सत्य का अनुसरण कैसे करें (16)
हमारी हाल ही की संगति की विषय-वस्तु विभिन्न प्रकार के लोगों का भेद पहचानने के बारे में रही है—उनकी उत्पत्तियों के आधार पर उनकी विभिन्न श्रेणियों और वर्गीकरणों में अंतर करना और फिर वास्तविक जीवन में विभिन्न प्रकार के लोगों की विविध अभिव्यक्तियों के जरिए उनके सार का भेद पहचानना। विभिन्न प्रकार के लोगों का भेद पहचानना सीखना इस संबंध में फायदेमंद है कि उनसे सही ढंग से कैसे पेश आया जाए और खुद से सही ढंग से कैसे पेश आया जाए, है ना? (हाँ।) क्या इन चीजों पर संगति करने से परमेश्वर में विश्वासियों के बारे में लोगों की पिछली धारणाएँ और कल्पनाएँ भी हल नहीं हो गई हैं? उदाहरण के लिए, बहुत-से लोग सभी विश्वासियों से भाई-बहनों की तरह पेश आते थे। जब तक कोई व्यक्ति कलीसिया में होता था, जब तक वह अपना कर्तव्य करने में उत्साही था, तब तक चाहे उसने कितना भी बुरा कर्म किया हो, उसकी मानवता कितनी भी भयानक रही हो या उसका स्वभाव कितना भी घमंडी, धूर्त या धोखेबाज रहा हो, ये लोग उससे भाई-बहनों की तरह पेश आते थे और प्रेम से उसकी मदद करते थे। क्या ऐसे लोगों में भेद पहचानने की क्षमता होती है? (नहीं।) इन पिछले कुछ वर्षों की सिंचाई और पोषण के जरिए तुम लोगों के दृष्टिकोण काफी बदल गए हैं, है ना? (हाँ।) अब जब तुम्हारे दृष्टिकोण बदल गए हैं तो क्या तुम विभिन्न प्रकार के लोगों से पेश आने में अपेक्षाकृत सिद्धांतयुक्त नहीं हो? (हाँ।) क्या विभिन्न प्रकार के लोगों के प्रति तुम्हारे दृष्टिकोण और रवैये पहले से भिन्न नहीं हैं? (हाँ, वे भिन्न हैं।) इन मुद्दों पर संगति करने से पहले लोगों में विभिन्न प्रकार के लोगों का भेद पहचानने की कोई क्षमता नहीं थी, उनका विश्वास था कि जब तक कोई व्यक्ति परमेश्वर में विश्वास रखता है तब तक वह अच्छा व्यक्ति है, परमेश्वर के घर का सदस्य है और यहाँ तक कि बुरी मानवता वाले लोग भी वे लोग हैं जिन्हें परमेश्वर बचाने का इरादा रखता है। इसे अब देखा जाए तो क्या ऐसी ही बात है? (नहीं।) अब यह ऐसी बात नहीं है। तो, इसे अब देखा जाए तो क्या अच्छे लोग ज्यादा हैं या बुरे लोग? (मुझे लगता है कि बुरे लोग ज्यादा हैं। इससे पहले मुझे बहुत-से लोग काफी अच्छे दिखाई देते थे, लेकिन परमेश्वर की संगति के जरिए और इसे विभिन्न प्रकार के लोगों की अभिव्यक्तियों से संबद्ध करने से अब मुझे लगता है कि बुरे लोग ज्यादा हैं।) इससे पहले ज्यादा-से-ज्यादा तुममें उन लोगों का भेद पहचानने की कुछ क्षमता थी जो स्पष्ट रूप से अविश्वासी, अवसरवादी, दुष्ट आत्मा, गंदे राक्षस थे और जो स्पष्ट गड़बड़ियाँ और विघ्न-बाधाएँ उत्पन्न कर सकते थे, तुम जानते थे कि वे अच्छे लोग या भाई-बहन नहीं हैं। अब ऐसी संगति के जरिए स्पष्ट अभिव्यक्तियों वाले लोगों का भेद पहचानने में समर्थ होने के अलावा, क्या तुम लोगों के प्रकाशनों और अभिव्यक्तियों के आधार पर मूलतः सभी लोगों का भेद पहचानने में समर्थ नहीं हो? (हाँ।) तो ऐसी संगति के बाद, जब तुम लोग फिर से लोगों से मेलजोल रखते हो तब क्या यह पहले से अलग महसूस नहीं होता है? (यह जरा-सा अलग है। अब जब मैं लोगों से मेलजोल रखता हूँ तब मैं उनके प्रकाशनों पर और यह देखने पर ध्यान केंद्रित करता हूँ कि चीजों से सामना होने पर वे क्या नजरिए व्यक्त करते हैं ताकि यह अनुमान लगा सकूँ कि वे मनुष्यों, पशुओं या दानवों—इन तीनों में से किससे पुनर्जन्म लिए हुए हैं। मैं लोगों के सार और वर्गीकरण के आधार पर उनका भेद पहचानने पर ध्यान केंद्रित करने लगा हूँ।) इसका मतलब है कि तुमने लोगों का भेद पहचानना सीख लिया है। तो फिर क्या तुम अपना भेद पहचान सकते हो? (जरा-सा।) संक्षेप में, इस विषय पर संगति करना लोगों का भेद पहचानने के लिए फायदेमंद है। यह विभिन्न प्रकार के लोगों के व्यवहार और नजरियों का भेद पहचानने और इन लोगों के सार की असलियत देखने में तुम्हारी मदद कर सकता है। इस तरीके से तुम विभिन्न प्रकार के लोगों से सिद्धांतों के अनुसार पेश आओगे और कुछ विशेष लोगों, घटनाओं या चीजों का सामना करते समय तुम उनसे धारणाओं और कल्पनाओं के आधार पर पेश नहीं आओगे और तुम समस्याओं को सँभालने के कुछ मूलभूत सिद्धांतों पर पकड़ बना पाओगे और इस प्रकार तुम मूर्खतापूर्ण चीजें कम करोगे। उदाहरण के लिए, इससे पहले असामान्य व्यवहार या विकृत विचारों और नजरियों वाले लोगों को देखते समय तुमने सोचा होगा कि ऐसे लोगों में खराब काबिलियत है, उनमें समझने की कोई क्षमता नहीं है या उन्होंने थोड़े-से धर्मोपदेश सुने हैं और उनकी नींव बहुत ही ज्यादा उथली है, और इसलिए तुम्हें उन्हें सींचने और उनकी ज्यादा मदद करने के लिए कुछ मेहनत करनी चाहिए। अब संगति के जरिए पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए और दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों का भेद पहचानने की क्षमता प्राप्त करने के बाद तुम उन पिछले मूर्खतापूर्ण अभ्यासों को छोड़ दोगे और निरर्थक कामों में अब और शामिल नहीं होगे। तो क्या तुम लोग लोगों से सत्य सिद्धांतों के अनुसार पेश आ सकते हो? (हम ऐसा कुछ हद तक कर सकते हैं।) क्या तुम्हारे अभ्यास में विचलन आएँगे? (अगर मैं किसी व्यक्ति के सार के बारे में सटीकता से राय नहीं बना सकता तो हो सकता है कि मेरे अभ्यास में विचलन आएँ।) किन परिस्थितियों में तुम्हारे अभ्यास में विचलन आएँगे? मान लो कि उनका बाहरी व्यवहार ज्यादातर लोगों की धारणाओं के बहुत ज्यादा अनुरूप है—वे कीमत चुका सकते हैं और चीजों का त्याग कर सकते हैं, अक्सर सही बातें कहते हैं और बार-बार दान देते हैं और दूसरों की मदद करते हैं—तो मानवता के लिहाज से इस व्यक्ति को दयालु माना जाता है, लेकिन साथ ही, वे बिल्कुल भी सामान्य नहीं हैं, वे अक्सर कुछ अतिवादी व्यवहार प्रदर्शित करते हैं और वे कुछ अलौकिक अभिव्यक्तियाँ प्रदर्शित करते हैं, तो क्या तुम ऐसे व्यक्ति का भेद पहचान पाओगे? क्या तुम जानते हो कि उससे कैसे पेश आना है? (सिर्फ परमेश्वर की पिछली संगति के कारण ही मुझे पता चला है कि ऐसा व्यक्ति दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों में से एक है।) तुम लोग उसके सार का दानव के सार के रूप में निरूपण कर सकते हो और इस तथ्य की असलियत देख सकते हो, लेकिन क्या तुम यह तय कर सकते हो कि दैनिक जीवन में उसकी अभिव्यक्तियों और उसकी मौजूदा अवस्था के आधार पर उससे पेश आने का उचित तरीका क्या है? इसमें लोगों से पेश आने के सिद्धांत शामिल हैं। तो इस प्रकार के व्यक्ति से पेश आने का उचित तरीका क्या है? अगर उसके जीवन की अवस्था मूलतः सामान्य है, उसने कलीसिया के कार्य में विघ्न-बाधाएँ उत्पन्न नहीं की हैं और दूसरों को परेशान नहीं किया है तो उससे सही तरीके से पेश आओ—अगर वह सेवा कर सकता है तो उसे ऐसा करने दो; अगर वह नहीं कर सकता है और उसने दूसरों के लिए विघ्न-बाधाएँ उत्पन्न की हैं और ज्यादातर लोगों ने उसकी अभिव्यक्तियों और प्रकाशनों की असलियत देख ली है और वे यह तय कर सकते हैं कि उसका सार दानव का सार है तो उसे अब भी बाहर निकालकर सँभाला जा सकता है—बहुत देर नहीं हुई है। क्या यह एक सिद्धांत नहीं है? (हाँ।) यह सिद्धांत है; तुम्हें अपने दिल में स्पष्ट होना चाहिए। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि बाद में उसे कैसे सँभाला जाता है, समय का चयन उचित होना चाहिए। मान लो कि तुम उसकी असलियत देख लेते हो, लेकिन ज्यादातर लोगों का उससे संपर्क नहीं रहा है और उन्होंने उसकी असलियत तो और भी कम देखी है। फिर अगर तुम सत्य पर संगति किए बिना और उसका भेद पहचानने का तरीका समझाए बिना सीधे उसका चरित्र चित्रण करते हो और उसे सँभालते हो तो यह बहुत ही ज्यादा जल्दबाजी होगी। और मान लो कि उसके सार की असलियत देख लेने के बाद तुम उसके प्रति विकर्षण महसूस करना शुरू कर देते हो और फिर उसकी काट-छाँट करने के मौके ढूँढ़ते रहते हो या अपने शब्दों और क्रियाकलापों में और साथ ही सत्य पर संगति करते समय हमेशा उसे निशाना बनाते हो—तो क्या यह कार्य करने का अच्छा तरीका है? (नहीं।) क्यों नहीं? (क्योंकि अगर हम उससे इस तरीके से पेश आए तो ज्यादातर लोगों को पता ही नहीं चलेगा कि क्या चल रहा है और यह तक हो सकता है कि उनमें गलतफहमियाँ उत्पन्न हो जाएँ। इस व्यक्ति के सार को तथ्यों के जरिए बेनकाब करना और स्पष्ट रूप से सामने लानाआवश्यक है और सिर्फ तभी जब लोगों के पास उसका भेद पहचानने की क्षमता हो जाए, उसे उजागर करना और उसका गहन-विश्लेषण करना या उसकी काट-छाँट करना उचित होगा—तब सभी लोग समझ जाएँगे। अगर यह व्यक्ति सत्य का अनुसरण करने वाला व्यक्ति नहीं है, लेकिन वह विघ्न-बाधाएँ उत्पन्न नहीं करता और अब भी कुछ सेवा कर सकता है तो हमें उसे सेवा करने देना चाहिए। अगर हम जानते हैं कि वह सत्य का अनुसरण करने वाला व्यक्ति नहीं है, लेकिन फिर भी हम लगातार उसकी काट-छाँट करते हैं तो यह उसके कर्तव्य के निर्वहन को प्रभावित करेगा।) इस तरह से कार्य करना सिद्धांतहीन है। दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए और पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों से पेश आते समय लंबे समय तक संपर्क और अवलोकन के जरिए भले ही तुमने उनके सार की असलियत देख ली हो, फिर भी तुम्हें कुछ बुद्धिमानी का उपयोग करना चाहिए और उनसे सिद्धांतों के अनुसार पेश आना चाहिए। बुद्धिमानी का उपयोग करना ठीक है, लेकिन तुम सिद्धांतों का उल्लंघन नहीं कर सकते। ऐसे लोगों से सिद्धांतों के अनुसार पेश आने में कई विवरण शामिल हैं। उनमें से एक यह है कि भले ही तुम स्पष्ट रूप से यह देखते हो कि वे सत्य से विमुख लोग हैं जिनका सार दानवों का सार है, फिर भी तुम हमेशा उनमें दोष नहीं ढूँढ़ सकते, उनकी काट-छाँट करने के लिए उनकी मामूली-सी गलतियों पर उन्हें टोक नहीं सकते या हर मोड़ पर उन्हें उजागर नहीं कर सकते। उन्हें पता ही नहीं होगा कि क्या चल रहा है; वे बेखबर होंगे और उन्हें यह पता नहीं होगा कि तुम क्यों उनकी काट-छाँट कर रहे हो और क्यों उन्हें निशाना बना रहे हो। ऐसा करने से उनके कर्तव्य के निर्वहन पर भी प्रभाव पड़ेगा। दूसरों की नजर में भले ही तुम जो करते हो या कहते हो उसमें तुम गलत नहीं हो, लेकिन इस तरीके से कार्य करने से न सिर्फ कोई नतीजा नहीं मिलता है, बल्कि इसके प्रतिकूल नतीजे भी होते हैं और यह सत्य-सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है। इसलिए, चाहे तुम किसी भी प्रकार के व्यक्ति से निपट रहे हो, तुम्हें उससे सिद्धांतों के अनुसार और निष्पक्षता से पेश आना चाहिए; इस आधार पर कार्य मत करो कि तुम कैसा महसूस करते हो। थोड़ा-बहुत बुद्धिमानी का उपयोग करना ठीक है, लेकिन तुम्हें उससे सिद्धांतों के अनुसार पेश आना चाहिए। इस तरीके से कार्य करना, एक तो यह है कि यह व्यवस्था का पालन करता है और नियमों की अनुपालना करता है और इससे गड़बड़ियाँ उत्पन्न होने की संभावना कम रहती है; दूसरा यह है कि इससे यह भी सिद्ध होता है कि तुम्हारे पास परमेश्वर का भय मानने वाला दिल है, तुम पागलों की तरह गलत कर्म नहीं कर रहे हो और न ही तुम अपने खुद के इरादों के अनुसार जानबूझकर या लापरवाही से चीजें कर रहे हो। तुम्हारे पास हर प्रकार के व्यक्ति से पेश आने के लिए सिद्धांत होने चाहिए। चाहे वे दानव हों, पशु हों या मनुष्य हों, तुम्हें उनके साथ सिद्धांतों के अनुसार पेश आना चाहिए। तुम्हें इस प्रकार के लोगों का भेद पहचानने और लोगों से पेश आने के सिद्धांतों पर पकड़ बनाने में समर्थ होना चाहिए। जब इस मामले की बात आती है तब तुम्हारे पास विकृत समझ नहीं होनी चाहिए, है ना? (सही कहा।) गड़बड़ करने वाली कोई भी चीज मत करो। अगर तुम कुछ ऐसा करते हो जिससे गड़बड़ियाँ या विघ्न-बाधाएँ उत्पन्न होती हैं तो फिर तुम बहुत ही ज्यादा बेवकूफ हो; मनुष्य को ऐसा नहीं करना चाहिए। समझे? (समझ गए।)
इससे पहले हमने उन लोगों के सार की अभिव्यक्तियों के बारे में संगति की थी जो पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए हैं और जो दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए हैं, जो कि दो अलग वर्गीकरणों से संबंधित हैं। इससे लोगों को यह देखने में मदद मिली कि वैसे तो सभी प्रकार के लोगों के पास मानवीय रंग-रूप होता है, फिर भी सत्य के प्रति उनके अलग-अलग रवैयों के जरिए उनके सार और उनके वर्गीकरण में अंतरों का भेद पहचाना जा सकता है। किसी व्यक्ति का बाहरी रंग-रूप चाहे कैसा भी हो—शायद किसी के नैन-नक्श समानुपातिक हों, वह काफी सुसंस्कृत और दयालु दिखता हो या शिक्षित, कुलीन, रुतबे और शालीनता वाला प्रतीत होता हो और यहाँ तक कि ऐसा प्रतीत होता हो कि उसमें गरिमा है, वह काफी महान है, कोई साधारण व्यक्ति नहीं है—इनमें से कोई भी उसके सार को निरूपित करने का आधार नहीं है। चाहे उसके नैन-नक्श कैसे भी हों, चाहे वह लंबा हो या ठिगना, मोटा हो या पतला, उसकी त्वचा का रंग कैसा भी हो या उसका जीवन संपन्न हो या विपन्न, इनमें से कोई भी यह प्रदर्शित नहीं कर सकता कि वास्तव में उसका सार क्या है। व्यक्ति के सार का निरूपण मानवीय पारंपरिक संस्कृति के मानकों या नैतिक आचरण के बारे में कहावतों पर आधारित नहीं हो सकता और न ही यह प्रसिद्ध लोगों के उन आदर्श वाक्यों या प्रसिद्ध उक्तियों पर आधारित हो सकता है जिनका पूरे इतिहास में लोगों द्वारा सारांश किया जाता है और न ही यह सत्तारूढ़ दलों के भ्रामक बयानों पर आधारित हो सकता है। तो फिर इसे किस पर आधारित होना चाहिए? लोगों को विभिन्न प्रकार के लोगों के सार के बारे में राय बनाने और उनका सार तय करने के आधार के रूप में परमेश्वर के वचनों, परमेश्वर द्वारा व्यक्त सत्य और लोगों से परमेश्वर की अपेक्षाओं का उपयोग करना चाहिए। लोगों के बाहरी रंग-रूप, उनके गुणों या वे जिस ज्ञान पर पकड़ बनाने लगे हैं उसके आधार पर उनके बारे में राय नहीं बनानी चाहिए, और व्यक्ति के रुतबे या समाज में और लोगों के बीच वह जो भूमिका निभाता है उसके आधार पर तो निश्चित रूप से राय नहीं बनानी चाहिए। लोगों के बारे में राय बनाने के ऐसे सभी तरीके गलत हैं। परमेश्वर के वचनों के आधार पर लोगों के बारे में राय बनानी चाहिए; सिर्फ परमेश्वर के वचन ही सत्य हैं। एक बात तो यह है कि इसे सत्य पर आधारित होना चाहिए; दूसरी बात यह है कि इसे सत्य के प्रति व्यक्ति के रवैये और इस बात पर आधारित होना चाहिए कि क्या वह सत्य समझ सकता है। सत्य के आधार पर व्यक्ति के सार का भेद पहचानना और उसका वर्गीकरण तय करना सबसे सटीक है। इससे निश्चित रूप से कोई त्रुटि नहीं होगी।
पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोग और दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए लोग—इन दो प्रकार के लोगों की अभिव्यक्तियों पर संगति करने के बाद आगे हमें उन लोगों की अभिव्यक्तियों पर संगति करनी चाहिए जो सच्चे मनुष्यों से पुनर्जन्म लिए हुए हैं। अब हम सबसे महत्वपूर्ण भाग पर आ गए हैं। इसके लिए पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों में दिखाने के लिए निश्चित अभिव्यक्तियाँ और विशेषताएँ होती हैं, जैसे कि दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों में होती हैं। तो क्या मनुष्यों से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों में भी इनके अनुरूप अभिव्यक्तियाँ और विशेषताएँ होती हैं? (हाँ।) यह निश्चित है। हमने मानवता की कुछ ऐसी मूलभूत अभिव्यक्तियों और विशेषताओं का जिक्र किया है जो सच्चे मनुष्यों में होती हैं। आज हम मनुष्यों से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों की विशिष्ट अभिव्यक्तियों और विशेषताओं पर संगति करेंगे। यह देखते हुए कि इस प्रकार के व्यक्ति का वर्गीकरण मानवीय है, इसलिए औपचारिक रूप से संगति करने से पहले आओ, सबसे पहले यह सोचें कि मनुष्य होने की मूलभूत विशेषताएँ क्या हैं। अथवा, वर्षों लोगों के साथ बातचीत करने और मेलजोल रखने के जरिए, तुमने इस प्रकार के व्यक्ति में, जिसमें मनुष्य होने का वर्गीकरण है, क्या विशेषताएँ देखी हैं? उसकी क्या अभिव्यक्तियाँ होती हैं? बताओ। (इस प्रकार के व्यक्ति में, जिसमें मानव होने का वर्गीकरण है, जमीर और विवेक होता है। उदाहरण के लिए, अगर वह कुछ गलत करता है या किसी के साथ गलत करता है या कुछ ऐसा करता है जो सत्य का उल्लंघन करता हो तो वह अपने जमीर में धिक्कार महसूस करता है।) (इस प्रकार का व्यक्ति कम-से-कम सत्य समझ सकता है, वह सकारात्मक चीजों से प्रेम करता है और नकारात्मक चीजों से बेहद नफरत करता है। उसका जमीर और विवेक सही-सलामत होते हैं।) सत्य समझने में समर्थ होना अपेक्षाकृत उच्च मानक है। सत्य से सामना होने से पहले इस प्रकार के व्यक्ति में मानवता की कौन-सी विशेषताएँ होती हैं? उसके क्रियाकलापों, वाणी और वह कैसे आचरण करता है और कैसे दुनिया से निपटता है इनकी क्या विशेषताएँ होती हैं? वह सामान्य मानवता की कौन-सी अभिव्यक्तियों और प्रकाशनों को प्रदर्शित करता है? यानी जब वह लोगों से बातचीत करता है और मेलजोल रखता है तब वह ऐसी कौन-सी अभिव्यक्तियाँ प्रदर्शित करता है जो जिससे दूसरे लोग यह देख सकें कि वह सकारात्मक व्यक्ति है? (वह अपेक्षाकृत तर्कसंगत होता है, वह रहमदिल होता है, वह ऐसी चीजें नहीं करता जो दूसरों को धोखा देती हों या नुकसान पहुँचाती हों और उसका दूसरों को नुकसान पहुँचाने का कोई इरादा नहीं होता।) तुम लोग जिन चीजों के बारे में सोच सकते हो वे यही सकारात्मक अभिव्यक्तियाँ हैं जो मानवता के अपेक्षाकृत अनुरूप हैं, जो लोगों के मन में एक अच्छे व्यक्ति की अभिव्यक्तियाँ हैं। रहमदिल होना, दूसरों को धोखा नहीं देना या नुकसान नहीं पहुँचाना, अपनी बात के प्रति सच्चा रहना, जिम्मेदारी का बोध होना, दूसरों के साथ मिल-जुलकर रहने में समर्थ होना, सकारात्मक चीजों की लालसा रखना और नकारात्मक चीजों से बेहद नफरत करना—ये सभी मानवता की कुछ सकारात्मक अभिव्यक्तियाँ हैं। क्या और भी हैं? (इसमें आध्यात्मिक समझ होना—परमेश्वर के वचनों को समझने में समर्थ होना—भी है।) आध्यात्मिक समझ होना मानवता, जिस पर हम फिलहाल चर्चा कर रहे हैं, से असंबंधित है। हम मुख्य रूप से मामलों को सँभालने में मानवता वाले लोगों के विभिन्न दृष्टिकोणों के बारे में बात कर रहे हैं और साथ ही, व्यक्ति के स्व-आचरण और दूसरों से पेश आने के सार की अभिव्यक्तियों, और जब स्व-आचरण और क्रियाकलापों की बात आती है तब उसके सिद्धांतों और न्यूनतम मानकों वगैरह के बारे में बात कर रहे हैं। मानवता की जिन सकारात्मक अभिव्यक्तियाँ को लोग देख और जान सकते हैं, उनकी संख्या कम है। ऐसा लगता है कि मानवजाति में जो लोग यह समझते हैं कि कैसे आचरण करना है, वे सच में दुर्लभ हैं। इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि बहुत-से लोग कहते हैं कि वे आचरण करने में विफल हो गए हैं। यह देखो कि फिल्मों और टीवी शो में अभिनेता सकारात्मक किरदारों को कैसे चित्रित करते हैं—जब किसी मामले में किसी विशेष दृष्टिकोण, अभिव्यक्ति या रवैये को प्रकट करने की बात आती है तब अभिनेता यह नहीं जानते कि उसका अभिनय कैसे करना है या उसे कैसे व्यक्त करना है और इस क्षेत्र में उनकी समझ खाली होती है। अगर तुम उनसे गुंडे, बदमाश, माफिया सरगना, वेश्या, स्वच्छंद महिला या किसी मशहूर या महान व्यक्ति का किरदार निभाने को कहो तो वे उस किरदार को बखूबी निभा सकते हैं, वे इन लोगों के हर हाव-भाव, हर शब्द और हर क्रियाकलाप, यहाँ तक कि उनकी एक नजर को भी पूरी जीवंतता और विशिष्टता के साथ चित्रित कर सकते हैं। कुछ दर्शक उन्हें कोई नकारात्मक भूमिका निभाते हुए देखने के बाद गलती से यह तक मान बैठते हैं कि सच में शो वाले बुरे व्यक्ति वे ही हैं, और अगर वे उन्हें कभी दिख जाएँ तो उन्हें पीटना चाहेंगे। कुछ तो उन पर थूक भी देंगे। देखो, उन्होंने अपनी भूमिका को कितनी जीवंतता से चित्रित किया, उन्होंने उस बुरे इंसान को वाकई जीवित कर दिया। जब एक अच्छे व्यक्ति का किरदार निभाने की बात आती है तब क्या होता है? क्या लोग उनके अभिनय से कुछ प्रेरणा प्राप्त कर सकते हैं, क्या यह जान सकते हैं कि मानवता वाला व्यक्ति कैसे बनना है? वाकई ऐसा कोई अभिनेता नहीं है। जब मानवता वाला व्यक्ति बनने की बात आती है तब मानवजाति को कुछ समझ नहीं आता। न सिर्फ पटकथा लेखकों और निर्देशकों को कुछ समझ नहीं आता, बल्कि दर्शकों को भी कुछ समझ नहीं आता—कोई नहीं समझता कि मानवता होने का मतलब क्या होता है। और इसलिए फिल्मों और टीवी शो में इसे पूरे खोखलेपन से चित्रित किया जाता है। उदाहरण के लिए, जब कोई अभिनेता कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य की भूमिका निभाता है जो मरने से ठीक पहले अपनी आँखें बंद कर लेता है, तब दर्शक कहते हैं, “वह निश्चित रूप से अभी तक नहीं मरा है, उसने अपनी पार्टी का बकाया जो नहीं चुकाया है!” और जैसा सोचा था वैसा ही होता है, एक सेकंड पूरा होने से पहले ही वह अपनी आँखें खोल लेता है और काँपते हुए अपनी जेब से कुछ सिक्के निकालता है और कहता है, “ये मेरी पार्टी का बकाया है। मैं पार्टी का कर्जा नहीं रख सकता। पार्टी निश्चित रहे। जब मैं दूसरी दुनिया में पहुँचूँगा तब भी मैं बिना डगमगाए, यहाँ तक कि मरते दम तक पार्टी के प्रति वफादार रहूँगा!” सिर्फ तभी वह दम तोड़ता है। इसी तरह से फिल्मों और टीवी शो में मानवता वाले व्यक्ति को चित्रित किया जाता है। दर्शकों की नजर में यह वास्तव में पूरी तरह से खोखला है। ऐसे लोग वास्तविक जीवन में मौजूद नहीं होते और लोगों के लिए इसे प्राप्त करना बहुत मुश्किल है। इसलिए मानवजाति बस समझ ही नहीं पाती कि सच्ची मानवता क्या है और उसके लिए इसका मानक परिभाषित करना बहुत