87. माता-पिता के प्यार और देखभाल को सही ढंग से कैसे लें
अक्टूबर 2019 में, मुझे एक सभा के दौरान पुलिस ने गिरफ़्तार कर लिया और ढाई साल जेल की सज़ा सुनाई। उस समय मैं उन्नीस साल की थी। जब मेरी सज़ा पूरी हुई और मैं रिहा हुई, तो माँ मुझे लेने आईं। हमने कई सालों से एक-दूसरे को नहीं देखा था, और जब मैंने देखा कि माँ काफी दुबली हो गई हैं और उनके बाल भी काफी सफेद हो गए हैं, तो मुझे इतना दुख हुआ कि मैं उसे शब्दों में बयां नहीं कर सकती थी। ट्रेन में बैठी हुई, मैं सोच रही थी कि बचपन से ही मेरे माता-पिता ने मुझे बहुत प्यार किया है और कभी कोई दुख नहीं झेलने दिया। मैं परिवार में इकलौती संतान थी और वे हमेशा पहले मेरे बारे में सोचते थे। खासकर जब मैं बीमार होती या मुझे चोट लग जाती, तो वे मुझसे भी ज़्यादा घबरा जाते थे। मुझे याद है जब मैं चौदह साल की थी, तो पहाड़ पर चढ़ते समय मेरी टाँग टूट गई थी। मेरे माता-पिता बारी-बारी से अस्पताल में मेरी देखभाल करते थे, और मेरे पिताजी के पास ज़्यादा छुट्टियाँ नहीं होती थीं फिर भी जो छुट्टियाँ उनके पास थीं, उन्होंने मेरे साथ बिताईं। उन्हें साथ वाली चारपाई पर थके-हारे लेटे देखकर, मेरा दिल टूट जाता था। मैं खुद को कोसती थी कि मैं एक मुसीबत हूँ और उन्हें परेशान करती हूँ। परमेश्वर में विश्वास करने के बाद, मैंने अपना कर्तव्य निभाने के लिए घर छोड़ दिया। हालाँकि मेरे माता-पिता मुझे जाने देना नहीं चाहते थे, फिर भी उन्होंने मेरा साथ दिया, और मुझे आर्थिक मदद भी दी। खासकर इस बार जब मैं गिरफ़्तार हुई तो मेरे माता-पिता चिंता से अधमरे हो गए थे, और मैं जानती थी कि उन्होंने पिछले ढाई साल पीड़ा और बहुत ज़्यादा चिंता में बिताए हैं। मुझे लगा कि मैं उनकी बहुत कर्ज़दार हूँ। मैंने सोचा कि इतनी बड़ी होने तक मैंने अपने माता-पिता के लिए कभी कुछ नहीं किया। इसके बजाय, मैंने हर मोड़ पर उन्हें अपनी चिंता करने पर मजबूर किया है। खासकर जब मैंने अपनी माँ को ट्रेन में गहरी नींद में सोते हुए देखा, तो मैं समझ गई कि मेरी गिरफ़्तारी के बाद से वह चैन की नींद नहीं सो पाई हैं। मुझे बहुत आत्म-ग्लानि हुई और लगा कि मैंने एक संतान की अपनी ज़िम्मेदारियाँ पूरी नहीं की हैं। अब मैं बड़ी हो गई थी, मुझे उनके भरण-पोषण के लिए पैसे कमाने चाहिए और उनकी चिंता का कारण नहीं बनना चाहिए। घर लौटने के बाद, मैंने उन्हें भौतिक रूप से भरपाई करने के लिए जल्दी से नौकरी खोजने और पैसे कमाने की योजना बनाई। जब मेरे माता-पिता को मेरे विचार के बारे में पता चला, तो उन्होंने मेरे काम पर जाने का समर्थन नहीं किया। वे चाहते थे कि मैं ठीक से परमेश्वर में विश्वास करूँ और परमेश्वर के वचन पढ़ने और अपना कर्तव्य निभाने के लिए ज़्यादा समय निकालूँ। वे मेरे साथ जितना अच्छा व्यवहार करते, मैं उतना ही ज़्यादा कर्ज़दार महसूस करती। जैसे ही मैंने सोचा कि इस उम्र में भी मेरे माता-पिता मेरा भरण-पोषण कर रहे हैं, मेरा काम पर जाने का संकल्प और मज़बूत हो गया। बाद में, कई कारणों से, साथ ही महामारी के कारण, मुझे नौकरी नहीं मिली, लेकिन मेरे दिल में हमेशा अपने माता-पिता के प्रति कर्ज़ महसूस होता रहा और मैं हमेशा सोचती रही कि उन्हें कैसे चुकाऊँ। मेरी माँ को हेपेटाइटिस बी था और वे बहुत कमज़ोर थीं; मेरे पिताजी को कमर में तेज़ दर्द, मधुमेह और हृदय रोग था, और उनका स्वास्थ्य पहले जैसा नहीं था। इसलिए मैंने उनके कपड़े धोने में मदद की और अपनी क्षमता के अनुसार कुछ काम किए, और मैं पिताजी का “गुआ शा”[क] से मालिश भी करती थी और उनके लिए कुछ दवा वाले प्लास्टर खरीद लाती थी। महामारी का लॉकडाउन हटने के कुछ ही समय बाद, पुलिस ने मुझे ढूँढ़ निकाला और परमेश्वर को नकारने और उसके साथ विश्वासघात करने वाले “तीन कथन” पर दस्तखत करने को कहा, और धमकी दी कि अगर मैंने दस्तखत नहीं किए, तो वे मेरे पीछे पड़े रहेंगे। उन्होंने मुझसे किसी भी समय पुलिस स्टेशन में रिपोर्ट करने के लिए तैयार रहने को भी कहा। मैं मन ही मन जानती थी कि मैं अब और घर पर नहीं रह सकती।
