प्रश्न: प्रभु यीशु कहते हैं: "मेरी भेड़ें मेरा शब्द सुनती हैं" (यूहन्ना 10:27)। तब समझ आया कि प्रभु अपनी भेड़ों को बुलाने के लिए वचन बोलने को लौटते हैं। प्रभु के आगमन की प्रतीक्षा से जुड़ी सबसे महत्वपूर्ण बात है, प्रभु की वाणी सुनने की कोशिश करना। लेकिन अब, सबसे बड़ी मुश्किल ये है कि हमें नहीं पता कि प्रभु की वाणी कैसे सुनें। हम परमेश्वर की वाणी और मनुष्य की आवाज़ के बीच भी अंतर नहीं कर पाते हैं। कृपया हमें बताइये कि हम प्रभु की वाणी की पक्की पहचान कैसे करें।

उत्तर: हम परमेश्वर की वाणी कैसे सुनते हैं? हममें कितने भी गुण हों, हमें कितना भी अनुभव हो, उससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। प्रभु यीशु में विश्वास करते हुए, उनके कई वचन सुनकर हमें कैसा लगता है? हालांकि हमें प्रभु के वचनों का कोई अनुभव या ज्ञान नहीं है, लेकिन उन्हें सुनते ही लगता है कि वे सत्य हैं, उनमें सामर्थ्य और अधिकार है। यह एहसास कैसे होता है? क्या ऐसा हमारे अनुभव के कारण होता है? ये प्रभाव है प्रेरणा और सहज बोध का। इससे साबित होता है कि सच्चे हृदय वाले लोग महसूस कर सकते हैं कि परमेश्वर के वचनों में सामर्थ्य और अधिकार होता है, ऐसा परमेश्वर की वाणी सुनने पर होता है। देखिए, परमेश्वर की वाणी और मनुष्य की आवाज़ में सबसे बड़ा अंतर ये होता है कि परमेश्वर की वाणी सत्य है, उसमें सामर्थ्य और अधिकार है, और उसे सुनते ही हम उसे महसूस कर सकते हैं। हम इसे शब्दों में बयां कर पाएं या नहीं, इसका अनुभव स्पष्ट होता है। मनुष्य की आवाज़ को पहचानना आसान है। इसे सुनते ही लगता है कि हम इसे समझ सकते हैं। लेकिन मनुष्य की आवाज में हमें ज़रा सा भी सामर्थ्य या अधिकार महसूस नहीं होता, और उसमें सत्य की मात्रा तो और भी कम होती है। परमेश्वर के वचनों और मनुष्य के शब्दों के बीच सबसे बड़ा अंतर यही है। उदाहरण के लिए, हम देखते हैं कि प्रभु यीशु के वचनों में अधिकार भी है और सामर्थ्य भी, उसे सुनते ही हम कह सकते हैं कि ये सत्य है, उनका अर्थ गहरा, रहस्यमय और मनुष्य की क्षमता से बाहर है। आइये, अब हम बाइबल में प्रेरितों के शब्दों पर नज़र डालें। हालांकि इनमें से ज़्यादातर पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता से उत्पन्न हुए हैं, लेकिन इनमें कोई अधिकार या सामर्थ्य नहीं हैं। ये सिर्फ सही शब्द हैं, लोगों को लाभ पहुंचाने वाले शब्दों के अतिरिक्त और कुछ नहीं। इस पर भी चर्चा करते हैं, प्रभु यीशु ने जो वचन बोले, क्या कोई इंसान भी उन्हें बोल सकता है? उन्हें कोई नहीं बोल सकता। यानी प्रभु यीशु के वचन परमेश्वर की वाणी है। इस तरह की तुलनाएं करके, क्या हम परमेश्वर की वाणी और मनुष्य की आवाज़ के बीच अंतर नहीं कर सकते?

आइये अब हम सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कुछ वचनों को पढ़ें, सुनते हैं कि क्या सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन सचमुच सत्य और परमेश्वर की वाणी हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं: "मैं पूरे ब्रह्मांड में अपना कार्य कर रहा हूँ, और पूरब से असंख्य गर्जनाएं निरंतर गूँज रही हैं, जो सभी राष्ट्रों और संप्रदायों को झकझोर रही हैं। यह मेरी वाणी है जो सभी मनुष्यों को वर्तमान में लाई है। मैं अपनी वाणी से सभी मनुष्यों को जीत लूँगा, उन्हें इस धारा में बहाऊँगा और अपने सामने समर्पण करवाऊँगा, क्योंकि मैंने बहुत पहले पूरी पृथ्वी से अपनी महिमा को वापस लेकर इसे नये सिरे से पूरब में जारी किया है। भला कौन मेरी महिमा को देखने के लिए लालायित नहीं है? कौन बेसब्री से मेरे लौटने का इंतज़ार नहीं कर रहा है? किसे मेरे पुनः प्रकटन की प्यास नहीं है? कौन मेरी सुंदरता को देखने के लिए तरस नहीं रहा है? कौन प्रकाश में नहीं आना चाहता? कौन कनान की समृद्धि को नहीं देखना चाहता? किसे उद्धारकर्ता के लौटने की लालसा नहीं है? कौन महान सर्वशक्तिमान की आराधना नहीं करता है? मेरी वाणी पूरी पृथ्वी पर फैल जाएगी; मैं चाहता हूँ कि अपने चुने हुए लोगों के समक्ष मैं और अधिक वचन बोलूँ। मैं पूरे ब्रह्मांड के लिए और पूरी मानवजाति के लिए अपने वचन बोलता हूँ, उन शक्तिशाली गर्जनाओं की तरह जो पर्वतों और नदियों को हिला देती हैं। इस प्रकार, मेरे मुँह से निकले वचन मनुष्य का खज़ाना बन गए हैं, और सभी मनुष्य मेरे वचनों को सँजोते हैं। बिजली पूरब से चमकते हुए दूर पश्चिम तक जाती है। मेरे वचन ऐसे हैं कि मनुष्य उन्हें छोड़ना बिलकुल पसंद नहीं करता, पर साथ ही उनकी थाह भी नहीं ले पाता, लेकिन फिर भी उनमें और अधिक आनंदित होता है। सभी मनुष्य खुशी और आनंद से भरे होते हैं और मेरे आने की खुशी मनाते हैं, मानो किसी शिशु का जन्म हुआ हो। अपनी वाणी के माध्यम से मैं सभी मनुष्यों को अपने समक्ष ले आऊँगा। उसके बाद, मैं औपचारिक तौर पर मनुष्य जाति में प्रवेश करूँगा ताकि वे मेरी आराधना करने लगें। मुझमें से झलकती महिमा और मेरे मुँह से निकले वचनों से, मैं ऐसा करूँगा कि सभी मनुष्य मेरे समक्ष आएंगे और देखेंगे कि बिजली पूरब से चमकती है और मैं भी पूरब में 'जैतून के पर्वत' पर अवतरित हो चुका हूँ। वे देखेंगे कि मैं बहुत पहले से पृथ्वी पर मौजूद हूँ, यहूदियों के पुत्र के रूप में नहीं, बल्कि पूरब की बिजली के रूप में। क्योंकि बहुत पहले मेरा पुनरुत्थान हो चुका है, और मैं मनुष्यों के बीच से जा चुका हूँ, और फिर अपनी महिमा के साथ लोगों के बीच पुनः प्रकट हुआ हूँ। मैं वही हूँ जिसकी आराधना असंख्य युगों पहले की गई थी, और मैं वह शिशु भी हूँ जिसे असंख्य युगों पहले इस्राएलियों ने त्याग दिया था। इसके अलावा, मैं वर्तमान युग का संपूर्ण-महिमामय सर्वशक्तिमान परमेश्वर हूँ! सभी लोग मेरे सिंहासन के सामने आएँ और मेरे महिमामयी मुखमंडल को देखें, मेरी वाणी सुनें और मेरे कर्मों को देखें। यही मेरी संपूर्ण इच्छा है; यही मेरी योजना का अंत और उसका चरमोत्कर्ष है, यही मेरे प्रबंधन का उद्देश्य भी है। सभी राष्ट्र मेरी आराधना करें, हर ज़बान मुझे स्वीकार करे, हर मनुष्य मुझमें आस्था रखे और सभी लोग मेरी अधीनता स्वीकार करें!" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'सात गर्जनाएँ गूँजती हैं—भविष्यवाणी करती हैं कि राज्य के सुसमाचार पूरे ब्रह्मांड में फैल जाएँगे')।

