अंतिम दिनों के मसीह के कथन- संकलन

विषय-वस्तु

स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V

परमेश्वर की पवित्रता (II)

सब को शुभ संध्या! (शुभ संध्या सर्वसामर्थी परमेश्वर!) आज, भाइयो और बहनो, आइए हम एक गीत गाएं। जो आपको पसंद हो और आप ने उसे पहले लगातार गाया हो। (हम परमेश्वर के वचन का गीत गाना चाहेंगे “बिना दाग का पवित्र प्रेम”।)

गीत के अंत के बोलः “प्रेम” एक निष्कलंक शुद्ध भावना को दर्शाता है जहां आप अपने दिल को प्रेम करने, अनुभव करने और विचार करने के लिए उपयोग में लाते हैं। प्रेम में कोई शर्त, कोई बाधा और कोई दूरी नहीं होती है। प्रेम में कोई शक नहीं, कोई धोखा नहीं, कोई समझौता नहीं, कोई चालाकी नहीं होती। प्रेम में कोई चुनाव नहीं और कुछ अशुद्धता नहीं होती।

1. यदि आपके पास ऐसा प्रेम है, तो आप न ही धोखा, शिकायत, दगा, बलवा करते, या कुछ लेने या कुछ पाने के लिए एक निश्चित राशि की मांग नहीं करते हैं। यदि आप प्रेम करते हैं, तो खुशी से बलिदान करते हैं।

2. यदि आपके पास ऐसा प्रेम है, तो आप खुशी से कठिनाई में स्थिर रहते और परमेश्वर से सहयोग करते हैं। आप अपना सब कुछ परमेश्वर के लिए दे देंगेः आपका परिवार, आपका भविष्य, आपकी जवानी और आपकी शादी। अन्यथा आपका प्रेम, प्रेम नहीं, पर धोखा और फरेब है।

यह चुनने के लिए अच्छा गीत था। क्या आप यह गीत गाना पसंद करेंगे? (हां) यह गीत गाने के पश्चात् आप क्या महसूस करते हैं? क्या आप इस तरह के प्रेम को अपने भीतर महसूस करने के योग्य हैं? (अभी तक पूर्णतः नहीं)। गीत में से कौन से शब्दों ने आपको भीतर तक हिला दिया? (वे होंगेः प्रेम में और कोई शर्त नहीं, कोई बाधा नहीं, कोई दूरी नहीं होती है)। प्रेम में कोई संदेह, धोखा, समझौता, या कोई चालाकी नहीं होती है। प्रेम में कोई चुनाव नहीं और कुछ अशुद्धता नहीं होती है। परन्तु मैं अपने अंदर अशुद्धता देखता हूं। मैं यह भी देखता हूं कि कहां मैंने परमेश्वर के साथ समझौता किया, किन क्षेत्रों में मैं कम पाया गया, इसलिए जब मैं आज अपने बारे में सोचता हूं तो पाता हूं कि मैंने उस प्रकार का प्रेम अब तक हासिल नहीं किया जो शुद्ध और दागरहित है। आपके पास कैसा प्रेम है? आपके भीतर किस का प्रेम है? (मैं पूर्णतः उस स्तर को खोजने की चाह रखता हूं और तरसता भी हूं।) आपके स्वयं की महत्ता और शब्दों के आधार पर अपने अनुभवों से, आपने कौनसा स्तर प्राप्त किया है? क्या आपके पास धोखा है, क्या आपके पास शिकायतें हैं? (हां) क्या आपके हृदय में मांगे हैं, कुछ चीज़ें हैं जिन्हें आप परमेश्वर से चाहते और इच्छा रखते हैं? (हां, ये मिलावटी चीज़ें हैं) किन परिस्थितियों में वे बाहर आती हैं? (जब परिस्थिति जो परमेश्वर ने मेरे लिए बनाई हैं मेरे ख्यालों से मेल नहीं खाती कि कैसा होना चाहिए, या जब मेरी इच्छा पूरी न हुई हो, तब मैं इस प्रकार का कलुषित स्वभाव दिखाऊंगा।) क्या आप अक्सर यह गीत गाते हैं? क्या आप व्याख्या कर सकेंगे कि आप इसे किस तरह समझते हैं “शुद्ध प्रेम बिना दाग”? और परमेश्वर प्रेम को इस तरह क्यों परिभाषित करते हैं? (मैं सचमुच इस गीत को स्वयं पसंद करता हूं क्योंकि मैं वास्तव में देख सकता हूं कि यह प्रेम एक पूर्ण प्रेम है। हालांकि मैं उस मानक से खुद को बहुत दूर महसूस करता हूं। अभी मैं सत्य की खोज में मात्र उस स्तर पर हूं जहां कि मैं कुछ बातों (चीज़ों) का त्याग (बलिदान) करने का इच्छुक हूं और कुछ खर्च करने को तैयार हूं, पर जैसे ही कुछ मेरे भविष्य और लक्ष्य को प्रभावित करता है, मैं अंतर्द्वंद्व महसूस करता हूं। मैं यह देखता हूं कि मुझे परमेश्वर पर कुछ भरोसा है।) (अब मैं यह महसूस करता हूं कि सच्चे प्रेम को पाने से मैं अब भी काफी दूर हूं, पर कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जहां पर मैं उस तक बढ़ने के काबिल रहा हूं, एक तरीका जो मैं करता हूं कि उस सामर्थ के द्वारा जो परमेश्वर का वचन मुझे देता है और दूसरा तरीका यह कि इन परिस्थितियों में, मैं प्रार्थना के द्वारा परमेश्वर से सहभागिता करता हूं। हालांकि, जब यह अस्तित्व के विषय में मेरे विचारों को शामिल करता है, तो मुझे महसूस होता है कि मैं उन पर विजय नहीं पा सकता।) क्या आपने कभी उन चीज़ों के बारे में सोचा है जो आपको तब रोकती थी जब आप उनपर काबू नहीं कर पा रहे थे? क्या आपने इन विषयों पर आत्मनिरीक्षण किया है? (हां, मैं आत्मनिरीक्षण करता आया हूं और अधिकतर मेरे स्वयं का घमण्ड और गर्व के साथ साथ भविष्य और नियति की अपेक्षाएं मेरे सबसे बड़े व्यवधान हैं) जब आपका भविष्य और नियति की अपेक्षाएं सबसे बड़े व्यवधान हैं, तब क्या आपने कभी सोचा है कि क्यों यह बड़ा अवरोध है? कैसे यह भविष्य और लक्ष्य एक अवरोध बन जाते हैं? आप अपने भविष्य और नियति से क्या चाहते हैं? (मैं इस संदर्भ में पूर्णतः स्पष्ट नहीं हूं, कभी मैं ऐसी परिस्थितियों में आ जाता हूं जहां कि मैं महसूस करता हूं कि मेरा कोई भविष्य या नियति नहीं है या कभी-कभी मैं ऐसा सोचता हूं कि जो परमेश्वर ने मुझ पर प्रगट किया मेरे पास कोई लक्ष्य नहीं है। ऐसे समय में मैं बहुत कमजोर महसूस करता हूं और अनुभव करता हूं कि यह मेरी स्वयं की बड़ी रूकावट बन गई है। हालांकि अनुभव और प्रार्थना के एक समय के बाद परिस्थिति एक घुमाव-बिन्दु तक पहुंच सकती है, परन्तु अभी भी इस विषय में मैं विचलित महसूस करता हूं।) जब आप “भविष्य और नियति” कहते हैं, तब उससे सच में आपका क्या तात्पर्यहै? (इसका मतलब यह है कि जब परमेश्वर ने मेरे लिए कुछ परिस्थितियां निर्मित की हैं, मैं उसकी आवश्यकताओं से बहुत दूर हूं, कभी-कभी मैं सोचता हूं कि परमेश्वर ने मुझ पर यह प्रकाशित किया कि मेरी कुछ नियति या मंज़िल है या नहीं, मैं बहुत कमजोर महसूस करता हूं।) आप वास्तव में क्या कहना चाहते हैं जब आप कहते हैं “भविष्य और नियति”? क्या ऐसा कुछ है जिसकी ओर आप इशारा कर सकें? क्या यह कोई तस्वीर है या कुछ ऐसा जिसकी आपने कल्पना कर ली या ऐसा कुछ है जिसे आप वास्तव में देख सकते हैं? क्या यह वास्तविक वस्तु है? (यह लक्ष्य है।) लक्ष्य क्या है? आपका भविष्य क्या है? आपमें से प्रत्येक को अपने मन में यह सोचना चाहिए कि आपके भविष्य और नियति को लेकर आपके दिल में जो चिंतायें हैं, वे किस ओर इशारा कर रही हैं? (इसे बचाये और जीवित रखना चाहिये और यह आशा रखनी चाहिए कि यह धीरे-धीरे परमेश्वर के उपयोग में लाने के योग्य बन सके और मेरे कर्तव्य को उस स्तर तक पूरा करने की प्रक्रिया में आ सके जहां मेरा कर्तव्य पूरा हो। अक्सर ये बातें परमेश्वर द्वारा प्रगट की जाती हैं और मैं यह सोचता हूं कि मैं अभी उसके योग्य नहीं हूं।) अन्य भाई बहनों को विचार-विमर्श करना चाहिए। आप “बेदाग़ शुद्ध प्रेम” को कैसे समझते हैं? (व्यष्टि स्तर पर कुछ भी अशुद्ध नहीं और वे उनके भविष्य और लक्ष्य द्वारा नियंत्रित नहीं किए जाते हैं। लिहाज़ा, परमेश्वर के बर्ताव से निरपेक्ष, वे पूर्णतः परमेश्वर के कार्यों को मानने के योग्य होते हैं इसके साथ-साथ परमेश्वर के आयोजन के आज्ञाकारी और अंत तक उसका अनुसरण करने वाले होते हैं। केवल इस प्रकार का प्रेम परमेश्वर की नज़र में शुद्ध प्रेम, बिना दाग का है। केवल जब मैं अपने आप की तुलना उससे करता हूं तो यह पाता हूं कि इन कुछ वर्षों में जब से मैंने परमेश्वर पर विश्वास किया है, मुझे सहज तौर पर कुछ वस्तुओं का बलिदान करना पड़ा और कुछ खर्च भी वहन करना होगा, परन्तु मैं वास्तव में परमेश्वर को अपना दिल देने के योग्य नहीं बन सका। जब परमेश्वर मुझे प्रकाशित करते हैं, तो मुझे ऐसा महसूस होता है कि मुझे ऐसा बनाया गया हूं जिसे कभी बचाया नहीं जा सकता और मैं उन्हीं नकारात्मक परिस्थितियों में पड़ा रहता हूं। मैं स्वयं को अपना कर्तव्य निर्वाह करते देखता हूं, परन्तु उसी के साथ साथ मैं परमेश्वर के साथ सौदेबाज़ी करनेकरने का प्रयत्न भी करता हूं, और सम्पूर्ण मन से परमेश्वर से प्रेम करने में असमर्थ रहता हूं और मेरी मंज़िल, मेरा भविष्य और मेरी नियति मेरे मन में हमेशा बने रहते हैं। मुझे याद है कि एक बार व्यक्ति की संगति में यह कहा गया कि हमें परमेश्वर के प्रेम को अपने कर्तव्य को पूरा करते हुए चुकाना चाहिए, प्रेम सच्चे मन से प्रदर्शित किया जाना चाहिए, न कि केवल शब्दों में। मैं इस प्रेम की तुलना में अपने आप को बहुत दूर महसूस करता हूं।)

ऐसा लगता है कि आप इस गीत को अक्सर गा चुके हैं और इसकी कुछ समझ है और इसका आपके वास्तविक अनुभव के साथ कुछ रिश्ता है। हालांकि इस गीत के प्रत्येक पद के साथ लगभग हर एक की स्वीकृति का अलग स्तर है “शुद्ध प्रेम बिना दाग” कुछ लोग इच्छुक हैं, कुछ लोग अपने भविष्य को अलग करने की तलाश में हैं, कुछ लोग अपने परिवार को दरकिनार करने की फिराक में हैं, कुछ लोग कुछ भी पाने की तलाश में नहीं हैं। अभी भी कुछ लोगों को आवश्यकता है कि उनमें धोखा न हो, कोई शिकायत न हो और परमेश्वर के विरुद्ध बलवा न हो। क्यों परमेश्वर इस तरह प्रेम करने की सलाह देना चाहते हैं और यह चाहते हैं कि लोग उनसे इसी तरह से प्रेम करें? क्या यह इस प्रकार का प्रेम है कि लोग इसे प्राप्त कर सकें? कहने का तात्पर्य यह है कि क्या लोग इस प्रकार के प्रेम करने के योग्य हैं? शायद लोग यह देखें कि वे ऐसा प्रेम नहीं कर सकते, क्योंकि क्योंकि उनके पास ऐसा प्रेम है ही नहीं, और जब उनके पास ऐसा प्रेम है ही नहीं जब वे प्रेम के विषय में आधारभूत बातें जानते ही नहीं, तो परमेश्वर ये बातें कहते हैं, जो उनके लिए अनजान हैं। क्योंकि लोग इस दुनिया में रहते हैं, वे अपनी बिगड़ी हुई दशा में जीते हैं, यदि लोगों के पास इस प्रकार का प्रेम होता और यदि कोई अपने में इस प्रकार का प्रेम रख पाता, कि कोई याचना नहीं, कोई मांग नहीं, अपने आप को समर्पित करने के इच्छुक, और दुख सहने को तैयार और जो कुछ उनका अपना है उसे त्याग देने को तैयार, ऐसा व्यक्ति जो इस प्रकार का प्रेम रखता हो, वह अन्य लोगों की नज़रों में कैसा दिखेगा? क्या वह पूर्ण व्यक्ति नहीं होगा? (हां) क्या ऐसा कोई आदर्श व्यक्ति इस जगत में है? वह विद्यमान नहीं है, है क्या? इस प्रकार का कोई व्यक्ति दुनिया में विद्यमान नहीं है, जब तक कि वह शून्यता में न जीता हो, सही है न? इसलिए कुछ लोग अपने अनुभवों के द्वारा जैसा इन शब्दों में विवरण दिया गया है वैसा ही बनने के लिए बहुत मेहनत करते हैं, वे स्वयं से लड़ते हैं, स्वयं पर अंकुश लगाते हैं और स्वयं को लगातार त्यागे या भुलाये रखते हैं: वे दुख सहते और उन गलतफहमियों को जिन में वे पड़े थे, उन्हें छोड़ते हैं। उन तरीकों को छोड़ते हैं जिन के द्वारा वे परमेश्वर से बगावत करते रहे थे। अपनी इच्छाओं और मांग का त्याग करते हैं। परन्तु अंतत:, उन आवश्यकताओं को अभी भी पूर्ण नहीं कर पाते। ऐसा क्यों होता है? परमेश्वर लोगों को ये बातें पालन करने हेतु एक पैमाना प्रदान करने के लिये कहते हैं ताकि लोग जानें कि परमेश्वर लोगों से किस स्तर की मांग करते हैं। पर क्या परमेश्वर ने कभी कहा कि लोगों को यह अभी प्राप्त करना चाहिए? क्या कभी परमेश्वर ने कहा कि इतने समय में लोगों को यह प्राप्त कर लेना चाहिए? (नहीं) क्या कभी परमेश्वर ने कहा कि लोग उसे इस तरह से प्रेम करें? क्या यह अध्याय ऐसा कहता है? नहीं, यह ऐसा नहीं कहता। परमेश्वर लोगों से बस उस “प्रेम” के विषय में बता रहा हैजिसकी वह चर्चा कर रहा था। जहां तक इस बात का प्रश्न है कि लोग परमेश्वर को इस तरह से प्यार करें और परमेश्वर से ऐसे व्यवहार करें, परमेश्वर की मांग क्या हैं? तो यह आवश्यक नहीं कि उन्हें तुरन्त या एकदम अभी पूरा किया जाए क्योंकि लोग ऐसा नहीं कर सकते। क्या आपने कभी सोचा है कि लोगों को इस तरह प्रेम करने के लिए किन परिस्थितियों की आवश्यकता है, यदि लोग इसे बार-बार पढ़ेंगे तो क्या वे धीरे-धीरे इस प्यार को पा लेंगे? (नहीं) तब क्या शर्तें हैं? पहली, लोग परमेश्वर के प्रति अविश्वास से कैसे मुक्त हो सकते हैं? (केवल ईमानदार व्यक्ति ही इसे प्राप्त कर सकते हैं) धोखे से छुटकारे के विषय में क्या किया जाये? (उन्हें भी ईमानदार लोग होना है) एक ऐसा व्यक्ति होना जो परमेश्वर से सौदेबाज़ी न करे? उसे भी एक ईमानदार व्यक्ति होना है। चालाकी न रखने वाले के विषय में क्या? “प्रेम में कोई चुनाव नहीं होता” ऐसा कहने का क्या तात्पर्य है? क्या यह सब एक ईमानदार व्यक्ति होने की तरफ इशारा कर रहे हैं। यहां पर इनकी कई विस्तृत व्याख्याएं हैं; इस प्रकार के प्रेम को लाने के लिए परमेश्वर की योग्यता या इस प्रकार के प्रेम की व्याख्या के लिए परमेश्वर की योग्यता, इसे इस प्रकार कहने से किस बात की पुष्टि होती है? क्या हम कह सकते हैं कि परमेश्वर इस प्रकार का प्रेम रखता है? (हां) इसे कहां आप देखते हैं? (परमेश्वर का मनुष्यों के प्रति प्रेम में)। क्या परमेश्वर का मनुष्यों के लिए प्रेम सशर्त है? (नहीं) क्या परमेश्वर और मनुष्य के मध्य में बाधाएं या दूरियां हैं? (नहीं) क्या परमेश्वर मनुष्यों पर संदेह करता है? (नहीं) परमेश्वर मनुष्यों को देखता है, मनुष्य को समझता है, है न? (हां)। वह सचमुच मनुष्य को समझता है। क्या परमेश्वर मनुष्य के प्रति धोखेबाज़ है? (नहीं) चूंकि परमेश्वर इस प्रेम के विषय में इतनी पूर्णता से कहते हैं, तो क्या उनका हृदय या उनका सार भी इतना ही पूर्ण होगा? क्या लोगों ने प्रेम को कभी इस तरह से परिभाषित किया है? (नहीं। इंसान ने किन परिस्थितियों में प्रेम को परिभाषित किया है? इंसान प्रेम के विषय में क्या कहता है? क्या यह देना अर्पण करना नहीं है? (हां) मनुष्य की प्रेम की परिभाषा सरल है और उसमें तत्व का अभाव है।