कुछ महीने बाद, मैं अपना कर्तव्य निभाने के लिए दूसरे इलाके में चली गई। अपने माता-पिता से फिर से अलग होने पर मेरा दिल उदासी से भर गया, “अब जाने के बाद, मुझे नहीं पता कि मैं फिर कब वापस आ पाऊँगी। मेरे माता-पिता बूढ़े हो रहे हैं और उनका स्वास्थ्य खराब होता जा रहा है। मैं परिवार में इकलौती संतान हूँ। जब मैं आसपास नहीं होती, तो उनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं होता। अगर उन्हें कुछ हो गया तो क्या होगा? लोग अक्सर कहते हैं कि बुढ़ापे के सहारे के लिए बच्चे पाले जाते हैं, लेकिन मैंने एक बेटी होने का कोई फर्ज़ पूरा नहीं किया, मेरे माता-पिता का मुझे पालना-पोसना व्यर्थ ही गया।” यह सोचते ही मेरे दिल में एक अजीब सा दर्द उठा। हालाँकि मैं अपना कर्तव्य निभा रही थी, लेकिन मुझे लगातार अपने माता-पिता की याद आती थी। कभी-कभी तो मैं घर जाकर वहाँ अपना कर्तव्य निभाने के बारे में भी सोचती थी ताकि मैं उनके साथ रह सकूँ। मैं जानती थी कि पुलिस अभी भी मुझे ढूँढ़ रही है और मैं वापस नहीं जा सकती, लेकिन जब मैं अपने माता-पिता के खराब स्वास्थ्य के बारे में सोचती, तो मेरा दिल शांत नहीं हो पाता था और न ही मैं अपने कर्तव्य में अपना दिल लगा पाती थी। बाद में, पर्यवेक्षक को मेरी दशा के बारे में पता चला, और उसने मेरे लिए परमेश्वर के वचनों का एक अंश ढूँढ़ा : “अगर तुम्हारे माता-पिता परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास में बाधा डालने की कोशिश नहीं करते, और वे भी विश्वासी हैं, और वे वाकई तुम्हें अपना कर्तव्य निष्ठापूर्वक निभाने और परमेश्वर का आदेश पूरा करने में समर्थन और प्रोत्साहन देते हैं, तो तुम्हारे माता-पिता के साथ तुम्हारा रिश्ता, आम शाब्दिक अर्थ में, रिश्तेदारों के बीच का दैहिक रिश्ता नहीं है, वह कलीसिया के भाई-बहनों के बीच का रिश्ता है। उस स्थिति में, उनके साथ कलीसिया के साथी भाई-बहनों की तरह बातचीत करने के अलावा तुम्हें उनके प्रति अपनी कुछ संतानोचित जिम्मेदारियाँ भी पूरी करनी चाहिए। तुम्हें उनके प्रति थोड़ा अतिरिक्त सरोकार दिखाना चाहिए। अगर इससे तुम्हारा कर्तव्य-प्रदर्शन प्रभावित नहीं होता, यानी, अगर वे तुम्हारे दिल को विवश नहीं करते, तो तुम अपने माता-पिता को फोन करके उनका हालचाल पूछ सकते हो और उनके लिए थोड़ा सरोकार दिखा सकते हो, तुम उनकी कुछ कठिनाइयाँ हल करने और उनके जीवन की कुछ समस्याएँ सुलझाने में मदद कर सकते हो, तुम उनके जीवन-प्रवेश के संदर्भ में उनकी कुछ कठिनाइयाँ हल करने में मदद कर सकते हो—तुम ये सभी चीजें कर सकते हो। दूसरे शब्दों में, अगर तुम्हारे माता-पिता परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास में बाधा नहीं डालते, तो तुम्हें उनके साथ यह रिश्ता बनाए रखना चाहिए, और तुम्हें उनके प्रति अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी करनी चाहिए। और तुम्हें उनके लिए सरोकार क्यों दिखाना चाहिए, उनकी देखभाल क्यों करनी चाहिए और उनका हालचाल क्यों पूछना चाहिए? क्योंकि तुम उनकी संतान हो। चूँकि तुम्हारा उनके साथ यह रिश्ता है, तुम्हारी एक और तरह की जिम्मेदारी है और तुम्हें उनकी थोड़ी और खैर-खबर लेनी चाहिए और उन्हें और ज्यादा सहायता प्रदान करनी चाहिए। अगर यह तुम्हारे कर्तव्य-प्रदर्शन को प्रभावित नहीं करता और अगर तुम्हारे माता-पिता परमेश्वर में तुम्हारी आस्था और तुम्हारे कर्तव्य-प्रदर्शन में बाधा नहीं डालते या गड़बड़ी नहीं करते, और वे तुम्हें रोकते भी नहीं, तो तुम्हारे लिए उनके प्रति अपनी जिम्मेदारियाँ निभाना स्वाभाविक और उचित है और तुम्हें इसे उस हद तक करना चाहिए, जिस हद तक तुम्हारा जमीर तुम्हें न धिक्कारे—यह सबसे न्यूनतम मानक है, जिसे तुम्हें पूरा करना चाहिए। अगर तुम अपनी परिस्थितियों के प्रभाव और बाधा के कारण घर पर अपने माता-पिता का सम्मान नहीं कर पाते, तो तुम्हें इस विनियम का पालन करने की जरूरत नहीं। तुम्हें अपने आपको परमेश्वर के आयोजनों के हवाले कर देना चाहिए और उसकी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित होना चाहिए, और तुम्हें अपने माता-पिता का सम्मान करने पर जोर देने की जरूरत नहीं है। क्या परमेश्वर इसकी निंदा करता है? परमेश्वर इसकी निंदा नहीं करता; वह लोगों को ऐसा करने के लिए मजबूर नहीं करता। अब हम किस पर संगति कर रहे हैं? हम इस बारे में संगति कर रहे हैं कि जब अपने माता-पिता का सम्मान करना लोगों के कर्तव्य-प्रदर्शन के साथ टकराता है, तो उन्हें कैसे अभ्यास करना चाहिए; हम अभ्यास के सिद्धांतों और सत्य पर संगति कर रहे हैं। अपने माता-पिता का सम्मान करना तुम्हारी जिम्मेदारी है, और अगर परिस्थितियाँ अनुकूल हों तो तुम यह जिम्मेदारी निभा सकते हो, लेकिन तुम्हें अपनी भावनाओं से विवश नहीं होना चाहिए। उदाहरण के लिए, अगर तुम्हारे माता-पिता में से कोई बीमार पड़ जाए और उसे अस्पताल जाना पड़े, और उनकी देखभाल करने वाला कोई न हो, और तुम अपने कर्तव्य