737 मनुष्य के पास परमेश्वर का भय मानने वाला हृदय होना चाहिए

1 परमेश्वर के सार का एक हिस्सा प्रेम है, और वह हर एक के प्रति दयावान है, फिर भी लोग उस बात की अनदेखी करते हैं और उसे भूल जाते हैं कि उसका सार महिमा भी है। मैं तुम लोगों में से हर एक से उसके कार्यकलापों में सावधान और विवेकी होने का आग्रह करता हूँ। अपने बोलने में सावधान और विवेकी रहो। और जिस तरह तुम लोग परमेश्वर के साथ व्यवहार करते हो उसके बारे में, तुम लोग जितना अधिक सावधान और विवेकी रहते हो, उतना ही बेहतर है! जब तुम्हारी समझ में नहीं आता है कि परमेश्वर की प्रवृत्ति क्या है, तो लापरवाही से बात मत करो, अपने कार्यकलापों में लापरवाह मत बनो, और लापरवाही से उपनाम मत रखो। इससे भी अधिक, मनमाने ढंग से निष्कर्षों पर मत पहुँचो। इसके बजाय, तुम्हें प्रतीक्षा और खोज करनी चाहिए; यह भी परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने की अभिव्यक्ति है।

2 यदि तुम सब बातों से बढ़कर इस स्थिति को प्राप्त कर सकते हो, और सब से बढ़कर इस प्रवृत्ति को धारण कर सकते हो, तब परमेश्वर तुम्हारी मूर्खता, तुम्हारी अज्ञानता, और तर्कहीनता के लिए तुम्हें दोष नहीं देगा। इसके बजाय, परमेश्वर को अपमानित करने के तुम्हारे भय, परमेश्वर के इरादों के प्रति तुम्हारे सम्मान, और परमेश्वर का आज्ञापालन करने की तुम्हारी तत्परता की प्रवृत्ति के कारण, परमेश्वर तुम्हें स्मरण करेगा, तुम्हारा मार्गदर्शन करेगा और तुम्हें प्रबुद्धता देगा, या तुम्हारी अपरिपक्वता और अज्ञानता को सहन करेगा। इसके विपरीत, यदि उसके प्रति तुम्हारी प्रवृत्ति श्रद्धा विहीन होती है—मनमाने ढंग से परमेश्वर की आलोचना करना, मनमाने ढंग से परमेश्वर के विचारों का अनुमान लगाना और उन्हें परिभाषित करना—तो परमेश्वर तुम्हें अपराधी ठहराएगा, अनुशासित करेगा, और यहाँ तक कि दण्ड भी देगा; या वह तुम्हें कोई कथन कहेगा। कदाचित् यह कथन तुम्हारे परिणाम को सम्मिलित करता हो।

3 इसलिए, मैं एक बार फिर से इस पर जोर देना चाहता हूँ: हर वह चीज़ जो परमेश्वर की ओर से आती है उसके प्रति तुम्हें सावधान और विवेकी रहना चाहिए। लापरवाही से मत बोलो, और अपने कार्यकलापों में लापरवाह मत रहो। इससे पहले कि तुम कुछ कहो, तुम्हें सोचना चाहिए: क्या ऐसा करना परमेश्वर को क्रोधित करेगा? क्या ऐसा करना परमेश्वर का भय मानना है? यहाँ तक कि साधारण मामलों में भी, तुम्हें वास्तव में तब भी इन प्रश्नों को समझना चाहिए, और वास्तव में उन पर विचार करना चाहिए। यदि तुम हर जगह, सभी चीज़ों में, और हर समय, इन सिद्धान्तों के अनुसार सचमुच में अभ्यास कर सकते हो, विशेषरूप से उन मामलों के संबंध से जो तुम्हारी समझ में नहीं आते हैं, तो परमेश्वर हमेशा तुम्हारा मार्गदर्शन करेगा, और तुम्हें हमेशा अनुसरण करने के लिए एक मार्ग देगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य के परिणाम को कैसे जानें" से रूपांतरित

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