"जैसे ही मैं बोलने के लिए ब्रह्माण्ड की तरफ अपना चेहरा घुमाता हूँ, सारी मानवजाति मेरी आवाज़ सुनती है, और उसके उपरांत उन सभी कार्यों को देखती है जिन्हें मैंने समूचे ब्रह्माण्ड में गढ़ा है। वे जो मेरी इच्छा के विरूद्ध खड़े होते हैं, अर्थात् जो मनुष्य के कर्मों से मेरा विरोध करते हैं, वे मेरी ताड़ना के अधीन आएँगे। मैं स्वर्ग के असंख्य तारों को लूँगा और उन्हें फिर से नया कर दूँगा, और, मेरी बदौलत, सूर्य और चन्द्रमा नये हो जाएँगे—आकाश अब और वैसा नहीं रहेगा जैसा वह था और पृथ्वी पर बेशुमार चीज़ों को फिर से नया बना दिया जाएगा। मेरे वचनों के माध्यम से सभी पूर्ण हो जाएँगे। ब्रह्माण्ड के भीतर अनेक राष्ट्रों को नए सिरे से बाँटा जाएगा और उनका स्थान मेरा राज्य लेगा, जिससे पृथ्वी पर विद्यमान राष्ट्र हमेशा के लिए विलुप्त हो जाएँगे और एक राज्य बन जाएँगे जो मेरी आराधना करता है; पृथ्वी के सभी राष्ट्रों को नष्ट कर दिया जाएगा और उनका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। ब्रह्माण्ड के भीतर मनुष्यों में से उन सभी का, जो शैतान से संबंध रखते हैं, सर्वनाश कर दिया जाएगा, और वे सभी जो शैतान की आराधना करते हैं उन्हें मेरी जलती हुई आग के द्वारा धराशायी कर दिया जायेगा—अर्थात उनको छोड़कर जो अभी धारा के अन्तर्गत हैं, शेष सभी को राख में बदल दिया जाएगा। जब मैं बहुत-से लोगों को ताड़ना देता हूँ, तो वे जो धार्मिक संसार में हैं, मेरे कार्यों के द्वारा जीते जाने के उपरांत, भिन्न-भिन्न अंशों में, मेरे राज्य में लौट आएँगे, क्योंकि उन्होंने एक श्वेत बादल पर सवार पवित्र जन के आगमन को देख लिया होगा। सभी लोगों को उनकी किस्म के अनुसार अलग-अलग किया जाएगा, और वे अपने-अपने कार्यों के अनुरूप ताड़नाएँ प्राप्त करेंगे। वे सब जो मेरे विरुद्ध खड़े हुए हैं, नष्ट हो जाएँगे; जहाँ तक उनकी बात है, जिन्होंने पृथ्वी पर अपने कर्मों में मुझे शामिल नहीं किया है, उन्होंने जिस तरह अपने आपको दोषमुक्त किया है, उसके कारण वे पृथ्वी पर मेरे पुत्रों और मेरे लोगों के शासन के अधीन निरन्तर अस्तित्व में बने रहेंगे। मैं अपने आपको असंख्य लोगों और असंख्य राष्ट्रों के सामने प्रकट करूँगा, और अपनी वाणी से, पृथ्वी पर ज़ोर-ज़ोर से और ऊंचे तथा स्पष्ट स्वर में, अपने महा कार्य के पूरे होने की उद्घोषणा करूँगा, ताकि समस्त मानवजाति अपनी आँखों से देखे।

