35. वास्तविक कार्य न करने पर चिंतन

जू यान, चीन द्वारा

मई 2023 में मैं धर्मोपदेश कार्य की प्रभारी थी। अक्टूबर के मध्य में एक समूह अगुआ को वास्तविक कार्य न करने के कारण बरखास्त कर दिया गया और बाद में भाई ली जी को समूह अगुआ चुना गया। उस समय अगुआ ने मुझे याद दिलाने के लिए एक विशेष पत्र भेजा जिसमें कहा गया था कि ली जी की योग्यता औसत है, उसमें कार्यक्षमता की कमी है और मुझसे उसकी ज्यादा सहायता और सहयोग करने को कहा। इसलिए उसी दिन मैंने ली जी को एक पत्र लिखा, जिसमें समूह के सदस्यों की विशिष्ट स्थितियों और समूह के जरूरी मुद्दों का परिचय दिया, मैंने उससे कार्य को इसके अनुसार प्राथमिकता देने का कहा। ली जी ने उत्तर दिया, कहा कि पहले तो उसे लगा था कि उसकी योग्यता अपर्याप्त है, उसमें बहुत सी कमियाँ हैं और वह समूह अगुआ होने के कर्तव्य के लिए उपयुक्त नहीं है, लेकिन परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद उसकी अवस्था बदल गई है और उसने आगामी कार्य के लिए एक योजना बना ली है। मैंने मन ही मन सोचा, “ली जी में कुछ जीवन प्रवेश है। भले ही उसमें कार्यक्षमता की कमी है, लेकिन अगर वह सही व्यक्ति है तो कमियों से डरने की जरूरत नहीं है, मैं उसका और अधिक सहयोग और सहायता कर सकती हूँ।” मुझे लगा कि एक बार जब वह कुछ सिद्धांत समझ लेगा और कुछ कार्य अनुभव प्राप्त कर लेगा तो सब ठीक हो जाएगा। उसके बाद से मैं ली जी के कार्य का बारीकी से जायजा लेने लगी। वह मेरे सुझावों को स्वीकार करने लगा और कार्य के विवरण पर समय पर प्रतिक्रिया देने लगा।

एक महीने से कुछ ही ज्यादा समय में ली जी को धीरे-धीरे तीन पाठ आधारित कार्य दल के सदस्य मिल गए जिनमें से सभी में कुछ न कुछ योग्यता थी। मुझे यह सोचकर बहुत खुशी हुई, “मुझे हमेशा उपयुक्त लोगों को खोजने में संघर्ष करना पड़ता था, लेकिन ली जी अभी-अभी आया है और उसे आते ही उपयुक्त लोग मिल गए हैं। लगता है ली जी की कार्यक्षमता बहुत बुरी नहीं है।” मैंने उस समय के बारे में सोचा जब मैं तीन समूहों के कार्य और लोगों को विकसित करने के लिए जिम्मेदार थी। उस समय मैं हर दिन बेचैन रहती थी, लेकिन अब जब ली जी को अपने कार्य की लगभग समझ आ गई है तो मैं थोड़ा आराम कर सकती हूँ। उसके बाद मैंने कार्य का उतनी बारीकी से जायजा नहीं लिया। पंंद्रह दिन बाद मैंने देखा कि जिस समूह की जिम्मेदारी ली जी के पास है, उसने कोई धर्मोपदेश जमा नहीं किया है। मैं थोड़ा उलझन में थी, “ली जी ने कहा कि समूह में अभी-अभी शामिल हुई तीन बहनों में कुछ योग्यता है तो फिर उनके कर्तव्यों से कोई स्पष्ट नतीजे क्यों नहीं दिख रहे हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि अभी-अभी प्रशिक्षण शुरू करने के कारण वे सिद्धांतों को समझ नहीं पा रही हैं?” यह सोचकर मैं समूह के धर्मोपदेशों की पड़ताल की स्थिति की जाँच करने गई और मैंने पाया कि ली जी धर्मोपदेशों में कुछ कमियाँ पहचान सकता है और कार्य में कोई स्पष्ट विचलन नहीं है। मैंने सोचा, “ली जी जिस कार्य का जिम्मेदार था, उसके नतीजे हमेशा से ही खराब रहे हैं। तुरंत नतीजों की उम्मीद करना संभव नहीं है। शायद समय के साथ इसमें सुधार होगा।” उस समय मैंने यह भी सोचा, “क्या मुझे और जाँच करनी चाहिए?” लेकिन एक बार जब मैंने सोचा कि अगर वाकई समस्याएँ हैं तो मुझे समस्याओं को सुलझाने में समय लगाना होगा और मुझे अभी भी दो अन्य समूहों के कार्य का जायजा लेना है, मुझे लगा कि अगर मुझे इन सब में शामिल होना पड़ा तो मैं थक जाऊँगी! काफी सोचने के बाद मैंने आखिरकार तय किया कि ली जी से ही इसकी जाँच और समाधान करवाना बेहतर होगा। एक बार मुझे पता चला कि स्थानांतरित हुईं तीन नई बहनों में से एक लू युआन, ली जी के जायजा लेने और पर्यवेक्षण के प्रति प्रतिरोधी महसूस कर रही है, उसे लग रहा था कि कार्य की प्रगति के बारे में लगातार पूछताछ करना उसके समय की बरबादी है और उसने यह विचार दूसरों के सामने भी व्यक्त किया। मुझे पता था कि उसका रवैया गलत है और इससे धर्मोपदेश कार्य प्रभावित होगा, लेकिन मैंने आगे जाँच नहीं की और इसे सुलझाने की कोशिश नहीं की और मैंने ली जी से लू युआन के साथ संगति करने के लिए कहा। बाद में ली जी ने बताया कि लू युआन अपना कर्तव्य सामान्य रूप से कर रही है, इसलिए मैंने इस मामले पर आगे कोई जायजा नहीं लिया।

मुझे पता भी नहीं चला और आधा दिसंबर बीत गया और मैंने पाया कि ली जी की जिम्मेदारी वाले समूह ने अभी तक ज्यादा धर्मोपदेश नहीं दिए हैं। मुझे एहसास हुआ कि कुछ गड़बड़ है, इसलिए मैंने स्थिति के बारे में पूछने के लिए जल्दी से ली जी को एक पत्र लिखा। उसने कहा कि उसकी अवस्था ठीक नहीं है, कई भाई-बहनों ने कहा था कि वह वास्तविक कार्य नहीं कर सकता या अपने कर्तव्यों में आने वाली मुश्किलों का समाधान नहीं कर सकता, और वे उसकी रिपोर्ट करने पर विचार कर रहे हैं। उस समय मैं हैरान रह गई। क्या वह पहले कुछ कार्य नहीं कर पाता था? अचानक उसकी रिपोर्ट करने की नौबत कैसे आ गई? मुझे थोड़ा डर लगा। इस समूह का कार्य इस प्रकार होने का कारण यह था कि इस अवधि के दौरान मैं वास्तविक कार्य नहीं कर रही थी। मेरे ऊपर एक ऐसी जिम्मेदारी थी जिससे मैं बच नहीं सकती थी। मैं