1. मैंने दूसरों के साथ सामंजस्यपूर्ण ढंग से सहयोग करना सीखा
अगस्त 2021 में, पर्यवेक्षक ने मुझे बताया कि वे भाई वांग जिन और मुझे पाठ-आधारित कर्तव्य में सहयोग का काम सौंपने की योजना बना रही हैं, जैसे ही कोई उपयुक्त मेजबान परिवार मिल जाएगा, वे हम दोनों को वहाँ भेजने की व्यवस्था कर देंगी। यह सुनते ही मैं तुरंत प्रतिरोधी महसूस करने लगा, मेरा मन वांग जिन और मेरे बीच की सभी अप्रिय पुरानी बातों से भर गया।
उस समय जब मैं पाठ-आधारित कर्तव्य करता था, तो पहले मैं ही अपने समूह में अगुआई करता था। जिन भाई-बहनों के साथ मैं सहयोग करता था, वे मेरे लिखे संवाद-पत्रों पर शायद ही कभी कोई आपत्ति उठाते या समस्याएँ बताते थे, पर्यवेक्षक भी हमेशा मेरे साथ चीजों पर चर्चा करती थीं। लेकिन जब से वांग जिन समूह में आया, वह अक्सर मेरे लिखे पत्रों के बारे में अलग-अलग राय रखता और समस्याएँ बताता था। भले ही वह सही था, मैं उसे स्वीकार करने को तैयार नहीं था। मैं इतने लंबे समय से समूह में था, किसी ने भी कभी इतनी बेबाकी से मेरी कमियाँ नहीं बताई थीं। उसकी टिप्पणियों से ऐसा लगता था मानो मैं उसके जितना अच्छा नहीं हूँ। दो बार तो उसने पर्यवेक्षक के ठीक सामने मेरे लेखों में समस्याएँ बताईं, इसे स्वीकार करना मेरे लिए और भी मुश्किल हो गया। मैंने मन में सोचा, “क्या पर्यवेक्षक सोचेंगी कि इतने समय तक पाठ-आधारित कर्तव्य करने के बाद भी, मैं सिद्धांतों को उस व्यक्ति जितना भी नहीं समझता जिसने अभी-अभी प्रशिक्षण देना शुरू किया है? मैं अपना चेहरा कैसे दिखा पाऊँगा?” जब मैं इस तरह सोचता, तो मुझे लगता कि वांग जिन जानबूझकर मुझे परेशान कर रहा है, सबके सामने मुझे शर्मिंदा करने की कोशिश कर रहा है और मैं न चाहते हुए भी उसके प्रति पूर्वाग्रही हो गया। खासकर जब मैंने उसे पर्यवेक्षक के सामने बहुत स्पष्टता और तर्क के साथ संगति करते देखा तो मेरे अंदर एक असुरक्षा की भावना पैदा हो गई। मुझे लगा जैसे उसने मेरी चमक चुरा ली है और पर्यवेक्षक के दिल में मेरी जगह छीन ली है। बाद में, जब हम एक साथ कंप्यूटर कौशल सीख रहे थे, वांग जिन को एक समस्या हुई और उसने मुझसे मदद माँगी। मैंने मन में सोचा, “तुम बहुत काबिल बनते हो न? हमेशा कहते रहते हो कि मैं इस काम में अच्छा नहीं हूँ या वह काम नहीं कर सकता? जब मैं हर बात में तुमसे कमतर हूँ, तो फिर मुझसे पूछ ही क्यों रहे हो?” मैं सचमुच उसे सिखाना नहीं चाहता था और मैंने उससे अधीरता भरे लहजे में बात की। कुछ समय बाद, वांग जिन ने मुझसे कहा, “भाई, इस दौरान तुमसे बातचीत करते हुए मैंने पाया है कि तुम में न केवल एक घमंडी स्वभाव है और तुम सत्य को स्वीकार नहीं करते, बल्कि तुम्हारे अंदर रुतबे की प्रबल इच्छा भी है। अगर तुम ऐसे ही चलते रहे, तो मुझे डर है कि तुम अंत में एक मसीह-विरोधी बन जाओगे।” उसे ऐसा कहते सुनकर, मेरा चेहरा शर्म से जलने लगा, जैसे किसी ने मुझे थप्पड़ मार दिया हो। मुझे बहुत बुरा लगा, “मुझे घमंडी कहना एक बात है, लेकिन वह यह कैसे कह सकता है कि मैं एक मसीह-विरोधी बन जाऊँगा? क्या वह यूँ ही मुझ पर ठप्पा नहीं लगा रहा है? मसीह-विरोधी कैसा व्यक्ति होता है? वे ऐसे लोग हैं जिनसे परमेश्वर घृणा करता है और हटा देता है, जिन्हें भाई-बहन अस्वीकार करते हैं। अगर मेरे भाई-बहनों को यह पता चल गया, तो वे मेरे बारे में क्या सोचेंगे?” जब भी मैं इन बातों को याद करता, मुझे वांग जिन से बहुत चिढ़ होती थी और मैं फिर कभी उसके साथ कर्तव्य में सहयोग नहीं करना चाहता था।