मुश्किल है। या तो मानक बहुत ही ज्यादा ऊँचा तय किया जाता है और यह पूरी तरह से खोखला होता है या लोग बेखबर होते हैं और इसे मनमाने ढंग से तय करते हैं। वास्तव में एक सच्चे मनुष्य में जो मानवता होती है वह बहुत सरल होती है। कितनी सरल? यह कुछ ऐसी चीज है जो तुम्हारी पहुँच में है, कुछ ऐसी चीज है जिसे तुम प्राप्त कर सकते हो। इसका तुम्हारी पहुँच में होने का क्या मतलब है? इसका मतलब है कि यह बहुत व्यावहारिक, बहुत वास्तविक, बहुत वस्तुनिष्ठ है, यह बिल्कुल भी खोखली नहीं है। क्योंकि यह बहुत वस्तुनिष्ठ और व्यावहारिक है, इसलिए लोगों को लगता है कि यह बहुत साधारण है और जिक्र करने लायक नहीं है, और यह तो उन्हें और भी कम लगता है कि ये अभिव्यक्तियाँ वही हैं जो मानवजाति को प्रदर्शित करनी चाहिए। यह मानवजाति उन चीजों की हिमायत करती है जो भव्य, उन्नत और प्रभावशाली हैं। बहुत-से लोगों में न सिर्फ सच्ची मानवता नहीं होती, बल्कि वे उससे नफरत भी करते हैं क्योंकि सामान्य मानवता की अभिव्यक्तियाँ बहुत व्यावहारिक, बहुत साधारण, बहुत आम होती हैं, और इसके बजाय वे ज्ञान का अनुसरण करते हैं और उसका आदर करते हैं। इस तरीके से पूरे समाज में एक बुरा रुझान उत्पन्न हो गया है, एक ऐसा रुझान जो सच्चे मानव की अभिव्यक्तियों से नफरत करता है और उसे नीची नजर से देखता है। यहाँ तक कि एक ऐसा व्यक्ति जिसमें सच में मानवता है, उसे भी ऐसा नहीं लगता कि इस तरीके से आचरण करना एक सच्चा मनुष्य होना या मानवता वाला व्यक्ति होना है। इसके विपरीत, वह तथाकथित नेक और असाधारण व्यक्ति बनने का प्रयास करता है जिसकी हिमायत समाज के बुरे रुझान करते हैं। यह उस मानवता सार को नकारता है और ढकता है जो उन कुछ लोगों में होता है जिनमें मानवता होती है। यहाँ “ढकने” का क्या मतलब है? इसका मतलब है कि कोई भी तुम्हें मानवता वाला व्यक्ति नहीं मानता। इसका मतलब है कि तुम चाहे कुछ भी करो, दूसरे लोग तुम्हें अलग-थलग कर देते हैं और तुम्हें नीची नजर से देखते हैं, और लोगों के बीच तुम्हें अपनी प्रतिभा का उपयोग करने की कोई जगह नहीं मिलती, तुम्हें बोलने की कोई जगह नहीं मिलती और तुम्हें अपनी शक्तियों का उपयोग करने का कोई अवसर नहीं मिलता। “नकारने” का मतलब है कि भ्रष्ट मानवजाति में तुम्हारी सामान्य मानवता बस जिक्र करने लायक ही नहीं है। मानवता होना कोई ऐसी चीज नहीं है जिसकी वे हिमायत करते हैं। वे किसकी हिमायत करते हैं? वे भीड़ को खुश करने, चालाकी से अपना काम निकालने, चापलूसी और खुशामद करने, झूठ बोलने और धोखा देने की हिमायत करते हैं, और कुछ भी कहने में समर्थ होते हैं चाहे वह बात कितनी भी घिनौनी मिठास से भरी और उनकी सच्ची भावनाओं के बिलकुल विपरीत ही क्यों न हो। इस समाज में सच बोलने से तुम्हें कोई सफलता नहीं मिलेगी। तुम्हारी मानवता चाहे कितनी भी अच्छी हो, यह समाज उसकी हिमायत नहीं करता है और वह उसे नकार देगा। अगर तुम कुछ सकारात्मक, न्यायसंगत या निष्पक्ष चीजें या जमीर के शब्द कहते हो, अगर तुम अपनी उचित जगह ग्रहण करते हुए कुछ तर्कसंगत चीजें कहते हो तो वे तुम्हें अलग-थलग कर देंगे, तुम्हें नकार देंगे और तुम्हें छोटा साबित करेंगे। कुछ तो ऐसे भी हैं जो तुम्हारा मजाक उड़ाएँगे, तुम्हारा उपहास करेंगे, तुम्हें अपमानित करेंगे और फिर तुम पर आक्रमण करने और तुम्हारा बहिष्कार करने के लिए सभी दुष्ट शक्तियों और ताकतों को इकट्ठा करेंगे, और अंततः तुम्हें इतना शर्मिंदा महसूस करने पर मजबूर कर देंगे कि तुम अपना चेहरा नहीं दिखा पाओगे, वे तुम्हें खुद को नकारने पर मजबूर कर देंगे। अंत में तुम यही सोचोगे, “मैं किसी काम का नहीं हूँ, मैं न तो समाज के रुझानों के अनुसार और न ही इन लोगों के अनुसार खुद को ढाल सकता हूँ। मुझे चालबाजियों को अंजाम देना नहीं आता, मैं षड्यंत्र या चालें नहीं सोच सकता, इसलिए इन लोगों के बीच मेरा जीवित रहना बहुत मुश्किल है।” तुम खुद को बहुत हीन समझना शुरू कर देते हो, इन लोगों के साथ घुलने-मिलने में असमर्थ महसूस करते हो। दरअसल, तुम उनके सांसारिक आचरण के फलसफों को, मामलों को सँभालने की उनकी विधियों और साधनों को, और उनके जीवित रहने के तरीके को आत्मसात करने में असमर्थ हो। इस बुरे रुझान और इन बुरे लोगों द्वारा नकारे जाने के बाद तुम अपनी खुद की मानवता को नकार देते हो और फिर उनके अनुसार ढल जाने के लिए, उनका अनुसरण करने के लिए, समाज में घुलने-मिलने के लिए, इन दुष्ट लोगों के साथ घुलने-मिलने के लिए और इस बुरे रुझान में घुलने-मिलने के लिए हर संभव प्रयास करते हो। दूसरे लोग जिस तरह से चालबाजियों, कूट युक्तियों और षड्यंत्रों का उपयोग करते हैं तुम उसकी नकल करने का प्रयास करते हो और दूसरे लोग जिस तरह से चापलूसी भरे शब्द, घिनौनी मिठास से भरे शब्द और उनकी सच्ची भावनाओं के विपरीत शब्द बोलते हैं तुम उसकी भी नकल करने का प्रयास करते हो। लेकिन तुम चाहे इन चीजों की नकल करने का कैसे भी प्रयास करो और तुम चाहे कितनी भी मेहनत करो, कुल मिलाकर तुम्हें लगता है कि ये वे शब्द नहीं हैं जो तुम बोलना चाहते हो या वे चीजें नहीं हैं जो तुम करना चाहते हो। हर शब्द जो तुम बोलते हो वह तुम्हारी सच्ची भावनाओं के बहुत विपरीत होता है, और हर चीज जो तुम करते हो उससे तुम अपने जमीर में धिक्कार महसूस करते हो; तुम्हें लगता है कि तुम्हें ऐसा नहीं कहना चाहिए या ऐसा नहीं करना चाहिए। तुम हर रोज इसी तरह मुखौटा पहने हुए जीते हो। हालाँकि ऐसा लगता है कि व्यवहार, वाणी, या कुछ विचारों और नजरियों के लिहाज से तुम इस बुरे रुझान में घुल-मिल गए हो और इस भ्रष्ट मानवजाति के साथ घुल-मिल गए हो, लेकिन अंदर ही अंदर तुम दर्द, दमन और आक्रोश से भरे हो। ऐसा जीवन अनुभव होने के बाद तुम निष्पक्ष और न्यायपूर्ण व्यवहार की, सकारात्मक चीजों की और प्रकाश की लालसा करना शुरू कर दोगे। तो ऐसे व्यक्ति में मानवता की कौन-सी विशेषताएँ होती हैं जो उसे दूसरे लोगों और बुरे रुझानों के बीच ऐसी भावनाएँ और ऐसे अनुभव होने की अनुमति देती हैं? वास्तव में यह बहुत सरल है : जब किसी व्यक्ति में जमीर और विवेक का मानवता सार होता है तब लोगों के बीच रहते समय उसे ऐसे अनुभव होंगे।
जमीर और विवेक वे दो सबसे मूलभूत चीजें हैं जो मानवता वाले लोगों में होनी चाहिए। वैसे तो इन दोनों चीजों पर बार-बार चर्चा की गई है, फिर भी ये लोगों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं और इसका आकलन करने के लिए भी ये सबसे महत्वपूर्ण कसौटियाँ हैं कि किसी व्यक्ति का वर्गीकरण मनुष्य है या नहीं। जमीर का विशिष्ट रूप से क्या मतलब है? मैंने पहले बताया है कि जमीर व्यक्ति के दिल में उत्पन्न होने वाला एक गुण है और यह लोगों से कुछ माँगें करता है और मुख्य रूप से व्यक्ति के आचरण के सिद्धांतों और स्व-आचरण के न्यूनतम मानकों में अभिव्यक्त होता है। विशिष्ट रूप से, किसी व्यक्ति के आचरण करने का पंथ, उसके आचरण करने और दुनिया से निपटने के सिद्धांत और उसकी मानवता के प्रकाशन यह प्रमाणित कर सकते हैं कि उसमें जमीर है या नहीं। अभी-अभी जब मैंने पूछा कि जमीर का विशिष्ट रूप से क्या मतलब है तब तुम लोग उत्तर नहीं दे सके। तुम लोग सिर्फ उन बातों पर ध्यान केंद्रित करते हो जिन्हें तुम लोग गहन सत्य मानते हो, लेकिन जहाँ तक इस प्रकार के सत्यों की बात है तो तुम लोगों को लगता है कि वे इतने मामूली, इतने साधारण और इतने महत्वहीन हैं कि जिक्र करने योग्य ही नहीं हैं, इसलिए तुम लोग उन पर बस ध्यान ही नहीं देते हो और उन्हें गंभीरता से नहीं लेते हो। अगर किसी व्यक्ति में जमीर है तो इसका मतलब है कि उसकी मानवता में दो विशेषताएँ हैं : एक है ईमानदारी और दूसरी है दयालुता। हो सकता है कि तुम बाहरी रंग-रूप से यह न बता पाओ कि कोई व्यक्ति दयालु है या नहीं, लेकिन अगर कोई व्यक्ति रहमदिल है तो जैसे ही तुम उससे मेलजोल रखोगे तुम्हें यह बात पता चल जाएगी। कोई व्यक्ति ईमानदार है या नहीं इसका आकलन करने का आधार क्या है? यह आधार उसके आचरण करने और दुनिया से निपटने के सिद्धांत हैं। अगर वह विश्वासघाती, धूर्त, कपटी, दुनियादारी जानने वाला, षड्यंत्रकारी, और आचरण करने और दुनिया से निपटने के मामले में रहस्यमय है तो वह व्यक्ति निश्चित रूप से ईमानदार नहीं है। अगर उसका आचरण करने और दुनिया से निपटने का तरीका बहुत सरल, बहुत सीधा और बहुत सच्चा है, अगर वह दूसरों से बहुत साफ तौर पर बात करता है, लोगों के साथ मेलजोल रखते समय कुटिलता या धोखेबाजी नहीं करता है, असत्यता के बिना बोलता है और कार्य करता है—काले को काला और सफेद को सफेद कहता है, ऐसी बातों में बहुत स्पष्ट रूप से अंतर करता है—सकारात्मक चीजों का पालन करता है और बुरी शक्तियों से समझौता नहीं करता तो वह व्यक्ति काफी ईमानदार है। अगर कोई व्यक्ति ईमानदार और दयालु दोनों है तो उस व्यक्ति में जमीर है, उसमें मानवता की न्यूनतम विशेषताएँ हैं। मानवता की एक दूसरी विशेषता विवेक है। विवेक भी एक ऐसा पद और विषय है जिस पर हम अक्सर चर्चा करते हैं, लेकिन किसी ने भी कभी स्पष्ट रूप से यह परिभाषित नहीं किया है कि विवेक क्या है। विवेक के भीतर क्या शामिल है और किस प्रकार की अभिव्यक्तियाँ विवेक होने की अभिव्यक्तियाँ मानी जाती हैं—क्या तुम लोग इस पर स्पष्ट हो? ज्यादातर लोग बहुत स्पष्ट नहीं हैं; इस क्षेत्र में उनकी समझ अभी भी अपेक्षाकृत धुँधली है। तो विवेक होने का क्या मतलब है? इसका मतलब है सही रुख अपनाते हुए जो कहना चाहिए उसे कहने में समर्थ होना और जो करना चाहिए उसे करने में समर्थ होना; यही विवेक होना है। अगर तुम मानवता वाले व्यक्ति हो तो तुम्हारी वाणी और क्रियाकलाप नपे-तुले होंगे। तुम्हें पता होगा कि मौजूदा परिवेश में और तुम्हारी पहचान और रुतबे के आधार पर तुम्हें कौन-से शब्द बोलने चाहिए, कौन-सी चीजें करनी चाहिए, इन शब्दों को बोलते समय तुम्हारा क्या रुख होना चाहिए और किसी विशेष मामले को व्यक्त करने के लिए तुम्हें किस प्रकार की वाणी का उपयोग करना चाहिए। इन चीजों के लिए तुम्हारे दिल में मानक और संयम होगा। यानी तुम्हारा विवेक तुम्हारे शब्दों और व्यवहार को विनियमित कर सकेगा जिससे तुम्हारे शब्द और व्यवहार उचित हो जाएँगे, और बाहर से देखने पर दूसरे लोग उन्हें तर्कसंगत और नपे-तुले समझेंगे, तुम्हारी वाणी और क्रियाकलाप बिल्कुल सही होंगे और लोगों का नैतिक उन्नयन करने में सक्षम होंगे। चाहे तुम जो शब्द कहते हो और तुम जो चीजें करते हो वे तुम्हारी काबिलियत, तुम्हारी शिक्षा के स्तर या तुम्हारी उम्र के लिहाज से, पूरी तरह उपयुक्त हों या न हों, कम-से-कम तुम्हारे दिल में सीमाएँ होंगी, एक मानक होगा जो तुम्हें नियंत्रण में रखेगा, जो तुम्हें तर्कसंगत अवस्था में बोलने और कार्य करने की अनुमति देगा। विवेक होने का यही मतलब है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि विवेकी व्यक्ति किसका सामना करता है—चाहे वह कोई अमीर व्यक्ति हो या गरीब या कोई रुतबे वाला व्यक्ति हो या बिना रुतबे वाला—किसी भी परिस्थिति में उसकी वाणी और कार्य इस बात से बाधित नहीं होते हैं कि उसका मिजाज अच्छा है या बुरा और न ही वह इस बात पर विचार करता है कि कोई मामला उसके लिए फायदेमंद है या नहीं; उसके दिल में हमेशा संयम होता है, एक मानक या सीमा होती है जो उसे विनियमित करने का काम करती है। वह जानबूझकर टेढ़ी-मेढ़ी दलीलें नहीं देगा और न ही वह अनुचित रूप से परेशान करने वाला व्यक्ति होगा। भले ही वह कभी-कभी अंदर से गुस्से में और बहुत ही परेशान हो और उसके शब्दों का चयन काफी उचित न भी हो, तो भी वह जो कहता है वे टेढ़ी-मेढ़ी दलीलें या भ्रांतियाँ नहीं होतीं; बल्कि वे प्रस्तुत करने योग्य और दमदार होती हैं। “दमदार होने” का क्या मतलब है? इसका मतलब है कि भले ही वह जो कहता है वह आवश्यक रूप से सत्य के अनुरूप न हो, तो भी ज्यादातर लोगों की नजर में यह “तर्क” टिका रह सकता है; आमतौर पर इसे किसी सही चीज के रूप में पहचाना जाता है और कोई भी इसका विरोध नहीं करता। ऐसा व्यक्ति विवेकशील व्यक्ति है।
जमीर और विवेक, इन दोनों पहलुओं को स्पष्ट रूप से समझा दिया गया है। मानवता होने की यही दो मुख्य अभिव्यक्तियाँ हैं : एक है जमीर होना और दूसरी है विवेक होना। मुझे बताओ, क्या ये दोनों पहलू खोखले हैं या नहीं? (वे नहीं हैं।) क्या ये बहुत वास्तविक नहीं हैं? (हाँ।) ये बहुत वास्तविक हैं, खोखले नहीं हैं। तो फिर मानवजाति इनकी हिमायत क्यों नहीं करती? क्योंकि जमीर वाले व्यक्ति में ईमानदारी और दयालुता होती है और बुरी प्रवृत्तियों के बीच और बुरी, भ्रष्ट मानवजाति के बीच ईमानदार और दयालु लोग घिनौने और साथ ही बेहद महत्वहीन माने जाते हैं, सभी लोग इन्हें नीची नजर से देखते हैं। अगर तुम ईमानदार और दयालु व्यक्ति हो तो वे तुमसे वास्तव में कड़ी पूछताछ तक करेंगे : “तुम्हारे ईमानदार और दयालु होने का क्या फायदा है? क्या तुम्हारे पास ज्ञान है? क्या तुम्हारे पास सामाजिक रुतबा है? क्या समाज में तुम्हारे पास शोहरत या शक्ति है?” तुम कहते हो, “मेरे पास कोई शोहरत या शक्ति नहीं है; मैं बस कुछ हद तक ईमानदार और दयालु व्यक्ति हूँ।” लोग तुम पर हँसेंगे और नफरत से तुम्हें ठुकरा देंगे। उनकी नजर में तुम्हारे पास जमीर होना और तुम्हारा ईमानदार और दयालु होना पूँजी नहीं है—ज्ञान, रुतबे और शोहरत, या शक्ति के बिना तुम्हें समाज में कोई सफलता नहीं मिलेगी। वे कहते हैं, “तुम्हारे पास जमीर है, लेकिन जमीर की कीमत है ही क्या? तुम क्या कर सकते हो? क्या तुम षड्यंत्र और साजिशें कर सकते हो या लोगों को धोखा दे सकते हो? क्या तुम लोगों का दिल जीत सकते हो और अपने लिए उनकी तरफदारी खरीद सकते हो?” तुम इनमें से कुछ भी नहीं कर सकते। अगर तुममें जमीर है, अगर तुममें मानवता के ये दो पहलू—ईमानदारी और दयालुता—हैं तो तुम समाज की बुरी प्रवृत्तियों में पाई जाने वाली उन चीजों में दिलचस्पी नहीं लोगे, तुम इन प्रवृत्तियों का अनुसरण नहीं करोगे, इसलिए तुम्हें समाज में कोई सफलता नहीं मिलेगी और तुम लोगों द्वारा बहिष्कृत कर दिए जाओगे। वे तुम्हें बहिष्कृत क्यों करेंगे? क्योंकि ज्यादातर लोग बुरी प्रवृत्तियों का सम्मान करते हैं और बुरी प्रवृत्तियाँ समाज की मुख्यधारा बन चुकी हैं—अगर तुम अपने जमीर के अनुसार कार्य करते हो और सभी मामलों में चीजों को निष्पक्षता से सँभालते हो तो दूसरे लोग तुम्हें अनुपयुक्त समझेंगे और तुम्हें अलग-थलग कर देंगे। अगर कलीसिया में तुम अपने जमीर पर भरोसा कर सकते हो, अपनी वाणी और क्रियाकलापों में सत्य सिद्धांतों का पालन कर सकते हो और बुरे लोगों को उजागर करने और उनका गहन-विश्लेषण करने की हिम्मत कर सकते हो तो जो लोग दानवों के हैं, वे अपनी अपने पैरों के नीचे की जमीन खो देंगे और बेनकाब हो जाएँगे; उनकी कुट युक्तियाँ और षड्यंत्र, और साथ ही सत्य से नफरत करने वाली उनकी शैतानी प्रकृति पूरी तरह से खोलकर रख दी जाएगी। इसलिए, ये लोग जो दानवों के हैं, वे कलीसिया में ऐसे लोगों के होने से विशेष रूप से डरते हैं जो सत्य सिद्धांतों का पालन करते हैं। जब भी वे किसी ऐसे व्यक्ति को देखते हैं जो सत्य समझता है तब वे उसे अलग-थलग कर देते हैं और उसे कुचल डालते हैं, इस बात से डरते हैं कि सत्य समझने वाले लोग उन्हें उजागर करने के लिए उठ खड़े होंगे जिससे वे बेनकाब हो जाएँगे और निकाल दिए जाएँगे। वे इस तरीके से कार्य करने के लिए अपनी शैतानी प्रकृति द्वारा संचालित होते हैं। परमेश्वर के घर में जो लोग दानवों के हैं, वे ठीक इस कारण से डटे नहीं रह सकते क्योंकि परमेश्वर के घर में सत्य की सत्ता है, परमेश्वर ही सामर्थ्य रखता है। लेकिन अविश्वासी दुनिया में यह अलग है। चूँकि इस दुनिया में नास्तिकता और बुरी प्रवृत्तियाँ ही प्रबल हैं, इसलिए मानवता वाले लोग बुरी प्रवृत्तियों के बीच और बुरी, भ्रष्ट मानवजाति के बीच अपने पैर नहीं जमा पाते हैं। इस बीच जो लोग अपनी युक्तियों में निष्ठुर होते हैं, कपटी और धूर्त होते हैं, वे अक्सर अगुआ, असाधारण और लोगों के बीच तथाकथित सभ्रांत लोग होते हैं। मानवता वाला व्यक्ति, चाहे उसकी काबिलियत, खूबियाँ, शक्तियाँ या प्रतिभाएँ कुछ भी हों, उसे अलग-थलग कर दिया जाता है और उसके पास आगे बढ़ने का कोई अवसर नहीं होता। जब तक वह कुछ न्यायसंगत शब्द बोलता रहेगा या निष्पक्षता से मामलों को सँभालता रहेगा तब तक वे बुरे लोग और दानव उसे सताते रहेंगे। इसलिए, यह बुरी मानवजाति जो दानवों की है, जमीर की अवहेलना करती है; सिर्फ मानवता वाले लोगों में ही जमीर होता है। जहाँ तक विवेक की बात है, विवेक होने की अभिव्यक्ति यह है कि व्यक्ति के साथ चाहे कुछ भी हो जाए, वह उससे तर्कसंगत रूप से पेश आ सकता है, न्यायपूर्ण रूप से बोल सकता है और कार्य कर सकता है, वह अपनी भावनाओं या अपनी शोहरत या रुतबे के अनुसार कार्य नहीं करेगा और वह दूसरों को मजबूर या बाधित नहीं करेगा। वह मामले से तर्कसंगत रूप से पेश आने में समर्थ होता है : अगर वह सही है तो वह सही है; अगर वह गलत है तो वह गलत है; अगर वह उचित है तो वह उचित है; अगर वह अनुचित है तो वह अनुचित है। वह चीजों का मूल्यांकन निष्पक्ष रूप से करता है और चीजों को सिद्धांतों के अनुसार न्यायसंगत रूप से करता है, और वह मानवता की नैतिक सीमाओं का उल्लंघन नहीं करता। यही विवेक होने की अभिव्यक्ति है। ये दो चीजें, जमीर और विवेक, समाज में नहीं टिकतीं, विशेष रूप से बुरे देशों में और बुरी प्रवृत्तियों के बीच, जहाँ ये और भी ज्यादा नहीं टिकतीं और अस्वीकार्य होती हैं। लेकिन जमीर और विवेक ही ठीक वे दो प्रमुख विशेषताएँ हैं जो सामान्य मानवता में होती हैं और ये वे विशेषताएँ भी हैं जो मानवजाति में होनी चाहिए। जब तुममें ये दोनों विशेषताएँ होंगी, सिर्फ तभी तुम एक सच्चे मनुष्य होगे। अगर तुम जमीर और विवेक वाले व्यक्ति हो तो एक बात तो यह है कि तुम अपने आचरण में विशेष रूप से सिद्धांतयुक्त होगे और लोगों से अपेक्षाकृत न्यायसंगत तरीके से पेश आ पाओगे। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि किसी व्यक्ति के साथ तुम्हारा रिश्ता कैसा है या उसने तुम्हें चोट पहुँचाई है या नहीं, तुम उससे सही ढंग से पेश आ सकते हो और उसका वस्तुनिष्ठ रूप से मूल्यांकन कर सकते हो। यही ईमानदारी है, जो मानवता की एक विशेषता है। इसके अतिरिक्त, अगर तुममें दयालुता है, जो मानवता की एक और विशेषता है तो लोगों से निपटते समय या चीजें करते समय तुम्हारी एक निश्चित सीमा होगी, जो तुम्हें अपने जमीर के खिलाफ बोलने या कार्य करने से रोक सकती है। उदाहरण के लिए, बुरे लोग हमेशा टेढ़े-मेढ़े शब्द बोलते हैं और टेढ़ी-मेढ़ी दलीलें बकते हैं, काले और सफेद को उलट-पुलट कर पेश करते हैं और तथ्यों को तोड़-मरोड़ देते हैं। जो कोई भी उनके लिए हानिकारक है या जिसने भी उन्हें चोट पहुंचाई है या निशाना बनाया है, उस के प्रति वे द्वेष रखते हैं और हर तरह से उसे सताने और उस पर पलटकर हमला करने के अवसर ढूँढ़ने का प्रयास करते हैं। लेकिन मानवता वाले व्यक्ति के लिए, क्योंकि उसमें ईमानदारी और दयालुता होती है जो जमीर का हिस्सा हैं, भले ही किसी ने उसे नुकसान पहुँचाया हो या धोखा दिया हो और वह पलटकर हमला करना और बदला लेना चाहता हो और हो सकता है कि आवेश में वह कुछ कठोर शब्द कह डाले, जैसे कि “मैं उससे दिल की गहराइयों से नफरत करता हूँ!”, लेकिन जब बदला लेने का वास्तविक अवसर सामने आता है तब उसका दिल पिघल जाता है और वह नरम पड़ जाता है; वह ऐसा करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता है, उसका दिल नहीं मानता। और कुछ समय बाद, वह इस नफरत को अब और जगा नहीं पाता। दयालु व्यक्ति ऐसा ही होता है। अगर किसी ने तुम्हें धोखा दिया है या तुम्हें नुकसान पहुँचाया है और तुम्हारे पास बदला लेने का अवसर है, अपने दुश्मन को सजा और प्रतिकार भुगतते देखने का अवसर है तो क्या तुम क्रियाकलाप कर पाओगे और उन पर पलटकर हमला करने के लिए चीजें कर पाओगे? जब तुम गुस्से में होते हो, तब हो सकता है कि तुम कहो, “मैं उस पर जरूर पलटकर हमला करूँगा! वह पूरी तरह से भयानक और निष्ठुर है!” लेकिन जब बदला लेने का मौका सचमुच आता है तब तुम ऐसा करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। तुम कहोगे, “जाने दो, वह तो बहुत पहले की बात है। चलो, उसे वहीं समाप्त कर दें।” तुम अंतहीन रूप से उसका पीछा नहीं करोगे और न ही तुम अपने दुश्मन को सजा या बुरा अंजाम भुगतते देखने पर अड़ जाओगे। तुम अपने दिल में लगातार नफरत लेकर नहीं जीओगे; कुछ समय बाद यह नफरत गायब हो जाएगी। यही दयालु दिल होने की अभिव्यक्ति है। दयालुता जमीर वाले व्यक्ति की एक विशेष अभिव्यक्ति है और साथ ही मनुष्य होने की विशेषता भी है। यकीनन कुछ लोगों की नजर में दयालुता एक कमजोरी है। यहाँ तक कि हो सकता है कि कुछ अविश्वासी लोग तुम्हें कायर तक समझें और तुम्हें उकसाते हुए कहें, “तुम्हें निष्ठुर और पत्थरदिल होना चाहिए। जब बदला लेने का अवसर आता है तब तुम्हें खून का बदला खून से लेना चाहिए, अपने दुश्मन को खुद कुचल डालना चाहिए और उसे अपने ही हाथों से मार डालना चाहिए।” लेकिन तुम सोचते हो, “अगर मैं अपने दुश्मन को अपने ही हाथों से मार डालता हूँ तो क्या मैं बुराई नहीं कर रहा होऊँगा? उसका जीवित रहना मुझे प्रभावित नहीं करता; बस यही है कि उसने जो एक चीज की, वह हद पार कर गई और मुझे चोट लग गई, लेकिन वह सब अतीत की बात है।” समय के साथ तुम पाते हो कि तुम उससे अब और नफरत नहीं करते। कुछ लोग कहते हैं कि तुम बहुत कायर हो, पर्याप्त निष्ठुर नहीं हो। खुद तुम्हें भी यह हैरानी में डालने वाला लगता है : “मैं निष्ठुर क्यों नहीं हो सकता? मैं अपने दुश्मनों के प्रति हमेशा नरमी क्यों बरतता हूँ और द्वेष क्यों नहीं रख पाता?” कुछ लोगों की नजर में दयालु दिल होना मानवता की कमजोरी है। लेकिन वास्तव में यह मानवता की एक विशेषता है, है ना? (हाँ।)
