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प्रश्न 4: हमने सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के वचनों को पढ़ा है और पाया है कि ऐसी कुछ बातें हैं जो बहुत कठोर हैं। वे मानव जाति का न्याय, निंदा और अभिशाप हैं। मुझे लगता है कि अगर परमेश्‍वर न्याय करते हैं और लोगों को शाप देते हैं, तो क्या यह उनकी निंदा और सज़ा के समान नहीं है? यह कैसे कहा जा सकता है कि इस तरह का न्याय मानव जाति को शुद्ध करने और बचाने के लिए है?

उत्तर: अंत के दिनों में, परमेश्‍वर सत्‍य को व्यक्त करने और विजेताओं का एक समूह बनाने के लिए न्याय का कार्य करते हैं, ऐसे लोगों का एक समूह जो परमेश्‍वर के साथ एकमना और एकदिल हैं। यह तभी तय कर लिया गया था जब परमेश्‍वर ने दुनिया बनायी थी। लेकिन ऐसे कुछ व्यक्ति हैं जो देखते हैं कि परमेश्‍वर के कुछ वचनों में लोगों की निंदा और शाप हैं और वे अवधारणाएं बना लेते हैं। यह खासकर इसलिए है क्योंकि वे परमेश्‍वर के कार्य को नहीं जानते। अंत के दिनों में परमेश्‍वर का न्याय महान सफ़ेद सिंहासन का न्याय है जिसकी भविष्‍यवाणी प्रकाशितवाक्‍य की किताब में की गई है। परमेश्‍वर ने धार्मिकता, महिमा, और क्रोध के अपने स्वभाव को प्रकट किया है, और यह पूरी तरह से मानव जाति को उजागर करने के लिए और हर प्रकार के व्यक्ति में भेद करने के लिए है। इससे भी ज्यादा, यह पुराने युग को समाप्त करने और शैतान के लोगों के पूरे सफाये के लिए है। तो शैतान के वे सभी लोग, जो परमेश्‍वर का विरोध करते हैं, क्या परमेश्‍वर उनकी निंदा कर उन्‍हें शाप नहीं दे सकते? हालां‍कि न्याय के कुछ वचन ऐसे हैं जो परमेश्‍वर के चुने गए लोगों द्वारा प्रकट किये गए भ्रष्टाचार को और उनकी असली भ्रष्‍ट समानता को उजागर करते हैं, और ये निंदा की तरह लगते हैं, ये परमेश्‍वर के चुने गए लोगों को उनके भ्रष्ट स्वभाव का सार स्‍पष्‍टता से दिखाने और इस मामले की तह तक पहुंचने के लिए है, साथ ही, यह सत्य को समझने का फल पाने के लिए है। अगर परमेश्‍वर इतने कठोर नहीं होते, अगर उनके वचन हमारे अंदर तक चोट नहीं करते, तो हम अपनी भ्रष्ट समानताओं और शैतानी प्रकृति की पहचान नहीं कर पाते, और अंत के दिनों में परमेश्‍वर के कार्य से मानव जाति को शुद्ध करना और पूर्ण बनाना संभव नहीं होता। जो व्यक्ति सत्‍य से प्रेम करते हैं और तथ्यों का सम्मान करते हैं, वे यह देख पाएंगे कि परमेश्‍वर के वचन तीखे हैं, भले ही वे न्याय और ताड़ना के या निंदा और शाप के वचन हों, लेकिन वे पूरी तरह से वास्तविक तथ्यों के अनुरूप हैं। परमेश्‍वर इस प्रकार से बोलते हैं जो बहुत ही व्यावहारिक और बहुत ही वास्तविक होता है, और यह बिल्कुल बढ़ा-चढ़ा कर बोला गया नहीं है। परमेश्‍वर के इन कठोर वचनों से प्राप्त परिणामों से, हम सब देख सकते हैं कि उनके भीतर मानव जाति के लिए परमेश्‍वर का वास्तविक प्रेम और मानव जाति को बचाने के उनके अच्छे इरादे छिपे हुए हैं। केवल वही लोग जो सत्य से ऊबे हुए हैं, अपनी धारणाएं बना सकते हैं, और जो लोग सच्चाई से घृणा करते हैं, वे ही परमेश्‍वर के कार्य की आलोचना और निंदा कर सकते हैं। परमेश्‍वर 20 से अधिक वर्षों से चीन में कार्य कर रहे हैं और उन्होंने पहले से ही विजेताओं का एक समूह बना लिया है। वे सीसीपी सरकार के क्रूर उत्पीड़न और अत्‍याचार