363 लोग नहीं जानते कि वे कितने अधम हैं

1 मानवजाति के मन में, परमेश्वर उनके लिए कोई वरदान नहीं है, बल्कि कोई ऐसा है जो हमेशा उन्हें शाप देता है; इसलिए, मानवजाति उस पर ध्यान नहीं देती है, वे उसका स्वागत नहीं करते हैं, वे उसके प्रति हमेशा उदासीन रहते हैं, और यह कभी भी नहीं बदला है। क्योंकि मानवजाति के हृदय में ये बातें हैं, इसलिए परमेश्वर कहता है कि मानवजाति अतर्कसंगत और अनैतिक है, और यहाँ तक कि उन भावनाओं को भी उनमें महसूस नहीं किया जा सकता है जिनसे मनुष्यों को सुसज्जित होना माना जा सकता है। मानवजाति परमेश्वर की भावनाओं के लिए कोई मान नहीं दिखाती है, किन्तु परमेश्वर से निपटने के लिए तथाकथित "धार्मिकता" का उपयोग करती है।

2 मानवजाति कई वर्षों से इसी तरह की है और इस कारण से परमेश्वर ने कहा है कि उनका स्वभाव नहीं बदला है। ऐसा कहा जा सकता है कि मनुष्य मूल्यहीन अभागे हैं क्योंकि वे स्वयं को नहीं सँजोए रखते हैं। यदि वे स्वयं से भी प्यार नहीं करते हैं, किन्तु स्वयं को ही रौंदते हैं, तो क्या यह इस बात को नहीं दर्शाता है कि वे मूल्यहीन हैं? मानवजाति एक अनैतिक स्त्री की तरह है जो स्वयं के साथ खेल खेलती है और जो दूषित किए जाने के लिए स्वेच्छा से स्वयं को दूसरों को देती है। किन्तु फिर भी, वे अब भी नहीं जानते हैं कि वे कितने अधम हैं। उन्हें दूसरों के लिए कार्य करने, या दूसरों के साथ बातचीत करने, स्वयं को दूसरों के नियंत्रण के अधीन करने में खुशी मिलती है; क्या यह वास्तव में मानवजाति की गंदगी नहीं है?

3 क्योंकि मानवजाति स्वयं को नहीं जानती है, इसलिए उनका सबसे बड़ा दोष अपने आकर्षण का दूसरों के सामने स्वेच्छा से जुलूस निकालना है, अपने कुरूप चेहरे का जूलूस निकालना है; यह कुछ ऐसा है जिससे परमेश्वर सबसे ज्यादा घृणा करता है। क्योंकि लोगों के बीच संबंध असामान्य हैं, और लोगों के बीच कोई सामान्य अंतर्वैयक्तिक संबंध नहीं हैं, इसलिए परमेश्वर के साथ उनका सामान्य संबंध तो बिल्कुल भी नहीं है। परमेश्वर ने बहुत अधिक कहा है, और ऐसा करने में उसका मुख्य उद्देश्य मानवजाति के हृदय में एक स्थान को अधिकार में लेना है, लोगों को उनके हृदय की सभी मूर्तियों से छुटकारा दिलवाना है, ताकि परमेश्वर समस्त मानवजाति पर सामर्थ्य का उपयोग कर सके और पृथ्वी पर होने का अपना उद्देश्य प्राप्त कर सके।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों के रहस्य की व्याख्या के "अध्याय 14" से रूपांतरित

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