प्रश्न 3: कलीसिया की सभाओं में पादरी और एल्डर अक्सर कहते हैं कि प्रभु यीशु की सूली पर कही बात "पूरा हुआ" ये साबित करती है कि मानवजाति को बचाने का कार्य पूरा हो चुका है, और यह कि सिर्फ प्रभु यीशु में विश्वास करके और उनके समक्ष अपने पापों को स्वीकार करने से ही हमारे पाप माफ़ कर दिये जाएंगे, और प्रभु आगे से हमें पापियों की तरह नहीं देखेंगे। हम केवल आस्था से ही उचित ठहराये जाते हैं और अनुग्रह से बचाये जाते हैं। प्रभु अपने वापस आने पर हमें स्वर्ग के राज्य में ले लेंगे, और संभवत: वे मानवजाति को बचाने का काम आगे बढ़ाने के लिए नहीं लौटेंगे। मुझे लगता है कि पादरी और एल्डर की यह समझ स्वीकार्य नहीं है। हाँ, आखिर प्रभु यीशु ने जब सूली पर कहा, "पूरा हुआ", तो वे किस बारे में कह रहे थे? अंत के दिनों में सत्य को व्यक्त करने, न्याय का कार्य करने और मनुष्य को शुद्ध करने के लिए परमेश्वर को वापस आने की क्या ज़रूरत है?

उत्तर: जब प्रभु यीशु ने सूली पर कहा था "पूरा हुआ", तब वास्तव में वे किस बारे में ऐसा कह रहे थे? क्या उनका मतलब था कि छुटकारे का कार्य पूरा हो गया है, या वे कहना चाहते थे कि परमेश्वर का मानवजाति को पूरी तरह से बचाने का कार्य पूरा हो चुका है? क्या उस ज़माने के लोग वाकई जान सकते थे? कहा जा सकता है कि कोई नहीं जानता था। प्रभु यीशु ने बस ये शब्द कहे: "पूरा हुआ"। उन्होंने ये नहीं कहा कि परमेश्वर का मानवजाति को बचाने का कार्य पूरा हो गया है। मनुष्य कभी भी सही मायनों में समझ नहीं पाएगा कि प्रभु यीशु ने जब ये कहा कि "पूरा हुआ", तो वे किस बारे में ऐसा कह रहे थे। कोई भी अपने खुद के विचारों के अनुसार प्रभु के वचनों की व्याख्या करने की हिम्मत भला क्यों करेगा? मनमाने ढंग से इस वाक्यांश "पूरा हुआ" की व्याख्या करने की हिम्मत क्यों करें? ये प्रभु यीशु के वचनों पर अपने खुद के इंसानी विचारों को अटकलबाजी से थोपने के सिवाय कुछ नहीं है। सब लोग इस पर गौर करें, अगर प्रभु यीशु का वचन "पूरा हुआ" इस बात का संकेत देता है कि परमेश्वर का समस्त मानवजाति को बचाने का कार्य अच्छी तरह से पूरा हो गया है, तो फिर प्रभु ने ये भविष्यवाणी क्यों की: "मुझे तुम से और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा, क्योंकि वह अपनी ओर से न कहेगा परन्तु जो कुछ सुनेगा वही कहेगा, और आनेवाली बातें तुम्हें बताएगा" (यूहन्ना 16:12-13)। इसके अलावा, यूहन्ना के सुसमाचार, अध्याय 12, पद 47-48, में प्रभु यीशु ने कहा: "यदि कोई मेरी बातें सुनकर न माने, तो मैं उसे दोषी नहीं ठहराता; क्योंकि मैं जगत को दोषी ठहराने के लिये नहीं, परन्तु जगत का उद्धार करने के लिये आया हूँ। जो मुझे तुच्छ जानता है और मेरी बातें ग्रहण नहीं करता है उसको दोषी ठहरानेवाला तो एक है: अर्थात् जो वचन मैं ने कहा है, वही पिछले दिन में उसे दोषी ठहराएगा।" प्रभु यीशु के वचन हमें साफ़ तौर पर बताते हैं कि प्रभु सत्य को व्यक्त करने और न्याय का कार्य करने के लिए लौटेंगे। बाइबल में भी एक भविष्यवाणी