से गुज़र चुके हैं, और वे सभी परमेश्‍वर का पक्ष लेने और गवाही देने में सक्षम हैं। यह पूरी तरह से परमेश्‍वर के वचनों की वज़ह से पाया हुआ फल है। उन सभी ने परमेश्‍वर के प्रेम को उनके वचनों में देखा है, और जाना है कि मानव जाति को बचाने के लिए उन्होंने कैसा दुःख उठाया है। हालांकि उनके कुछ वचन बहुत कठोर हैं लेकिन वे इनका अनुसरण कर पाते हैं, और इससे उन्होंने परमेश्‍वर के स्वभाव का वास्तविक ज्ञान प्राप्त किया है। उन्होंने परमेश्वर के प्रति सम्मान और प्रेम का भाव विकसित किया है। वे सभी अपने कर्तव्यों को ईमानदारी से पूरा करने में सक्षम हैं, और अंत तक पूरी तरह से परमेश्‍वर का अनुसरण करेंगे। यह बात शैतान को सबसे ज्‍़यादा शर्मिंदा करती है, और यह शैतान को हराने का परमेश्‍वर का प्रमाण है। जहां तक सवाल परमेश्‍वर द्वारा अंत के दिनों में लोगों का न्याय करने और उन्हें शुद्ध करने का है, आइये सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के वचनों के कुछ अंश देखते हैं, और हमें यह स्पष्ट हो जाएगा।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं: "इस समय जब परमेश्वर देहधारी हुआ, तो उसका कार्य, प्राथमिक रूप में ताड़ना और न्याय के द्वारा, अपने स्वभाव को व्यक्त करना है। इसे नींव के रूप में उपयोग करके वह मनुष्य तक अधिक सत्य को पहुँचाता है, अभ्यास करने के और अधिक मार्ग दिखाता है, और इस प्रकार मनुष्य को जातने और मनुष्य को उसके भ्रष्ट स्वभाव से बचाने के अपने उद्देश्य को प्राप्त करता है। राज्य के युग में परमेश्वर के पीछे यही निहित है" ("वचन देह में प्रकट होता है" के लिए प्रस्तावना)।

"अंत के दिनों में, मसीह मनुष्य को सिखाने के लिए विभिन्न प्रकार की सच्चाइयों का उपयोग करता है, मनुष्य के सार को उजागर करता है, और उसके वचनों और कर्मों का विश्लेषण करता है। इन वचनों में विभिन्न सच्चाइयों का समावेश है, जैसे कि मनुष्य का कर्तव्य, मनुष्य को किस प्रकार परमेश्वर का आज्ञापालन करना चाहिए, हर व्यक्ति जो परमेश्वर के कार्य को मनुष्य को किस प्रकार परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार सामान्य मानवता से, और साथ ही परमेश्वर की बुद्धि और उसके स्वभाव इत्यादि को जीना चाहिए। ये सभी वचन मनुष्य के सार और उसके भ्रष्ट स्वभाव पर निर्देशित हैं। खासतौर पर, वे वचन जो यह उजागर करते हैं कि मनुष्य किस प्रकार से परमेश्वर का तिरस्कार करता है इस संबंध में बोले गए हैं कि किस प्रकार से मनुष्य शैतान का मूर्त रूप और परमेश्वर के विरूद्ध दुश्मन की शक्ति है। अपने न्याय का कार्य करने में, परमेश्वर केवल कुछ वचनों से ही मनुष्य की प्रकृति को स्पष्ट नहीं करता है; वह लम्बे समय तक इसे उजागर करता है, इससे निपटता है, और इसकी काट-छाँट करता है। उजागर करने की इन विधियों, निपटने, और काट-छाँट को साधारण वचनों से नहीं, बल्कि सत्य से प्रतिस्थापित किया जा सकता है, जिसे मनुष्य बिल्कुल भी धारण नहीं करता है। केवल इस तरीके की विधियाँ ही न्याय समझी जाती हैं; केवल इसी तरह के न्याय के माध्यम से ही मनुष्य को वश में किया जा सकता है और परमेश्वर के प्रति समर्पण में पूरी तरह से आश्वस्त किया जा सकता है, और इसके अलावा मनुष्य परमेश्वर का सच्चा ज्ञान प्राप्त कर सकता है। न्याय का कार्य जिस चीज़ को उत्पन्न