मैंने कभी नहीं सोचा था कि कलीसिया हमारे लिए फिर से सहयोग करने की व्यवस्था करेगी। मैंने मन में सोचा, “नहीं, यह ठीक नहीं होगा। मुझे पर्यवेक्षक को समझाने का कोई तरीका ढूँढ़ना होगा। चाहे जो भी हो, मैं उसे समूह में शामिल नहीं होने दे सकता।” लेकिन मुझे चिंता थी कि अगर मैंने सच बताया, तो पर्यवेक्षक सोचेंगी कि मैं छोटी-छोटी बातों का बतंगड़ बनाता हूँ और मैं खुद को बिल्कुल भी नहीं जानता। इसलिए, मैंने घुमा-फिराकर कहा, “भले ही वांग जिन ने पहले पाठ-आधारित कर्तव्य किया है, पर उसने कभी धर्मोपदेशों का संपादन नहीं किया है। इसके अलावा, उसका अस्थमा और सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस काफी गंभीर है, उसकी उम्र भी बढ़ रही है। वह वास्तव में इस कर्तव्य के लिए उपयुक्त नहीं है।” लेकिन पर्यवेक्षक ने जवाब दिया, “जब वांग जिन पहले पाठ-आधारित कर्तव्य करता था, तो समूह में उसका पेशेवर कौशल सबसे अच्छा था और उसे सिद्धांतों की भी कुछ समझ है। तुम दोनों फिलहाल सहयोग कर सकते हो।” यह सुनकर, मैं थोड़ा निराश हो गया। हर दिन एक ऐसे व्यक्ति का सामना करने के बारे में सोचकर जो हमेशा मेरी समस्याएँ बताता रहता था, मेरा अंदर से दम घुटने लगा; मैं बता भी नहीं सकता कि कैसा महसूस हो रहा था। कुछ दिनों बाद, अगुआ एक सभा के लिए आईं और उनके सामने मैंने फिर से वांग जिन के लिए झूठी चिंता दिखाई, कहा कि वह बूढ़ा हो रहा है और उसका स्वास्थ्य खराब है, मुझे डर है कि वह पाठ-आधारित कर्तव्य का दबाव नहीं झेल पाएगा। यह कहने के बाद, मेरे मन में हल्की-सी आत्म-ग्लानि हुई, मैं जानता था कि मैं सच्चे दिल से नहीं बोल रहा था। लेकिन जब मैंने सोचा कि मेरी बातों से शायद अगुआ वांग जिन को समूह में न शामिल होने देने के लिए राजी हो जाएँ, तो वह थोड़ी-सी बेचैनी भी गायब हो गई। हैरानी की बात है, अगुआ का दृष्टिकोण बिल्कुल पर्यवेक्षक जैसा ही था। मैं बेहद परेशान हो गया। घर पहुँचकर मैंने अपनी पत्नी से वांग जिन के बारे में कुछ आलोचनात्मक बातें कहीं। सुनने के बाद, उसने मुझे याद दिलाते हुए कहा, “हम चाहे किसी के भी साथ सहयोग करें, उसमें हमेशा हमारे सीखने के लिए एक सबक होता है। तुम लगातार दूसरों पर ही ध्यान लगाए रहते हो—यह सत्य का अनुसरण करने की अभिव्यक्ति नहीं है!” मैं जानता था कि वह सही कह रही है, लेकिन मैं फिर भी वांग जिन के साथ सहयोग नहीं करना चाहता था, न ही मैंने ठीक से आत्म-चिंतन किया। मैं अब भी उम्मीद कर रहा था कि अगुआ को कोई उपयुक्त मेजबान परिवार न मिले, ताकि मुझे उसके साथ सहयोग न करना पड़े।
एक रात 11 बजे के बाद, मुझे अचानक 42 डिग्री सेल्सियस का तेज बुखार हो गया। मैं बिस्तर पर कमजोर और बेसुध, एक बेजान ढेर जैसा महसूस कर रहा था और कंबल में दुबका हुआ काँप रहा था। मेरी पत्नी ने बुखार कम करने के लिए जल्दी से मेरे शरीर पर अल्कोहल मलना शुरू कर दिया। मलते-मलते वह बोली, “तुम्हें अचानक इतना तेज बुखार आ गया है, क्या तुम्हें नहीं लगता कि तुम्हें आत्म-चिंतन करना चाहिए? पिछले कुछ दिनों से, तुम बस वांग जिन की गलतियाँ निकालते रहे हो, लेकिन क्या तुम्हारे सीखने के लिए कोई सबक नहीं है? क्या इतनी गंभीर बीमारी परमेश्वर का अनुशासन हो सकती है?” मुझे एहसास हुआ कि मुझे सचमुच आत्म-चिंतन करने की जरूरत है। मैंने मन ही मन परमेश्वर से प्रार्थना की और उससे अपनी समस्याओं को समझने में मेरा मार्गदर्शन करने के लिए कहा।
बाद में, मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा और अपनी दशा के बारे में कुछ समझ हासिल की। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “कोई समस्या आने पर, कुछ लोग दूसरों से उत्तर खोजते हैं, लेकिन जब वह व्यक्ति सत्य के अनुसार बोलता है, तो वे उसकी बात को स्वीकार नहीं करते, वे मानने को तैयार नहीं हो पाते और मन ही मन सोचते हैं, ‘मैं उससे बेहतर हूँ। अगर मैं इस बार उसके सुझाव सुन लेता हूँ तो क्या ऐसा नहीं लगेगा कि वह मुझसे श्रेष्ठ है? नहीं, मैं इस मामले में उसकी बात नहीं सुन सकता। मैं यह काम सिर्फ अपने तरीके से करूँगा।’ फिर वे दूसरे व्यक्ति के दृष्टिकोण को नकारने का कोई कारण और बहाना ढूँढ़ लेते हैं। जब वे किसी ऐसे व्यक्ति को देखते हैं जो उनसे बेहतर है तो वे उसे नीचे गिराने की कोशिश करते हैं, उसके बारे में निराधार अफवाहें गढ़ते हैं या उसे बदनाम करने और उसकी प्रतिष्ठा कम करने के लिए कुछ घिनौने तरीके इस्तेमाल करते हैं—यहाँ तक कि उसे रौंदते हैं—ताकि लोगों के मन में अपनी जगह की रक्षा कर सकें। यह किस तरह का स्वभाव है? यह केवल अहंकार और दंभ नहीं है, यह शैतान का स्वभाव है, यह दुर्भावनापूर्ण स्वभाव है। इस व्यक्ति का अपने से बेहतर और श्रेष्ठतर लोगों पर हमला करना और उन्हें अलग-थलग करना कपटपूर्ण और दुष्टतापूर्ण है। इस व्यक्ति का लोगों को नीचे गिराने के लिए कोई कसर न छोड़ना यह दिखाता है कि उसके अंदर अच्छी-खासी दानवी प्रकृति है! शैतान के स्वभाव के अनुसार जीते हुए वह लोगों को कमतर दिखाता है, उन्हें फँसाने की कोशिश करता है और उन्हें सताता है। क्या यह कुकृत्य नहीं है? और इस तरह जीने के बावजूद उसे अभी भी यह लगता है कि वह ठीक है, एक अच्छा व्यक्ति है। लेकिन जब वह अपने से श्रेष्ठ किसी व्यक्ति को देखता है तो वह उसे सताता है और उसे पूरी तरह कुचलता है। यहाँ क्या मसला है? जो लोग ऐसे बुरे कर्म करते हैं, क्या वे निर्लज्ज और स्वेच्छाचारी नहीं हैं? ऐसे लोग केवल अपने हितों और अपनी भावनाओं का खयाल करते हैं और वे केवल अपनी इच्छाओं, महत्वाकांक्षाओं और अपने लक्ष्यों को पाना चाहते हैं। वे इस बात की परवाह नहीं करते कि कलीसिया के कार्य को कितना नुकसान पहुँचता है और वे लोगों के मन में अपने रुतबे की रक्षा के लिए और अपनी प्रतिष्ठा की रक्षा करने के लिए परमेश्वर के घर के हितों का बलिदान करना पसंद करेंगे। क्या ऐसे लोग अभिमानी और आत्मतुष्ट, स्वार्थी और नीच नहीं होते? ऐसे लोग अभिमानी और आत्मतुष्ट ही नहीं, बल्कि बेहद स्वार्थी और नीच भी होते हैं। वे परमेश्वर के इरादों को लेकर बिल्कुल विचारशील नहीं हैं। क्या ऐसे लोगों में परमेश्वर का भय मानने वाला दिल होता है? उनके पास परमेश्वर का भय मानने वाला दिल बिल्कुल नहीं होता। यही कारण है कि वे मनमाने ढंग से कार्य करते हैं और वही करते हैं जो करना चाहते हैं, उन्हें कोई अपराध-बोध नहीं होता, कोई भय नहीं होता, कोई भी आशंका या चिंता नहीं होती और वे परिणामों पर भी विचार नहीं करते। यही वे अक्सर करते हैं और इसी तरह उन्होंने हमेशा व्यवहार किया है। इस तरह के व्यवहार की प्रकृति क्या है? हल्के-फुल्के ढंग से कहें तो इस तरह के लोग बहुत अधिक ईर्ष्यालु होते हैं और उनमें अपनी निजी प्रतिष्ठा और रुतबे की बहुत प्रबल आकांक्षा होती है; वे बहुत धोखेबाज और धूर्त होते हैं। और अधिक कठोर ढंग से कहें तो समस्या का सार यह है कि इस तरह के लोगों में परमेश्वर का भय मानने वाला दिल बिल्कुल नहीं होता है। वे परमेश्वर से नहीं डरते हैं, वे अपने आपको अत्यंत महत्वपूर्ण मानते हैं और वे अपने बारे में हर चीज को परमेश्वर से भी ऊँचा और सत्य से भी ऊँचा मानते हैं। उनके दिलों में परमेश्वर उल्लेख के योग्य नहीं है और महत्वहीन है, उनके दिलों में परमेश्वर का कहीं कोई दर्जा नहीं होता है। जिनके हृदय में परमेश्वर के लिए कोई जगह नहीं है और जिनके पास परमेश्वर का भय मानने वाला दिल नहीं है क्या वे सत्य का अभ्यास कर सकते हैं? बिल्कुल नहीं। इसलिए जब वे सामान्यतः उत्साहित होकर और ढेर सारे प्रयास खपाते हुए खुद को व्यस्त बनाये रखते हैं, तब वे क्या कर रहे होते हैं? ऐसे लोग यह तक दावा करते हैं कि उन्होंने परमेश्वर के लिए खपने की खातिर सब कुछ त्याग दिया है और बहुत अधिक पीड़ा सही है, लेकिन वास्तव में उनके सारे क्रियाकलापों का प्रयोजन, सिद्धांत और उद्देश्य खुद के रुतबे और प्रतिष्ठा के लिए हैं, अपने सारे हितों की रक्षा करने के लिए है। क्या तुम लोग ऐसे व्यक्ति को बहुत ही भयावह कहोगे कि नहीं कहोगे? किस तरह के लोगों में वर्षों तक परमेश्वर पर विश्वास करने के बाद भी परमेश्वर का भय मानने वाला दिल नहीं होता? क्या वे अहंकारी नहीं हैं? क्या वे शैतान नहीं हैं? और किन चीजों में परमेश्वर का भय मानने वाला दिल सबसे कम होता है? जानवरों के अलावा, बुरे लोगों और मसीह-विरोधियों