की गयी है: "क्योंकि वह समय आ पहुँचा है कि पहले परमेश्वर के लोगों का न्याय किया जाए" (1 पतरस 4:17)। पादरी और एल्डर की बातों के अनुसार, अगर प्रभु यीशु को सूली पर चढ़ाने के साथ ही मानवजाति को बचाने का सारा कार्य पूरा हो गया, तो फिर प्रभु यीशु की इस भविष्यवाणी, "परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा" के वचन कैसे सच होंगे? क्या प्रभु यीशु की यह भविष्यवाणी कि वे सत्य को व्यक्त करने और न्याय का कार्य करने के लिए वापस आयेंगे, गलत नहीं हो जाएगी? इसलिए, पादरी और एल्डर की बातें साफ़ तौर पर प्रभु यीशु के वचनों के अनुरूप नहीं हैं, और ये परमेश्वर के कार्य की वास्तविकता से मेल नहीं खाती हैं। हम सबको यह जान लेना चाहिए कि प्रभु यीशु ने जो किया वो मानवजाति के छुटकारे का कार्य था। हमें बस प्रभु यीशु को स्वीकार कर लेना चाहिए, उनके समक्ष पापों को स्वीकार करके पश्चाताप करना चाहिए, और तब हमारे पाप माफ़ कर दिये जायेंगे। तब हम प्रभु से प्रार्थना करने के काबिल हो जाएंगे, और प्रभु के दिये अनुग्रह का आनंद ले पायेंगे। पाप चाहे जो भी हो, व्यवस्था आगे हमें पीड़ित नहीं करेगी। यही प्रभु यीशु के उद्धार के कार्य का परिणाम है। हम अक्सर जिस वाक्यांश "विश्वास के ज़रिए छुटकारे" का उपयोग करते हैं, यही उसका सही अर्थ है। प्रभु यीशु के कार्य से प्राप्त परिणाम से यह बात और अधिक स्पष्ट रूप से साबित हो जाती है कि प्रभु यीशु का कार्य केवल उद्धार का कार्य ही था। किसी भी तरह से यह अंत के दिनों में लोगों का न्याय, शुद्धिकरण और पूर्ण करने का कार्य नहीं था। हालांकि प्रभु यीशु में हमारा विश्वास हमारे पापों को क्षमा दिलाता है, और हम आगे जाहिर तौर पर कोई पाप नहीं करते, और काफी अच्छा बर्ताव करते हैं, फिर भी हम खुद को पाप से पूरी तरह से अलग करके शुद्ध नहीं हो पाये हैं, और पूरी तरह बचाये नहीं गये हैं; है न? क्या हम अभी भी अक्सर झूठ बोलते हैं और पाप करते हैं? क्या हम अभी भी लालच करते हैं और बुरे ख्याल संजोये रहते हैं? क्या हम अभी भी लोगों से ईर्ष्या करते हैं, और दूसरों से नफ़रत करते हैं? क्या हमारे दिलों में अभी भी अहंकार और तिकड़मबाजी है? क्या हम अभी भी सांसारिक प्रवृत्तियों की नक़ल करते हैं, धन-दौलत से चिपके रहते हैं, और प्रतिष्ठा की चाह रखते हैं? कुछ लोग, जब चीन की कम्युनिस्ट सरकार द्वारा पकड़े या सताये जाते हैं, तो वे परमेश्वर को भी दोष देते हैं। और-तो-और वे लिखित बयान भी देते हैं, जिसमें वे परमेश्वर को नकारते हैं और उनको धोखा देते हैं। ख़ास तौर से अंत के दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा सत्य की अभिव्यक्ति और न्याय के कार्य के बारे में, लोग अपनी खुद की धारणाओं और भ्रांतियों के आधार पर परमेश्वर के कार्य पर अपनी राय बनाते हैं और उसकी निंदा करते हैं। क्या ये सच नहीं है? इसलिए प्रभु में हमारे विश्वास के चलते हम सिर्फ पापों के लिए माफी पाते हैं। लेकिन हमारे भीतर शैतान की प्रवृत्ति और उसका स्वभाव बना रहता है। यही