हम मानवता के दो महत्वपूर्ण अंशों—जमीर और विवेक—के बारे में और विस्तार से नहीं बताएँगे। आओ, दो दूसरे सबसे विशिष्ट पहलुओं के बारे में बात करें जिन्हें सबसे आसानी से अनदेखा किया जाता है या जिनके बारे में लोगों को कभी जानकारी ही नहीं रही है। अगर हम सिर्फ यह कहें कि किसी व्यक्ति में मानवता का जमीर और विवेक है तो यह लोगों को अपेक्षाकृत सामान्य लगता है और यह निर्धारित करना बहुत मुश्किल होगा कि किसी व्यक्ति ने ऐसी क्या चीजें की हैं या उसमें ऐसी कौन-सी अभिव्यक्तियाँ हैं जो दर्शाती हैं कि उसके पास सही मायने में जमीर और विवेक है और यह आकलन करना मुश्किल होगा कि क्या उसके पास सही मायने में सामान्य मानवता है। इसलिए, हम जमीर और विवेक की विशिष्ट अभिव्यक्तियों के नजरिए से नहीं, बल्कि दो दूसरे पहलुओं से संगति करेंगे। यानी, अगर किसी व्यक्ति में मानवता का सार है तो एक बात तो यह है कि वह उचित-अनुचित का भेद पहचान सकता है और इसके अतिरिक्त, वह यह भी जानता है कि क्या सही है और क्या गलत। किसी व्यक्ति में ये दोनों पहलू हैं या नहीं यह बात यह दर्शाने के लिए पर्याप्त है कि उसमें जमीर और विवेक है या नहीं। यह चीज इस बात का गहन-विश्लेषण करने का एक ज्यादा विशिष्ट तरीका है कि किसी की मानवता में जमीर और विवेक है या नहीं। जब किसी व्यक्ति में ये दोनों पहलू—उचित-अनुचित का भेद पहचानना और जानना कि क्या सही है और क्या गलत—होते हैं, सिर्फ तभी यह सही मायने में दर्शाता है कि उसमें मानवता का जमीर और विवेक है। अगर उसमें ये दोनों पहलू नहीं हैं तो जमीर और विवेक होने का उसका दावा झूठा है और यह तथ्यों के हिसाब से नहीं है। आओ, सबसे पहले उचित-अनुचित का भेद पहचानने में समर्थ होने को देखें। “भेद पहचानने” का मतलब है समझना, जानना, जागरूक होना और बूझना। “उचित-अनुचित” का क्या मतलब है? उचित और अनुचित का मतलब सकारात्मक चीजें और नकारात्मक चीजें हैं। तो फिर यह जानने का क्या मतलब है कि क्या सही है और क्या गलत? उदाहरण के लिए, “मानवजाति को परमेश्वर ने बनाया है।” क्या यह कथन सही है या गलत? (यह सही है।) “मानवजाति वानरों से विकसित हुई है।” क्या यह कथन सही है या गलत? (गलत।) अगर तुम यह भेद पहचान सकते हो और यह फैसला ले सकते हो कि कौन-से विचार सही हैं और कौन से गलत, तो यह इस बात को जानना है कि क्या सही है और क्या गलत। दानव कहते हैं, “मानवजाति वानरों से विकसित हुई है।” यह सुनकर तुम कहते हो, “यह सही नहीं है। मानवजाति को परमेश्वर ने बनाया है।” तो फिर इस मामले में तुम भ्रमित नहीं हो और तुम जानते हो कि क्या सही है और क्या गलत। तो फिर क्या सही-गलत और उचित-अनुचित में कोई अंतर है? (हाँ।) “परमेश्वर सारी मानवजाति के भाग्य पर संप्रभु है।” क्या यह कथन सही है या गलत? (यह सही है।) “मानवजाति अपने भाग्य का नियंत्रण खुद करती है।” क्या यह कथन सही है या गलत? (गलत।) “कोई व्यक्ति कितना लंबा जीवन जीता है यह इस पर निर्भर करता है कि कैसे वह अपना ध्यान रखता है और स्वस्थ रहता है।” क्या यह कथन सही है या गलत? “किसी व्यक्ति का जीवनकाल परमेश्वर द्वारा नियत होता है।” यह सही है या गलत? (सही है।) अब तुम जानते हो कि यह जानने का क्या मतलब है कि क्या सही है और क्या गलत, है ना? (हाँ।) तो फिर आओ, उचित-अनुचित का भेद पहचानने को देखें। हमने अभी-अभी क्या कहा कि “उचित-अनुचित” का क्या मतलब है? (सकारात्मक चीजें और नकारात्मक चीजें।) उदाहरण के लिए, ईमानदार व्यक्ति होना—क्या यह सकारात्मक चीज है या नकारात्मक चीज है? (सकारात्मक चीज है।) “दुनिया पैसों के इशारों पर नाचती है” के बारे में क्या कहते हो? (वह नकारात्मक चीज है।) दूसरा उदाहरण कौन दे सकता है? (लोगों के लिए परमेश्वर की आराधना करना पूरी तरह से स्वाभाविक और न्यायोचित है। यह सकारात्मक चीज है।) तो फिर अगरबत्ती जलाना और बुद्ध की आराधना करना क्या है? (यह नकारात्मक चीज है।) चीजें करने में सत्य की खोज करना। (यह सकारात्मक चीज है।) व्यक्ति का अपनी खुद की इच्छा का अनुसरण करना और वह जो कुछ भी करता है उसमें एकतरफा फैसले लेना। (यह नकारात्मक चीज है।) तुम जानते हो कि कौन-सी चीज सकारात्मक है और कौन-सी नकारात्मक है, और तुम यह भी फैसला कर सकते हो कि कौन-से विचार सही हैं और कौन-से गलत—इसे उचित-अनुचित का भेद पहचानने में समर्थ होना और यह जानना कहा जाता है कि क्या सही है और क्या गलत। यह अंतर्दृष्टि और समझ होना और अपने दिल में इन चीजों का भेद पहचानने की क्षमता होना—यह दर्शाता है कि तुम मानवता के गुण वाले व्यक्ति हो। उचित-अनुचित का भेद पहचानने और यह जानने में कि क्या सही है और क्या गलत, समर्थ होने का मतलब है कि व्यक्ति की मानवता के भीतर कुछ सकारात्मक और नकारात्मक चीजों की पहचान करने की जन्मजात क्षमता है। इसके अतिरिक्त, उसके दिल में इस बात को लेकर कुछ जागरूकता और भावना भी है कि कुछ चीजें सही हैं या नहीं। यहाँ तक कि सत्य सुने या समझे बिना भी उसकी मानवता में, भेद पहचानने की इस प्रकार की क्षमता होती है। भले ही वह इसे स्पष्ट रूप से नहीं कह सकता हो, फिर भी वह अपने दिल में जानता है कि कौन-सी चीजें सकारात्मक हैं और कौन-सी नकारात्मक हैं और वह जानता है कि नकारात्मक चीजें गलत होती हैं। अगर उसके दिल में नफरत की भावना भी है और वह इन चीजों को अस्वीकार कर सकता है और उसके लिए इनका पालन नहीं करना संभव है तो यह और भी बेहतर है। जब वह सत्य नहीं समझता तब भी, भले ही वह सकारात्मक और नकारात्मक चीजों के बीच का भेद स्पष्ट रूप से न पहचान सके, उसके दिल में सकारात्मक और नकारात्मक चीजों के प्रति अलग-अलग भावनाएँ होती हैं और उनसे पेश आने के अलग-अलग तरीके होते हैं। उदाहरण के लिए, समाज में कुछ बुरी प्रवृत्तियों के संबंध में, जब मानवता वाले लोग इन बुरी प्रवृत्तियों को देखते हैं तब वे अपने दिलों में गहरी नफरत महसूस करते हैं। उन्हें लगता है कि ये चीजें सही मार्ग नहीं हैं, सकारात्मक चीजें नहीं हैं और न ही ऐसी चीजें हैं जिनका लोगों को अनुसरण करना चाहिए या जिन्हें उन्हें करना चाहिए। इस तथ्य के बावजूद कि इस सामाजिक परिवेश में रहने वाले व्यक्ति के रूप में उनके पास बुरी प्रवृत्तियों का अनुसरण करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है, वे दिल की गहराइयों में उन्हें घटिया समझते हैं। और उन्हें घटिया समझते हुए वे इस परिवेश से भाग निकलने का हर अवसर तलाशते हैं या इन बुरी प्रवृत्तियों से बचने और इन्हें अस्वीकार करने के हर संभव तरीके सोचते हैं।
एक व्यक्ति के लिए उचित-अनुचित का भेद पहचानना बहुत महत्वपूर्ण है। चूँकि उचित-अनुचित में सकारात्मक और नकारात्मक दोनों चीजें शामिल होती हैं, तो तुम लोगों के विचार से कुछ सकारात्मक चीजें कौन-सी हैं और कुछ नकारात्मक चीजें कौन-सी हैं? (परमेश्वर में विश्वास रखना, परमेश्वर का अनुसरण करना, परमेश्वर की आराधना करना, परमेश्वर के प्रति समर्पण करना और साथ ही अपना कर्तव्य करना और ईमानदार व्यक्ति होना—ये सभी सकारात्मक चीजें हैं। झूठ बोलना और धोखा देना, परमेश्वर का प्रतिरोध करना, परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह करना, परमेश्वर से विश्वासघात करना—ये नकारात्मक चीजें हैं।) (सकारात्मक चीजें मुख्य रूप से परमेश्वर से आती हैं और सत्य के अनुरूप होती हैं। उदाहरण के लिए, परमेश्वर के कार्य द्वारा प्राप्त विभिन्न नतीजे और साथ ही लोगों का परमेश्वर के स्वभाव और सार का सच्चा ज्ञान, ये सभी सकारात्मक चीजें हैं और ये सभी सत्य के अनुरूप हैं।) सकारात्मक चीजों को बहुत खोखला या बहुत उदात्त मत समझो। वास्तव में, सकारात्मक चीजें वे विभिन्न सकारात्मक और सही लोग, घटनाएँ और चीजें हैं जो लोगों के लिए फायदेमंद हैं। ऐसी कोई भी चीज जो लोगों के लिए फायदेमंद है, ऐसी कोई भी चीज जो उनके सामान्य जीवन के लिए फायदेमंद है और हानिकारक नहीं है, सकारात्मक चीज है। उदाहरण के लिए, क्या प्राकृतिक नियम और कानून सकारात्मक चीजें हैं? (हाँ।) परमेश्वर के सभी वचन सत्य हैं और सकारात्मक चीजें हैं; ऐसी कोई भी चीज जिसमें सत्य शामिल है, सकारात्मक चीज है। परमेश्वर द्वारा मानवजाति को जीवन और सत्य का प्रावधान, और साथ ही मानवजाति का प्रबंध करने और उसे बचाने के परमेश्वर के कार्य की विषय-वस्तु ऐसी सकारात्मक चीजें हैं जो सत्य से संबंधित हैं। लोगों से परमेश्वर की सभी अपेक्षाएँ, परमेश्वर का हरेक वचन, विभिन्न सत्यों के अभ्यास के सिद्धांत—ये सभी सकारात्मक चीजें हैं। परमेश्वर द्वारा मानवजाति का प्रबंध करने के कार्य के अलावा ऐसी कई दूसरी सकारात्मक चीजें भी हैं जो मानव उत्तरजीविता के लिए फायदेमंद हैं और लोगों के लिए नुकसानदायक नहीं हैं। क्या तुम लोग उन्हें देख सकते हो? क्या तुम उन्हें पहचान सकते हो? क्या तुम उन्हें अपने दिलों की गहराइयों से स्वीकार सकते हो और उनका अनुमोदन कर सकते हो? क्या तुम उनके साथ चल सकते हो, उनके अनुसार खुद को ढाल सकते हो और उनका अनुसरण कर सकते हो? उदाहरण के लिए, क्या चार ऋतुओं के नियम सकारात्मक चीजें हैं? (हाँ।) वसंत ऋतु में मौसम गर्म हो जाता है और फूल खिलते हैं, सभी चीजें उगती हैं और पुनर्जीवित होती हैं, बर्फ और हिम पिघलते हैं। क्या यह एक सकारात्मक चीज है? (हाँ।) गर्मियों में सूरज तेज चमकता है, उसकी किरणें झुलसा देने वाली होती हैं और सभी चीजें तेजी से बढ़ती हैं और धूप सेंकती हैं। क्या यह एक सकारात्मक चीज है? (हाँ।) शरद ऋतु में झुलसा देने वाली गर्मी की जगह धीरे-धीरे साफ आसमान और ठंडी हवा ले लेती है; विभिन्न पौधे धीरे-धीरे परिपक्व होते हैं, उनमें बीज और फल आते हैं, फसल तैयार हो जाती है। क्या यह एक सकारात्मक चीज है? (हाँ।) सर्दियों में तापमान गिर जाता है, मौसम धीरे-धीरे ठंडा हो जाता है और कभी-कभी बर्फ पड़ती है। हालाँकि यह दूसरी ऋतुओं की तरह आनंददायक, आरामदायक या मुक्त नहीं होती, फिर भी सर्दियों में सभी चीजें अपनी ऊर्जा सुरक्षित रख सकती हैं और मानवजाति भी आराम करती है और फिर से स्वस्थ हो उठती है। तो फिर क्या यह नियम एक सकारात्मक चीज है? (हाँ।) सूर्योदय के समय लार्क पक्षी गाते हैं, सुबह-सुबह उठ जाने वाले पक्षी चहचहाते हैं, वे लोगों को याद दिलाते हैं कि सुबह हो गई है और उठ जाने का समय हो गया है, कि उन्हें जीवन के लिए, आजीविका के लिए और मानवजाति की निरंतर उत्तरजीविता के लिए श्रम करना शुरू कर देना चाहिए। क्या यह एक सकारात्मक चीज है? (हाँ।) मानवजाति सुबह-सुबह उठने वाले पक्षियों और लार्क पक्षियों की आवाज सुनकर उठ जाती है और दिन का श्रम शुरू कर देती है। यह एक सकारात्मक चीज है। रात को विभिन्न कीट और जीव अपने-अपने नियमों के अनुसार विभिन्न प्रकार की गतिविधियों में लग जाते हैं—कुछ भोजन के लिए घूमने निकल पड़ते हैं और दूसरे आवाज निकालना शुरू कर देते हैं। इस समय मानवजाति खामोश हो जाती है और धीरे-धीरे नींद में डूब जाती है। झींगुरों की झीं-झीं और उसके साथ विभिन्न जीवों की आवाज और उनकी निशाचर गतिविधियाँ सुनते-सुनते लोग स्वप्नलोक में खो जाते हैं और बहुत आराम से, बहुत आनंदपूर्वक और शांतिपूर्वक सोते हैं। क्या यह एक सकारात्मक चीज है? (हाँ।) लोगों के लिए, ये सकारात्मक चीजें वे चीजें हैं जो बार-बार घटित होती हैं। तुम उनके विभिन्न चिन्ह और संकेत प्राप्त कर सकते हो और तुम उन फायदों को भी महसूस कर सकते हो जो वे तुम्हारे जीवन में लाती हैं और साथ ही उन विभिन्न बदलावों और प्रभावों को भी महसूस कर सकते हो जो वे तुम्हारे जीवन में लाती हैं जब तुम अपने रोजमर्रा के जीवन में व्यस्त रहते हो। अगर तुम्हारे पास अपने आस-पास की विभिन्न सकारात्मक चीजों के अस्तित्व के प्रति सही अनुक्रिया और उसकी सही समझ है और साथ ही इन सकारात्मक चीजों से पेश आने का सही तरीका भी है तो यह दर्शाता है कि तुम एक ऐसे व्यक्ति हो जिसे उचित-अनुचित की कुछ समझ है, तुम परमेश्वर द्वारा बनाई गई सभी चीजों से बने सजीव पर्यावरण के प्रति अनुक्रियाशील, संवेदनशील और ग्रहणशील हो और अपने आस-पास की इन सभी चीजों के प्रभाव या अपने जीवन में उनके साथ के लिए तुम्हारा हृदय कृतज्ञ है। यह दर्शाता है कि तुम यह महसूस कर सकते हो कि परमेश्वर का अस्तित्व और उसकी बनाई सभी चीजें निर्विवाद रूप से वास्तविक हैं और तुम सभी चीजों से तुम्हें विभिन्न पहलुओं में होने वाले फायदों और अपने ऊपर उनके प्रभाव को महसूस कर सकते हो। अगर तुम ऐसे संदेश प्राप्त कर सकते हो और ऐसी भावनाएँ रख सकते हो तो तुम एक ऐसे व्यक्ति हो जो उचित-अनुचित में अंतर समझ सकता है और उसमें मानवता है। तुम सकारात्मक चीजों को सही ढंग से समझ सकते हो, उनके अनुसार खुद को ढाल सकते हो, उनके साथ चल सकते हो और उनके साथ सह-अस्तित्व में रह सकते हो। और बस यही नहीं है कि तुम्हें ये चीजें घिनौनी नहीं लगती हैं; बल्कि, चूँकि तुम परमेश्वर में विश्वास रखते हो और कुछ सत्य समझते हो, इसलिए तुम और भी ज्यादा आश्वस्त हो कि ये सभी सकारात्मक चीजें परमेश्वर से, सृष्टिकर्ता से आती हैं और तुम इन सकारात्मक चीजों के अस्तित्व के लिए और भी ज्यादा आभारी हो सकते हो। तदनुसार, तुम अपने दिल में नकारात्मक चीजों के प्रति विकर्षण और नफरत महसूस करते हो। तो कुछ नकारात्मक चीजें कौन-सी हैं? (पर्यावरण को प्रदूषित करना, अत्यधिक दोहन।) पर्यावरण को नष्ट और प्रदूषित करना, पेड़ों की अंधाधुंध कटाई, अत्यधिक दोहन और उपयोग—ये सभी नकारात्मक चीजें हैं। इनके अलावा ऐसी और कौन-सी चीजें हैं जो तुम लोगों को नकारात्मक लगती हैं और जिनके लिए तुम्हारे दिलों में स्पष्ट नफरत है? मानवजाति हमेशा प्रकृति पर विजय पाना चाहती है—क्या यह एक सकारात्मक चीज है या नकारात्मक चीज? (नकारात्मक चीज है।) उदाहरण के लिए, कुछ जगहों पर बार-बार चक्रवात आते हैं, इसलिए कुछ लोग हमेशा सोचते हैं, “ये चक्रवात हर जगह धूल उड़ाते फिरते हैं, घरों और खेतों को बरबाद कर देते हैं। उन्हें रोकने के लिए एक दीवार बनाने के लिए हम जो भी चीज आजमा सकते हैं हमें आजमानी होंगी, यह दिखाने के लिए कि मानव तकनीक उन्नत है और मानव क्षमताएँ मजबूत हो गई हैं।” क्या यह एक सकारात्मक चीज है या नकारात्मक चीज? (नकारात्मक चीज है।) यह सुनने के बाद तुम लोगों को अपने दिलों में कैसा लगता है? (मुझे लगता है कि लोग अपनी क्षमताओं का वास्तविकता से ज्यादा मूल्यांकन करते हैं।) बिल्कुल यही बात है। कुछ जगहें विशाल घास के मैदानों से ढकी हुई हैं, इसलिए कुछ लोग कहते हैं, “घास के मैदानों में चरवाहे खानाबदोश जीवन जीते हैं और वर्ष भर उन्हें मुश्किल से ही कोई अच्छा भोजन मिलता है। वर्ष का आधा समय वे हमेशा बाहर खुले में रहते हैं, घास के मैदानों में मवेशियाँ और भेड़ें चराते हैं। ये मुश्किल दिन कब समाप्त होंगे? हमें चरवाहों का जीवन बेहतर बनाने के तरीके खोजने होंगे, घास के मैदानों और चरागाहों को भवनों और शहरों में बदलना होगा ताकि चरवाहों को अब और चरवाहे बनकर जीवित न रहना पड़े। तब वे बेहतर जीवन का आनंद ले पाएँगे और देश और सरकार का धन्यवाद करेंगे।” क्या यह एक सकारात्मक चीज है या नकारात्मक चीज? (नकारात्मक चीज है।) क्या तुम लोग यह महसूस कर सकते हो कि ऐसा करना नकारात्मक चीज है? घास के मैदानों को भवनों और शहरों में बदलना—यह एक त्रुटिपूर्ण विचार और दृष्टिकोण है; यह अभ्यास कितना बेतुका है! तुम लोग इस मामले की असलियत नहीं देख सकते, है ना? तुम लोग सोचते हो, “यह सरकार का मामला है, हम इस बारे में कुछ नहीं कर सकते” और तुम लोगों को इस बारे में कुछ भी महसूस नहीं होता। इसके अतिरिक्त, मानवजाति अंतरिक्ष अन्वेषण में हमेशा तरक्की कर रही है, उसे हमेशा चाँद पर जाने, मंगल और बृहस्पति का सर्वेक्षण करने की चाह रहती है। वह सूर्य का भी अन्वेषण करना चाहती है, लेकिन चूँकि सूर्य का तापमान बहुत ही ज्यादा है, इसलिए वह वहाँ नहीं जा सकती। इसलिए वह पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण पर काबू पाने और चाँद और मंगल तक उड़ान भरने के लिए अंतरिक्ष यान बनाती है। यह एक सकारात्मक चीज है या नकारात्मक चीज? (नकारात्मक चीज है।) यह एक नकारात्मक चीज है। तो क्या ऐसी कोई सकारात्मक चीज है जो विज्ञान से जुड़ी हो? क्या कोई ऐसा दावा है जो सकारात्मक हो और परमेश्वर द्वारा बनाई गई सभी चीजों के प्राकृतिक नियमों के अनुरूप हो? (वैज्ञानिक तरीकों से आविष्कृत और निर्मित कुछ साधन, जैसे कि कंप्यूटर, हमारी कार्यकुशलता में सुधार कर सकते हैं। ये सकारात्मक चीजें हैं।) ये न तो सकारात्मक हैं और न ही नकारात्मक। ये तो बस साधन हैं। इनमें कोई विशेष विचार, सिद्धांत या दलील शामिल नहीं है। हम जिन सकारात्मक और नकारात्मक चीजों के बारे में बात कर रहे हैं, उनमें चीजों का सार और मूलभूत तत्व और साथ ही मानवजाति द्वारा संचालित विभिन्न वैज्ञानिक शोध परियोजनाओं के पीछे के उद्देश्य भी शामिल हैं। इनके आधार पर हम तय करते हैं कि कोई चीज सकारात्मक है या नकारात्मक। तो दूसरी और कौन-सी नकारात्मक चीजें हैं? (फिलहाल मानवजाति सभी चीजों के विकास के नियमों का पालन नहीं करती, बल्कि इन नियमों को बदलने के लिए वैज्ञानिक तरीकों का उपयोग करती है। उदाहरण के लिए, मुर्गियों को हार्मोन से भरपूर चारा खिलाया जाता है और वे तीस दिनों में बाजार के लिए तैयार हो जाती हैं और बेमौसमी सब्जियाँ और फल उगाए जाते हैं। ऐसा लगता है जैसे विज्ञान और तकनीक ने उन्नति तो कर ली है, लेकिन इससे सभी चीजों के विकास के नियमों का उल्लंघन होता है और यह लोगों की भोजन की लालसा को संतुष्ट करने के लिए है। यह एक नकारात्मक चीज है।) यह एक नकारात्मक चीज है। कुछ लोग बाघों और शेरों को काबू में करना चाहते हैं। वे देखते हैं कि बाघ भयानक दिखते हैं—बाघ की एक जम्हाई से ही लोग डरकर भाग जाते हैं—इसलिए वे उन्हें काबू में करना और फिर उनके नुकीले दाँत निकालकर अपने आँगन में रखना चाहते हैं जिससे वे कुत्तों की तरह बाघों से अपने घरों की रखवाली करवाएँ। क्या यह एक सकारात्मक चीज है या नकारात्मक चीज? (नकारात्मक चीज है।) यह एक नकारात्मक चीज है। मनुष्य दैहिक सुख की तलाश में विभिन्न वैज्ञानिक उपायों का उपयोग करके और प्राकृतिक नियमों का उल्लंघन करते हुए जो भी करता है और जो भी आविष्कार करता है, वे सभी नकारात्मक चीजें हैं, सकारात्मक नहीं हैं क्योंकि वे मानवजाति को बहुत ज्यादा नुकसान पहुँचाती हैं और वे मानव के जीवन परिवेश को बहुत गंभीर क्षति पहुँचाती हैं। उदाहरण के लिए, कुछ जगहें अत्यधिक शुष्क हैं, इसलिए सरकार वहाँ वर्षा करवाने के लिए क्लाउड सीडिंग एजेंट फैलाने के लिए हवाई जहाजों का उपयोग करती है। क्या यह एक सकारात्मक चीज है या नकारात्मक चीज? (नकारात्मक चीज है।) कुछ जगहों पर बहुत ही ज्यादा वर्षा होती है जिससे बाढ़ आ जाती है, इसलिए सरकार वहाँ हवाई जहाज तैनात करती है ताकि वर्षा को नियंत्रित करने के लिए बादलों को तितर-बितर कर सके। क्या यह प्राकृतिक नियमों का उल्लंघन नहीं करता और उन्हें नष्ट नहीं करता? (हाँ।) प्राकृतिक नियमों को नष्ट करना, प्राकृतिक नियमों का उल्लंघन करना, प्राकृतिक नियमों के अनुरूप नहीं होना, जो भी अच्छा लगे वह करना, उन्नत मानव तकनीक का दिखावा करना—ये नकारात्मक चीजें हैं। इनके अलावा दूसरी और कौन-सी नकारात्मक चीजें हैं? जैविक घटकों और आनुवंशिक संशोधन पर शोध करना एक सकारात्मक चीज है या नकारात्मक? (नकारात्मक चीज है।) आनुवंशिकी पर किए गए वैज्ञानिक शोध के कारण लोग ज्यादा आनुवंशिक रूप से संशोधित खाद्य-पदार्थ खा सकते हैं। तो क्या आनुवंशिक रूप से संशोधित खाद्य-पदार्थ सकारात्मक चीजें हैं या नकारात्मक? (नकारात्मक चीजें हैं।) तुम यह क्यों कहते हो कि वे नकारात्मक हैं? कुछ लोग कहते हैं, “यह एक वैज्ञानिक उपलब्धि है जिसका लक्ष्य ज्यादा लोगों को खाने के लिए पर्याप्त भोजन उपलब्ध करवाना और उन्हें भूखा नहीं रहने देना है। इसके अतिरिक्त, लोग दशकों से आनुवंशिक रूप से संशोधित खाद्य-पदार्थ खा रहे हैं और लंबे और सुडौल हो रहे हैं—विशेष रूप से आजकल के युवा लोग पिछली पीढ़ी की तुलना में लंबे हैं। यह सब मानवजाति के लिए विज्ञान के योगदानों की बदौलत है। जब आनुवंशिक रूप से संशोधित खाद्य-पदार्थ लोगों के लिए इतने बड़े फायदे लाते हैं तो फिर उन्हें नकारात्मक चीजें क्यों कहा जाता है?” क्या तुम लोग इसे समझा सकते हो? (वैसे तो अब लोग ज्यादा लंबे हैं, लेकिन उनके शारीरिक गठन बिगड़ते जा रहे हैं और उन्हें ज्यादा बीमारियाँ हो रही हैं—यह सब लोगों द्वारा वैज्ञानिक रूप से संसाधित चीजें खाने के कारण है। इसलिए, ये नकारात्मक चीजें हैं।) सतह पर ऐसा लगता है कि आनुवंशिक रूप से संशोधित खाद्य-पदार्थ लोगों को फायदा पहुँचाते हैं—लोग ज्यादा लंबे और सुडौल हो गए हैं—लेकिन उनके शारीरिक गठन बिगड़ गए हैं। कुल मिलाकर लोगों पर इनका नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, ये उन्हें फायदा पहुँचाने के बजाय नुकसान पहुँचाते हैं। चाहे लोग इन्हें फायदेमंद समझें या नुकसानदेह, ये नकारात्मक चीजें हैं, सकारात्मक चीजें तो बिल्कुल नहीं हैं क्योंकि ये परमेश्वर द्वारा बनाए गए प्राकृतिक नियमों का उल्लंघन करती हैं और उन प्रकार्यों के खिलाफ जाती हैं जो परमेश्वर द्वारा बनाई गई विभिन्न मूल सजीव चीजों द्वारा मानव शरीर में किए जाने थे। हो सकता है कि लोगों पर इनका प्रभाव शुरू में ज्यादा न दिखाई दे, लेकिन बीस साल बाद इसके प्रतिकूल नतीजे प्रकट हो जाते हैं : बहुत-से लोगों को सभी तरह की अजीब बीमारियाँ हो जाती हैं और यहाँ तक कि उनकी प्रजनन क्षमता भी प्रभावित होती है। यह चीज यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि ऐसे खाद्य-पदार्थ सकारात्मक चीजें नहीं हैं। वैसे तो मानव परिप्रेक्ष्य से आनुवंशिक रूप से संशोधित खाद्य-पदार्थ तकनीक के उत्पाद हैं, मानवजाति के लिए विज्ञान का योगदान हैं, लेकिन सकारात्मक और नकारात्मक चीजों के परिप्रेक्ष्य से यह बिल्कुल भी सकारात्मक चीज नहीं है।