में, दानवों और शैतान के जैसों में। वे सत्य को जरा-भी नहीं स्वीकारते; उनके पास परमेश्वर का भय मानने वाला दिल बिल्कुल नहीं होता। वे किसी भी बुराई को करने में सक्षम हैं; वे परमेश्वर के शत्रु हैं, और उसके चुने हुए लोगों के भी शत्रु हैं” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, पाँच शर्तें, जिन्हें परमेश्वर पर विश्वास के सही मार्ग पर चलने के लिए पूरा करना आवश्यक है)। परमेश्वर के वचनों का यह अंश ठीक मेरी ही दशा को उजागर कर रहा था। इसे पढ़ने के बाद, मेरे दिल में चुभन-सी महसूस हुई और मैं डर गया। मैंने अतीत के बारे में सोचा, जब हम समस्याओं पर चर्चा कर रहे थे, तो समूह के भाई-बहन मेरे दृष्टिकोणों से सहमत होते थे। पर्यवेक्षक भी उन समस्याओं पर मुझसे परामर्श करती थीं जिनकी असलियत वे समझ नहीं पाती थीं। इससे मुझे श्रेष्ठता का एहसास होता था। लेकिन जब से मैंने वांग जिन के साथ सहयोग करना शुरू किया और उसे पर्यवेक्षक के सामने इतनी स्पष्टता और तर्क के साथ संगति करते देखा, साथ ही ऐसा लगा कि वह सिद्धांतों को मुझसे बेहतर समझता है, तो मुझे असुरक्षा का एहसास होने लगा। सबसे बड़ी बात, वह हमेशा मेरी समस्याएँ ढूँढ़ लेता था, कहता था कि मेरे पत्रों के कुछ हिस्से खराब या अनुपयुक्त हैं और उसने तो पर्यवेक्षक के सामने भी मेरे लेखों में समस्याएँ बताईं। इससे मेरे आत्म-सम्मान को ठेस पहुँची और मेरा रुतबा खतरे में पड़ गया। इसलिए, जब इस बार अगुआ ने हमारे लिए सहयोग करने की व्यवस्था की, तो मैं खास तौर पर प्रतिरोधी था, सोच रहा था, “अगर मैं इस बार उसके साथ सहयोग करता हूँ और वह पहले की तरह मेरी समस्याएँ बताता रहा, तो क्या फिर से मेरी इज्जत नहीं चली जाएगी?” उसे समूह से बाहर रखने के लिए, मैंने कहा कि उसने कभी धर्मोपदेशों का संपादन नहीं किया है और उसके स्वास्थ्य की चिंता करने की आड़ में, मैंने अगुआ और पर्यवेक्षक को यह समझाने की कोशिश की कि वे उसे समूह में प्रशिक्षण न देने दें। जब मेरी कोशिशें नाकाम रहीं, तो मैंने अपने असंतोष की भड़ास निकालने के लिए अपनी पत्नी से वांग जिन के बारे में आलोचनात्मक बातें कहीं। मैंने तो बेसब्री से यह उम्मीद भी की कि अगुआ को हमारे लिए कोई उपयुक्त मेजबान परिवार न मिले, ताकि मुझे उसके साथ सहयोग न करना पड़े। अपने मान-सम्मान और रुतबे की रक्षा के लिए, मैं कलीसिया के काम की पूरी तरह से अवहेलना कर रहा था। मैं कितना स्वार्थी और नीच था, मुझमें रत्ती भर भी मानवता नहीं थी! तथ्यों के प्रकाशन से ही मैंने देखा कि मेरे अंदर प्रतिष्ठा और रुतबे की गहरी इच्छा थी, एक अत्यंत दुर्भावनापूर्ण प्रकृति थी और परमेश्वर का भय मानने वाला दिल बिल्कुल नहीं था। सच तो यह है कि कोई भी पूर्ण नहीं होता और कोई भी कर्तव्य सिर्फ एक व्यक्ति अकेले पूरा नहीं कर सकता। अगुआ ने कलीसिया के काम की जरूरतों के कारण वांग जिन और मेरे लिए सहयोग करने की व्यवस्था की थी। अगर मैं अकेले धर्मोपदेश लिखता, तो निश्चित रूप से कई विचलन और कमियाँ होतीं। दो लोगों के एक-दूसरे का पूरक बनने से, हमारे काम के नतीजे बेहतर होते। लेकिन मैं परमेश्वर के इरादे समझने में नाकाम रहा था और मैंने वांग जिन को समूह में आने से रोकने की हर संभव कोशिश भी की। मैं सचमुच नहीं जानता था कि मेरे लिए क्या अच्छा है। यह एहसास होने पर, मुझे गहरा अफसोस और आत्म-ग्लानि हुई और मैंने दोबारा ऐसा बुरा काम कभी न करने का संकल्प लिया।