परमेश्वर के प्रेम की परिभाषा और जिस तरह से परमेश्वर प्रेम के लिए बोलता है, वे आपस में उसके तत्व के पहलू से सम्बन्धित हैं, पर उसके तत्व के किस पहलू से? पिछली बार हमने एक महत्वपूर्ण विषय पर सहभागिता की थी, यह ऐसा विषय है जिस पर लोगों ने अक्सर चर्चा की है और जिसे आगे लाये हैं, और यह एक शब्द है जो अक्सर परमेश्वर पर विश्वास रखने के वक्त आता है, फिर भी यह एक ऐसा शब्द है जो लोगों में परिचित और अपरिचित दोनों जान पड़ता है, मनुष्य में इसकी परिभाषा बहुत उच्च और निम्न दोनों जान पड़ती हैं, पर ऐसा क्यों है? यह एक ऐसा शब्द है जो मनुष्यों की भाषा से आया है, लोगों में इसकी परिभाषा विशिष्ट भी है और धुंधली भी, लेकिन वह शब्द है क्या? (“पवित्रता”) ओह पवित्रताः यह वह विषय है जिस पर हमने पिछली बार संगति की थी। हमने इस विषय के बारे में कुछ संगति की थी। पर हमारी बात अधूरी थी। पिछली बार हमने जो चर्चा की थी उसके आधार पर क्या किसी ने परमेश्वर की पवित्रता के तत्व के विषय में कोई नई समझ प्राप्त की? (हां) आपके विचार में वह नई समझ क्या थी? यानी उस समझ या उन शब्दों में आपको ऐसा क्या लगा जिससे आपको लगा कि मैंने जो संगति में परमेश्वर की पवित्रता की बात बताई थी, उससे वह भिन्न थी? क्या आपको याद है? क्या उसने कुछ प्रभाव डाला? (परमेश्वर कहता है कि वह जो अपने हृदय में महसूस करता है; वह शुद्ध है। यह पवित्रता का एक पहलू है।) यह उसका एक अंश है, क्या इसमें और कुछ भी जोड़ने को है? (जब परमेश्वर मनुष्य पर क्रोधित होता है तो वहां पवित्रता होती है और यह दाग रहित है।) (मैं परमेश्वर के आधिपत्य में उसकी पूर्णता, उसकी विश्वसनीयता , उसकी बुद्धि और उसकी सब वस्तुओं पर प्रभुता को देखता हूं।मैं इन बातों को समझता हूं।) “सब चीज़ों पर प्रभुता” यह परमेश्वर के अधिकार के विषय में है, अब हम परमेश्वर की पवित्रता के विषय में बात कर रहे हैं। (जहां तक परमेश्वर की पवित्रता की बात है, मैं समझता हूं कि परमेश्वर के क्रोध और दया उनके धर्मी स्वभाव में हैं। इसने मुझ पर बड़ा गहरा प्रभाव डाला है। यह भी बात आती है कि परमेश्वर का धर्मी स्वभाव अनोखा है। पहले मुझे ऐसी समझ नहीं थी या इसकी ऐसी परिभाषा नहीं जानता था। पर अपनी संगति में आपने बताया कि परमेश्वर का क्रोध मनुष्य के गुस्से से अलग है। यह एक ऐसी वस्तु है जो किसी भी सृजन में नहीं है। परमेश्वर का क्रोध एक सकारात्मक बात है और यह सैद्धांतिक है; यह परमेश्वर के अंतर्निहित तत्व द्वारा भेजा जाता है। यह इसलिए है कि वह कुछ नकारात्मक बातें देखता है और इसलिए परमेश्वर अपना क्रोध प्रसारित करते हैं। परमेश्वर की दया में, मैं यह भी देखता हूं कि किसी भी सृजन में इसका अस्तित्व नहीं है। यद्यपि मनुष्य के अच्छे कार्य या धार्मिक कार्य दया के समान माने जाते हैं, पर वे अशुद्ध हैं और उनके पास कुछ भी उद्देश्य नहीं है। कुछ प्रकार की तथाकथित दया नकली और खोखली है। परन्तु मैं ने परमेश्वर के उद्धार को देखा है, वह लोगों पर अपनी दया दिखाते हैं, और यह दया मनुष्य को सीधे उद्धार की राह में ले आती है। यह लोगों को परमेश्वर पर विश्वास करने के पथ पर ले आती है ताकि वे सुन्दर लक्ष्य और आशा को प्राप्त करें। इसलिए परमेश्वर की पवित्रता उनके तत्व में बसती है। इसी कारण, यदि परमेश्वर अपने क्रोध से एक नगर का नाश भी कर देता, क्योंकि उसके पास अनुग्रहकारी तत्व है, वह उस शहर के लोगों को बचाने और सुरक्षित रखने में किसी भी समय या किसी भी स्थान पर अपनी दया दिखा सकता है। यह मेरी समझ है।) आपके पास परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव की कुछ समझ है।

जब मैंने अभी आपसे कुछ प्रश्न पूछे तो आप में से बहुतों ने यह मान लिया कि परमेश्वर का प्रेम महान और सच्चा है, परन्तु आप में परमेश्वर के पवित्र तत्व के ज्ञान की कमी है। हमारे वर्तमान विषय पर मैं इस विषय पर चर्चा करूंगा, जो परमेश्वर की पवित्रता का ज्ञान है। लोग अक्सर परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव को उसकी पवित्रता के साथ जोड‌ देते हैं और वे सब जानते हैं और उनकी धार्मिक स्वभावके विषय में कुछ विस्तार से सुना है। और तो और, कई लोग अक्सर परमेश्वर की पवित्रता और उनके धार्मिक स्वभाव को अपनी संगति में यह कहते हुए जोड़ते हैं कि परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव पवित्र है। हर कोई “पवित्र” शब्द से अच्छी तरह परिचित है और यह आमतौर पर उपयोग किया जाने वाला शब्द है, परन्तु उस शब्द के गुणार्थों के सम्बन्ध में, परमेश्वर की पवित्रता की किन अभिव्यक्तियों को लोग देख पाने के योग्य हैं? परमेश्वर ने ऐसा क्या प्रकाशित किया है जिसे लोग मान सकें? मैं सोचता हूँ कि यह कुछ ऐसा है जिसे कोई नहीं जानता। हम कहते हैं कि परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव है, परन्तु यदि आप परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव को लेकर यह कहते हैं कि यह पवित्र है, यह कुछ अस्पष्ट मालूम पड़ता है, थोड़ा संशय में डालने वाला, ऐसा क्यों है? आप कहते हैं कि परमेश्वर का स्वभाव धार्मिक है, या आप कहते हैं कि उनका धार्मिक स्वभाव पवित्र है तो अपने मनों में आप परमेश्वर की पवित्रता को कैसे चित्रित करते हैं? आप उसे कैसे समझते हैं? कहने का तात्पर्य यह कि परमेश्वर ने क्या प्रगट किया या कि परमेश्वर के पास क्या है और क्या वे लोग उसे पवित्र मानेंगे? क्या आपने इस के बारे में पहले सोचा था? मैंने यह देखा है कि लोग सामान्य तौर से उपयोग में लाए जाने वाले शब्द कहते या उन मुहावरों को बोलते हैं जो बार-बार दोहराए जाते हैं, फिर भी वे यह नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं? यह ठीक वैसे ही है जैसे कोई कहता है, और वे आदत के अनुसार यह कहते हैं, और यह एक मुहावरा बन जाता है। यद्यपि यदि उन्हें इस बात को खोजना और वास्तव में अध्ययन करना होता, वे यह पाते कि उसकी पवित्रता के सम्बन्ध में वास्तविक अर्थ क्या है या यह किसकेविषय में है। “पवित्र” शब्द की ही तरह, कोई नहीं जानता कि परमेश्वर की पवित्रता के विषय में परमेश्वर के किस पहलू को की बात की जा रही है। जहां तक “पवित्र” शब्द से परमेश्वर के साथ सामंजस्य की बात है, कोई भी नहीं जानता और लोगों के हृदय संशय में हैं और वे इस बात में खुलें हैं कि वे परमेश्वर को पवित्र कैसे मानते हैं। परन्तु जब आप इसकी गहराई में जाते हैं तब परमेश्वर कैसे पवित्र है? क्या कोई जानता है? मैं सोचता हूं कि कोई इस विषय पर पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। आज हम “पवित्र” शब्द का परमेश्वर के साथ सामंजस्य विषय पर चर्चा करेंगे कि ताकि लोग परमेश्वर की पवित्रता के सार के वास्तविक अंश को देख सके, इस से कुछ लोगों को आदतानुसार लापरवाही से शब्द का प्रयोग करने और उन बातों को अंधाधुंध तरीके से कहने से रोका जा सकेगा जिसके बारे में जानते ही नहीं कि वे क्या कह रहे हैं या नहीं समझते कि वे सही और परिशुद्ध हैं या नहीं। लोग हमेशा इस तरह कहते हैं, आपने यह कहा है, मैंने यह कहा, है और यह कहने का एक तरीका बन गया है और लोगों ने इस तरह “पवित्र” शब्द को अनजाने में कलंकित कर दिया है।

“पवित्र” शब्द, सतही तौर पर समझने के लिए बहुत आसान जान पड़ता है, है न? सबसे निचले स्तर पर, लोग “पवित्र” शब्द का अर्थ साफ, मैलरहित, पावन और शुद्ध के रूप में मानते हैं, जैसा कि हमने गीत में अभी गाया, “शुद्ध प्रेम बिना दाग” जहां “पवित्रता” और “प्रेम” दोनों एक साथ रखे गए हैं, जो कि सही है; यह इसका ही भाग है, परमेश्वर का प्रेम उनके तत्व का भाग है, परन्तु यह इसकी पूर्णता नहीं है, जहां तक लोगों का दृष्टिकोण है, वे शब्द को देखते और उसे उन बातों के साथ संगठित करने का प्रयास करते हैं जिन्हें वे स्वयं के नज़रिए से शुद्ध और साफ देखते हैं या वे बातें जिन्हें वे व्यक्तिगत तौर पर सोचते हैं कि वे मैली नहीं हैं और निष्कलंक हैं। उदाहरण के लिए, कुछ लोग कहते हैं कि कमल का फूल साफ है, लोग कैसे कमल के फूल को इस तरह परिभाषित कर सके? (“कमल का फूल कीचड़ में खिलता है फिर भी निष्कलंक है।”) यह गंदे पानी में निष्कलंक खिलता है, इसलिए लोग कमल के फूल के लिए “पवित्र” शब्द लगाने लगे। कुछ लोगों ने प्रेम कथाएं जो दूसरों के द्वारा लिखी गई थी, देखा और उनका सार “पवित्र” जैसा माना या घड़े गये नायकों को पवित्र देखा। इसके अलावा, कुछ ने बाइबिल या अन्य आध्यात्मिक पुस्तक के लोगों को संत या देवदूत मान लिया जिन्होंने परमेश्वर द्वारा किये जा रहे कार्य के दौरान उनकी आज्ञा का पालन किया और जिन्हें पवित्र अनुभव हुए। ये सब वे बातें हैं जो लोगों ने धारण कर लीं और ये अवधारणाएं लोगों द्वारा अपना ली गई लोग ऐसी अवधारणा क्यों रखते हैं? इसका एक कारण है और यह बहुत सरल हैः यह इसलिए है कि लोग गलत स्वभाव के मध्य जीते और एक बुरे और गंदे जगत में रहते हैं। वे जो कुछ देखते हैं, वे जो कुछ छूते हैं, वे जो कुछ अनुभव करते हैं, वह शैतान की बुराई और शैतान का भ्रष्टाचार है, कुचक्र, अंतर्कलह और युद्ध होते हैं, जो शैतान के प्रभाव में होते हैं। इसी कारण, जब कभी परमेश्वर लोगों के मध्य में अपना कार्य करते हैं, या जब कभी परमेश्वर लोगों से बात करते हैं और उनके द्वारा अपना स्वभाव और तत्व लोगों पर प्रदर्शित किया जा जाता है, तब लोग यह देख पाने या ग्रहण करने के योग्य नहीं होते कि पवित्रता क्या है। और यही कारण है कि ये लोग कहते हैं कि परमेश्वर पवित्र हैं। क्योंकि लोग गंदगी, भ्रष्टाचार और शैतान के अधीन रहते हैं, वे प्रकाश को नहीं देखते, सकारात्मक बातों और चीज़ों को नहीं जानते, और यहां तक कि वे सत्य को भी नहीं जानते हैं। इसलिए, कोई वास्तविक रूप से नहीं जानता कि पवित्रता क्या है। यह कहने के बाद, क्या कोई पवित्र वस्तु या पवित्र जन इस भ्रष्ट मानवजाति में पाया है? (नहीं) हम निश्चित रूप से कह सकते हैं कि नहीं है, क्योंकि केवल परमेश्वर का तत्व पवित्र है। परमेश्वर के तत्व की पवित्रता के सम्बन्ध में, पिछली बार हमने संगति में इसके विषय में थोड़ा-बहुत परमेश्वर की पवित्रता को लोगों के ज्ञान की प्रेरणा के तौर पर प्रस्तुत किया था। परन्तु यह पर्याप्त नहीं है। परमेश्वर की पवित्रता को जानने के लिए यह लोगों की पूरी तरह से मदद नहीं कर सकता और न यह समझने में मदद कर सकता कि परमेश्वर की पवित्रता अनोखी है। इसके अलावा, यह पर्याप्त मात्रा में लोगों को पवित्रता के सच्चे अर्थ के पहलू को ,जो पूर्णतया परमेश्वर के अंर्तनिहित है, समझने की अनुमति नहीं दे सकता। इसलिए यह आवश्यक है कि हम इस विषय में अपनी संगति को जारी रखें। हमारी संगति के तीसरे भाग में हमने तीन शीर्षकों पर चर्चा की, इसलिए हमें चौथे शीर्षक पर अब बातचीत करनी चाहिए और हम पवित्रशास्त्र पढ़ना प्रारम्भ करेंगे।

4. शैतान के प्रलोभन

(मत्ती 4:1-4) तब आत्मा यीशु को जंगल में ले गया ताकि इबलीस् से उसकी परीक्षा हो। वह चालीस दिन और चालीस रात निराहार रहा, तब उसे भूख लगी। तब परखने वाले ने पास आकर उससे कहा, “यदि तू परमेश्वर का पुत्र है, तो कह दे, कि ये पत्थर रोटियां बन जाए, यीशु ने उस को उत्तर दिया, ‘लिखा है कि मनुष्य केवल रोटी ही से नहीं, परन्तु हर एक वचन से जो परमेश्वर के मुख से निकलता है, जीवित रहेगा’।”

ये वे शब्द हैं जिनसे शैतान ने प्रभु यीशु की परीक्षा करने की कोशिश की। इबलीस् ने जो कहा उसकी भावना क्या है? आगे बढ़कर इसे पढ़ो, (“यदि तू परमेश्वर का पुत्र है, तो कह दे कि ये पत्थर रोटियां बन जाएं”) शैतान ने ये शब्द कहे, जो कि बिल्कुल साधारण हैं। परन्तु क्या इन शब्दों के आवश्यक भाव के साथ एक समस्या है? (हां) क्या समस्या है? उसने कहा, “यदि तू परमेश्वर का पुत्र है,” तो अपने मन में क्या वह जानता था कि वह परमेश्वर का पुत्र है? क्या वह जानता था कि वह यीशु है? (हां)। तो उसने क्यों कहा “यदि तू”? (वह प्रभु की परीक्षा लेने का प्रयत्न कर रहा था) हां, सचमुच वह परमेश्वर की परीक्षा लेने की कोशिश कर रहा था। पर उसके ऐसा करने का मकसद क्या था? उसने कहा, “यदि तू परमेश्वर का पुत्र है।” अपने हृदय में वह जानता था कि यीशु मसीह परमेश्वर का पुत्र है। यह उसके मन में बिल्कुल स्पष्ट था, पर इसके बावजूद, क्या उसने अपना समर्पण किया या उसने अपनी आराधना की? (नहीं) वह क्या करना चाहता था? वह यह करना और ये शब्द कहना चाह रहा था ताकि यीशु मसीह क्रोध करे और अपने प्रलोभन में फंसा ले और यीशु मसीह को अपने सोचे हुए तरीके के अनुसार काम करवाकर अपने फंदे में फंसा ले। क्या इसका मतलब यह नहीं था? उसका मन साफ जानता था कि यह प्रभु यीशु मसीह है, पर फिर भी उसने ऐसा कहा। क्या यह शैतान का स्वभाव नहीं? शैतान का स्वभाव क्या है? (धूर्तता, दुष्टता और परमेश्वर के प्रति श्रद्धा न रखना) उसके मन में परमेश्वर के प्रति कोई श्रद्धा नहीं है। यहां वह क्या नकारात्मक बात कर रहा था? क्या वह परमेश्वर पर आक्रमण करना नहीं चाह रहा था? वह इस विधि से परमेश्वर पर आक्रमण करना चाह रहा था इसलिए उसने कहा, “यदि तू परमेश्वर का पुत्र है, तो कह दे कि ये पत्थर रोटियां बन जाएं” क्या यह शैतान की बुरी नियत नहीं? (हां) वह वास्तव में क्या करना चाह रहा था? इसका मकसद बिल्कुल स्पष्ट है; वह प्रभु यीशु मसीह के स्थान और पहचान को खंडित करने के लिए इस विधि के उपयोग की कोशिश कर रहा था। उसने कहा, “यदि तू परमेश्वर का पुत्र है तो इन पत्थरों को रोटियों में बदल दे, और यदि तू ऐसा नहीं करता तो परमेश्वर का पुत्र नहीं है और यह काम तू मत कर” क्या यहां उसका यह मतलब था? वह इस विधि का प्रयोग कर परमेश्वर पर आक्रमण करना चाह रहा था और वह परमेश्वर के काम को तहस-नहस करके खत्म करना चाह रहा था। यह शैतान का दुष्कर्म और धूर्तता है। उसका दुष्कर्म उसके स्वभाव की प्राकृतिक अभिव्यक्ति है। हालांकि वह जानता था कि प्रभु यीशु मसीह परमेश्वर का पुत्र है, स्वयं परमेश्वर की सृष्टि होते हुए भी वह स्वयं को इस प्रकार के काम करने से नहीं रोक सका, और परमेश्वर के पीछे लगे रहने और पीछे से लगातार आक्रमण करते रहने और परमेश्वर के काम को बिगाड़ने और नाश करने के लिए बड़ा भ्रष्ट कदम उठाने के कारण वह परमेश्वर का शत्रु बना।

