565 स्वयं को जान लेने के बाद ही कोई अपने आपसे घृणा कर सकता है

1 क्यों कई लोग अपनी दैहिक प्राथमिकताओं का अनुसरण करते हैं? ऐसा इसलिए है क्योंकि वे स्वयं को बहुत अच्छा मानते हैं; वे सही और न्यायोचित महसूस करते हैं कि उनमें कोई दोष नहीं है, और यहाँ तक कि वे पूरी तरह से सही हैं। इसलिए वे इस धारणा के साथ कार्य करते हैं कि न्याय उनके पक्ष में है। जब कोई यह जान लेता है कि उसकी असली प्रकृति क्या है—कितना कुरूप, कितना घृणित और कितना दयनीय है—तो फिर वह स्वयं पर बहुत गर्व नहीं करता है, उतना बेतहाशा अहंकारी नहीं होता है, और स्वयं से उतना प्रसन्न नहीं होता है जितना वह पहले होता था। ऐसा व्यक्ति महसूस करता है, कि "मुझे अवश्य ईमानदार और सादगीपूर्ण ढंग से परमेश्वर के कुछ वचनों का पालन करना चाहिए। यदि नहीं, तो मैं इंसान होने के स्तर के बराबर नहीं होऊँगा, और परमेश्वर की उपस्थिति में रहने में शर्मिंदा होऊँगा।" तब कोई वास्तव में अपने आप को क्षुद्र के रूप में, वास्तव में महत्वहीन के रूप में देखता है। इस समय, उसके लिए सच्चाई का पालन करना आसान होता है, और वह थोड़ा-थोड़ा ऐसा दिखाई देता है जैसा कि किसी इंसान को होना चाहिए। जब लोग वास्तव में स्वयं से घृणा करते हैं केवल तभी वे शरीर को त्याग पाते है। यदि वे स्वयं से घृणा नहीं करते हैं, तो वे देह को नहीं त्याग पाएँगे।

2 स्वयं से घृणा करने में कुछ चीजों का समावेश है: सबसे पहले, अपने स्वयं के स्वभाव को जानना; और दूसरा, स्वयं को अभावग्रस्त और दयनीय के रूप में समझना, स्वयं को अति तुच्छ और महत्वहीन समझना, और स्वयं की दयनीय और गंदी आत्मा को समझना। जब कोई पूरी तरह से देखता है कि वह वास्तव में क्या है, और यह परिणाम प्राप्त हो जाता है, तब वह स्वयं के बारे में वास्तव में ज्ञान प्राप्त करता है, और ऐसा कहा जा सकता है कि किसी ने अपने आप को पूरी तरह से जान लिया है। केवल तभी कोई स्वयं से वास्तव में घृणा कर सकता है, इतना कि स्वयं को शाप दे, और वास्तव में महसूस करे कि उसे शैतान के द्वारा अत्यधिक गहराई तक भ्रष्ट किया गया है इस तरह से कि वह अब इंसान के समान नहीं है। तब एक दिन, जब मृत्यु का भय दिखाई देगा, तो ऐसा व्यक्ति महसूस करेगा, "यह परमेश्वर की धार्मिक सजा है; परमेश्वर वास्तव में धार्मिक है है; मैं इतना गंदा हूँ कि मुझे परमेश्वर द्वारा मिटा दिया जाना चाहिए, और मेरी जैसी आत्मा पृथ्वी पर रहने के योग्य नहीं है।" इस बिन्दु पर, यह व्यक्ति न तो परमेश्वर के विरुद्ध कोई शिकायत करेगा और न ही उसका विरोध करेगा, परमेश्वर के साथ विश्वासघात तो बिल्कुल नहीं करेगा।

— "मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "स्वयं को जानना मुख्यतः मानव स्वभाव को जानना है" से रूपांतरित

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