करता है वह है परमेश्वर के असली चेहरे और उसकी स्वयं की विद्रोहशीलता के सत्य के बारे में मनुष्य में समझ। न्याय का कार्य मनुष्य को परमेश्वर की इच्छा की, परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य की, और उन रहस्यों की अधिक समझ प्राप्त करने देता है जो उसके लिए अबोधगम्य हैं। यह मनुष्य को उसके भ्रष्ट सार तथा उसकी भ्रष्टता के मूल को पहचानने और जानने, साथ ही मनुष्य की कुरूपता को खोजने देता है। ये सभी प्रभाव न्याय के कार्य के द्वारा निष्पादित होते हैं, क्योंकि इस कार्य का सार वास्तव में उन सभी के लिए परमेश्वर के सत्य, मार्ग और जीवन का मार्ग प्रशस्त करने का कार्य है जिनका उस पर विश्वास है। यह कार्य परमेश्वर के द्वारा किया गया न्याय का कार्य है" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है")।

"परमेश्वर के द्वारा मनुष्य की सिद्धता किसके द्वारा पूरी होती है? उसके धर्मी स्वभाव के द्वारा। परमेश्वर के स्वभाव मुख्यतः धार्मिकता, क्रोध, भव्यता, न्याय और शाप शामिल है, और उसके द्वारा मनुष्य की सिद्धता प्राथमिक रूप से न्याय के द्वारा होती है। कुछ लोग नहीं समझते, और पूछते हैं कि क्यों परमेश्वर केवल न्याय और शाप के द्वारा ही मनुष्य को सिद्ध बना सकता है। वे कहते हैं कि यदि परमेश्वर मनुष्य को शाप दे, तो क्या वह मर नहीं जाएगा? यदि परमेश्वर मनुष्य का न्याय करे, तो क्या वह दोषी नहीं ठहरेगा? तब वह कैसे सिद्ध बनाया जा सकता है? ऐसे शब्द उन लोगों के होते हैं जो परमेश्वर के कार्य को नहीं जानते। परमेश्वर मनुष्य की अवज्ञाकारिता को शापित करता है, और वह मनुष्य के पापों को न्याय देता है। यद्यपि वह बिना किसी संवेदना के कठोरता से बोलता है, फिर भी वह उन सबको प्रकट करता है जो मनुष्य के भीतर होता है, और इन कठोर वचनों के द्वारा वह उन सब बातों को प्रकट करता है जो मूलभूत रूप से मनुष्य के भीतर होती हैं, फिर भी ऐसे न्याय के द्वारा वह मनुष्य को शरीर के सार का गहरा ज्ञान प्रदान करता है, और इस प्रकार मनुष्य परमेश्वर के समक्ष आज्ञाकारिता के प्रति समर्पित होता है। मनुष्य का शरीर पाप का है, और शैतान का है, यह अवज्ञाकारी है, और परमेश्वर की ताड़ना का पात्र है - और इसलिए, मनुष्य को स्वयं का ज्ञान प्रदान करने के लिए परमेश्वर के न्याय के वचनों का उस पर पड़ना आवश्यक है और हर प्रकार का शोधन होना आवश्यक है; केवल तभी परमेश्वर का कार्य प्रभावशाली हो सकता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "केवल पीड़ादायक परीक्षाओं का अनुभव करने के द्वारा ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो")।

"तुम सभी पाप और दुराचार के स्थान में रहते हो; तुम सभी दुराचारी और पापी लोग हो। आज तुम न केवल परमेश्वर को देख सकते हो, बल्कि उससे भी महत्वपूर्ण, तुम सब ने ताड़ना और न्याय को प्राप्त किया है, ऐसे गहनतम उद्धार को प्राप्त किया है, अर्थात परमेश्वर के महानतम प्रेम को प्राप्त किया है। वह जो कुछ करता है, वह तुम्हारे लिए वास्तविक प्रेम है; वह कोई बुरी मंशा नहीं रखता है। यह तुम्हारे पापों के कारण ही है कि वह तुम्हारा न्याय करता है, ताकि तुम आत्म-परीक्षण करोगे और यह अतिबृहत उद्धार प्राप्त करोगे। यह सब कुछ मनुष्य में कार्य करने के लिए किया गया है। आदि से लेकर अन्त तक, मनुष्य को बचाने