... जब मैंने संसार की सृष्टि की थी, मैंने सभी चीज़ों को उनकी किस्म के अनुसार ढाला था, रूपाकृतियों वाली सभी चीज़ों को उनकी किस्म के अनुसार एक साथ रखा था। मेरी प्रबन्धन योजना का अंत ज्यों-ज्यों नज़दीक आएगा, मैं सृष्टि की पूर्व दशा बहाल कर दूँगा, मैं प्रत्येक चीज़ को पूर्णतः बदलते हुए हर चीज़ को उसी प्रकार बहाल कर दूँगा जैसी वह मूलतः थी, जिससे हर चीज़ मेरी योजना के आलिंगन में लौट आएगी। समय आ चुका है! मेरी योजना का अंतिम चरण संपन्न होने वाला है। आह, पुराना अस्वच्छ संसार! तू पक्का मेरे वचनों के अधीन आएगा! तू पक्का मेरी योजना के द्वारा अस्तित्वहीन हो जाएगा! आह, सृष्टि की अनगिनत चीज़ो! तुम सब मेरे वचनों के भीतर नया जीवन प्राप्त करोगी—तुम्हारे पास तुम्हारा सार्वभौम प्रभु होगा! आह, शुद्ध और निष्कलंक नये संसार! तू पक्का मेरी महिमा के भीतर पुनर्जीवित होगा! आह, सिय्योन पर्वत! अब और मौन मत रह। मैं विजयोल्लास के साथ लौट आया हूँ! सृष्टि के बीच से, मैं समूची पृथ्वी को बारीक़ी से देखता हूँ। पृथ्वी पर मानवजाति ने नए जीवन की शुरुआत की है, और नई आशा जीत ली है। आह, मेरे लोगो! ऐसा कैसे हो सकता है कि तुम लोग मेरे प्रकाश के भीतर पुनर्जीवित न हो? ऐसा कैसे हो सकता है कि तुम लोग मेरे मार्गदर्शन के अधीन आनन्द से न उछलो? भूमि उल्लास से चिल्ला रही है, समुद्र उल्लासपूर्ण हंसी से उफन रहे हैं! आह, पुनर्जीवित इस्राएल! मेरे द्वारा पूर्वनियत किए जाने की वजह से तुम कैसे गर्व महसूस नहीं कर सकते हो? कौन रोया है? किसने विलाप किया है? पहले का इस्राएल समाप्त हो गया है, और आज के इस्राएल का उदय हुआ है, जो संसार में सीधा और बहुत ऊँचा खड़ा है, और समस्त मानवता के हृदय में तनकर डटा हुआ है। आज का इस्राएल मेरे लोगों के माध्यम से अस्तित्व का स्रोत निश्चित रूप से प्राप्त करेगा! आह, घृणास्पद मिस्र! निश्चित रूप से तू अब भी मेरे विरुद्ध खड़ा तो नहीं है? तू कैसे मेरी दया का लाभ उठा सकता है और मेरी ताड़ना से बचने की कोशिश कर सकता है? ऐसा कैसे हो सकता है कि तू मेरी ताड़ना के के दायरे में विद्यमान न हो? वे सभी जिनसे मैं प्रेम करता हूँ, निश्चय ही अनन्त काल तक जीवित रहेंगे, और वे सभी जो मेरे विरुद्ध खड़े हैं, निश्चय ही अनन्त काल तक मेरे द्वारा ताड़ित किए जाएँगे। क्योंकि मैं एक ईर्ष्यालु परमेश्वर हूँ, मनुष्यों ने जो किया है, उस सबके लिए उन्हें हल्के में नहीं छोडूँगा। मैं पूरी पृथ्वी पर निगरानी रखूँगा, और धार्मिकता, प्रताप, कोप और ताड़ना के साथ संसार के पूर्व में प्रकट होते हुए, मानवजाति के असंख्य समुदायों के समक्ष स्वयं को उजागर करूँगा!" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन' के 'अध्याय 26')।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों को पढ़कर सबके मन में एक समान भावनाएं जागती हैं। सबको लगता है कि परमेश्वर इंसान से बात कर रहे हैं। परमेश्वर के अलावा, क्या हम सभी इंसानों से बात कर सकते हैं? मनुष्य को बचाने की परमेश्वर की इच्छा, मनुष्य को कौन बता सकता है? कौन मानवजाति को यह बता सकता है कि अंत के दिनों का कार्य करने की परमेश्वर की योजना क्या है, मानवजाति का परिणाम और मंज़िल क्या है? परमेश्वर की प्रबंधन योजना के बारे में पूरी दुनिया को भला कौन बता सकता है? परमेश्वर के अलावा कोई नहीं बता सकता। सर्वशक्तिमान परमेश्वर पूरी मानव जाति से बात करते हैं, वे मनुष्य को परमेश्वर के वचनों के सामर्थ्य और अधिकार का अहसास कराते हैं, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन, परमेश्वर की सीधी अभिव्यक्ति हैं, ये परमेश्वर की वाणी हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा बोले गए सभी वचन, ऐसे हैं जैसे परमेश्वर तीसरे स्वर्ग में खड़े होकर पूरी मानव जाति से कह रहे हों, यहां सर्वशक्तिमान परमेश्वर एक सर्जक के रूप में मनुष्य से बातचीत कर रहे हैं, वे अपनी धार्मिकता और महिमा के निरपराध स्वभाव को मानव के सामने प्रकट कर रहे हैं। जब परमेश्वर की भेड़ें सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन सुनती हैं, तो वे शुरू में उसमें छिपे सत्य को नहीं पहचानती, उन्हें इसका अनुभव भी नहीं होता, लेकिन उन्हें सर्वशक्तिमान परमेश्वर के हर वचन के सामर्थ्य और अधिकार का अहसास हो जाता है, वे पुष्टि कर सकती हैं कि ये परमेश्वर की वाणी है और परमेश्वर की आत्मा की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है। परमेश्वर के चुने हुए लोगों को केवल परमेश्वर के वचन सुन कर उनकी पुष्टि, परमेश्वर की वाणी के रूप में करनी होती है। तो फिर धार्मिक पंथ के पादरी और एल्डर सर्वशक्तिमान परमेश्वर की निंदा क्यों करते हैं? जहां तक मसीह विरोधियों का सवाल है, जो परमेश्वर के देहधारण को नहीं पहचानते, और ये नहीं मानते कि परमेश्वर सत्य कह सकते हैं, हालांकि उन्हें परमेश्वर के बोले सभी वचन सत्य दिखार्इ देते हैं, और उनके वचनों में सामर्थ्य और अधिकार का आभास होता है, फिर भी वे नहीं मानते कि परमेश्वर इस तरह बोल सकते हैं। वे ये भी नहीं मानते कि परमेश्वर सब कुछ सत्य ही बोलते हैं। ये समस्या क्या है? क्या आप बता सकती हैं? अंत के दिनों देहधारी सर्वशक्तिमान परमेश्वर समस्त मानव जाति से बात करते हैं, लेकिन हममें से कितने लोग परमेश्वर की वाणी सुन पाते हैं? वर्तमान में ऐसे बहुत से धार्मिक पंथ हैं जो सर्वशक्तिमान परमेश्वर को बोलते देख पाते हैं, फिर भी सुन कर समझ नहीं पाते कि ये परमेश्वर की वाणी है, वे परमेश्वर के बोले वचनों को भी इंसान के शब्द समझते हैं, और इंसान के ही नजरिये से परमेश्वर से जुड़े निर्णय लेते हैं, उनका अपमान और उनकी निंदा करते हैं। क्या इनके दिलों में परमेश्वर का डर है? क्या ये अतीत के फरीसियों जैसे ही नहीं हैं? ये सभी सत्य से घृणा और परमेश्वर की निंदा करते हैं। परमेश्वर के वचनों में अधिकार है, सामर्थ्य है, और ऐसे लोगों को जरा भी आभास नहीं होता कि ये वचन परमेश्वर की वाणी हैं। क्या ऐसे लोग परमेश्वर की भेड़ें हो सकते हैं? इनके हृदय भावनाहीन हैं, ये सुनते तो हैं, पर जानते नहीं, ये देखते हैं, पर समझते नहीं। ऐसे लोग स्वर्गारोहण की आशा कैसे कर सकते हैं? अंत के दिनों के देहधारी परमेश्वर ने सत्य को अभिव्यक्त किया है, धार्मिक मंडलियों के लोगों को उजागर किया है, सच्चे विश्वासी और झूठे विश्वासी, सत्य से प्रेम करने वाले, और सत्य से घृणा करने वाले, बुद्धिमान और मूर्ख कुंवारियां, ये सभी लोग स्वाभाविक रूप से, अलग-अलग समूहों में बंटे हुए हैं। जैसा कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं: "सभी दुष्ट लोगों को परमेश्वर के मुँह से बोले गए वचनों से ताड़ित किया जाएगा, और सभी धार्मिक लोग उसके मुँह से बोले गए वचनों से धन्य होंगे ..." ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'सहस्राब्दि राज्य आ चुका है')। इसलिए, जो लोग परमेश्वर की वाणी सुन सकते हैं, वे प्रभु के दूसरे आगमन के गवाह हैं, वे परमेश्वर के सिहांसन के आगे स्वर्गारोहित हो चुके हैं, और मेमने के विवाह भोज में शामिल हो रहे हैं। ये लोग बुद्धिमान कुंवारियां हैं, और सबसे भाग्यशाली मनुष्य हैं।