स्थिति को समझने के लिए तुरंत समूह के पास गई। मुझे आश्चर्य हुआ कि ली जी को लगा कि उसकी योग्यता कम है और वह समूह का अगुआ नहीं बन सकता, इसलिए उसने जिम्मेदारी ली और इस्तीफा दे दिया। अगुआ ने संगति और मदद करने की भरसक कोशिश की, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। ली जी के जाने के बाद मुझे पता चला कि जिस समूह की जिम्मेदारी ली जी की थी, उसमें ढेर सारी समस्याएँ हैं। लू युआन हमेशा नकारात्मकता फैलाती रहती थी। उसे लगता था कि ली जी द्वारा उसके कार्य की निगरानी और जाँच उसका समय बरबादी कर रही है जिसके कारण ली जी धर्मोपदेश कार्य का जायजा नहीं ले पा रहा था जिससे धर्मोपदेश कार्य के नतीजों पर बुरा असर पड़ा। जिन तीन नई बहनों का अभी-अभी तबादला हुआ था, वे अनियंत्रित और अनुशासनहीन थीं और अपने कर्तव्यों में अव्यवस्थित थीं, जब उन्हें कोई मुश्किल आती थी तो वे उसे ली जी पर डाल देती थीं। लेकिन ली जी ने कभी भी उनके अपने कर्तव्यों के प्रति रवैये का मुद्दा नहीं उठाया, न ही उसने अपने उच्च स्तर को इसकी रिपोर्ट की। उसने उन्हें बस यूँ ही चलते रहने दिया। यह सब जानकर मैं दंग रह गई। ली जी ने तीन महीनों में कार्य को इस हद तक पहुँचा दिया था और समूह के सदस्य अपने कर्तव्यों में बेहद अनमने हो गए थे—मुझे इन मुद्दों के बारे में बिल्कुल भी पता नहीं था। इससे धर्मोपदेश का कार्य ठप्प पड़ गया था। मुझे इस बात का पछतावा हुआ कि मैं ज्यादा सजग क्यों नहीं रही! बाद में मैंने समूह के अनुपयुक्त सदस्यों को बरखास्त कर दिया और कुछ नए लोगों को नियुक्त किया और उसके बाद ही कार्य में धीरे-धीरे सुधार होने लगा।

इस घटना के बाद मुझे बहुत ग्लानि हुई। मुझे अच्छी तरह पता था कि ली जी की योग्यता औसत है और उसकी कार्यक्षमता भी अच्छी नहीं है तो मैं इस समूह के कार्य की बागडोर कैसे छोड़ सकती थी और उसकी उपेक्षा कैसे कर सकती थी? अगर मैंने कार्य पर नजर रखने और उसका जायजा लेने पर ज्यादा ध्यान दिया होता तो मैं ली जी की समस्याओं का पहले ही पता लगा सकती थी और इस तरह इन नतीजों से बच सकती थी। इस तरह से कार्य करने से पता चला कि मैं वास्तविक कार्य नहीं कर रही थी। उस दौरान मैं अक्सर झूठे अगुआओं को उजागर करने वाले परमेश्वर के वचनों को खोजती और पढ़ती थी। उनमें से एक अंश ऐसा था जो खास तौर पर मेरी अवस्था से संबंधित था। परमेश्वर कहता है : “नकली अगुआ कभी भी विभिन्न टीम पर्यवेक्षकों की कार्य स्थितियों के बारे में नहीं पूछते या उनकी निगरानी नहीं करते। वे विभिन्न टीमों के पर्यवेक्षकों और विभिन्न महत्वपूर्ण कार्यों के लिए जिम्मेदार कार्मिकों के जीवन प्रवेश के साथ ही कलीसिया के कार्य और उनके कर्तव्यों के साथ-साथ परमेश्वर में आस्था, सत्य और स्वयं परमेश्वर के प्रति उनके रवैयों के बारे में भी न तो पूछते हैं, न ही इसकी निगरानी करते हैं या इस बारे में समझ रखते हैं। वे नहीं जानते कि इन व्यक्तियों में कोई परिवर्तन या विकास हुआ है या नहीं, न ही वे उनके कार्य से जुड़ी विभिन्न संभावित समस्याओं के बारे में जानते हैं; खासकर वे कार्य के विभिन्न चरणों में होने वाली त्रुटियों और विचलनों के कारण कलीसिया के कार्य और परमेश्वर के चुने हुए लोगों के जीवन प्रवेश पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में नहीं जानते, साथ ही वे यह भी नहीं जानते कि इन त्रुटियों और विचलनों को कभी सुधारा गया है या नहीं। वे इन सभी चीजों से पूरी तरह से अनभिज्ञ होते हैं। अगर उन्हें इन विस्तृत स्थितियों के बारे में कुछ भी पता नहीं होता तो समस्याएँ आने पर वे निष्क्रिय हो जाते हैं। परंतु नकली अगुआ अपना काम करते समय इन विस्तृत मुद्दों की बिल्कुल परवाह नहीं करते। वे मानते हैं कि विभिन्न टीम पर्यवेक्षकों की व्यवस्था करने और उन्हें काम सौंप देने पर उनका कार्य पूरा हो जाता है—इसे काम को अच्छी तरह से करना समझा जाता है और यदि अन्य समस्याएँ आती हैं तो वे उनकी चिंता का विषय नहीं हैं। चूँकि नकली अगुआ विभिन्न टीम पर्यवेक्षकों की देख-रेख करने, उनका निर्देशन करने और उन पर निगरानी रखने में विफल रहते हैं और इन क्षेत्रों में अपनी जिम्मेदारियों को अच्छे से नहीं निभाते, नतीजतन कलीसिया के कार्य में गड़बड़ी हो जाती है। इसे ही अगुआओं और कार्यकर्ताओं का अपनी जिम्मेदारियों में लापरवाही बरतना कहते हैं। परमेश्वर मानव हृदय की गहराइयों की पड़ताल कर सकता है; यह क्षमता मनुष्य में नहीं है। इसलिए काम करते समय लोगों को ज्यादा मेहनती होने और चौकस रहने की जरूरत है, कलीसिया के कार्य की सामान्य प्रगति सुनिश्चित करने के लिए नियमित रूप से कार्यस्थल पर जाकर निगरानी, देख-रेख और निर्देशन करने की जरूरत है। साफ है कि नकली अगुआ अपने कार्य में पूरी तरह गैर-जिम्मेदार होते हैं और वे कभी भी विभिन्न कामों की देख-रेख, निगरानी या निर्देशन नहीं करते हैं। परिणामस्वरूप कुछ पर्यवेक्षक यह नहीं जानते कि कार्य में आने वाली विभिन्न समस्याओं को कैसे हल किया जाए और कार्य करने में लगभग पर्याप्त रूप से सक्षम न होने के बावजूद वे पर्यवेक्षक की भूमिका में बने रहते हैं। अंततः कार्य में बार-बार देरी होती है और वे इसे पूरी तरह से बिगाड़ देते हैं। नकली अगुआओं द्वारा