में इतने व्यस्त हो कि घर नहीं लौट सकते, तो तुम्हें क्या करना चाहिए? ऐसे समय, तुम अपनी भावनाओं से विवश नहीं हो सकते। तुम्हें मामला प्रार्थना के हवाले कर देना चाहिए, उसे परमेश्वर को सौंप देना चाहिए और उसे परमेश्वर के आयोजनों की दया पर छोड़ देना चाहिए। इसी तरह का रवैया तुम्हारे अंदर होना चाहिए। ... इस तरह की स्थिति का सामना करने पर अगर इससे तुम्हारे कर्तव्य में देरी न होती हो या तुम्हारे कर्तव्य का निष्ठावान प्रदर्शन प्रभावित न होता हो, तो तुम अपने माता-पिता के प्रति संतानोचित निष्ठा दिखाने के लिए कुछ ऐसी चीजें कर सकते हो जिन्हें करने में तुम सक्षम हो, और वे जिम्मेदारियाँ पूरी कर सकते हो जिन्हें पूरा करने में तुम सक्षम हो। संक्षेप में, यही है जो लोगों को करना चाहिए और जिसे वे मानवता के दायरे में करने में सक्षम हैं। अगर तुम अपनी भावनाओं में फँस जाते हो और इससे तुम्हारा कर्तव्य-प्रदर्शन बाधित होता है, तो यह पूरी तरह से परमेश्वर के इरादों के विपरीत है। परमेश्वर ने तुमसे कभी ऐसा करने की अपेक्षा नहीं की, परमेश्वर सिर्फ यह माँग करता है कि तुम अपने माता-पिता के प्रति अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी करो, बस। संतानोचित निष्ठा होने का यही अर्थ है” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण करने का क्या अर्थ है (4))। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, मैं समझ गई कि अभ्यास कैसे करना है। मेरे माता-पिता दोनों परमेश्वर में विश्वास करते हैं, और जब माहौल इजाज़त दे और मेरे कर्तव्यों में कोई बाधा न आए, तो मैं उनके घर के कामों में मदद कर सकती हूँ और उनके दैनिक जीवन में उनकी देखभाल कर सकती हूँ। मैं उनसे बातचीत कर सकती हूँ और परमेश्वर के वचनों के बारे में संगति कर सकती हूँ, उनके जीवन प्रवेश में उनकी मदद कर सकती हूँ। अगर माहौल इजाज़त न दे, तो मुझे अपने कर्तव्य को पहले रखना चाहिए, क्योंकि एक सृजित प्राणी के रूप में, परमेश्वर का आदेश पूरा करना और अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाना ही सबसे ज़रूरी है। यह समझने पर, मैं अपने माता-पिता को परमेश्वर के हाथों में सौंपने और पहले अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाने को तैयार थी।
एक बार, एक अगुआ सभा में आए और मुझसे कहा कि मुझे हरगिज़ घर नहीं जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि सात-आठ पुलिसवाले मेरे घर गए थे ताकि मेरी माँ को मेरा पता बताने के लिए मजबूर कर सकें, और उन्होंने यह भी कहा कि मेरा मामला प्रांतीय विभाग देख रहा है और उन्होंने मुझे पकड़ने का पक्का फैसला कर लिया है। यहाँ तक कि मेरे अविश्वासी रिश्तेदारों और दोस्तों से भी पुलिस ने पूछताछ की थी। मैं जानती थी कि अगर पुलिस मुझे नहीं ढूँढ़ पाई, तो वे लगातार मेरे माता-पिता से पूछताछ करते रहेंगे, और मुझे बहुत अपराध-बोध हुआ। अपने आँसू रोकने की कोशिश करते हुए, मैं मन ही मन खुद को कोसती रही, “मैंने अपने माता-पिता को मुसीबत में डाल दिया है। अगर मैं न होती, तो मेरे माता-पिता को यह सब दुख नहीं सहना पड़ता। अब जब मैं घर से दूर हूँ, तो पुलिस मुझे नहीं ढूँढ़ सकती, इसलिए वे मेरे माता-पिता से पूछताछ और उन्हें परेशान कर रहे हैं। ये पुलिसवाले ज़हरीले साँपों की तरह हैं। एक बार जब वे किसी को निशाना बना लेते हैं, तो वे अपनी पकड़ कभी ढीली नहीं करते। क्या मेरे माता-पिता फिर कभी शांति से जी पाएँगे? एक संतान के रूप में, मैंने अपने माता-पिता को कभी कोई सुख नहीं दिया। मैंने सिर्फ उन पर बोझ ही डाला है। उनके लिए अच्छा तो यही होता कि वे मुझे कभी पालते ही नहीं!” लेकिन मैं यह भी जानती थी कि यह माहौल परमेश्वर की अनुमति से मुझ पर आया है, और मुझे शिकायत नहीं करनी चाहिए। इसलिए, मैंने चुपचाप परमेश्वर से प्रार्थना की, उससे मेरे दिल की रक्षा करने को कहा। मुझे “पीड़ा के बीच आनंद पाना” फिल्म याद आई। नायिका कमर दर्द के कारण लकवा होने का सामना कर रही थी, और उसने शारीरिक और आत्मिक दोनों तरह से बहुत दर्द सहा। हालाँकि, अपने अनुभव के बाद, उसे खुद के बारे में कुछ समझ मिली और उसने अपने जीवन में प्रगति की। मुझे एहसास हुआ कि बुरी लगने वाली चीज़ों के पीछे परमेश्वर के अच्छे इरादे छिपे होते हैं, और मैं समर्पण करने और सबक सीखने को तैयार थी।