हमें परमेश्वर की वाणी अपने दिल और आत्मा की गहराइयों से सुननी चाहिए। एक समान विचारों वाले लोग एक दूसरे को आसानी से समझ पाते हैं। परमेश्वर के वचन सत्य हैं, उनमें सामर्थ्य और अधिकार होता है, दिल और आत्मा की गहराइयों से सुनाने वाले निश्चित ही इसे महसूस कर सकते हैं। जिन लोगों ने सिर्फ कुछ दिन ही सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों को पढ़ा है, वे भी यह पुष्टि कर सकते हैं कि ये परमेश्वर की वाणी और उनके वचन हैं। हर बार जब परमेश्वर देहधारण करते हैं, वे अपने कार्य का एक चरण पूरा करने आते हैं, पैगम्बरों के विपरीत, जो परमेश्वर के निर्देशानुसार सिर्फ एक खास संदर्भ में कुछ शब्द ही कहते हैं। जब परमेश्वर अपने कार्य का एक चरण पूरा करने के लिए देहधारण करते हैं, तो उन्हें अनेक वचन, अनेक सत्य बोलने होते हैं, उन्हें रहस्योंद्घाटन और भविष्यवाणियां करनी होती हैं। ऐसा होने में कर्इ वर्ष या दशक लग सकते हैं। उदाहरण के लिए, छुटकारे के कार्य में, प्रभु यीशु ने पहले उपदेश दिया था, "मन फिराओ, क्योंकि स्वर्ग का राज्य निकट आ गया है" (मत्ती 4:17)। उन्होंने मनुष्य को अपराध स्वीकार करना, पश्चाताप करना, क्षमा करना, कष्ट सहना, अपनी तकलीफें खुद उठाना सिखाया, और वो सब सिखाया जिसका किसी मनुष्य को अनुग्रह के युग में पालन करना होगा। उन्होंने प्रेम और दया रूपी परमेश्वर के स्वभाव को प्रदर्शित किया, साथ ही, उन्होंने स्वर्ग के राज्य के रहस्यों और उसमें हमारे प्रवेश से जुड़ी शर्तों को उजागर किया। उनके सलीब पर चढ़ाए जाने, उनके पुर्नजन्म और उनके स्वर्ग में पहुंचने के बाद ही, परमेश्वर का छुटकारे का कार्य पूरा हुआ। प्रभु यीशु द्वारा बोले गए वचन सत्य हैं, जिन्हें परमेश्वर ने अपने छुटकारे के कार्य के दौरान मनुष्य को उपहार स्वरूप दिया है। अंत के दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर आए और उन्होंने मनुष्य को शुद्ध करने और बचाने वाले सभी सत्य बोले। उन्होंने न्याय के कार्य की शुरूआत परमेश्वर के लोगों से की, और मानव को अपने निहित स्वभाव से परिचित कराया, जिसका महत्वपूर्ण बिंदु धार्मिकता है। उन्होंने 6 हजार साल लम्बी अपनी प्रबंधन योजना के सभी रहस्यों को खोला है। उन्होंने राज्य के युग का आरंभ और अनुग्रह के युग का अंत किया है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन, परमेश्वर के जीवन का सार हैं, और उनके स्वभाव की अभिव्यक्ति हैं। यह परमेश्वर अंत के दिनों के कार्य का पूरा एक चरण है जो वे मानव जाति के शुद्धिकरण और बचाव के लिए कर रहे हैं। आइये अब हम सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कुछ वचनों को पढ़ें, और सुनें कि क्या वह सत्य और परमेश्वर की वाणी हैं।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं: "वर्तमान देहधारण में परमेश्वर का कार्य मुख्य रूप से ताड़ना और न्याय के द्वारा अपने स्वभाव को व्यक्त करना है। इस नींव पर निर्माण करते हुए वह मनुष्य तक अधिक सत्य पहुँचाता है और उसे अभ्यास करने के और अधिक तरीके बताता है और ऐसा करके मनुष्य को जीतने और उसे उसके भ्रष्ट स्वभाव से बचाने का अपना उद्देश्य हासिल करता है। यही वह चीज़ है, जो राज्य के युग में परमेश्वर के कार्य के पीछे निहित है" ("वचन देह में प्रकट होता है" की 'प्रस्तावना')।

"अंत के दिनों में मसीह मनुष्य को सिखाने, उसके सार को उजागर करने और उसके वचनों और कर्मों की चीर-फाड़ करने के लिए विभिन्न प्रकार के सत्यों का उपयोग करता है। इन वचनों में विभिन्न सत्यों का समावेश है, जैसे कि मनुष्य का कर्तव्य, मनुष्य को परमेश्वर का आज्ञापालन किस प्रकार करना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार सामान्य मनुष्यता का जीवन जीना चाहिए, और साथ ही परमेश्वर की बुद्धिमत्ता और उसका स्वभाव, इत्यादि। ये सभी वचन मनुष्य के सार और उसके भ्रष्ट स्वभाव पर निर्देशित हैं। खास तौर पर वे वचन, जो यह उजागर करते हैं कि मनुष्य किस प्रकार परमेश्वर का तिरस्कार करता है, इस संबंध में बोले गए हैं कि किस प्रकार मनुष्य शैतान का मूर्त रूप और परमेश्वर के विरुद्ध शत्रु-बल है। अपने न्याय का कार्य करने में परमेश्वर केवल कुछ वचनों के माध्यम से मनुष्य की प्रकृति को स्पष्ट नहीं करता; बल्कि वह लंबे समय तक उसे उजागर करता है, उससे निपटता है और उसकी काट-छाँट करता है। उजागर करने, निपटने और काट-छाँट करने की इन विधियों को साधारण वचनों से नहीं, बल्कि उस सत्य से प्रतिस्थापित किया जा सकता है, जिसका मनुष्य में सर्वथा अभाव है। केवल इस तरह की विधियाँ ही न्याय कही जा सकती हैं; केवल इस तरह के न्याय द्वारा ही मनुष्य को वशीभूत और परमेश्वर के प्रति समर्पण के लिए पूरी तरह से आश्वस्त किया जा सकता है, और इतना ही नहीं, बल्कि मनुष्य परमेश्वर का सच्चा ज्ञान भी प्राप्त कर सकता है। न्याय का कार्य मनुष्य में परमेश्वर के असली चेहरे की समझ पैदा करने और उसकी स्वयं की विद्रोहशीलता का सत्य उसके सामने लाने का काम करता है। न्याय का कार्य मनुष्य को परमेश्वर की इच्छा, परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य और उन रहस्यों की अधिक समझ प्राप्त कराता है, जो उसकी समझ से परे हैं। यह मनुष्य को अपने भ्रष्ट सार तथा अपनी भ्रष्टता की जड़ों को जानने-पहचानने और साथ ही अपनी कुरूपता को खोजने का अवसर देता है। ये सभी परिणाम न्याय के कार्य द्वारा लाए जाते हैं, क्योंकि इस कार्य का सार वास्तव में उन सभी के लिए परमेश्वर के सत्य, मार्ग और जीवन का मार्ग प्रशस्त करने का कार्य है, जिनका उस पर विश्वास है। यह कार्य परमेश्वर के द्वारा किया जाने वाला न्याय का कार्य है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है')।