पर्यवेक्षकों की स्थितियों के बारे में पूछताछ न करने, उनकी देख-रेख न करने या उसके बारे में निगरानी न करने का यही दुष्परिणाम होता है, जो पूरी तरह से नकली अगुआओं की अपनी जिम्मेदारी के प्रति लापरवाही के कारण होता है(वचन, खंड 5, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ (3))। परमेश्वर कहता है कि झूठे अगुआ अपने कर्तव्यों के प्रति गैर-जिम्मेदार होते हैं और वास्तविक कार्य नहीं करते। पर्यवेक्षक चुनने के बाद उन्हें लगता है कि सब ठीक है और अब वे कार्य से मुक्त हो सकते हैं। इसलिए वे कार्य के विभिन्न पहलुओं पर ध्यान नहीं देते या उनकी बारीकियों को नहीं समझते। उन्हें यह भी नहीं पता होता कि पर्यवेक्षक या कर्तव्य निभाने वाले लोग वास्तव में सक्षम हैं भी या नहीं या कार्य ठप्प हो गया है जिससे कार्य को गंभीर नुकसान पहुँच रहा है। यह एक प्रमाणिक झूठा अगुआ है। मैं बिल्कुल वैसी ही झूठी अगुआ थी जिसके बारे में परमेश्वर बात करता है। ली जी को समूह अगुआ चुने जाने के बाद मैंने देखा कि उसे तीन पाठ-आधारित कार्य दल के सदस्य मिले और जब मैंने उससे कार्य के बारे में बात की तो उसका रवैया हमेशा काफी अच्छा रहा। इसलिए मुझे लगा कि ली जी ने अच्छा कार्य किया है और मैं उसे कार्य सौंपकर निश्चिंत रह सकती हूँ। फिर मैं एक नौकरशाह बन गई, उसके कार्य की निगरानी नहीं की या जायजा नहीं लिया। नतीजतन मुझे पता ही नहीं चला कि ली जी अपने कर्तव्यों में संघर्ष कर रहा था, मुझे इस बात का भी जरा अंदाजा नहीं था कि समूह के सदस्य उचित कार्यों की उपेक्षा कर रहे थे और अपने कर्तव्यों में अनमने हो रहे थे। मुझे पता था कि उनके समूह में धर्मोपदेश का कार्य लगातार नतीजे नहीं दे रहा है, लेकिन मुझे डर था कि अगर मैंने बारीकियों पर गौर किया तो मुझे समस्याओं को सुलझाने में समय और मेहनत लगानी पड़ेगी, इसलिए मैंने यह कार्य ली जी पर छोड़ दिया। इसके अलावा लू युआन ने दूसरों को अपने कार्य का पर्यवेक्षण नहीं करने दिया और समूह में नकारात्मकता फैलाती रही। उसने धर्मोपदेश के कार्य में रुकावट डालने वाली भूमिका निभाई। मैंने उसकी समस्याओं को उजागर नहीं किया, बल्कि ली जी को उन्हें सँभालने दिया और बाद में मैंने नतीजों का जायजा नहीं लिया। इस वजह से समस्याएँ अनसुलझी रह गईं और लू युआन समूह में सकारात्मक भूमिका निभाने में विफल रही, जिससे कार्य की प्रगति प्रभावित हुई। यह देखकर मुझे एहसास हुआ कि मैं वाकई एक झूठी अगुआ बन रही थी। अपने कर्तव्य करने से मेरे पास अपराधों के अलावा कुछ नहीं बचा।

बाद में मैंने चिंतन किया, “आखिर क्या वजह थी कि मैं ली जी पर इतना भरोसा करती थी?” मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “नकली अगुआ उन पर्यवेक्षकों के बारे में कभी पूछताछ नहीं करते जो वास्तविक कार्य नहीं कर रहे होते हैं या जो अपने उचित कार्यों पर ध्यान नहीं दे रहे होते हैं। उन्हें लगता है कि उन्हें बस एक पर्यवेक्षक चुनना है और मामला खत्म; और कि बाद में पर्यवेक्षक सभी कार्य-संबंधी मामलों को अपने आप सँभाल सकता है। इसलिए नकली अगुआ जब-तब बस सभाएँ आयोजित करता है लेकिन काम का पर्यवेक्षण नहीं करता, न ही पूछता है कि काम कैसा चल रहा है और किसी काम को हाथ न लगाने वाले उच्चाधिकारियों की तरह व्यवहार करता है। ... वे स्वयं कोई वास्तविक कार्य करने में अक्षम होते हैं और समूह अगुआओं और पर्यवेक्षकों के कार्य के बारे में सूक्ष्मता से ध्यान भी नहीं देते—वे इसकी न तो खोज-खबर करते हैं, न ही इस बारे में पूछताछ करते हैं। लोगों के बारे में उनका नजरिया उनकी अपनी सोच और कल्पनाओं पर आधारित होता है। वे किसी को कुछ समय के लिए अच्छा काम करते देखते हैं तो उन्हें लगता है कि वह व्यक्ति हमेशा ही अच्छा काम करेगा, उसमें कोई बदलाव नहीं आएगा; अगर कोई कहता है कि इस व्यक्ति के साथ कोई समस्या है तो वह उस पर विश्वास नहीं करता, अगर कोई उन्हें उस व्यक्ति के बारे में चेतावनी देता है तो वह उसे अनदेखा कर देता है। क्या तुम्हें लगता है कि नकली अगुआ बेवकूफ होता है? वे बेवकूफ और मूर्ख होते हैं। उन्हें क्या चीज बेवकूफ बनाती है? वे यह मानते हुए लोगों पर सहर्ष विश्वास कर लेते हैं कि चूँकि जब उन्होंने इस व्यक्ति को चुना था तो इस व्यक्ति ने शपथ ली थी, संकल्प किया था और आँसू बहाते हुए प्रार्थना की थी, यानी वह भरोसे के लायक है और काम का प्रभार रखते हुए उसके साथ कभी कोई समस्या नहीं होगी। नकली अगुआओं को लोगों की प्रकृति की कोई समझ नहीं होती; वे भ्रष्ट मानवजाति की असल स्थिति से अनजान होते हैं। वे कहते हैं, ‘पर्यवेक्षक के रूप में चुने जाने के बाद कोई कैसे बदल सकता है? इतना गंभीर और विश्वसनीय प्रतीत होने वाला व्यक्ति कामचोरी कैसे कर सकता है? वह कामचोरी नहीं करेगा, है न? उसमें बहुत ईमानदारी है।’ चूँकि नकली अगुआओं की अपनी कल्पनाओं और अनुभूतियों में बहुत ज्यादा आस्था होती है, यह अंततः उन्हें कलीसिया के काम में उत्पन्न होने वाली कई समस्याओं का समय पर समाधान करने में असमर्थ बना देती है और संबंधित पर्यवेक्षक को तुरंत बर्खास्त करने और उसके कर्तव्य भार का समायोजन करने से रोकती है। वे प्रामाणिक नकली अगुआ हैं। ... नकली अगुआओं में यह घातक कमी होती है : वे अपनी कल्पनाओं के आधार पर लोगों पर जल्दी भरोसा कर लेते हैं। और यह सत्य को न समझने के कारण होता है, है न? परमेश्वर के वचन भ्रष्ट लोगों के सार का खुलासा कैसे करते हैं? जब परमेश्वर ही लोगों पर भरोसा नहीं करता तो वे क्यों करें? नकली अगुआ बहुत घमंडी और आत्मतुष्ट होते हैं, है न? वे यह सोचते हैं, ‘मैं इस व्यक्ति को परखने में गलत नहीं हो सकता, जिस व्यक्ति को मैंने उपयुक्त समझा है उसके साथ कोई समस्या नहीं होनी चाहिए; वह निश्चित रूप से ऐसा नहीं है जो खाने, पीने और मस्ती करने में रमा रहे, आराम पसंद करे और मेहनत से नफरत करे। वह पूरी तरह से भरोसेमंद और विश्वसनीय है। वह बदलेगा नहीं; अगर वह बदला तो इसका मतलब होगा कि मैं उसके बारे में गलत था, है न?’ यह कैसा तर्क है? क्या तुम कोई विशेषज्ञ हो? क्या तुम्हारे पास एक्सरे जैसी दृष्टि है? क्या तुममें विशेष कौशल है? तुम किसी व्यक्ति के साथ एक-दो साल तक रह सकते हो, लेकिन क्या तुम उसके प्रकृति सार को पूरी तरह से उजागर करने वाले किसी उपयुक्त वातावरण के बिना यह देख पाओगे कि वह वास्तव में कौन है? अगर परमेश्वर ऐसे लोगों को उजागर न करे तो तुम्हें तीन या पाँच वर्षों तक उनके साथ रहने के बाद भी यह जानने के लिए संघर्ष करना पड़ेगा कि उनका प्रकृति सार किस तरह का है। और जब तुम उनसे शायद ही कभी मिलते हो, शायद ही कभी उनके साथ होते हो तो यह भी कितना सच होगा? किसी की अस्थायी छवि या किसी के द्वारा उनके सकारात्मक मूल्यांकन के आधार पर नकली अगुआ प्रसन्नतापूर्वक उन पर भरोसा कर लेते हैं और ऐसे व्यक्ति को कलीसिया का काम सौंप देते हैं। इसमें क्या वे अत्यधिक अंधे नहीं हो जाते हैं? क्या वे उतावली से काम नहीं ले रहे हैं? और जब नकली अगुआ इस तरह से काम करते हैं तो क्या वे बेहद गैर-जिम्मेदार नहीं होते?(वचन, खंड 5, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ (3))। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मुझे समझ आया कि मैं लोगों पर आँख मूँदकर और बिना सोचे-समझे भरोसा क्यों करती थी। मूल कारण यह था कि मैं सत्य नहीं समझती थी, बहुत अहंकारी थी, लोगों को अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के अनुसार आंकती थी। मैं यह मान लेती थी कि कोई व्यक्ति सिर्फ इसलिए वास्तविक कार्य कर सकता है क्योंकि उसने एक पल के लिए थोड़ा अच्छा प्रदर्शन किया है। इस वजह से मैं लोगों पर जरूरत से ज्यादा भरोसा करने लगी और कार्य का पर्यवेक्षण करने और जायजा लेने में लापरवाही बरतने लगी। दरअसल अगुआ ने मुझे चेताया था कि ली जी की योग्यता और कार्यक्षमता बहुत अच्छी नहीं है, उसने मुझे कार्य के विवरण का ज्यादा जायजा लेने और कार्य करने में उसका और ज्यादा मार्गदर्शन करने के लिए कहा था। लेकिन चूँकि ली जी को तीन पाठ-आधारित कार्य दल के सदस्य मिल गए थे और उसने धर्मोपदेशों में कुछ समस्याएँ देखी थीं, इसलिए मैंने उसके बारे में अपना नजरिया बदल दिया, सोचने लगी कि उसमें कुछ कार्यक्षमता है और उसकी योग्यता भी बहुत बुरी नहीं है। उसके बाद मैंने उसके कार्य में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई, नतीजतन कार्य में देरी हुई। लेकिन जब मैंने वाकई उन बातों पर विचार किया तो मुझे एहसास हुआ कि तीन में से दो सदस्य तो अगुआ ने ही दिए थे और ली जी सिर्फ उनके कर्तव्यों की व्यवस्था करने के लिए जिम्मेदार था। ऐसा नहीं था कि ली जी ने स्वयं लोगों को विकसित करके उन्हें खोजा था। इसके अलावा उसे धर्मोपदेशों में कुछ मसले इसलिए नजर आए क्योंकि उसने धर्मोपदेश लिखने का अभ्यास किया था और वह कुछ सिद्धांतों को समझ पाया था। लेकिन जब सत्य का उपयोग करके समस्याओं का समाधान करने की बात आई, जैसे समूह के सदस्यों की अवस्था और अपने कर्तव्यों के प्रति उनके रवैये से जुड़ी समस्याओं का समाधान करना था तो वह ऐसा नहीं कर पाया। मैं लोगों को सत्य सिद्धांतों के अनुसार नहीं आंक रही थी, इसके अलावा मैं आराम में लिप्त थी और कष्ट सहने या कीमत चुकाने को तैयार नहीं थी, ली जी के कार्य का विस्तार से जायजा नहीं ले रही थी या मार्गदर्शन नहीं कर रही थी। आखिरकार इससे कार्य को नुकसान पहुँचा। इस पर चिंतन करते हुए मुझे अपने दिल में अपराध बोध और पछतावा दोनों महसूस हुए। मुझे एहसास हुआ कि मैं सचमुच अपनी आँखों और दिल दोनों से अंधी हो चुकी थी।

उसके बाद मैंने यह पढ़ने के लिए परमेश्वर के वचन खोजे कि वास्तविक कार्य कैसे किया जाए। परमेश्वर कहता है : “कोई अगुआ या कर्मी चाहे जो भी महत्वपूर्ण कार्य करे और उस कार्य की प्रकृति चाहे जो हो, उसकी पहली प्राथमिकता यह समझना और पकड़ना है कि कार्य कैसे चल रहा है। चीजों की खोज-खबर लेने और प्रश्न पूछने के लिए उन्हें व्यक्तिगत रूप से वहाँ होना चाहिए और उनकी सीधी जानकारी प्राप्त करनी चाहिए। उन्हें केवल सुनी-सुनाई बातों के भरोसे नहीं रहना चाहिए या दूसरे लोगों की रिपोर्टों पर ध्यान नहीं देना चाहिए। बल्कि उन्हें अपनी आँखों से देखना चाहिए कि कार्मिकों की स्थिति क्या है और काम कैसे आगे बढ़ रहा है और समझना चाहिए कि कठिनाइयाँ क्या हैं, कोई क्षेत्र ऊपरवाले की अपेक्षाओं के विपरीत तो नहीं है, कहीं सिद्धांतों का उल्लंघन तो नहीं हुआ, कहीं कोई बाधा या गड़बड़ी