हमारे पापों और परमेश्वर के विरोध का स्रोत है। अगर हमारी आंतरिक पापी प्रकृति का समाधान नहीं हुआ, तो हम परमेश्वर का विरोध करेंगे, उनको धोखा देंगे, और परमेश्वर को अपना शत्रु मानेंगे। क्या आप कहेंगे कि ऐसा व्यक्ति स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने लायक होगा? अब तो यह साफ़ हो गया होगा कि "पूरा हुआ" कहने के पीछे प्रभु यीशु का मतलब सिर्फ़ यह था कि परमेश्वर का छुटकारे का कार्य पूरा हो गया है। निश्चित रूप से वे यह नहीं कह रहे थे कि मानवजाति को बचाने का सारा कार्य पूरा हो गया है। अंत के दिनों के देहधारी सर्वशक्तिमान परमेश्वर संपूर्ण सत्य व्यक्त करने, और परमेश्वर के लोगों से शुरू करके न्याय का कार्य करने आये। यह आगमन लोगों को पूरी तरह से शुद्ध करने और उनको पूरी तरह से बचाने के लिए था, लोगों के भीतर घर कर गयी पाप की बुनियादी समस्या को सुलझाने के लिए था, ताकि लोग पापों से मुक्त हो सकें, शुद्धता प्राप्त कर सकें, पूर्ण उद्धार प्राप्त कर सकें और परमेश्वर के राज्य में प्रवेश कर सकें। आइए, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों के कुछ और अंश पढ़ें, ताकि हम सब इस बात को और अधिक साफ़ तौर पर समझ सकें।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं: "तुम लोगों जैसा पापी, जिसे परमेश्वर के द्वारा अभी-अभी छुड़ाया गया है, और जो परिवर्तित नहीं किया गया है, या सिद्ध नहीं बनाया गया है, क्या तुम परमेश्वर के हृदय के अनुसार हो सकते हो? तुम्हारे लिए, तुम जो कि अभी भी पुराने अहम् वाले हो, यह सत्य है कि तुम्हें यीशु के द्वारा बचाया गया था, और कि परमेश्वर द्वारा उद्धार की वजह से तुम्हें एक पापी के रूप में नहीं गिना जाता है, परन्तु इससे यह साबित नहीं होता है कि तुम पापपूर्ण नहीं हो, और अशुद्ध नहीं हो। यदि तुम्हें बदला नहीं गया तो तुम संत जैसे कैसे हो सकते हो? भीतर से, तुम अशुद्धता से घिरे हुए हो, स्वार्थी और कुटिल हो, मगर तब भी तुम यीशु के साथ अवतरण चाहते हो—क्या तुम इतने भाग्यशाली हो सकते हो? तुम परमेश्वर पर अपने विश्वास में एक कदम चूक गए हो: तुम्हें मात्र छुटकारा दिया गया है, परन्तु परिवर्तित नहीं किया गया है। तुम्हें परमेश्वर के हृदय के अनुसार होने के लिए, परमेश्वर को व्यक्तिगत रूप से तुम्हें परिवर्तित और शुद्ध करने का कार्य करना होगा; यदि तुम्हें सिर्फ छुटकारा दिया जाता है, तो तुम पवित्रता को प्राप्त करने में असमर्थ होंगे। इस तरह से तुम परमेश्वर के आशीषों में साझेदारी के अयोग्य होंगे, क्योंकि तुमने मनुष्य का प्रबंधन करने के परमेश्वर के कार्य के एक कदम का सुअवसर खो दिया है, जो कि परिवर्तित करने और सिद्ध बनाने का मुख्य कदम है। और इसलिए तुम, एक पापी जिसे अभी-अभी छुटकारा दिया गया है, परमेश्वर की विरासत को सीधे तौर पर उत्तराधिकार के रूप में पाने में असमर्थ हो" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'पदवियों और पहचान के सम्बन्ध में')।