बाद में, मैंने विचार किया, “कौन-सा भ्रष्ट स्वभाव मुझे वांग जिन के साथ सहयोग करने के लिए इतना प्रतिरोधी बना रहा था?” मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े और अपनी समस्या के बारे में और अधिक समझ हासिल की। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “जब कोई मसीह-विरोधी किसी विरोधी पर आक्रमण करता है और उसे अलग करता है तो उसका मुख्य उद्देश्य क्या होता है? वे लोग कलीसिया में एक ऐसी स्थिति पैदा करने का प्रयास करते हैं जहाँ उनकी आवाज के विरोध में कोई आवाज न उठे, जहाँ उनकी सत्ता और उनकी अगुआई का दर्जा सर्वोपरि होता है और उनके शब्द सर्वोपरि होते हैं, और वे सभी के द्वारा सुने जाने चाहिए, और जहाँ भले ही किसी की राय अलग हो, उन्हें इसे व्यक्त नहीं करना चाहिए, बल्कि इसे अपने दिल में सड़ने देना चाहिए। मसीह-विरोधियों के साथ जो भी व्यक्ति खुले तौर पर असहमत होने का साहस करता है, वह उनका दुश्मन बन जाता है और वे उसे सताने का हर संभव तरीका इस्तेमाल करेंगे और बेतहाशा कामना करते हैं कि उन्हें गायब कर दें। यह उन तरीकों में से एक है जिसके जरिए मसीह-विरोधी हमले करते हैं और अपने विरोधियों को अलग-थलग करते हैं, अपने रुतबे को मजबूत करते और अपनी सत्ता की रक्षा करते हैं। वे सोचते हैं, ‘तुम्हारी राय मुझसे अलग हो सकती है, लेकिन तुम उसके बारे में मनचाही बातें नहीं बना सकते, मेरी सत्ता और रुतबे को जोखिम में तो बिल्कुल नहीं डाल सकते। अगर तुम्हें कोई आपत्ति है, तो मुझसे अकेले में कह सकते हो। यदि तुम सबके सामने कहकर मुझे शर्मिंदा करोगे तो मुसीबत को बुलावा दोगे, और मुझे तुम्हारा ध्यान रखना पड़ेगा!’ यह किस प्रकार का स्वभाव है? मसीह-विरोधी दूसरों को खुलकर नहीं बोलने देता। अगर मसीह-विरोधी को लेकर किसी को आपत्ति हो या किसी अन्य चीज के बारे में कोई राय हो, तो वे खुद उसे मुक्त रूप से सामने नहीं ला सकते; उन्हें मसीह-विरोधी के चेहरे के मान का ख्याल रखना चाहिए। अगर ऐसा नहीं किया तो मसीह-विरोधी उन्हें शत्रु मानेगा और उन पर आक्रमण करेगा और उन्हें अलग कर देगा। यह किस तरह की प्रकृति है? यह एक मसीह-विरोधी की प्रकृति है। और वे ऐसा क्यों करते हैं? वे कलीसिया के लिए किसी वैकल्पिक आवाज की अनुमति नहीं देते, वे कलीसिया में अपने विरोधी को नहीं रहने देते, और परमेश्वर के चुने हुए लोगों को खुले तौर पर सत्य की संगति नहीं करते देते और लोगों का भेद नहीं पहचानने देते। वे सबसे ज्यादा इस बात से डरते हैं कि कहीं लोग उनका भेद न पहचान लें और उन्हें उजागर न कर दें; वे यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनकी सत्ता और लोगों के दिलों में वे जो रुतबा रखते हैं वह मजबूत होता जाए और कभी कमजोर न किया जाए। वे ऐसी कोई चीज बरदाश्त नहीं कर सकते, जो एक अगुआ के रूप में उनके गौरव, प्रतिष्ठा या पदवी और मोल को धमकाए या उस पर असर डाले। क्या यह मसीह-विरोधियों की दुर्भावनापूर्ण प्रकृति की अभिव्यक्ति नहीं है? वे पहले से मौजूद अपनी ताकत से संतुष्ट नहीं होते, वे उसे भी मजबूत और सुरक्षित बनाकर शाश्वत सत्ता चाहते हैं। वे केवल लोगों के व्यवहार को ही नियंत्रित नहीं करना चाहते, बल्कि उनके दिलों को भी नियंत्रित करना चाहते हैं। मसीह-विरोधियों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले ये तरीके पूरी तरह से अपनी सत्ता और रुतबे की रक्षा करने के लिए होते हैं, और ये पूरी तरह सत्ता से चिपके रहने की उनकी इच्छा का परिणाम है। ... यह तब विशेष रूप से सच होता है जब कोई विरोधी मौजूद होता है, और मसीह-विरोधी सुन लेता है कि विरोधी ने उसके बारे में कुछ कहा है या उसकी पीठ पीछे उसकी आलोचना की है। अगर बात ऐसी है तो, वह मुद्दा थोड़े समय में ही सुलझा लेगा, भले ही इसके लिए रात की नींद और दिन का खाना ही क्यों न छोड़ना पड़े। ऐसा कैसे है कि वह इतना प्रयास कर सकता है? ऐसा इसलिए है, क्योंकि उसे लगता है कि उसका रुतबा खतरे में है, कि उसे चुनौती दी गई है। उसे लगता है कि अगर वह ऐसी कार्रवाई नहीं करता तो उसकी सत्ता और रुतबा खतरे में पड़ जाएगा—कि जब उसके बुरे कर्म और उसका कुत्सित आचरण उजागर हो जाएँगे तो वह न केवल अपना रुतबा और सत्ता बनाए रखने में असमर्थ होगा, बल्कि उसे कलीसिया से बाहर या निष्कासित भी कर दिया जाएगा। यही कारण है कि वह इस मामले को दबाने और अपने लिए छिपे सभी खतरे दूर करने के तरीकों के बारे में सोचने में बेहद अधीर रहता है। यही