"अंत के दिन पहले ही आ चुके हैं। सृष्टि की सभी चीज़ें उनके प्रकार के अनुसार अलग की जाएँगी और उनकी प्रकृति के आधार पर विभिन्न श्रेणियों में विभाजित की जाएँगी। यही वह क्षण है, जब परमेश्वर लोगों के परिणाम और उनकी मंज़िल प्रकट करता है। यदि लोग ताड़ना और न्याय से नहीं गुज़रते, तो उनकी अवज्ञा और अधार्मिकता को उजागर करने का कोई तरीका नहीं होगा। केवल ताड़ना और न्याय के माध्यम से ही सभी सृजित प्राणियों का परिणाम प्रकट किया जा सकता है। मनुष्य केवल तभी अपने वास्तविक रंग दिखाता है, जब उसे ताड़ना दी जाती है और उसका न्याय किया जाता है। बुरे को बुरे के साथ रखा जाएगा, भले को भले के साथ, और समस्त मनुष्यों को उनके प्रकार के अनुसार अलग किया जाएगा। ताड़ना और न्याय के माध्यम से सभी सृजित प्राणियों का परिणाम प्रकट किया जाएगा, ताकि बुरे को दंडित किया जा सके और अच्छे को पुरस्कृत किया जा सके, और सभी लोग परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन हो जाएँ। यह समस्त कार्य धार्मिक ताड़ना और न्याय के माध्यम से पूरा करना होगा। चूँकि मनुष्य की भ्रष्टता अपने चरम पर पहुँच गई है और उसकी अवज्ञा अत्यंत गंभीर हो गई है, इसलिए केवल परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव ही, जो मुख्यत: ताड़ना और न्याय से संयुक्त है और अंत के दिनों में प्रकट होता है, मनुष्य को रूपांतरित कर सकता है और उसे पूर्ण बना सकता है। केवल यह स्वभाव ही बुराई को उजागर कर सकता है और इस तरह सभी अधार्मिकों को गंभीर रूप से दंडित कर सकता है। ... अंत के दिनों के दौरान, केवल धार्मिक न्याय ही मनुष्यों को उनके प्रकार के अनुसार पृथक् कर सकता है और उन्हें एक नए राज्य में ला सकता है। इस तरह, परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के धार्मिक स्वभाव के माध्यम से समस्त युग का अंत किया जाता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)')।

"क्या अब तुम समझ गए हो कि न्याय क्या है और सत्य क्या है? अगर तुम समझ गए हो, तो मैं तुम्हें न्याय किए जाने के लिए आज्ञाकारी ढंग से समर्पित होने की नसीहत देता हूँ, वरना तुम्हें कभी भी परमेश्वर द्वारा सराहे जाने या उसके द्वारा अपने राज्य में ले जाए जाने का अवसर नहीं मिलेगा। जो केवल न्याय को स्वीकार करते हैं लेकिन कभी शुद्ध नहीं किए जा सकते, अर्थात् जो न्याय के कार्य के बीच से ही भाग जाते हैं, वे हमेशा के लिए परमेश्वर की घृणा के शिकार हो जाएँगे और नकार दिए जाएँगे। फरीसियों के पापों की तुलना में उनके पाप संख्या में बहुत अधिक और ज्यादा संगीन हैं, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर के साथ विश्वासघात किया है और वे परमेश्वर के प्रति विद्रोही हैं। ऐसे लोग, जो सेवा करने के भी योग्य नहीं हैं, अधिक कठोर दंड प्राप्त करेंगे, जो चिरस्थायी भी होगा। परमेश्वर ऐसे किसी भी गद्दार को नहीं छोड़ेगा, जिसने एक बार तो वचनों से वफादारी दिखाई, मगर फिर परमेश्वर को धोखा दे दिया। ऐसे लोग आत्मा, प्राण और शरीर के दंड के माध्यम से प्रतिफल प्राप्त करेंगे। क्या यह हूबहू परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव का प्रकटन नहीं है? क्या मनुष्य का न्याय करने और उसे उजागर करने में परमेश्वर का यह उद्देश्य नहीं है? परमेश्वर उन सभी को, जो न्याय के समय के दौरान सभी प्रकार के दुष्ट कर्म करते हैं, दुष्टात्माओं से आक्रांत स्थान पर भेजता है, और उन दुष्टात्माओं को इच्छानुसार उनके दैहिक शरीर नष्ट करने देता है, और उन लोगों के शरीरों से लाश की दुर्गंध निकलती है। ऐसा उनका उचित प्रतिशोध है। परमेश्वर उन निष्ठाहीन झूठे विश्वासियों, झूठे प्रेरितों और झूठे कार्यकर्ताओं का हर पाप उनकी अभिलेख-पुस्तकों में लिखता है; और फिर जब सही समय आता है, वह उन्हें गंदी आत्माओं के बीच में फेंक देता है, और उन अशुद्ध आत्माओं को इच्छानुसार उनके संपूर्ण शरीरों को दूषित करने देता है, ताकि वे कभी भी पुन: देहधारण न कर सकें और दोबारा कभी भी रोशनी न देख सकें। वे पाखंडी, जो किसी समय सेवा करते हैं, किंतु अंत तक वफ़ादार बने रहने में असमर्थ रहते हैं, परमेश्वर द्वारा दुष्टों में गिने जाते हैं, ताकि वे दुष्टों की सलाह पर चलें, और उनकी उपद्रवी भीड़ का हिस्सा बन जाएँ; अंत में परमेश्वर उन्हें जड़ से मिटा देगा। परमेश्वर उन लोगों को अलग फेंक देता है और उन पर कोई ध्यान नहीं देता, जो कभी भी मसीह के प्रति वफादार नहीं रहे या जिन्होंने अपने सामर्थ्य का कुछ भी योगदान नहीं किया, और युग बदलने पर वह उन सभी को जड़ से मिटा देगा। वे अब और पृथ्वी पर मौजूद नहीं रहेंगे, परमेश्वर के राज्य का मार्ग तो बिलकुल भी प्राप्त नहीं करेंगे। जो कभी भी परमेश्वर के प्रति ईमानदार नहीं रहे, किंतु उसके साथ बेमन से व्यवहार करने के लिए परिस्थिति द्वारा मजबूर किए जाते हैं, वे परमेश्वर के लोगों की सेवा करने वालों में गिने जाते हैं। ऐसे लोगों की एक छोटी-सी संख्या ही जीवित बचेगी, जबकि बड़ी संख्या उन लोगों के साथ नष्ट हो जाएगी, जो सेवा करने के भी योग्य नहीं हैं। अंतत: परमेश्वर उन सभी को, जिनका मन परमेश्वर के समान है, अपने लोगों और पुत्रों को, और परमेश्वर द्वारा याजक बनाए जाने के लिए पूर्वनियत लोगों को अपने राज्य में ले आएगा। वे परमेश्वर के कार्य के परिणाम होंगे। जहाँ तक उन लोगों का प्रश्न है, जो परमेश्वर द्वारा निर्धारित किसी भी श्रेणी में नहीं आ सकते, वे अविश्वासियों में गिने जाएँगे—तुम लोग निश्चित रूप से कल्पना कर सकते हो कि उनका क्या परिणाम होगा। मैं तुम सभी लोगों से पहले ही वह कह चुका हूँ, जो मुझे कहना चाहिए; जो मार्ग तुम लोग चुनते हो, वह केवल तुम्हारी पसंद है। तुम लोगों को जो समझना चाहिए, वह यह है : परमेश्वर का कार्य ऐसे किसी शख्स का इंतज़ार नहीं करता, जो उसके साथ कदमताल नहीं कर सकता, और परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव किसी भी मनुष्य के प्रति कोई दया नहीं दिखाता" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है')।