अब, आइए हम इस भाग की व्याख्या करें जिसका उपयोग शैतान ने कियाः “कह दे कि ये पत्थर रोटियां बन जाएं”। पत्थर को रोटी में बदलना - क्या इसका कुछ अर्थ है? इसका कोई अर्थ नहीं। यदि यहां भोजन है तो क्यों ना इसे खाएं, यह क्यों आवश्यक है कि पत्थर को खाने में बदला जाए? इसका क्या यहां कुछ अर्थ है? (नहीं) हालांकि उस समय वह उपवास में था, तो निश्चित रूप से प्रभु यीशु के पास खाने को भोजन था? क्या उसने खाना खाया? (खाया)। तो यहां हम इस कथन में शैतान की निरर्थकता और बेहूदगी को देखते हैं। उसके सारे छल-कपट और बेतुकेपन में हम उसकी मूर्खता देखते हैं। शैतान कई बातें करता है। आप उसके विद्वेषी स्वभाव को देखिये और देखिये कि वह परमेश्वर के काम को नष्ट करता है। वह घृणा से भरा हुआ और परेशान करने वाला है। परन्तु दूसरी तरफ क्या आप उसके शब्दों और काम के पीछे बचकाना और बेतुका स्वभाव पाते हैं? (हां) यह शैतान के स्वभाव का एक प्रकाशन है; उसका स्वभाव इसी प्रकार का है और वह इसी तरह का काम करेगा। मनुष्यों को यह कथन बेतुका और हास्यपद लगेगा, पर ऐसे शब्द वाकई में शैतान द्वारा कहे जा सकते हैं। क्या हम कह सकते हैं कि वह अनभिज्ञ है? बेतुका? शैतान की बुराई हर जगह है और लगातार दिखाई देती जा रही हैं। और उसे प्रभु यीशु ने कैसे उत्तर दिया? (“मनुष्य न केवल रोटी ही से जीवित रहेगा, बल्कि हरेक उस वचन से जीवित रहेगा जो परमेश्वर के मुख से निकलता है।”) क्या इन शब्दों में कोई शक्ति है? (शक्ति है।) हम क्यों कहते हैं कि उनमें सामर्थ्य है? (वे सत्य हैं) ये वचन सत्य है। अब, क्या मनुष्य केवल रोटी ही से जीवित रहता है? प्रभु यीशु ने 40 दिन और रात उपवास किया। क्या वह भूख से मरा? (नहीं) वह भूख से नहीं मरा, इसलिए शैतान उसके पास पहुंचा। उसे उकसाते हुए पत्थर को खाने में बदलने के लिए यह कहते हुएः “यदि तू पत्थर को खाने में बदल दे तो क्या तेरे पास खाने की वस्तु न होगी? तब तुझे उपवास नहीं करना पड़ेगा, भूखा नहीं रहना पड़ेगा?” परन्तु प्रभु यीशु ने कहा, “मनुष्य केवल रोटी ही से जीवित न रहेगा,” इसका मतलब यह है कि हालांकि मनुष्य भौतिक शरीर में रहता है, तो भी उसे कौनसी चीज़ जीवित रखती है, उसे जीवित रहने और सांस लेने की शक्ति कहां से मिलती है? यह भोजन नहीं, परन्तु वे सारे वचन हैं जो परमेश्वर के मुख से निकलते हैं। एक ओर तो, मनुष्य इन वचनों को सच मानता है। शब्द उसे विश्वास देते हैं, उसे यह एहसास कराते हैं कि वह परमेश्वर पर निर्भर रह सकता है, परमेश्वर सत्य है। और दूसरी ओर क्या इन वचनों का कोई व्यवहारिक स्वरूप है? (हां।) क्यों? क्योंकि प्रभु यीशु ने 40 दिन और रात उपवास किया और वह अभी भी वहां खड़ा है; जीवित है। क्या यह एक दृष्टांत है? सवाल यह है कि उसने 40 दिन और रात कुछ नहीं खाया। बात यहां यह है कि 40 दिन और रात उसने कुछ नहीं खाया। और वह अभी भी ज़िंदा है। उसके वाक्यांश का शक्तिशाली सबूत है। उसका कथन सरल है, परन्तु जहां तक प्रभु यीशु का सम्बन्ध है, क्या उसका यह वक्तव्य उसे किसी और द्वारा सिखाया गया था या क्योंकि शैतान ने ऐसा कहा था केवल इसलिए उसने यह सोचा था। इस के विषय में विचार करें। परमेश्वर सत्य है। परमेश्वर जीवन है। क्या परमेश्वर की सत्यता और जीवन बाद में जोड़े गए थे। क्या यह अनुभव से उत्पन्न हुआ? (नहीं) यह परमेश्वर में सहज है। मतलब यह कि सच्चाई और जीवन परमेश्वर के तत्व में रहते हैं। जो कुछ उसका है, वह जो प्रकट करता है, वह सत्य है। यह सत्य, यह वाक्यांश - चाहे इसका स्वरूप लम्बा हो या छोटा है - यह मनुष्य को जीने दे सकता है, उसे जीवन देता है; यह मनुष्य को जीवन यात्रा के विषय में स्पष्टता से खोजने लायक बना सकता है और मनुष्य को परमेश्वर पर विश्वास रखने के लायक बनाता है। इस वाक्यांश का उपयोग परमेश्वर का स्रोत है। स्रोत सकारात्मक है। यह सकारात्मक वस्तु पवित्र है? (हां) शैतान का वाक्यांश शैतान के स्वभाव में से आता है। शैतान अपना बुरा स्वभाव, दुर्भावनापूर्ण स्वभाव, हर जगह लगातार प्रकट करता है। अब ये प्रकाशन, क्या स्वभाविक रूप से बनाए जाते हैं? (हां) क्या कोई इसे उकसाता है, क्या कोई इसकी सहायता करता है? क्या कोई इसे विवश करता है? (नहीं) यह इन्हें स्वयं निकालता है। यह शैतान का बुरा स्वभाव है। जो कुछ भी परमेश्वर करता और जैसे भी करता है, शैतान उसके पदचिन्हों पर चलता है। शैतान जो भी ऐसी बातें कहता और करता है वह शैतान का विशिष्ट तत्व है - बुरा तत्व, दुर्भावनापूर्ण तत्व। अब आगे पढ़ें, शैतान और क्या कहता है? आइए, हम नीचे पढ़ना जारी रखें।

(मत्ती 4:5-6) “तब शैतान उसे पवित्र नगर में ले गया, और मंदिर के कंगूरे पर खड़ा कर दिया, और उससे कहा, यदि तू परमेश्वर का पुत्र है, तो अपने आपको नीचे गिरा दे क्योंकि लिखा है, कि वह तेरे विषय में अपने स्वर्गदूतों को आज्ञा देगा और वे तुझे हाथों हाथ उठा लेंगे, कहीं ऐसा न हो, कि तेरे पांव में पत्थर से ठेस लगे।”

आइए, पहले हम शैतान के इस वाक्यांश पर चर्चा करें। उसने कहा, “यदि तू परमेश्वर का पुत्र है, तो अपने आप को नीचे गिरा दे,” और तब उसने पवित्रशास्त्र का उल्लेख किया, “वह तेरे विषय में अपने स्वर्गदूतों को आज्ञा देगा: और वे तुझे हाथों हाथ उठा लेंगे, कहीं ऐसा न हो कि तेरे पांव में पत्थर से ठेस लगे।” जब आप शैतान के शब्दों को सुनते हैं तब आप कैसा महसूस करते हैं? क्या वे बहुत बचकाने नहीं हैं? वे बचकाने हैं, निरर्थक और घ्रणास्पद हैं। मैं यह क्यों कहूंगा? शैतान हमेशा कुछ मूर्खतापूर्ण कार्य के पीछे रहता है, वह स्वयं को बहुत ही चतुर समझता है, और अक्सर पवित्रशास्त्र का उल्लेख करता है - यहां तक कि परमेश्वर के प्रत्येक शब्द का - वह उन शब्दों का उपयोग परमेश्वर की परीक्षा लेने और उस पर हमला करने के लिए इस्तेमाल करता है। ऐसा करने में उसका उद्देश्य परमेश्वर के काम की योजना को बर्बाद करना होता है। फिर भी शैतान ने जो कहा क्या उस पर आपने ध्यान दिया? (उस में पापमय भावना है।) शैतान हमेशा से प्रलोभन देने वाला रहा है; वह सीधे तौर पर नहीं बोलता, वह गोल-मटोल तरीके से प्रलोभन देने, दोष लगाने और गिराने के लिए बोलता है। शैतान परमेश्वर और मनुष्य दोनों को एक समान प्रलोभन देता है। वह सोचता है कि परमेश्वर और मनुष्य दोनों अनजान, मूर्ख और चीजों को स्पष्टता से पहचानने लायक नहीं हैं। शैतान सोचता है कि परमेश्वर और मनुष्य दोनों उसके तत्व को नहीं देख सकेंगे और यह कि परमेश्वर और मनुष्य उसकी चालाकी और पापमय नीयत को नहीं देख सकेंगे। क्या यहां शैतान की मूर्खता नहीं दिखती? (हां) आगे, शैतान खुल्लम-खुल्ला पवित्रशास्त्र को पेश करता है; ऐसा करने से वह सोचता है कि उसे विश्वसनीयताप्राप्त होगी और आप उसकी गलती को नहीं पकड़ पाएंगे और इस तरह मूर्ख बनाए जाने को नज़रअंदाज़ करेंगे। क्या यह शैतान की बेतुकी और बचकानी हरकत नहीं है? (हां) यह ठीक वैसा ही है जैसा जब कोई सुसमाचार सुनाता और परमेश्वर की गवाही देता है, तो क्या नास्तिकभी वैसा ही नहीं कहते जैसा शैतान ने कहा था? क्या आपने लोगों को वैसा ही कहते हुए सुना है? (हां) जब आप इस तरह की बातें सुनते तो क्या चिढ़ महसूस करते हैं? (हां) जब आप चिढ़ महसूस करते हैं तो क्या आप नकारा हुआ और विद्रोही भी महसूस करते हैं? (हां) जब आप यह अनुभव करते हैं तो क्या आप यह पहचान सकने के योग्य होते हैं कि शैतान मनुष्यों में जो काम करता है वह दूषित व्यवस्था और दुष्टता है। क्या कभी आपने अपने मन में ऐसा महसूस किया है, “परमेश्वर कभी ऐसा नहीं कहता। शैतान के शब्द हमला और प्रलोभन लाते हैं, उसके शब्द बेतुके, हास्यप्रद, बचकाने और घृणा उत्पन्न करने वाले हैं। फिर भी परमेश्वर अपने कथन में और काम में, ऐसी विधि का प्रयोग नहीं करेगा या अपना काम करेगा और न कभी उसने ऐसा किया है?” बेशक, इस परिस्थिति में लोगों के पास किंचितमात्रा में आगे बढ़ने की भावना रहती है और उन्हें परमेश्वर की पवित्रता का अहसास नहीं होता; वे केवल इतना स्वीकार कर सकते हैं कि परमेश्वर का वचन सत्य है। पर वे यह नहीं जानते कि सच्चाई स्वयं ही पवित्रता है। आप अपनी वर्तमान स्थिति के अनुसारकेवल इतना महसूस करते हैं: “हर बात जो परमेश्वर कहते हैं वह सच है, हमारे लिए ही है और हमें उसे ग्रहण करना चाहिए,” चाहे आप उसे ग्रहण करने के योग्य हों या ना भी हों, बिना अपेक्षा के आप कहते हैं कि परमेश्वर का वचन सत्य है और परमेश्वर सत्य है, परन्तु आप यह नहीं जानते कि सत्य स्वयं में पवित्र है और यह कि परमेश्वर पवित्र है। इसलिए यीशु मसीह का प्रत्युत्तर शैतान के शब्दों के प्रति क्या था?

(मत्ती 4:7) यीशु ने उससे कहा, यह भी लिखा है, कि तू प्रभु अपने परमेश्वर को प्रलोभन न दे।

यीशु ने जो वाक्यांश कहा क्या उसमें सच्चाई है? (हां।) उसमें सत्य है। ऊपरी तौर पर यह लगता है कि यह लोगों को मानने के लिए एक आदेश है, यह बहुत सरल वाक्यांश हैं, परन्तु यही एक है जिसका मनुष्य और शैतान ने बहुधा उल्लंघन किया है, इसलिए प्रभु यीशु ने उससे कहा, “तू प्रभु अपने परमेश्वर को प्रलोभन न दे,” क्योंकि शैतान ने बहुधा यही किया और ऐसा करने के लिए पूरा प्रयास भी किया, आप यहां तक कह सकते हैं कि शैतान ने बेशर्मी से ऐसा किया। यह शैतान का स्वभाव ही है कि वह परमेश्वर से न तो डरता है और न उसके मन में परमेश्वर का भय ही है। इसलिए जब शैतान परमेश्वर के बाजू में था और उसे देख सकता था, शैतान अपने आप को परमेश्वर को प्रलोभन देने से रोक न सका। इसलिए प्रभु यीशु ने शैतान से कहा, “तू अपने परमेश्वर कोप्रलोभन न दे” यह एक ऐसा वाक्यांश है जो परमेश्वर ने शैतान से अक्सर कहा है। क्या यह उपयुक्त नहीं कि आज भी यह वाक्यांश कहा जाए? (हां) क्यों? (क्योंकि हम भी अक्सर परमेश्वर को प्रलोभन देते हैं, उसकी परीक्षा लेते हैं) लोग अक्सर परमेश्वर की परीक्षा लेते हैं, परन्तु बहुधा लोग ऐसा क्यों करते हैं? क्या यह ऐसा इसलिए है क्योंकि लोग शैतान के दूषित स्वभावसे भरे हुए हैं? (हां) इसलिए जैसा शैतान ने ऊपर कहा कुछ वैसा ही लोग अक्सर कहते हैं? (हां) किन परिस्थितियों में? कोई यह कह सकता है कि लोग ऐसा कह रहे हैं और स्वभाविक तौर पर कर रहे हैं, जिसमें समय और स्थान की कोई परवाह नहीं है। यह सिद्ध करता है कि लोगों का स्वभाव ठीक वैसा ही है जैसाशैतान का दूषित स्वभाव। प्रभु यीशु ने एक सरल वाक्यांश कहा, एक वह जो सत्य का प्रतिनिधित्व करता और जिसकी लोगों को आवश्यकता है। हालांकि इस परिस्थिति में क्या प्रभु यीशु शैतान से बहस कर रहा था? क्या जो बात उसने शैतान से कही उसमें कुछ विरोधाभास था? (नहीं) कैसे प्रभु यीशु ने शैतान के प्रलोभन को अपने मन में देखा? क्या वह खीजा और विद्रोही हुआ? (हां) प्रभु यीशु खीज से भर गया और विद्रोही भी हुआ, परन्तु उसने शैतान से वाद-विवाद नहीं किया, बल्कि किसी महान सिद्धांत के विषय में तो बात ही नहीं की, क्या यह सही नहीं है? (हां) ऐसा क्यों है? (प्रभु यीशु शैतान को मान्यता नहीं देना चाह रहे थे।) वह शैतान को मान्यता क्यों नहीं देना चाह रहे थे? (क्योंकि शैतान हमेशा से ऐसा ही है, वह कभी नहीं बदल सकता।) क्या हम यह कह सकते हैं, कि शैतान हठी है? (हां, हम कह सकते हैं) क्या शैतान मान सकता है कि परमेश्वर सत्य है? शैतान कभी नहीं मानेगा कि परमेश्वर सत्य है और न कभी स्वीकार करेगा कि परमेश्वर सत्य है; यह उसका स्वभाव है। इसके अलावा, शैतान के स्वभाव में कुछ और भी ऐसा है जो लोगों के लिए घृणास्पद है, यह क्या है? उसके प्रभु यीशु को परखने के प्रयास में, उसके मन में और क्या था? हालांकि उसने परमेश्वर को प्रलोभन देने का प्रयास किया लेकिन सफल नहीं हुआ, फिर भी शैतान ने प्रयास तो किया ही। हालांकि उसे दण्डित होना पड़ा, उसने किसी भी तरह ऐसा किया। हालांकि ऐसा करने पर उसे कुछ भी अच्छा प्राप्त नहीं हुआ, लेकिन उसने ऐसा किया, और अड़ा रहा और अंत तक परमेश्वर के विरुद्ध खड़ा रहा। यह किस तरह का स्वभाव है? क्या यह बुरा नहीं है? (हां) जो लोग जो परमेश्वर का नाम सुनकर क्रोधित हो जाते हैं, क्या उन्होंने परमेश्वर को देखा है? जो लोग परमेश्वर का नाम सुनकर गुस्से में आ जाते हैं, क्या वे परमेश्वर को जानते हैं? वह नहीं जानते कि परमेश्वर कौन है, उस पर विश्वास नहीं करते और परमेश्वर ने उनसे बात नहीं की है। परमेश्वर ने उन्हें कभी परेशान नहीं किया तो फिर वे गुस्सा क्यों होते हैं? क्या हम कह सकते हैं कि यह व्यक्ति बुरा है? (हां) क्या ऐसा व्यक्ति बुरे स्वभाव वाला होगा? संसार में चाहे जो कुछ भी हो रहा है, चाहे वह अच्छा भोजन, प्रसिद्ध लोग, सुन्दर लोग, इन में से कोई भी चीज़ उन्हें परेशान नहीं करेगी, लेकिन “परमेश्वर” शब्द सुनकर वे विचलित हो जाते हैं; क्या यह बुरे स्वभाव का एक उदाहरण नहीं होगा? यह मनुष्य के बुरे स्वभाव को बताने के लिए संतोषजनक सबूत है? अब आपके स्वयं के लिए बात करते हैं, क्या कभी ऐसा हुआ है कि सत्य का उल्लेख किया गया है, या जब मनुष्य जाति के लिए परमेश्वर की परख का समय आता है, या जब मनुष्य के विरुद्ध परमेश्वर के न्याय, की बात की जाती है, और आप चिढ़, हठ महसूस करते और आप इसे नहीं सुनना चाहते? आप मन में सोचते है कि यह कैसा सच है? क्या सब लोगों ने नहीं कहा, परमेश्वर सत्य है? यह सच नहीं है, यह स्पष्ट रूप से मनुष्य के लिए परमेश्वर का दण्डात्मक शब्द है, कुछ लोग अपने मनों में चिढ़ महसूस कर सकते हैं, यह हर दिन होता है, उसके न्याय की तरह हर दिन हमारे लिए उसकी परख का उल्लेख होता है; इन सब का अंत कब होगा? हम अच्छा लक्ष्य कब पाएंगे? यह नहीं पता कि यह अनुचित क्रोध आता कहां से है। यह किस प्रकार का स्वभाव है? (बुरा स्वभाव) यह शैतान के बुरे स्वभाव से प्रेरित है। जहां तक परमेश्वर का सम्बन्ध है, वह शैतान के बुरे स्वभाव और मनुष्य के दूषित स्वभाव के विषय में, वह कभी मनुष्य से विवाद या झगड़ा नहीं करता, और वह कभी भी गुस्सा नहीं होता जब मनुष्य अज्ञानता में काम करते हैं। जैसा मनुष्य का दृष्टिकोण होता है वैसा परमेश्वर का दृष्टिकोण नहीं होता, इसके अलावा, उसे काम करने के लिये मनुष्य के दृष्टिकोण, उनके ज्ञान, उनके विज्ञान या उनके दर्शनशास्त्र या कल्पनाओं का उपयोग करने की आवश्यकता नहीं होती। बल्कि प्रत्येक बात जो परमेश्वर करता और जो परमेश्वर प्रगट करता है वह सत्य से जुड़ी होती है। यानिकि उसका हर शब्द और हर कार्य सच से संबंधित है। यह सत्य कोई आधारहीन कल्पना नहीं है। यह सत्य और ये शब्द परमेश्वर द्वारा उजागर किए गये हैं। वह परमेश्वर के तत्व और उसके जीवन के कारण हुए हैं। क्योंकि ये शब्द और तत्व और प्रत्येक बात जो परमेश्वर ने की, सच है, इसलिए हम कह सकते हैं कि परमेश्वर का तत्व पवित्र है। अन्य शब्दों में प्रत्येक बात जो परमेश्वर कहते और करते हैं वह लोगों के लिए जीवन शक्ति और प्रकाश लाती है; यह लोगों को सकारात्मक बातों को और उन सकारात्मक बातों की वास्तविकता को देखने की अनुमति देती है और यह मानवता को प्रकाश की राह की ओर इंगित करती है ताकि वे सही राह पर चल सकें। ये बातें परमेश्वर के तत्व के कारण निर्धारित की गई और ये परमेश्वर के तत्व की पवित्रता के कारण निर्धारित की गई हैं। आपने यह देखा है, सही? हम पवित्रशास्त्र पढ़ने के साथ जारी रखेंगे।

(मत्ती 4:8-11) फिर शैतान उसे एक बहुत ऊंचे पहाड़ पर ले गया और सारे जगत के राज्य और उसका वैभव दिखाकर उससे कहा, “यदि तू गिरकर मेरी उपासना करे, तो मैं यह सब कुछ तुझे दे दूंगा।” तब यीशु ने उससे कहा, “हे शैतान दूर हो जा, क्योंकि लिखा हैः तू प्रभु अपने परमेश्वर को प्रणाम कर, और केवल उसी की उपासना कर।” तब शैतान उसके पास से चला गया, और देखो, स्वर्गदूत आकर उसकी सेवा करने लगे।