बाद में, मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “तुम सब लोगों को शायद ये वचन स्मरण हों : ‘क्योंकि हमारा पल भर का हल्का-सा क्लेश हमारे लिये कहीं अधिक और अनन्त महिमा उत्पन्न करता जाता है।’ तुम सब लोगों ने पहले भी ये वचन सुने हैं, किंतु तुममें से कोई भी इनका सच्चा अर्थ नहीं समझा। आज तुम उनकी वास्तविक महत्ता से गहराई से अवगत हो। ये वचन परमेश्वर द्वारा अंत के दिनों के दौरान पूरे किए जाएँगे और वे उन लोगों में पूरे किए जाएँगे जिन्हें बड़े लाल अजगर द्वारा निर्दयतापूर्वक उत्पीड़ित किया गया है, उस देश में जहाँ वह कुण्डली मारकर बैठा है। बड़ा लाल अजगर परमेश्वर को सताता है और परमेश्वर का शत्रु है, इसीलिए इस देश में लोगों को परमेश्वर में विश्वास रखने के कारण अपमान और अत्याचार का सामना करना पड़ता है और परिणामस्वरूप ये वचन तुम लोगों में, लोगों के इस समूह में पूरे किए जाते हैं। चूँकि परमेश्वर का कार्य उस देश में आरंभ किया जाता है जो परमेश्वर का विरोध करता है, इसलिए परमेश्वर के संपूर्ण कार्य को भयंकर बाधाओं का सामना करना पड़ता है, और उसके बहुत-से वचनों को तुरंत पूरा नहीं किया जा सकता समय लगता है; इस प्रकार, परमेश्वर के वचनों के परिणामस्वरूप लोग शोधित किए जाते हैं, जो कष्ट झेलने का भाग भी है। परमेश्वर के लिए बड़े लाल अजगर के देश में अपना कार्य करना अत्यंत कठिन है, परंतु इसी कठिनाई के माध्यम से परमेश्वर अपने कार्य का एक चरण पूरा करता है, ताकि वह अपनी बुद्धिमानी और अपने अद्भुत कर्मों को प्रकट कर सके और परमेश्वर इस अवसर का उपयोग लोगों के इस समूह को पूर्ण बनाने के लिए करता है। लोगों की पीड़ा के माध्यम से, उनकी काबिलियत के माध्यम से, और इस गंदे देश के लोगों के समस्त शैतानी स्वभावों के माध्यम से परमेश्वर अपना शुद्धिकरण और विजय का कार्य करता है, ताकि इससे वह महिमा और उन लोगों को प्राप्त कर सके जो उसके कर्मों की गवाही देंगे। परमेश्वर ने इस समूह के लोगों के लिए जो समस्त कीमत चुकाई है, उसका सम्पूर्ण महत्व यही है” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, क्या परमेश्वर का कार्य उतना सरल है जितना मनुष्य कल्पना करता है?)। परमेश्वर के वचनों पर विचार करने के बाद, मैं समझ गई कि अंत के दिनों में, परमेश्वर अपने चुने हुए लोगों को पूर्ण बनाने के लिए बड़े लाल अजगर की गिरफ़्तारियों और उत्पीड़न का उपयोग कर उससे सेवा करवाता है, ताकि लोग सीसीपी का घिनौना चेहरा साफ-साफ देख सकें और उसके दुष्ट सार को पहचान सकें जो परमेश्वर का दुश्मन है, जिससे वे और भी दृढ़ता से परमेश्वर का अनुसरण कर सकें। साथ ही, परमेश्वर इस माहौल के ज़रिए लोगों की आस्था को भी पूर्ण बनाता है, ताकि वे देख सकें कि परमेश्वर सब पर संप्रभु है, परमेश्वर के अधिकार को समझ सकें और शैतान से डरना बंद कर सकें, जिससे वे क्लेश से सबक सीख सकें और सत्य पा सकें। मेरे माता-पिता को परमेश्वर की अनुमति से सताया गया, लेकिन उन्हें यह अवसर भी परमेश्वर द्वारा दिया गया था ताकि वे परमेश्वर के कार्य का अनुभव कर सकें और परमेश्वर की गवाही दे सकें। लेकिन, मैं दूर नहीं देख पाती थी और मैं चीज़ों की असलियत नहीं देख पा रही थी, इसलिए मैं लगातार देह के नज़रिए से चीज़ों पर विचार करती रही, इस बात की चिंता करती रही कि मेरे माता-पिता को कष्ट होगा और यहाँ तक कि सारा दोष अपने ऊपर ले लिया। मुझे विश्वास था कि मैंने अपने माता-पिता को इसमें घसीट लिया है, और नतीजतन मैं महसूस करती रही कि मैं उनकी कर्ज़दार और दोषी हूँ, मानो अगर मैं गिरफ़्तार न होती तो मेरे माता-पिता को सताया नहीं जाता। यह बहुत अतर्कसंगत था। बड़े लाल अजगर की प्रकृति दुष्ट है, और वह पागलों की तरह परमेश्वर में विश्वास करने वालों को गिरफ़्तार करता और सताता है। अगर मैं गिरफ़्तार न भी होती, तो भी मेरे माता-पिता को परमेश्वर में विश्वास करने के लिए सीसीपी द्वारा सताया जाता। कई साल पहले, जब मैं छोटी थी, मेरे माता-पिता परमेश्वर में विश्वास करने के कारण गिरफ़्तारी से बचने के लिए मुझे कई अलग-अलग जगहों पर छिपाते फिरे, और हम कई सालों तक अपने घर वापस नहीं गए। हमने बिल्कुल भी स्थिर जीवन नहीं जिया। अब जब मेरे माता-पिता को फिर से पुलिस द्वारा परेशान और सताया जा रहा था, मुझे बड़े लाल अजगर से नफ़रत करनी चाहिए, और उसे अपमानित करने के लिए अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाना चाहिए। बाद में, मैंने अपने माता-पिता को एक पत्र लिखा और उन्हें प्रोत्साहित करने के लिए परमेश्वर के इरादों और इस माहौल का अनुभव करने की अपनी समझ के बारे में संगति की। बाद में, मुझे मेरे माता-पिता का जवाब