के लिए परमेश्वर जितना हो सके वो सब कुछ कर रहा है, और वह निश्चय ही उस मनुष्य को पूर्णतया विनष्ट करने का इच्छुक नहीं है, जिसे उसने अपने हाथों से रचा है। अब कार्य करने के लिए वह तुम्हारे मध्य आया है; क्या यह और अधिक उद्धार नहीं है? अगर वो तुमसे नफ़रत करता, तो क्या फिर भी वो व्यक्तिगत रूप से तुम्हारा संदर्शन करने के लिए इतने बड़े परिमाण का कार्य करता? उसे इस प्रकार दुःख क्यों उठाना चाहिए? परमेश्वर तुम सब से घृणा नहीं करता, न ही तुम्हारे प्रति कोई बुरी मंशा रखता है। तुम सब को जानना चाहिए कि परमेश्वर का प्रेम ही सबसे सच्चा प्रेम है। यह लोगों की अनाज्ञाकारिता के कारण ही है कि उसे उन्हें न्याय के द्वारा बचाना पड़ता है, अन्यथा वे बचाए नहीं जाएँगे। चूंकि तुम नहीं जानते कि एक जीवन का सन्दर्शन कैसे करना है या कैसे जीना है, और तुम इस दुराचारी और पापमय स्थान में जीते हो और दुराचारी और अशुद्ध दानव हो, वह इतना दयाहीन नहीं कि तुम्हें और अधिक भ्रष्ट होने दे; न ही वह इतना दयाहीन है कि तुम्हें शैतान की इच्छानुसार कुचले जाते हुए इस प्रकार के अशुद्ध स्थान में रहने दे, या इतना दयाहीन है कि तुम्हें नरक में गिर जाने दे। वह मात्र तुम्हारे इस समूह को प्राप्त करना और तुम सब को पूर्णतः बचाना चाहता है। यही तुम में जीत लिए जाने के कार्य को करने का मुख्य उद्देश्य है-यह मात्र उद्धार के लिए है" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "विजयी कार्यों का आंतरिक सत्य (4)")।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन में यह स्पष्ट कहा गया है। मानव जाति शैतान के क्षेत्र में रहती है, पाप में रहती है, और पापों में मज़ा लेती है। धार्मिक समुदायों में से किसी ने भी परमेश्‍वर के आगमन की ओर ध्यान नहीं दिया है और कोई भी सच्चाई से प्रेम या इसे स्वीकार नहीं करता है। चाहे लोगों ने परमेश्‍वर की कैसी भी गवाही दी हो या उनके वचनों को फैलाया हो, ऐसे कितने लोग हैं जिन्‍होंने सक्रिय रूप से परमेश्‍वर के प्रकटन और कार्य की खोज या जांच-पड़ताल की है? और ऐसे कितने व्यक्ति होंगे जो परमेश्‍वर के न्याय और ताड़ना को स्वीकार करके उनके प्रति समर्पित हो पायेंगे? क्या हर कोई यह नहीं कहेगा कि यह मानव जाति दुष्टता का चरम है? अगर अंत के दिनों में परमेश्‍वर के न्याय का कार्य नहीं होता, तो यह मानव जाति जो पूरी तरह से भ्रष्ट है, शैतानी स्वभाव से भरी है, और जो परमेश्‍वर से इंकार और उनका विरोध करती है, क्या व‍ह शुद्ध होकर परमेश्‍वर के उद्धार को प्राप्त कर सकती है? अगर अंत के दिनों के परमेश्‍वर का न्याय नहीं होगा तो कौन विजेताओं का समूह बनाएगा? प्रभु यीशु की भविष्यवाणियां कैसे पूरी होंगी? कैसे मसीह का राज्य साकार होगा? प्रभु में विश्वास रखने वाले बहुत से लोग मानते हैं कि परमेश्‍वर प्रेमपूर्ण और दयालु परमेश्‍वर हैं और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हमने कौन से पाप किये हैं, परमेश्‍वर हमें पापमुक्त कर देंगे। वे मानते हैं कि प्रभु जब वापस आयेंगे तो भले ही हम कितने भी भ्रष्ट हों, किसी को भी छोड़ा नहीं जाएगा और हम सभी स्वर्ग के राज्‍य में आरोहित किये जायेंगे। क्या यह एक उचित नज़रिया है? क्या इस बात का समर्थन करने के लिए प्रभु के वचन में कुछ है? परमेश्‍वर पवित्र और धर्मी