शैतान ने, अपनी पिछली दो चालों में असफल होने के बादएक और कोशिश की: उसने प्रभु यीशु को सारे जगत के राज्य और उसका वैभव दिखाया और उससे शैतान की आराधना करने को कहा। इस स्थिति में शैतान का कौनसा वैशिष्ट्य देखते हैं? क्या शैतान पूरी तरह से बेशर्म नहीं है? (हां) वह कैसे बेशर्म हो सकता है? प्रत्येक वस्तु परमेश्वर द्वारा रची गई थी। फिर भी शैतान इसे पलटता है और परमेश्वर को दिखाते हुए कहता है कि “इन सारे राज्यों के धन और वैभव को देख। यदि तू मेरी उपासना करे तो मैं यह सब तुझे दे दूंगा”। क्या यह उल्टा चलन नहीं है? क्या शैतान बेशर्म नहीं है? परमेश्वर ने सब कुछ बनाया, पर क्या यह उसके आनन्द के लिए था? परमेश्वर ने सब कुछ मनुष्य जाति को दे दिया, परन्तु शैतान उन सब को अपने कब्ज़े में करना चाहता था और बाद में उसने कहा, “मेरी आराधना कर। मेरी आराधना कर और मैं यह सब तुझे दे दूंगा।” यह शैतान का बदसूरत चेहरा है, वह पूर्णतया बेशर्म है, सही है न? शैतान “शर्म” शब्द का मतलब भी नहीं जानता, और यह उसकी बुराई का दूसरा सबूत है। वह यह भी नहीं जानता कि “शर्म” क्या होती है। शैतान निश्चय जानता है कि परमेश्वर ने सब कुछ बनाया है और वह उसे सम्भालता है और उस पर उसकी प्रभुता है। सब परमेश्वर का है, मनुष्य का नहीं और शैतान का तो बिल्कुल नहीं, फिर भी शैतान ने निर्लज्जतापूर्वक कहा कि वह सब कुछ परमेश्वर को दे देगा। क्या शैतान फिर से कुछ घृणास्पद और शर्मनाक नहीं कर रहा है? परमेश्वर अब शैतान से और भी अधिक नफरत करता है, सही? शैतान ने भले ही कुछ भी करने की कोशिश की, लेकिन क्या प्रभु यीशु उसके झांसे में आये? (नहीं)। प्रभु यीशु ने क्या कहा? (तू अपने प्रभु परमेश्वर ही की उपासना करना) क्या इस वाक्यांश का कोई व्यवहारिक अर्थ है? (हां) किस प्रकार का व्यवहारिक अर्थ? हम शैतान की बुराई और बेशर्मी को उसके वक्तव्य में देखते हैं। अतः यदि मनुष्य शैतान की उपासना करे, तो निष्कर्ष क्या होगा? क्या वे राज्य का धन ओर वैभव प्राप्त करेंगे? (नहीं) वे क्या प्राप्त करेंगे? क्या मनुष्य शैतान के ही समान बेशर्म और हास्यपद बन जाएंगे? (हां) तब वे शैतान से भिन्न नहीं होंगे। इसलिए प्रभु यीशु ने यह वाक्यांश कहा जो सब और प्रत्येक इंसान के लिए महत्वपूर्ण है, “तू प्रभु अपने परमेश्वर ही की उपासना कर, और उसी की सेवा कर।” जिसका अर्थ है कि प्रभु के अलावा, स्वयं परमेश्वर को छोड़, यदि आप दूसरे की उपासना करते हो, यदि आप शैतान जो इबलीस् है, उसकी उपासना करते हो, तब आप उसी गंदगी में लौटते हो जैसा शैतान है। जब आप शैतान की बेशर्मी और उसकी बुराई में भागीदार होते हो, तब आप शैतान के जैसे ही परमेश्वर की परीक्षा और हमला करने लगोगे। तब आपका अंत क्या होगा? आप परमेश्वर द्वारा घृणा किए जाने लगोगे, नीचे धकेल दिए जाओगे, और परमेश्वर द्वारा नाश किए जाओगे। क्या यह सही नहीं है? जब शैतान ने असफल होते हुए भी कई बार प्रभु यीशु को परखा, क्या उसने फिर प्रयास किया? शैतान ने फिर प्रयास नहीं किया और वह चला गया। यह शैतान के बुरे स्वभाव को सिद्ध करता है, उसकी दुर्भावना, उसका बेतुकापन, और निरर्थकता इस योग्य नहीं कि उसका वर्णन परमेश्वर से किया जाए और प्रभु यीशु ने केवल तीन वाक्यों में शैतान को हरा दिया, उसके बाद शैतान अपने पैरों के बीच दुम दबा कर खिसक गया और उसने उसे फिर नहीं परखा। चूंकि प्रभु यीशु ने शैतान को इस परीक्षा में हरा दिया, तो अब वह आसानी से अपने उस काम को जारी रख सकता था, जो कार्य उसके सामने पड़ा था। जो कुछ प्रभु यीशु ने कहा और किया, क्या वह इस परिस्थिति में प्रत्येक के लिये व्यवहारिक अर्थ रखता है? (हां) किस प्रकार का व्यवहारिक अर्थ? क्या शैतान को हराना आसान काम है? (नहीं) तब यह क्या होगा? लोगों को क्या शैतान के बुरे स्वभाव की समझ होनी चाहिए? क्या लोगों को शैतान के प्रलोभनों की सही समझ होनी चाहिए? (हां) यदि आपने अपने जीवन में शैतान के प्रलोभनों का अनुभव किया है और आप शैतान के बुरे स्वभाव को देख सकते हैं, क्या आप उसे हराने के योग्य होंगे? यदि आप शैतान के बेतुकेपन और निरर्थकता को जानते, तो क्या फिर भी आप शैतान के साथ परमेश्वर पर हमला करने को खड़े होंगे? (नहीं, हम नहीं होंगे)। यदि आप समझ जाएं कि कैसे शैतान की दुर्भावना और बेशर्मी आपके द्वारा प्रगट हुई है - यदि आप स्पष्ट रूप से इस बात को पहचान जायें और जान जायें – तो क्या आप फिर भी परमेश्वर पर इस प्रकार हमला करेंगे और उसकी परीक्षा लेंगे? (नहीं, हम नहीं करेंगे) आप क्या करोगे? (हम शैतान का सामना करेंगे और उसे छोड़ देंगे।) क्या यह आसान कार्य है? (नहीं) यह सरल नहीं है, ऐसा करने के लिये, लोगों को निरंतर प्रार्थना करनी चाहिए, उन्हें स्वयं को परमेश्वर के सामने रखना चाहिए और उन्हें स्वयं को हमेशा जांचते रहना चाहिए। उन्हें अपने आप को परमेश्वर के अनुशासन, और उसके न्याय और दण्ड के अधीन समर्पित करना चाहिए और यही एक राह है जिससे वे अपने आप को शैतान के राज्य और नियंत्रण से धीरे-धीरे मुक्त कर पाएंगे।

हम उन बातों का निष्कर्ष निकाल सकते है जो उसके कहने से शैतान के तत्व का निर्माण करती है। सर्वप्रथम, शैतान के तत्व को सामान्य रूप से बुरा कहा जाता है, जो परमेश्वर की पवित्रता के विरूद्ध खड़ा होता है। मैं शैतान के तत्व को बुरा क्यों कहता हूं? इसे देखने के लिए कि शैतान लोगों के साथ क्या करता है, उसके परिणाम को देखना होगा। शैतान लोगों को दूषित और नियंत्रित करता है और मनुष्य शैतान के दूषित स्वभाव के अधीन कार्य करता है, और ऐसी दुनिया और दूषित लोगों के बीच रहता है जो शैतान के द्वारा दूषित कर दिये गये हैं। बहुत सारे लोग शैतान द्वारा अनजाने में ग्रसित और सम्मिलित कर लिये गये हैं और इसलिए मनुष्य में शैतान का स्वभाव आ गया है। प्रत्येक बात जो शैतान ने कहीं और की है, उसमें हम उसके अंहकार को देखते हैं, हम उसके छल और उसकी दुर्भावना को देखते हैं। शैतान का अंहकार सर्वप्रथम कैसे दिखता है? क्या शैतान सदा से ईश्वर का स्थान लेना चाहता है? शैतान हमेशा से परमेश्वर के कार्य को बिगाड़ने, और परमेश्वर का स्थान लेने की चाह रखता आया है कि वह स्वयं के लिए इसे ले ले जिससे लोग उसके पीछे चलें, उसका साथ दें, और शैतान की उपासना करें; यह शैतान के अंहकार का स्वभाव है। परन्तु जब शैतान लोगों को बिगाडता है तब वह इस चालाकी और षडयंत्रकारी तरीके से कार्य करता है: जब शैतान लोगों में अपना कार्य करता है, तो वह सीधे तौर पर लोगों को नहीं बताता कि परमेश्वर को कैसे ठुकरायें और उसका विरोध करें। जब शैतान परमेश्वर की परीक्षा लेता है तब वह आकर यह नहीं कहता, “मैं तुझे परख रहा हूं, मैं तुझ पर हमला कर रहा हूं” तो शैतान कौन से तरीके का उपयोग करता है। (धोखेबाज़ी)। वह धोखा देता, हमला करता है, और जाल बिछाता है, और यहां तक कि पवित्रशास्त्र का उल्लेख भी करता है। शैतान कई तरीकों से बोलता और कार्य करता है ताकि अपना बुरा उद्देश्य पूरा कर सके, शैतान के ऐसा कर लेने के बाद हम क्या देखते हैं कि मनुष्यों पर क्या प्रभाव पड़ा है? क्या मनुष्य अंहकारी़ नहीं है? हजारों साल मनुष्य ने शैतान के भ्रष्टाचार से दुख उठाया है इसलिए मनुष्य हेकड़ीबाज़ और असाधारण रूप से दम्भी बन गया है, वह धूर्त, दुर्भावनाग्रस्त और अनुचित हो गया है, सही? ये सारी बातें शैतान के स्वभाव के कारण हुई हैं। चूंकि शैतान का स्वभाव बुरा है, इसने मनुष्य को बुरा स्वभाव और मनुष्य को दूषित स्वभाव दिया है। इसलिए मनुष्य दूषित शैतानी स्वभाव के अधीन जीता है और मनुष्य शैतान के समान परमेश्वर के विरोध में जाता है, परमेश्वर पर आक्रमण करता है और इस हद तक उसे परखता है कि मनुष्य परमेश्वर की उपासना नहीं करता और अपने हृदय में उसका भय नहीं रखता, सही है ना?

जहां तक परमेश्वर की पवित्रता का सवाल है, भले ही यह एक परिचित विषय हो, कुछ लोगों के लिए यह विचार-विमर्श में थोड़ा मुश्किल हो सकता है, और विषय वस्तु कुछ गहन हो सकती है। भूतकाल में लोग परमेश्वर की पवित्रता के विषय पर बहुत कम व्यवहार करते थे, इसलिए वे उसे नहीं समझते थे। परन्तु चिंता न करें, यह समझने में मैं तुम्हारी सहायता करूंगा कि परमेश्वर की पवित्रता क्या है? मैं देखता हूं कि आपको यह ग्रहण करने में कुछ कठिन है, आइए पहले हम यह कहें: यदि आप किसी को जानना चाहते हैं तो केवल यह देखो कि वे क्या कहते हैं और उनके कार्यों का परिणाम क्या होता है, और उस व्यक्ति के तत्व को आप देखने के योग्य हो जाओगे। तो आइए, पहले हम इस दृष्टिकोण से परमेश्वर की पवित्रता को देखें। हमने कहा शैतान का तत्व बुरा और दुर्भावना पूर्ण है, इसलिए शैतान के कार्य अंत तक मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए किए गए। शैतान बुरा है इस कारण लोगों को बुरा बना दिया है, सही? क्या कोई कहेगा, “शैतान दुष्ट है, लेकिन जो इससे भ्रष्ट हुआ शायद वह पवित्र है?” क्या मज़ाक है, सही? क्या यह सम्भव है? (नहीं) इसलिए इसके बारे में इस प्रकार न सोचें, आइये हम इस बारे में इस पहलू से बात करें: शैतान बुरा है, यह उसका तत्व है और यह वास्तविक है, यह केवल ज़बानी बात नहीं है, हम शैतान पर अभियोग लाने का प्रयत्न नहीं कर रहे हैं, हम यहां सच और वास्तविकता और उसके आसपास के तथ्यों के बारे में संगति कर रहे हैं। यहां कुछ लोगों को या एक खास वर्ग को चोट पहुंच सकती है, परन्तु इसमें दुर्भावना की कोई मंशा नहीं है; आज शायद आप सुनकर थोड़ी असुविधा अनुभव करें, परन्तु जल्द कुछ दिन बाद जब आप उसे पहचानने के योग्य होंगे, तब आप अपने आपसे घ्रणा करोगे, और यह महसूस करोगे कि आज हमने जिसके विषय में बात की वह आपके लिए बहुत उपयोगी और मूल्यवान है।

शैतान का तत्व बुरा है, इसलिए शैतान के कार्यों का परिणाम अवश्यभावी बुरा है, या कम से कम बुरे से सम्बन्धित है, क्या हम ऐसा कह सकते हैं? (हां) तो शैतान कैसे लोगों को भ्रष्ट करता है? पहले हमें विशेषकर यह देखना है कि शैतान ने दुनिया में और लोगों में जो बुराई दिखती है, जो हम महसूस करते हैं, उसके बीज कैसे बोये; क्या आपने पहले इस पर विचार किया? आपने इस पर ज्यादा सोचा नहीं होगा, इसलिए मुझे उन मुख्य बिन्दुओं को सामने लाने दीजिए ताकि आप यह देख सकें कि शैतान कैसे मनुष्य को दूषित करता है। एक सिद्धांत है जो क्रमिक-विकास कहलाता है, हर कोई इसके विषय में जानता है, सही? क्रमिक-विकास और भौतिकवाद के विषय में लोगों ने अध्ययन किया है न? (हां) अतः शैतान ने मनुष्य को दूषित करने के लिए पहले ज्ञान का उपयोग किया, और फिर ज्ञान और रहस्यमयी बातें या चीज़ें जिनके विषय में मनुष्य खोज करना चाहते हैं, उनके विषय में मनुष्य की रूचि को उभारने के लिए विज्ञान का इस्तेमाल कियाः ऐसा कहा जा सकता है, कि शैतान ने मनुष्य को दूषित करने के लिए वैज्ञानिक ज्ञान का उपयोग किया। मनुष्य को भ्रष्ट करने में दूसरी चीज़ उसने जो इस्तेमाल की वह है पारम्परिक संस्कृति और अंधविश्वास का उपयोग और उसके बाद उसने सामाजिक रीति-रिवाज का उपयोग किया। ये वे बातें हैं जो मनुष्य के सम्पर्क में आती है, लोगों के प्रतिदिन के जीवन सेजुड़ी रहती हैं। जोवो देखते हैं, सुनते हैं, छूते और अनुभव करते हैं। कह सकते हैं कि वे प्रत्येक को घेरे रहती हैं, इंसान उन्हीं में उलझा रहता है और उनसे पार नहीं पा सकता। मनुष्य जाति के पास इनसे अप्रभावित रहना, इनके नियंत्रण में न आना और इन सब चीज़ों के बंधन से बचे रहना सम्भव नहीं। इंसान में इतनी शक्ति नहीं कि वह उनसे दूर रह सके।

पहले हम ज्ञान के विषय में बात करेंगे। क्या प्रत्येक व्यक्ति ज्ञान को सकारात्मक बात नहीं मानता? या बहुत कम लोग सोचते हैं कि “ज्ञान” शब्द का लक्ष्यार्थ नकारात्मक की अपेक्षा सकारात्मक है। तो हम क्यों कह रहे हैं कि शैतान ने मनुष्य को भ्रष्ट करने में ज्ञान का उपयोग किया? क्या क्रमिक विकास का सिद्धांत ज्ञान का पहलू नहीं है? क्या न्यूटन के वैज्ञानिक नियम ज्ञान का भाग नहीं हैं? पृथ्वी के गुरूत्वाकर्षण का नियम ज्ञान का भाग है, सही? (हां) फिर शैतान ने ज्ञान को मनुष्य को भ्रष्ट करने में उपयोग में लाई जाने वाली साधन सूची में शामिल क्यों किया है? आपका इसमें क्या विचार है? क्या ज्ञान में लेश मात्र भी सच्चाई का अंश है? (नहीं) तब ज्ञान का तत्व क्या है? (यह सत्य के विरूद्ध जाता है।) किस आधार पर मनुष्य ज्ञान का अध्ययन करता है? क्या यह क्रमिक विकास के सिद्धांत पर आधारित है? क्या यह ज्ञान नहीं है मनुष्य ने जिसका अनुसंधान किया, इस का योगफल, नास्तिकता पर आधारित है? (हां) इसलिए, क्या परमेश्वर का इस ज्ञान के साथ कोई सम्बन्ध है? क्या यह परमेश्वर की उपासना के साथ जुड़ा हुआ है? क्या यह सत्य के साथ जुड़ा हुआ है? (नहीं) शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने में ज्ञान का कैसा उपयोग करता है? मैंने अभी यह कहा है कि इनमें से कोई भी ज्ञान परमेश्वर की उपासना और सत्य से जुड़ा हुआ नहीं है। कुछ लोग इस बारे में इस तरह सोचते हैं: “हो सकता है इसका सच्चाई से कोई लेना-देना न हो, परन्तु यह लोगों को भ्रष्ट नहीं करता।” आप इस बारे में क्या सोचते हैं? क्या आप को ज्ञान के द्वारा यह सिखाया गया है कि लोगों की खुशी इस बात पर निर्भर करती है कि उन्होंने स्वयं अपने हाथों से क्या बनाया है? क्या कभी ज्ञान ने आपको यह सिखाया, कि मनुष्य का भाग्य उसके अपने हाथ में है? (हां) यह किस प्रकार की बात है? (यह बकवास है) ध्यान दें! यह बकवास है! विचार विमर्श के लिए ज्ञान एक जटिल विषय है। आप सरलता से यह कह सकते हैं कि ज्ञान का एक क्षेत्र ज्ञान के सिवाय और कुछ नहीं है। यह ज्ञान का वह क्षेत्र है जो नास्तिकता के आधार पर और इस जानकारी की कमी के आधार पर है, कि परमेश्वर ने ही सब कुछ रचा है, सीखा जाता है। जब लोग इस प्रकार के ज्ञान का अध्ययन करते हैं, तो ऐसा नहीं मानते कि सब वस्तुओं पर परमेश्वर की प्रभुता है, वे नहीं मानते कि परमेश्वर ही हर चीज़ का प्रबंधन करता है। इसकी बजाय, वे ज्ञान के उस क्षेत्र में खोज करते हैं, अनुसंधान करते हैं उसका वैज्ञानिक उत्तर तलाश करते हैं। परन्तु यदि लोग ईश्वर पर विश्वास नहीं करते, इसके विपरीत शोध करते हैं, तो वे सही उत्तर नहीं पाएंगे, सही? ज्ञान आपको केवल जीवकोपार्जन ही देता है, यह केवल नौकरी देता है, वह केवल आमदनी देता है जिससे कि आप भूखे न मरें, पर वह परमेश्वर को जानने में आपकी सहायता कभी नहीं करेगा, यह कभी उस पर विश्वास करने में, उसकी आज्ञा मानने में आपकी मदद नहीं करेगा, और ज्ञान कभी भी आप को बुराई से दूर नहीं रखेगा। जितना ज्यादा आप ज्ञान का अध्ययन करोगे उतना ही आप परमेश्वर का विरोध करने, परमेश्वर पर शोध करने, परमेश्वर को परखने और परमेश्वर के विरूद्ध जाने की इच्छा करेंगे। अतः अब आप क्या देखते हैं कि ज्ञान लोगों को क्या सिखाता है? यह सब कुछ शैतान का तत्व ज्ञान है। क्या शैतान का तत्वज्ञान और जीवित रहने के नियम जो भ्रष्ट मनुष्यों में पाए जाते हैं क्या उनका कोई सम्बन्ध सत्य से है? (नहीं)। उनका सत्य से कोई लेना-देना नहीं है और वास्तव में वे सच के विपरीत हैं। लोग अक्सर कहते हैं, “जीवन गति है” यह कैसी बात है? (बकवास) लोग यह भी कहते हैं “मनुष्य लोहा है, चावल इस्पात है, मनुष्य जब एक बार का भोजन चूक जाता है, तो भूख का अनुभव करता है” यह क्या है? (बकवास, शैतान का कार्य) यह उससे भी बद्तर छलावा है और यह सुनने में घृणित है। तो ज्ञान एक ऐसी चीज़ है जिसके बारे में शायद हर कोई जानता है। मनुष्य के तथाकथित ज्ञान में शैतान ने अपने जीवन के तत्व ज्ञान और अपनी सोच का कितना रंग मिला दिया है, और जब शैतान यह करता है तब शैतान मनुष्य को उसकी सोच, तत्व ज्ञान, और दृष्टिकोण लेने की अनुमति देता है जिससे मनुष्य परमेश्वर के अस्तित्व को इंकार सके, सब वस्तुओं पर परमेश्वर की प्रभुता और मनुष्य के भाग्य पर प्रभुत्व को नकार सके। तो जैसे-जैसे मनुष्य का अध्ययन प्रगति करता है उसका परमेश्वर के अस्तित्व में होने का एहसास धुंधला होता जाता है, जब वह और ज्ञान प्राप्त करता है, और मनुष्य यह भी सोच सकता कि परमेश्वर का अस्तित्व है ही नहीं, क्योंकि शैतान ने अपना दृष्टिकोण, अवधारणा और विचार मनुष्य के दिमाग में भर दिए हैं। जैसे ही शैतान ये विचार मनुष्य के दिमाग में भर देता है, तो क्या मनुष्य इसके द्वारा दूषित नहीं हो जाते? (हां) अब मनुष्य का जीवन किस पर आधारित है? क्या वह सचमुच इस ज्ञान पर आधारित है? (नहीं) मनुष्य अपना जीवन शैतान के उन विचारों, दृष्टिकोण और तत्व ज्ञान पर आधारित है जो कि इस ज्ञान में छिपा हुआ है। यह वह सिरा है जहां मनुष्य में शैतान के भ्रष्टाचार का सार घटित होता है। यही शैतान का लक्ष्य और विधि है जिससे वह मनुष्य को दूषित करने के लिए करता है।