मानवजाति हमेशा चंद्रमा पर शोध करने और यह अन्वेषण करने का प्रयास करती रहती है कि क्या कोई दूसरा ग्रह मानव निवास के लिए उपयुक्त है। क्या यह वैज्ञानिक शोध, यह दृष्टिकोण, एक सकारात्मक चीज है या नकारात्मक चीज? (नकारात्मक चीज है।) यह नकारात्मक चीज क्यों है? (परमेश्वर ने मनुष्यों को पृथ्वी पर रहने के लिए बनाया; हमारे लिए उसका यह इरादा कभी नहीं था कि हम दूसरे ग्रहों पर रहें। मनुष्य हमेशा महत्वाकांक्षी होते हैं और हर जगह जाना चाहते हैं। अंततः यह मेहनत की बरबादी है और वे कहीं नहीं जा सकते।) लोगों के परिप्रेक्ष्य से, इन चीजों पर शोध करना काफी सामान्य है; यह मानवजाति के भविष्य के लिए जीवनयापन की स्थितियों को बनाना है, जो कि अच्छी चीज है। परमेश्वर द्वारा पृथ्वी पर स्थापित कई प्रकार्य नष्ट हो चुके हैं; विभिन्न आपदाएँ बार-बार आती हैं, पृथ्वी का जीवन परिवेश क्षतिग्रस्त हो गया है, हवा, पानी और मिट्टी सभी बुरी तरह से प्रदूषित हो चुके हैं और सभी प्रकार के सजीव प्राणी विलुप्ति का सामना कर रहे हैं। पृथ्वी पर रहना मुश्किल हो गया है। इसलिए कुछ वैज्ञानिक शोध संस्थानों ने दूसरे ग्रहों पर शोध करना शुरू कर दिया है, वे उम्मीद करते हैं कि मानवजाति दूसरे ग्रहों पर जा सकेगी और वहाँ बस सकेगी। उनका मानना है कि मानवजाति की भावी पीढ़ियों के जीवित रहने के लिए लोगों को पहले से तैयारी करनी होगी—अगर उन्होंने अभी तैयारी नहीं की और भविष्य में मानवजाति पृथ्वी पर जीवित नहीं रह पाई तो क्या ऐसा नहीं होगा कि मानव प्रजाति के पास बच निकलने का कोई रास्ता ही नहीं बचे? तो क्या यह दृष्टिकोण, यह वैज्ञानिक शोध, अंततः एक नकारात्मक चीज है या सकारात्मक? (नकारात्मक चीज है।) किस आधार पर तुम कहते हो कि यह एक नकारात्मक चीज है? (इस आधार पर कि परमेश्वर ने दूसरे ग्रहों पर मनुष्यों के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ तैयार की ही नहीं हैं। दूसरे ग्रहों की बात छोड़ो, पृथ्वी पर भी बहुत गर्म और बहुत ठंडी जगहें मनुष्यों के रहने के लिए उपयुक्त नहीं हैं। लेकिन मनुष्य हमेशा महत्वाकांक्षी होते हैं, हमेशा परमेश्वर की संप्रभुता और परमेश्वर के आयोजनों से अलग होना चाहते हैं, दूसरे ग्रहों पर जाकर रहने की चाह रखते हैं—यह परमेश्वर की व्यवस्थाओं और विधानों के खिलाफ है। इसलिए यह एक नकारात्मक चीज है।) परमेश्वर ने मनुष्यों के लिए पृथ्वी—जो जीवन के लिए एक अद्भुत परिवेश है—बनाई है, लेकिन मनुष्य इसका अच्छी तरह से प्रबंध नहीं करते हैं। वे निरंतर विज्ञान और आधुनिक उद्योग का विकास कर रहे हैं और नतीजतन उन्होंने पृथ्वी के पारिस्थितिक पर्यावरण को नष्ट कर दिया है और हवा, पानी और यहाँ तक कि जमीन को भी प्रदूषित कर दिया है। लोगों के पास जैविक अनाज और सब्जियाँ अब और उपलब्ध नहीं हैं और उन्हें सभी प्रकार की बीमारियाँ हो रही हैं। पृथ्वी पर जीवित रहना मुश्किल हो गया है और अब वे दूसरे ग्रहों पर जाने के बारे में सोच रहे हैं, इस पर विचार नहीं कर रहे हैं कि उनका नश्वर देह वहाँ जाने में समर्थ है भी या नहीं। मनुष्य, ये नश्वर देह वाले प्राणी, सिर्फ पृथ्वी पर रहने के लिए उपयुक्त हैं और सिर्फ पृथ्वी पर ही रह सकते हैं। यह परमेश्वर का विधान है। मनुष्य सिर्फ अपनी विभिन्न जन्मजात स्थितियों पर भरोसा करके जा भी कहाँ सकते हैं? पक्षी अपने पंख फड़फड़ाकर हजारों मीटर ऊँची उड़ान भर सकते हैं, लेकिन मनुष्य खुद उड़ान भरकर वहाँ ऊपर तक नहीं जा सकते; उन्हें हवाई जहाज की मदद की जरूरत होती है। तब भी, हवाई जहाज में उड़ान भरना कभी-कभी खतरनाक होता है। इसलिए मनुष्य पृथ्वी पर रहने के लिए सबसे उपयुक्त हैं। मनुष्य के शारीरिक गुण पृथ्वी की मिट्टी के, और पृथ्वी पर रहन-सहन की स्थितियों के सभी पहलुओं के अनुरूप हैं, जैसे कि सभी चीजें, चारों ऋतुएँ और प्राकृतिक नियम। इसलिए, मानवजाति को सिर्फ पृथ्वीवासी ही कहा जा सकता है। मानव उत्तरजीविता के इन नियमों और रहन-सहन की इन स्थितियों को उस समय मनुष्यों के लिए पूर्वनियत किया गया था जब परमेश्वर ने सभी चीजें बनाईं। इसलिए मानवजाति सिर्फ पृथ्वी पर जीवित रहने के लिए ही उपयुक्त है, दूसरे ग्रहों पर रहने के लिए नहीं। मानवजाति ने पृथ्वी को इस हद तक तबाह और क्षतिग्रस्त कर दिया है कि वह निवास योग्य नहीं है और वे सिर्फ यहाँ से चले जाना चाहते हैं और इससे छुटकारा पाना चाहते हैं, हमेशा दूसरे ग्रहों पर बसने का प्रयास करते रहते हैं। यह एक व्यर्थ संघर्ष है। यह अभ्यास परमेश्वर द्वारा पृथ्वीवासियों के लिए नियत प्राकृतिक नियमों के अनुरूप नहीं है; बल्कि यह पृथ्वीवासियों के लिए भौतिक उत्तरजीविता के नियमों का उल्लंघन करता है और एक बहुत ही अनुपयुक्त अभ्यास है। इसलिए यह एक नकारात्मक चीज है। भले ही ऐसे कुछ ग्रह हों जिन पर हवा है और पृथ्वीवासी एक नजर डालने के लिए वहाँ जा सकते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मानवजाति उन ग्रहों पर जीवित रह सकती है। पृथ्वी पर भी तुम दक्षिणी ध्रुव या उत्तरी ध्रुव पर जाकर एक नजर डाल सकते हो, वहाँ कदम रख सकते हो, लेकिन अगर तुम्हें वहाँ कई सालों तक रहना पड़े तो क्या तुम इसे सह सकते हो? कुछ अपेक्षाकृत गर्म जगहें भी हैं जहाँ वर्ष भर तापमान साठ डिग्री सेल्सियस से ज्यादा रहता है; वे भी मानव उत्तरजीविता के लिए उपयुक्त नहीं हैं। विशेष भौगोलिक पर्यावरणों के कारण पृथ्वी पर मुट्ठीभर जगहों पर लंबे समय तक जीवित रहने के लिए मनुष्य उपयुक्त नहीं हैं, फिर दूसरे ग्रहों पर रहने की तो बात ही छोड़ दो। वह परमेश्वर की व्यवस्थाओं का हिस्सा नहीं है। मानव देह की विशेषताओं के आधार पर यह मानवजाति सिर्फ पृथ्वी पर रहने के लिए ही उपयुक्त है; यह बात प्रमाणित है। परमेश्वर द्वारा पृथ्वी को बनाने का उद्देश्य मानवजाति के लिए एक उपयुक्त जीवन परिवेश की व्यवस्था करना था। अगर तुम ऐसे परिवेश से भागना चाहते हो और कोई दूसरा रास्ता ढूँढ़ना चाहते हो तो इससे सिर्फ विनाश ही होगा। इसलिए यह एक नकारात्मक चीज है। अगर तुम जानते हो कि दूसरे ग्रहों पर रहने के बारे में हमेशा शोध करना एक नकारात्मक चीज है, लेकिन फिर भी तुम अपने दिल में, मानवजाति द्वारा दूसरे ग्रहों पर रहने का तरीका ढूँढ़ने के लिए वैज्ञानिक शोध करने को स्वीकृति देते हो तो यह प्रमाणित करता है कि तुम्हारी मानवता में कोई समस्या है तुम उचित-अनुचित में अंतर नहीं समझते और तुम सही-गलत का भेद नहीं पहचान सकते। अगर तुम स्पष्ट रूप से जानते हो कि यह मार्ग अव्यावहारिक है, लेकिन फिर भी तुम अगले युग में दूसरे ग्रहों पर बसने में समर्थ होने की लालसा और उम्मीद करते हो तो तुम सामान्य व्यक्ति नहीं हो—तुम विचित्र हो।
वह व्यक्ति जो उचित-अनुचित में अंतर समझता है, एक बात तो यह है कि वह सकारात्मक चीजों से प्रेम कर सकता है, उन्हें स्वीकार सकता है और उनकी स्पष्ट समझ रख सकता है। इसके अतिरिक्त, वह नकारात्मक चीजों का भी भेद पहचान सकता है, और चूँकि उसके पास मानवता और विवेक है, इसलिए वह अपने दिल में नकारात्मक चीजों के प्रति विमुखता और नफरत महसूस करता है। यकीनन वह उनका कुछ सत्यों की समझ के आधार पर तिरस्कार भी कर सकता है, आलोचना भी कर सकता है और उन्हें नकार भी सकता है। अगर तुम ऐसा नहीं कर सकते हो इसका मतलब है कि तुम ऐसे व्यक्ति नहीं हो जो उचित-अनुचित में अंतर समझता है। यह भी कहा जा सकता है कि मानवता के लिहाज से तुममें कमी है। अगर अपनी मानवता में तुममें उचित-अनुचित का भेद पहचानने की क्षमता की कमी है तो फिर तुम्हारी मानवता में एक बहुत महत्वपूर्ण स्थिति, एक बहुत महत्वपूर्ण घटक की कमी है। इसका मतलब है कि तुममें सामान्य मानवता नहीं है और तुम्हें एक सच्चा व्यक्ति नहीं कहा जा सकता। हो सकता है कि कुछ लोग कहें, "अभी-अभी दिए गए उदाहरणों में लोगों के दैनिक जीवन की मूलभूत जरूरतों से संबंधित कुछ चीजें शामिल हैं और इनमें विज्ञान भी शामिल है। अगर वे चीजें नकारात्मक चीजें हैं और उनके लिए हमें उनका भेद पहचानने की जरूरत है तो फिर क्या हमें उन्हें अस्वीकार कर देना चाहिए?" यह जरूरी नहीं है। उचित-अनुचित का भेद पहचानने का मतलब है कि तुम्हारे दिल में सकारात्मक और नकारात्मक चीजों का भेद पहचानने की क्षमता है। अपनी मानवता में तुम्हारे पास फैसले के लिए एक मानक है और तुम जानते हो कि कौन-सी चीजें सकारात्मक हैं और कौन-सी चीजें नकारात्मक हैं। तुम्हारे पास एक स्पष्ट रवैया भी है, तुम जानते हो कि सकारात्मक और नकारात्मक चीजों से कैसे पेश आना है। तुम सकारात्मक चीजों को स्वीकार सकते हो, उनके अनुरूप हो सकते हो और उनके अनुसार खुद को ढाल सकते हो और तुम्हारे दिल में उनके प्रति कोई प्रतिरोध या विमुखता नहीं है। जहाँ तक नकारात्मक चीजों की बात है, तुम अपने दिल की गहराइयों से उनका भेद पहचान सकते हो और तुम उनका तिरस्कार कर सकते हो, उनसे विमुख हो सकते हो, उनसे नफरत कर सकते हो और यहाँ तक कि उनके बारे में तुम्हारे अपने दृष्टिकोण भी हो सकते हैं जिनका उपयोग तुम उनकी आलोचना करने के लिए करते हो। उचित-अनुचित का भेद पहचान सकने वाले व्यक्ति का यही रवैया और अभिव्यक्ति होनी चाहिए। लेकिन मान लो कि तुम अपने अंदर से उन चीजों का तिरस्कार करते हो और उनसे नफरत करते हो जो स्पष्ट रूप से सकारात्मक हैं और यहाँ तक कि नकारात्मक चीजों की तुलना में उन्हें साधारण पाते हो और साथ ही उन्हें बहुत ही ज्यादा आम, बहुत ही ज्यादा मामूली और इतना ज्यादा बेकार पाते हो कि उनका जिक्र तक नहीं करते। तुम अपने अंदर से नकारात्मक चीजों की तारीफ भी करते हो, उनकी लालसा भी करते हो, उनके पीछे भी भागते हो और यहाँ तक कि समाज और दुनिया में उन नकारात्मक चीजों का अनुमोदन भी करते हो। और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि सत्य पर या भेद पहचानने की क्षमता के सिद्धांतों पर कैसे संगति की जाती है, तुम उन्हें नहीं अपना सकते या उन्हें स्वीकार नहीं सकते। ऐसे में तुम्हारी मानवता सामान्य नहीं है। जब सकारात्मक और नकारात्मक चीजों की बात आती है तब अगर तुम्हारे पास इसलिए कोई धारणा या स्पष्ट दृष्टिकोण नहीं हैं क्योंकि तुम युवा हो और तुम्हारे पास जीवन में अनुभव या अंतर्दृष्टि की कमी है या क्योंकि इन चीजों ने तुम्हें शामिल नहीं किया है या उन्होंने तुम्हारे जीवन में प्रवेश नहीं किया है तो तब भी यह नहीं कहा जा सकता कि तुम ऐसे व्यक्ति हो जो उचित-अनुचित का भेद नहीं पहचान सकता है। लेकिन सकारात्मक चीजें क्या हैं और नकारात्मक चीजें क्या हैं, इस पर संगति करने के बाद अब भी अगर तुम अपने दिल की गहराइयों से सकारात्मक चीजों को स्वीकार नहीं सकते या उनके अनुरूप नहीं हो सकते, बल्कि तुम उनसे विमुखता महसूस करते हो और उनसे नफरत करते हो, जबकि नकारात्मक चीजों के पीछे जोश से भागते हो और उनकी लालसा करते हो तो तुम ऐसे व्यक्ति नहीं हो जो उचित-अनुचित का भेद पहचान सकता है। इस बिंदु से देखा जाए तो यह अत्यंत स्पष्ट है कि ऐसे व्यक्ति में कोई मानवता नहीं है। उचित-अनुचित का भेद पहचानने का यह मामला सकारात्मक और नकारात्मक चीजों के प्रति व्यक्ति के अनुकूलन को प्रकट करता है जिससे हमें यह तय करने में मदद मिलती है कि इस व्यक्ति का सही मायने में क्या वर्गीकरण है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसका किससे सामना होता है, अगर उसका झुकाव सकारात्मक चीजों की बजाय नकारात्मक चीजों की तरफ है तो यह स्पष्ट है कि इस व्यक्ति में कोई मानवता नहीं है और उसमें जमीर और विवेक नहीं हैं। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? वह परमेश्वर से आने वाली सकारात्मक चीजों के मूल नियमों और कानूनों की लालसा करने और उनका पालन करने के बजाय बुरी चीजों की लालसा करता है, विभिन्न उपक्रमों, शोध परियोजनाओं या तकनीक के कुछ ऐसे पहलुओं की लालसा करता है जिनका शैतान और दुष्ट मानवजाति हिमायत करती है, जिनका अनुमोदन करती है और जिनमें शामिल रहती है। तो फिर ऐसे लोग निश्चित रूप से गैर-मानव हैं। क्या यह स्पष्ट है? (हाँ।)
हमने अभी-अभी लोगों की मानवता के भीतर उचित-अनुचित का भेद पहचानने की क्षमता के बारे में बात की, यानी क्या लोग सकारात्मक और नकारात्मक चीजों की पहचान कर सकते हैं या नहीं। बहुत ही कम लोग यह भेद पहचानने में सक्षम होते हैं, फिर भी लोग अपने जीवन में बार-बार सकारात्मक और नकारात्मक दोनों चीजों के संपर्क में आते हैं। उदाहरण के लिए, क्या लोगों के सामान्य भाव—आनंद, गुस्सा, दुःख, खुशी—सकारात्मक चीजें हैं या नकारात्मक चीजें? (सकारात्मक चीजें हैं।) परमेश्वर के खिलाफ लोगों के विद्रोह के बारे में क्या कहना है? क्या यह सकारात्मक चीज है या नकारात्मक? (नकारात्मक चीज।) और परमेश्वर के प्रति लोगों की अत्यधिक इच्छाओं के बारे में क्या कहना है? क्या ये सकारात्मक चीजें हैं या नकारात्मक? (नकारात्मक चीजें।) लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी में, जब उन बहुत-सी चीजों की बात आती है जिनसे उनका सामना होता है तब लोगों में वास्तव में कोई बोध नहीं होता है। कुछ सकारात्मक चीजें लोगों के जीवन और अस्तित्व में हमेशा उनके साथ रहती हैं; वे उनके जीवन में एक बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं और मानव उत्तरजीविता पर उनके सकारात्मक प्रभाव को किसी भी नकारात्मक चीज के प्रभाव से बदला नहीं जा सकता। लेकिन लोग अक्सर इन सकारात्मक चीजों को नजरअंदाज कर देते हैं, इसके बजाय वे यह मानते हैं कि बहुत-सी नकारात्मक चीजें ही हमेशा लोगों के साथ रहती हैं, उनके जीवन को बनाए रखती हैं और उनके अस्तित्व में उनके साथ चलती हैं। इससे यह देखा जा सकता है कि बहुत-से लोगों में सकारात्मक चीजों के प्रति वास्तव में कोई भावना नहीं होती है। अगर तुम्हारे मन में इन चीजों के प्रति कोई भावना नहीं है तो इसका कोई महत्व नहीं है। यह जानने के बाद कि वे सकारात्मक चीजें हैं, जब तक तुम उनसे विमुख नहीं होते हो, बल्कि अपने दिल की गहराइयों से उनकी लालसा भी कर सकते हो और उनसे प्रेम भी कर सकते हो तब तक यह प्रमाणित होता है कि तुम्हारी मानवता सकारात्मक चीजों की लालसा करती है। मान लो कि तुम जानते हो कि सकारात्मक चीजें क्या होती हैं और नकारात्मक चीजें क्या होती हैं, लेकिन फिर भी तुम खुद को सकारात्मक चीजें पसंद करने के लिए राजी नहीं कर सकते। बल्कि अपने दिल में तुम नकारात्मक चीजों को पसंद करते हो, यहाँ तक कि तुम्हें उनमें विशेष रूप से दिलचस्पी भी है और एक कदम आगे बढ़ा जाए तो अगर स्थितियाँ सही हों और तुम्हें अवसर मिल जाए तो निश्चित रूप से तुम उनका अनुसरण करोगे और उन्हें हासिल करने का प्रयास करोगे। यह बताता है कि जब सकारात्मक और नकारात्मक चीजों के प्रति तुम्हारे रुझान की बात आती है तब तुम्हें नकारात्मक चीजें पसंद हैं, सकारात्मक चीजें नहीं। अगर तुम्हें सकारात्मक चीजें पसंद नहीं हैं तो यह दर्शाता है कि तुम सकारात्मक व्यक्ति नहीं हो। अगर तुम सकारात्मक व्यक्ति नहीं हो तो तुम निश्चित रूप से जमीर और विवेक वाले व्यक्ति नहीं हो; तुम नकारात्मक व्यक्ति हो। अगर तुम जमीर और विवेक वाले व्यक्ति नहीं हो तो फिर तुम गैर-मानव हो, तुम व्यक्ति नहीं हो। उदाहरण के लिए, कोई व्यक्ति टमाटर उगाता है। वह कहीं सुनता है कि जब पौधों पर टमाटर लग जाते हैं, उसके बाद उन पर सिर्फ एक रासायनिक पदार्थ लगाकर उन्हें रातों-रात हरे से लाल टमाटरों में बदला जा सकता है और फिर तुरंत बेचने के लिए तैयार किया जा सकता है। फिर वह सोचता है, “यह तो बढ़िया है। बाकी सभी लोग इन्हें इसी तरीके से बेचते हैं, इसलिए मैं भी ऐसे ही बेचूँगा। इस तरीके से मैं अमीर बन सकता हूँ और मैं टमाटर भी जल्दी खा सकता हूँ। यह बिल्कुल सही है!” इसलिए वह इन टमाटरों को बेच देता है और खुद भी इन्हें खाता है। कोई व्यक्ति उसे चेताता है कि रासायनिक पदार्थों से पकाए गए टमाटर लोगों के लिए नुकसानदायक होते हैं और ऐसी चीजें बेचना दूसरों को नुकसान पहुँचाना है, लेकिन वह इसे मानने से इनकार कर देता है, कहता है, “इससे लोगों को कैसे नुकसान पहुँच सकता है? यह तो वैज्ञानिक शोध का फल है; यह एक सकारात्मक चीज है। विज्ञान मानवजाति की सेवा करता है और चूँकि इन चीजों का आविष्कार विज्ञान के जरिए हुआ है, इसलिए लोगों के जीवन में इनका व्यापक रूप से उपयोग किया जाना चाहिए। विज्ञान के बिना लोगों का जीवन नहीं चल सकता; हमें इस पर भरोसा करना ही पड़ेगा।” यहाँ तक कि कुछ लोग विज्ञान को सत्य भी मानते हैं और वे लोगों को विज्ञान से प्रेम करना, उसे सीखना, उसका उपयोग करना और साथ ही हर चीज को उस पर आधारित करना सिखाते हैं। हो सकता है कि कुछ लोगों ने अब यह पता लगा लिया हो कि विज्ञान आवश्यक रूप से सही नहीं है और विज्ञान के जरिए आविष्कृत कुछ चीजें लोगों के लिए नुकसानदायक हैं—उदाहरण के लिए, रासायनिक हथियार और उन्नत हथियार मानवजाति का संहार करने में सक्षम हैं और विशेष रूप से आनुवंशिक रूप से संशोधित खाद्य पदार्थ मानवजाति के लिए अंतहीन संकट हैं। लेकिन बहुत से लोग ऐसा नहीं सोचते हैं, वे कहते हैं, “क्या विज्ञान गलत हो सकता है? अगर विज्ञान गलत होता तो क्या राज्य उसका समर्थन करता? समस्त मानवजाति विज्ञान सीखती है और उसका उपयोग करती है—क्या समस्त मानवजाति गलत हो सकती है?” क्या यह कथन सही है? उनका मानना है कि चूँकि समस्त मानवजाति विज्ञान का सम्मान करती है और उसका उपयोग करती है और यही सामाजिक प्रवृत्ति है, इसलिए चाहे यह कितनी भी नकारात्मक क्यों न हो, यह एक सकारात्मक चीज बन सकती है। क्या ये उचित-अनुचित का भेद पहचान सकने वाले लोग हैं? (नहीं।) वे जो शब्द बोलते हैं वे क्या हैं? (भ्रांतियाँ।) ये भ्रांतियाँ, पाखंड और टेढ़ी-मेढ़ी दलीलें हैं। हालाँकि बुरी मानवजाति में ज्यादातर लोग इन कहावतों से सहमत होते हैं और इन्हें स्वीकारते हैं, लेकिन चाहे कितने भी लोग इन्हें स्वीकारें और इनका अनुमोदन करें, जो गलत है वह हमेशा गलत ही रहेगा, नकारात्मक चीजें हमेशा नकारात्मक चीजें ही रहेंगी और टेढ़े-मेढ़े तर्क हमेशा टेढ़े-मेढ़े तर्क ही रहेंगे। उनका सकारात्मक चीजें बनना असंभव है और न ही वे कभी सत्य बन सकती हैं।