परमेश्‍वर हैं; क्या वे शैतानी स्वभाव से भरे हुए, गंदगी और भ्रष्टाचार से कलंकित, सत्‍य से इंकार करने वाले लोगों और परमेश्वर के शत्रुओं को अपने राज्‍य में प्रवेश करने की मंज़ूरी देंगे? इसलिए, प्रभु यीशु ने भविष्यवाणी की थी कि वे वापस आकर अंत के दिनों में सत्‍य व्यक्त करेंगे और अपना न्याय का कार्य करेंगे और मानवता को पूरी तरह शुद्ध करके बचाएँगे। जहां तक मानव जाति का सवाल है, जो भ्रष्टाचार से पूरी तरह दूषित हो गई है, परमेश्‍वर निश्चित रूप से सत्य को आगे बढ़ाएंगे और उनके लिए अपने न्याय और ताड़ना का प्रयोग करेंगे। मनुष्यों के मन और आत्माओं को जगाने के लिए, इंसान को जीतने के लिए और उनके शैतानी स्वभाव को शुद्ध करने का यही एकमात्र तरीका है। हालांकि मानव जाति के खिलाफ गंदगी, भ्रष्टाचार, अवज्ञा और परमेश्‍वर के प्रति विरोध के लिए परमेश्‍वर के न्याय के वचन कठोर हैं, फिर भी इससे परमेश्‍वर के पवित्र और धर्मी स्वभाव का पता चलता है, और यह हमें अपनी शैतानी प्रकृति और इस तथ्य को समझने की भी अनुमति देता है कि हम भ्रष्ट हैं। परमेश्‍वर के न्याय और ताड़ना के अनुभव के माध्यम से, हम सभी परमेश्‍वर के वचन से जीते गये हैं, हम अपनी इच्‍छा से उनके न्याय के प्रति समर्पित होते हैं, धीरे-धीरे सत्य को समझते हैं, और स्पष्ट रूप से हमारे अपने शैतानी स्वभाव और प्रकृति को देखते हैं, हम परमेश्‍वर के धर्मी स्वभाव की सच्ची समझ प्राप्त कर पाते हैं, हमने अपने मन में परमेश्‍वर के प्रति श्रद्धा का भाव विकसित कर लिया है, हमने अनजाने में चीजों को देखने का हमारा तरीका बदल दिया है, हमारे जीवन का स्वभाव बदल गया है, और हम परमेश्‍वर के प्रति श्रद्धा रख कर बुराई से दूर रह सकते हैं। अंत के दिनों में परमेश्‍वर के न्याय के कार्य ने आखिरकार विजेताओं का समूह बनाने का कार्य पूरा कर लिया है, जो अंत के दिनों में परमेश्‍वर के न्याय कार्य का परिणाम है, और परमेश्वर के लोगों से शुरू होने वाले उनके न्याय के कार्य के पीछे का सच्‍चा महत्‍व है। यह हमें क्या समझने में मदद करता है? परमेश्‍वर अपने वचन से लोगों का न्याय करते हैं और उनको उजागर करते हैं, लोगों को दंडित करने और ख़त्म करने के लिए नहीं, बल्कि पूरी तरह से शुद्ध करने, बदलने और मनुष्यों को बचाने के लिए। परन्तु जो लोग सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के वचनों के न्याय और शुद्धिकरण को स्वीकार करने से इनकार करते हैं, वे बड़ी आपदा के आने पर संकट में धंस जायेंगे और दंडित किए जाएंगे।

हम कुछ वर्षों तक परमेश्‍वर के न्याय और ताड़ना से गुजरे हैं और कुछ सत्‍यों को समझते हैं। हमने वाकई देखा है कि शैतान ने मानव जाति को वाकई इतनी गहराई तक भ्रष्ट किया है, कि हर व्यक्ति अहंकार और धोखे के शैतानी स्वभाव से भरकर, आत्‍म-मुग्‍ध, स्वार्थी और नीच हो गया है। वे अक्सर झूठ बोलने और धोखा देने के अलावा कुछ नहीं कर सकते। वे जिस प्रकार का जीवन बीता रहे हैं, वह काफी हद तक मानवोचित नहीं है। परमेश्‍वर के सामने, हम सभी शर्मिंदा और पश्चाताप से भरे हैं, और हमारे पास छिपने के लिए कोई भी जगह नहीं है। यह परमेश्‍वर के वचनों के न्याय और ताड़ना की प्रक्रिया से गुज़रने का एक पहलू है। सबसे बड़ी बात जो हम पाते हैं, वो य‍ह है कि हमें परमेश्‍वर के धार्मिक स्वभाव और पवित्र सार की