन्हें मनुष्यों के द्वारा अविश्वासी समझ लिया गया है, वे परमेश्वर की दृष्टि में जानवर हैं, और जिन्हें परमेश्वर के द्वारा अविश्वासी समझा गया है, वे लोग वे हैं जिनमें जीवन के रूप में परमेश्वर का वचन नहीं है। अतः, वे लोग जिनमें परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता नहीं है, और वे जो परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीवन जीने में असफल हो जाते हैं, वे अविश्वासी हैं। परमेश्वर की इच्छा इसे ऐसा बनाना है, जिससे प्रत्येक व्यक्ति परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीवनयापन करे। यह सामान्यतः ऐसा नहीं है, कि प्रत्येक व्यक्ति वास्तविकता के विषय में बात करने के योग्य ही हो सके, परन्तु इससे महत्वपूर्ण यह है कि प्रत्येक परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता को जीने के योग्य हो सके। वह वास्तविकता जिसका अनुसरण मनुष्य करता है, वह वास्तविकता बहुत ही छिछली है, इसका कोई मूल्य नहीं है, यह परमेश्वर की इच्छा को पूर्ण नहीं कर सकती, यह अत्यधिक उथली है, यह उल्लेख किए जाने के योग्य तक नहीं है, इसमें बहुत कमी है और यह परमेश्वर की अपेक्षाओं से बहुत ही दूर है। यह देखने के लिए तुम में से प्रत्येक व्यक्ति एक विशेष जाँच के अधीन होगा कि तुम में से कौन मात्र अपनी समझ के विषय में बात करना जानता है, परन्तु उस मार्ग की ओर इशारा करने और यह देखने में अयोग्य है, कि तुम में से कौन अनुपयोगी कूड़ा-करकट है। इसे भविष्य में स्मरण रखना। खोखले ज्ञान के विषय में बात मत करना—मात्र अभ्यास के उस मार्ग, और वास्तविकता के विषय में बात करना। वास्तविक ज्ञान से वास्तविक अभ्यास में पारगमन, और फिर अभ्यास करने से वास्तविकता के जीवनयापन में पारगमन। दूसरों को उपदेश मत दो और वास्तविक ज्ञान के विषय में बात मत करो। यदि तुम्हारा ज्ञान एक मार्ग है, तब तुम इसे छोड़ सकते हो; यदि यह एक मार्ग नहीं है, तब कृपा करके चुपचाप बैठ जाओ, और बात करना बन्द कर दो। जो कुछ तुम कहते हो वह बेकार है—यह परमेश्वर को मूर्ख बनाने और दूसरों को तुम से जलन करवाने के लिए ज्ञान के कुछ शब्द मात्र हैं। क्या यही तुम्हारी अभिलाषा नहीं है? क्या यह जानबूझकर दूसरों के साथ खिलवाड़ करना नहीं है? क्या इसका कोई मूल्य है? ज्ञान के विषय में तभी बात करो जब तुम इसे अनुभव कर चुके हो, और तब तुम डींगें नहीं मार रहे होगे। अन्यथा तुम मात्र एक ऐसे व्यक्ति होगे, जो घमण्ड की बातें करता रहता है। तुम अनेक बातों पर जयवन्त नहीं हो सकते और न ही अपने वास्तविक अनुभवों में अपने शरीर का विरोध कर सकते हो। सर्वदा वही करना, जो करने के लिए तुम्हारी इच्छाएँ तुम्हें प्रेरित करती हैं और परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट न करना, परन्तु फिर भी तुम में सैद्धान्तिक ज्ञान की बात करने की गुस्ताख़ी विद्यमान है—तुम तो बेशर्म हो! तुम में परमेश्वर के ज्ञान की बात करने की गुस्ताख़ी विद्यमान है—तुम कितने ढीठ व्यक्ति हो! उपदेश देना और डींगें मारना तुम्हारी प्रवृति बन चुकी है, और तुम ऐसा करने के आदि हो चुके हो। जब कभी तुम बात करना चाहते हो तो यह तुम्हारे लिए बहुत ही सरल सी बात है, तुम यह बहुत ही सरलता और बिना विचारे करते हो, और जब अभ्यास करने की बात आती है तब तुम सजने-संवरने में व्यस्त हो जाते हो। क्या यह दूसरों को मूर्ख बनाना नहीं है? तुम मनुष्यों को मूर्ख बनाने में समर्थ हो सकते हो, परन्तु परमेश्वर को मूर्ख नहीं बनाया जा सकता। मनुष्यों को पता नहीं होता और न ही उनमें अच्छे से पहचानने की योग्यता होती है, परन्तु परमेश्वर ऐसे मसलों के विषय में गम्भीर है, और वह तुम्हें नहीं छोड़ेगा। हो सकता है तुम्हारे भाई और बहनें तुम्हारा पक्षसमर्थन करें, तुम्हारे ज्ञान की प्रशंसा करें, तुम्हारी सराहना करें, परन्तु यदि तुम में वास्तविकता नहीं है, तो पवित्र आत्मा तुम्हें नहीं छोड़ेगा। सम्भवतः व्यवहारिक परमेश्वर तुम्हारी गलतियों को नहीं देखेगा, परन्तु परमेश्वर का आत्मा तुम्हारी ओर ध्यान नहीं देगा, और सहन करने के लिए तुम्हारे लिए इतना ही पर्याप्त होगा। क्या तुम इस पर विश्वास करते हो? अभ्यास की वास्तविकता के विषय में अधिक बात करो; क्या तुम वह पहले ही भूल चुके हो? "उथले सिद्धान्तों की बात और निस्सार वार्तालाप कम करो और अभी अभ्यास करने का आरम्भ करना सर्वोत्तम है।" क्या तुम ये वचन भूल चुके हो? क्या तुम इसमें से कुछ भी नहीं समझते हो? क्या तुम्हारे पास परमेश्वर की इच्छा का कोई ज्ञान नहीं है?