मिला। उन्होंने कहा कि पुलिस द्वारा बार-बार परेशान किए जाने पर वे डरे हुए और भयभीत थे, लेकिन परमेश्वर के अधिकार से संबंधित वचनों को खाने और पीने के माध्यम से, उन्हें पता चला कि शैतान परमेश्वर के हाथों में सिर्फ एक खिलौना है, और पुलिस परमेश्वर की अनुमति के बिना कुछ नहीं कर सकती। इससे उन्हें इसका सामना करने की आस्था और हिम्मत मिली, और यहाँ तक कि पुलिस की निराधार अफवाहों और भ्रांतियों का खंडन करने की भी हिम्मत मिली। जब मैंने देखा कि मेरे माता-पिता ने क्या हासिल किया है, तो मैं बहुत भावुक हो गई। मेरे माता-पिता के साथ मैं नहीं थी, लेकिन परमेश्वर के वचनों की अगुआई से उनका जीवन और भी बेहतर था, और मैंने देखा कि मेरी चिंताएँ पूरी तरह से निराधार थीं। यह सोचते ही, मुझे अब अपने माता-पिता की उतनी चिंता नहीं रही।
एक बार, मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “तुम्हें पाल-पोसकर तुम्हारे माता-पिता एक जिम्मेदारी और एक दायित्व निभा रहे हैं। तुम्हें पाल-पोस कर वयस्क बनाना उनका दायित्व और जिम्मेदारी है, और इसे दयालुता नहीं कहा जा सकता। चूँकि इसे दयालुता नहीं कहा जा सकता, तो क्या यह कहा जा सकता है कि यह कुछ ऐसी चीज है जिसका तुम्हें आनंद लेना चाहिए? (यह कहा जा सकता है।) यह एक प्रकार का अधिकार है जिसका तुम्हें आनंद लेना चाहिए। तुम्हें अपने माता-पिता द्वारा पाल-पोस कर बड़ा किया जाना चाहिए, क्योंकि वयस्क होने से पहले तुम्हारी भूमिका एक पाले-पोसे जा रहे बच्चे की होती है। इसलिए, तुम्हारे माता-पिता तुम्हारे प्रति सिर्फ एक जिम्मेदारी पूरी कर रहे हैं, और तुम बस इसे प्राप्त कर रहे हो, लेकिन निश्चित रूप से तुम उनसे अनुग्रह या दयालुता प्राप्त नहीं कर रहे हो। किसी भी जीवित प्राणी के लिए बच्चों को जन्म देकर उनकी देखभाल करना, प्रजनन करना और अगली पीढ़ी को बड़ा करना एक किस्म की जिम्मेदारी है। उदाहरण के लिए, पक्षी, गायें, भेड़ें और यहाँ तक कि बाघ भी प्रजनन के बाद अपने बच्चों की देखभाल करते हैं। ऐसा कोई भी जीवित प्राणी नहीं है जो अपनी संतान को पाल-पोस कर बड़ा न करता हो। कुछ अपवाद हो सकते हैं, लेकिन वे हमारे लिए अज्ञात बने हुए हैं। जीवित प्राणियों के अस्तित्व में यह एक कुदरती घटना है, जीवित प्राणियों की यह सहजप्रवृत्ति है और इसका श्रेय दयालुता को नहीं दिया जा सकता है। वे बस उस विधि का पालन कर रहे हैं जो सृष्टिकर्ता ने जानवरों और मानवजाति के लिए स्थापित की है। इसलिए, तुम्हारे माता-पिता का तुम्हें पाल-पोस कर बड़ा करना किसी प्रकार की दयालुता नहीं है। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि तुम्हारे माता-पिता तुम्हारे लेनदार नहीं हैं। वे तुम्हारे प्रति अपनी जिम्मेदारी पूरी कर रहे हैं। वे तुम्हारे लिए अपने दिल का चाहे कितना ही खून खपाएँ और तुम पर कितना ही पैसा खर्च करें, उन्हें तुमसे इसकी भरपाई करने को नहीं कहना चाहिए, क्योंकि माता-पिता के रूप में यह उनकी जिम्मेदारी है। चूँकि यह एक जिम्मेदारी और दायित्व है, इसलिए इसे मुफ्त होना चाहिए, और उन्हें इसकी भरपाई करने को नहीं कहना चाहिए। तुम्हें पाल-पोस कर बड़ा करके तुम्हारे माता-पिता बस अपनी जिम्मेदारी और दायित्व निभा रहे थे, और यह निःशुल्क होना चाहिए, इसमें लेनदेन नहीं होना चाहिए। इसलिए तुम्हें भरपाई करने के विचार के अनुसार न तो अपने माता-पिता से पेश आना चाहिए, न उनके साथ अपने रिश्ते को ऐसे सँभालना चाहिए। अगर तुम इस विचार के अनुसार अपने माता-पिता से पेश आते हो, उनका कर्ज चुकाते हो और उनके साथ अपने रिश्ते को सँभालते हो, तो यह अमानुषी है। साथ ही, हो सकता है इसके कारण तुम आसानी से अपनी दैहिक भावनाओं से नियंत्रित होकर उनसे बँध जाओ और फिर तुम्हारे लिए इन उलझनों से उबरना इस हद तक मुश्किल हो जाएगा कि शायद तुम अपनी राह से भटक जाओ। तुम्हारे माता-पिता तुम्हारे लेनदार नहीं हैं, इसलिए उनकी तमाम अपेक्षाएँ साकार करना तुम्हारा दायित्व नहीं है। उनकी अपेक्षाओं की कीमत चुकाना तुम्हारा दायित्व नहीं है। उनकी अपनी अपेक्षाएँ हो सकती हैं, लेकिन तुम्हें अपने चुनाव खुद करने होंगे। परमेश्वर ने तुम्हारे लिए एक जीवन पथ निर्दिष्ट किया है, तुम्हारे लिए एक नियति व्यवस्थित की है और इन चीजों का तुम्हारे माता-पिता से बिल्कुल भी कोई लेना-देना नहीं है” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (17))। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, मैं समझ गई कि मेरे माता-पिता का मुझे जन्म देना, मेरा पालन-पोषण करना और मेरे जीवन के लिए ज़रूरी चीज़ें मुहैया कराना एक ऐसी ज़िम्मेदारी थी जिसे उन्हें पूरा करना था। यह कोई एहसान नहीं था और इसे चुकाने की ज़रूरत नहीं है। ठीक पशु-पक्षियों की दुनिया में चिड़ियों की तरह : जब एक चिड़िया अपने बच्चों को जन्म देती है, तो वह उन्हें खिलाती है और अपने बच्चों को पालने के लिए भोजन पकड़ने के लिए अपनी जान जोखिम में डालती है। जब छोटे बच्चे खतरे में होते हैं, तो वह उनकी उन्मत्तता से रक्षा करती है, भले ही वह खुद घायल हो जाए, फिर भी अपने बच्चों की रक्षा करती है। उस माँ का अपने बच्चों के प्रति देखभाल और प्यार पूरी तरह से सहज-वृत्ति से पैदा होता है। इंसानों का अपनी संतान को पालना भी ऐसा ही है। जिस पल मेरे माता-पिता ने मुझे जन्म दिया, उसी पल से उन पर मुझे पालने की ज़िम्मेदारी और मेरी देखभाल करने का दायित्व आ गया था। जब उन्होंने मुझे पाला, तो वे अपनी ज़िम्मेदारी पूरी कर रहे थे, और मैं उनकी किसी चीज़ की कर्ज़दार नहीं हूँ और न ही मुझे कुछ चुकाने की ज़रूरत है। मैं “बुढ़ापे में अपनी देखभाल के लिए बच्चे पालना,” और “संतानोचित धर्मनिष्ठा का गुण सबसे ऊपर रखना चाहिए” जैसे पारंपरिक सांस्कृतिक विचारों से प्रभावित और शिक्षित थी। मैंने अपने माता-पिता की देखभाल को एक एहसान माना, और मानती थी कि मुझे उनके द्वारा मेरे लिए कीमत चुकाने और खुद को खपाने के बदले उन्हें चुकाना चाहिए, इतना कि मैं उसके लिए अपनी बाकी की ज़िंदगी कुर्बान करने को बेताब थी। मैं अच्छी तरह जानती थी कि मैंने दो साल से ज़्यादा समय तक हिरासत केंद्र में न तो परमेश्वर के वचन खाए-पिए थे और न ही अपना कर्तव्य निभाया था, और मेरा जीवन प्रवेश बहुत पीछे छूट गया था, इसलिए अब, मुझे परमेश्वर के वचन पढ़ने चाहिए और अपना कर्तव्य ठीक से निभाना चाहिए। लेकिन जब मैंने अपने माता-पिता के मेरे लिए चिंता करने और दुख उठाने के बारे में सोचा, तो मैं बस काम करना और पैसे कमाना चाहती थी ताकि उन्हें एक अच्छे भौतिक जीवन से भरपाई कर सकूँ। अगर महामारी न होती, तो मैं काम पर चली गई होती और पैसे कमाती। बाद में, मैंने अपना कर्तव्य निभाने के लिए घर छोड़ दिया, लेकिन मैं अभी भी सोच रही थी कि अपने माता-पिता का प्रतिदान कैसे करूँ। मेरे सारे विचार एहसान चुकाने के विचार से बँधे हुए थे, मानो मेरी बाकी की ज़िंदगी सिर्फ अपने माता-पिता के एहसान को चुकाने के लिए ही जी जा सकती है। मैं एक सृजित प्राणी हूँ। मेरी साँस परमेश्वर ने दी थी, और यह परमेश्वर ही था जिसने वयस्क होने तक मेरी रक्षा की। अंत के दिनों में, परमेश्वर ने मुझ पर कृपा भी की कि मैं उसके सामने आऊँ ताकि मैं उसके वचनों की आपूर्ति का आनंद ले सकूँ। परमेश्वर ने मेरे लिए इतनी बड़ी कीमत चुकाई है, और मुझे परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाना चाहिए। हालाँकि मेरे माता-पिता ने मेरी बहुत देखभाल की, लेकिन परमेश्वर के संरक्षण के बिना मैं आज ज़िंदा नहीं होती, ठीक वैसे ही जैसे जब मैं चौदह साल की थी तब पहाड़ पर चढ़ी थी। अगर परमेश्वर का संरक्षण न होता, तो मैं पहाड़ की तलहटी में गिरकर मर गई होती। मैं सबसे ज़्यादा परमेश्वर की कर्ज़दार हूँ, अपने माता-पिता की नहीं। मुझे अपने माता-पिता के एहसान को चुकाने के लिए नहीं जीना चाहिए, बल्कि परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाना चाहिए। यह समझने पर, मैं अपने माता-पिता द्वारा दिए गए प्यार और देखभाल को सही ढंग से देख पाई।
बाद में, मैंने परमेश्वर के और वचन पढ़े : “पहले तो ज्यादातर लोग अपने कर्तव्य निभाने के लिए घर छोड़ने को कुछ हद तक व्यापक वस्तुपरक हालात के कारण चुनते हैं जिससे उनका अपने माता-पिता को छोड़ना जरूरी हो जाता है; वे अपने माता-पिता की देखभाल के लिए उनके साथ नहीं रह सकते; ऐसा नहीं है कि वे स्वेच्छा से अपने माता-पिता को छोड़ना चुनते हैं; यह वस्तुपरक कारण है। दूसरी ओर, व्यक्तिपरक ढंग से कहें, तो तुम अपने कर्तव्य निभाने के लिए बाहर इसलिए नहीं जाते कि तुम अपने माता-पिता को छोड़ देना चाहते हो और अपनी जिम्मेदारियों से बचकर भागना चाहते हो, बल्कि परमेश्वर की बुलाहट की वजह से जाते हो। परमेश्वर के कार्य के साथ सहयोग करने, उसकी बुलाहट स्वीकार करने और एक सृजित प्राणी के कर्तव्य निभाने के लिए तुम्हारे पास अपने माता-पिता को छोड़ने के सिवाय कोई चारा नहीं था; तुम उनकी देखभाल करने और उनका साथ देने के लिए उनके बगल में नहीं रह सकते थे। तुमने अपनी जिम्मेदारियों से बचने के लिए