थोड़ी वास्तविक समझ है, जिससे हम परमेश्‍वर से डरने और बुराई से दूर रहने, और एक सच्चे इंसान की तरह जीवन जीने में सक्षम हैं। हम सब गहराई से महसूस करते हैं कि हम वाकई परमेश्‍वर से शुद्धि प्राप्त कर चुके हैं, और हमने उनसे महान उद्धार पा लिया है। अतीत में, जब मैं कलीसिया में एक अगुवा के रूप में कार्य करता था, तब मैं हमेशा अपनी प्रसिद्धि और रूतबे पर ध्यान देता था, और मैंने भाई-बहनों के जीवन की ज़िम्मेदारी का बोझ नहीं उठाया। मैं हमेशा अपने आस-पास चापलूसों को रखना पसंद करता था, और मैं इस बात के लिये लालची था कि मुझे रूतबे का आशीर्वाद मिले। मैं अपने पद के नशे में मदहोश और शक्तिशाली था और किसी की बात नहीं मानता था। जब कोई व्यक्ति किसी कार्य के बारे में मुझसे अलग मत रखता था, तो मैं सिर्फ अपनी धारणाओं से चिपका रहता और जो दिल में आए वह बोलता ताकि दूसरा व्यक्ति उसका पालन करना जारी रखे। चूंकि मैंने सत्‍य की खोज करने पर ध्यान नहीं दिया और सत्य की वास्तविकता को धारण नहीं किया, जब मैं धर्म का प्रचार करता था तो मैं सिर्फ़ अपने आपको बड़ा दिखाने और बढ़ा-चढ़ाकर बताने के लिए कुछ शाब्दिक समझ की बातें किया करता था। इस तरह मुझे पता भी नहीं चल पाया कि कब मेरे स्वयं के कार्यों ने परमेश्‍वर के स्वभाव को अपमानित कर दिया। तब एक दिन मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के वचनों में इन बातों को पढ़ा: "जो लोग हमेशा अपने ही लाभ के लिए परमेश्वर पर विश्वास रखते हैं, जो अभिमानी और घमंडी हैं, जो खुद का दिखावा करते हैं, हमेशा अपनी हैसियत की रक्षा करते हैं, ये ऐसे मनुष्य हैं जो शैतान से प्यार करते हैं और सत्य का विरोध करते हैं, वे परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं और पूरी तरह से शैतान के संबंधी हैं" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "अंधकार के प्रभाव से बच निकलें और आप परमेश्वर द्वारा जीत लिए जाएँगे")। "तुम लोगों की छवि परमेश्वर से भी कहीं अधिक बड़ी है, तुम सब की प्रतिष्ठा परमेश्वर की तुलना में अधिक ऊँची है, मनुष्यों के बीच तुम सभी की प्रतिष्ठा का क्या कहना—तुम लोग एक ऐसी मूर्ति बन गए हो जिसकी लोग पूजा करते हैं। क्या तुम महादेवदूत नहीं बन गए हो? जब लोगों का अंत प्रकट किया जाता है, जो तभी होता है जब उद्धार का कार्य समाप्त होने लगता है, तुम लोगों में से कई ऐसे मुर्दे होंगे जो उद्धार से परे हैं और जिनका उन्मूलन कर दिया जाना चाहिए" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "अभ्यास (7)")। सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के वचनों के हर एक अंश में अधिकार और सामर्थ्य था, और वे मेरे दिल में तलवार की तरह धंस गये। मेरे लिए छिपने की कोई जगह नहीं थी, मैं डर से कांप रहा था, और मुझे लग रहा था कि परमेश्‍वर मेरे प्रति अपना क्रोध दर्शा रहे हैं। मैं परमेश्‍वर के सामने गिरकर अपने बुरे कृत्यों का पश्चाताप करने के सिवाय और कुछ नहीं कर पाया। मैं परमेश्‍वर पर विश्वास करता था, लेकिन मैंने सत्‍य का अनुसरण नहीं किया, मैंने परमेश्वर को ऊपर नहीं रखा और न ही उनके बारे में गवाही दी, लेकिन अपने कर्तव्यों का पालन करने में मैंने अक्सर खुद को सही ठहराते हुए दिखावा किया ताकि लोग मेरी तारीफ करें और मेरा सम्‍मान करें। क्या