405 क्या यह परमेश्वर में सच्चा विश्वास है?

1 लोग अनुग्रह की प्राप्ति और शांति के आनंद को केवल विश्वास का प्रतीक मानते हैं, और आशीष की तलाश को परमेश्वर में अपने विश्वास का आधार समझते हैं। बहुत कम लोग परमेश्वर को जानना चाहते हैं या अपने स्वभाव में बदलाव की कोशिश करते हैं। अपने विश्वास में लोग परमेश्वर को उन्हें एक उपयुक्त मंज़िल और जितना वे चाहते हैं, उतना अनुग्रह देने, उसे अपना सेवक बनाने, उसे अपने साथ एक शांतिपूर्ण, मैत्रीपूर्ण संबंध, फिर वह चाहे कभी भी हो, बनाए रखने के लिए बाध्य करना चाहते हैं, ताकि उनके बीच कभी कोई संघर्ष न हो। अर्थात् परमेश्वर में उनका विश्वास यह माँग करता है कि वह उनकी सभी आवश्यकताएँ पूरी करने का वादा करे और उन्हें वह सब प्रदान करे, जिसके लिए वे प्रार्थना करें। वे परमेश्वर से किसी का न्याय या निपटारा न करने की अपेक्षा करते हैं, क्योंकि वह हमेशा दयालु उद्धारकर्ता यीशु रहा है, जो हर समय और सभी जगहों पर लोगों के साथ एक अच्छा संबंध रखता है।

2 लोग बस बेशर्मी से परमेश्वर से माँग माँगें करते हैं, यह मानते हैं कि चाहे वे विद्रोही हों या आज्ञाकारी, वह बस आँख मूँदकर उन्हें सब-कुछ प्रदान करेगा। वे बस परमेश्वर से लगातार "ऋण वसूली" करते हैं, यह विश्वास करते हुए कि उसे उन्हें बिना किसी प्रतिरोध के "चुकाना" चाहिए और इतना ही नहीं, दोगुना भुगतान करना चाहिए; वे सोचते हैं कि परमेश्वर ने उनसे कुछ लिया हो या नहीं, वे उसके साथ चालाकी कर सकते हैं, वह लोगों के साथ मनमानी नहीं कर सकता, और लोगों के सामने जब वह चाहे और बिना उनकी अनुमति के अपनी बुद्धि और धार्मिक स्वभाव तो बिलकुल भी प्रकट नहीं कर सकता, जो कई वर्षों से छिपाए हुए हैं। वे बस परमेश्वर के सामने अपने पाप स्वीकार करते हैं, और यह मानते हैं कि परमेश्वर उन्हें दोषमुक्त कर देगा, वह ऐसा करने से नाराज़ नहीं होगा, और यह हमेशा के लिए चलता रहेगा। वे परमेश्वर को आदेश दे देते हैं, और यह मानकर चलते हैं कि वह उनका पालन करेगा। क्या तुम लोग अब तक यही मानते नहीं आए हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मनुष्य के उद्धार के लिए तुम्हें सामाजिक प्रतिष्ठा के आशीष से दूर रहकर परमेश्वर की इच्छा को समझना चाहिए' से रूपांतरित

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