"तुम्हें जानना ही चाहिए कि मैं किस प्रकार के लोगों को चाहता हूँ; वे जो अशुद्ध हैं उन्हें राज्य में प्रवेश करने की अनुमति नहीं है, वे जो अशुद्ध हैं उन्हें पवित्र भूमि को मैला करने की अनुमति नहीं है। तुमने भले ही बहुत कार्य किया हो, और कई सालों तक कार्य किया हो, किंतु अंत में यदि तुम अब भी बुरी तरह मैले हो, तो यह स्वर्ग की व्यवस्था के लिए असहनीय होगा कि तुम मेरे राज्य में प्रवेश करना चाहते हो! संसार की स्थापना से लेकर आज तक, मैंने अपने राज्य में उन लोगों को कभी आसान प्रवेश नहीं दिया है जो अनुग्रह पाने के लिए मेरे साथ साँठ-गाँठ करते हैं। यह स्वर्गिक नियम है, और कोई इसे तोड़ नहीं सकता है!" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है')।

"यद्यपि यीशु ने मनुष्यों के बीच अधिक कार्य किया, फिर भी उसने केवल समस्त मानवजाति की मुक्ति का कार्य पूरा किया और वह मनुष्य की पाप-बलि बना; उसने मनुष्य को उसके समस्त भ्रष्ट स्वभाव से छुटकारा नहीं दिलाया। मनुष्य को शैतान के प्रभाव से पूरी तरह से बचाने के लिए यीशु को न केवल पाप-बलि बनने और मनुष्य के पाप वहन करने की आवश्यकता थी, बल्कि मनुष्य को उसके शैतान द्वारा भ्रष्ट किए गए स्वभाव से मुक्त करने के लिए परमेश्वर को और भी बड़ा कार्य करने की आवश्यकता थी। और इसलिए, अब जबकि मनुष्य को उसके पापों के लिए क्षमा कर दिया गया है, परमेश्वर मनुष्य को नए युग में ले जाने के लिए वापस देह में लौट आया है, और उसने ताड़ना एवं न्याय का कार्य आरंभ कर दिया है। यह कार्य मनुष्य को एक उच्चतर क्षेत्र में ले गया है। वे सब, जो परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन समर्पण करेंगे, उच्चतर सत्य का आनंद लेंगे और अधिक बड़े आशीष प्राप्त करेंगे। वे वास्तव में ज्योति में निवास करेंगे और सत्य, मार्ग और जीवन प्राप्त करेंगे" ("वचन देह में प्रकट होता है" की 'प्रस्तावना')।

"मनुष्य को छुटकारा दिए जाने से पहले शैतान के बहुत-से ज़हर उसमें पहले ही डाल दिए गए थे, और हज़ारों वर्षों तक शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जाने के बाद मनुष्य के भीतर ऐसा स्थापित स्वभाव है, जो परमेश्वर का विरोध करता है। इसलिए, जब मनुष्य को छुटकारा दिलाया गया है, तो यह छुटकारे के उस मामले से बढ़कर कुछ नहीं है, जिसमें मनुष्य को एक ऊँची कीमत पर खरीदा गया है, किंतु उसके भीतर की विषैली प्रकृति समाप्त नहीं की गई है। मनुष्य को, जो कि इतना अशुद्ध है, परमेश्वर की सेवा करने के योग्य होने से पहले एक परिवर्तन से होकर गुज़रना चाहिए। न्याय और ताड़ना के इस कार्य के माध्यम से मनुष्य अपने भीतर के गंदे और भ्रष्ट सार को पूरी तरह से जान जाएगा, और वह पूरी तरह से बदलने और स्वच्छ होने में समर्थ हो जाएगा। केवल इसी तरीके से मनुष्य परमेश्वर के सिंहासन के सामने वापस लौटने के योग्य हो सकता है। आज किया जाने वाला समस्त कार्य इसलिए है, ताकि मनुष्य को स्वच्छ और परिवर्तित किया जा सके; वचन के द्वारा न्याय और ताड़ना के माध्यम से, और साथ ही शुद्धिकरण के माध्यम से भी, मनुष्य अपनी भ्रष्टता दूर कर सकता है और शुद्ध बनाया जा सकता है। इस चरण के कार्य को उद्धार का कार्य मानने के बजाय यह कहना कहीं अधिक उचित होगा कि यह शुद्धिकरण का कार्य है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारण का रहस्य (4)')।