उन्हें नहीं छोड़ा, सही है? अपनी जिम्मेदारियों से बचने के लिए उन्हें छोड़ देना और परमेश्वर की बुलाहट का जवाब देने और अपने कर्तव्य निभाने के लिए उन्हें छोड़ना—क्या इन दोनों बातों की प्रकृतियाँ अलग नहीं हैं? (बिल्कुल।) तुम्हारे हृदय में तुम्हारे माता-पिता के प्रति भावनात्मक लगाव और विचार जरूर होते हैं; तुम्हारी भावनाएँ खोखली नहीं हैं। अगर वस्तुपरक हालात अनुमति दें, और तुम अपने कर्तव्य निभाते हुए भी उनके साथ रह पाओ, तो तुम उनके साथ रहने को तैयार होगे, नियमित रूप से उनकी देखभाल करोगे और अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी करोगे। लेकिन वस्तुपरक हालात के कारण तुम्हें उनको छोड़ना पड़ता है; तुम उनके साथ नहीं रह सकते। ऐसा नहीं है कि तुम उनके बच्चे के रूप में अपनी जिम्मेदारियाँ नहीं निभाना चाहते हो, बल्कि तुम नहीं निभा सकते हो। क्या इसकी प्रकृति अलग नहीं है? (बिल्कुल है।) अगर तुमने संतानोचित होने और अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी करने से बचने के लिए घर छोड़ दिया था, तो यह असंतानोचित होना है और यह मानवता का अभाव दर्शाता है। तुम्हारे माता-पिता ने तुम्हें पाल-पोसकर बड़ा किया, लेकिन तुम अपने पंख फैलाकर जल्द-से-जल्द अपने रास्ते चले जाना चाहते हो। तुम अपने माता-पिता को नहीं देखना चाहते, और उनकी किसी भी मुश्किल के बारे में सुनकर तुम कोई ध्यान नहीं देते। तुम्हारे पास मदद करने के साधन होने पर भी तुम नहीं करते; तुम बस सुनाई न देने का बहाना कर लोगों को तुम्हारे बारे में जो चाहें कहने देते हो—तुम बस अपनी जिम्मेदारियाँ नहीं निभाना चाहते। यह असंतानोचित होना है। लेकिन क्या स्थिति अभी ऐसी है? (नहीं।) बहुत-से लोगों ने अपने कर्तव्य निभाने के लिए अपनी काउंटी, शहर, प्रांत और यहाँ तक कि अपने देश तक को छोड़ दिया है; वे पहले ही अपने गाँवों से बहुत दूर हैं। इसके अलावा, विभिन्न कारणों से उनके लिए अपने परिवारों के साथ संपर्क में रहना सुविधाजनक नहीं है। कभी-कभी वे अपने माता-पिता की मौजूदा दशा के बारे में उसी गाँव से आए लोगों से पूछ लेते हैं और यह सुन कर राहत महसूस करते हैं कि उनके माता-पिता अभी भी स्वस्थ हैं और ठीक गुजारा कर पा रहे हैं। दरअसल, तुम असंतानोचित नहीं हो; तुम मानवता न होने के उस मुकाम पर नहीं पहुँचे हो, जहाँ तुम अपने माता-पिता की परवाह भी नहीं करना चाहते, या उनके प्रति अपनी जिम्मेदारियाँ नहीं निभाना चाहते। यह विभिन्न वस्तुपरक कारणों से है कि तुम्हें यह चुनना पड़ा है, इसलिए तुम असंतानोचित नहीं हो। ये वे दो कारण हैं। एक और कारण भी है : अगर तुम्हारे माता-पिता वैसे लोग नहीं हैं जो तुम्हें खास तौर पर सताते हैं या परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास में रुकावट पैदा करते हैं, अगर वे परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास को समर्थन देते हैं, या वे ऐसे भाई-बहन हैं जो तुम्हारी तरह परमेश्वर में विश्वास रखते हैं, खुद परमेश्वर के घर के सदस्य हैं, फिर तुम दोनों में से कौन दिल की गहराई से अपने माता-पिता के बारे में सोचते समय शांति से परमेश्वर से प्रार्थना नहीं करेगा? तुममें से कौन अपने माता-पिता को—उनके स्वास्थ्य, सुरक्षा और उनके जीवन की तमाम जरूरतों के साथ—परमेश्वर के हाथों में नहीं सौंप देगा? अपने माता-पिता को परमेश्वर के हाथों में सौंप देना उनके प्रति संतानोचित आदर दिखाने का सर्वोत्तम तरीका है। तुम उम्मीद नहीं करते कि वे जीवन में तरह-तरह की मुश्किलें झेलें, तुम उम्मीद नहीं करते कि वे बुरा जीवन जिएँ, पोषणरहित खाना खाएँ, या बुरा स्वास्थ्य झेलें। अपने हृदय की गहराई से तुम निश्चित रूप से यही उम्मीद करते हो कि परमेश्वर उनकी रक्षा करेगा, उन्हें सुरक्षित रखेगा। अगर वे परमेश्वर के विश्वासी हैं, तो तुम उम्मीद करते हो कि वे अपने खुद के कर्तव्य निभा सकेंगे और तुम यह भी उम्मीद करते हो कि वे अपनी गवाही में दृढ़ रह सकेंगे। यह अपनी मानवीय जिम्मेदारियाँ निभाना है; लोग अपनी मानवता से केवल इतना ही हासिल कर सकते हैं। इसके अलावा, सबसे महत्वपूर्ण यह है कि वर्षों तक परमेश्वर में विश्वास रखने और अनेक सत्य सुनने के बाद, लोगों में कम-से-कम इतनी समझ-बूझ तो है : मनुष्य का भाग्य स्वर्ग द्वारा तय होता है, मनुष्य परमेश्वर के हाथों में जीता है, और परमेश्वर द्वारा मिलने वाली देखभाल और रक्षा, अपने बच्चों की चिंता, संतानोचित धर्मनिष्ठा या साथ से कहीं ज्यादा अहम है। क्या तुम इस बात से राहत