(अ) शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए किस प्रकार से ज्ञान का उपयोग करता है।

पहले हम इस विषय के सबसे सामान्य पहलू पर बात करेंगे। जब आप कक्षा में चीनी भाषा का पाठ पढ़ रहे थे, क्या भाषा और लिखावट लोगों को भ्रष्ट करने लायक थी, वे नहीं हो सकती हैं। क्या शब्द लोगों को दूषित कर सकते हैं? (नहीं)। शब्द लोगों को दूषित नहीं कर सकते हैं। वे एक माध्यम हैं जो लोगों को बोलने की अनुमति देते हैं और एक उपकरण है जिससे लोग परमेश्वर के साथ संवाद करते हैं। भाषा और शब्द के ज़रिये अब परमेश्वर लोगों के साथ संवाद करता है, वे साधन हैं, वे एक जरूरत हैं। एक और एक दो होते हैं, यह ज्ञान है, सही? दो और दो का गुणा चार होते हैं, यह ज्ञान है, सही? पर क्या यह आपको दूषित कर सकता है? यह एक सामान्य ज्ञान और नियम है इसलिए यह लोगों को दूषित नहीं कर सकता है। तो कैसा ज्ञान लोगों को दूषित करता है? वह ज्ञान जिसमें शैतान के दृष्टिकोण और विचार का मेल हो। शैतान इन दृष्टिकोणों और विचारों को मानवता में ज्ञान द्वारा प्रविष्ट करने के अवसर की ताक में रहता है। उदाहरण के लिए, एक निबंध में लिखित शब्दों में कुछ गलत है? (नहीं) तो फिर समस्या कहां होगी? लेखक का दृष्टिकोण और नीयत जब वह लिख रहा था तथा उस निबंध में उसके विचारों का तत्व - ये आत्मिक बातें हैं - और लोगों को दूषित करने के योग्य हैं। उदाहरण के लिए, यदि आप टेलीविज़न पर शो देख रहे हैं, किस प्रकार की बातें आपके दृष्टिकोण को बदल सकती हैं? है। प्रस्तुतकर्ता ने क्या कहा, क्या शब्द स्वयं दूषित करने योग्य हो सकते हैं? (नहीं) कैसी बातें लोगों को दूषित करेंगी? यह शो के विचार और विषय-वस्तु होगी जो निर्देशक के दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करती हैं या उन दृष्टिकोणों के द्वारा वे सूचनाएं जो लोगों तक पहुंची, जिन्होंने लोगों के मन और मस्तिष्क को प्रभावित किया, क्या यह सही है? (हां) क्या आप समझ रहे हैं कि मैं अपनी इस चर्चा में क्या इशारा कर रहा हूं कि कैसे शैतान ज्ञान का उपयोग लोगों को दूषित करने के लिए करता है? (हां, हम जानते हैं) आप गलत नहीं समझेंगे, सही? तो जब आप एक उपन्यास या निबंध दोबारा पढ़ते हैं, तो क्या आप मूल्यांकन कर सकते हैं कि निबंध में व्यक्त किए गए विचार मनुष्य को दूषित कर रहे हैं या मानवता की सेवा कर रहे हैं? (हम ऐसा थोड़ा सा ही कर सकते हैं।) यह वह है जहां एक धीमी गति से अध्ययन और अनुभव किया जाना चाहिए, यह कोई ऐसी बात नहीं है जो एकदम से समझी जाए। उदाहरण के लिए, जब ज्ञान के एक क्षेत्र में अध्ययन और शोध करते समय, उस ज्ञान के कुछ सकारात्मक पहलू उसे क्षेत्र को समझने में सहायक हो सकते हैं, और लोगों को क्या नकारना चाहिए। उदाहरण के लिए “विद्युत” को लीजिए, यह ज्ञान का एक क्षेत्र है, सही? आप अनभिज्ञ रहोगे यदि आप यह नहीं जानते कि बिजली लोगों को झटका दे सकती है, सही? पर यदि एक बार आप ज्ञान के इस क्षेत्र को समझ जाते हैं, तब आप बिजली की कोई छूने में असावधानी नहीं बरतेंगे और आप विद्युत का उपयोग कैसे करें, यह भी जानेंगे। ये दोनों सकारात्मक बातें हैं। क्या अब आप को स्पष्ट हुआ कि किस विषय में बात कर रहे हैं? ज्ञान कैसे लोगों को भ्रष्ट करता है? (हां, स्पष्ट हो गया) यदि आप समझ गये तो फिर हम इस के विषय में आगे बात करना जारी नहीं रखेंगे क्योंकि दुनिया में ज्ञान के कई प्रकारों का अध्ययन किया गया है और आपको स्वयं उनका अंतर करने में अपना समय देना चाहिए।

(ब) मनुष्य को भ्रष्ट करने में शैतान विज्ञान का कैसे उपयोग करता है

विज्ञान क्या है? क्या विज्ञान ने प्रत्येक के दिमाग में बड़ी प्रतिष्ठा और गहरा प्रभाव नहीं डाल रखा है? (हां, ऐसा है) जब विज्ञान की चर्चा की जाये तो क्या लोग महसूस नहीं करते, “यह कुछ ऐसी बात है जो आमतौर पर लोग नहीं ग्रहण कर पाते, यह एक ऐसा विषय है जिसे केवल कुछ वैज्ञानिक शोधकर्ता या माहिर ही छू सकते हैं, इसका सामान्य जनता से कोई सम्बन्ध नहीं है?” क्या इनका कोई सम्बन्ध है भी? (हां) शैतान लोगों को दूषित करने के लिये किस प्रकार विज्ञान को उपयोग में लाता है? हम अन्य चीजों के विषय में बात नहीं करेंगे केवल उन बातों की चर्चा करेंगे लोगअपने जीवन में लगातार जिनका सामना करते रहते हैं। क्या आपने वंशाणुओं की उत्पत्ति के विषय में सुना है? (हां) आप सब इस शब्द से परिचित हैं, सही? क्या वंशाणु विज्ञान द्वारा खोजे गए थे? वास्तव में वंशाणु लोगों के लिए क्या मायने रखते हैं? क्या यह लोगों को यह महसूस नहीं कराता कि शरीर एक रहस्यमयी वस्तु है? जब लोगों को इस विषय से परिचित कराया जाता है, तो क्या वहां ऐसे लोग न होंगे - विशेषकर जिज्ञासु, जो और अधिक जानना चाहते हैं या और विवरण चाहते हैं? जिज्ञासु लोग अपनी शक्ति इस विषय पर लगाएंगे और जब वे फुरसत में होंगे, वे और अधिक जानकारी के लिये पुस्तकें और इंटरनेट खोजेंगे। विज्ञान क्या है? स्पष्ट भाषा में, विज्ञान उस चीज़ों के विचार और सिद्धात हैं जिनके विषय में मनुष्य जिज्ञासु है, बातें जो अज्ञात हैं, और परमेश्वर द्वारा उन्हें नहीं बताई गईं हैं; विज्ञान उन रहस्यों को जिन्हें मनुष्य खोजना चाहता है, का विचार और सिद्धांत है। आपको क्या लगता है, विज्ञान का दायरा कितना है? आप यह कह सकते हैं कि विज्ञान सब चीज़ों को संक्षेप में संग्रहित करता है, परन्तु मनुष्य कैसे विज्ञान का कार्य करता है? क्या यह शोध के द्वारा होता है? इसमें इन बातों का विवरण और नियमों पर शोध शामिल है और तब इन संदिग्ध, अनिश्चित सिद्धांतों को एकत्रित करके लाना कि प्रत्येक उनके बारे में क्या सोचते हैं, “ये वैज्ञानिक सचमुच कमाल के होते हैं। वे इन चीज़ों के बारे में बहुत जानते और समझते हैं!” उन लोगों के लिए उनके पास काफी सराहना होती है, सही? जो लोग विज्ञान की खोज करते हैं, वे किस प्रकार का दृष्टिकोण रखते हैं? क्या वे ब्रह्माण्ड पर शोध नहीं करना चाहते, अपनी रूचि के क्षेत्र में रहस्यमयी बातों पर शोध नहीं करना चाह्ते? और अंत में इसका परिणाम क्या आता है? कुछ विज्ञानों में लोगों ने अनुमान के आधार पर अपना निष्कर्ष निकाला, अन्य विज्ञानों में लोगों ने अपने अनुभवों को ध्यान में रखते हुए निष्कर्ष निकाले; और विज्ञान के दूसरे क्षेत्रों में लोगों ने अपने निष्कर्ष अनुभव या इतिहास और उनकी पृष्ठभूमि के अवलोकनों के आधार पर अपने निष्कर्ष निकाले। क्या यह सही है? (हां) तो विज्ञान लोगों के लिए क्या करता है? विज्ञान यह करता है कि वह मनुष्यों को इस भौतिक जगत में चीजों को देखने और मनुष्य की उत्कंठा मात्र को करता है; वह मनुष्य को उन नियमों को जिनके द्वारा परमेश्वर सब चीज़ों पर प्रभुता करता है, देखने की अनुमति नहीं देता। मनुष्य विज्ञान के द्वारा उत्तर पाने की चेष्ठा करता प्रतीत होता है, परन्तु ये उत्तर उलझन और अस्थायी संतुष्टि देते हैं, एक ऐसी संतुष्टि जो मनुष्य के मन को केवल इस भौतिक संसार में सीमित रखती है। मनुष्य सोचता है कि विज्ञान ने हर चीज़ का उत्तर पहले ही दे दिया है, वे उसे मानने या अस्वीकृत करने के लिये अपने वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर ही अटल विश्वास रखते हैं। मनुष्य का हृदय इस हद तक विज्ञान का गुलाम हो जाता है कि उसकी मानसिक स्थिति ऐसी रहती ही नहीं कि वह परमेश्वर को जानें, उसकी उपासना करे, और यह विश्वास करे कि सब वस्तुएं परमेश्वर की ही ओर से आती हैं, और उसी से उत्तर पाने के लिए उसकी ओर निहारें। क्या यह सच नहीं है? आप देख सकते हैं कि मनुष्य जितना विज्ञान में विश्वास करते हैं, उतना ही वे विवेकशून्य हो जाते हैं और यह विश्वास करते हैं कि हर एक बात का एक वैज्ञानिक हल है, और शोध हर बात को हल कर सकती है। वे परमेश्वर को नहीं खोजते और यह भी विश्वास नहीं करते कि उसका अस्तित्व है, यहां तक कि कुछ लोग जो कई सालों से परमेश्वर को मान रहे थे, सनक में आकर बैक्टीरिया की खोज में लग जाएंगे या उत्तर पाने के लिए जानकारी की खोजबीन करेंगे। ऐसे लोग चीज़ों को सच्चाई के नज़रिये से नहीं देखते और अधिकांश मामलों में ये वैज्ञानिक दृष्टिकोण और ज्ञान के भरोसे या वैज्ञानिक उत्तर से समस्या का हल पाना चाहते हैं। परन्तु वे न तो परमेश्वर पर भरोसा करते हैं, न परमेश्वर की खोज करते हैं। क्या ऐसे लोगों के हृदय में परमेश्वर होता है? (नहीं)। कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो परमेश्वर पर उसी तरह से शोध करना चाहते हैं जैसे वे विज्ञान का अध्ययन करते हैं। उदाहरण के लिए, कई धर्म विशेषज्ञ उस स्थान पर गए जहां प्रलय के बाद जहाज़ टिका था। उन्होंने जहाज को देखा, परन्तु जहाज के दिखाई देने में उन्होंने परमेश्वर के अस्तित्व को नहीं देखा। उन्होंने केवल कहानियों और इतिहास पर विश्वास किया। यह उनके वैज्ञानिक शोध और भौतिक संसार के अध्ययन का परिणाम है। यदि आप भौतिक वस्तु पर ही शोध करेंगे तो चाहे वे सूक्ष्म जीव विज्ञान हो, खगोलशास्त्र या भूगोल हो, आप कभी भी वह परिणाम नहीं पाएंगे जो कहता हो कि परमेश्वर का अस्तित्व है या वह सब वस्तुओं पर प्रभुता रखता है। क्या यह सही है? (हां) इसलिए विज्ञान मनुष्य के लिए क्या करता है? क्या वह मनुष्य को परमेश्वर से दूर नहीं करता है? क्या यह लोगों को परमेश्वर का अध्ययन करने की अनुमति नहीं देता है? क्या यह लोगों को परमेश्वर के अस्तित्व में संदेह पैदा नहीं करता है? तो शैतान मनुष्य को दूषित करने के लिये किस प्रकार विज्ञान का उपयोग करता है? क्या शैतान लोगों को धोखा देने और संज्ञाशून्य कर देने के लिये वैज्ञानिक निष्कर्षों का उपयोग करता है? शैतान लोगों के दिलों पर आधिपत्य करने के लिये भ्रामक उत्तरों का उपयोग करता है ताकि वे परमेश्वर के अस्तित्व की खोज न करें। इस प्रकार वे प्रभु के विषय में संदेह करते रहेंगे, उससे इंकार करते रहेंगे और उससे दूरी बना लेंगे। इसलिए हम कहते हैं कि यह उन तरीकों में से एक है जिससे शैतान लोगों को भ्रष्ट करता है।

(स) शैतान कैसे पारम्परिक संस्कृति का उपयोग मनुष्य को दूषित करने में करता है।

क्या कई बातें पारम्परिक संस्कृति का एक भाग मानी जाती हैं? (हां) इस पारम्परिक संस्कृति का मतलब क्या है? (यह वंशानुगत चली आती है।) यह वंशानुगत चली आती है, यह एक पहलू है। परिवार, जातीय समूह, यहां तक कि मानव जाति अपनी जीवन पद्धति को प्रारम्भ से ही आगे बढ़ाती रही है, या वे अपने रीति-रिवाज, कहावत और नियम आगे बढ़ाते रहे हैं जो लोगों के विचारों में छप गए हैं। लोगों को इन से क्या मिलता है? लोग ऐसा समझते हैं कि ये चीज़ें उनके जीवन से अलग नहीं की जा सकती। वे उन चीज़ों को लेते और नियम तथा जीवन का हिस्सा मानते हैं। चूंकि ये बातें उनके पुरखों द्वारा दी गई हैं इसलिए वे उन्हें बदलने और छोड‌ने को बिल्कुल तैयार नहीं होते। पारम्परिक संस्कृति के अन्य पहलू हैं जैसे वे जो कि चीनी दार्शनिकों द्वारा प्रतिपादित किए गये थे, लोगों को चीनीवाद और कन्फयूशियसवाद द्वारा लोगों को सिखाई गई थीं जो प्रत्येक व्यक्ति का अंतर्तम भाग बन गई हैं। क्या यह सही नहीं हैं? (हां) इस पारम्परिक संस्कृति में और क्या शामिल है? क्या इनमें वे त्यौहार शामिल हैं जो लोग मानते हैं? उदाहरण के लिए, इसमें वसंत उत्सव, दीप उत्सव, चिंग मिंग दिवस, ड्रैगन नौका उत्सव और अंतर्राष्ट्रीय मज़दूर दिवस, बाल दिवस, मध्य हेमंत उत्सव और राष्ट्रीय दिवस प्रमुख हैं। कुछ परिवार, अन्य त्यौहार भी मनाते हैं या जब वरिष्ठ लोग एक उम्र को प्राप्त कर लेते हैं उत्सव मनाते हैं या जब बच्चे एक माह की उम्र को प्राप्त करते हैं और जब वे 100 दिन की आयु के हो जाते हैं तो उत्सव मनाते हैं। ये सब पारम्परिक त्यौहार हैं। क्या इन त्यौहारों की पृष्ठभूमि पारम्परिक संस्कृति नहीं है? पारम्परिक संस्कृति का सार क्या है? क्या इनमें परमेश्वर की उपासना के विषय में कुछ है? क्या इसमें लोगों को सच का अभ्यास करने के विषय में कहने को कुछ है? (नहीं) क्या लोगों का कोई ऐसा त्यौहार है जिसमें वे परमेश्वर के लिए बलिदान करें, परमेश्वर की वेदी के पास जाएं और उसके कुछ वचन प्राप्त करें? क्या ऐसा कोई त्यौहार है? (नहीं) इन सारे त्यौहारों में लोग क्या करते हैं? (शैतान की उपासना करते हैं, खाते-पीते, और मौज करते हैं।) आधुनिक युग में यह एक अवसर होता है खाने, पीने और मज़े करने का। तब पारम्परिक संस्कृति के पीछे स्रोत क्या है? पारम्परिक संस्कृति किस से है (शैतान से) यह “शैतान” से है। इन पारम्परिक उत्सवों की पृष्ठभूमि में, शैतान मनुष्यों में कुछ बातें भर देता है, ये चीज़ें क्या हैं? यह सुनिश्चित करना कि लोग अपने पूर्वजों को याद रखें, क्या यह उनमें से एक है? उदाहरण के लिए, चिंग मिंग उत्सव के दौरान लोग कब्र को व्यवस्थित करते हैं और अपने पूर्वर्जों को भेंट चढ़ाते हैं। इस प्रकार लोग अपने पूर्वजों को स्मरण रखेंगे। सही? शैतान ड्रैगन बोट उत्सव के माध्यम से सुनिश्चित करता है कि लोग देशभक्त होना स्मरण रखें, मध्य हेमंत उत्सव के बारे में क्या? (परिवार मिलन) परिवार मिलन की पृष्ठभूमि क्या है? इसका कारण क्या है? (पहले परिवार और भावना को पहले रखना) भावनात्मक रूप से संवाद करना और जुड़ना, सही? वाकई चंद्र नववर्ष की पूर्व संध्या या दीप-उत्सव को मनाने के पीछे की भावना के कई कारण हैं, हालांकि उन्हें मनाने के पीछे के कई कारण दिये जाते हैं, लेकिन इनमें से प्रत्येक का कारण है कि शैतान उनके माध्यम से अपनी दार्शिनिकता और सोच को लोगों में बैठाता है ताकि वे परमेश्वर से दूर रहें और यह न जानें कि परमेश्वर है। वे या तो अपने पूर्वजों को या शैतान को अर्पित करते हैं। या फिर यह खाने, पीने और मज़ा करके शरीर की अभिलाषा पूरी करने का बहाना मात्र है। हर उत्सव के बाद शैतान के विचार और दृष्टिकोण मनुष्य के दिमाग पर और गहरे होते जाते हैं और वे इसे जान भी नहीं पाते। जब व्यक्ति अधेड़ हो जाते हैं, वृद्ध हो जाते हैं तो शैतान की ये बातें, ये विचार, ये दृष्टिकोण पहले से ही उनके हृदयों में गहरे पैठ चुके होते हैं। और चाहे ये विचार सही हों या गलत, बिना सोच विचार के अपनी अगली पीढ़ी को स्थानांतरित करते रहते हैं। क्या यह सही है? (हां) तो येपारम्परिक संस्कृति और त्यौहार लोगों को कैसे दूषित करते हैं? (लोग इन परम्पराओं के नियमों से इतने बंध जाते हैं कि परमेश्वर की खोज के लिये उनके पास न तो समय बचता है और न शक्ति बचती है।) यह एक पहलू है। उदाहरण के लिए, हर कोई चंद्र नव वर्ष मनाता है, यदि आप नहीं मनाते, तो क्या आप दुखी महसूस नहीं करेंगे? आपको नहीं लगेगा, “ओह, मैंने तो नववर्ष का उत्सव मनाया ही नहीं, इस बार का चन्द्र नव वर्ष उत्सव तो कमाल थाऔर मैं रह गया, क्या यह पूरा वर्ष खराब जायेगा?” क्या आप असहज महसूस नहीं करेंगे? (हां) और थोड़ा सा डर भी जायेंगे, सही? कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने बहुत वर्षों से अपने पुरखों के लिए भेंट नहीं चढ़ाई और वे अचानक स्वप्न देखते हैं कि एक मृत व्यक्ति पैसा मांग रहा है, वे भीतर कैसा महसूस करेंगे? “कितने दुख की बात है कि इस मृत को खर्च करने के लिए पैसा चाहिए! मैं उनके लिए कुछ कागज की मुद्रा को जला दूंगा, यदि मैं ऐसा नहीं करता तो यह सही नहीं होगा। अगर मैं कुछ कागज की मुद्राएं नहीं जलाऊंगा तो हम जीवित लोग किसी मुसीबत में पड़ सकते हैं, कौन बता सकता है आफत कब आ जाए?” उनके मन में डर और चिंता का ये बादल हमेशा मंडराता रहेगा। तो उन्हें यह चिंता कौन देता है? (शैतान) शैतान यह लाता है। क्या यह एक तरीका नहीं है जिससे शैतान मनुष्य को दूषित करता है? वह आपको नियंत्रित करने के कई तरीके और बहाने काम में लाता है; आपको डराने और आपको उस हद तक बांधने के लिए जब तक कि आप उसकी चाल में न फंस जायें और न झुक जायें और समर्पण न कर दें; इसी तरीके से शैतान मनुष्य को दूषित करता है। अक्सर ऐसे समय में जब लोग कमज़ोर होते हैं या वे परिस्थितियों के प्रति पूर्ण रूप से सजग नहीं होते तब वे अनभिज्ञता में, दिमागी उलझन में कुछ ऐसा कर देते हैं, कि वे अनजाने में शैतान के चंगुल में फंस जाते हैं यानी वे शैतान की गिरफ्त में आकर अनजाने में ऐसा कुछ कर सकते हैं और वे नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं। यह वह तरीका है जिससे शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करता है। अभी भी कुछ लोग ऐसे हैं उन सांस्कृतिक परम्पराओं से अलग होने के अनिच्छुक हैं जिनकी जड़ें उनके दिमाग में गहरी जमी हुई हैं और वे उन्हें छोड़ नहीं सकते। विशेषकर यह तब होता है जब वे कमजोर और उदासीन होते हैं कि वे इस प्रकार की छुट्टियों को मनाने की इच्छा रखते हैं और वे फिर से शैतान से मिलना और उसे संतुष्ट करना चाहते हैं, ताकि ऐसा करके वे अपने अंदर भी संतुष्टि महसूस कर सकें। क्या ऐसा ही नहीं होता है? (हां) इन सांस्कृतिक परम्पराओं की पृष्ठभूमि क्या है? क्या दृश्य के पीछे शैतान का काला हाथ डोर को खींच रहा है? क्या शैतान का बुरा स्वभाव चीज़ों को चालाकी से नियंत्रित नहीं कर रहा है? क्या शैतान इन सब चीज़ों को नियंत्रित नहीं कर रहा है? (हां) जब लोग इस पारम्परिक संस्कृति में जीते और इस प्रकार की पारम्परिक छुट्टियों को मनाते हैं, तब क्या हम कह सकते हैं कि यह एक ऐसा वातावरण है जिसमें वे शैतान द्वारा मूर्ख बनाए जा रहे है और शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जा रहे हैं? क्या वे शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जाने से खुश नहीं हैं? क्या यह वह तरीका नहीं है? (हां) इस बात को तो हम सब मानते हैं, सही? और हम सब जानते भी हैं।