अंत के दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर सत्य को व्यक्त करते हैं और अपना न्याय कार्य करते हैं। उनके वचन मानवजाति में गहराई तक जड़ें जमा चुके भ्रष्टाचार का खुलासा करते हैं, उनमें परमेश्वर के प्रति इंसान के प्रतिरोध के हर पहलू को बताया गया है, साथ ही उसके शैतानी स्वभाव का भी वर्णन है, साथ ही उनमें इंसान को परमेश्वर की पवित्रता और धार्मिकता वाले निरपराध स्वभाव का भी दर्शन मिलता है। इसीलिए लोग परमेश्वर के प्रकटन और कार्य को देख पाए हैं, और एक- एक करके परमेश्वर की ओर मुड़ते हुए, उनके उद्धार को स्वीकार करते आए हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर लोगों का न्याय करने के लिए सत्य को व्यक्त करते हैं, वे पहले अपने वचनों के जरिये, परमेश्वर के विश्वासियों पर अन्याय और ताड़ना का प्रयोग करते हैं, और उन लोगों के असली स्वभाव को उजागर करते हैं, जो धार्मिक पंथों में होने के बावजूद, परमेश्वर का विरोध करते हैं। आइये देखें कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन इसकी व्याख्या कैसे करते हैं, सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं: "मनुष्य मुझे स्वर्ग में खोजता है और स्वर्ग में मेरे अस्तित्व की विशेष चिंता करता है, लेकिन देह में कोई मेरी परवाह नहीं करता, क्योंकि मैं जो देह में उन्हीं के बीच रहता हूँ, बहुत मामूली हूँ। जो लोग सिर्फ़ बाइबल के वचनों के साथ अनुकूलता की खोज करते हैं और जो लोग सिर्फ़ एक अज्ञात परमेश्वर के साथ अनुकूलता की खोज करते हैं, वे मेरे लिए एक घृणित दृश्य हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि वे मृत शब्दों की आराधना करते हैं, और एक ऐसे परमेश्वर की आराधना करते हैं, जो उन्हें अनकहा खज़ाना देने में सक्षम है; जिस परमेश्वर की वे आराधना करते हैं, वह एक ऐसा परमेश्वर है, जो अपने आपको मनुष्य के नियंत्रण मेंछोड़ देता है—ऐसा परमेश्वर, जिसका अस्तित्व ही नहीं है। तो फिर, ऐसे लोग मुझसे क्या प्राप्त कर सकते हैं? मनुष्य बस वचनों के लिए बहुत नीच है। जो मेरे विरोध में हैं, जो मेरे सामने असीमित माँगें रखते हैं, जिनमें सत्य के लिए कोई प्रेम नहीं है, जो मेरे प्रति विद्रोही हैं—वे मेरे अनुकूल कैसे हो सकते हैं?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम्हें मसीह के साथ अनुकूलता का तरीका खोजना चाहिए')।

"तुम लोगों का हृदय बुराई, विश्वासघात और कपट से भरा हुआ है, और इसके परिणामस्वरूप, तुम लोगों के प्रेम में कितनी अशुद्धियाँ हैं? तुम लोग सोचते हो कि तुमने मेरे लिए पर्याप्त त्याग किया है; तुम सोचते हो कि मेरे लिए तुम्हारा प्रेम पहले से ही पर्याप्त है। किन्तु फिर तुम लोगों के वचन और कार्य क्यों हमेशा विद्रोही और कपटपूर्ण होते हैं? तुम मेरा अनुसरण करते हो, फिर भी तुम मेरे वचन को स्वीकार नहीं करते। क्या इसे प्रेम कहा जाता है? तुम लोग मेरा अनुसरण करते हो, फिर भी मुझे एक तरफ़ कर देते हो। क्या इसे प्रेम कहा जाता है? तुम लोग मेरा अनुसरण करते हो, परंतु फिर भी मुझ पर संदेह रखते हो? क्या इसे प्रेम कहा जाता है? तुम लोग मेरा अनुसरण करते हो, फिर भी तुम मेरे अस्तित्व को स्वीकार नहीं कर पाते हो। क्या इसे प्रेम कहा जाता है? तुम मेरा अनुसरण करते हो, फिर भी मेरे स्वरूप के अनुकूल मेरे साथ व्यवहार नहीं करते और हर मोड़ पर मेरे लिए चीज़ों को मुश्किल बनाते हो। क्या इसे प्रेम कहा जाता है? तुम लोग मेरा अनुसरण करते हो, फिर भी तुम मुझे मूर्ख बनाने और हर मामले में धोखा देने का प्रयास करते हो। क्या इसे प्रेम कहा जाता है? तुम लोग मेरी सेवा करते हो, फिर भी तुम मेरा भय नहीं मानते। क्या इसे प्रेम कहा जाता है? तुम लोग सर्वथा और सभी चीजों में मेरा विरोध करते हो। क्या इस सबको प्रेम कहा जाता है? तुम लोगों ने बहुत त्याग किया है, यह सच है, परंतु तुमने उसका अभ्‍यास कभी नहीं किया जो मैं तुमसे चाहता हूँ। क्या इसे प्रेम कहा जा सकता है? सावधानी पूर्वक किया गया अनुमान दर्शाता है कि तुम लोगों के भीतर मेरे लिए प्रेम का ज़रा-सा भी अंश नहीं है। इतने वर्षों के कार्य और मेरी ओर से कहे गए इतने वचनों के बाद, तुम लोगों ने वास्तव में कितना प्राप्त किया है? क्या यह एक बार पीछे मुड़कर विचार करने योग्य नहीं है?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'बहुत बुलाए जाते हैं, पर कुछ ही चुने जाते हैं')।

