64 विजय के कार्य का आतंरिक अर्थ

1 मनुष्य पर विजय का आन्तरिक अर्थ मनुष्य पर विजय पाने के बाद शैतान के मूर्त रूप, मनुष्य का सृजनकर्ता के पास वापस लौटना है जिसे शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है, जिसके माध्यम से वह शैतान को छोड़ देगा और पूरी तरह से परमेश्वर के पास वापस लौट जाएगा। इस तरह से, मनुष्य को पूरी तरह से बचा लिया जाएगा। और इसलिए, विजय का कार्य शैतान के विरुद्ध युद्ध में अंतिम कार्य है, और शैतान की पराजय के वास्ते परमेश्वर के प्रबंधन में अंतिम चरण है। इस कार्य के बिना, मनुष्य का सम्पूर्ण उद्धार अन्ततः असंभव होगा, शैतान की सम्पूर्ण पराजय भी असंभव होगी, और मनुष्यजाति कभी भी अपनी अद्भुत मंज़िल में प्रवेश करने में, या शैतान के प्रभाव से छुटकारा पाने में सक्षम नहीं होगी। परिणामस्वरुप, शैतान के साथ युद्ध की समाप्ति से पहले मनुष्य के उद्धार के कार्य को समाप्त नहीं किया जा सकता है, क्योंकि परमेश्वर के प्रबधंन के कार्य का केन्द्रीय भाग मनुष्यजाति के उद्धार के वास्ते है।

2 अति आदिम मनुष्यजाति परमेश्वर के हाथों में थी, किन्तु शैतान के प्रलोभन और भ्रष्टता की वजह से, मनुष्य को शैतान के द्वारा बाँध लिया गया था और वह इस दुष्ट के हाथों में पड़ गया था। इसलिए यदि मनुष्य को बचाया जाना है, तो उसे शैतान के हाथों से वापस छीनना होगा, शैतान को मनुष्य के पुराने स्वभाव में बदलावों के माध्यम से पराजित किया जाना चाहिए, बदलाव जो उसकी मूल समझ को पुनः स्थापित करते हैं, और इस तरह से मनुष्य को, जिसे बन्दी बना लिया गया था, शैतान के हाथों से वापस छीना जा सकता है। यदि मनुष्य शैतान के प्रभाव और बंधन से मुक्त हो जाता है, तो शैतान शर्मिन्दा हो जाएगा, मनुष्य को अंततः वापस ले लिया जाएगा, और शैतान को हरा दिया जाएगा। और क्योंकि मनुष्य को शैतान के अंधकारमय प्रभाव से मुक्त किया जा चुका है, इसलिए जब एक बार यह युद्ध समाप्त हो जाएगा तो मनुष्य इस सम्पूर्ण युद्ध में जीत के परिणामस्वरूप प्राप्त हुआ लाभ बन जाएगा, और शैतान वह लक्ष्य बन जाएगा जिसे दण्डित किया जाएगा, जिसके पश्चात् मनुष्यजाति के उद्धार का सम्पूर्ण कार्य पूरा कर लिया जाएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक अद्भुत मंज़िल पर ले जाना" से रूपांतरित

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