104 मैं परमेश्वर की उपस्थिति में जीता/जीती हूं

मैं परमेश्वर की उपस्थिति में जीता/जीती हूँ।

उसकी ओर देखता/देखती हूँ मैं,

उस पर निर्भरता पर है मुझे विश्वास।

हर व्यक्ति और चीज़ जो हम देखते हैं,

परमेश्वर के हाथों से बनाई गई हैं।

मैं परमेश्वर की उपस्थिति में जीता/जीती हूँ,

हाँ, मैं परमेश्वर की उपस्थिति में जीता/जीती हूँ!

मैं परमेश्वर की उपस्थिति में जीता/जीती हूँ,

हर दिन उसके वचन मैं पढ़ता/पढ़ती हूं।

अपनी वास्तविक स्थिति के प्रकाश में जो सत्य छुपा हुआ है

उस पर मैं विचार करता/करती हूँ।

विचार करने पर ही केवल

मैं अपने सच्चे रंग देख सकता/सकती हूं।

अभिमानी, स्वार्थी और चालाक हूँ मैं।

मनुष्य को जैसा होना चाहिए,

मैं वैसा/वैसी नहीं हूँ।

इस सबने मुझे बना दिया है शैतान की तरह।

मैं अपने दूषित स्वभाव से घृणा करता/करती हूँ,

न्याय के सामने झुकता/झुकती हूँ,

अपने स्वभाव को बदलना चाहता/चाहती हूँ।

परमेश्वर के वचन ले जाते हैं मुझे सही राह पर।

यह है परमेश्वर का अनुग्रह!

मैं परमेश्वर की उपस्थिति में जीता/जीती हूँ।

हर चीज़ में उसकी इच्छा की खोज करता/करती हूं।

जितनी कम हो मनुष्य के विचारों से अनुरूपता, उतना ही ज़्यादा पाया जा सकता है सत्य।

मैं परमेश्वर की उपस्थिति में जीता/जीती हूँ,

हां, मैं परमेश्वर की उपस्थिति में जीता/जीती हूँ!

अगर हम करते हैं शिकायत और अवज्ञा,

तो हम बिना सत्य के लोगों के रूप में हो जाएंगे बेनक़ाब।

केवल सत्य और परमेश्वर की इच्छा के लिए प्रयास करके ही

हम वास्तव में देख पाएंगे उसे आमने-सामने।

मैं परमेश्वर की उपस्थिति में जीता/जीती हूँ,

निरंतर उसकी निगरानी में रहता/रहती हूँ।

उसके वचन मेरे कार्यों और मेरे विचारों को करते हैं बेनक़ाब,

करते हैं उनका न्याय।

मैं परमेश्वर की उपस्थिति में जीता/जीती हूँ,

हां, मैं परमेश्वर की उपस्थिति में जीता/जीती हूँ!

मेरा दिल श्रद्धा से भर गया है।

मैं हूँ परमेश्वर की सुरक्षा में,

कभी फिर न करूंगा/करूंगी उसका अपमान।

जो परमेश्वर से करता है भय,

रहता है बुराई से दूर,

वही है सबसे बुद्धिमान।

परमेश्वर के शुद्धिकरण से,

मैं चखता/चखती हूँ उसकी धार्मिकता का प्यारा स्वाद।

मैं परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करता/करती हूं,

सच्चाई पर भरोसा करता/करती हूं,

उससे प्रेम करता/करती हूँ,

उसकी आज्ञा मानता/मानती हूँ।

मैं परमेश्वर की उपस्थिति में जीता/जीती हूँ,

मोक्ष के मार्ग पर चलते हुए।

स्वभाव मेरा बदल गया है,

यह है सबसे बड़ा आशीष!

मैं परमेश्वर की उपस्थिति में जीता/जीती हूँ,

निरंतर उसकी निगरानी में रहता/रहती हूँ।

हालांकि न्याय दर्दनाक होता है,

मेरे पापी विचार हो गए हैं शांत।

मैं परमेश्वर की उपस्थिति में जीता/जीती हूँ,

हाँ, मैं परमेश्वर की उपस्थिति में जीता/जीती हूँ

निरंतर उसकी निगरानी में रहता/रहती हूँ।

हालांकि न्याय दर्दनाक होता है,

मेरे पापी विचार हो गए हैं शांत।

मैं परमेश्वर की उपस्थिति में जीता/जीती हूँ,

हां, मैं परमेश्वर की उपस्थिति में जीता/जीती हूँ!

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