मैं दूसरों को धोखा नहीं दे रहा था या उन्हें जंज़़ीरों में नहीं बांध रहा था? मैं परमेश्‍वर जैसे रुतबे के लिए होड़ में नहीं था? मैं बहुत अभिमानी था, और मुझमें कोई शर्म नहीं थी! मेरे कार्यों ने इससे पहले काफ़ी समय तक परमेश्‍वर के स्वभाव को अपमानित किया था, और मेरे जैसा व्यक्ति जो परमेश्‍वर के साथ होड़ करता है, निश्चित रूप से परमेश्‍वर द्वारा मिटा दिये जाने का लक्ष्‍य होगा और शापित किया जाएगा। मैं बहुत तकलीफ़ में था और मुझे शुद्धिकरण के लिए रखा गया था। मैंने परमेश्‍वर से प्रार्थना की और सत्य की मांग की, और फिर मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के और भी वचन पढ़े: "यद्यपि मनुष्य के लिए ताड़ना और न्याय, शुद्धिकरण और निर्दयी प्रकटीकरण हैं, जो उसके पापों का दण्ड देने और उसके शरीर को दण्ड देने के लिए हैं, परन्तु इस कार्य का कुछ भी उसके शरीर की निंदा करने और नष्ट कर देने की इच्छा से नहीं है। वचन के समस्त गम्भीर प्रकटीकरण सही मार्ग पर तुम्हारा सन्दर्शन करने के उद्देश्य से हैं। तुम सब इस कार्य का बहुत कुछ व्यक्तिगत रूप से अनुभव कर चुके हो, और स्पष्टतः, इस ने तुम्हारा सन्दर्शन बुरे मार्ग पर नहीं किया है! इसका सब कुछ तुम्हें एक सामान्य जीवनयापन करने के योग्य करने के लिए है; इसका सब कुछ वह है जो तुम्हारी सामान्य मानवता ग्रहण कर सकती है" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "विजयी कार्यों का आंतरिक सत्य (4)")। सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के वचनों से, मैंने अचानक प्रकाश देखा, और मैंने अपने लिए परमेश्वर के न्याय के बारे में उनके अच्छे इरादों को समझा। परमेश्‍वर का न्याय और ताड़ना मुझे मिटाने के लिए नहीं, बल्कि मुझे मेरी अभिमानी शैतानी प्रकृति की पहचान कराने के लिए थी, यह मेरे कार्यों की प्रकृति और परिणामों को समझाने और मेरे जैसे लोगों से निपटने के लिए परमेश्‍वर के दृष्टिकोण को पहचानने के लिए थी। यह इसलिये था कि मैं वाकई पश्चाताप करूं, अपने आप से घृणा करूं, खुद का त्याग करूं, सत्‍य का अनुसरण करूं, स्वभाव में परिवर्तन लाने की कोशिश करूं, और सामान्य मानवता में रहने में सक्षम हो सकूं। उनके वचनों ने परमेश्‍वर के बारे में मेरी गलतफहमी को दूर कर दिया। मैं अब नकारात्मक और कमजोर नहीं था, और मैंने सत्‍य का अनुसरण करना शुरू कर दिया। जब मैं वापस परमेश्‍वर की ओर मुड़ा और देखा कि उन्‍होंने मुझे छोड़ा नहीं है, और न ही वे मेरे अपराधों के अनुसार मेरे साथ व्यवहार करते थे, बल्कि उन्होंने मुझे प्रबुद्ध और प्रकाशित किया था, मैं समझ गया कि परमेश्वर द्वारा लोगों का न्याय करने और उनको ताड़ना देने का क्या महत्व है। मैंने वाकई उनकी दया और उद्धार को महसूस किया है। परमेश्‍वर के वचनों के माध्यम से उस न्याय और ताड़ना की प्रक्रिया से गुजरने के बाद, मैंने परमेश्‍वर के स्वभाव की धार्मिकता और पवित्रता को पहचाना, कि वे मानव जाति के पाप और उनके शैतानी स्वभाव से नफरत करते हैं, यही कारण है कि वे मानव जाति के प्रति निंदा और शाप के वचनों का उपयोग करते हैं। इस तरह मैंने लोगों के अपराधों को और बर्दाश्त नहीं करने के परमेश्‍वर के धर्मी स्वभाव को महसूस किया, और मैंने अपने मन में परमेश्‍वर के लिए श्रद्धा का भाव विकसित किया। इस तरह के न्‍याय