"परमेश्वर पर तुम लोगों के विश्वास का प्रयोजन तुम्हारे अपने लक्ष्य पूरे करने के लिए परमेश्वर का उपयोग करना है। क्या यह तुम्हारे द्वारा परमेश्वर के स्वभाव के अपमान का एक और तथ्य नहीं है? तुम लोग स्वर्ग के परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास करते हो, परंतु पृथ्वी के परमेश्वर के अस्तित्व से इनकार करते हो; लेकिन मैं तुम लोगों के विचार स्वीकार नहीं करता; मैं केवल उन लोगों की सराहना करता हूँ, जो अपने पैरों को ज़मीन पर रखते हैं और पृथ्वी के परमेश्वर की सेवा करते हैं, किंतु उनकी सराहना कभी नहीं करता, जो पृथ्वी के मसीह को स्वीकार नहीं करते। ऐसे लोग स्वर्ग के परमेश्वर के प्रति कितने भी वफादार क्यों न हों, अंत में वे दुष्टों को दंड देने वाले मेरे हाथ से बचकर नहीं निकल सकते। ये लोग दुष्ट हैं; ये वे बुरे लोग हैं, जो परमेश्वर का विरोध करते हैं और जिन्होंने कभी खुशी से मसीह का आज्ञापालन नहीं किया है। निस्संदेह, उनकी संख्या में वे सब सम्मिलित हैं जो मसीह को नहीं जानते, और इसके अलावा, उसे स्वीकार नहीं करते" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'पृथ्वी के परमेश्वर को कैसे जानें')।

"मनुष्य भ्रष्ट हो चुका है और शैतान के फंदे में जी रहा है। सभी लोग देह में जीते हैं, स्वार्थपूर्ण अभिलाषाओं में जीते हैं, और उनके मध्य एक भी व्यक्ति नहीं, जो मेरे अनुकूल हो। ऐसे लोग भी हैं, जो कहते हैं कि वे मेरे अनुकूल हैं, परंतु वे सब अस्पष्ट मूर्तियों की आराधना करते हैं। हालाँकि वे मेरे नाम को पवित्र मानते हैं, पर वे उस रास्ते पर चलते हैं जो मेरे विपरीत जाता है, और उनके शब्द घमंड और आत्मविश्वास से भरे हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि मूलत: वे सब मेरे विरोध में हैं और मेरे अनुकूल नहीं हैं" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम्हें मसीह के साथ अनुकूलता का तरीका खोजना चाहिए')।

हमने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों के न्याय से यह पहचान कर ली है, हमने अपने दंभ, अपनी आत्ममुग्धता और अपनी धोखेबाजी को बखूबी जान लिया है, हम हर तरह से हमारे शैतानी स्वभाव को छोड़ने के लिए तैयार हैं। हालांकि शायद हम खुद को बेहतर बनाते हैं, मुश्किलें सहते हैं, परमेश्वर के लिए मूल्य चुकाते हैं, लेकिन हम परमेश्वर के सामने सच्चा समर्पण नहीं करते, और उससे सच्चा प्रेम तो शायद ही कभी करते हैं। परीक्षाओं और कष्टों के समय में तो हम परमेश्वर की शिकायत करते हैं, परमेश्वर पर शक करते हैं, उसकी उपस्थिति को नकारते हैं। इससे हमें पता चलता है कि हम भ्रष्ट इंसानों का स्वभाव शैतान जैसा हो गया है। अगर हम अपनी शैतानी फितरत को त्याग कर अपना शुद्धिकरण नहीं कर पाए, तो हम परमेश्वर के सामने सच्चे रूप में समर्पण नहीं कर पाएंगे, परमेश्वर से सच्चा प्रेम नहीं कर पाएंगे। अतीत में हमें लगता था कि हम कई वर्षों से परमेश्वर में आस्था रखते आए हैं, हमने कर्इ वस्तुओं का त्याग किया, परमेश्वर की भक्ति में गहरार्इ तक डूबे, खूब मेहनत से काम किया, इसलिए हम अच्छे बन गए, हम ऐसे लोग बन गए, जो परमेश्वर से प्रेम करते थे, उनके प्रति समर्पित थे। लेकिन सर्वशक्तिमान परमेश्वर के न्याय और ताड़ना को अनुभव करने के बाद ही हमें ये एहसास हुआ, भले ही बाहरी स्वरूप में तो हम प्रभु के लिए बहुत मेहनत करते हैं, लेकिन फिर भी हम अक्सर झूठ बोलते और परमेश्वर को धोखा देते रहते हैं, परमेश्वर से दिखावटी प्रेम करते हैं, हमने पूर्वाग्रह बना रखे हैं, अपनी तरफ बहुत ध्यान देते हैं, दिखावा करते रहते हैं। अंत में हम यह समझ गए कि हमारी सारी कोशिशें और खर्च दरअसल केवल उनका आशीष पाने के लिए थे, हमने तो स्वर्ग के राज्य में प्रवेश पाने के लिए ये सब किया है। यानी हम परमेश्वर के साथ सौदेबाजी करते रहे। ये परमेश्वर के प्रति सच्चा समर्पण कहां है? परमेश्वर से प्रेम की बात तो बहुत दूर की है, फिर भी हम बेशर्मी से कहते रहते हैं कि हम परमेश्वर से अथाह प्रेम करते हैं, परमेश्वर के प्रति सबसे ज्यादा समर्पित हैं। ये बेकार की बात है, ये परमेश्वर से जुड़ा ज्ञान बिल्कुल भी नहीं है। प्रकाशित वाक्य और परमेश्वर के वचनों के न्याय में हम देखते हैं कि परमेश्वर की नज़र हर चीज पर है। जब हम परमेश्वर की अपार पवित्रता, धार्मिकता और उनके निरपराध स्वभाव का अनुभव करते हैं, तो मन ही मन डरने और कांपने लगते हैं। हम अपने शैतानी स्वरूप को महसूस करके, परमेश्वर का सामना करने को लेकर शर्मिंदा होते हैं, हम उनके सामने खड़े होने लायक नहीं रह जाते, फिर हम जमीन पर गिर जाते हैं, पश्चाताप करते हुए रोते हैं, खुद को कोसते हैं, अपने चेहरों पर खुद थप्पड़ मारते हैं। तभी हमें लगता है कि हम रोजाना किसी शैतान की तरह जिन्दगी बिताते हैं, हमने किसी इंसान की तरह बिल्कुल जीवन नहीं जिया, और हम इंसान कहलाने के लायक नहीं हैं। जब हमें कई तरह के न्याय और ताड़नाओं, परीक्षाओं और शुद्धिकरणों का सामना करना पड़ता है, जब हम काट-छांट की प्रक्रियाओं और कुछ कठिन हालातों से गुजरते हैं, तो धीरे-धीरे कुछ सत्य समझ आने लगते हैं, हम देख पाते हैं कि हम कितने भ्रष्ट हो चुके हैं। उस समय हमें परमेश्वर का कुछ प्रामाणिक ज्ञान हो पाता है, और आखिर में हम परमेश्वर का सम्मान करते हुए अपने दिल में उनके प्रति समर्पित हो जाते हैं। परमेश्वर में विश्वास करने का सही मार्ग यही है। और ये परिणाम होता है परमेश्वर के न्याय और ताड़ना से गुजरने का। अगर परमेश्वर के वचनों का न्याय और ताड़ना न होती, तो हम अपने अंदर बसे शैतान के भ्रष्टाचार की सही तस्वीर कभी न देख पाते। हम पाप करने और परमेश्वर का विरोध करने के स्रोत को कभी न जान पाते। हम पाप की बेड़ियों से खुद को कैसे आजाद करें, हम ये भी न समझ पाते, और इसीलिए हम परमेश्वर के सच्चे आज्ञाकारी कभी न बन पाते। अगर परमेश्वर के वचनों का सख्त न्याय न होता, तो हम उनके धार्मिक, भव्य और निरपराध स्वभाव से परिचित न हो पाते, न ही हमारे हृदय में परमेश्वर का डर होता, न हम परमेश्वर से भयभीत होते, न बुराइयों को छोड़ पाते। ये एक तथ्य है। अगर परमेश्वर ने देहधारण न किया होता, तो अंत के दिनों में न्याय कार्य कौन करता? तब मनुष्य को परमेश्वर के पवित्र, धार्मिक और निरपराध स्वभाव के दर्शन कौन कराता? अगर परमेश्वर ने देहधारण न किया होता, तो किसके वचनों में इतना सामर्थ्य और अधिकार होता, कि वो हमारा न्याय कर सके, हमें शुद्ध कर सके, और हमें पाप की दलदल से बचा सके? सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन और कार्य पूरी तरह से परमेश्वर के रूप में उनके रुतबे और पहचान को दिखाते हैं, ये बताते हैं कि वही सृष्टिकर्ता हैं, और वही इकलौते सच्चे परमेश्वर हैं। हमने सर्वशक्तिमान परमेश्वर की बोली में, परमेश्वर की वाणी को पहचान लिया है, और परमेश्वर के प्रकटन को भी देखा है। हाल के वर्षों में आखिर क्यों इतने सारे लोग सब कुछ छोड़छाड़ कर सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का प्रसार करने और उनकी गवाही देने के काम में जुटे हैं? आखिर क्यों इतने सारे लोग चीन की साम्यवादी सरकार द्वारा पकड़े जाने, प्रताड़ित होने और मारे जाने का जोखिम उठाते हैं, क्योंकि वे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य का प्रचार-प्रसार करने और उनकी गवाही देने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ते? आखिर क्यों इतने सारे लोगों ने धार्मिक लोगों के द्वारा परित्याग, प्रताड़ना, प्रतिबंध और निंदा को सहन करना पसंद किया है, ताकि वे घर-घर जाकर सुसमाचार का प्रसार कर सकें? ऐसा इसलिए कि उन्होंने परमेश्वर की वाणी सुनी है, और परमेश्वर के प्रकटन का स्वागत किया है। उन्होंने परमेश्वर की शर्तों को पूरा किया है, और इस संदेश का प्रचार किया है, "देखो, दूल्हा आ रहा है! उससे भेंट करने के लिये चलो" (मत्ती 25:6)। क्या आप बस इस बात से सहमत हैं कि प्रभु आपके द्वार पर दस्तक दे रहे हैं? हां, सचमुच प्रभु हमारे द्वार पर दस्तक दे रहे हैं! तो क्या हम प्रभु के लिए अपने द्वार खोलेंगे? तो, जब प्रभु लोगों को हमारे द्वार पर दस्तक देने भेजेंगे, तो क्या हमें सत्य के मार्ग की खोज और जाँच-पड़ताल करनी चाहिए, और प्रभु की वाणी को सुनने का प्रयास करना चाहिए?