"अंत के दिनों का कार्य सभी को उनके स्वभाव के आधार पर पृथक करना और परमेश्वर की प्रबंधन योजना का समापन करना है, क्योंकि समय निकट है और परमेश्वर का दिन आ गया है। परमेश्वर उन सभी को, जो उसके राज्य में प्रवेश करते हैं—वे सभी, जो बिलकुल अंत तक उसके वफादार रहे हैं—स्वयं परमेश्वर के युग में ले जाता है। फिर भी, स्वयं परमेश्वर के युग के आगमन से पूर्व, परमेश्वर का कार्य मनुष्य के कर्मों को देखना या मनुष्य के जीवन की जाँच-पड़ताल करना नहीं, बल्कि उसकी अवज्ञा का न्याय करना है, क्योंकि परमेश्वर उन सभी को शुद्ध करेगा, जो उसके सिंहासन के सामने आते हैं। वे सभी, जिन्होंने आज के दिन तक परमेश्वर के पदचिह्नों का अनुसरण किया है, वे लोग हैं, जो परमेश्वर के सिंहासन के सामने आते हैं, और ऐसा होने से, हर वह व्यक्ति, जो परमेश्वर के कार्य को उसके अंतिम चरण में स्वीकार करता है, परमेश्वर द्वारा शुद्ध किए जाने लायक है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर के कार्य को उसके अंतिम चरण में स्वीकार करने वाला हर व्यक्ति परमेश्वर के न्याय का पात्र है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है')।

"अंत के दिन पहले ही आ चुके हैं। सृष्टि की सभी चीज़ें उनके प्रकार के अनुसार अलग की जाएँगी और उनकी प्रकृति के आधार पर विभिन्न श्रेणियों में विभाजित की जाएँगी। यही वह क्षण है, जब परमेश्वर लोगों के परिणाम और उनकी मंज़िल प्रकट करता है। यदि लोग ताड़ना और न्याय से नहीं गुज़रते, तो उनकी अवज्ञा और अधार्मिकता को उजागर करने का कोई तरीका नहीं होगा। केवल ताड़ना और न्याय के माध्यम से ही सभी सृजित प्राणियों का परिणाम प्रकट किया जा सकता है। मनुष्य केवल तभी अपने वास्तविक रंग दिखाता है, जब उसे ताड़ना दी जाती है और उसका न्याय किया जाता है। बुरे को बुरे के साथ रखा जाएगा, भले को भले के साथ, और समस्त मनुष्यों को उनके प्रकार के अनुसार अलग किया जाएगा। ताड़ना और न्याय के माध्यम से सभी सृजित प्राणियों का परिणाम प्रकट किया जाएगा, ताकि बुरे को दंडित किया जा सके और अच्छे को पुरस्कृत किया जा सके, और सभी लोग परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन हो जाएँ। यह समस्त कार्य धार्मिक ताड़ना और न्याय के माध्यम से पूरा करना होगा। चूँकि मनुष्य की भ्रष्टता अपने चरम पर पहुँच गई है और उसकी अवज्ञा अत्यंत गंभीर हो गई है, इसलिए केवल परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव ही, जो मुख्यत: ताड़ना और न्याय से संयुक्त है और अंत के दिनों में प्रकट होता है, मनुष्य को रूपांतरित कर सकता है और उसे पूर्ण बना सकता है। केवल यह स्वभाव ही बुराई को उजागर कर सकता है और इस तरह सभी अधार्मिकों को गंभीर रूप से दंडित कर सकता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)')।

