564 यह तरीका आत्मचिंतन की कुंजी है

1 आत्म-चिंतन और स्वयं को जानने की कुंजी है: जितना अधिक तुम महसूस करते हो कि तुमने किसी निश्चित क्षेत्र में अच्छा कर लिया है या सही चीज़ को कर लिया है, और जितना अधिक तुम सोचते हो कि तुम परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट कर सकते हो या तुम कुछ क्षेत्रों में शेखी बघारने में सक्षम हो, तो उतना ही अधिक उन क्षेत्रों में अपने आप को जानना तुम्हारे लिए उचित है, और यह देखने के लिए कि तुम में कौन सी अशुद्धियाँ हैं और साथ ही तुममें कौन सी चीजें परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट नहीं कर सकती हैं उतना ही अधिक उनमें गहन परिश्रम करना तुम्हारे लिए उचित है। आओ, एक उदाहरण के रूप में हम पौलुस को लें। पौलुस विशेष रूप से जानकार था, और प्रचार के अपने काम में उसने बहुत कष्ट उठाये थे। बहुत सारे लोगों ने उसका विशेष रूप से सम्मान किया। नतीजतन, बहुत सारा काम पूरा करने के बाद, उसने मान लिया था कि उसके लिए एक अलग मुकुट रखा होगा। इससे वह गलत राह पर बढ़ते-बढ़ते दूर चला गया, और अंत में उसे परमेश्वर ने दंडित किया।

2 पौलुस ने प्रभु यीशु के वचनों में सत्य की खोज करने पर ध्यान केंद्रित नहीं किया था; उसे केवल अपनी धारणाओं और कल्पनाओं पर विश्वास था। उसने सोचा था कि जब तक वह कुछ अच्छा काम करेगा और अच्छे व्यवहार का प्रदर्शन करेगा, तब तक परमेश्वर द्वारा उसकी प्रशंसा की जाएगी और उसे पुरस्कृत किया जाएगा। अंत में, उसकी अपनी धारणाओं और कल्पना ने उसकी आत्मा को अंधा बना दिया और उसके सच्चे चेहरे को ढंक दिया। पौलुस के बारे में यह कहानी उन सभी के लिए चेतावनी का काम करती है जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं, जो है कि जब कभी भी हम महसूस करते हैं कि हमने विशेष रूप से अच्छा किया है, या विश्वास करते हैं कि हम किसी पहलू में विशेष रूप से प्रतिभावान हैं, या सोचते हैं कि किसी संबंध में हमें बदले जाने या हमसे निपटे जाने की आवश्यकता नहीं है, तो हमें उस विशेष संबंध में स्वयं को बेहतर ढंग से जानने और सोच-विचार करने का प्रयास करना चाहिए, यह देखने के लिए कि उनमें वास्तव में ऐसी कोई चीज़ है या नहीं जो परमेश्वर का विरोध करती है।

3 तुम्हारा हर कदम, तुम्हारा हर काम, इस काम को करने की तुम्हारी दिशा और तुम्हारे लक्ष्य, वास्तव में तुम्हारे विचारों और दृष्टिकोणों से पहले ही तय हो चुके हैं। कुछ लोगों ने खुद को बहुत अच्छी तरह छिपा लिया है और तुम उनमें ऐसा कोई बर्ताव नहीं देख पाते जो परमेश्वर का विरोध करता है, न ही वे ऐसी कोई बात कह पाते हैं जो परमेश्वर का विरोध करती है। हालांकि, जो चीज़ें मनुष्य के मस्तिष्क में गहराई तक समायी हैं, परमेश्वर उनसे नफ़रत और घृणा करता है। परमेश्वर इसी को उजागर करना चाहता है और हमें भी इसे ही समझना चाहिये। इसलिए मैं कहता हूँ कि तुम जितना अधिक यह महसूस करते हो कि किसी क्षेत्र में तुम अच्छा कर रहे हो, उस संबंध में जानना तुम्हारे लिये उतना ही अधिक महत्वपूर्ण है और इसलिये तुम्हें अधिक से अधिक सत्य की खोज करनी चाहिए। तभी तुम परमेश्वर द्वारा शुद्ध और पूर्ण किये जा सकते हो।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने पथभ्रष्‍ट विचारों को पहचानकर ही तुम स्‍वयं को जान सकते हो' से रूपांतरित

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