जो लोग हमेशा सामाजिक प्रवृत्तियों का अनुसरण करते हैं और भ्रांतियाँ बोलना पसंद करते हैं, क्या वे वही नहीं हैं जो नकारात्मक चीजों को विशेष रूप से पसंद करते हैं? (हाँ।) क्या वे सत्य और सकारात्मक चीजों को स्वीकार सकते हैं? (नहीं।) वे सकारात्मक चीजों को नहीं स्वीकार सकते। उदाहरण के लिए, कुछ लोग बीमार पड़ जाते हैं और दरअसल उनकी बीमारी व्यायाम से और उनकी दिनचर्या में बदलावों से ठीक हो सकती है, लेकिन वे इलाज के आधुनिक, उच्च-तकनीक वाले साधनों और विधियों का उपयोग करने पर अड़ जाते हैं। हो सकता है कि तुम कहो, “भले ही अब चिकित्सा पद्धति उन्नत है और उस उपचार के स्पष्ट नतीजे हैं, लेकिन इससे अवशिष्ट प्रभाव होंगे जिनकी जटिलताएँ वापस पलटने योग्य नहीं होंगी। तुम्हें कोई प्राकृतिक विधि अपनानी चाहिए—जैसे कि व्यायाम करना, अपनी दिनचर्या में बदलाव करना और अपनी आहार-संबंधी आदतों और पैटर्न में बदलाव करना—ताकि धीरे-धीरे तुम्हारा शरीर एक सामान्य, प्राकृतिक लय में प्रवेश कर जाए, जिसके बाद कुछ लक्षण धीरे-धीरे कम हो जाएँगे।” कुछ लोग इस तरह के दृष्टिकोण को स्वीकार सकते हैं, लेकिन दूसरे लोग नहीं। वे सोचते हैं, “यह पुराना दृष्टिकोण है। यही वह तरीका और फलसफा था जिससे हजारों वर्ष पहले मानवजाति बीमारियों का इलाज किया करती थी। यह विचार कि बीमारी का ठीक होना तीस प्रतिशत उपचार और सत्तर प्रतिशत स्वास्थ्य-लाभ पर निर्भर करता है, अब कोई मायने नहीं रखता! अब चिकित्सा पद्धति उन्नत है और उच्च-तकनीक वाले उपचार जल्द नतीजे लाते हैं। दवाइयाँ तुम्हें चुटकियों में ठीक कर देती हैं!” उनके दृष्टिकोणों के अनुसार, अगर चिकित्सा पद्धति उन्नत है और मानवजाति की विभिन्न बीमारियों का इलाज कर सकती है और लोगों को लंबी उम्र जीने दे सकती है, तो चिकित्सा पद्धति एक सकारात्मक चीज बन है; लोगों को चिकित्सा पद्धति और विज्ञान में विश्वास रखना चाहिए और अपनी नियति पर विज्ञान को संप्रभु होने देना चाहिए। वे सोचते हैं कि चाहे लोगों को कितनी भी बीमारियाँ हो जाएँ, डरने की कोई बात नहीं है—उच्च-तकनीक वाले साधनों से किसी भी जटिल, असाध्य बीमारी को ठीक किया जा सकता है और अगर कुछ अवशिष्ट प्रभाव होते हैं तो भी इस बारे में चिंता करने की कोई बात नहीं है। क्या ये दृष्टिकोण सटीक हैं? ये भ्रांतियाँ हैं। मुझे बताओ, अगर तुम इस तरह के व्यक्ति से सकारात्मक चीजों के बारे में बात करो तो क्या तुम उसे समझा सकोगे? क्या वह इसे स्वीकार सकेगा? (नहीं, हम उसे नहीं समझा सकेंगे।) तुम्हारे उसे नहीं समझा सकने का एक कारण यह है कि वह खुद ही सकारात्मक दृष्टिकोणों को स्वीकारने में असमर्थ है। और दूसरा कारण यह है कि दुनिया भर में समस्त मानवजाति बुरी प्रवृत्तियों के बहाव में बहती चली जा रही है और इसका एक भी अपवाद नहीं है। भले ही वह परमेश्वर में विश्वास रखता है, लेकिन अपने दिल की गहराई में वह सत्य नहीं स्वीकारता है, वह सकारात्मक चीजों को नहीं स्वीकारता है और वह लोगों और चीजों को परमेश्वर के वचनों के आधार पर नहीं देखता है। बल्कि वह हर मामले को देखने या उससे पेश आने के लिए आधार के रूप में अभी भी शैतान के दृष्टिकोणों और शैतान की बुरी प्रवृत्तियों का उपयोग करता है। इसलिए, भले ही इस तरह के व्यक्ति को परमेश्वर में विश्वास रखते हुए कई वर्ष हो गए हैं, उसने कुछ धर्मोपदेश सुने हैं, वह अपना कर्तव्य करता रहा है और वह सत्य स्वीकारने के लिए इच्छुक होने का दावा करता है, लेकिन वास्तविक जीवन में चीजों के बारे में वह जिन दृष्टिकोणों को अपनाता है वे नहीं बदलते हैं और न ही इस मामले में कोई बदलाव आता है कि वह नकारात्मक चीजों और सकारात्मक चीजों के बीच क्या चुनता है। जिन नकारात्मक चीजों को उसने स्वीकार लिया है, वे उसके दिल में पहले से ही जड़ें जमा चुकी हैं और अगर वह यह बात जानता है कि ये चीजें सत्य नहीं हैं तब भी वह उन पर ही कायम रहेगा। इससे यह काफी स्पष्ट है कि अपने दिल में उसे जिन चीजों से सच्चा प्रेम है, वे नकारात्मक चीजें हैं, सत्य नहीं। भले ही उसने परमेश्वर के वचन पढ़े हों और सत्य पर धर्मोपदेश सुने हों और वह धर्म-सिद्धांत के लिहाज से यह समझता हो कि ये वचन सही और सत्य हैं, फिर भी वह उन नकारात्मक चीजों को छोड़ने के लिए इच्छुक नहीं है जिन्हें वह बहुत पहले अपने दिल की गहराई में स्वीकार चुका है और वह कभी भी नकारात्मक चीजों का भेद पहचानने के लिए आधार के रूप में परमेश्वर के वचनों का उपयोग नहीं करता है। जब उसका सामना विशिष्ट मामलों से होता है तब भी वह अपने दिल में अपने मूल, गलत दृष्टिकोणों से चिपका रहता है और तब भी वह नकारात्मक चीजों को सकारात्मक चीजें और गलत दृष्टिकोणों को सही दृष्टिकोण मानता है। जहाँ तक सकारात्मक चीजों का प्रश्न है, भले ही वह स्पष्ट रूप से यह नहीं कहता है कि वे नकारात्मक चीजें हैं, लेकिन अपने दिल में वह नकारात्मक चीजों को छोड़ने और सकारात्मक चीजों को स्वीकारने के लिए इच्छुक नहीं है, क्योंकि उसे लगता है, “ऐसा लगता है कि सकारात्मक चीजों का प्रभाव बहुत ही कम होता है और बहुत ही कम लोग उन्हें स्वीकार सकते हैं। वे समाज में व्यवहार्य नहीं हैं—यह एक वस्तुनिष्ठ तथ्य है।” इससे प्रमाणित होता है कि उसके दिल में उचित-अनुचित का भेद पहचानने की क्षमता नहीं है और उसकी मानवता में कोई समस्या है। इस तरह के व्यक्ति को सकारात्मक चीजों में दिलचस्पी नहीं होती और वह अक्सर प्रकृति को बदलना चाहता है, प्राकृतिक दुनिया की उत्तरजीविता के नियमों को बदलना चाहता है, मानव शरीर विज्ञान के नियमों को बदलना चाहता है और मानव उत्तरजीविता के नियमों को बदलना चाहता है, उसे हमेशा प्रकृति पर विजय पाने और विभिन्न सजीव प्राणियों पर विजय पाने की चाह रहती है। उदाहरण के लिए, वह हमेशा इस तरह की बातों पर मनन करता रहता है : “हम कुत्तों को बिल्लियों के जीन कैसे दे सकते हैं ताकि बिल्लियों की तरह कुत्ते भी चूहे पकड़ सकें? और क्या यह अद्भुत नहीं होगा अगर बिल्लियाँ चूहे भी पकड़ सकें और कुत्तों की तरह घर की रखवाली भी कर सकें?” “अगर मुर्गियाँ अंडे दे सकतीं और बाँग भी दे सकतीं तो हमें सिर्फ मुर्गियाँ ही पालनी पड़तीं—वह कितना बढ़िया होता!” देखो, वह हमेशा अनुचित चीजों पर मनन करता रहता है। अगर यह कोई ऐसा व्यक्ति होता जो उचित-अनुचित का भेद पहचान सकता तो वह सोचता, “परमेश्वर द्वारा बनाए गए पशु कितने अद्भुत हैं! मुर्गे बाँग दे सकते हैं और मुर्गियों का साथ दे सकते हैं, मुर्गियाँ अंडे दे सकती हैं और चूजों को पाल सकती हैं और मनुष्य मुर्गों और मुर्गियों दोनों का माँस खा सकते हैं। कुत्ते घर की रखवाली कर सकते हैं और अपने मालिकों के साथी बन सकते हैं, बिल्लियाँ चूहे पकड़ सकती हैं और कभी-कभी परिवार में एक सदस्य की तरह ऐसे घुलमिल सकती हैं कि उनकी मौजूदगी भी महसूस नहीं होती। ये सभी बढ़िया हैं, हरेक का अपना खुद का कार्य है—परमेश्वर की बनाई हर चीज अच्छी है!” लेकिन जो लोग सकारात्मक चीजों को नहीं समझ सकते, वे शैतान के दृष्टिकोणों का उपयोग उन्हें नकारने और उनकी निंदा करने के लिए करेंगे; वे शैतान के दृष्टिकोणों के आधार पर विभिन्न प्राणियों की उत्तरजीविता के नियमों को बदलने का, प्राकृतिक दुनिया के विभिन्न नियमों को बदलने का और यहाँ तक कि मानव उत्तरजीविता के नियमों को बदलने का भी प्रयास करेंगे; वे यह सब इसलिए करेंगे ताकि सत्ता विज्ञान के पास हो। ऐसे लोगों में निश्चित रूप से सामान्य मानवता नहीं होती है। उनकी मानवता में उचित-अनुचित का भेद पहचानने में समर्थ होने की विशेषता की कमी होती है। इसके अतिरिक्त, वे नहीं जानते कि प्राकृतिक नियमों के अनुसार अपने जीवन का प्रबंधन कैसे करना है और वे हमेशा मानवीय इच्छा के अनुसार चीजें करना चाहते हैं, भौतिक जीवन के सामान्य नियमों को बदलने के लिए तकनीकी साधनों या कृत्रिम विधियों का उपयोग करना चाहते हैं। उदाहरण के लिए, एक सामान्य व्यक्ति को ऊर्जा से भरपूर रहने और दिन भर जीने और कार्य करने के लिए दिन में सात-आठ घंटे के आराम की जरूरत होती है, लेकिन इस तरह का व्यक्ति सोचता है, “क्या यह बहुत अच्छा नहीं होगा अगर लोग बिना सोए या खाए हर रोज सामान्य रूप से जी सकें और कार्य कर सकें? आखिर इसे हासिल करने के लिए कौन-से उच्च-तकनीक वाले साधनों का उपयोग किया जा सकता है?” उसके मन में बेहूदे और अजीब विचार यूँ ही उत्पन्न हो सकते हैं। वह इस पर मनन नहीं करता कि सामान्य मानवता के परिप्रेक्ष्य से इन नियमों के अनुसार खुद को कैसे ढालना है और उनका पालन कैसे करना है और इस प्रकार देह की विभिन्न जरूरतों और समस्याओं को सही ढंग से कैसे सँभालना है, बल्कि वह हमेशा इन नियमों को बदलना चाहता है, सामान्य लोगों से भिन्न होना चाहता है, अपनी शारीरिक सहज प्रवृत्तियों से परे जाना चाहता है और अपनी देह द्वारा नियंत्रित या सीमित नहीं किए जाने में समर्थ होना चाहता है। क्या यह भयावह नहीं है? वह हमेशा भीड़ से अलग दिखना चाहता है। दूसरे लोग दिन में आठ घंटे सोते हैं, लेकिन वह सिर्फ दस मिनट या ज्यादा-से-ज्यादा एक-दो घंटे सोना चाहता है और फिर भी दिन भर के लिए पर्याप्त ऊर्जा चाहता है। यह कुछ ऐसी चीज है जो सामान्य लोग हासिल नहीं कर सकते। मानव शरीर के प्राकृतिक नियम परमेश्वर के विधान के तहत पहले से ही निर्धारित किए जा चुके हैं। किसी व्यक्ति की भूख कितनी बड़ी है, उसके आंतरिक अंगों के कार्य करने के नियम क्या हैं, किसी व्यक्ति में कितनी ऊर्जा है, वह एक दिन में कितना कार्य कर सकता है, उसका दिमाग एक दिन में कितनी चीजों के बारे में सोच सकता है और वह उनके बारे में कितनी देर तक सोच सकता है—ये सब निर्धारित हैं। मानवता के परिप्रेक्ष्य से, ये नियम वास्तव में सामान्य हैं और ये सकारात्मक चीजें हैं। सिर्फ निश्चित नियमों का पालन करके ही मानवजाति वर्षों तक जीवित रह सकती है, वंश-वृद्धि कर सकती है, पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रह सकती है और मानवजाति की उत्तरजीविता जारी रह सकती है। यह सभी प्राणियों के लिए ऐसा ही है। सिर्फ निश्चित प्राकृतिक नियमों और जीवन के निश्चित नियमों का पालन करके और आराम और गतिविधि दोनों की अवधियों को अपनाकर ही उनके जीवन की निरंतरता बनी रह सकती है। अगर कोई प्राकृतिक नियमों का उल्लंघन करता है तो उसके जीवन की निरंतरता में समस्याएँ आएँगी और हो सकता है कि वह बहुत लंबे समय तक जीवित न रहे। अगर किसी व्यक्ति की शारीरिक स्थिति में कोई समस्या उत्पन्न होती है तो उसका सामान्य जीवन, उसके दैनिक भोजन और साथ ही उसकी सामान्य सोच, सामान्य निर्णय-क्षमता और एक दिन में उसके द्वारा किए जाने वाले कार्य की मात्रा इत्यादि सभी प्रभावित होंगे। इसलिए, मानवजाति के प्राकृतिक नियम मानवजाति की सामान्य उत्तरजीविता की रक्षा करते हैं। ये सकारात्मक चीजें हैं और लोगों को इनका तिरस्कार नहीं करना चाहिए और न ही लोगों को इनसे विमुख होना चाहिए। बल्कि उन्हें इनका सम्मान करना चाहिए और इनका पालन करना चाहिए। वे गैर-मानव जो शैतान के हैं, हमेशा महसूस करते हैं, “मानवजाति के इन प्राकृतिक नियमों का पालन करने से लोग पूरी तरह से अक्षम और निकम्मे लगते हैं! हमें हमेशा इन प्राकृतिक नियमों द्वारा सीमित किया जा रहा है—जब तुम थक जाते हो तब तुम्हें सोने जाना पड़ता है; जब तुम्हें भूख लगती है तब तुम्हें खाने जाना पड़ता है। अगर तुम ये चीजें नहीं करते हो तो तुम्हारा दिमाग तुम्हारे मुँह के साथ तालमेल नहीं बिठा पाता है, तुम्हारे हाथ काँपने लगते हैं, तुम्हारा दिल तेजी से धड़कने लगता है, तुम्हारी टाँगें कमजोर हो जाती हैं और तुम मजबूती से खड़े नहीं रह सकते हो। यह कितनी दिक्कत वाली बात है! कल्पना करो कि तुम बस कोई दवा लेकर सामान्य रूप से जी सकते या कई दिनों तक आराम नहीं करने के बाद भी ऊर्जा से भरपूर रह सकते, जो तुम्हें एक रोबोट से भी ज्यादा अद्भुत बना देता। या कल्पना करो कि जब तुम्हें भूख लगती है तब तुम बस एक विशेष एक्यूपॉइंट दबाते हो और तुरंत तुम्हें भूख लगनी बंद हो जाती है। या कल्पना करो कि तुम कई दिनों तक खाना नहीं खाते हो और फिर भी ठीक रहते हो, तुम्हारी देह कमजोर नहीं होती, तुम्हारी ऊर्जा में कमी नहीं आती और तुम्हारा शरीर सामान्य और स्वस्थ रहता है। यह तो अद्भुत होगा!” लोग हमेशा इन प्राकृतिक नियमों को बदलना चाहते हैं। क्या यह सकारात्मक चीजों को नकारना और उनका विरोध करना नहीं है? (हाँ।) इन सकारात्मक चीजों का अस्तित्व मानवजाति के सामान्य अस्तित्व को सुनिश्चित करता है और मानवजाति के सामान्य जीवन को बनाए रखता है, इसलिए लोगों को न सिर्फ इनका पालन करना चाहिए बल्कि इनसे तर्कसंगत रूप से पेश भी आना चाहिए। उन्हें इनके खिलाफ नहीं जाना चाहिए, इन्हें दबाना नहीं चाहिए या इनसे असहमत होने की स्थिति में नहीं आना चाहिए, इनका विरोध तो और भी कम करना चाहिए। दूसरी तरफ, वे चीजें जो मानवजाति के प्राकृतिक नियमों से परे हैं, लोगों की कल्पनाएँ, उनके कुछ असामान्य विचार और असाधारण व्यवहार, ये सभी नकारात्मक चीजें हैं। चूँकि ये सभी नकारात्मक चीजें हैं, इसलिए लोगों को इनका भेद पहचानना चाहिए और इन्हें अस्वीकार कर देना चाहिए, इन्हें नहीं स्वीकारना चाहिए। अगर तुममें सकारात्मक और नकारात्मक चीजों का भेद पहचानने की क्षमता है और तुम जीवनयापन करने के दौरान उनसे सही ढंग से पेश आ सकते हो और तर्कसंगत रूप से उन्हें सँभाल सकते हो तो इसका मतलब है कि तुम्हारी मानवता सामान्य है। अगर तुम अक्सर खुद पर इन सकारात्मक चीजों का सकारात्मक प्रभाव महसूस नहीं करते हो और तुम अक्सर इनका विरोध करना और ऐसी चीजें करना चाहते हो जो इनके विपरीत हों, तुम कुछ नकारात्मक कहावतों और दृष्टिकोणों के आधार पर अक्सर इन सकारात्मक चीजों को बदलने का प्रयास करते हो, चीजों के वस्तुनिष्ठ नियमों का उल्लंघन करते हो तो इससे यह साबित होता है कि अपनी मानवता के लिहाज से तुममें उचित-अनुचित का भेद समझने की क्षमता नहीं है। इस तरीके से संगति करने के बाद क्या अब तुम समझ गए हो? (हाँ।)
अगर किसी व्यक्ति में मानवता है तो क्या उसे यह नहीं समझना चाहिए कि सकारात्मक चीजें क्या हैं और क्या उसे उन्हें नहीं स्वीकारना चाहिए? (हाँ।) और क्या उसे नकारात्मक चीजों का भेद पहचानने में भी समर्थ नहीं होना चाहिए और साथ ही साथ उसे अपने दिल से उनसे नफरत करने और उन्हें अस्वीकार करने में भी समर्थ नहीं होना चाहिए? (हाँ।) तो दूसरी कौन-सी चीजें हैं जिन्हें लोग सकारात्मक या नकारात्मक के रूप में पहचानने में असमर्थ होते हैं? क्या परमेश्वर में विश्वास रखना और उसका अनुसरण करना सकारात्मक चीज है या नकारात्मक चीज? (सकारात्मक चीज है।) क्या मनुष्य की नियति पर परमेश्वर की संप्रभुता सकारात्मक चीज है या नकारात्मक चीज? (सकारात्मक चीज।) मनुष्य की नियति पर परमेश्वर की संप्रभुता सकारात्मक चीज है। तो परमेश्वर की संप्रभुता और आयोजनों के प्रति भ्रष्ट मानवजाति के विरोध को अनुबल देने वाले मुख्य दृष्टिकोण क्या हैं? (लोग मानते हैं कि व्यक्ति की नियति उसी के हाथ में होती है और ज्ञान उसकी नियति को बदल सकता है।) ये वे दृष्टिकोण हैं जो भ्रष्ट मानवजाति द्वारा परमेश्वर को नकारने और परमेश्वर का प्रतिरोध करने को अनुबल देते हैं; ये सही मायने में नकारात्मक चीजें हैं। तो लोगों को परमेश्वर के मनुष्य की नियति पर संप्रभुता रखने के मामले को कैसे बूझना चाहिए? कुछ लोग हालाँकि, धर्म-सिद्धांत के रूप में यह स्वीकारते हैं कि “परमेश्वर मनुष्य की नियति पर संप्रभु है” यह कथन सही है और सकारात्मक है, लेकिन फिर भी वे अपने दिलों में यह विश्वास करते हैं कि मनुष्य के अपने प्रयास उसकी नियति को बदल सकते हैं, उसकी नियति उसी के हाथ में हो सकती है और अंतिम फैसला उसी का होता है। उन्हें लगता है कि अगर वे कड़ी मेहनत से पढ़ाई नहीं करेंगे और लगन से प्रयास नहीं करेंगे तो वे किसी अच्छे विश्वविद्यालय में प्रवेश नहीं पा सकेंगे और उनके पास अच्छी नौकरी, अच्छी संभावनाएँ नहीं होंगी और न ही जीवनयापन की अच्छी स्थितियाँ होंगी। क्या ये उस तरह के लोग हैं जो उचित-अनुचित का भेद पहचान सकते हैं? (नहीं।) बीस-तीस वर्ष जीने के बाद भी वे अभी भी यह नहीं जानते कि “परमेश्वर मनुष्य की नियति पर संप्रभु है” इस कथन का क्या मतलब है। परमेश्वर में विश्वास रखते हुए उन्हें बहुत-से वर्ष हो चुके हैं, लेकिन वे अभी भी यही सोचते हैं कि उनकी नियति उन्हीं के हाथ में है, ज्ञान उनकी नियति को बदल सकता है और अगर वे एक अच्छा गंतव्य चाहते हैं, अच्छी चीजों का आनंद लेना चाहते हैं और एक अच्छा जीवन जीना चाहते हैं तो उन्हें अपने स्वयं के प्रयासों पर भरोसा करना होगा—ठीक वैसे ही जैसे अविश्वासी कहते हैं, “जीतने के लिए तुम्हें अपना सब कुछ दाँव पर लगाना पड़ेगा।” क्या यह उस तरह का व्यक्ति है जो उचित-अनुचित का भेद पहचान सकता है? (नहीं।) क्या जो व्यक्ति उचित-अनुचित का भेद नहीं पहचान सकता, वह मनुष्य है? (नहीं।) वह अच्छे जीवन का आनंद लेता है, अच्छा खाता-पीता है, अच्छे कपड़े पहनता है और समाज में दूसरे लोग उसका बहुत सम्मान करते हैं और उसे लगता है कि अब उसके पास जो जीवन है, वह पूरी तरह से उसकी अपनी कड़ी मेहनत की बदौलत है। इसलिए, उसका मानना है कि “जीतने के लिए तुम्हें अपना सब कुछ दाँव पर लगाना पड़ेगा और मनुष्य की नियति खुद उसी पर निर्भर करती है, दूसरों पर नहीं” यह कथन सच है और यह एक सही दृष्टिकोण है। क्या यह सामान्य मानवता की अभिव्यक्ति है? (नहीं।) लोग ज्ञान प्राप्त करने से पहले इन चीजों को नहीं समझते, लेकिन एक बार जब वे कुछ ज्ञान पर पकड़ बना लेते हैं तब वे “परमेश्वर मानवजाति पर संप्रभु है” इस कथन को पूरी तरह से नकार देते हैं और सोचते हैं, “किसी व्यक्ति की नियति उसी के हाथ में होती है; व्यक्ति खुद अपने हाथ से खुशी की रचना कर सकता है।” क्या यह उस तरह का व्यक्ति है जो उचित-अनुचित का भेद पहचान सकता है? (नहीं।) तो ऐसा व्यक्ति किस तरह का प्राणी है? क्या वह मानवता से रहित नहीं है? (हाँ।) ऐसा व्यक्ति जमीर और विवेक से रहित व्यक्ति है और जमीर और विवेक से रहित व्यक्ति उचित-अनुचित का भेद नहीं पहचान सकता। जीवन के तथ्यों का सही मायने में अनुभव कर लेने के बाद भी वह सही मायने में यह बूझ नहीं पाता कि सकारात्मक चीजें क्या होती हैं और न ही वह सही मायने में इस बात को समझ पाता है कि सकारात्मक चीजों का सार क्या है। यह दर्शाता है कि वह उचित-अनुचित का भेद पहचानने में असमर्थ है। ऐसे व्यक्ति में कोई मानवता नहीं होती है; वह बिल्कुल भी मनुष्य नहीं होता है। ऐसे भी कुछ लोग हैं जो धर्म-सिद्धांतों को बिना समझे-बूझे ही दोहरा सकते हैं, वे कहते हैं, “सभी चीजों के नियम परमेश्वर से आते हैं, वे सकारात्मक चीजें हैं, वे मानवता के लिए फायदेमंद हैं और वे वही हैं जिनका मानवता को पालन करना चाहिए और वे वही हैं जिनकी मानवता को लालसा करनी चाहिए और अनुसरण करना चाहिए,” लेकिन कुछ उच्च-तकनीक वाली जानकारी और उच्च-तकनीक वाली चीजों के संपर्क में आने के बाद इन मामलों पर उनके नजरिए बदल जाते हैं। वे किस प्रकार के विचारों में बदल जाते हैं? वे कहते हैं, “हम लोग, जो परमेश्वर में विश्वासी हैं, जीने के नियमों, सभी चीजों के नियमों और सभी चीजों की उत्तरजीविता के नियमों के बारे में हमेशा बात करते रहते हैं और हमें लगता है कि ये सकारात्मक चीजें हैं। यह बहुत ही पिछड़ापन है! यह ज्ञान की कमी को दर्शाता है, यह कुएँ का मेंढक होना है! अब तकनीक बहुत उन्नत है; ऐसी बहुत-सी चीजें हैं जो तुम्हें खुद नहीं करनी पड़तीं क्योंकि तकनीकी उत्पाद तुम्हारे लिए उन्हें कर सकते हैं—इसे ही उन्नत कहते हैं! देखो, कुछ कारें खुद ही चल सकती हैं। कार में बैठने के बाद तुम गंतव्य सेट करते हो और फिर तुम बस एक शब्द कहते हो और कार चलने लगती है। यह वाकई उच्च-तकनीक है, यह बहुत ही उम्दा है! मानवजाति ने उन्नत तकनीक विकसित की है और हम बिना कुछ किए ही सभी चीजों के मालिक बन गए हैं। इसलिए, सिर्फ विज्ञान ही परम सत्य है! जिन लोगों में शिक्षा और ज्ञान की कमी है और जो विज्ञान नहीं समझते हैं, वे पिछड़े हुए और असभ्य हैं!” उनका नजरिया बदल गया है, है ना? अपने दिलों में उन्होंने सकारात्मक और नकारात्मक चीजों के बीच के अंतर का भेद नहीं पहचाना है। ऐसे भी कुछ लोग हैं जो किसी विमानन संग्रहालय घूम आने के बाद हैरत से कहते हैं, “वाह, क्या आँखें खोल देने वाली चीज है, विज्ञान तो बहुत ही उन्नत है! हम आम लोगों को वह जगह अपनी समझ-बूझ से परे लगती है—हम उसका कुछ भी समझ नहीं सकते हैं। तुम कल्पना तक नहीं कर सकते कि विज्ञान अब किस हद तक विकसित हो गया है। हम तो उस आधुनिक, उन्नत तकनीकी चीज के संपर्क तक में नहीं आए हैं! और हम अभी भी परमेश्वर में विश्वास रखते हैं और प्राकृतिक नियमों और कानूनों की बात करते हैं—हम बहुत ही पिछड़े हुए हैं!” आधुनिक समाज की इन चकाचौंध भरी चीजों को देखने के बाद ऐसे लोग अपने दिलों की गहराइयों से सकारात्मक और नकारात्मक चीजों के बारे में उन सिद्धांतों को पूरी तरह से नकार देते हैं जिन्हें वे इससे पहले समझते थे। वे सकारात्मक चीजों को ज्यादा स्पष्ट रूप से तय नहीं करते हैं, बल्कि यह मानते हैं कि सकारात्मक चीजें पिछड़ी हुई हैं और आधुनिक तकनीक से और मानव विकास की आधुनिक गति से पीछे रह गई हैं। सिर्फ इतना ही नहीं, वे इन नकारात्मक चीजों को विशेष रूप से स्वीकृति देते हैं और उनकी लालसा करते हैं, और उम्मीद करते हैं कि वे भी उन लोगों में से कोई एक बनेंगे जो आधुनिक, उन्नत तकनीक विकसित करते हैं। क्या इस तरह का व्यक्ति कोई ऐसा है जो उचित-अनुचित का भेद समझ सकता है? (नहीं।) यह देखते हुए कि उचित-अनुचित का भेद पहचानने में समर्थ होना मानवता की एक विशेषता है, नतीजतन यह कुछ ऐसा है जो मानवता में अंतर्निहित और जन्मजात है, न कि कुछ ऐसा है जो बाद में बनता है। यानी उचित-अनुचित का भेद पहचानने में समर्थ होना, मानवता की यह विशेषता समय के साथ या भौगोलिक वातावरण या लोगों, घटनाओं और चीजों में बदलावों के साथ नहीं बदलेगी। इसे कोई नहीं बदल सकता और कुछ भी इसे बदल या हटा नहीं सकता। जो लोग उचित-अनुचित का भेद पहचान सकते हैं, उनके दिलों की गहराइयों में सकारात्मक चीजें हमेशा वही होती हैं जिनकी वे लालसा करते हैं, जबकि नकारात्मक चीजें हमेशा वही होती हैं जिनसे वे विमुख होते हैं और नफरत करते हैं और ये वे चीजें नहीं होतीं जिनकी उनकी मानवता को जरूरत है। उन्हें किन चीजों की जरूरत है? उन्हें ऐसी चीजों की जरूरत है जो भौतिक जीवन के नियमों के लिए और उनकी भौतिक उत्तरजीविता के लिए फायदेमंद हैं, ऐसी चीजें जो प्राकृतिक हैं, जो लोगों को शांतिपूर्ण और सुकून महसूस करवाती हैं और जो सामान्य मानवता के जमीर और विवेक की जरूरतों के अनुरूप हैं, न कि ऐसी चीजें जो भव्य, उदात्त और प्रभावशाली हैं। देखो, जब यह बात आती है कि व्यक्ति कैसे आचरण करता है तब कुछ लोग यह पसंद करते हैं कि उनका जीवन थोड़ा ज्यादा सरल और ज्यादा सादगी भरा हो; वे असाधारण जीवन जीना पसंद नहीं करते हैं, बल्कि वे बस शांति पसंद करते हैं और सुकून और आनंद पाना, बहुत ही शांत जीवन जीना पसंद करते हैं। लेकिन दूसरे लोग यह पसंद नहीं करते हैं; वे असाधारण जीवन जीना पसंद करते हैं, वे भव्य, उदात्त और प्रभावशाली चीजें पसंद करते हैं, वे प्रदर्शन करना पसंद करते है, वे भीड़ से अलग दिखना और मशहूर होना पसंद करते हैं और वे सादगी या स्वाभाविकता पसंद नहीं करते हैं। यही बात लोगों की मानवता में अंतर को दर्शाती है।
