710 परमेश्वर के कार्य का पालन करने से ही स्वभाव बदलता है

1

अगर तुम पवित्र आत्मा के आज के वचनों का अनुसरण

और ईश-कार्य का अनुभव कर पाओ, तो बदल सके तुम्हारा स्वभाव।

अगर तुम पवित्र आत्मा के वचन खोजो, उनका अनुसरण करो,

तो तुम ईश्वर के आज्ञाकारी हो; बदलाव आएगा तुममें।

आत्मा के नए वचनों से बदले इंसान।

अगर अतीत से चिपका रहे, तो न बदले इंसान।

आत्मा के मार्गदर्शन का अनुसरण करो, ईश-वचनों का पालन करो।


अपना स्वभाव ख़ुद न बदल सके इंसान।

ज़रूरी है ईश-वचनों से उसकी ताड़ना और

न्याय हो, शुद्धिकरण और काट-छाँट हो।

तभी ईश्वर के प्रति आज्ञाकारी, वफ़ादार हो पाए इंसान,

न कि लापरवाही से या बेवकूफ बनाकर उसे।


2

ईश-वचनों के शुद्धिकरण से, इंसान का स्वभाव बदले।

ईश-वचनों से उजागर होकर, न्याय पाकर,

अविवेकी न रहे, शांत बने इंसान।

सबसे अहम बात वो आज के ईश-वचनों और कार्य को समर्पित होता,

इंसानी धारणाओं को त्याग देता, और ख़ुशी से समर्पित होता।


अपना स्वभाव ख़ुद न बदल सके इंसान।

ज़रूरी है ईश-वचनों से उसकी ताड़ना और

न्याय हो, शुद्धिकरण और काट-छाँट हो।

तभी ईश्वर के प्रति आज्ञाकारी, वफ़ादार हो पाए इंसान,

न कि लापरवाही से या बेवकूफ बनाकर उसे।


3

पहले, बदलने का अर्थ था ख़ुद को त्यागना,

देह को अनुशासित करना, दुख उठाना, देह की इच्छाओं को त्यागना;

ये एक तरह का बदलाव है स्वभाव में।

आज, सभी जानें, वर्तमान ईश-वचनों का पालन,

नए ईश-कार्य का ज्ञान ही बदलाव की असली निशानी है।

तब ईश्वर को जानने, आज्ञा मानने के लिए, उसके बारे में

इंसान की पुरानी धारणाएँ मिटायी जा सकें।

यही सच्ची अभिव्यक्ति है स्वभाव में बदलाव की।


अपना स्वभाव ख़ुद न बदल सके इंसान।

ज़रूरी है ईश-वचनों से उसकी ताड़ना और

न्याय हो, शुद्धिकरण और काट-छाँट हो।

तभी ईश्वर के प्रति आज्ञाकारी, वफ़ादार हो पाए इंसान,

न कि लापरवाही से या बेवकूफ बनाकर उसे।


—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जिनके स्वभाव परिवर्तित हो चुके हैं, वे वही लोग हैं जो परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश कर चुके हैं से रूपांतरित

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