एकमात्र तरीका है, जिससे वह अपना रुतबा बरकरार रख सकता है” (वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद दो : वे विरोधियों पर आक्रमण करते हैं और उन्हें अलग कर देते हैं)। परमेश्वर कहता है कि मसीह-विरोधी मतविरोधी लोगों को बाहर कर देते हैं। वे कलीसिया में किसी भी अलग मत को मौजूद नहीं रहने देते, हर चीज में उन्हीं की चलती है और हर किसी को उनकी बात सुननी पड़ती है। जैसे ही कोई सुझाव देता है या उनकी कमियाँ बताता है, जिससे उनकी इज्जत खराब होती है और दूसरों के दिलों में उनका रुतबा गिरता है, वे तुरंत उस व्यक्ति को मतविरोधी और दुश्मन मानने लगते हैं। वे अपनी ताकत और रुतबे को मजबूत करने के लिए उन्हें बाहर निकालने और दबाने के वास्ते किसी भी हद तक चले जाते हैं। यह मसीह-विरोधियों की दुर्भावनापूर्ण प्रकृति की एक अभिव्यक्ति है। मैंने जो प्रकट किया था उस पर चिंतन किया—क्या मैं एक मसीह-विरोधी जैसा ही नहीं था? जब वांग जिन ने मेरे कर्तव्य में समस्याएँ पाईं और उन्हें बेबाकी से बताया, तो न केवल मैं इसे सकारात्मक परिप्रेक्ष्य से स्वीकार करने में नाकाम रहा, बल्कि मुझे लगा कि वह मेरे आत्म-सम्मान को चोट पहुँचा रहा है। चाहे वह कितना भी सही हो या उसकी बातें कितनी भी तथ्यों के अनुरूप हों, मैं उसे स्वीकार नहीं करता, यहाँ तक कि उसके प्रति पूर्वाग्रही हो गया और उससे बैर रखने लगा। बाद में, जब वह कंप्यूटर कौशल सीख रहा था और उसे कठिनाइयाँ हुईं, तो उसने मुझसे विनम्रता से मदद माँगी, लेकिन मैंने उसे नजरअंदाज कर दिया ताकि उसका उत्साह कम हो जाए। इससे भी बुरी बात, मैं अच्छी तरह जानता था कि वांग जिन ने पहले पाठ-आधारित कर्तव्य किया था और उसे सिद्धांतों की कुछ समझ थी, उसका खराब स्वास्थ्य अपना कर्तव्य करने की उसकी क्षमता को प्रभावित नहीं करता था। लेकिन, सिर्फ इसलिए कि वह हमेशा मेरी समस्याएँ बताता था, जो मेरे आत्म-सम्मान और रुतबे को नुकसान पहुँचाती थीं, मैंने उसे एक मतविरोधी और दुश्मन के रूप में देखा। मैंने उसके खराब स्वास्थ्य और धर्मोपदेश संपादन में अनुभव की कमी को बहाने के रूप में इस्तेमाल किया ताकि अगुआ और पर्यवेक्षक को उसे समूह में प्रशिक्षण न देने के लिए मना सकूँ। अपने आत्म-सम्मान और रुतबे की रक्षा के लिए, मैंने एक मतविरोधी व्यक्ति पर हमला करने और उसे बाहर निकालने के लिए बहुत-सी चीजें की थीं। मेरी प्रकृति कितनी दुर्भावनापूर्ण थी! मेरे इन सभी घिनौने और नीच बुरे कर्मों को करने में सक्षम होने का मूल कारण शैतानी जहर था जिसके सहारे मैं जीता था, जैसे कि “सारे ब्रह्मांड का सर्वोच्च शासक बस मैं ही हूँ,” “सिर्फ एक अल्फा पुरुष हो सकता है” और “वास्तविक मनुष्य को क्रूर होना चाहिए।” ये चीजें मेरी प्रकृति बन गई थीं, जिनके कारण मैं लोगों के जिस भी समूह में होता, यही चाहता कि बस मेरी ही चले। जब भी मैं किसी को खुद से बेहतर देखता, तो मैं उसके साथ निष्पक्ष व्यवहार नहीं कर पाता था। खासकर जब उसकी बातों या क्रियाकलापों से मेरे आत्म-सम्मान को चोट पहुँचती या मेरे रुतबे को खतरा होता। मैं उसे अपनी आँखों का काँटा समझता, उसे दबाता और बाहर निकालता, यहाँ तक कि उसे दुश्मन मानता था। मैंने उन मसीह-विरोधियों और बुरे लोगों के बारे में सोचा जिन्हें परमेश्वर के घर से निष्कासित कर दिया गया था। वे सत्य से पूरी तरह विमुख थे और सत्य से घृणा करते थे, कभी दूसरों से सही सुझाव स्वीकार नहीं करते थे। जैसे ही कोई उनके आत्म-सम्मान और रुतबे पर आँच पहुँचाता, वे उसे दबाते और सताते, ऐसे किसी भी व्यक्ति से छुटकारा पाने के सपने देखते जो उनका अनुसरण नहीं करते और कलीसिया को अपना क्षेत्र बनाना चाहते थे। उन्हें उनके द्वारा किए गए कई बुरे कर्मों और कलीसिया के काम में गंभीर बाधा डालने के कारण निष्कासित कर दिया गया था। अगर मैंने पश्चात्ताप नहीं किया और अपने भ्रष्ट स्वभावों के अनुसार काम करना जारी रखा, अपनी प्रतिष्ठा और रुतबे की रक्षा