जो लोग उचित-अनुचित का भेद नहीं पहचान सकते, वे कुछ सही और सकारात्मक कथनों से सहमत हो सकते हैं या बाहर से, कुछ सकारात्मक चीजों को पसंद करने और उनकी लालसा रखने में दूसरों का अनुसरण कर सकते हैं। हालाँकि जैसे-जैसे समय बीतेगा, परिवेश बदलेगा और साथ ही लोग, घटनाएँ और चीजें बदलेंगी, ये सकारात्मक चीजें उनके दिलों की गहराइयों में तुरंत नकारात्मक चीजें बन जाएँगी, जबकि नकारात्मक चीजें जिन्हें वे सही मायने में पसंद करते हैं, तब सकारात्मक चीजें बन जाएँगी, उनके अनुसरण की वस्तुएँ बन जाएँगी। कहने का मतलब यह है कि अपनी पसंद की किसी भी नकारात्मक चीज को देखने से पहले सकारात्मक चीजें उनके लिए सिर्फ एक धर्म-सिद्धांत होती हैं और वे बहाव के साथ बह सकते हैं और झुंड का अनुसरण कर सकते हैं, लेकिन जैसे-जैसे उनकी उम्र बढ़ती जाएगी और समय बीतता जाएगा, वे अपने दिलों में जिन चीजों से सही मायने में प्रेम करते हैं और उनके जो सच्चे दृष्टिकोण हैं वे स्वाभाविक रूप से प्रकट हो जाएँगे। उदाहरण के लिए, कुछ लोग अक्सर कहते हैं, “परमेश्वर में विश्वास रखना अच्छा है; जो लोग परमेश्वर में विश्वास रखते हैं वे सही मार्ग पर चलते हैं और बुराई नहीं करते हैं; वे सभी अच्छे लोग हैं।” लेकिन जब उन्हें परमेश्वर में विश्वास रखते हुए कुछ वर्ष हो जाते हैं और वे देखते हैं कि परमेश्वर के घर के सभी धर्मोपदेश और संगतियाँ लोगों को ईमानदार होने, सत्य का अनुसरण करने, परमेश्वर के प्रति समर्पण करने और एक सृजित प्राणी का कर्तव्य करने के लिए कहती हैं तो उसके बाद वे इससे विमुख हो जाते हैं, और उन्हें लगता है कि परमेश्वर में विश्वास रखना व्यर्थ है और वे कलीसिया छोड़ना और दुनिया में लौट जाना चाहते हैं; उनके दिल कलीसिया में नहीं होते हैं। सत्य से प्रेम नहीं करने वाले लोग ऐसे ही होते हैं। दरअसल, इस तरह का व्यक्ति सकारात्मक चीजों को पसंद नहीं करता है और उसके दिल में बहुत-से टेढ़े-मेढ़े तर्क और पाखंड होते हैं। उसके लिए, ये टेढ़े-मेढ़े तर्क और पाखंड सकारात्मक चीजें हैं, जबकि अपने दिल की गहराइयों में वह सही मायने में सकारात्मक चीजों से विमुख होता है, उनसे नफरत करता है, उनका तिरस्कार करता है और उन्हें कभी नहीं स्वीकारता है। चूँकि वह सकारात्मक चीजों को कभी नहीं स्वीकारता और वह नकारात्मक चीजों को पसंद करता है, ठीक इसी वजह से इस तरह के व्यक्ति की मानवता में उचित-अनुचित का भेद पहचानने की क्षमता नहीं होती है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे कुछ लोग जब पहली बार परमेश्वर में विश्वास रखना शुरू करते हैं तब वे सिर्फ आशीषों के लिए ही ऐसा करते हैं। बहुत-से वर्षों तक धर्मोपदेश सुनने के बाद अंततः वे समझ जाते हैं : “परमेश्वर में विश्वास रखने का मतलब है कि लोगों से ईमानदार होने, समर्पित होने और अपना कर्तव्य करने में कीमत चुकाने को तैयार रहने, परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होने, लापरवाही से और जानबूझकर कार्य नहीं करने और परमेश्वर के घर के हितों को बनाए रखने की अपेक्षा की जाती है। विशेष रूप से जब परमेश्वर के घर के हित उनके अपने हितों से टकराते हैं तब उन्हें परमेश्वर के घर के हितों को बनाए रखना होगा और अपने व्यक्तिगत हितों को छोड़ देना होगा।” सत्य के सभी अलग-अलग पहलुओं के बारे में जानने के बाद उन्हें परमेश्वर में विश्वास रखने का पछतावा होता है, कहते हैं, “मुझे लगा था कि परमेश्वर में विश्वास रखने का मतलब है एक बड़े समूह का हिस्सा होना, एक शक्तिशाली ताकत पाना जिस पर भरोसा किया जा सके और जब तक लोग बहुत कुछ त्याग करते हैं, कष्ट सहते हैं और कीमत चुकाते हैं तब तक वे राज्य में प्रवेश कर सकते हैं और एक अच्छा गंतव्य पा सकते हैं और गर्जन करते हुए अगले युग में जा सकते हैं, उसके मालिक बन सकते हैं और राजाओं की तरह शासन कर सकते हैं। लेकिन अब पता चला कि ऐसा नहीं है। परमेश्वर में विश्वास रखना दरअसल लोगों को यह सिखाना कि उन्हें कैसे आचरण करना है, कैसे परमेश्वर के प्रति समर्पण करना है और कैसे बुराई से दूर रहना है। अगर लोग परमेश्वर में विश्वास रखते हैं तो विशेष रूप से उनसे हमेशा ईमानदार होने और ईमानदारी से बोलने के लिए कहा जाता है और हमेशा सत्य का अभ्यास करने के लिए कहा जाता है; उन्हें अंतिम निर्णय लेने की अनुमति नहीं होती। तो फिर परमेश्वर में विश्वास रखने का क्या मतलब है?” फिर उनके दिलों में शिकायतें उत्पन्न हो जाती हैं और वे अपनी आस्था से पीछे हटना चाहते हैं। लेकिन फिर वे सोचते हैं, “मुझे परमेश्वर में विश्वास रखते हुए कई वर्ष हो गए हैं; अगर मैं अब रुक गया तो क्या मेरा विश्वास व्यर्थ नहीं जाएगा?” उस बिंदु पर वे हार मानने के अनिच्छुक होते हैं। लेकिन अगर उन्होंने विश्वास रखना जारी रखा तो उन्हें सत्य में कोई दिलचस्पी नहीं होती। परमेश्वर का घर हमेशा सत्य का अनुसरण करने और वास्तविकता में प्रवेश करने, परमेश्वर के प्रति समर्पण करने, सत्य की तलाश करने और सिद्धांतों के अनुसार कार्य करने की बात करता है। वे इन चीजों के बारे में सुन-सुनकर थक चुके होते हैं और अब इनके बारे में और नहीं सुनना चाहते हैं। विशेष रूप से जब परमेश्वर का घर सत्य का अभ्यास करने की बात करता है तब वे अंदर ही अंदर परेशान और दुखी महसूस करते हैं; जब सकारात्मक चीजों का जिक्र किया जाता है तब वे अपने दिलों में उनसे विमुखता महसूस करते हैं और उनका तिरस्कार करते हैं और वे सुनने को तैयार नहीं होते। कुछ लोग यह एहसास होने के बाद कि अगर उन्होंने अंत तक विश्वास रखा तो भी उन्हें सत्य या अच्छा गंतव्य नहीं मिलेगा, वे बस विश्वास रखना ही बंद कर देते हैं। उनमें से कुछ लोग नौकरी ढूँढ़ने या कारोबार करने लग जाते हैं और कुछ शादी करने के लिए घर वापस चले जाते हैं। वे परमेश्वर में विश्वास रखना छोड़ देते हैं क्योंकि वे सत्य से प्रेम नहीं करते। परमेश्वर का घर हमेशा सत्य के बारे में बात करता रहता है और सत्य पर संगति करता रहता है जिससे वे विशेष रूप से विमुख होते हैं। यह दर्शाता है कि इस तरह के व्यक्ति में कोई जमीर और विवेक नहीं होता और वह उचित-अनुचित का भेद नहीं पहचान सकता। उचित-अनुचित का भेद पहचानने में असमर्थ होने का मतलब है कि अपनी मानवता में उनके पास सकारात्मक और नकारात्मक चीजों को पहचानने का मानक और क्षमता नहीं होती; यह कुछ ऐसी चीज है जो उनके पास नहीं है। तो क्या इस तरह के व्यक्ति में सामान्य मानवता होती है? (नहीं।) वह गैर-मनुष्य है। अगर किसी व्यक्ति में सही मायने में मानवता हो तो एक चीज इसे प्रमाणित कर सकती है : वह अपने दिल में सकारात्मक चीजों से प्रेम करता है और उनकी लालसा करता है। यहाँ तक कि जब वह सत्य नहीं समझता तब भी वह एक ऐसे न्यायपूर्ण समाज की लालसा करता है जो अंधकार से मुक्त हो, वह सकारात्मक चीजों की लालसा करता है और यह लालसा करता है कि सत्य के पास सामर्थ्य रहे। लेकिन यह बुरा समाज उसके लिए यह जगह प्रदान नहीं करता और अगर लोग कुछ सकारात्मक चीजें प्रकट करते हैं तो उन्हें अलग कर दिया जाता है और कुचल दिया जाता है। इन हालातों में मानवता वाले लोग उन सकारात्मक चीजों को प्राप्त नहीं कर सकते जिन्हें वे पसंद करते हैं और जिनकी वे लालसा करते हैं, इसलिए वे अपने दिलों में चिढ़े हुए महसूस करते हैं। लेकिन जब वे परमेश्वर में विश्वास रखते हैं, उसके बाद परमेश्वर के वचनों को पढ़कर और धर्मोपदेशों को सुनकर वे बहुत-से सत्य समझ जाते हैं और ये सत्य उन सकारात्मक चीजों के अनुरूप होते हैं और उनसे मेल खाते हैं जिन्हें उनकी मानवता पसंद करती है, जिससे सकारात्मक चीजों के लिए उनकी जरूरतें सटीक रूप से पूरी हो जाती हैं। इसलिए, उनके दिल सकारात्मक चीजों की और भी ज्यादा लालसा करते हैं। हालाँकि वे अभी पूरी तरह से सत्य को अभ्यास में नहीं ला सकते हैं—परिवेशी सीमाओं, अपने छोटे आध्यात्मिक कद या कुछ भ्रष्ट स्वभावों से बाधित और बँधे होने के कारण—फिर भी उनमें यह संकल्प और इच्छा होती है कि वे किसी दिन सत्य और परमेश्वर के वचनों के अनुसार पूरी तरह से अभ्यास कर पाएँगे जिससे वे परमेश्वर के वचनों के प्रति समर्पण प्राप्त कर सकेंगे और अपनी उन जरूरतों को पूरा कर सकेंगे जो उनके सकारात्मक चीजों को पसंद करने से उत्पन्न होती हैं। ऐसे लोगों की मानवता में उचित-अनुचित का भेद पहचानने में समर्थ होने का गुण होता है; वे मानवता वाले लोग होते हैं। अगर तुम सिर्फ यह दावा करते हो कि तुम्हें सकारात्मक चीजें पसंद हैं और मौखिक रूप से स्वीकार करते हो कि परमेश्वर जो कुछ भी करता है वह अच्छा होता है तो यह सिर्फ धर्म-सिद्धांत बोलना और नारे लगाना है। सुखद शब्द और सही सिद्धांत कहना, या बड़े-बड़े शब्द बोलना—ऐसा कोई भी कर सकता है। इससे यह प्रकट नहीं होता कि तुम सही मायने में सकारात्मक चीजों को पसंद करते हो। लेकिन जब तुम सत्य सुनते हो तब अगर तुम उससे प्रेम कर सकते हो और उसकी लालसा कर सकते हो और जितना ज्यादा तुम सत्य सुनते हो, उतना ही ज्यादा तुम सत्य की लालसा करते हो और उसे तलाशने की तुम्हारी इच्छा उतनी ही ज्यादा हो जाती है और परमेश्वर का अनुसरण करने और उद्धार प्राप्त करने में तुम्हारी आस्था उतनी ही दृढ़ हो जाती है; और अगर परमेश्वर में विश्वास रखने की प्रक्रिया में तुम्हें अपने विभिन्न लक्ष्यों में लाभ प्राप्त होते हैं, तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव धीरे-धीरे त्याग दिए जा रहे हैं और परमेश्वर का प्रतिरोध करने और उसके खिलाफ विद्रोह करने के तुम्हारे क्रियाकलाप लगातार कम होते जा रहे हैं—तो तुम ऐसे व्यक्ति हो जो सकारात्मक चीजें पसंद करता है, तुम ऐसे व्यक्ति हो जिसके पास सत्य वास्तविकता है। ऐसे लोग परमेश्वर में अपने विश्वास में सफल होते हैं और लाभ प्राप्त करते हैं। तुम यह महसूस कर सकते हो कि तुम बदल गए हो और परमेश्वर और सत्य के प्रति तुम्हारा रवैया पहले से भिन्न है। इससे पहले तुमने परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह किया था और परमेश्वर के प्रति समर्पण नहीं किया था और तुम बहुत छोटे मामलों में भी सत्य का अभ्यास नहीं कर सकते थे। लेकिन अनुसरण के इन वर्षों के जरिए, कर्तव्य करने के इन वर्षों के जरिए और सभी पहलुओं में अपने प्रयासों के जरिए तुमने कुछ सत्य समझ लिया है और जब मामलों से तुम्हारा सामना होता है तब तुम सत्य की तलाश कर सकते हो और अपने देह की इच्छाओं के खिलाफ विद्रोह कर सकते हो। सिद्धांतों से जुड़े कुछ बड़े मामलों में तुम सिद्धांतों का पालन भी कर सकते हो और तुम्हारे लिए अपनी इच्छानुसार कार्य नहीं करना संभव है और तुम परमेश्वर के घर के हितों को बनाए रख सकते हो और कलीसिया के कार्य को बनाए रख सकते हो। इसका मतलब है कि तुम्हारा कुछ आध्यात्मिक कद है, तुम्हारे पास अपने खिलाफ विद्रोह करने और सत्य स्वीकारने और उसके प्रति समर्पण करने में कुछ अभ्यास और प्रवेश है और तुम्हारे विभिन्न भ्रष्ट स्वभाव भी अलग-अलग मात्रा में बदल चुके हैं। यह उन लोगों में उचित-अनुचित का भेद पहचानने की अभिव्यक्ति है जिनमें सही मायने में मानवता होती है।
जो लोग उचित-अनुचित का भेद नहीं पहचान सकते, हो सकता है कि वे भी सत्य स्वीकार करना चाहें और उद्धार का अनुसरण करने के इच्छुक हों, लेकिन जब उनका सामना चीजों से होता है तब वे सत्य को अभ्यास में नहीं ला सकते हैं। वे अभी भी अपने भ्रष्ट स्वभावों के अनुसार जीते हैं, अक्सर परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह करते हैं और उसका प्रतिरोध करते हैं, बिना यह जाने कि वे ऐसा कर रहे हैं। दस वर्ष पहले उन्होंने परमेश्वर के खिलाफ इसी तरह से विद्रोह किया था और दस वर्ष बाद अब भी वे ऐसा ही कर सकते हैं। वे न तो सत्य स्वीकारते हैं और न ही उसका अभ्यास करते हैं। इसके दो कारण हैं : एक तो यह कि वे यह बिल्कुल नहीं समझते कि सत्य क्या है और बस अपने तर्क, अपनी खुद की कहावतों और अपने खुद के नजरियों से चिपके रहते हैं। दूसरा यह कि वे सत्य स्वीकारने वाले लोग तो बिल्कुल भी नहीं हैं। दस वर्ष पहले उन्होंने जिस भी तरीके से परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह किया था, दस वर्ष बाद अब भी वे उसी तरीके से ऐसा कर रहे हैं, इसमें कोई बदलाव नहीं है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि परमेश्वर में विश्वास रखते हुए उन्हें कितने वर्ष हो चुके हैं, उनके पास सत्य स्वीकारने और परमेश्वर के प्रति समर्पण करने का कोई प्रमाण नहीं है, और देह और अपने भ्रष्ट स्वभावों के खिलाफ विद्रोह करने का प्रमाण तो और भी कम है। इससे यह प्रकट होता है कि वे सत्य स्वीकारने वाले लोग नहीं हैं। ऐसे लोग उचित-अनुचित का भेद पहचानने वाले लोग नहीं हैं। यह भी कहा जा सकता है कि वे मानवता वाले लोग नहीं हैं—सादे शब्दों में कहा जाए तो वे मनुष्य नहीं हैं। कुछ लोग इन शब्दों को सुनने के बाद अपने दिलों में आश्वस्त नहीं होते। वे कहते हैं, “मुझे परमेश्वर में विश्वास रखते हुए दस वर्ष से ज्यादा हो चुके हैं और मैं हमेशा अपना कर्तव्य करता रहा हूँ। बस यही है कि मैं कभी-कभी कुछ गलतियाँ कर बैठता हूँ और कुछ काट-छाँट से गुजरता हूँ। क्या यह बहुत सामान्य नहीं है? हर किसी में भ्रष्ट स्वभाव होते हैं; गलतियाँ कौन नहीं करता? जो भी हो, मैं सच्चा विश्वासी हूँ। तुम यह कैसे कह सकते हो कि मुझमें कोई मानवता नहीं है?” यह सच है कि तुम सच्चे विश्वासी हो, लेकिन क्या सच्चा विश्वासी होने का मतलब यह है कि तुम सत्य स्वीकार सकते हो? क्या सच्चा विश्वासी होने का मतलब यह है कि तुम देह के खिलाफ विद्रोह कर सकते हो और तुम उद्दंड नहीं होगे? क्या सच्चा विश्वासी होने का मतलब यह है कि तुम परमेश्वर के प्रति समर्पण कर सकते हो? ऐसा नहीं है। सच्चा विश्वासी होना ही सब कुछ नहीं है और इसका मतलब यह नहीं है कि तुम उद्धार प्राप्त कर सकते हो। उद्धार प्राप्त करना निर्णायक रूप से इस बात पर निर्भर करता है कि क्या तुम्हारी मानवता सत्य स्वीकार सकती है और क्या तुम उचित-अनुचित का भेद पहचान सकते हो। सच्चा विश्वासी होना लोगों के लिए अंततः उद्धार प्राप्त करने की सबसे जरूरी शर्त नहीं है और न ही यह मूलभूत शर्त है। तुम कहते हो कि तुम सच्चे विश्वासी हो, लेकिन तुमने कितना सत्य समझा है और प्राप्त किया है? जब परमेश्वर के घर के हितों की बात आती है तब तुमने कितने अवसरों पर उन्हें बनाए रखा है? अगर तुम यह सोचते हो कि तुम सच्चे विश्वासी हो, तुममें जमीर और विवेक और मानवता है और तुम सच्चे व्यक्ति हो तो उसी मामले में अगर तुम दस वर्ष पहले परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह कर सके थे तो क्या अब भी तुम परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह कर सकते हो? क्या तुम बदल गए हो? क्या तुमने देह के खिलाफ विद्रोह किया है? अगर तुमने देह के खिलाफ विद्रोह नहीं किया है तो क्या तुम अगले दस वर्षों में ऐसा कर सकते हो? अगर तुम अभी भी देह के खिलाफ विद्रोह नहीं कर सकते हो और अभी भी परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह कर सकते हो तो यह दर्शाता है कि तुम्हारी मानवता में कोई समस्या है। तुम सत्य का अभ्यास नहीं कर सकते हो, इसलिए अगर तुम यह कहते हो कि तुम सच्चे विश्वासी हो तो यह बेकार है। तुम कहते हो कि तुम कष्ट सहने और कीमत चुकाने के इच्छुक हो और तुम लगन से अपना कर्तव्य करने के इच्छुक हो, लेकिन यह इच्छुक होना बेकार है। यह तुम्हारे लिए सत्य का अभ्यास करने और परमेश्वर के प्रति समर्पण करने की बस एक पूर्वापेक्षा है, लेकिन तुम अंततः इसे अभ्यास में ला सकते हो या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि तुममें मानवता है या नहीं। अगर तुम्हारा दिल अपने भ्रष्ट स्वभावों पर अंकुश लगाने और नियंत्रण करने में हमेशा असमर्थ रहता है और तुम अपने खुद के हितों को बनाए रखना चुनते हो और सकारात्मक चीजों के बजाय नकारात्मक चीजों को चुनते हो तो यह दर्शाता है कि तुम्हारी मानवता सत्य से प्रेम नहीं करती और उसमें तुम्हारे भ्रष्ट स्वभावों को नियंत्रित करने की क्षमता नहीं है। अगर जब तुम सत्य नहीं समझते थे तब तुममें अपने भ्रष्ट स्वभावों के प्रकाशनों को नियंत्रित करने की क्षमता नहीं थी तो यह क्षम्य है। लेकिन अब स्थिति भिन्न है। तुमने बहुत-से वर्षों से सत्य के बारे में धर्मोपदेश सुने हैं, फिर भी तुम अपने भ्रष्ट स्वभावों को नियंत्रित नहीं कर सकते हो जिससे तुम सत्य सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास कर सको और जब चीजों से तुम्हारा सामना हो तब तुम सही चुनाव कर सको। तुम बुरे लोगों को कलीसिया के कार्य में बाधा डालते हुए स्पष्ट रूप से देखते हो, फिर भी तुम परमेश्वर के घर के हितों का बचाव करने के लिए उठ खड़े नहीं हो सकते। लेकिन जब कोई तुम्हारे हितों को चोट पहुँचाता है तब तुम उनका बचाव करने के लिए अपनी पूरी शक्ति लगा सकते हो। यह चीज यह प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त है कि तुम्हें नियमित और नियंत्रित करने के लिए तुम्हारी मानवता में कोई जमीर या विवेक नहीं है जिससे तुम अभ्यास का सही मार्ग और सिद्धांत चुन सको। अगर तुम ऐसे अनुचित कार्य करते हो और फिर भी यह दावा करते हो कि तुम मनुष्य हो तो यह दर्शाता है कि तुम्हारा जमीर और विवेक अब और काम नहीं कर रहे हैं। तो फिर तुम एक सामान्य व्यक्ति नहीं हो क्योंकि तुम्हारी मानवता में कोई जमीर और विवेक नहीं है और न ही ऐसा कुछ है जो तुम्हें सही चुनाव करने में समर्थ बना सके। समझे? कुछ लोग कहते हैं, “अभी मेरा आध्यात्मिक कद छोटा है। अपने पारिवारिक परिवेश और परवरिश के कारण मैं उद्दंड, स्वेच्छाचारी और अभिमानी हूँ। लेकिन वास्तविक जीवन में मैं जानता हूँ कि सकारात्मक चीजें क्या होती हैं और नकारात्मक चीजें क्या होती हैं और मैं जानता हूँ कि मुझे क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए। बस यही है कि मेरा आध्यात्मिक कद छोटा है और मेरे पास कोई ऐसा व्यक्ति नहीं रहा जो सत्य समझता हो ताकि वह मुझे प्रबुद्ध कर सके, मेरा पर्यवेक्षण कर सके और मुझे आग्रह कर सके, इसलिए मैं सत्य को अभ्यास में नहीं लाया और मैंने कुछ अपराध किए हैं और मुझे अंदर से थोड़ा पछतावा महसूस होता है।” वास्तविक जीवन में ऐसे लोग अपने आचरण को नियमित करने और खुद को संयमित करने के लिए अपने जमीर का उपयोग कर सकते हैं ताकि वे सही मार्ग पर चल सकें। ये वे लोग हैं जिन्हें बचाया जा सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे सत्य स्वीकार सकते हैं, कुछ सत्य को अभ्यास में ला सकते हैं, और वे कुछ बदलावों से गुजर चुके हैं। बस यही है कि उनकी प्रगति की गति औसत से जरा-सी धीमी है और उनका विकास कुछ हद तक कम व्यापक है, लेकिन वे बदल रहे हैं। यह ठीक वैसा ही है जैसे कुछ बीज अच्छी मिट्टी में तेजी से उगते हैं, जबकि कुछ रेत या चट्टान की दरारों में धीरे-धीरे और ज्यादा मुश्किल से उगते हैं; लेकिन जब तक उनमें जीवन रहता है तब तक वे उगते रहते हैं। लोगों के साथ भी ऐसा ही है। जब तक उनकी मानवता में वह जमीर और विवेक होता है जो लोगों में होना चाहिए तब तक यह प्रमाणित होता है कि उनमें मानव जीवन है—जब वे सत्य स्वीकार लेंगे, उसके बाद वे बदल जाएँगे। भले ही यह बदलाव धीमा हो—दूसरे लोग दस वर्षों में बड़ी प्रगति कर लेते हैं जबकि वे बीस-तीस वर्षों में सिर्फ थोड़ी-सी प्रगति करते हैं—धीमेपन के बावजूद वे एक सकारात्मक दिशा में विकसित हो रहे हैं, वे बदल रहे हैं और उनका जीवन निरंतर बढ़ रहा है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे कितनी तेजी से या धीरे-धीरे बढ़ते हैं, इस तरह के व्यक्ति में मानवता का गुण होता है। हालाँकि एक और तरह का व्यक्ति भी है जिसे परमेश्वर में विश्वास रखते हुए बहुत-से वर्ष हो गए हैं, लेकिन उसने कोई जीवन विकास प्राप्त नहीं किया है। चाहे कोई भी सत्य पर संगति क्यों न करे, वह विमुखता का बोध महसूस करता है और सुनने का इच्छुक नहीं होता है। परमेश्वर चाहे कैसा भी परिवेश बनाए, वह सत्य की तलाश नहीं करता है, उससे सबक नहीं सीख सकता और उससे सकारात्मक मार्गदर्शन और मदद प्राप्त नहीं कर सकता। वह अपने दिल में सकारात्मक चीजों से विमुख होता है। उसका स्वेच्छाचारी स्वभाव और जीवनशैली कभी नहीं बदली है। ऐसे लोग बिना जमीर और विवेक वाले होते हैं। वे मनुष्य नहीं हैं—वे गैर-मनुष्य हैं। जब मैं इसे इस तरीके से समझाता हूँ, तो क्या यह तुम्हारे लिए ज्यादा स्पष्ट और ज्यादा समझने योग्य हो रहा है? (हाँ।)