तो नहीं है, आवश्यक उपकरण की या पेशेवर कामों से जुड़े कार्य में निर्देशात्मक सामग्री की कमी तो नहीं है—उन्हें इन सब पर नजर रखनी चाहिए। चाहे वे कितनी भी रिपोर्टें सुनें या सुनी-सुनाई बातों से वे कितना भी कुछ छान लें, इनमें से कुछ भी व्यक्तिगत दौरे पर जाने की बराबरी नहीं करता; चीजों को अपनी आँखों से देखना अधिक सटीक और विश्वसनीय होता है। एक बार वे स्थिति के सभी पक्षों से परिचित हो जाएँ, तो उन्हें इस बात का अच्छा अंदाजा हो जाएगा कि क्या चल रहा है। उन्हें खासतौर पर इस बात की स्पष्ट और सटीक समझ होनी चाहिए कि कौन अच्छी क्षमता का है और विकसित किए जाने योग्य है, क्योंकि इसी से वे लोगों को सटीक ढंग से विकसित कर उनका उपयोग कर पाते हैं जो इस बात के लिए अहम है कि अगुआ और कार्मिक अपना काम ठीक से करें(वचन, खंड 5, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ (4))। परमेश्वर कहता है कि वास्तविक कार्य को अच्छी तरह से करने के लिए मुख्य बात यह है कि हम देह के बारे में न सोचें और केवल दूसरों की रिपोर्ट न सुनें। हमें व्यक्तिगत रूप से भाग लेना चाहिए, कार्यस्थल की गहराई में जाना चाहिए और कार्य के विवरण को समझना चाहिए। हमें समस्याओं के समाधान में भी व्यक्तिगत रूप से भाग लेना चाहिए। हमें बिना जायजा लिए कार्य को केवल कार्यान्वित ही नहीं करना चाहिए, बल्कि कुछ समय बाद उसके नतीजों का जायजा भी लेना चाहिए और हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हम समस्याओं का पता लगाकर उनका समाधान करें। इसलिए मैंने मन ही मन परमेश्वर से प्रार्थना की कि मैं अब नौकरशाह नहीं रहूँगी, उसके बाद मैंने विस्तृत कार्य करने पर ध्यान केंद्रित करना शुरू कर दिया, कुछ मुद्दों के बारे में स्वयं पूछताछ करने और उन्हें सुलझाने के लिए कार्य करने लगी। उस समय जिस समूह के लिए बहन सु जिंग जिम्मेदार थी, वहाँ धर्मोपदेश कार्य का कोई नतीजा नहीं मिल रहा था और जब मैं कार्य की जाँच करने आई तो उसने रिपोर्ट किया कि कैसे उसने वास्तविक कार्य किया, कैसे कष्ट सहना पड़ा और कीमत चुकानी पड़ी। उसकी रिपोर्ट सुनकर ऐसा लगा कि सु जिंग ने बहुत कुछ किया है, लेकिन यह कार्य के नतीजों से मेल नहीं खाता था, इसलिए मैंने कार्य की बारीकी से जाँच शुरू की। मैंने पाया कि सु जिंग अपनी प्रतिष्ठा और रुतबे को लेकर बहुत चिंतित थी, कार्य की रिपोर्ट करते समय वह सिर्फ अच्छी खबरों की ही रिपोर्ट करती थी, बुरी खबरों की नहीं। जब मैं कार्य के बारे में विस्तार से पूछताछ करती तो वह हमेशा मुख्य मुद्दों से बचती थी, कई दौर की जाँच-पड़ताल के बाद मुझे यकीन हो गया कि सु जिंग में कोई कार्यक्षमता नहीं है और फिर मैंने उसे बरखास्त कर दिया। क्योंकि मुझे उस समय समूह का अगुआ बनने के लिए कोई उपयुक्त व्यक्ति नहीं मिल रहा था, इसलिए मैंने कार्य की कुछ बारीकियों को खुद ही सँभाल लिया। दो महीने तक वाकई कार्य में भाग लेने और उसका जायजा लेने के बाद धर्मोपदेश कार्य के नतीजे बेहतर हुए। मुझे असली कार्य करने का स्वाद चखने का मौका मिला।

मुझे पता भी नहीं चला कि कब अप्रैल आ गया। जिन तीन समूहों की मैं जिम्मेदार थी, उनके कार्य में धीरे-धीरे प्रगति दिखाई देने लगी और हमने समूह के अगुआ के लिए उम्मीदवारों की पहचान कर ली थी। मैं मन ही मन योजना बना रही थी, “कार्य आखिरकार पटरी पर आ गया है और अगर मैं नियमित रूप से चीजों पर नजर रखूँ तो सब ठीक रहेगा, और मैं आखिरकार आराम कर सकती हूँ।” धीरे-धीरे मैं रोजाना जमा किए जाने वाले धर्मोपदेशों पर ही ध्यान देने लगी और मैं अब कार्य के विवरण पर ध्यान देने की पहल नहीं करती थी। जून में एक दिन मैंने एक अनुभवजन्य गवाही वीडियो देखा जिसमें भाई कलीसिया अगुआ था और सुसमाचार कार्य के लिए जिम्मेदार था। वह कार्य काफी बारीकी से करता था और हर संभावित सुसमाचार प्राप्तकर्ता की स्थिति को अच्छी तरह जानता था। मैंने अपनी तुलना उससे की और महसूस किया कि मैं बहुत पीछे हूँ। खासकर पिछले पंद्रह दिनों में मैं सिर्फ धर्मोपदेश जमा कराकर ही संतुष्ट थी और मैंने हर समूह के कार्य के विवरण पर ध्यान नहीं दिया था। मुझे एहसास हुआ कि मैं अपने कार्य में थोड़ी ढीली पड़ गई हूँ। मैंने सोचा कि मुझे जल्दी से चीजों को बदलना होगा। बाद में मैंने कई समूहों के कार्य के विवरण की जाँच शुरू की। मुझे तब तक इसका एहसास नहीं हुआ जब तक मैंने देखा नहीं, लेकिन जब मैंने देखा तो मैं चौंक गई। एक समूह के पास धर्मोपदेशों का लंबित कार्य का ढेर लगा था जिसकी समीक्षा नहीं हुई थी और दूसरे समूह में कार्य के नतीजों में उल्लेखनीय गिरावट आई थी। जितना मैंने जाँच की, उतनी ही ज्यादा समस्याएँ मुझे मिलीं। मुझे खुद पर बहुत गुस्सा आ रहा था। मैं न चाहते हुए भी फिर से एक झूठे अगुआ के रास्ते पर कैसे चल पड़ी? मैंने प्रार्थना और खोज की और मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा : “एक और प्रकार का नकली अगुआ होता है, जिसके बारे में हमने अक्सर ‘अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ’ विषय पर संगति करते समय बात की है। इस प्रकार के अगुआओं में कुछ काबिलियत होती है, वे बेवकूफ नहीं होते हैं, उनके पास अपने कार्य करने के तौर-तरीके और विधियाँ होती