"परमेश्वर की ताड़ना और न्याय के कार्य का मूलभूत उद्देश्य मानवता को शुद्ध करना है और उन्हें उनके अंतिम विश्राम के लिए तैयार करना है; इस शुद्धिकरण के बिना संपूर्ण मानवता अपने प्रकार के मुताबिक़ विभिन्न श्रेणियों में वर्गीकृत नहीं की जा सकेगी, या विश्राम में प्रवेश करने में असमर्थ होगी। यह कार्य ही मानवता के लिए विश्राम में प्रवेश करने का एकमात्र मार्ग है। केवल परमेश्वर द्वारा शुद्धिकरण का कार्य ही मनुष्यों को उनकी अधार्मिकता से शुद्ध करेगा और केवल उसकी ताड़ना और न्याय का कार्य ही मानवता के उन अवज्ञाकारी तत्वों को सामने लाएगा, और इस तरह बचाये जा सकने वालों से बचाए न जा सकने वालों को अलग करेगा, और जो बचेंगे उनसे उन्हें अलग करेगा जो नहीं बचेंगे। इस कार्य के समाप्त होने पर जिन्हें बचने की अनुमति होगी, वे सभी शुद्ध किए जाएँगे, और मानवता की उच्चतर दशा में प्रवेश करेंगे जहाँ वे पृथ्वी पर और अद्भुत द्वितीय मानव जीवन का आनंद उठाएंगे; दूसरे शब्दों में, वे अपने मानवीय विश्राम का दिन शुरू करेंगे और परमेश्वर के साथ रहेंगे। जिन लोगों को रहने की अनुमति नहीं है, उनकी ताड़ना और उनका न्याय किया गया है, जिससे उनके असली रूप पूरी तरह सामने आ जाएँगे; उसके बाद वे सब के सब नष्ट कर दिए जाएँगे और शैतान के समान, उन्हें पृथ्वी पर रहने की अनुमति नहीं होगी। भविष्य की मानवता में इस प्रकार के कोई भी लोग शामिल नहीं होंगे; ऐसे लोग अंतिम विश्राम की धरती पर प्रवेश करने के योग्य नहीं हैं, न ही ये उस विश्राम के दिन में प्रवेश के योग्य हैं, जिसे परमेश्वर और मनुष्य दोनों साझा करेंगे क्योंकि वे दंड के लायक हैं और दुष्ट, अधार्मिक लोग हैं। ... बुराई को दंडित करने और अच्छाई को पुरस्कृत करने के परमेश्वर के अंतिम कार्य के पीछे का पूरा उद्देश्य, सभी मनुष्यों को पूरी तरह शुद्ध करना है, ताकि वह पूरी तरह पवित्र मानवता को शाश्वत विश्राम में ला सके। उसके कार्य का यह चरण सबसे अधिक महत्वपूर्ण है; यह उसके समस्त प्रबंधन-कार्य का अंतिम चरण है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे')।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने अंत के दिनों में परमेश्वर के न्याय के कार्य के महत्व और उसके नतीजों के बारे में बहुत साफ़ तौर पर बताया है। इससे हम सुनिश्चित हो सकते हैं कि अंत के दिनों में परमेश्वर का न्याय का कार्य ही वह कार्य है, जो मानवजाति का पूरी तरह से शुद्धिकरण और बचाव करता है। प्रभु यीशु ने छुटकारे का जो कार्य किया, वह अंत के दिनों में परमेश्वर के न्याय कार्य का रास्ता बनाता है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर, प्रभु यीशु के छुटकारे के कार्य की बुनियाद पर न्याय और शुद्धिकरण का कार्य करते हैं, और मानवजाति को पूरी तरह से पाप से बचा कर परमेश्वर के राज्य में लाते हैं। क्या परमेश्वर का ऐसा करना बहुत व्यावहारिक नहीं है? अगर हम सिर्फ प्रभु यीशु के छुटकारे