के लिए मतविरोधी लोगों पर हमला किया और उन्हें बाहर निकाला, तो अंततः मैं निश्चित रूप से परमेश्वर द्वारा ठुकराया और हटा दिया जाऊँगा। यह एहसास होने पर, मुझे पछतावा भी हुआ और डर भी लगा और मैंने तुरंत परमेश्वर से प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, मैं गलत था। मैं शैतान द्वारा बहुत गहराई से भ्रष्ट किया गया हूँ। अपने आत्म-सम्मान और रुतबे की रक्षा के लिए, मैं अपने भाई के साथ सहयोग करने को तैयार नहीं था, मैंने उसकी आलोचना की और उसे बाहर भी निकाला। परमेश्वर, मैं पश्चात्ताप करने को तैयार हूँ। कृपया अभ्यास का मार्ग खोजने में मेरा मार्गदर्शन करो।”
बाद में, मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े और जाना कि अभ्यास कैसे करना है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “तुम्हें उन लोगों के करीब जाना चाहिए जो तुमसे सच्ची बात कह सकें; इस तरह के लोगों का साथ होना तुम्हारे लिए बहुत फायदेमंद है। खास तौर पर ऐसे अच्छे लोगों का तुम्हारे आसपास होना तुम्हें भटकने से बचा सकता है जो तुममें किसी समस्या का पता चलने पर तुम्हें डाँटने-फटकारने और तुम्हें उजागर करने का साहस रखते हों। उन्हें तुम्हारे रुतबे से कोई फर्क नहीं पड़ता है, और जिस पल उन्हें पता चलता है कि तुमने सत्य सिद्धांतों के विरुद्ध कुछ किया है, आवश्यक होने पर वे तुम्हें फटकारेंगे और तुम्हें उजागर भी करेंगे। केवल ऐसे लोग ही सीधे-सच्चे और न्यायप्रिय लोग होते हैं। चाहे वे तुम्हें कैसे भी उजागर करें और कैसे भी फटकारें, यह सब तुम्हारे लिए मददगार है और यह सब तुम्हारी निगरानी करने और तुम्हें आगे बढ़ाने के लिए होता है। तुम्हें ऐसे लोगों के करीब जाना चाहिए; ऐसे लोगों को मदद के लिए अपने साथ रखने से, तुम अधिक सुरक्षित हो जाते हो—परमेश्वर की सुरक्षा पाने का भी यही अर्थ है। सत्य समझने वाले और सिद्धांतों का पालन करने वाले लोगों का तुम्हारे साथ होना और रोजाना तुम्हारी निगरानी करना, तुम्हारे लिए अपना कर्तव्य निभाने और अच्छे से काम करने के लिए बहुत फायदेमंद है” (वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद चार : वे अपनी बड़ाई करते हैं और अपने बारे में गवाही देते हैं)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, मैं समझ गया कि मेरे पास ऐसा कोई होना जो सच बोलने और मेरी समस्याओं को उजागर करने और बताने की हिम्मत रखता हो, मेरे कर्तव्य और मेरे जीवन प्रवेश के लिए काफी फायदेमंद है। मैंने उस समय के बारे में सोचा जब मैंने वांग जिन के साथ सहयोग किया था। जब भी उसे मेरे लिखे किसी लेख में कोई समस्या मिलती, तो वह सीधे बता देता था। भले ही उस समय यह मेरे आत्म-सम्मान पर भारी पड़ता था, लेकिन उसके सुझावों के अनुसार संशोधन करने के बाद नतीजे वास्तव में बहुत बेहतर होते थे। मुझे एहसास हुआ कि मुझे दूसरों के सुझावों और मदद को स्वीकार करना चाहिए; यहाँ तक कि काट-छाँट का सामना करते समय भी, मुझे पहले इसे परमेश्वर से आया मानकर स्वीकार करना चाहिए और समर्पण करना चाहिए। अगर मेरे पास उसकी तरह कोई मेरी समस्याएँ बताने और मेरी मदद करने वाला नहीं होता, तो मेरा कर्तव्य निश्चित रूप से विचलनों और खामियों से भरा होता, जो कलीसिया के काम के लिए हानिकारक होता। इसके अलावा, मेरे लिए अपने भ्रष्ट स्वभावों को समझना भी आसान नहीं होता। मैंने सोचा कि कैसे मैं समूह में हर चीज में अंतिम फैसला किया करता था और किसी भी भाई-बहन ने मुझे कभी कोई सुझाव नहीं दिया था। मुझे विश्वास हो गया था कि मैं हर चीज में अच्छा हूँ और सब कुछ समझता हूँ। इसने केवल मेरे घमंडी स्वभाव को बढ़ावा दिया और मुझे खुद को सबसे ऊपर समझने पर मजबूर किया। जब वांग जिन ने मेरे साथ सहयोग करना शुरू किया, तो जैसे ही वह कोई समस्या देखता, वह बोल उठता था। इससे मुझे अपनी समस्याओं और जो भ्रष्टता मैं प्रकट कर रहा था, उसके बारे में कुछ जागरूकता हासिल करने में मदद