हैं, और समस्याएँ हल करने के लिए योजनाएँ होती हैं, और जब उन्हें कार्य का कोई अंश दिया जाता है, तो वे उसे अपेक्षित मानकों के लगभग अनुरूप कार्यान्वित कर सकते हैं। वे कार्य के दौरान उत्पन्न होने वाली किसी भी समस्या का पता लगाने में समर्थ होते हैं और उनमें से कुछ समस्याएँ हल भी कर सकते हैं; जब वे कुछ लोगों द्वारा सूचित की गई समस्याएँ सुनते हैं, या वे कुछ लोगों के व्यवहार, अभिव्यक्तियों, बातों और कार्य की जाँच-परख करते हैं, तो उनके दिल में प्रतिक्रिया होती है, और उनकी अपनी राय और एक रवैया होता है। यकीनन, अगर ये लोग सत्य का अनुसरण करें और उनमें दायित्व की भावना हो, तो ये सभी समस्याएँ हल हो सकती हैं। लेकिन, आज हम जिस प्रकार के व्यक्ति पर संगति कर रहे हैं, उसकी जिम्मेदारी के अंतर्गत आने वाले कार्य में समस्याएँ अप्रत्याशित रूप से अनसुलझी रह जाती हैं। ऐसा क्यों होता है? ऐसा इसलिए होता है क्योंकि ये लोग वास्तविक कार्य नहीं करते हैं। वे आराम से प्रेम और कड़ी मेहनत से नफरत करते हैं, वे बस ऊपरी तौर पर लापरवाही से प्रयास करते हैं, उन्हें निठल्ला रहना और रुतबे के फायदों का आनंद लेना पसंद है, उन्हें लोगों पर हुक्म चलाना अच्छा लगता है, और वे बस थोड़े-से होंठ हिलाते हैं और कुछ सुझाव देते हैं और फिर मान लेते हैं कि उनका कार्य पूरा हो गया है। वे कलीसिया के किसी भी वास्तविक कार्य या परमेश्वर द्वारा उन्हें सौंपे गए अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य को गंभीरता से नहीं लेते हैं—उनमें दायित्व की यह भावना नहीं होती है, और भले ही परमेश्वर का घर बार-बार इन बातों पर जोर देता रहे, फिर भी वे उन्हें गंभीरता से नहीं लेते हैं। ... इस प्रकार के व्यक्ति में क्या समस्या है? (वह बहुत ही आलसी है।) मुझे बताओ, गंभीर समस्या किन्हें होती है : आलसी लोगों को या खराब काबिलियत वाले लोगों को? (आलसी लोगों को।) आलसी लोगों को गंभीर समस्या क्यों होती है? (खराब काबिलियत वाले लोग अगुआ या कार्यकर्ता नहीं बन सकते, लेकिन जब वे अपनी क्षमताओं के दायरे में आने वाला कोई कर्तव्य करते हैं, तो वे कुछ हद तक प्रभावी हो सकते हैं। लेकिन, आलसी लोग कुछ भी नहीं कर सकते हैं; अगर उनमें काबिलियत हो, तो भी उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।) आलसी लोग कुछ भी नहीं कर सकते हैं। इसे संक्षेप में प्रस्तुत करें, तो वे बेकार लोग हैं; उनमें एक द्वितीय-श्रेणी की अक्षमता है। आलसी लोगों की काबिलियत कितनी भी अच्छी क्यों न हो, वह नुमाइश से ज्यादा कुछ नहीं होती; भले ही उनमें अच्छी काबिलियत हो, लेकिन इसका कोई फायदा नहीं है। वे बहुत ही आलसी होते हैं—उन्हें पता होता है कि उन्हें क्या करना चाहिए, लेकिन वे वैसा नहीं करते हैं, और भले ही उन्हें पता हो कि कोई चीज एक समस्या है, फिर भी वे इसे हल करने के लिए सत्य की तलाश नहीं करते हैं, और वैसे तो वे जानते हैं कि कार्य को प्रभावी बनाने के लिए उन्हें क्या कष्ट सहने चाहिए, लेकिन वे इन उपयोगी कष्टों को सहने के इच्छुक नहीं होते हैं—इसलिए वे कोई सत्य प्राप्त नहीं कर पाते हैं, और वे कोई वास्तविक कार्य नहीं कर सकते हैं। वे उन कष्टों को सहना नहीं चाहते हैं जो लोगों को सहने चाहिए; उन्हें सिर्फ सुख-सुविधाओं में लिप्त रहना, खुशी और फुर्सत के समय का आनंद लेना और एक मुक्त और शांतिपूर्ण जीवन का आनंद लेना आता है। क्या वे निकम्मे नहीं हैं? जो लोग कष्ट सहन नहीं कर सकते हैं, वे जीने के लायक नहीं हैं। जो लोग हमेशा परजीवी की तरह जीवन जीना चाहते हैं, उनमें जमीर या विवेक नहीं होता है; वे पशु हैं, और ऐसे लोग श्रम करने के लिए भी अयोग्य हैं। क्योंकि वे कष्ट सहन नहीं कर पाते हैं, इसलिए श्रम करते समय भी वे इसे अच्छी तरह से करने में समर्थ नहीं होते हैं, और अगर वे सत्य प्राप्त करना चाहें, तो इसकी उम्मीद तो और भी कम है। जो व्यक्ति कष्ट नहीं सह सकता है और सत्य से प्रेम नहीं करता है, वह निकम्मा व्यक्ति है; वह श्रम करने के लिए भी अयोग्य है। वह एक पशु है, जिसमें रत्ती भर भी मानवता नहीं है। ऐसे लोगों को हटा देना चाहिए; सिर्फ यही परमेश्वर के इरादों के अनुरूप है(वचन, खंड 5, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ (8))। ऐसे झूठे अगुओं के बारे में परमेश्वर का प्रकाशन पढ़कर, जिनमें योग्यता तो है लेकिन जो अपने कर्तव्यों को ठीक से नहीं निभाते, मेरा दिल काँप उठा। पहले मैं हमेशा सोचती थी कि मैं बहुत आलसी नहीं हूँ और मैंने खुद को कभी भी परमेश्वर द्वारा उजागर किए गए निकम्मे व्यक्ति से नहीं जोड़ा, लेकिन इस बार तथ्यों के सामने आने पर मुझे यह स्वीकारना पड़ा कि वास्तविक कार्य न कर पाने की मेरी असफलता का मूल कारण मेरा आराम पसंद होना, कड़ी मेहनत से नफरत करना, सुकून की लालसा करना और बहुत आलसी होना था। तीन समूहों के कार्य की देखरेख के अपने समय पर नजर डालूँ तो शुरुआत में मैं कुछ जिम्मेदारी ले सकती थी, कुछ मुश्किल सह सकती थी, कुछ कीमत चुका सकती थी और कार्य में कुछ प्रगति भी हुई थी। लेकिन मैं अपनी देह के प्रति बहुत ज्यादा विचारशील थी, मुझे हमेशा ज्यादा समय और ऊर्जा खपाकर खुद को थका देने का डर रहता था, इसलिए जब मैंने कार्य में कुछ नतीजे देखे