के कार्य को स्वीकार कर लें और परमेश्वर के अंत के दिनों के न्याय और शुद्धिकरण के कार्य को अस्वीकार कर दें, तो हम परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करने की काबिलियत कैसे पायेंगे? लगता है कि परमेश्वर में विश्वास के लिए हमें उनके कार्य की समझ होना ज़रूरी है। ये हमेशा से बेहद अहम रहा है! फिर भी बहुतेरे धार्मिक लोग सिर्फ आस्था के ज़रिए उद्धार में विश्वास रखते हैं। उनका मानना है कि प्रभु में विश्वास से पापों की माफी मिल जाती है, और सारी दिक्कतें खत्म हो जाती हैं, वे ऐसा मानते हैं कि दयावान और प्रेमपूर्ण प्रभु इंसान के हर पाप को माफ़ कर देते हैं। अपने आगमन पर वे उन सभी को स्वर्ग के राज्य में आरोहित कर देंगे। इसलिए वे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के न्याय के कार्य को स्वीकार करने से मना कर देते हैं। ये कैसी समस्या है? क्या ऐसा इंसान परमेश्वर के कार्य को समझ पाता है? क्या वे लोग परमेश्वर के धर्मी स्वभाव को समझ पाते हैं? क्या आपको लगता है कि परमेश्वर ऐसे किसी शैतानी किस्म के इंसान को अपने राज्य में प्रवेश करने की इजाज़त देंगे, जो उनके खिलाफ विद्रोह और उनका विरोध करता है? वे नहीं देंगे! ऐसे इंसान को अगर परमेश्वर के राज्य में प्रवेश मिल जाए तो क्या नतीजा होगा? आइए, एक उदाहरण पर गौर करें। अगर यहोवा परमेश्वर में विश्वास करनेवाले इसराइलियोँ को परमेश्वर के राज्य में लाया गया होता, तो आपको क्या लगता है, क्या होगा? वे देहधारी परमेश्वर, प्रभु यीशु को भी स्वीकार नहीं कर पाये थे, और उन लोगों ने प्रभु यीशु की निंदा करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी, और प्रभु यीशु को सूली पर चढ़ा दिया। ये शैतानी किस्म के लोग जो परमेश्वर का यों पागलों की तरह विरोध करते हैं, अगर वे परमेश्वर के राज्य में प्रवेश कर लें, तो क्या वे परमेश्वर का विरोध करते रहेंगे? क्या वे विद्रोह करेंगे? क्या वे प्रभु की शक्ति छीनने की कोशिश करेंगे? प्रभु यीशु उपदेश देने के लिए उपासना गृह में क्यों नहीं गये? इसलिए कि यहूदी धर्म के मुख्य पादरी, धर्मगुरु और फरीसी बहुत दुष्ट थे। वे कुछ भी कर सकते थे। हम सभी जानते हैं कि जब उन लोगों ने प्रभु यीशु को पकड़ लिया, तो उन लोगों ने उन्हें मारा-पीटा, उन पर ताने कसे, और उन पर थूका। यहाँ तक कि उन्हें सूली पर चढ़ाने के लिए रोमन सरकार को सौंप दिया। प्रभु यीशु को पहले से मालूम था कि वे एक सांप की तरह हैं, इसलिए वे उपदेश देने के लिए उपासना गृह में नहीं गये। अंत के दिनों में, प्रभु यीशु वापस आ गये हैं। वे उपदेश देने के लिए कलीसियाओं में क्यों नहीं जाते? इसलिए कि कलीसियाओं के सभी अगुवा बड़े दुष्ट हैं। अगर देहधारी सर्वशक्तिमान परमेश्वर कलीसियाओं में जाते हैं, तो वे पुलिस को ज़रूर बुलायेंगे। वे पक्के तौर पर सर्वशक्तिमान परमेश्वर को सीसीपी सरकार के हवाले कर देंगे। क्या ये सच नहीं है? क्या हम सर्वशक्तिमान परमेश्वर की खुले आम गवाही देने के लिए कलीसियाओं में जाने की