एक और तरह का व्यक्ति भी है : वह जानता है कि परमेश्वर में विश्वास रखना अच्छा है, लेकिन वह यह नहीं समझता कि सकारात्मक और नकारात्मक चीजें क्या होती हैं; इसके अतिरिक्त, वह अपनी वाणी और क्रियाकलापों को नियमित या नियंत्रित करने के लिए अपने जमीर का उपयोग करने के बिल्कुल भी करीब नहीं होता है। ऐसे लोगों का भेद पहचानना आसान है। वे सकारात्मक चीजों को पसंद करने के बिल्कुल भी करीब नहीं होते और न ही वे चीजों का मतलब समझने के पास पहुँचते हैं। यह सब उनके लिए एक उलझन है। अगर तुम उनसे पूछते हो कि सकारात्मक चीजें क्या होती हैं तो वे धर्म-सिद्धांतों के लिहाज से बात करेंगे और कहेंगे कि परमेश्वर जो कहता और करता है, वे सब सकारात्मक चीजें हैं। वे जो कहते हैं वह सुनने में तो काफी अच्छी लगता है, लेकिन जब उनका सामना चीजों से होता है तब वे उन्हें परमेश्वर के वचनों से नहीं जोड़ पाते या उनका भेद नहीं पहचान पाते; उनके मन खिचड़ी बन जाते हैं, वे भ्रमित हो जाते हैं और उनमें किसी भी चीज के बारे में कोई स्पष्टता नहीं होती है। अगर तुम उनसे पूछते हो कि इतने वर्षों से परमेश्वर में विश्वास रखने से उन्हें क्या सत्य प्राप्त हुए हैं तो वे कहते हैं, “परमेश्वर सभी चीजों पर संप्रभु है, वह मनुष्य के लिए जो कुछ भी करता है वह अच्छा है और परमेश्वर मनुष्य से प्रेम करता है। शैतान परमेश्वर का प्रतिरोध करता है और शैतान मनुष्य को चोट पहुँचाता है, उसे सताता है और उसके साथ दुर्व्यवहार करता है।” अगर तुम उनसे पूछते हो कि उन्होंने और क्या प्राप्त किया है तो वे कहते हैं, “हमें अपना कर्तव्य अच्छी तरह से करना चाहिए, ज्यादा कष्ट सहना चाहिए और ज्यादा बड़ी कीमत चुकानी चाहिए।” अगर तुम उनसे पूछते हो कि अपना कर्तव्य करने में किन सिद्धांतों का पालन करना चाहिए तो वे कहते हैं, “हमसे ऊपर वाले जो भी कहते हैं, हमें उसे मानना चाहिए और हमसे जो भी करने को कहा जाता है, हमें उसे करना चाहिए। अगर वह कार्य गंदा और थकाऊ हो तो भी हमें उसे अच्छी तरह से करना चाहिए; हमें गड़बड़ नहीं करनी चाहिए और बाधा नहीं डालनी चाहिए या परेशानी उत्पन्न नहीं करनी चाहिए। हमें ऐसी चीजें करनी चाहिए जो सभी के लिए और परमेश्वर के घर के लिए फायदेमंद हैं।” वे जो ये धर्म-सिद्धांत बोलते हैं, वे सभी सही हैं, उनमें एक भी गलत शब्द नहीं है। लेकिन जब उनका सामना चीजों से होता है तब वे सिर्फ कुछ विकृत और बेवकूफी भरे दृष्टिकोण प्रकट करते हैं और चाहे तुम उन्हें कितनी भी बार क्यों न सुधारो, वे बदल नहीं सकते हैं। ऐसे लोग किस तरह के नीच हैं? (वे भ्रमित लोग हैं।) क्या भ्रमित लोग मनुष्य होते हैं? (नहीं।) भ्रमित लोग क्या होते हैं? (दरिंदे।) इसके लिए सभ्य शब्द “पशु” है और बोलचाल का शब्द “दरिंदा” है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे कितने धर्मोपदेश सुनते हैं, वे यह नहीं समझते कि सत्य क्या है, सकारात्मक चीजें क्या होती हैं या नकारात्मक चीजें क्या होती हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे ऐसी कितनी चीजें करते हैं जो परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह करती हैं, उन्हें अपने दिलों में इसकी कोई जागरूकता नहीं होती और फिर भी उन्हें लगता है कि वे स्वाभाविक रूप से रहमदिल हैं और उनके पास सहानुभूति भरा दिल है। जब वे किसी को कष्ट सहते देखते हैं तब वे अपने दिलों में दुखी महसूस करते हैं और सोचते हैं कि काश वे उसकी जगह कष्ट सह सकते। जब वे देखते हैं कि किसी के पास खाने-पहनने के लिए कुछ भी नहीं है तब वे उसे अपने खुद के कपड़े और भोजन देना चाहते हैं। वे मानवजाति की भ्रष्टता को उजागर करने वाले परमेश्वर के चाहे कितने भी वचन क्यों न सुन लें, उन्हें अभी भी यही लगता है कि वे बहुत अच्छे हैं, हर किसी से बेहतर हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे कितनी सारी गलत चीजें करते हैं, उन्हें पता ही नहीं होता कि उनसे कहाँ गलती हुई और वे कभी स्वीकार नहीं करते कि उनमें भ्रष्ट स्वभाव है। अगर तुम उनसे पूछते हो, “क्या तुम भ्रष्ट मनुष्य हो? क्या तुममें भ्रष्ट स्वभाव है?” वे कहते हैं, “हाँ, है। हर किसी में भ्रष्टता होती है, तो मुझमें कैसे नहीं होगी? तुम बेवकूफी भरे शब्द बोल रहे हो!” वे तुम्हें बेवकूफ तक बुला देते हैं। लेकिन जब वे कुछ गलत चीज करते हैं तब वे उसे स्वीकार नहीं करते हैं और यहाँ तक कि दोष भी दूसरों के मत्थे मढ़ देते हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे क्या गलत करते हैं, वे उसे स्वीकार नहीं करते और चाहे उनके द्वारा किए गए बुरे कर्म कितने भी गंभीर हों, खुद को सही ठहराने के लिए उनके पास हमेशा बहाने और कारण होते हैं। क्या ऐसे लोगों के पास कोई विवेक होता है? क्या वे उचित-अनुचित का भेद पहचान सकने वाले लोग हैं? (उनके पास कोई विवेक नहीं होता और वे उचित-अनुचित का भेद नहीं पहचान सकते।) ऐसा लगता है कि वे हर रोज बहुत मेहनत करते हैं, सुबह से शाम तक धर्मोपदेश सुनते हैं और परमेश्वर के वचन पढ़ते हैं, लेकिन वे सत्य का एक भी वाक्य नहीं समझ सकते, ऐसी एक भी चीज नहीं कर सकते जो सत्य सिद्धांतों के अनुरूप हो और ऐसा एक भी शब्द नहीं बोल सकते जो सत्य के अनुरूप हो। सत्य के अनुरूप शब्दों की तो बात ही छोड़ो—वे तो ऐसा भी एक शब्द नहीं बोल सकते जो मानवता के जमीर और विवेक के अनुरूप हो; वे सिर्फ उलझे हुए और बेतुके शब्द बोलते हैं और सिर्फ टेढ़ी-मेढ़ी दलीलें देते हैं। ऐसे लोग जमीर और विवेक होने की कसौटी पर बिल्कुल खरे नहीं उतरते; वे सिर्फ भ्रमित लोग हैं, जो टेढ़े-मेढ़े तर्कों से लबालब भरे हुए हैं। बहुत-से धर्मोपदेश सुनने के बाद वे कुछ आध्यात्मिक वचन बोल सकते हैं। जब तुम उन्हें आध्यात्मिक वचन बोलते हुए सुनते हो तब तुम्हें लगता है कि वे काफी कुशल और स्पष्ट हैं, लेकिन जब मामलों को सँभालने की बात आती है तब वे तुम्हें उलझे हुए और बेतुके लगते हैं। जब वे टेढ़ी-मेढ़ी दलीलें देते हैं, तब वे तुम्हें अवाक कर सकते हैं। “तुम्हें अवाक कर सकते हैं” का क्या मतलब है? इसका मतलब है कि तुम कल्पना नहीं कर सकते कि कोई ऐसे बेतुके शब्द भी कह सकता है या सोचने का ऐसा तरीका भी अपना सकता है, यह तुम्हारे लिए समझ से बिल्कुल परे है और अंत में, तुम सिर्फ चुप्पी से ही उनका जवाब दे सकते हो, जो कि उनसे निपटने का सबसे अच्छा तरीका है।
अगर कोई व्यक्ति मनुष्य है और उसमें सामान्य मानवता है तो उसका उचित-अनुचित का भेद पहचानने में समर्थ होना अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब उसने परमेश्वर के वचनों की आपूर्ति प्राप्त नहीं की है और वह सत्य नहीं समझता है तब वह कुछ सरल सकारात्मक और नकारात्मक चीजें समझने के लिए अपने जमीर और विवेक का उपयोग कर सकता है। जब उन कुछ सकारात्मक और नकारात्मक चीजों की बात आती है जिनके वह वास्तविक जीवन में संपर्क में आता है तब उसके पास कुछ भेद पहचानने की और संज्ञानात्मक क्षमताएँ होती हैं। वह मूलभूत मानवीय सामान्य समझ के तहत आने वाली चीजों के प्रति, मानव उत्तरजीविता के नियमों के प्रति और कुछ लोगों, घटनाओं और चीजों के प्रति जिनसे उसका अक्सर सामना होता है, भेद पहचानने की कुछ क्षमता रखने में समर्थ होता है। वह कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जो भ्रमित तरीके से जीता हो, बल्कि जब मानव जगत की सकारात्मक और नकारात्मक चीजों की बात आती है तब उसमें भेद पहचानने की और संज्ञानात्मक क्षमताएँ होती हैं और यकीनन उसके पास इन चीजों के प्रति कुछ विचार, रुख और सही रवैये भी होते हैं। तीस वर्ष की उम्र के बाद ऐसे लोगों का धीरे-धीरे जीवन के विभिन्न मामलों से सामना होने लगता है। अगर उन्होंने परमेश्वर के वचनों को नहीं पढ़ा है या परमेश्वर के वचनों की आपूर्ति नहीं प्राप्त की है तो भी जब वे पचास-साठ वर्ष के हो जाते हैं तब वे धीरे-धीरे यह संक्षेप में प्रस्तुत कर सकते हैं कि सकारात्मक चीजें क्या होती हैं और नकारात्मक चीजें क्या होती हैं, और फिर वे जिन सकारात्मक चीजों को बूझ सकते हैं उनके अनुसार जीवन जी सकते हैं और सकारात्मक चीजों के कुछ नियमों का पालन कर सकते हैं। जहाँ तक कुछ नकारात्मक चीजों का प्रश्न है, वे उनका भेद पहचानने में समर्थ होने के साथ-साथ अपने दिलों की गहराइयों से खुद को उनसे दूर भी कर सकते हैं। जब उनके पास सांसारिक रुझानों या सांसारिक आचरण के फलसफों और लोगों के बीच प्रचलित कहावतों का पालन करने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता है तब उन्हें लगता है कि वे अपने जमीर के खिलाफ जा रहे हैं और उनका जमीर उन्हें धिक्कारेगा। वे अपने दिलों की गहराइयों से ऐसे नजरिए स्वीकार नहीं करते हैं; वे सिर्फ उत्तरजीविता या अस्थायी फायदों की खातिर ही इस तरीके से कार्य करते हैं। ये चीजें करना उनका मूल उद्देश्य नहीं होता; बल्कि यह उनकी इच्छा के खिलाफ किया गया चुनाव होता है। ऐसे लोग परमेश्वर में विश्वास रखने के बाद, इस बात को लेकर ज्यादा चिंतित रहते हैं कि सभी प्रकार के मुद्दों, जैसे कि मानव जीवन और उत्तरजीविता से संबंधित मुद्दों के बारे में परमेश्वर के वचन वास्तव में क्या कहते हैं, मानव जीवन की कठिन समस्याओं के बारे में परमेश्वर के सटीक कथन वास्तव में क्या हैं और जब इनसे लोगों का सामना होता है तब परमेश्वर लोगों से वास्तव में क्या करने के लिए कहता है। वे इन प्रश्नों के उत्तर पाने की लालसा करते हैं। जब वे उत्तर प्राप्त करते हैं तब उन्हें नहीं लगता कि परमेश्वर के वचनों के अनुसार अभ्यास करना बहुत कठिन है या मानवता की जरूरतों के विपरीत है। इसके बजाय उन्हें लगता है कि सिर्फ ये सत्य ही वह सही मार्ग है जो लोगों के पास होना चाहिए और जो उन्हें प्राप्त करना चाहिए और वही सदृश्यता है जो अपने जीवन में लोगों के पास होनी चाहिए। उन्हें लगता है कि अगर लोग इस तरीके से जीते हैं तो यह सही मायने में उनके जमीर और मानवता की जरूरतों को पूरा कर सकता है और सिर्फ इसी तरीके से जीने से ही वे अपनी इच्छा के खिलाफ नहीं जाते हैं और सिर्फ तभी वे व्यावहारिक महसूस कर सकते हैं और आनंद और शांति पा सकते हैं। उन्हें यह भी लगता है कि सिर्फ तभी लोगों के पास उम्मीद होगी और वे जीते रहने के इच्छुक होंगे और सिर्फ तभी वे विभिन्न बुरी शक्तियों, विभिन्न बुरे रुझानों और उस खोखली अवस्था से मुक्त हो सकेंगे जिसमें मानवजाति रहती है। अपने दिलों की गहराई में अपने जमीर के प्रभाव में वे परमेश्वर के वचनों में विभिन्न कथनों, शिक्षाओं और भरण-पोषण को पसंद करते हैं और वे उन्हें अपने दिलों की गहराइयों से अपनाते हैं। उनमें सत्य प्राप्त करने का अनुसरण करने की इच्छा होती है। इसके अलावा, जैसे-जैसे परमेश्वर के वचन अधिकाधिक व्यक्त किए जाते हैं और परमेश्वर के वचनों की आपूर्ति अधिकाधिक व्यावहारिक और विस्तृत होती जाती है, सत्य और सकारात्मक चीजों के लिए उनकी लालसा भी उत्तरोत्तर संतुष्ट होती जाती है। ऐसा नहीं है कि वे जितना ज्यादा सुनते हैं, उतने ही ज्यादा अशांत हो जाते हैं, इसे उतना ही अत्यधिक विस्तृत पाते हैं या उन्हें यह उतना ही उलझा हुआ लगता है। इसके विपरीत, वे जितना ज्यादा सुनते हैं, उन्हें चीजें उतनी ही ज्यादा स्पष्ट लगती हैं और उन्हें उतना ही ज्यादा ऐसा लगता है कि वे चीजों की असलियत देख सकते हैं और उनके पास एक मार्ग हो सकता है। उन्हें लगता है कि आगे उम्मीद है, उन्हें प्रकाश दिखाई दे रहा है और उनके पास सत्य का अभ्यास करने और उद्धार प्राप्त करने का एक मार्ग है। उनके दिल अधिकाधिक व्यावहारिक महसूस करते हैं और उन्हें अधिकाधिक यह लगता है कि परमेश्वर में विश्वास रखने का मार्ग सही है और परमेश्वर में विश्वास रखने में उन्होंने अब तक हर रोज जो कीमत चुकाई है और जो ऊर्जा और दिल का खून खपाया है, वे सब सार्थक और अर्थपूर्ण रहे हैं। इसकी पुष्टि उनके दिलों की गहराइयों में होती है। हालाँकि उनकी इच्छा पूरी हो गई है और सत्य के लिए उनकी लालसा कुछ हद तक तृप्त हो गई है, फिर भी जो लोग सही मायने में सत्य की लालसा करते हैं, वे अपना संकल्प नियत करेंगे और योजनाएँ बनाएँगे, जिसके लिए स्वयं को सत्य के सभी पहलुओं का अभ्यास करने और उनमें प्रवेश करने, परमेश्वर के वचनों, विभिन्न सत्य सिद्धांतों और परमेश्वर की विभिन्न अपेक्षाओं को अपने में कार्यान्वित करने की आवश्यकता होगी, इस प्रकार वे परमेश्वर के वचनों को वास्तविक जीवन में अपने क्रियाकलापों और स्व-आचरण के लिए कसौटी और अपनी जीवन वास्तविकता बनने देंगे। पहले जब वे सत्य नहीं समझते थे तब वे सिर्फ कुछ शब्द और धर्म-सिद्धांत ही बोल सकते थे। जब उनका सामना चीजों से होता था तब उनके प्रति उनका सिर्फ एकतरफा नजरिया होता था, जैसे अंधे लोगों और हाथी की नीतिकथा में था; वे समस्या का सार देखने में असमर्थ थे और उन्हें नहीं पता था कि क्या करना है। उन्हें लगता था कि जीवन बहुत उबाऊ है जिसमें ऐसा कोई लक्ष्य नहीं है जिसकी तरफ प्रयास किया जाए और कोई उम्मीद नहीं है और वे एक उलझन भरे तरीके से जीवन जीते थे। लेकिन अब स्थिति भिन्न है। परमेश्वर के वचन अधिकाधिक स्पष्ट रूप से बोले जाते हैं और सत्य की संगति अधिकाधिक स्पष्ट रूप से की जाती है। उन्हें लगता है कि मार्ग ज्यादा उज्जवल और ज्यादा स्पष्ट होता जा रहा है और आगे बढ़ने का एक रास्ता है। और हर शब्द जो वे कहते हैं, हर चीज जो वे करते हैं और हर प्रकार का व्यक्ति जिससे उनका सामना होता है, इन सबके लिए आधार के रूप में पालन करने के लिए उनके पास परमेश्वर के वचन हैं। उन्हें लगता है कि परमेश्वर के वचन बहुत व्यावहारिक और बहुत अच्छे हैं और उन्होंने दृढ़ता से कह दिया है कि परमेश्वर में विश्वास रखना ही सही मार्ग है, परमेश्वर में विश्वास रखने से उद्धार मिल सकता है और इस प्रकार परमेश्वर में विश्वास रखना उन्हें मानव के समान जीवन जीने में समर्थ बना सकता है और यह बहुत अर्थपूर्ण और मूल्यवान है! सत्यों के लिए लालसा करते हुए और उनका अभ्यास करते हुए वे इन सत्यों में निरंतर प्रवेश भी कर रहे हैं और निरंतर अच्छी फसल भी प्राप्त कर रहे हैं। जैसे-जैसे उनके जमीर और मानवता की सकारात्मक चीजों की लालसा और जरूरत पूरी होती जा रही हैं, उनका आंतरिक जीवन भी धीरे-धीरे बदलता जा रहा है। हालाँकि वे अक्सर भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करते हैं और परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह करते हैं और जब चीजों से उनका सामना होता है तब वे अक्सर—न चाहते हुए भी—अपने भ्रष्ट स्वभावों, अपने देह और अपने बेवकूफी भरे, भ्रामक विचारों और दृष्टिकोणों के अनुसार कार्य करते हैं और साथ ही साथ एक अच्छी परिघटना भी घटित होती है : जब वे ऐसा करते हैं तब उनका जमीर बार-बार असहज हो उठता है और उन्हें लगता है कि उनके भ्रष्ट स्वभाव की जड़ें गहराई तक पहुँच चुकी हैं और उन्हें बदलना मुश्किल है। फिर अपने जमीर के प्रभाव में वे अपने दिलों में बार-बार धिक्कारे गए महसूस करते हैं, उन्हें अपराधबोध और पछतावा महसूस होता है। वे बार-बार इस पर विचार करते हैं कि आखिर उन्होंने कहाँ गलती कर दी और वे अक्सर पश्चात्ताप करते हैं। ये सभी जमीर के प्रभाव हैं। अगर लोगों में जमीर है तो उनमें ये भावनाएँ और ये अभिव्यक्तियाँ होंगी; अगर लोगों में जमीर है तो वे इसी तरीके से जिएँगे, अक्सर आत्म-चिंतन करेंगे, अक्सर पश्चात्ताप करेंगे और अपना रास्ता बदल लेंगे। हालाँकि वे बार-बार असफलताओं और रुकावटों का सामना करते हैं और गलत कर्म करने के कारण बार-बार काट-छाँट, न्याय और ताड़ना का सामना करते हैं, लेकिन चूँकि वे अक्सर पश्चात्ताप करते हैं और बदल जाते हैं, इसलिए सत्य का अनुसरण करने का उनका लक्ष्य वही रहता है, और अंत में उन्हें अच्छा नतीजा और अच्छी फसल मिलेगी। वे अक्सर धिक्कार और अपराधबोध महसूस करते हैं और वे अक्सर अपना रास्ता बदल लेते हैं और पश्चात्ताप करते हैं। यह अच्छी परिघटना है—यह दर्शाता है कि वे पहले से ही सही मार्ग पर हैं और अंततः उन्हें वास्तविक फायदे होंगे। एक बात तो यह है कि उनके भ्रष्ट स्वभाव कुछ हद तक शांत हो गए हैं और परमेश्वर के प्रति उनका विद्रोहीपन कम हो गया है। इससे पहले जब उनका ऐसी चीजों से सामना होता था जो उनकी धारणाओं के अनुरूप नहीं होती थीं तब वे शिकायत करते थे, लेकिन अब वे और शिकायत नहीं करते और सत्य की तलाश कर सकते हैं; वे जानते हैं कि धारणाओं और कल्पनाओं के आधार पर परमेश्वर और परमेश्वर के कार्य से पेश आना बेतुका, बेहूदा और गलत है। इसके अतिरिक्त, जहाँ इससे पहले मुश्किलों से सामना होने पर वे नकारात्मक होते थे, वहीं अब वे और नकारात्मक नहीं होते हैं; वे उनसे सही ढंग से पेश आ सकते हैं और परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण कर सकते हैं। हालाँकि वे कभी-कभी नकारात्मक हो सकते हैं, लेकिन यह उनके कर्तव्य के प्रदर्शन को प्रभावित नहीं करता और वे अपना कर्तव्य करने में समर्पित हो चुके हैं। उनका जमीर उन्हें बताएगा कि ऐसा करना सही है। जब वे इस तरीके से कार्य करेंगे तब उनके दिलों में शांति होगी और दोषारोपण का कोई बोध नहीं होगा और उन्हें यह उत्तरोत्तर महसूस होगा कि यही वह तरीका है जिससे उन्हें कार्य करना चाहिए। वे इस तरीके से जितना ज्यादा अभ्यास करते हैं, उतना ही ज्यादा उन्हें सभी चीजों में सत्य की तलाश और अभ्यास करने का महत्व समझ आता है और उतना ही ज्यादा उन्हें लगता है कि उन्हें सत्य की तलाश करनी चाहिए और सत्य सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास करना चाहिए, कि यह मार्ग सही है और इस तरीके से अभ्यास करने से फायदे मिलते हैं। जब लोगों को ऐसे फायदे मिलते हैं तब वे पाते हैं कि परमेश्वर के साथ उनका रिश्ता बदल रहा है, उनके भीतर का जीवन बदल रहा है और उनके भ्रष्ट स्वभावों की पकड़ उत्तरोत्तर कमजोर पड़ती जा रही है, उन पर ये स्वभाव जो बंधन और अवरोध डालते हैं, वे कम हो रहे हैं; वे यह भी पाते हैं कि सत्य का अनुसरण करने की उनकी इच्छा और उसके लिए उनकी लालसा मजबूत होती जा रही है और सत्य का अभ्यास करने और अपने भ्रष्ट स्वभावों पर विजय पाने की उनकी ताकत भी बढ़ती जा रही है। इस तरीके से लोगों में एक विशेष तरह की भावना उत्पन्न होगी, जो यह है कि उनके लिए भ्रष्ट स्वभावों को छोड़ देने और उद्धार प्राप्त करने की उम्मीद है, वे जिस मार्ग पर चल रहे हैं वह सही है और सत्य स्वीकारना, उसका अभ्यास करना और उसके प्रति समर्पण करना सही है। यही वह रवैया है जो मानवता के जमीर और विवेक वाले लोगों का सत्य के प्रति होता है। जैसे-जैसे लोग धीरे-धीरे सत्य स्वीकारते हैं, उनमें यही अभिव्यक्ति होती है। यह सबसे सामान्य अभिव्यक्ति है। जिन लोगों में यह अभिव्यक्ति नहीं होती, उनका जमीर कोई नियामक भूमिका नहीं निभा सकता है—यह कम-से-कम है। अगर तुममें जमीर है तो तुम्हारा जमीर निश्चित रूप से एक नियामक भूमिका निभाएगा। अगर तुम्हारा जमीर नियामक भूमिका नहीं निभा सकता है तो फिर तुम्हारा वह जमीर, जमीर नहीं है—तुममें जमीर है ही नहीं। अगर लोगों में जमीर है तो वे उचित-अनुचित का भेद पहचान पाएँगे, सकारात्मक चीजों और नकारात्मक चीजों के बीच का भेद पहचान पाएँगे और सकारात्मक चीजें चुनेंगे और नकारात्मक चीजें छोड़ देंगे। अगर लोगों में जमीर है और वे उचित-अनुचित का भेद पहचान सकते हैं तो वे सत्य स्वीकारना, उसका अभ्यास करना, उसके प्रति समर्पण करना और सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना चुनेंगे। अगर वे इस बार सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं तो उनका जमीर उन्हें धिक्कारेगा और अगर वे अगली बार सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं तो उन्हें फिर से धिक्कारा जाएगा। अगर तुममें जमीर का बोध है और तुम सही और गलत में अंतर समझते हो तो बहुत सारे सत्य सुनने के बाद जब तुम बार-बार गलत कर्म करोगे तब तुम्हारा जमीर तुम्हें और भी ज्यादा धिक्कारेगा और दोष देगा और तुम अपने जमीर की भावना के प्रति समर्पण करने और सही चुनाव करने में समर्थ होगे। कुछ लोग कहते हैं, “जब मैं गलत कर्म करता हूँ तब मेरा जमीर भी मुझे धिक्कारता है, लेकिन दस-बीस वर्षों तक धिक्कारे जाने के बाद भी मैं सत्य का अभ्यास करने का चुनाव नहीं करना चाहता।” तो फिर मैं कहता हूँ कि तुम्हारा वह जमीर जमीर है ही नहीं। तुम कहते हो कि तुम अपने जमीर द्वारा धिक्कारे गए महसूस करते हो, लेकिन इतने वर्षों से तुम अपना रास्ता बदलने में या पश्चात्ताप करने में असमर्थ रहे हो और तुम्हारा तथाकथित जमीर तुम्हें नियमित करने में विफल हो गया है ताकि तुम सही मार्ग चुनो। तो फिर तुम्हारा जमीर जमीर नहीं है और तुममें कोई मानवता नहीं है। तुम कहते हो, “मैं जानता हूँ कि क्या सही है और क्या गलत—तुम यह कैसे कह सकते हो कि मुझमें कोई जमीर नहीं है?” इसका सिर्फ यही मतलब हो सकता है कि तुम्हारा दिल बहुत ही ज्यादा अड़ियल है और तुम्हारा जमीर अब और काम नहीं कर रहा है। अगर तुममें सही मायने में मानवता का जमीर है तो जब तुम गलत कर्म करोगे और तुम्हारा जमीर तुम्हें धिक्कारेगा तब तुम्हारी मानवता का झुकाव सकारात्मक की तरफ होगा और तुम्हारा जमीर तुम्हें भीतर से दोष देगा, कहेगा “यह गलत है, इसमें मानवता की बहुत कमी है!” अगर यह तुम्हें हमेशा इसी तरह से धिक्कारता है तो इसकी कोई समझ नहीं होने के लिए तुम्हें किस तरह का व्यक्ति होना पड़ेगा? सिर्फ जमीर रहित लोगों में ही इस समझ की कमी होती है। अगर तुममें सही मायने में जमीर है तो जब तुम्हारा जमीर तुम्हें धिक्कारता है तब क्या तुम अड़ियल बने रह सकते हो? अगर तुम कहते हो, “मुझे दस-बीस वर्षों से धिक्कारा जा रहा है और मैंने विशेष रूप से कुछ महसूस नहीं किया है” तो तुम जमीर वाले व्यक्ति नहीं हो। क्या यह ऐसा नहीं है? (हाँ।) तुममें कोई जमीर नहीं है, लेकिन तुम फिर भी अपने में मानवता होने का दावा करते हो—क्या यह लोगों को धोखा देना नहीं है? अगर तुममें मानवता है तो ऐसा कैसे हो सकता है कि तुममें कोई जमीर न हो? अगर तुममें कोई जमीर नहीं है तो फिर तुममें कोई मानवता भी नहीं है। मानवता नहीं होने का एक संकेत यह है कि व्यक्ति नहीं समझता कि सकारात्मक चीजें क्या होती हैं और नकारात्मक चीजें क्या होती हैं। तुम कहते हो कि तुममें जमीर है, तो फिर तुम उचित-अनुचित का भेद पहचानने में असमर्थ क्यों हो? तुमने बहुत सारे धर्मोपदेश सुने हैं, तो फिर तुम सत्य का अनुसरण करने की लालसा क्यों नहीं करते? तुम कहते हो, “मेरा दिल सत्य का अनुसरण करने का इच्छुक है और सत्य का अभ्यास करने का इच्छुक है”—तो फिर तुमने किन सत्यों का अभ्यास किया है? प्रमाण कहाँ है? अगर तुम्हारा दिल सत्य से प्रेम करता है और सत्य का अनुसरण करने का इच्छुक है तो तुम सत्य का अभ्यास क्यों नहीं करते? क्या यह लोगों को धोखा देना नहीं है? क्या यह किसी धोखेबाज के झूठों जैसा नहीं है? यह ठीक उस बड़े लाल अजगर जैसा है जो हमेशा यह प्रचार करता है कि वह जो कुछ भी करता है वह लोगों की सेवा करने के लिए और उन्हें सुखी जीवन जीने में समर्थ बनाने के लिए है, लेकिन जब लोग परमेश्वर में विश्वास रखते हैं और सही मार्ग पर चलते हैं तब वह उन्हें पागलों की तरह गिरफ्तार करता है और सताता है। वह लोगों को परमेश्वर का अनुसरण करने, सत्य स्वीकारने और उद्धार प्राप्त करने की अनुमति नहीं देता है—वह उन्हें सिर्फ पार्टी का अनुसरण करने और उसके आदेशों को मानने की अनुमति देता है जिससे वे अंत में नरक पहुँच जाते हैं और दंडित किए जाते हैं, जिससे बड़े लाल अजगर को बहुत खुशी मिलती है। तो क्या बड़े लाल अजगर के ये शब्द कि वह “लोगों की सेवा करता है” सच हैं या झूठ? शैतान हमेशा कहता है कि वह जो कुछ भी करता है वह लोगों के फायदे के लिए होता है, लेकिन वह लोगों को सत्य की आपूर्ति नहीं कर सकता और न ही वह लोगों को जीवन में सही मार्ग पर ले जाने के लिए उनका मार्गदर्शन कर सकता है। वह लोगों के मन में सिर्फ पाखंड और भ्रांतियाँ बिठाता है, उन्हें व्यभिचार के जीवन में लिप्त होने, बुराई के मार्ग पर चलने, संसार के पीछे भागने, शोहरत और लाभ के पीछे भागने, एक-दूसरे के खिलाफ लड़ने और एक दूसरे को नुकसान पहुँचाने के लिए मजबूर करता है, वह लोगों को सही मार्ग पर चलने की अनुमति नहीं देता और उन्हें परमेश्वर के पक्ष से छीन ले जाता है। अंत में लोगों को शोहरत और लाभ तो हासिल हो जाता है, लेकिन उनके शरीर और मन पूरी तरह से नष्ट हो जाते हैं; वे शैतान के पाखंडों और भ्रांतियों से भर जाते हैं, परमेश्वर उनके दिल में मौजूद नहीं होता और वे यह विश्वास अब और नहीं करते कि मानवजाति को परमेश्वर ने बनाया। वे परमेश्वर को नकारना शुरू कर देते हैं और उसके प्रति शत्रुतापूर्ण हो जाते हैं। क्या शैतान यह मनुष्य के फायदे के लिए कर रहा है? क्या यह लोगों को नुकसान पहुँचाना और बरबाद करना नहीं है? फिर भी जो लोग उचित-अनुचित का भेद पहचानने में समर्थ नहीं हैं, वे इन चीजों की असलियत नहीं देख पाते हैं।
