197 मैं परमेश्वर से प्रेम करने का प्रयास करने को संकल्पित हूँ

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मुझे ऐसा लगता था कि सब-कुछ छोड़कर परमेश्वर के लिए काम करने का अर्थ है कि मैं परमेश्वर से प्यार करता हूँ। हालाँकि सीसीपी ने मेरा पीछा किया लेकिन मैंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

मेरे परिवार ने मुझे नकार दिया, दुनिया ने मेरी निंदा की, लेकिन मैं बिना किसी शिकायत या पछतावे के अपनी जवानी के वर्ष परमेश्वर को समर्पित करने को तैयार था।

अगर मैं स्वर्ग के राज्य में उन्नत और पुरस्कृत किया जा सकूँ, तो मैं कितने भी दुख और आँसू सहने के लिए तैयार हूँ।

जब परीक्षणों ने मेरी कुरूपता को उजागर किया, तो मैं नकारात्मक और कमज़ोर हो गया और फूट-फूटकर रोया।

परमेश्वर में अपने विश्वास में, मैंने जिस मार्ग को अपनाया, उस पर विचार करते हुए, मुझे एहसास हुआ कि सत्य की वास्तविकता के बिना, मैं मजबूती से खड़ा नहीं रह सकता।

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परमेश्वर के वचनों ने जब इंसान के भ्रष्ट सार को उजागर किया, तब मुझे पता चला कि मैं कितनी बुरी तरह से भ्रष्ट हो चुका हूँ।

मैं हमेशा परमेश्वर से बदले में कुछ पाने की आशा के साथ मेहनत और काम करता था; मैं वास्तव में कभी उससे प्रेम नहीं करता था, बल्कि धोखे से उसके आशीष पाना चाहता था।

मैं बहुत ही ज़्यादा स्वार्थी और धोखेबाज़ था और मैंने अपनी इंसानियत गँवा दी थी, लेकिन उसके बावजूद परमेश्वर ने मेरे न्याय और शुद्धिकरण के लिए अपने वचनों का प्रयोग किया।

मैंने जो कुछ किया है उसके प्रायश्चित स्वरूप मैं परमेश्वर के चरणों में गिरता हूँ, मैं परमेश्वर के प्रेम को पाने योग्य नहीं हूँ।

मैंने परमेश्वर को प्रेम करने और उसे संतुष्ट करने का संकल्प किया है, अब मैं अपने भविष्य या भाग्य को लेकर न तो कोई योजना बनाऊँगा, न ही उस पर विचार करूँगा।

3

परीक्षणों और मुश्किलों को सहने से मेरी आस्था पूर्ण होती है। मैंने इस बात को समझा कि परीक्षणों का आना सचमुच परमेश्वर का आशीष है।

भले ही देह को कष्ट उठाने पड़ें, लेकिन मैं इनसे परमेश्वर के प्रेम की अनुभूति कर सकता हूँ। सत्य के अभ्यास से, मेरा भ्रष्ट स्वभाव बदल रहा है।

आज मैं धन्य हूँ कि मैं परमेश्वर से प्यार करने और उसकी गवाही देने में समर्थ हूँ। मैं पतरस का अनुकरण करना और अधिक गहराई से परमेश्वर को प्रेम करने का प्रयास करना चाहता हूँ। 

मुझे यकीन है कि मसीह सत्य, मार्ग और जीवन है। सत्य को समझ लिया और परमेश्वर को जान लिया, तो जीवन व्यर्थ नहीं गया।

परमेश्वर की व्यवस्थाओं का पालन करना कभी भी गलत नहीं हो सकता। परमेश्वर से शाश्वत प्रेम और उसका आज्ञापालन मेरा कर्तव्य है।

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अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

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