हिम्मत करते हैं? अगर आप उनके सामने सर्वशक्तिमान परमेश्वर की गवाही देंगे, तो वे ज़रूर आपको पकड़ कर बेइज्जत करेंगे और पब्लिक सिक्यूरिटी (जन सुरक्षा) ब्यूरो के हवाले कर देंगे। यही वजह है कि आजकल की कलीसिया उस ज़माने के यहूदी धर्म के उपासना गृहों जैसी ही है। वे सब ऐसी जगहें हैं जहां परमेश्वर को खदेड़ा जाता है, उनका विरोध किया जाता है और उनकी निंदा की जाती है। क्या यही तरीका है? यह दर्शाता है कि मानवजाति किस हद तक भ्रष्ट हो सकती है। लोग सत्य से उकता चुके हैं और उससे नफ़रत करते हैं। लोग परमेश्वर के आगमन को नामंजूर करते हैं, वे सब शैतानी किस्म के लोग हो गये हैं और परमेश्वर का विरोध करते हैं। अगर अंत के दिनों में परमेश्वर ने सत्य को व्यक्त करने, लोगों का न्याय करने और उनको शुद्ध करने के लिए देहधारण न किया होता, तो परमेश्वर मानवजाति द्वारा उनके विरोध की वजह से लोगों को तबाह कर देते।

"मेरे काम में दखल मत दीजिए" फ़िल्म की स्क्रिप्ट से लिया गया अंश

पिछला: प्रश्न 2: आप सबने गवाही दी है कि प्रभु यीशु अंत के दिनों में सत्य व्यक्त करने और न्याय कार्य करने लौट आये हैं। मैं यह क्यों नहीं समझ पाया? मैं बस विश्वास करता हूँ कि प्रभु बादलों पर लौटेंगे; मैं केवल यह विश्वास करता हूँ कि जब प्रभु लौटेंगे, तो उसमें विश्वास करने वाले सभी लोग तुरंत बदल दिए जायेंगे और प्रभु से मिलने के लिए हवा में उठा लिए जायेंगे। जैसा कि पौलुस ने कहा, "पर हमारा स्वदेश स्वर्ग पर है; और हम एक उद्धारकर्ता प्रभु यीशु मसीह के वहाँ से आने की बाट जोह रहे हैं: वह अपनी शक्‍ति के उस प्रभाव के अनुसार जिसके द्वारा वह सब वस्तुओं को अपने वश में कर सकता है, हमारी दीन-हीन देह का रूप बदलकर, अपनी महिमा की देह के अनुकूल बना देगा" (फिलिप्पियों 3:20-21)। और आप सब कहते हैं कि प्रभु का लौटना देहधारण के लिए है, मनुष्य के पुत्र के रूप में प्रकट होने के लिए है और सत्य व्यक्त करके अंत के दिनों में न्याय कार्य करने के लिए है। मैं समझता हूँ, यह असंभव है! चूंकि परमेश्वर सर्वशक्तिमान हैं, परमेश्वर के एक अकेले वचन ने स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीज़ों की सृष्टि की, और मरे हुओं को फिर से जीवित कर दिया। परमेश्वर एक वचन से हमें पवित्रता में बदल सकते हैं। सत्य व्यक्त करके मनुष्य के साथ न्याय और शुद्धिकरण करने के लिए, प्रभु को देहधारण करने की क्या ज़रूरत है?

अगला: प्रश्न 4: हमने सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर के वचनों को पढ़ा है और पाया है कि ऐसी कुछ बातें हैं जो बहुत कठोर हैं। वे मानव जाति का न्याय, निंदा और अभिशाप हैं। मुझे लगता है कि अगर परमेश्‍वर न्याय करते हैं और लोगों को शाप देते हैं, तो क्या यह उनकी निंदा और सज़ा के समान नहीं है? यह कैसे कहा जा सकता है कि इस तरह का न्याय मानव जाति को शुद्ध करने और बचाने के लिए है?

अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

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