महसूस नहीं करते हो कि तुम्हारे माता-पिता परमेश्वर की देखभाल और रक्षा के अधीन हैं? तुम्हें उनकी चिंता करने की जरूरत नहीं है। ... किसी भी स्थिति में, लोगों को अपराध भावना नहीं पालनी चाहिए और उनकी अंतरात्मा को दोषी महसूस नहीं करना चाहिए क्योंकि वे वस्तुपरक हालात से प्रभावित होने के कारण अपने माता-पिता के प्रति अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी नहीं कर सके। ये और इन जैसे दूसरे मसले लोगों के परमेश्वर में विश्वास के जीवन में मुसीबतें नहीं बननी चाहिए; उन्हें त्याग देना चाहिए। जब माता-पिता के प्रति जिम्मेदारियाँ पूरी करने के विषय उभरते हैं, तो लोगों को ये सही समझ रखनी चाहिए और उन्हें अब बेबस महसूस नहीं करना चाहिए” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (16))। परमेश्वर के वचनों ने मेरी आत्मा को मुक्ति पाने में मदद की, और मैं समझ गई कि संतान का फर्ज़ न निभाने का असल व्यवहार क्या होता है। जब बच्चों के पास अपने माता-पिता की देखभाल करने की सुविधा होती है, लेकिन वे सिर्फ अपने सुख की परवाह करते हैं, अपनी ज़िम्मेदारियों से बचते हैं और अपने माता-पिता को नज़रअंदाज़ करते हैं, तो यह ज़मीर की कमी है। यही संतान का फर्ज़ न निभाना है। लेकिन मेरा अपने माता-पिता की देखभाल न कर पाना ज़िम्मेदारियों से बचना नहीं है, और न ही इसका मतलब है कि मैं उनका सम्मान नहीं करना चाहती। यह इसलिए है क्योंकि मैं सीसीपी के उत्पीड़न के कारण घर नहीं लौट सकती। इसके अलावा, मेरे माता-पिता भी परमेश्वर में विश्वास करते हैं और मुझसे उनकी सबसे बड़ी उम्मीद यह नहीं है कि मैं बुढ़ापे में उनकी देखभाल करूँगी या उनकी बाकी की ज़िंदगी उनकी देखरेख करूँगी, बल्कि यह है कि मैं परमेश्वर में ठीक से विश्वास करूँ और अपना कर्तव्य निभाऊँ, और जीवन में सही मार्ग पर चलूँ। इस वजह से, मुझे दोषी महसूस करने की ज़रूरत नहीं है, और अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाना ही सबसे बड़ी तसल्ली है जो मैं अपने माता-पिता को दे सकती हूँ। साथ ही, मैंने परमेश्वर के वचनों में अभ्यास का एक मार्ग भी पाया, जो यह है कि मैं अपने माता-पिता को परमेश्वर के हाथों में सौंप दूँ और परमेश्वर को उनकी अगुआई करने दूँ, क्योंकि मेरा साथ और देखभाल सिर्फ़ एक सतही चिंता है, और इसका कोई वास्तविक असर नहीं होता। ठीक वैसे ही जैसे जब मेरे पिताजी को कमर में दर्द था। मैं ज़्यादा से ज़्यादा “गुआ शा” से उनकी मालिश कर सकती थी और कुछ दवा वाले प्लास्टर खरीद सकती थी। लेकिन जब उनके दिल में तेज दर्द उठा, तो मेरे हाथ बँध हुए थे, मैं बस वहाँ खड़ी रह सकती थी पर कुछ कर नहीं सकती थी, मैं उनका दर्द बिल्कुल भी कम नहीं कर सकती थी। चाहे मैं अपने माता-पिता के साथ हूँ या नहीं, जब उन्हें बीमार होना होगा तो वे बीमार होंगे, और जब स्वस्थ रहना होगा तो स्वस्थ रहेंगे। सिर्फ मेरे उनके साथ होने से कुछ नहीं बदलेगा। इसलिए उन्हें परमेश्वर के हाथों में सौंपना ही सबसे बुद्धिमानी का चुनाव है। हालाँकि मेरे माता-पिता अब कुछ बीमारियों से पीड़ित हैं, लेकिन वे एक साथ हैं, और एक-दूसरे की देखभाल कर सकते हैं और एक-दूसरे के साथ परमेश्वर के वचनों पर संगति कर सकते हैं, इसलिए उनकी आत्माएँ आनंदित हैं। यह कुछ ऐसा है जिसकी जगह कोई देखभाल या भौतिक सुख नहीं ले सकता, और मैं उन्हें परमेश्वर को सौंपकर बहुत शांत महसूस करती हूँ।
अतीत में, मैं शैतानी ज़हरों से पीड़ित और बंधी हुई थी और खुद को अपने माता-पिता का कर्जदार मानती थी, उनकी देखभाल न कर पाने के कारण लगातार दोषी महसूस करती थी। अब परमेश्वर के वचनों ने मेरी आत्मा की बेड़ियों को खोल दिया है, ताकि मैं अब दयालुता से बंधी न रहूँ। मैं तहे दिल से परमेश्वर का धन्यवाद करती हूँ। अब मैं लंबे समय से अपने माता-पिता से संपर्क नहीं कर पाई हूँ, और मुझे नहीं पता कि वे कैसे हैं। हालाँकि, जब मैं सोचती हूँ कि परमेश्वर उनके आगे के रास्ते पर उनकी अगुआई करेगा, तो मेरा दिल बहुत ज़्यादा शांत हो जाता है, और मैं अपना समय और ऊर्जा अपने कर्तव्य में लगाने को तैयार हूँ। परमेश्वर का धन्यवाद! क. गुआ शा : एक तकनीक जिसमें तनाव दूर करने, रक्त संचार में सुधार लाने और मांसपेशियों के दर्द को कम करने के लिए त्वचा पर एक चिकने उपकरण से मालिश की जाती है।
फुटनोट :
क. गुआ शा : एक तकनीक जिसमें तनाव दूर करने, रक्त संचार में सुधार लाने और मांसपेशियों के दर्द को कम करने के लिए त्वचा पर एक चिकने उपकरण से मालिश की जाती है।