कुछ लोग कहते हैं, “मुझमें मानवता है और मैं उचित-अनुचित का भेद पहचान सकता हूँ और ज्यादातर लोगों की तुलना में मुझमें ज्यादा जमीर है।” तो फिर आज संगति की गई विषय-वस्तु से अपनी तुलना करो और देखो कि क्या तुममें जमीर है, क्या तुम सत्य स्वीकार सकते हो और उसका अभ्यास कर सकते हो, क्या जब तुम गलत करते हो तब तुम्हें अफसोस और अपराधबोध महसूस होता है और क्या तुमने सही मायने में पश्चात्ताप किया है और तुम सही मायने में बदल गए हो। अगर तुममें जीवन प्रवेश की ये अभिव्यक्तियाँ नहीं हैं तो यह प्रमाणित करता है कि जब से तुमने परमेश्वर में विश्वास रखना शुरू किया, उसके बाद से बहुत-से धर्मोपदेश सुनने के बावजूद तुम्हारे जमीर ने काम नहीं किया है। तुम्हारे जमीर के काम नहीं करने के पीछे क्या कारण है? सिर्फ एक ही कारण इस समस्या की व्याख्या कर सकता है : तुम एक जमीर रहित व्यक्ति हो। कुछ लोग कहते हैं, “हालाँकि मेरे पास जीवन प्रवेश नहीं है, लेकिन मैं सभी सत्य समझता हूँ।” अगर तुम सत्य समझते हो तो तुम उसका अभ्यास क्यों नहीं करते? तुम्हें अभी तक कोई प्रवेश क्यों नहीं मिला? तुम्हारा आंतरिक जीवन अभी भी क्यों नहीं बदला? तुम सत्य समझते हो, लेकिन उसका अभ्यास नहीं करते—तुम्हारा जमीर कहाँ है? कुछ लोग तो बहस तक करते हैं, “मुझे परमेश्वर में विश्वास रखते हुए बहुत-से वर्ष हो गए हैं। अगर मुझमें कोई जमीर नहीं होता तो क्या मैं इतना ज्यादा त्याग कर सकता था, इतना ज्यादा कष्ट सह सकता था और इतनी बड़ी कीमत चुका सकता था? क्या मैं खुशी से अपना कर्तव्य कर सकता था?” अगर तुम्हारे पास जमीर है तो फिर तुम्हारे द्वारा बहुत-से सत्य सुने जाने के बाद उसका क्या प्रभाव पड़ा है? क्या यह तुम पर अंकुश लगा सकता है ताकि तुम सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य करो? क्या यह तुम्हारे व्यवहार और विचारों को नियंत्रित कर सकता है? तुम बहुत-से वर्षों से धर्मोपदेश सुनते आ रहे हो, तुम बहुत-से सिद्धांत बोल सकते हो, तुमने बहुत कष्ट सहा है और बहुत बड़ी कीमत चुकाई है—तो फिर तुम्हारा जमीर तुम्हारे व्यवहार को नियंत्रित करने, तुमसे सिद्धांतों के अनुसार कार्य करवाने और सिद्धांतों का उल्लंघन करने से रोकने में कोई भूमिका क्यों नहीं निभाता? अगर तुममें बहुत सारा जमीर और मानवता है और तुमने बहुत-से सत्य समझ लिए हैं तो तुम उन्हें व्यवहार में क्यों नहीं ला सकते? तुम कैसे खुलेआम सिद्धांतों का उल्लंघन कर सकते हो और खुलेआम कलीसिया के कार्य में बाधा डाल सकते हो? अगर तुममें जमीर है तो क्या इतने वर्षों तक अपना कर्तव्य करने के बाद तुम्हारा जीवन बदल गया है? तुम नहीं बदले हो और सत्य में तुम्हारा किसी भी तरह का कोई प्रवेश नहीं है; यह दर्शाता है कि तुममें जमीर नहीं है। कुछ लोग कहते हैं, “अगर मेरे पास जमीर नहीं होता तो क्या मैं अपना कर्तव्य कर सकता था?” तुम अपना कर्तव्य नहीं कर रहे हो; तुम श्रम कर रहे हो। श्रम करने के लिए जमीर की जरूरत नहीं होती; जरा-सा प्रयास करना ही पर्याप्त होता है। यह इस कहावत की निश्चित रूप से पुष्टि करता है : जो लोग श्रम करते हैं वे जमीर रहित होते हैं; वे जीवन प्रवेश या सत्य का अनुसरण नहीं करते, वे सिर्फ श्रम करने की इच्छा करते हैं और प्रयास करने के इच्छुक रहते हैं। श्रम करने की क्या विशेषताएँ हैं? कष्ट सहने और कीमत चुकाने का इच्छुक होना, कष्ट सहने और कीमत चुकाने में अपनी खुशी, महत्व का बोध और मूल्य तलाश करना, आशीषों की अपनी इच्छा और परमेश्वर के साथ सौदे करने की अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा करने का प्रयास करना और अपने कष्टों और बलिदान के बदले आशीषें पाने का प्रयास करना। अगर तुम उनसे कार्य में प्रयास करने, कष्ट सहने और कीमत चुकाने को कहते हो तो उनमें इसके लिए बहुत सारा जोश होता है; लेकिन अगर तुम उनसे सिद्धांतों के अनुसार कार्य करने और सत्य का अभ्यास करने को कहते हो तो वे उदासीन और हैरान हो जाते हैं और उन्हें नहीं पता होता कि अभ्यास कैसे करना है। कुछ लोग तो यह तक महसूस करते हैं कि उन्हें मुश्किल परिस्थिति में डाल दिया गया है, और वे सोचते हैं, “अगर तुम मुझसे प्रयास करने, कष्ट सहने और कीमत चुकाने को कहते हो तो कोई बात नहीं। मैं किसी भी मात्रा में कष्ट सह सकता हूँ और चाहे मैं कितना भी थक जाऊँ, मैं शिकायत नहीं करूँगा। लेकिन मुझे सिद्धांतों के अनुसार कार्य करने के लिए कहना—क्या यह मेरे लिए चीजों को मुश्किल बनाना नहीं है? प्रयास करना, बिना किसी शिकायत के कष्ट सहना और कीमत चुकाना पहले से ही काफी अच्छा है—फिर भी तुम मुझसे सिद्धांतों के अनुसार कार्य करने की अपेक्षा क्यों करते हो? लोगों से तुम्हारी माँगें बहुत ही ज्यादा हैं! लोग जिस भी तरीके से चीजें करना चाहते हैं उन्हें करने दो; अगर कार्य पूरा हो जाता है, तो यह काफी है। अगर यह अच्छी तरह से नहीं किया जाता है तो इसे समय के साथ ठीक किया ही जा सकता है!” वे बस श्रम करने के इच्छुक होते हैं और श्रम करते समय वे बहुत ऊर्जावान होते हैं, लेकिन जब सत्य का अभ्यास करने की बात आती है तब वे उदासीन हो जाते हैं और जब जीवन प्रवेश की बात आती है तब तो वे और भी उलझन में पड़ जाते हैं। लेकिन फिर भी वे सोचते हैं कि वे अच्छे लोग हैं। वे अक्सर कहते हैं, “मैं जमीर वाला व्यक्ति हूँ और मैं दयालु हूँ। मैं अपनी सारी ऊर्जा अपना कर्तव्य करने में लगा देता हूँ और मैं कभी भी खुद को रोककर नहीं रखता। मैं परमेश्वर के लिए खुद को खपाने के लिए अपने परिवार और करियर को छोड़ सकता हूँ। मैं इतना प्रेरित कैसे हो सकता हूँ? मैं स्वाभाविक रूप से एक अच्छा व्यक्ति हूँ!” दरअसल, वह कोई सत्य नहीं समझता है, सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य तो और भी कम कर सकता है। वह सिर्फ पशुबल का उपयोग करना जानता है, लेकिन फिर भी वह यही समझता है कि वह अच्छा है। इस चरण में भी उसके जमीर और विवेक में कोई भावना नहीं है। अगर सही मायने में तुम्हारे पास जमीर होता तो तुम ऐसी टेढ़ी-मेढ़ी दलीलें कैसे दे सकते थे? तुम्हारे पास सत्य की शुद्ध समझ कैसे नहीं हो सकती थी? अगर तुम्हारे पास जमीर और मानवता होती तो तुम परमेश्वर के वचनों को, लोगों के लिए परमेश्वर की अपेक्षित कसौटियों को और तुम जो भी चीज करते हो उस हर चीज में किन सिद्धांतों का पालन किया जाना चाहिए उसको, ध्यान से कैसे नहीं सुन सकते थे? अगर तुम सुनते तो हो लेकिन समझते नहीं हो और सत्य के प्रति सुन्न हो तो तुम जमीर और मानवता रहित व्यक्ति हो। क्या तुम्हें लगता है कि तुम सत्य और जीवन के लिए, उद्धार के लिए अपने पाशविक परिश्रम की अदला-बदली कर सकते हो? यह असंभव है; वह मार्ग कारगर नहीं है। अगर तुम प्रयास करने और ईमानदारी से परिश्रम करने के इच्छुक हो, थोड़ा कष्ट सह सकते हो और लोगों की नजरों में तुम कुछ हद तक समर्पित हो, तो भी यह कहना मुश्किल है कि तुम अंत तक समर्पित रह सकोगे या नहीं। यह नहीं कहा जा सकता कि कब तुम्हारी पाशविक प्रकृति भड़क उठेगी और तुम परेशानी खड़ी कर दोगे, गड़बड़ियाँ और विघ्न-बाधाएँ उत्पन्न करोगे और फिर तुम्हें दूर करना पड़ेगा। क्या हाल ही में कलीसिया से कुछ लोगों को दूर नहीं कर दिया गया? ऐसे लोग बहुत ही सुखद लगने वाले शब्द बोलते हैं और जो कोई भी उन्हें सुनता है, उसे लगता है कि वे सत्य समझते हैं, लेकिन वे सत्य का अभ्यास करते ही नहीं हैं। वे सुखद लगने वाली चीजें कहते हैं, लेकिन वास्तविक कार्य नहीं करते हैं। वे खुद को न सिर्फ लोगों के खिलाफ, बल्कि परमेश्वर के घर के खिलाफ भी खड़े कर लेते हैं। क्या यह परमेश्वर का प्रतिरोध करना नहीं है? क्या परमेश्वर का घर उन्हें जगह दे सकता है? अगर वे अपना कर्तव्य करने के इच्छुक हैं तो उन्हें इसे आज्ञा और नियमों का पालन करते हुए करना चाहिए, लेकिन वे ऐसा नहीं करते हैं। वे प्रभारी बनने और शक्ति रखने का प्रयास करते हैं और यहाँ तक कि वे विघ्न-बाधाएँ और विनाश भी उत्पन्न करते हैं। वे किस हद तक विघ्न-बाधाएँ उत्पन्न करते हैं? जब मैं कुछ कर रहा होता हूँ तब भी वे दखलंदाजी करने, किसी न किसी चीज की आलोचना करने, रुकावट और व्यवधान डालने का प्रयास करते हैं। वे मेरे क्रियाकलापों में व्यवधान डालने का प्रयास करते हैं—क्या मैं उनके प्रति दया दिखा सकता हूँ? अगर तुम सिर्फ मेरे निजी जीवन में व्यवधान डाल रहे होते तो मैं तुम्हें एक तरफ कर सकता था और अनदेखा कर सकता था, लेकिन मैं परमेश्वर के घर में कार्य कर रहा हूँ, परमेश्वर के चुने हुए लोगों के लिए कुछ वास्तविक कार्य कर रहा हूँ और फिर भी तुम उसमें व्यवधान डालने और उसे कमजोर करने का प्रयास करते हो। यहाँ क्या समस्या है? ऐसे व्यक्ति के साथ क्या किया जाना चाहिए? (उसे दूर कर दिया जाना चाहिए।) परमेश्वर के घर में लोगों को सँभालने के लिए कुछ सिद्धांत हैं और ऐसे लोगों को दूर कर दिया जाना चाहिए। कुछ लोग कहते हैं, “मेरे साथ अन्याय हुआ है! मुझे नहीं पता था कि इससे तुम्हें ठेस पहुँचेगी। मुझे नहीं पता था कि मैं ऊपरवाले की अवज्ञा कर रहा हूँ और परमेश्वर की अवज्ञा कर रहा हूँ। मैंने जानबूझकर ऐसा नहीं किया।” यह तथ्य कि तुम ऐसा कर सके दर्शाता है कि तुम जानबूझकर ऐसा कर रहे थे। तुम कितने वर्षों से धर्मोपदेश सुनते आ रहे हो? क्या तुममें जमीर है—क्या तुममें मानवता है? अगर तुम मनुष्य होते, अगर तुममें मानवता होती और तुम्हारे पास जमीर और विवेक होता तो तुम ऐसी चीजें नहीं करते, वह चाहे जानबूझकर हो या अनजाने में। मैं कार्य कर रहा हूँ और वे जानबूझकर उसमें व्यवधान डालते हैं और उसे कमजोर करने का प्रयास करते हैं। क्या वे मनुष्य हैं भी? क्या वे दानव नहीं हैं? अगर लोगों में सही मायने में जमीर और विवेक है और सही मायने में मानवता है तो भले ही यह कोई साधारण व्यक्ति ही कुछ कर रहा हो, जब तक वह चीज कलीसिया के कार्य के लिए और भाई-बहनों के लिए फायदेमंद है तब तक वे जानते हैं कि उन्हें उसे बनाए रखना चाहिए और उसे कमजोर नहीं करना चाहिए और तब की बात तो छोड़ ही दो जब वह कोई ऐसी चीज है जिस पर मैं व्यक्तिगत रूप से ध्यान दे रहा हूँ। फिर भी वे व्यवधान उत्पन्न करने पर और उसे नुकसान पहुँचाने का प्रयास करने पर अड़ जाते हैं और उन्हें कोई नहीं रोक सकता। वे पक्के दानव बन गए हैं, है ना? मैं कहता हूँ कि ऐसे चरित्रों के बुरे कर्म गंभीर हैं—हमें उनके साथ नरमी नहीं बरतनी चाहिए; परमेश्वर के घर में लोगों को सँभालने के लिए सिद्धांत हैं और उन्हें बाहर निकालकर सँभाला जाना चाहिए। क्या यह उनसे पेश आने का उचित तरीका है? (हाँ।) वे अगर सिर्फ उनके रोजमर्रा के जीवन में अपनी निजी पसंदों का पालन करते हैं तो यह स्वीकार्य है। उदाहरण के लिए, हो सकता है कि मैं कहूँ, “मुझे नूडल्स खाना पसंद है,” जिस पर वे कहते हैं, “मुझे नूडल्स खाना पसंद नहीं है। जब मैं खाना बनाऊँगा तब तुम्हारे लिए नूडल्स बनाऊँगा और अपने लिए चावल बनाऊँगा।” यह मामला कलीसिया के कार्य से संबंधित नहीं है और न ही यह सत्य सिद्धांतों से संबंधित है, फिर व्यक्ति की मानवता या जमीर से तो यह और भी कम संबंधित है। यहाँ तुम्हारी व्यक्तिगत पसंद का पालन करना ठीक है, लेकिन जब कलीसिया के कार्य से संबंधित मामलों की बात आती है तब यह स्वीकार्य नहीं है। अगर तुम लापरवाही से गलत कर्म करते हो और गड़बड़ियाँ और विघ्न-बाधाएँ उत्पन्न करते हो तो तुम प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन कर रहे हो। किस तरह का व्यक्ति प्रशासनिक आदेशों का बेशर्मी से उल्लंघन कर सकता है? किस तरह का व्यक्ति खुलेआम सत्य और परमेश्वर के घर की अवज्ञा कर सकता है? (दानव।) वे बेवकूफ उलझे हुए लोग और दरिंदे इस तरीके से अवज्ञा कर सकते हैं और व्यवधान उत्पन्न कर सकते हैं, और दानव तो ऐसा करने में और भी ज्यादा सक्षम हैं। परमेश्वर का घर चाहे कुछ भी करे, दानव हमेशा उसमें व्यवधान डालने का प्रयास करते हैं—वे नतीजों की परवाह किए बिना विघ्न-बाधाएँ उत्पन्न करते हैं मानो वे आत्माओं के कब्जे में हों। वे इस हद तक व्यवधान डाल सकते हैं और फिर भी उन्हें इसका एहसास नहीं होता, उन्हें अभी भी यही लगता है कि उन्होंने कोई व्यवधान नहीं डाला है, वे पूरी तरह से मासूम हैं, और यहाँ तक कि वे अपना बचाव भी करते हैं। ऐसे लोगों के साथ किसी भी चीज की संगति करने की जरूरत नहीं है; बस उन्हें बाहर निकाल देना ही सही काम है। इस तरह के लोग, जिनमें मानवता का कोई जमीर और विवेक नहीं होता, पक्के दानव होते हैं; वे कभी नहीं बदलेंगे। तुमसे सत्य का अनुसरण करने की अपेक्षा नहीं की जाती है और न ही तुमसे सभी चीजों में सत्य का अभ्यास करने की अपेक्षा की जाती है, लेकिन कम-से-कम तुम्हें नियमों का पालन करना तो आना ही चाहिए। अगर तुम नियम तक नहीं समझते और तुम परमेश्वर के घर के प्रशासनिक आदेश नहीं समझते और जब तुम प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन करते हो तब तुम्हें पता तक नहीं चलता तो क्या तुममें मानवता है? तुममें कोई मानवता नहीं है; तुम दानव हो। जब दानव बुराई करते हैं तब वे खुद को रोक नहीं सकते। परमेश्वर के प्रति उनका प्रतिरोध, उनके द्वारा परमेश्वर की आलोचना और परमेश्वर के खिलाफ उनकी ईश-निंदा उनकी प्रकृति के स्वाभाविक प्रकाशन हैं। वे किसी के द्वारा उकसाए या शिक्षित किए, बिना ही, स्वाभाविक रूप से इस तरह की बुराई कर सकते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि उनकी शैतानी प्रकृति उन पर हावी रहती है।
आज हमने उचित-अनुचित का भेद पहचानने के मुद्दे पर संगति की, जो लोगों के जमीर और विवेक का हिस्सा है। इस संगति के जरिए क्या तुम लोग अब इस पहलू को स्पष्ट रूप से देख रहे हो? एक सच्चे मनुष्य में जमीर होता है और वह उचित-अनुचित का भेद पहचान सकता है; उसका जमीर काम कर रहा है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि किन व्यक्तियों, घटनाओं या चीजों से उसका सामना होता है और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कौन-से मुद्दे उत्पन्न होते हैं, उसका जमीर कम-से-कम बचाव की पहली पंक्ति तो होती ही है। एक बात तो यह है कि तुम्हारा जमीर तुम्हें इन चीजों के बारे में राय बनाने और उनका भेद पहचानने में मदद करेगा कि कौन-सी चीजें सकारात्मक हैं और कौन-सी नकारात्मक; दूसरी बात यह है कि यह तुम्हें अपने आगे के मार्ग का मूल्यांकन और जाँच करने में मदद कर सकता है ताकि तुम स्व-आचरण के न्यूनतम मानकों से नीचे न गिरो, और अंततः यह तुम्हें लाभ-हानि का मूल्यांकन करने और सही मार्ग चुनने में मदद करेगा। बेशक, जो लोग सत्य समझते हैं या जिन्हें परमेश्वर में विश्वास रखते हुए बहुत-से वर्ष हो चुके हैं और जिनके विश्वास में एक मजबूत नींव है, वे अपने जमीर के प्रभाव में अंततः सकारात्मक चीजें चुनेंगे और सत्य की तलाश करना और सत्य स्वीकारना चुनेंगे। इसलिए, मानवता में जमीर एक प्रमुख भूमिका निभाता है; यह लोगों को सही मार्ग की तरफ ले जाने में मार्गदर्शन करने और लोगों को नियमित करने की भूमिका निभाता है ताकि वे सकारात्मक चीजों का चयन करें। अगर किसी व्यक्ति में जमीर नहीं है तो यह कहने की जरूरत ही नहीं है कि वह न सिर्फ सकारात्मक चीजें और सही मार्ग चुनने में असमर्थ होगा, बल्कि वह जो कुछ भी करेगा, उसमें जमीर के न्यूनतम अंकुश और नियमन की कमी होगी। ऐसा व्यक्ति बड़े संकट में है; उसके बुराई करने और परमेश्वर का प्रतिरोध करने की बहुत संभावना है। अगर वह किसी पशु से पुनर्जन्म लिया हुआ है तो हो सकता है कि वह ऐसी चीजें करे जो दुष्ट राक्षस करते हैं, और जो लोग दुष्ट राक्षस और दानव हैं, वे और भी बड़ी बुराइयाँ कर सकते हैं, जो बहुत भयावह है। इसलिए जमीर होना बहुत महत्वपूर्ण है। क्या यह स्पष्ट है? (हाँ।) अगर किसी व्यक्ति में अपने व्यवहार को नियमित करने और सही मार्ग पर चलने के लिए मार्गदर्शन करने के लिए कोई जमीर नहीं है तो उसके द्वारा चुना गया मार्ग अनिवार्य रूप से गलत मार्ग होगा और वह जो करेगा वह नकारात्मक चीजें होंगी—इसके नतीजों की कल्पना भी नहीं की जा सकती। अगर वह बेशर्मी से सत्य का और चीजों के विकास के नियमों का उल्लंघन कर सकता है और लापरवाही से ईश-निंदा कर सकता है, सत्य के बारे में और परमेश्वर द्वारा किए जाने वाले सभी कार्यों के बारे में राय बना सकता है, यहाँ तक कि खुलेआम परमेश्वर का प्रतिरोध भी कर सकता है और परमेश्वर के प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन भी कर सकता है और दुस्साहसपूर्वक परमेश्वर को कोस सकता है, उसकी निंदा कर सकता है और ईश-निंदा कर सकता है तो वह बिल्कुल दानवों और शैतान के समान है। वह वे सारी बुराइयाँ कर सकता है जो दानव और शैतान कर सकते हैं, वे सारी चीजें कर सकता है जो दानव और शैतान कर सकते हैं और वे सारी भ्रांतियाँ, पाखंड और टेढ़ी-मेढ़ी दलीलें कह सकता है जो दानव और शैतान कह सकते हैं। ये लोग सच्चे अर्थों में दानव और शैतान हैं।
आज की संगति से तुम लोगों को क्या समझ आया है? (मैं समझ गया हूँ कि मानवता वाले लोगों में जमीर और विवेक होता है और वे उचित-अनुचित का भेद पहचान सकते हैं। उचित-अनुचित का भेद पहचानने के संबंध में, परमेश्वर ने विभिन्न उदाहरणों का उपयोग करते हुए अत्यंत स्पष्टता से समझाया कि सकारात्मक चीजें और नकारात्मक चीजें क्या होती हैं ताकि जब हमारा सामना चीजों से हो तब हम सटीक फैसले ले सकें और साथ ही अपने अनुसरण के पीछे सही परिप्रेक्ष्य रख सकें—हमें सकारात्मक चीजों की लालसा करनी चाहिए और उनका अनुसरण करना चाहिए और नकारात्मक चीजों से नफरत करनी चाहिए और उन्हें अस्वीकार कर देना चाहिए।) मानवता में जमीर और विवेक किसी व्यक्ति के लिए उद्धार प्राप्त करने की सबसे मूलभूत स्थितियाँ हैं। अगर तुममें ये दो मूलभूत स्थितियाँ हैं, लेकिन तुम सत्य का अनुसरण नहीं करते हो और जो जरा-सा सत्य तुम समझते हो, उसका अभ्यास नहीं करते और अंततः सत्य के प्रति समर्पण प्राप्त नहीं कर सकते तो तुम अभी भी उद्धार प्राप्त करने में असमर्थ रहोगे। जमीर और विवेक उद्धार की सिर्फ मूलभूत शर्तें हैं; जहाँ तक यह प्रश्न है कि तुम किस मार्ग पर चलते हो, यह तुम्हारी अपनी पसंद पर निर्भर करता है। अगर तुम एक ऐसे व्यक्ति हो जिसके पास सही मायने में जमीर और विवेक है तो तुम्हें अपने जमीर के नियमन के तहत, सत्य का अनुसरण करने के मार्ग पर चलना शुरू करने का चुनाव करने का अवसर मिलेगा। अगर तुम्हारा जमीर तुम्हें नियमित करता है और तुम्हारा मार्गदर्शन करता है ताकि तुम सही मार्ग चुनो, लेकिन तुम कष्ट सहने और कीमत चुकाने के इच्छुक नहीं हो, देह के खिलाफ विद्रोह करने और अपने दैहिक स्वार्थों से जुड़ी चीजें छोड़ने के इच्छुक नहीं हो और तुमने सत्य का अनुसरण करने के मार्ग पर चलना शुरू नहीं किया है तो अभी भी तुम्हारे पास उद्धार प्राप्त करने की कोई उम्मीद नहीं होगी। उद्धार प्राप्त करने की उम्मीद, एक बात तो यह है कि सीधे तुम्हारी मानवता के जमीर से संबंधित है; दूसरी बात यह है कि यह सीधे उस कीमत से संबंधित है जो तुम सत्य का अनुसरण करने में चुका सकते हो और यह सीधे सत्य का अभ्यास करने के तुम्हारे दृढ़ संकल्प और इच्छा से भी संबंधित है। जमीर तुम्हें बचाए जाने के लिए सिर्फ एक मूलभूत स्थिति प्रदान करता है और यह तुम्हारे लिए सत्य का अभ्यास करने के बहुत-से अवसर भी उत्पन्न करता है, जिससे तुम्हें अपने जमीर के नियमन के तहत सही मार्ग पर चलने का मौका मिलता है। यानी तुम्हारे सही मार्ग पर चलना शुरू करने की संभावना अपेक्षाकृत ज्यादा होगी और उद्धार प्राप्त करने की तुम्हारी उम्मीद भी अपेक्षाकृत ज्यादा होगी, पचास प्रतिशत से ज्यादा—लेकिन इसकी गारंटी नहीं होगी। इसलिए, अगर तुम्हें यह महसूस हो कि तुममें जमीर और मानवता है तो भी इसे लेकर आत्मतुष्ट मत हो, यह मत सोचो कि सिर्फ जमीर और विवेक होने का मतलब है कि तुम एक अच्छे व्यक्ति हो और उद्धार प्राप्त कर सकते हो, कि यह तुम्हारी मुट्ठी में है। अगर तुम इस तरीके से सोचते हो तो मैं तुम्हें बता दूँ कि इस मामले में तुम्हारी बूझ में विचलन हैं। अगर तुममें जमीर और मानवता है तो यह सिर्फ इस बात की पुष्टि करता है कि तुम वह व्यक्ति हो जिसे परमेश्वर ने चुना है और बुलाया है। लेकिन तुम अंततः उद्धार प्राप्त कर सकते हो या नहीं, इसका सबसे महत्वपूर्ण निर्णायक कारक तुम्हारे अपने अनुसरण में निहित है। भले ही तुम्हारा जमीर आमतौर पर सक्रिय हो, अक्सर तुम्हारे व्यवहार को नियमित करता हो और तुम्हें नियमित करता हो ताकि तुम सही मार्ग चुनो, लेकिन अगर तुम अक्सर अपने जमीर का उल्लंघन करते हो, सही मार्ग नहीं चुनते हो और सत्य का अभ्यास करना नहीं चुनते हो, बल्कि बार-बार अपने व्यक्तिगत स्वार्थों, अपनी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा और गौरव का बचाव करते हो और अक्सर अपनी व्यक्तिगत संभावनाओं, महत्वाकांक्षाओं और इच्छाओं पर विचार करते हो तो अंततः उद्धार प्राप्त करने की तुम्हारी उम्मीद बहुत कम होगी—तुम धीरे-धीरे इसे बरबाद कर चुके होगे। यह बहुत दुखद चीज होगी। तुम समझ रहे हो? (हाँ।) तो ठीक है, आज की हमारी संगति के लिए बस इतना ही। अलविदा!
9 मार्च 2024