तो मेरे मन में आराम की इच्छा जागी और मैंने समूह के अगुआओं पर कार्य थोपना शुरू कर दिया और चुपके से अपने अवकाश का आनंद लेना शुरू कर दिया। ऊपर से देखने पर ऐसा लग रहा था कि मैं रोज कार्य कर रही हूँ, लेकिन मैं कोई विस्तृत और वास्तविक कार्य नहीं कर रही थी। मुझे अच्छी तरह पता था कि ली जी ने अभी-अभी प्रशिक्षण शुरू किया है, फिर भी मैंने उस पर कार्य थोप दिया। मुझे यह भी पता था कि समूह के कुछ सदस्यों को समस्याएँ आ रही हैं और उनका लगातार जायजा लेने और ध्यान देने की जरूरत है, फिर भी मैंने हस्तक्षेप न करने का तरीका अपनाया। खासकर जब मेरी साथी बहन ने मुझे एक कमजोर समूह का पर्यवेक्षण करने के लिए कहा तो मैंने मन ही मन प्रतिरोध किया और कोई आसान कार्य चुनना चाहा, भले ही मैं आखिरकार मान गई, मैं हिचकिचा रही थी और अनिच्छुक थी। आराम की चाहत के कारण ही मैंने अपने कर्तव्यों में सिर्फ दैहिक कष्टों से बचने और दिमाग खपाना कम करने पर ध्यान दिया। मैं हर दिन सिर्फ धर्मोपदेशों की जाँच-पड़ताल करके ही संतुष्ट हो जाती थी और मैं हर समूह की समस्याओं के बारे में सक्रियता से सोचने के लिए मानसिक प्रयास नहीं करना चाहती थी। मैंने अपने कर्तव्य पालन में मजबूती से शुरुआत की, लेकिन अंत तक उसका अनुसरण नहीं कर पाई और मैंने हमेशा सबसे आसान रास्ता चुना। परमेश्वर ने लोगों को उचित मामलों पर विचार करने के लिए दिमाग दिया है, लेकिन मैं कभी भी अपने दिमाग का इस्तेमाल करना या समस्याओं पर गहराई से सोचना नहीं चाहती थी। कलीसिया ने मेरे लिए इतना महत्वपूर्ण कर्तव्य करने की व्यवस्था की थी, लेकिन मैं इस बारे में नहीं सोच रही थी कि इस कार्य को प्रभावी बनाने के लिए कीमत कैसे चुकाऊँ। इसके बजाय मैं दैहिक सुख के लिए अपने कर्तव्यों के प्रति गैर-जिम्मेदार हो रही थी। सचमुच, मुझमें न तो जमीर था और न ही इंसानियत। क्या मैं बिल्कुल वैसी ही बेकार इंसान नहीं थी जिसके बारे में परमेश्वर कहता है? हालाँकि मैं विकलांग नहीं थी, लेकिन मैंने अपने कर्तव्यों में अपना पूरा प्रयास नहीं किया। इसने मुझे एक बेकार इंसान बना दिया।

बाद में मैं सोचने लगी, “दैहिक सुख की मेरी निरंतर लालसा से आखिरकार मुझे क्या हासिल होगा? क्या लगातार अपनी देह को सँजोए रखने का कोई मूल्य है?” मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “मनुष्य की देह साँप के समान है : इसका सार अपने जीवन को हानि पहुँचाना है—और जब पूरी तरह से उसकी मनमानी चलने लगती है तो तुम जीवन पर से अपना अधिकार खो बैठते हो। देह शैतान की है। इसके भीतर हमेशा असंयमित इच्छाएँ होती हैं; यह हमेशा अपने लिए सोचती है, यह हमेशा सुविधा की कामना करती है और आराम भोगना चाहती है, इसमें चिंता का या तात्कालिकता की भावना का अभाव होता है, यह आलस्य में धँसी रहती है और अगर तुम इसे एक निश्चित बिंदु तक संतुष्ट करते हो तो यह अंततः तुम्हें निगल जाएगी। कहने का अर्थ है कि यदि तुम इसे इस बार संतुष्ट करोगे तो अगली बार यह फिर खुद को संतुष्ट करने की माँग करेगी। इसकी हमेशा असंयमित इच्छाएँ और नई माँगें रहती हैं और अपने आपको और अधिक पोषित करवाने और अपने सुख के बीच रहने के लिए तुम्हारे द्वारा अपने को दिए गए बढ़ावे का फायदा उठाती है—और यदि तुम इस पर कभी जीत नहीं हासिल करोगे तो तुम अंततः स्वयं को बरबाद कर लोगे(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल परमेश्वर से प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है)। सचमुच, देह साँप की तरह है; एक इंच भी दे दो तो मील भर जाएगा। जितना ज्यादा तुम इसे तृप्त करोगे, यह उतना ही अतृप्त होता जाएगा और आखिरकार यह किसी व्यक्ति को निगल सकता है। कुछ समय पहले की बात याद करूँ तो जब मैं स्वयं कार्य में शामिल होती थी तो भले ही मेरा शरीर थोड़ा थका हुआ होता था, जो भी समस्या सामने आती थी, उसका समाधान करने के लिए सत्य खोजने पर ध्यान दे पाती थी, मैं परमेश्वर से अधिक प्रार्थना करती थी और अधिक आत्मचिंतन करती थी। महत्वपूर्ण बात यह है कि अपने कर्तव्य करते हुए मुझे परमेश्वर का मार्गदर्शन महसूस होता था, मेरी आत्मा शांत और सहज थी और परमेश्वर के साथ मेरा रिश्ता सामान्य था। लेकिन जब मैं अपनी देह के बारे में सोचने लगी तो मैंने अपने कर्तव्यों को अच्छे से पूरा करने के बारे में सोचना बंद कर दिया। इसके बजाय मैं यह सोचती कि मैं कैसे अधिक आराम कर सकती हूँ और कैसे अपने मन को शांत कर सकती हूँ, धीरे-धीरे जब मैं समस्याएँ देखती थी तो मैं उनसे निपटने के लिए अनिच्छुक हो जाती थी और उन्हें सक्रियता से सुलझाने के लिए और भी अधिक अनिच्छुक हो जाती थी। कभी-कभी मैं यह भी सोचती थी, “खुद को इतना क्यों थकाऊँ? हर चीज में उलझकर खुद को इतना क्यों थकाऊँ—क्या यह मूर्खता नहीं है?” मैं धीरे-धीरे अपनी देह के आगे झुक गई, जिससे मैं अपने कर्तव्यों में और भी ज्यादा निष्क्रिय हो गई, कार्य में देरी करने लगी और अपराध करने लगी। इन बातों को समझने के बाद मैं अपनी देह के खिलाफ विद्रोह करने को तैयार हो गई, इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, पश्चात्ताप करने और वास्तविक कार्य करने को तैयार हुई।