और ताड़ना से कई बार गुज़रने के बाद, मुझे अपने अभिमानी स्वभाव के बारे में और अधिक समझ हुई। मैं अपने आप से घृणा करता था और अपने दिल में खुद को कोसता था। मैं अपने कर्तव्य को पूरा करने में ईमानदार बन गया, और अब मैं अक्‍खड़ नहीं रहा, मैंने उस तरह और दिखावा नहीं किया। मैं परमेश्‍वर को ऊँचा रखने और उनके लिए गवाही देने में सक्षम था, और उनकी ज़रूरतों के मुताबिक अपने कर्तव्य को पूरा करता था। अपने भाइयों और बहनों में, मैं जागरूकता के साथ खुद की आलोचना करते हुए अपनी शैतानी कुरूपता को प्रकट कर सकता था। मैं अब अन्य लोगों द्वारा अपने मूल्यांकन पर ज्यादा ध्यान नहीं देता था, और भले ही कोई भाई-बहन मेरे बारे में कुछ बुरा कहते, मैं परमेश्‍वर के सामने वापस आकरसच्चाई की खोज करने और खुद को जान पाने में सक्षम था। इस तरह मैं इन परिवर्तनों को पा सका और जो भी थोड़ी मानव समानता मुझमें आई, वह पूरी तरह से मेरे लिए सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के न्याय और ताड़ना का नतीज़ा था।

"कितनी सुंदर वाणी" फ़िल्म की स्क्रिप्ट से लिया गया अंश

पिछला:प्रश्न 3: कलीसिया की सभाओं में पादरी और एल्डर अक्सर कहते हैं कि प्रभु यीशु की सूली पर कही बात "पूरा हुआ" ये साबित करती है कि मानवजाति को बचाने का कार्य पूरा हो चुका है, और यह कि सिर्फ प्रभु यीशु में विश्वास करके और उनके समक्ष अपने पापों को स्वीकार करने से ही हमारे पाप माफ़ कर दिये जाएंगे, और प्रभु आगे से हमें पापियों की तरह नहीं देखेंगे। हम केवल आस्था से ही उचित ठहराये जाते हैं और अनुग्रह से बचाये जाते हैं। प्रभु अपने वापस आने पर हमें स्वर्ग के राज्य में ले लेंगे, और संभवत: वे मानवजाति को बचाने का काम आगे बढ़ाने के लिए नहीं लौटेंगे। मुझे लगता है कि पादरी और एल्डर की यह समझ स्वीकार्य नहीं है। हाँ, आखिर प्रभु यीशु ने जब सूली पर कहा, "पूरा हुआ", तो वे किस बारे में कह रहे थे? अंत के दिनों में सत्य को व्यक्त करने, न्याय का कार्य करने और मनुष्य को शुद्ध करने के लिए परमेश्वर को वापस आने की क्या ज़रूरत है?

अगला:प्रश्न 1: आप लोग इस तथ्य के गवाह हैं कि प्रभु यीशु लौट आये हैं और उन्होंने अपना कार्य करने के लिए देहधारण किया है। यह बात मैं समझ नहीं पाया। हम सब जानते हैं कि प्रभु यीशु परमेश्वर का देहधारण थे। अपना कार्य पूरा करने के बाद, उन्हें सूली पर लटका दिया गया और तब वे फिर से जीवित हो उठे और अपने सभी शिष्यों के समक्ष प्रकट हुए और वे अपने तेजस्वी आध्यात्मिक शरीर के साथ स्वर्ग में पहुँच गए। जैसा कि बाइबल में कहा गया है: "हे गलीली पुरुषो, तुम क्यों खड़े आकाश की ओर देख रहे हो? यही यीशु, जो तुम्हारे पास से स्वर्ग पर उठा लिया गया है, जिस रीति से तुम ने उसे स्वर्ग को जाते देखा है उसी रीति से वह फिर आएगा" (प्रेरितों 1:11)। इस प्रकार, बाइबल-संबंधी शास्‍त्र इस बात की पुष्टि करते हैं कि जब प्रभु फिर से आएंगे, तो उनका पुनर्जीवित आध्यात्मिक शरीर हमारे सामने दिखाई देगा। अंत के दिनों में, परमेश्वर ने न्याय का कार्य करने के लिए मनुष्य के पुत्र के रूप में देहधारण क्यों किया है? प्रभु यीशु के पुनर्जीवित आध्यात्मिक शरीर और मनुष्य के पुत्र के रूप में उनके देहधारण के बीच क्या अंतर है?

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