(द) शैतान कैसे अंधविश्वास का उपयोग मनुष्य को दूषित करने में करता है।

आप सब “अंधविश्वास” शब्द से तो परिचित हैं, सही? अंधविश्वास में अक्सर लोग किस के सम्पर्क में आते हैं? (झूठे ईश्वर) पारम्परिक संस्कृति में अतिव्यापीसमानता पाई जाती है। परन्तु आज हम उनके विषय में बात नहीं करेंगे। बल्कि मैं उन पर चर्चा करूंगा जिनसे हमारा बहुत सामान्य रूप से सामना होता हैः भविष्य कथन, ज्योतिष, धूप जलाना और बुद्ध की उपासना करना। कुछ लोग शगुन विचारते हैं, दूसरे बुद्ध की उपासना करते हैं और धूप जलाते हैं जबकि कुछ लोग अपना भाग्य पढ़वाते हैं या अपना भविष्य किसी को अपना चेहरा देखाकर भविष्य जानना चाहते हैं। आप में से कितनों ने अपना भविष्य दिखाया है या चेहरे से भविष्य जानने की कोशिश की है? काफी लोग इस तरह की चीज़ों में रुचि रखते हैं।, सही? (हां) ऐसा क्यों है? भविष्य जानने और ज्योतिष में लोगों को किस प्रकार का फायदा मिलता है? इसमें से वे किस प्रकार की संतुष्टि पाते हैं? (जिज्ञासा) क्या यह मात्र जिज्ञासा है? यह ऐसा नहीं हो सकता। भविष्य बताने का लक्ष्य क्या है? यह क्यों किया गया है? क्या यह भविष्य जानने के लिए नहीं है? कुछ लोग अपना चेहरा पढ़वाते हैं ताकि भविष्य का अनुमान लगा सकें। अन्य ऐसा इसलिए करते हैं कि देख सकें कि उनका भाग्य अच्छा है या नहीं। कुछ लोग ऐसा इसलिए करते हैं कि उनकी शादी कैसी रहेगी, और फिर अन्य यह कहते हैं कि देखें कि आने वाला वर्ष क्या भाग्य ला रहा है? कुछ लोग अपना चेहरा इसलिए पढ़वाते हैं कि देखें उनके बेटे या बेटी का भविष्य कैसा है, और कुछ व्यापारी लोग यह इसलिए करते हैं कि देखें कि वे कितना पैसा कमाएंगे और कुछ मार्गदर्शन पा सकें कि उन्हें क्या करना चाहिये? कुछ लोग केवल यह जानना चाहते हैं कि उनका भाग्य कैसा होगा और भविष्य क्या लाएगा। क्या यह सिर्फ जिज्ञासा शांत करना है? (नहीं) जब लोग अपना चेहरा पढ़वाते या इस प्रकार की बातें करते हैं, तो यह केवल उनके भविष्य के व्यक्तिगत लाभ के लिए हेाता है और वे यह विश्वास करते है कि यह उनके स्वयं भाग्य के साथ निकटता से जुड़ा है। क्या इनमें से कुछ भी उपयोगी है? (नहीं) यह उपयोगी क्यों नहीं हैं? क्या यह अच्छी बात नहीं है कि भविष्य के विषय में कुछ जाना जाए? यह आपको यह जानने में सहायता करेगा कि कोई मुसीबत कब आएगी, ताकि आप उससे बच सकते हैं यदि आप उसके विषय में पहले से जानते हों, सही? आपका भविष्य बता दिए जाने से आपकोपहले से ही उसके बारे में मार्गदर्शन मिल जायेगा, ताकि आने वाले वर्ष अच्छे हों और आप अच्छा पैसे वाला व्यापार कर सकें। क्या यह उपयोगी नहीं है? (नहीं) चाहे यह उपयोगी भी हो तो इसका हमसे कोई सम्बन्ध नहीं है, हम आज इस के बारे में संगति नहीं करेंगे। हमारे विचार विमर्श में यह मुद्दा और विषय शामिल नहीं है। शैतान कैसे अंधविश्वास का उपयोग लोगों को भ्रष्ट करने में करता है? लोग शकुन विचार, चेहरा पढ़ना और भविष्य बताना आदि जानना चाहते हैं, ताकि वे अपने भविष्य के विषय में जान सकें कि उनका भविष्य कैसा होगा या और आगे का मार्ग कैसा होगा, परन्तु अंतत:, किस के हाथ पहले से ही इन सब बातों को नियंत्रित कर रहे हैं? (परमेश्वर के हाथ) वे परमेश्वर के हाथों में हैं। जहां तक शैतान का सवाल है, इन विधियों का उपयोग करके वह लोगों को क्या जताना चाहता है? शैतान चेहरा पढ़ना और भविष्य बताने का उपयोग कर लोगों को बताना चाहता है कि वह उनका आगे का भविष्य जानता है और शैतान लोगों को बताना चाहता है कि वह इन बातों को जानता है, वह उन्हें नियंत्रित करता है। शैतान इस अवसर का लाभ उठाना चाहता है और लोगों को नियंत्रित करने में इन विधियों का उपयोग करता है ताकि लोग उस पर अंधा यकीन करें और उसकी हर बात मानें। उदाहरण के लिए, यदि भविष्यवक्ता आपका चेहरा पढ़करकुछ देर अपनी आंखें बंद करके आपको पिछले कुछ दशकों की बातें बड़ी स्पष्टता से बता दे तो आप अपने भीतर कैसा महसूस करेंगे? आप अचानक महसूस करेंगे, “मैं वास्तव में इस भविष्य बतानेवाले की सराहना करता हूं, वह कितना सटीक है! मैंने अपना अतीत कभी पहले किसी को नहीं बताया, वह इसके विषय में कैसे जानता है? यह शैतान के लिए बहुत कठिन नहीं होगा कि आपका अतीत जानें, सही? आज परमेश्वर आपको यहां लाया है, और शैतान भी लोगों को अब तक दूषित करता आया है और आपका पीछा करता आया है। शैतान एक बुरी आत्मा है, आपके दशकों का कालखण्ड शैतान के लिए कुछ भी नहीं है और उसके लिए ये सब बातें जानना कुछ कठिन नहीं है। जब आप जानते हैं कि जो शैतान ने कहा सटीक है, क्या आप उसके नियंत्रण में नहीं जा रहे हैं? एक दम से आपका हृदय उसके लिए कुछ आदर या श्रद्धा महसूस करेगा और कुछ लोगों के आत्मा पर तो उसने पहले ही कब्ज़ा कर लिया है। और आप तत्काल भविष्य बताने वाले से पूछोगे; मैं आगे क्या करूं? आने वाले साल में मुझे किस से बचना चाहिए? मुझे क्या नहीं करना चाहिए? और तब वह कहेगा; आपको वहां नहीं जाना चाहिए, आपको यह नहीं करना चाहिए, फलाने रंग के कपड़े मत पहनो, आपको ऐसे और ऐसे स्थानों पर बहुधा नहीं जाना चाहिए, और आपको कुछ बातें और अधिक करना चाहिए...” क्या आप हरेक बात जो वह कहता है एक दम से अपने दिल में ले नहीं लोगे? (हां) आप उसे परमेश्वर के वचन की अपेक्षा इसे जल्दी से याद कर लोगे। आप उसे इतनी जल्दी कैसे याद कर लोगे? (यह मेरे लिए लाभदायक है)। क्योंकि आप अच्छे भाग्य के लिए शैतान पर आश्रित होना चाहोगे, क्या यह वह समय नहीं है जब वह आपके दिल पर आपकी पकड़ बनाता है? तब जैसा उसने कहा है आप वैसा ही करते हैं तब उसके कहे हुए शब्द वैसे ही पूरे होते हैं जैसा पूर्वानुमान लगाया गया था। तब क्या आप यह जानने के लिए कि अगला साल क्या भाग्य लाएगा, फिर से उसके पास नहीं जाना चाहोगे? (हां) आप वही करेंगे जो शैतान आपसे करने के लिए कहेगा और आप उन बातों से बचोगे जिनसे वह बचने के लिए कहता है, क्या आप उसकी हर बात का पालन नहीं कर रहे हैं जो वह कहता है? आप तुरन्त उसकी शरण में चले जाओगे, भटककर पूरी तरह उसके नियंत्रण में चले जाओगे। इसका कारण यह है कि आप उस पर विश्वास करते हैं कि जो वह कहता है वह सच है और क्योंकि आप विश्वास करते हैं कि वह आपके पिछले जीवन के विषय में जानता है, आपके वर्तमान जीवन के बारे जानता हैऔर भविष्य में क्या होगा यह भी जानता है; यह वह विधि है जिससे शैतान लोगों को नियंत्रित करता है। पर वास्तविकता में कौन है जो नियंत्रण करता है? यह स्वयं परमेश्वर हैं, शैतान नहीं, शैतान केवल चालाकी से काम करता है। इस मामले में लोग अनजान हैं उसकी चालाकी से, उसकी चालाकी लोग केवल भौतिक जगत को देखते हैं, उस पर आश्रित रहते और विश्वास करते हैं। तब वे शैतान के चंगुल में पड़ जाएंगे और उसकी हर बात मानेंगे। परन्तु क्या जब लोग परमेश्वर पर विश्वास करना और उसके पीछे चलना चाहेंगे तब शैतान छोड़ देगा? शैतान नहीं छोड़ेगा। इस परिस्थिति में क्या लोग वास्तव में शैतान के चंगुल में पड़ रहे हैं? (हां) क्या हम कह सकते हैं कि इस संदर्भ में शैतान का व्यवहार सचमुच शर्मनाक है? (हां) हम ऐसा क्यों कहेंगे? (शैतान चालाकी उपयोग में लाता है) क्योंकि शैतान की चालाकी धोखा देने वाली और छल से भरी हुई है, शैतान बेशर्म है और शैतान लोगों को गुमराह करता है ताकि लोग यह सोचें कि वह उनकी सब बातों को नियंत्रित करता है वह लोगों को धोखा देता है ताकि लोग यह सोचें कि वह उनके भाग्य को नियंत्रित करता है। यह अनभिज्ञ लोगों से पूरी तरह से अपनी बात मनवा लेता है और उन्हें केवल एक या दो वाक्य से उन्हें बहकावे में लेकर उन्हें स्तम्भित कर देता है और लोग उसके आगे झुक जाते हैं। क्या यह सही है? (हां) तो शैतान किस प्रकार के तरीकों का उपयोग करता, वह क्या कहता है कि आप उस पर विश्वास करें? उदाहरण के लिए, आपने शैतान को नहीं बताया होगा कि आपके परिवार में कितने सदस्य हैं? पर शायद वह बता दे कि आपके परिवार में तीन सदस्य हैं, आपकी बेटी सात साल की है उ, और यहां आपके माता-पिता की उम्र इतनी है। यदि आरम्भ में आपको कुछ शक था भी तो यह सुनने के बाद क्या आपका विश्वास नहीं जमने लगेगा? (हां) तब शैतान कह सकता है कि आज आपके लिए कार्य करना कठिन होगा, आपके वरिष्ठ अधिकारी आपको उतना महत्व नहीं देते जितना आपको मिलना चाहिए और हमेशा आपके विरुद्ध कार्य करते रहते हैं। “इतना सुनने के बाद, आप सोचेंगे,” यह बिल्कुल सही है। दफ्तर में सब ठी-ठाक नहीं चल रहा है। “इससे आप शैतान पर थोड़ा और विश्वास करने लगोगे। तब वह आपको धोखा देने के लिये कुछ और कहेगा, ताकि आप और विश्वास करो, धीरे धीरे करके आपका प्रतिरोध कम होता चला जायेगा और आपका संदेह भी दूर हो जायेगा शैतान आपको अपनी छोटी-मोटी चालों से ही सम्मोहित कर देता है। और जैसे ही आप सम्मोहित हो जाते हैं, आप अपने आपे में नहीं रहते आप को समझ नहीं आएगा कि आप क्या करें और आप वही करना प्रारम्भ कर देंगे जो शैतान चाहता है। “क्या कमाल है!” विधि से शैतान मनुष्य को दूषित करता है, और आप अनजाने में शैतान के चंगुल में फंस कर उसके अधीन हो जाते हैं। शैतान जो कुछ बातें आपसे कहता है उन्हें लोग अच्छी बात समझते हैं, और तब वह आपको बताता है कि क्या करना है और क्या नहीं करना चाहिए, इस प्रकार आप अनजाने में उसकी राह पर चलने लगते हैं। एक बार जब आप उस राह पर चल पडें तो फिर आपको परेशानी ही परेशानी मिलेगी; आप लगातार यही सोचते रहेंगे कि शैतान ने क्या कहा, और आपको क्या करने को कहा और आप अनजाने में उसके वश में हो जाओगे। ऐसा क्यों है? यह इसलिए है क्योंकि मनुष्यों में सत्य की कमी है और वे शैतान प्रलोभन और बहकावे में फंसने से बचने में असमर्थ हैं। शैतान की बुराई और उसकी दगाबाजी, चालाकी और दुर्भावना का सामना करने में मानवजाति बेहद अनभिज्ञ, नासमझ और कमज़ोर है, सही है न? क्या यह उनमें से एक तरीका नहीं है जिनसे शैतान मनुष्य को दूषित करता है? (हां) मनुष्य अनजाने में धीरे धीरे शैतान के धोखे और चालाकियों में फंसता चला जाता है, क्योंकि लोग सकारात्मक और नकारात्मक के बीच अंतर नहीं कर पाते। उनमें शैतान पर विजय पाने का न तो स्तर होता है और न योग्यता होती है।