मिली, इस तरह मैं खुद पर लगाम लगा सका और ऐसी चीजें करने से बच सका जो परमेश्वर के स्वभाव को नाराज करतीं। वांग जिन मेरे सामने मेरी समस्याएँ और कमियाँ मुझ पर हमला करने या मुझे दबाने के लिए नहीं बता रहा था और उसका इरादा निश्चित रूप से मुझे दोषी ठहराना नहीं था। उसका उद्देश्य कलीसिया के काम की रक्षा करना था; वह वास्तव में मेरी मदद करने की कोशिश कर रहा था। फिर भी जब न्याय की भावना वाले ऐसे अच्छे व्यक्ति से सामना हुआ, तो न केवल मैं उसके सुझावों और मदद के लिए कृतज्ञ नहीं था, बल्कि मैंने उसके अच्छे इरादों को दुर्भावना समझ लिया और उसे दबाने और बाहर निकालने के लिए घिनौने और दुर्भावनापूर्ण तरीकों का इस्तेमाल किया। इससे न केवल उसे चोट पहुँची बल्कि काम में भी विघ्न-बाधा आई। मैं सचमुच भले और बुरे या सही और गलत में भेद नहीं कर सकता था! मैंने तय किया कि जब मैं दोबारा वांग जिन के साथ सहयोग करूँगा, तो मैं निश्चित रूप से उसके सुझावों को ठीक से स्वीकार करूँगा।
इसके तुरंत बाद, भाई-बहनों को एक उपयुक्त घर मिल गया, फिर वांग जिन और मैंने एक साथ अपना कर्तव्य निभाना शुरू कर दिया। शुरू में, जब वांग जिन ने मेरी समस्याएँ बताईं, तो मैं अब भी अपने अहंकार को छोड़ने के लिए संघर्ष कर रहा था। मैंने सोचा, “उसने पहले कभी धर्मोपदेशों का संपादन नहीं किया है। अगर वह मेरे द्वारा संपादित धर्मोपदेशों में समस्याएँ ढूँढ़ सकता है, तो क्या यह साबित नहीं करता कि मैं उसके जितना अच्छा नहीं हूँ? वह मेरे बारे में क्या सोचेगा?” जब मुझे यह विचार आया, तो मुझे एहसास हुआ कि मैं फिर से आत्म-सम्मान और रुतबे के लिए जी रहा था, इसलिए मैंने सचेत रूप से पढ़ने के लिए परमेश्वर के वचनों को खोजा। मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “तुम्हें पहले अपनी देह के खिलाफ विद्रोह करने का अभ्यास करना होगा; अपना मिथ्याभिमान और आत्मसम्मान त्यागना होगा, अपने हित त्यागने होंगे, तन और मन दोनों से अपने-आप को अपने कर्तव्य में झोंक देना होगा, समर्पणशील हृदय के साथ अपना कर्तव्य निभाना होगा और यह सोचना होगा कि जब तक तुम परमेश्वर को संतुष्ट रखते हो, तुम्हारे लिए कोई भी कष्ट सहना ठीक है। अगर तुम कठिनाइयों का सामना करते हो और तुम परमेश्वर से प्रार्थना करते हो और सत्य खोजते हो तो यह देखो कि परमेश्वर कैसे तुम्हारा मार्गदर्शन करता है और क्या तुम्हारे हृदय में शांति और खुशी है कि नहीं, तुम्हारे पास यह पुष्टि है कि नहीं” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपना हृदय परमेश्वर को देकर व्यक्ति सत्य प्राप्त कर सकता है)। परमेश्वर के वचनों ने मुझे आगे का रास्ता दिखाया। मुझे अपने अहंकार को छोड़ना था, अपना दिल और मन अपने कर्तव्य में लगाना था और अपना कर्तव्य अच्छी तरह से करना था; तभी मैं अपने सही काम पर ध्यान दे पाता। सच तो यह है कि हर किसी की अलग-अलग खूबियाँ होती हैं। केवल अपनी खूबियों का उपयोग करके और एक-दूसरे की खूबियों से सीखकर अपनी कमजोरियाँ दूर करने से ही हम अपने कर्तव्य में अच्छे नतीजे हासिल करेंगे। प्रतिष्ठा और रुतबा तो बस खोखली चीजें हैं। भले ही हर कोई मेरी इज्जत करे, इसका मतलब यह नहीं है कि मेरे पास सत्य वास्तविकता है और यह मुझे उद्धार पाने में तो और भी कम मदद कर सकता है। अगर मैं सत्य को नहीं समझता और अपने भ्रष्ट स्वभावों को नहीं त्यागा है, तो अंत में, मुझे फिर भी सजा के लिए नरक में भेज दिया जाएगा। इसका एहसास होने के बाद, जब वांग जिन ने मुझे फिर से मेरी समस्याएँ बताईं, तो मैं उतना प्रतिरोधी नहीं था। इसके बजाय, मैंने उसके द्वारा बताई गई समस्याओं के आधार पर संबंधित सिद्धांतों को ढूँढ़कर उनका अध्ययन किया। इस तरह से अभ्यास करने से, न केवल समस्याएँ जल्दी हल हो गईं, बल्कि मुझे अपने दिल में शांति और सुकून का एहसास भी हुआ। हमारा रिश्ता भी और अधिक सामंजस्यपूर्ण हो गया। मैं तहे दिल से परमेश्वर का धन्यवाद करता हूँ!