738 परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए तुम्हें उसके मानक को समझना चाहिए

1

अपने निष्कर्ष तय करने से पहले तुम,

अपने बारे में ईश्वर के विचारों को समझो।

पता लगाओ वो क्या सोचता है, तब तय करो सही है या नहीं तुम्हारी सोच।

कितने कष्ट सहे उससे या समय से, ईश्वर मापता नहीं किसी के परिणाम।

ईश्वर के मानक के अनुरूप नहीं जो,

इंसानी धारणा और कल्पना से आता वो।

अगर तुम अपनी सोच बदल दो, पहले के गलत विचार सही कर लो,

अब से ईश्वर का भय मानो, बुराई से दूर रहो,

हर चीज़ में ईश्वर का सम्मान करो,

अगर ईश्वर और खुद को बयाँ करने वाले

अपने विश्वासों, कल्पनाओं, धारणाओं से दूर रहो,

अगर उसके इरादों को खोजो, इंसान के प्रति उसके रवैये को समझो,

उसकी संतुष्टि के लिए उसके मानक पूरे करो, तो कमाल हो जाएगा,

ये दिखाएगा कि तुम ईश्वर का भय मानने और

बुराई से दूर रहने के मार्ग पर चल पड़े हो।

2

अगर अपनी धारणाओं, कल्पनाओं पर अड़ोगे,

तो ईश्वर ठुकरा देगा तुम्हें।

क्योंकि तुम उसके आगे अपनी योग्यताओं पर इतराते हो,

उससे बराबरी और बहस करते हो।

तुम उसकी इच्छा को, इंसान के प्रति

उसके रवैये को, जानने की कोशिश नहीं करते।

अगर तुम इस मार्ग पर चलते हो, तो खुद को सबसे ऊपर रखते हो।

इससे ईश्वर का न मान बढ़े, न सम्मान।

तुम ईश्वर में नहीं, खुद में आस्था रखते हो।

नहीं चाहता इन लोगों को ईश्वर, नहीं करेगा उनका उद्धार ईश्वर।

अगर तुम अपनी सोच बदल दो, पहले के गलत विचार सही कर लो,

अब से ईश्वर का भय मानो, बुराई से दूर रहो,

हर चीज़ में ईश्वर का सम्मान करो,

अगर ईश्वर और खुद को बयाँ करने वाले

अपने विश्वासों, कल्पनाओं, धारणाओं से दूर रहो,

अगर उसके इरादों को खोजो, इंसान के प्रति उसके रवैये को समझो,

उसकी संतुष्टि के लिए उसके मानक पूरे करो, तो कमाल हो जाएगा,

ये दिखाएगा कि तुम ईश्वर का भय मानने और

बुराई से दूर रहने के मार्ग पर चल पड़े हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें' से रूपांतरित

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