(इ) शैतान सामाजिक चलन को मनुष्य को दूषित करने के लिए कैसे उपयोग करता है।

क्या सामाजिक चलन एक नई घटना है? (नहीं) तो फिर वे कब प्रारम्भ हुए? क्या यह कहा जा सकता है कि जब से शैतान ने मनुष्य को दूषित करना आरंभ किया तभी से सामाजिक चलन शुरु हुआ? (हां) सामाजिक चलनमें क्या शामिल है? (कपड़ों की शैली और श्रृंगार) यह ऐसी कुछ चीज़ें हैं जिनसे लोगों का अक्सर सामना होता है। कपड़ों की शैली, फैशन, चलन यह एक छोटा पहलू है। क्या और भी कुछ है? क्या वह कहावत भी कुछ मायने रखती है जिसकी लोग अक्सर चर्चा करते हैं? क्या वह जीवनशैली भी मायने रखती है जिसकी लोग कामना करते हैं? क्या संगीत सितारे, विख्यात लोग, पत्रिकाएं और उपन्यास जिन्हें लोग पसंद करते हैं मायने रखती हैं? (हां) आपके विचार में इस चलन का कौन सा पहलू लोगों को दूषित करने के योग्य है? इन चलनों में से कौन सा आपके लिए बहुत मोहक है? कुछ लोग कहते हैं कि हम इतनी उम्र में पहुंच गए है। हम चालीस, पचास, साठ, सत्तर या अस्सी के हैं अब हम इस चलन में कहां जमते हैं और अब उन चीज़ों पर हमारा ध्यान नहीं जाता। क्या यह सही है? (नहीं) दूसरे कहते हैं कि हम विख्यात लोगों के पीछे नहीं भागते, यह सबकुछ किशोरों और नौजवानों के लिए है; हम फैशनवाले कपड़े भी नहीं पहनते, यह उन लोगों के लिये है जो अपनी छवि को लेकर काफी सतर्क रहते हैं। तो फिर इन में से कौन मनुष्य को दूषित करने के योग्य है? (मशहूर कहावत) क्या ये कहावतें लोगों को दूषित कर सकती हैं? मैं आपको एक बताता हूं आप देखिये कि यह लोगों को दूषित करती है या नहीं, “दाम संवारे सारे काम।” क्या यह चलन है? क्या यह चीज़ उस फैशन और स्वादिष्ट भोजन के चलन से भी ज़्यादा खराब नहीं है जिसकाअ ज़िक्र आप कर चुके हैं? (हां।) “दाम संवारे सारे काम।” यह शैतान की विचारधारा है और यह हर मानव समाज के प्रचलन में है। आप कह सकते हैं कि यह एक चलन है क्योंकि यह प्रत्येक के अंदर डाला गया और अब उनके हृदय में पैठ गया है। लोगों ने आरंभ में इसे स्वीकार नहीं किया लेकिन फिर धीरे-धीरे इसके आदी होते चले गये और जब उनका वास्तविक जीवन से सम्पर्क हुआ, तब उन्होंने धीरे-धीरे इसे मौन सहमति दे दी, उसके अस्तित्व को माना और आखिरकार अपनी सहमति की भी मुहर लगा दी। क्या यह सही है? (हां) क्या यही तरीका नहीं है जिससे शैतान मनुष्य को बर्बाद कर रहा है? शायद आप जो यहां बैठे हैं इस कहावत को उस परिमाण में नहीं समझते, लेकिन इस कहावत को देखने और समझने का प्रत्येक का अपना नज़रिया है, जो इस बात पर निर्भर है कि उनके आसपास किस प्रकार की चीज़े घटित हुई हैं और इस विषय में उनका अपना अनुभव क्या कहता है, सही है न? चाहे इस कहावत से किसी का कितना ही अनुभव रहा हो, इसका किसी के हृदय पर कितना नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है? (लोग सोचेंगे कि पैसा कुछ भी कर सकता है और वे पैसे का आदर करेंगे।) इस संसार में इंसानी स्वभाव के ज़रिये, इसमें यहां बैठे लोग भी शामिल हैं, लोगों की कुछ चीज़ें प्रकट होती हैं। इसकी व्याख्या कैसे की जायेगी? यह पैसे की उपासना है। क्या इसे किसी के दिल में से निकालना कठिन है? यह बहुत कठिन है! ऐसा जान पड़ता है कि शैतान का मनुष्य को दूषित करना सचमुच व्यापक है। क्या हम ऐसा कह सकते हैं? (हां) तो जब शैतान मनुष्य को इस चलन के ज़रिये दूषित कर लेता है, यह चीज़ उनमें कैसे अभिव्यक्त होती है? क्या आपको नहीं लगता कि बिना पैसे के इस दुनिया में आप एक दिन भी जीवित नहीं रह सकते, एक दिन भी असम्भव होगा? (हां) लोगों की हैसियत और सम्मान इस बात पर निर्भर करता है कि उनके पास कितना पैसा है, गरीब की कमर शर्म से झुकी हुई है जबकि धनी अपने उच्च स्तर का मजा लेते रहते हैं। वे ऊंचे पर घमंड से खड़े होकर , ज़ोर से बोलते हैं और अंहकार से जीते हैं। यह कहावत और चलन लोगों को क्या देते हैं? क्या बहुत से लोग पैसा पाने को ही सबकुछ नहीं समझते? क्या बहुत से लोग और पैसा कमाने के पीछे अपनी प्रतिष्ठा और ईमानदारी का बलिदान नहीं कर देते? क्या और बहुत से लोग अपने काम को अंजाम देने और परमेश्वर को खोजने का अवसर पैसे के लिए नहीं खो देते हैं? क्या यह लोगों के लिए हानि नहीं है? (हां) क्या यह शैतान का अशुभ कार्य नहीं है कि इस तरीके से कहावत के उपयोग से मनुष्य को इस हद तक दूषित करे? क्या यह दुर्भावनापूर्ण चाल नहीं है? जैसे आप इस कहावत का विरोध करने से लेकर अंततः उसे सच स्वीकार करने तक बहते जाते हैं, आपका दिल पूरी तरह से शैतान की गिरफ्त में आ जाता है, और इस तरह आप आनजाने में उसी के साथ जीने लगते हैं। इस कहावत ने आप पर किस हद तक असर डाला है? हो सकता है कि आप सच्चा मार्ग जानते हों, हो सकता है आप सत्य को जानते हों, परन्तु आपमें इतनी शक्ति नहीं कि आप उसका पालन कर सको। हो सकता है आप परमेश्वर के वचन को स्पष्टता से जानते हैं, पर आप कीमत चुकाने को तैयार नहीं, कीमत चुकाने के लिये दुख उठाने को तैयार नहीं। बल्कि अंत तक परमेश्वर के विरुद्ध जाने के लिये आप अपना भविष्य और नियति त्यागने को भी तैयार जायेंगे। परमेश्वर क्या कहता है इससे कोई मतलब नहीं, परमेश्वर क्या कहता है, उससे कोई सरोकार नहीं, भले ही आपको इसका कितना भी अहसास हो कि परमेश्वर आपसे कितना गहरा और महान प्रेम करता है, आप अपने ही रास्ते चलते रहेंगे और इस कहावत की कीमत चुकाएंगे। इसका मतलब यह है कि यह कहावत पहले से ही आप के विचारों और व्यवहारों पर नियंत्रण करती है और आप अपना भाग्य भी इसीकहावत से नियंत्रित कराते हैं और इस कहावत के लिए आप सब कुछ त्याग सकते हैं। लोग ऐसा करते हैं, वे इस कहावत द्वारा नियंत्रित किए जाते हैं और इस के द्वारा चलाए जाते हैं। क्या यह शैतान का मनुष्यों को दूषित करने का प्रभाव नहीं है? क्या यह शैतान की अवधारणा और दूषित स्वभावआपके हृदय में जड़ नहीं पकड‌ते जा रहे हैं? यदि आप ऐसा करते हैं, तो क्या शैतान ने अपना लक्ष्य प्राप्त नहीं कर लिया है? (हां) क्या आप देख सकते हैं कि शैतान ने मनुष्य को किस तरह से दूषित किया है? (नहीं) आपने यह नहीं देखा। क्या आप इसे महसूस कर सकते हैं? (नहीं) आपने इसे महसूस नहीं किया। क्या आप यहां शैतान की बुराई देखते हैं (हां) शैतान हर समय और हर जगह मनुष्यों को दूषित करता है। शैतान मनुष्य के लिए अपना विरोध करना, असम्भव बना देता है और इसके लिए मनुष्य को असहाय बना देता है। शैतान आपसे अपने विचार, अपने दृष्टिकोण, और उनसे जो बुरी बातें आती हैं, इन परिस्थितियों में जहां आप अज्ञानता में हैं, और जब आपको यह भी मालूम नहीं है कि आपके साथ क्या हो रहा है, उन्हें स्वीकार करवाता है। लोग बिना किसी अपवाद के इन बातों को पूरी तरह ग्रहण करते हैं। वे खुश होते हैं और उन बातों को धरोहर की तरह रखते हैं, वे उन चालाकियों में आ जाते हैं और उनके हाथों में खिलौनों की तरह खेलते हैं। और इस प्रकार शैतान का मनुष्य को दूषित करना और गहरा होता जाता है।

पूर्व में उल्लेखित वे तरीके, जो शैतान लोगों को दूषित करने के लिए उपयोग करता है, प्रत्यक्ष है और प्रत्येक ने उनका अनुभव किया है; शैतान उनका उपयोग करता है और उनसे बचना सम्भव नहीं। मनुष्य के पास ज्ञान और कुछ वैज्ञानिक सिद्धांत हैं, मनुष्य पारम्परिक संस्कृति के प्रभाव में जीता है, और प्रत्येक पारम्परिक संस्कृति का वारिस है। मनुष्य शैतान के द्वारा दी गई पारम्परिक संस्कृति को पालन करने के लिए बाध्य है, और इसके साथ ही उन सामाजिक रीति-रिवाज़ के साथ सामंजस्य बैठाकर कार्य करने के लिये बाध्य है जो शैतान ने मनुष्यों को उपलब्ध कराये हैं। शैतान से अभिन्नहोने के बावजूद, जो कुछ शैतान हर समय करता है उसमें सहयोग देना, उसकी धूर्तता, हठ, दुर्भावना और बुराई को स्वीकारना - शैतान के इन स्वभावों को आत्मसात करने के बाद - क्या मनुष्यों के बीच में और संसार में रहते हुए मनुष्य खुश है या दुखी? (दुखी) आप ऐसा क्यों कहेंगे? (वह इन बातों से बंधा हुआ है और उसका जीवन एक कड़वा संघर्ष है।) है न? हो सकता है आपने किसी ऐसे व्यक्ति को देखा हो जो चश्मा लगाए हुए है और दिखने में बहुत बुद्धिमान लगता हो; वह कभी चिल्लाता न हो, हमेशा बोलने में निपुण, बुद्धि सम्पन्न हो, और इसके अलावा, क्योंकि वह बहुत आयु का है, हर तरह के हालत से होकर गुजरा होगा तो उसे बहुत अनुभव भी काफी होगा, हो सकता है कि वह किसी भी मामले में,चाहे छोटा हो या बड़ा, विस्तार और अधिकार से बोल सकता हो, और जो कहता हो उसका उसके पास मजबूत आधार हो, हर बात की प्रमाणिकता और तर्क के लिये उसके पास सिद्धांत भी हों; लोग उसका व्यवहार, व्यक्तित्व, उसका आचरण, उसकी निष्ठा और उसका चरित्र देखकर सोचत हों कि उस व्यक्ति में तो कोई दोष नहीं है। ऐसे व्यक्ति मौजूदा सामाजिक रीतियों का विशेष ध्यान रखते हैं और कभी पुराने ढंग में नहीं देखे जाते; ऐसे व्यक्ति अग्रगण्य और आधुनिक शैली के होते हैं। ऐसा व्यक्ति वृद्ध होते हुये भी वक्त के साथ कदम मिलाकर चलता है और कभी पुराना नहीं पड़ता है। ऊपर से देखने पर ऐसे व्यक्ति में कोई दोष दिखाई नहीं देते, लेकिन अंदर से ऐसा व्यक्ति शैतान के द्वारा पूरी तरह से दूषित हो चुका होता है। ऊपर से कुछ भी गलत नहीं है, वह विनम्र है, सुसंस्कृत है, ज्ञानवान है और एक खास नैतिकता रखता है, वह निष्ठावान है और नौजवानों जितनी ही जानकारी रखता है। फिर भी, उसके स्वभाव और उसके तत्व के सम्बन्ध में, यह व्यक्ति शैतान का पूर्ण और जीवित नमूना है। वह शैतान का रूप और छवि है। यह शैतान के मनुष्य को दूषित करने का “फल” है। मैंने जो कहा हो सकता है कि वह आपके लिए दुखदायी हो, परन्तु यह सब सच है। जिस ज्ञान का मनुष्य अध्ययन करता है, जो विज्ञान वह समझता है और सामाजिक रीति में ठीक से व्यवस्थित होने के लिए वह जिस राह पर वह चलता है, बेशक ये शैतान के द्वारा दूषित करने वाले औजार हैं। यह बिल्कुल सच है। इसलिए मनुष्य एक दूषित स्वभाव में जीता है जो कि शैतान द्वारा पूरी तरह से भ्रष्ट किया गया है और मनुष्य के पास यह जानने का कोई तरीका नहीं है कि परमेश्वर की पवित्रता क्या है या परमेश्वर का तत्व क्या है। ऐसा इसलिए है क्योंकि शैतान मनुष्यों को जिस तरीके से दूषित करता है, उसमें ऊपरी सतह पर कोई दोष नहीं ढूंढ सकता, किसी के व्यवहार द्वारा कोई यह नहीं बता सकता कि उसमें कुछ कमी है। प्रत्येक व्यक्ति अपने कार्य पर सामान्य तौर पर जाता है और सामान्य जीवन जीता है, वह सामान्य तौर से पुस्तकें और समाचार पत्र पढता है, सामान्य तौर पर अध्ययन करता और बोलता है, कुछ लोगों ने तो यहां तक सीख लिया है कि नैतिकता का मुखौटा कैसे पहनें, जिससे उनके अभिवादन नम्र हों, शिष्ट बनें, दूसरों को समझने वाले बनें, मित्रवत बनें, दूसरों के मददगार बनें, दानशील बनें, और दूसरों के साथ हड़बड़ी करने वाला बनने से बचें और दूसरों का फायदा उठाने से बचें। जबकि उनके मन का दूषित शैतानी स्वभाव उनमें गहरी जड़ पकड़ चुकाहै;। यह तत्व बाहरी प्रयासों से परिवर्तित नहीं किया जा सकता है। परमेश्वर के तत्व के कारण मनुष्य परमेश्वर की पवित्रता को समझ नहीं सकता, इस के बावजूद कि परमेश्वर की पवित्रता का तत्व मनुष्य के लिए सार्वजनिक कर दिया गया है, मनुष्य इसे गम्भीरता से नहीं लेता। ऐसा इसलिए है कि शैतान ने पहले से ही मनुष्य के एहसास, विचार, दृष्टिकोण और चिंतन को विभिन्न साधनों से अपने कब्जे में कर लिया है। यह कब्जा और भ्रष्टता अस्थायी या प्रासंगिक नहीं है; यह हर जगह और हर समय विद्यमान है। इसलिए बहुत से लोग जो 3 या 4 साल से या 5 या 6 साल से परमेश्वर पर विश्वास पर विश्वास करते चले आ रहे हैं, वे अभी भी उन विचारों और दृष्टिकोण को, जो शैतान ने उनमें बैठा दिए हैं, ऐसे पकड़े हुए हैं जैसे कि कोई खज़ाना हो। क्योंकि मनुष्य ने बुरे, अहंकारी और शैतान के द्रोही स्वभाव को स्वीकार कर लिया है, और इस तरह मनुष्य अक्सर आपसी रिश्तों के अंतर्द्वंद्व में फंस जाता है, वर्क-वितर्क और असामंजस्यता की स्थिति में उलझ जाता है, और यह सब परिणाम है शैतान के अहंकारी स्वभाव का। यदि शैतान ने मानवजाति को सकारात्मक बातें दी होतीं - उदाहरण के लिए यदि मनुष्य द्वारा स्वीकृत पारम्परिक संस्कृति के कंफ्यूशीवाद और ताओवाद को अच्छा माना जाता तो उन्हें स्वीकार करने के बाद उसी प्रकार की मानसिकता वाले व्यक्तियों को आपस में मिलजुलकर रहना चाहिये था। जिन्होंने उन वादों को स्वीकार कर लिया था तो उनके बीच इतना विभाजन क्यों है? क्यों है ऐसा? यह इसलिए हुआ है क्योंकि ये बातें शैतान द्वारा दी गई हैं और शैतान लोगों में विभाजन उत्पन्न करता है। शैतान जो बातें देता है, वे धरातल पर कितनी भी प्रतिष्ठित और महत्वपूर्ण दिखाई पड़ें, पर कोई मतलब नहीं, वे मनुष्यों के जीवन में केवल घमण्ड़ और शैतान के बुरे स्वभाव की धूर्तता के अलावा और कुछ नहीं लातीं। क्या यह सही नहीं है? कुछ लोग जो अपने आप को छद्मरूप दे सकते हैं, ज्ञान का भंडार रखते हैं, जिनकी अच्छी परवरिश हुई है, उनके लिये अपने शैतानी स्वभाव को छुपा पाना बहुत कठिन होगा। कोई व्यक्ति अपने आपको कितना भी छिपाए, भले ही आप उसे संत समझें, या आप सोचें कि वह आदर्श व्यक्ति है, या आप उसे फरिश्ता है, आप उसे कितना भी शुद्ध मानें, उनका जीवन पर्दे के पीछे क्या होगा? उनके स्वभाव के प्रकाशन में आप किस तत्व को देखोगे? बिना किसी शक के आप शैतान का बुरा स्वभाव देखेंगे। क्या कोई ऐसा कह सकता है? (हां) उदाहरण के लिए ऐसा कोई व्यक्ति जो आप के निकट है जिसे आप सोचते हैं कि वह अच्छा व्यक्ति है, या आपका विचार उसके लिए अच्छा व्यक्ति होने का है, जिसे आप एक आदर्श व्यक्ति मानते हैं। अपनी वर्तमान हैसियत में आपके उसके बारे में क्या विचार हैं? पहले, आप यह देखोगे कि इस प्रकार के व्यक्ति में मानवता है या नहीं, क्या वे ईमानदार हैं, क्या उन्हें लोगों से सच्चा प्यार है, क्या उनके वचन और काम लाभप्रद हैं और दूसरों की मदद करते हैं। (नहीं) दिखावे की दयालुता, प्रेम या अच्छाई यहां प्रदर्शित होती है, आखिर यह है क्या? यह सब कुछ छलावा है, झूठ है। यह परदे के पीछे मुखौटे का एक गुप्त बुरा उद्देश्य है, उस व्यक्ति को प्रिय और पूजित बनाना है। क्या आप इसे स्पष्टता से देखते हैं? (हां)