एक दिन भक्ति के दौरान मैंने परमेश्वर के कुछ और वचन पढ़े : “वर्तमान में कर्तव्य निभाने के बहुत ज्यादा अवसर नहीं हैं, इसलिए जब भी संभव हो, तुम्हें उन्हें लपक लेना चाहिए। जब कोई कर्तव्य सामने होता है, तो यही समय होता है जब तुम्हें परिश्रम करना चाहिए; यही समय होता है जब तुम्हें खुद को अर्पित करना चाहिए और परमेश्वर के लिए खुद को खपाना चाहिए, और यही समय होता है जब तुमसे कीमत चुकाने की अपेक्षा की जाती है। कुछ भी मत छिपाओ, कोई षड्यंत्र मत पनपाओ, कोई गुंजाइश मत छोड़ो, या अपने लिए बचने का कोई रास्ता मत रखो। यदि तुमने कोई कसर छोड़ी या तुम मतलबी, धूर्त हो या धीमे पड़ते हो, तो तुम निश्चित ही एक खराब काम करोगे(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, जीवन प्रवेश कर्तव्य निभाने से प्रारंभ होता है)। “यदि तुम वास्तव में एक निश्चित स्तर की काबिलियत रखते हो, तुम अपनी जिम्मेदारी के दायरे में पेशेवर कौशल की समझ रखते हो और अपने पेशे से अनजान नहीं हो, तो तुम्हें बस एक वाक्यांश का पालन करना है, और तुम अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठावान बन सकोगे। कौन-सा वाक्यांश? ‘पूरे दिल से कार्य करो।’ यदि तुम पूरे दिल से काम करोगे और अपना दिल लोगों में लगाओगे, तो तुम अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठावान और जिम्मेदार बन पाओगे। लेकिन क्या इस वाक्यांश का अभ्यास करना आसान है? तुम इसे व्यवहार में कैसे लाओगे? इसका मतलब कानों से सुनना या दिमाग से सोचना नहीं है—इसका मतलब है अपने हृदय का इस्तेमाल करना। यदि कोई व्यक्ति वास्तव में अपने हृदय का उपयोग कर सकता है, तो जब उसकी आँखें देखती हैं कि कोई कुछ कर रहा है, किसी तरह से कार्य कर रहा है, या किसी चीज के प्रति उसकी किसी प्रकार की प्रतिक्रिया है या जब उसके कान कुछ लोगों की राय या तर्क सुनते हैं, इन बातों पर विचार और मनन करने के लिए अपने हृदय का उपयोग करके, उनके दिमाग में कुछ ख्याल, विचार और दृष्टिकोण पैदा होता है। ये ख्याल, विचार और दृष्टिकोण उस व्यक्ति या वस्तु की गहरी, विशिष्ट और सही समझ देंगे और साथ ही, उपयुक्त और सही निर्णय और सिद्धांतों को जन्म देंगे। जब किसी व्यक्ति में अपने दिल का इस्तेमाल करने की ऐसी अभिव्यक्तियाँ होती हैं, तभी इसका अर्थ होता है कि वह अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठावान है(वचन, खंड 5, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ (7))। परमेश्वर के वचनों ने मुझे यह समझाया कि अपने कर्तव्यों को अच्छे से पूरा करने और वास्तविक कार्य करने के लिए मुझे पहले सचेत होकर अपने भ्रष्ट स्वभाव के खिलाफ विद्रोह करना होगा और अपने कर्तव्यों में मन लगाना होगा। अगर मैं मन लगाऊँगी तो समस्याओं का पता लगाकर वाकई उनका समाधान कर पाऊँगी। ऐसा करके ही मैं अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन कर पाऊँगी और तभी इसे वास्तविक कार्य माना जा सकता है। यदि मैं मन नहीं लगाऊँगी और प्रयास या कीमत नहीं चुकाना चाहूँगी तो मैं समस्याएँ देखने पर सत्य खोजने का प्रयास नहीं करूँगी, हो सकता है कि मैं समस्याओं का पता ही न लगा पाऊँ, उनका समाधान तो दूर की बात है और अंत में मैं अपने कर्तव्यों का पालन भी नहीं कर पाऊँगी।

बाद में मैंने अपनी सहयोगी बहन के साथ समूह की समस्याओं के बारे में एक-एक करके बात की। हमने समूह में कार्य की सावधानीपूर्वक जाँच की और कुछ विचलन और कमियाँ पाईं, फिर मैंने व्यावहारिक रूप से संवाद करने के लिए एक पत्र लिखा, धीरे-धीरे समूह में कर्तव्यों के निर्वहन में कम दक्षता का मुद्दा हल हो गया। लेकिन मुझे पता था कि ये कार्य एक बार में पूरे नहीं हो सकते, लगातार जायजा लेना और पर्यवेक्षण जरूरी होगा, यह कार्य लंबे समय तक करना होगा। कभी-कभी जब कार्य का बोझ बढ़ जाता था, तब भी मैं आलसी होने और थकान से बचने की इच्छा वाली अवस्था प्रकट करती थी, लेकिन मैं तुरंत खुद को बदलने और अपनी देह के खिलाफ विद्रोह करने और परमेश्वर के वचनों पर आधारित वास्तविक कार्य करने में सक्षम थी। मुझे एहसास भी नहीं हुआ और मेरी जिम्मेदारी वाले समूहों में धर्मोपदेश कार्य के स्पष्ट नतीजे दिखने लगे और मुझे बहुत खुशी हुई। इस तरह अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए मुझे अपने दिल में शांति महसूस हुई।

यह अनुभव करने के बाद मुझे एहसास हुआ कि वास्तविक कार्य करना मुश्किल नहीं है। बस इसमें अपना दिल लगाने की बात है। जब तुम अपने इरादे सही रखते हो—दैहिक सुख-सुविधाओं से दूर रहते हो, और इसके बजाय वास्तविक कार्य कैसे करें, इस पर विचार करते हो—तो तुम्हारा दिल उचित मामलों पर ज्यादा केंद्रित होता है और अपने कर्तव्यों में तुम परमेश्वर के मार्गदर्शन को महसूस कर सकते हो, और समस्याओं को ज्यादा स्पष्ट और सटीक रूप से देख सकते हो। महत्वपूर्ण बात यह है कि वास्तविक कार्य करने से तुम और अधिक समस्याओं का पता लगा सकते हो, तुम सत्य के साथ समस्याओं को सुलझाने का अभ्यास कर सकते हो, खोज के माध्यम से तुम सत्य सिद्धांतों के एक और पहलू को भी समझ पाते हो। मुझे यह एहसास हुआ है कि वास्तविक कार्य करना ही हृदय में शांति और सुकून का मार्ग है। परमेश्वर का धन्यवाद!

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