"द्वार पर दस्तक" फ़िल्म की स्क्रिप्ट से लिया गया अंश

पिछला: प्रश्न 2: प्रभु यीशु ने एक बार कहा था: "क्योंकि मैं तुम्हारे लिये जगह तैयार करने जाता हूँ। और यदि मैं जाकर तुम्हारे लिये जगह तैयार करूँ, तो फिर आकर तुम्हें अपने यहाँ ले जाऊँगा कि जहाँ मैं रहूँ वहाँ तुम भी रहो" (यूहन्ना 14:2-3)। प्रभु यीशु पुनर्जीवित हुए और हमारे लिये एक स्थान तैयार करने स्वर्ग लौटे, इसका अर्थ ये हुआ कि वो स्थान स्वर्ग में है। अगर प्रभु लौट आए हैं, तो उनका आना, हमें स्वर्ग में आरोहित करने के लिये होना चाहिये, पहले हमें प्रभु से मिलवाने, आसमान में ऊपर उठाने के लिये होना चाहिये। अब तुम लोग इस बात की गवाही दे रहे हो कि प्रभु यीशु लौट आये हैं, वे देहधारी हुए हैं, और धरती पर वचन बोलने और कार्य करने में लगे हैं। तो वो हमें स्वर्ग के राज्य में कैसे लेकर जाएंगे? स्वर्ग का राज्य धरती पर है या स्वर्ग में?

अगला: प्रश्न 1: हमने प्रभु में इतने वर्षों से विश्वास किया है। हालांकि हम प्रभु के लिए प्रवचन दे सकते हैं, कार्य कर सकते हैं, और कष्ट सह सकते हैं, फिर भी हम सदा झूठ बोल सकते हैं, छल कर सकते हैं और धोखा दे सकते हैं। हर दिन, हम अपने बचाव में बोलते हैं। अक्सर, हम घमंडी, हठी, दिखावटी होते हैं तथा दूसरों को नीचा दिखाते रहते हैं। हम देह के बंधन से छूटने में नाकाम, पाप और पश्चाताप की स्थिति में जीते हैं। प्रभु के वचन का अनुभव करना और पालन करना तो दूर, सदा से हम इसी स्थिति में रहे हैं। हमने प्रभु के वचन की किसी भी वास्तविकता को कभी नहीं जिया। हमारी स्थिति में, क्या हम स्वर्ग के राज्य में लाये भी जा सकेंगे?कुछ लोग कहते हैं, हम पाप जैसे भी करें, देह के बंधन में कैसे भी फंसे रहें, प्रभु हमें पापरहित ही देखते हैं। वे पौलुस के कथन के अनुसार चलते हैं: "और यह क्षण भर में, पलक मारते ही अन्तिम तुरही फूँकते ही होगा। क्योंकि तुरही फूँकी जाएगी और मुर्दे अविनाशी दशा में उठाए जाएँगे, और हम बदल जाएँगे" (1 कुरिन्थियों 15:52)। और मान लेते हैं कि जब प्रभु आएंगे, तो वे उसी क्षण हमारी छवि बदल देंगे और हमें स्वर्ग के राज्य में ले आएंगे। कुछ लोग इस तर्क को स्वीकार नहीं कर सकते। वे मानते हैं कि जो लोग विश्वास के कारण उद्धार प्राप्त करते हैं, लेकिन फिर भी निरंतर पाप करते रहते हैं, वे स्वर्ग के राज्य में प्रवेश पाने के योग्य नहीं हैं। यह मुख्य रूप से प्रभु यीशु के वचन पर आधारित है: "जो मुझ से, 'हे प्रभु! हे प्रभु!' कहता है, उनमें से हर एक स्वर्ग के राज्य में प्रवेश न करेगा, परन्तु वही जो मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चलता है" (मत्ती 7:21)। "…इसलिये तुम पवित्र बनो, क्योंकि मैं पवित्र हूँ" (लैव्यव्यवस्था 11:45)। ये दो परस्पर विरोधी विचार हैं, जो कोई भी स्पष्ट रूप से नहीं कह सकता, कृपया हमारे लिए चर्चा करें।

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