जो विधियां शैतान लोगों को दूषित करने के लिए उपयोग में लाता है क्या वह मनुष्यता लाती हैं? क्या इसके विषय में कुछ भी सकारात्मक है? (नहीं) पहली बात, क्या मनुष्य अच्छे और बुरे में अंतर कर सकता है? (नहीं) देखिये, इस संसार में चाहे कोई बड़ा व्यक्ति हो, या कोई समाचार पत्र हो, या कोई रेडियो स्टेशन हो, वे सब यही कहते हैं कि यह या वह अच्छा या बुरा है, क्या वह सटीक है? (नहीं) क्या वह सही है? (नहीं) क्या घटनाओं और लोगों के बारे में उनका आकलन उचित है? (नहीं)। क्या इसमें कोई सच्चाई है? क्या यह संसार या मानवता, सकारात्मक और नकारात्मक बातों का आकलन सत्य के मानक के आधार पर करते हैं? (नहीं)। लोगों में वह योग्यता क्यों नहीं है? लोगों ने ज्ञान का इतना अधिक अध्ययन किया और विज्ञान के विषय में इतना जाना, तो क्या उनकी योग्यताएं इतनी महान नहीं हैं? वे सकारात्मक और नकारात्मक बातों में अंतर क्यों नहीं कर पाते? ऐसा क्यों है? (क्योंकिलोगों में सच्चाई नहीं है, विज्ञान और ज्ञान सत्य नहीं हैं।) प्रत्येक वस्तु जो शैतान मानवता के लिए लाता है उसमें बुराई और भ्रष्टाचार है, और उसमें सच, जीवन और सन्मार्ग का अभाव होता है। मनुष्य के लिये बुराई और भ्रष्टाचार लाने वाले शैतान क्या प्रेम हो सकता है? क्या आप कह सकते हैं कि मनुष्य के पास प्रेम है?कुछ लोग कह सकते हैं: “आप गलत हैं, इस सारे संसार में बहुत से लोग हैं जो गरीब और बेघर लोगों की मदद करते हैं, क्या वे अच्छे लोग नहीं हैं? कई धर्मार्थ संगठन भी हैं जो भले कार्य करते हैं, क्या उनके सब काम लोगों के भले के लिए नहीं हैं?” तो फिर इसके विषय में हम क्या कहें? शैतान मनुष्य को दूषित करने के लिए बहुत-सी अलग-अलग विधियों और सिद्धांतों का उपयोग करता है; क्या यह मनुष्य का दूषित होना अस्पष्ट धारणा है? नहीं यह अस्पष्ट नहीं है। शैतान कुछ व्यवहारिक बातें भी करता है जिनमें बहुत-सी बुरी बातों को ऐसा प्रस्तुत करता है जैसे अच्छी बात हो, और तो और, शैतान धोखेबाजी के कार्य भी, अपने निहित भाव और उद्देश्य के लिए करता है। दूषित लोग और शैतान एक जैसे हैं, वे भी इस संसार में हैं और समाज में एक दृष्टिकोण या सिद्धांत को बढ़ावा देते हैं। प्रत्येक राजवंश और प्रत्येक युग में वे एक सिद्धांत को बढ़ावा देते और मनुष्यों के भीतर कुछ विचार संस्थापित करते हैं। ये विचार और सिद्धांत धीरे-धीरे लोगों के दिमाग में जड़ पकड़ लेते हैं, और तब मनुष्य उन विचारों और सिद्धांतों के साथ जीना प्रारम्भ कर देते हैं; क्या वे अज्ञानतावश शैतान नहीं बन जाते हैं? क्या लोग शैतान के साथ एकाकार नहीं हो गये हैं? जब लोग शैतान के साथ एक हो जाते हैं, तब अंत में उनका व्यवहार परमेश्वर के प्रति क्या होता है, क्या वही आचरण नहीं हो जाता जो शैतान का परमेश्वर के प्रति है? कोई भी इसे मानने का साहस नहीं कर सकता, सही है न? यह बहुत भयानक है। मनुष्य शैतान हैं, और उनका स्वभाव ठीक शैतान के स्वभाव जैसा ही है। मैं क्यों कहता हूं कि शैतान का स्वभाव बुरा है? जो शैतान ने किया और जो बातें शैतान ने प्रकाशित की हैं, उनके आधार पर इसका निर्धारण और विश्लेषण किया गया है; अगर मैं कहूं शैतान बुरा है, तो आप क्या सोचेंगे? आप सोचेंगे, “सही बात है, शैतान बुरा है।” फिर मैं आप से पूछूंगाः “शैतान का कौनसा पहलू बुरा है?” यदि आप कहें: “शैतान का परमेश्वर का विरोध करना बुरा है” आप अभी भी सफाई के साथ नहीं बोल रहे होंगे। अब हमने इस प्रकार से सुनिश्चित वर्णन किया; क्या आपको शैतान की बुराई के सार के विशिष्ट अंशों की समझ है? (हां) अब जबकि आप को शैतान के बुरे स्वभाव की समझ आ गई है, तो अपने स्वयं के बारे में आप कितना समझते हैं? क्या ये बातें जुड़ी हुई हैं? (हां) क्या यह जुड़ना आपको दुख देता है? (नहीं) क्या यह आपके लिए सहायक है? (हां) यह कितना सहायक है? (बहुत सहायक है आइए सुस्पष्टता से बात करें, मैं अस्पष्ट शब्द नहीं सुनूंगा। यह “बहुत बड़ा” का क्या अभिप्राय है? (हम जानते हैं कि परमेश्वर किन बातों से घृणा करता है, कौन सी बातें परमेश्वर के विरोध में जाती हैं; हमारे दिल उन बातों को लेकर कुछ कुछ साफ हैं।) क्या और कुछ भी इसमें जोड़ने के लिए है? जब मैं परमेश्वर की पवित्रता के तत्व के विषय में संगति करता हूं तो क्या यह भी आवश्यक है कि मैं शैतान की बुराई के तत्व के बारे में भी संगति करूं? आपकी क्या राय है? (हां यह आवश्यक है) क्यों? (शैतान की बुराई परमेश्वर की पवित्रता को ऊंचे पर स्थापित करती है।) क्या यह ऐसा ही है? यह आंशिक तौर पर सही है कि बिना शैतान की बुराई के, लोग परमेश्वर की पवित्रता को नहीं जान पाएंगे; यह सही है। फिर भी यदि आप कहते हैं कि परमेश्वर की पवित्रता का अस्तित्व तभी है जब सामने शैतान की बुराई होती है। क्या यह सही है? यह तर्क गलत है। परमेश्वर की पवित्रता परमेश्वर का अंतर्निहित तत्व है; यद्यपि परमेश्वर इसे प्रगट करता या कार्य करता है, यह अंतर्निहित तत्व उसमें विद्यमान है और यह स्वभाविक रूप से प्रकट होता है, यह परमेश्वर में अंतर्भूत है और सदा से अस्तित्व में है, परन्तु मनुष्य उसे देख नहीं सकता। मनुष्य शैतान के दूषित स्वभाव में और दूषित तत्व में रहता है, और मनुष्य पवित्रता को या परमेश्वर की पवित्रता के विशिष्ट अंशको नहीं जानता है। क्या यह सही है? तो फिर क्या आप सोचते हैं कि हमें पहले शैतान के बुरे तत्व के बारे में संगति करनी आवश्यक है? (हां, आवश्यक है।) देखिये, हमने परमेश्वर की विशिष्टताओं के कई पहलुओं पर संगति की है और हमने शैतान के तत्व की चर्चा भी नहीं की, सही? कुछ लोग अपना शक कुछ इस प्रकार जाहिर कर सकते हैं, “आप केवल परमेश्वर के विषय में बात करते हैं, आप हर समय शैतान लोगों को दूषित करता है, और शैतान का स्वभाव बुराई है, ऐसा क्यों कह रहे हैं?” क्या आपने इस संदेह का समाधान कर लियाहै? (हां) कैसे आपने इस संदेह का समाधान किया? (परमेश्वर की संगति के द्वारा, अंतर कर लिया कि बुराई क्या है?) जब लोग बुराई पर विचार करते हैं और जब उनके पास उसकी एक सटीक परिभाषा होती है, जब लोग बुराई के विशिष्ट अंश और प्रकाशन को देख सकते हैं, बुराई के स्रोत और तत्व को देखते हैं - जब परमेश्वर की पवित्रता की अभी चर्चा होती है - तब लोग स्पष्ट रूप से जान पाएंगे और इसे परमेश्वर की सच्ची पवित्रता के रूप में पहचान पाएंगे। यदि मैं शैतान की बुराई की चर्चा नहीं करता, तो कुछ लोग गलतफहमी में यह विश्वास करेंगे कि लोग जो कुछ समाज में या लोगों के बीच में करते हैं - या इस संसार में करते हैं - वे पवित्रता से सम्बन्धित हो सकता है। क्या यह दृष्टिकोण गलत नहीं है? (हां) तभी तो मैंने शैतान के तत्व की चर्चा की है। आपने इतने वर्षों के अनुभव के द्वारा, परमेश्वर के वचन को देखने से और उसके कार्यों का अनुभव करने से अपने परमेश्वर की पवित्रता की कितनी समझ प्राप्त की है?। इस विषय में खुलकर बताइये। ऐसे शब्दों की आवश्यकता नहीं है जो मन को अच्छे लगें, बल्कि अपने अनुभव से बोलें, क्या परमेश्वर की पवित्रता केवल उसका प्रेम है? क्या वह केवल परमेश्वर का प्रेम मात्र है जिसे हम उसकी पवित्रता कहते हैं? वह कुछ ज़्यादा ही एक तरफा होगा, सही? वह एक तरफा नहीं होगा क्या? (हां) इसलिए परमेश्वर के प्रेम के अलावा भी परमेश्वर के तत्व के दूसरे पहलू भी हैं जो आपने देखे हैं? (हां) आपने क्या देखा? (परमेश्वर की पवित्रता यह है कि परमेश्वर त्यौहारों और अवकाशों, रीतियों और अंधविश्वासों से घृणा करता है।) अभी आपने महज़ इतना कहा कि परमेश्वर कुछ बातों से घृणा करता है; परमेश्वर पवित्र है, तो इसीलिये वह घ्रणा करता है, क्या आपका यही मतलब है? (हां।) इसके मूल में, परमेश्वर की पवित्रता क्या है? परमेश्वर की पवित्रता में कोई ठोस तत्व ज्ञान नहीं है, वह केवल चीज़ों से घृणा करता है? क्या आप अपने दिमाग में यह सोच रहे हैं, “क्योंकि परमेश्वर इन बुरी बातों से घृणा करता है, इसलिए कह सकते हैं कि परमेश्वर पवित्र है?” क्या यह यहां केवल परिकल्पना और धारणा नहीं है? जब परमेश्वर के तत्व को समझने की बात आती है तब सबसे बड़ा निषेध क्या है? (सच्चाई को पीछे छोड़ देना)। जब हम सिद्धांत की बात करने में वास्तविकता को पीछे छोड़ देते हैं, तो यह सर्वाधिकनिषेध की बात होती है। और कुछ? (अटकलबाज़ी और कल्पना) अटकलबाज़ी और कल्पना, ये भी बहुत मजबूत निषेध हैं। अटकलबाज़ी और कल्पना उपयोगी क्यों नहीं हैं? क्या उन चीजों को जिनका आप अनुमान लगाते और कल्पना करते हैं उनको वास्तव में क्या देख सकते हैं? (नहीं) क्या वे परमेश्वर का सच्चा तत्व हैं? (नहीं) निषेध और क्या है? परमेश्वर के तत्व के विषय में कर्णप्रिय लगने वाले शब्दों के समूह को गिनना निषेध है क्या? (हां) क्या यह अहंकारी होना या बकवास करना नहीं है? कर्णप्रिय शब्दों के चयन की तरह ही धारणा और अटकलबाज़ी भी बकवास बातें हैं। क्या और कुछ भी है? खाली तारीफ भी बकवास है, सही? (हां) क्या परमेश्वर लोगों को ऐसी बकवास की बातें कहते हुए सुनना पसंद करताहैं? (नहीं, वह नहीं करता) किसी बात का “मजा नहीं लेना” का पर्याय क्या है? (परेशानी महसूस करना) यह सुनकर वह असुविधा महसूस करता है। परमेश्वर लोगों के एक समूह की अगुवाई करता है और उसे बचाता है। और बचाए जाने के बाद लोगों का यह समूह जब उसका शब्द सुनता हैतो वह कभी भी यह नहीं समझता कि उसका अर्थ क्या है? कोई पूछ सकता हैः “क्या परमेश्वर अच्छा है?” और वे प्रत्युत्तर देंगे “अच्छा!” “कितना अच्छा?” “इतना अच्छा!” “क्या परमेश्वर मनुष्य से प्रेम करता है?” “हां” “कितना?” “इतना”। “क्या आप परमेश्वर के प्रेम की व्याख्या कर सकते हैं?” “वह सागर से भी ज्यादा गहरा है, आसामान से भी ऊंचा है!” क्या यह बकवास नहीं है? क्या यह वैसा ही निरर्थक नहीं है जैसा अभी आपने कहा, “परमेश्वर शैतान के दूषित स्वभाव से घृणा करता है, इसलिए परमेश्वर पवित्र है?” (हां) क्या अभी आपने जो कहा है वह बकवास नहीं है? ज्यादातर निरर्थक बातें जो कहीं जाते हैं वे कहां से आती हैं? (शैतान से)। वे शैतान से आती हैं। जो निरर्थक बातें कही जाती है, वे मूलत: लोगों की लापरवाही और परमेश्वर के प्रति अश्रद्धा होने के कारण आती है। क्या हम यह कह सकेंगे? (हां) अभी तक आपने समझ प्राप्त नहीं की अभी भी बकवास बातें करते हो, क्या यह गैरज़िम्मेदार होना नहीं है? क्या यह परमेश्वर के प्रति अशिष्ट होना नहीं है? आपने ज्ञान का कुछ अध्ययन किया है, कुछ कारणों को और कुछ तर्कों को समझा है, जिनका आपने यहां उपयोग किया और परमेश्वर को जानने का काम पूरा कर लिया। क्या आप सोचते हैं कि यह सुनकर परमेश्वर असुविधा महसूस करता है? इन विधियों का उपयोग कर आप परमेश्वर को कैसे जान सकते हैं? क्या यह विचित्र नहीं लगता? इसलिए, जब परमेश्वर के ज्ञान की बात आती है, व्यक्ति को बहुत ही अधिक सावधान रहने की आवश्यकता है; जहां आप परमेश्वर को जानते हैं, केवल उतना ही कहें। ईमानदारी से और व्यवहारिकता से बात करें और अपने शब्दों को रोज़मर्रा की सराहना से न सजाएं और चापलूसी न करें; परमेश्वर को इसकी आवश्यकता नहीं और इस प्रकार की बातें शैतान से आती हैं। शैतान का स्वभाव अंहकार है और शैतान चापलूसी और अच्छे शब्द सुनना पसंद करता है। यदि लोग कर्णप्रिय शब्दों की सूची बनाएं जो उन्होंने सीखे और उसे शैतान के लिए इस्तेमाल करें तो शैतान खुश और आनन्दित होगा। परन्तु परमेश्वर को इसकी आवश्यकता नहीं; परमेश्वर चाटुकारिता और चापलूसी पसंद नहीं करता। और उसे इसकी ज़रूरत नहीं कि लोग बकवास बात करें और आंख मूंदकर उसकी प्रशंसा करें। परमेश्वर ऐसी बातों से घृणा करता और उस प्रशंसा और चापूलसी को सुनेगा भी नहीं जो वास्तविकता की लीक से हटकर निकलती है। तो जब लोग आंख मूंदकर परमेश्वर की प्रशंसा करते हैं और जो वे कहते हैं वह उनके हृदय की बातों से मेल नहीं खाती, और वे बेकार में परमेश्वर की शपथ खाते हैं और लापरवाही से उससे प्रार्थना करते हैं, परमेश्वर बिल्कुल भी नहीं सुनता। आप जो कहते हैं आपको उसकी जवाबदारी लेनी चाहिए। यदि आप कुछ नहीं जानते, तो ऐसा कहिए, यदि आप कुछ जानते हैं तो उसे व्यवहारिक रूप से प्रगट कीजिए। अब परमेश्वर की पवित्रता के यथार्थ तत्व के विषय में, क्या आप को इसकी विशिष्ट समझ है? अब आप बकवास करने का साहस नहीं करेंगे, सही? आप निरर्थक बात नहीं कर रहे हैं पर बोलना बंद नहीं कर सकते, तो आप को कुछ समझदारी होना आवश्यक है, सही है? क्या आप इसके बारे में सोच रहे हैं? आप इसे निष्ठापूर्वक सम्भाल हे हैं, सही? अब आप कुछ बातें कह सकते हैं। (अब मैं ने बगावत की जब मैंने अतिक्रमण किया, मैंने परमेश्वर के न्याय और ताड‌‌ना को प्राप्त किया और उसमें मैंने परमेश्वर की पवित्रता को देखा। जब मैं उन परिस्थितियों और वातावरण में पड़ गया जो मेरी अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं थी, तब मैंने इन बातों के लिए प्रार्थना की और मैंने परमेश्वर की इच्छा को पुकारा और परमेश्वर ने अपने वचन के द्वारा मुझे शिक्षा और अगुवाई दी, और मैंने परमेश्वर की पवित्रता को देखा।) यह आपके स्वयं के अनुभव के द्वारा है, सही? (जब परमेश्वर सारे रास्ते में लोगों की अगुवाई करता है और जैसे वह लोगों के ऊपर प्रभुता करता है, उसमें मैं परमेश्वर की पवित्रता को देखता हूं। वास्वत में, जैसा परमेश्वर ने कहा है कि कैसे शैतान मनुष्य को दूषित करता है, और मनुष्य शैतान के भ्रष्टाचार और प्रभाव में जीता आया है, तो मनुष्य का उस पर कोई नियंत्रण नहीं है, मैं सचमुच परमेश्वर की पवित्रता को मनुष्यों में परमेश्वर के कार्य के द्वारा देखता हूँ।) (परमेश्वर ने जो कहा उसमें मैंने देखा है कि मनुष्य शैतान द्वारा इस प्रकार दूषित किया जाता है और उसे नुकसान पहुंचाता है।, फिर भी, परमेश्वर ने हमें बचाने के लिए सब कुछ दे दिया है, और इसमें मैं परमेश्वर की पवित्रता को देखता हूं।) यह वास्तविक तरीका है और यह सच्चा ज्ञान है। क्या इसमें कोई अलग ख्याल है? (मेरी समझदारी सही है या नहीं, यह मैं नहीं जानता। उस संगति में जिसमें परमेश्वर हमारे साथ था, शैतान जो कहता और करता है, उसमें मैं शैतान की बुराई देखता हूं। पहली संगति में हमने देखा कि परमेश्वर ने मनुष्य को बताया कि वह क्या खा सकता और क्या नहीं खा सकता है, और परमेश्वर के वचन के स्वच्छता और सीधेपन को प्रकाशित किया; उसके द्वारा मैं परमेश्वर की पवित्रता को देखता हूं। मैं बस यही कह सकता हूं।) आपने जितने लोगों को उनमें से किसके शब्दों को आप अधिकतम ऐसा ही हो या आमेन कहेंगे? किसका भाषण, किसकी संगति आज हमारी संगति के विषय के सबसे निकट थाऔर सबसे अधिक वास्तविक था? अंतिम बहन की संगति कैसी थी? (अच्छी) जो उसने कहा उस पर आपने आमेन कहा, उसने जो कहा वह क्या सही लक्ष्य पर था? आप स्पष्टता से अपनी बात कहें, आप इस बात की चिंता न करें कि आप गलत हो सकते हैं। (उस बहन के अभी कहे हुए शब्दों में मैंने सुना कि परमेश्वर का वचन खरा और बहुत स्पष्ट है, वह शैतान के चक्करदार शब्दों के समान नहीं है। मैंने परमेश्वर की पवित्रता को इसमें देखा।) यह इसका भाग है। अभी क्या कहा गया आप सबने सुना था? (हां) क्या सही था? (हां) आइए हम ताली बजाकर बहन की प्रशंसा करें। बहुत अच्छा। मैं देखता हूं कि आपने हाल ही की इन दो संगतियों में कुछ प्राप्त किया है, परन्तु आपको लगातार कठिन परिश्रम करते रहना चाहिए। आपके कठिन परिश्रम करने का कारण यह है कि परमेश्वर के तत्व की समझदारी एक बहुत ही गहरा पाठ है; यह ऐसा नहीं है कि कोई आए और एक ही रात में समझ जाए या केवल कुछ ही शब्दों में स्पष्टता से बोल सके।

लोगों के दूषित शैतानी स्वभाव, ज्ञान, दर्शनशास्त्र का प्रत्येक पहलू, लोगों के विचार और दृष्टिकोण और व्यक्तिगत पहलू, उन्हें परमेश्वर के तत्व को पहचानने में सबसे बड़ी बाधा बनते हैं; तो जब आप ये विषय सुनते हैं, तो कुछ विषय आप की पहुंच से बाहर हो सकते हैं, कुछ विषयों को को आप समझ नहीं सकते हो, और कुछ विषयों को आप वास्तविकता के साथ आधारभूत रूप से मिला नहीं पायेंगे। इस सबसे से अलग, मैंने आपकी परमेश्वर की पवित्रता की समझ के विषय में सुना है और मैं जानता हूं कि परमेश्वर की पवित्रता के विषय में जो मैंने कहा और संगति की है, अपने हृदय में उसे आपने मानना प्रारम्भ कर दिया है। मैं जानता हूं कि आपके हृदय में परमेश्वर की पवित्रता के तत्व को समझने की इच्छा अंकुरित होने लगी है। पर मुझे और भी आनन्दित क्या करता है? वह यह कि आप में से कुछ परमेश्वर की पवित्रता के ज्ञान को साधारण शब्दों में व्याख्या करने के योग्य हो गए हैं। यद्यपि यह कहने के लिए एक साधारण सी बात है और इसे मैंने पहले भी कहा है कि आप में से अधिकांश के मन में अभी भी यह बात को सहमति मिलना या इसका प्रभाव पड‌ना बाकी है। तथापि, आप में से कुछ ने इन शब्दों को अपने दिल में लिया है यह बहुत अच्छा है और यह एक अच्छी शुरूआत है। मैं आशा करता हूं कि वह विषय जो आपको गम्भीर लगते हैं - या जो विषयआपकी पहुंच से बाहर हैं - आप संगति कायम रखना जारी रखेंगे, और ज्यादा से ज्यादा संगति करेंगे। उन विषयों में जो आपकी पहुंच से बाहर हैं, कोई न कोई आपको और अधिक मार्गदर्शन देता रहेगा। यदि आप उन क्षेत्रों में अधिक संगति करते हैं जो अब आपकी पहुंच में हैं अभी, पवित्रात्मा आपमें काम करेगा और आप महान समझदारी को प्राप्त करोगे। समझदारी, परमेश्वर का तत्व और परमेश्वर के तत्व को जानना लोगों के जीवन में अपार सहायता प्रदान करता है। मैं आशा करता हूं कि आप इसमें लापरवाही नहीं बरतेंगे इसे एक खेल की तरह नहीं लेंगे; क्योंकि परमेश्वर को जानना, परमेश्वर में मनुष्य के विश्वास का आधार है और मनुष्य की सत्य और मुक्ति की खोज की नींव है और एक ऐसी चीज़ है जिसे किसी भी कीमत पर छोड़ा नहीं जा सकता। यदि मनुष्य परमेश्वर पर भरोसा रखता है फिर भी परमेश्वर को नहीं जानता, और यदि मनुष्य शब्दों और सिद्धांतों के बीच में जीता रहता है, तो आप कभी भी उद्धार प्राप्त नहीं कर सकते चाहे सत्य के आडम्बरपूर्ण शब्दों के अनुसार आप कार्य करें या जियें। तात्पर्य यह है कि, यदि आपका परमेश्वर पर विश्वास उसको जानने के आधार पर नहीं है, तो आपके विश्वास का कोई अर्थ नहीं है। आप समझ गये न? (हां, हम समझ गये) आज हमारी संगति यहां पर समाप्त होती है।

जनवरी 4, 2014