58. झूठे अगुआ को उजागर करना : एक निजी संघर्ष

बहन ज़ेंग, मैं आपसे एक सवाल पूछना चाहती हूँ। पूछिए। मैंने देखा है कि हाल में हमारी कलीसिया की अगुआ बहन ज़ोऊ, सभाओं में शाब्दिक सिद्धांतों का प्रचार कर रही हैं और लोगों की वास्तविक कठिनाइयों को हल नहीं कर पा रही हैं, वह अपनी कलीसिया के काम में सत्य की खोज नहीं करती हैं। बस अपनी धारणाओं के अनुसार चलती हैं। यह पता होने पर भी कि सभा स्थल सुरक्षित नहीं है, उन्होंने समय रहते उसे नहीं बदला और कुछ भाई-बहन गिरफ़्तार होने से बाल-बाल बचे। फिर भी उन्होंने उस बारे में कोई आत्म-चिंतन नहीं किया। वह दूसरों के सुझावों को स्वीकार नहीं करती हैं, बहाने बनाती हैं और अपनी बात पर अड़ी रहती हैं। वह विश्वासियों के सिंचन के काम पर ज़्यादा ध्यान नहीं देती हैं और कोई व्यावहारिक कार्य नहीं कर सकतीं। उनके निरंतर प्रदर्शन के आधार पर, मुझे पूरा यकीन है कि वह एक झूठी अगुआ हैं। मैं उनके बारे में रिपोर्ट करना चाहती हूँ, पर मेरे मन में कुछ संदेह हैं। आखिरकार, बहन ज़ोऊ एक अगुआ हैं, अगर वह पद से बरखास्त नहीं हुईं, और उन्हें पता चल गया कि मैंने उनकी रिपोर्ट की थी, तो वह मेरे बारे में गलत सोचेंगी और शायद मुझे मेरे कर्तव्य से बर्खास्त कर दें। मुझे क्या करना चाहिए?

मुझे भी लगता है कि वह झूठी अगुआ हैं। सहभागिता में वह सिर्फ़ परमेश्वर के वचनों के शाब्दिक अर्थ को दोहराती रहती हैं लेकिन शायद ही कभी आत्म-चिंतन करती हैं या उन बातों के मद्देनज़र खुद को जानने की कोशिश करती हैं। न ही वह इस विषय पर ज़्यादा बात करती हैं कि परमेश्वर के वचनों को कैसे अनुभव किया जाए और कैसे अभ्यास में लाया जाए। एक आम पादरी जैसी उनकी सहभागिता में, केवल शाब्दिक सिद्धांतों और नियमों के पालन पर बात होती है। उन्हें इस बारे में बात करना बहुत पसंद है कि उन्होंने कितने दुख भोगे हैं और कितने त्याग किये हैं उन्हें दिखावा करना और लोगों से प्रशंसा पाना अच्छा लगता है। उन सभाओं में जाने से मुझे कोई लाभ नहीं होता। वह मेरे किसी भी सुझाव को स्वीकार नहीं करतीं, उल्टा मुझ पर ही भाषण झाड़ देती हैं। मैं भी बोलना चाहती हूँ, पर डरती हूँ कि कहीं वह बुरा न मान जाएँ। अगर उन्होंने मुझे दबाने और मेरे लिए मुश्किलें खड़ी करने की कोशिश की तो? पर मुझे चुप रहना भी अच्छा नहीं लगता। इस बात को लेकर मेरे मन में बहुत कशमकश रहती है।

मुझे भी एक ऐसा ही अनुभव हुआ था। मैंने स्पष्ट रूप से देखा कि कलीसिया में एक झूठी अगुआ थीं जिनके बारे में रिपोर्ट की जानी चाहिए थी, पर मैं डरती थी कि कहीं वह बुरा न मान जाएँ और मुझ पर बेवजह दबाव न डालने लगें, तो मैं चुप रही। लेकिन प्रार्थना और सत्य की खोज के ज़रिए, मैंने देखा कि अहम मौकों पर सिद्धांतों पर खरा न उतरकर, केवल अपने निजी हितों के बारे में सोचना, खुदगर्ज़ी थी। मैंने यह भी देखा कि परमेश्वर के घर में सत्य और धार्मिकता राज करती है। किसी भी झूठे अगुआ या मसीह-विरोधी की बुरी शक्तियाँ यहाँ नहीं टिक सकतीं। इससे मेरा विश्वास बढ़ा और मुझे बल मिला। मैं उन अन्धकार की शक्तियों से मुक्त हुई, और मैंने उस अगुआ की रिपोर्ट कर दी।

आपका क्या अनुभव था? हमें उसके बारे में बताइए।

पिछले साल, मैं शहर के बाहर एक कलीसिया में अपना कर्तव्य पूरा कर रही थी, पर मुझे घर लौटना पड़ा क्योंकि व्यावहारिक कार्य न करने के कारण मेरी जगह किसी और को दे दी गई थी। उसके बाद मैंने पाया कि हमारी अगुआ बहन ली के पास, परमेश्वर के वचनों के बारे में कहने के लिये कुछ भी प्रबोधक नहीं था, वह बस शाब्दिक सिद्धांतों का प्रचार कर रही थीं। उन्होंने कभी खुद को जानने की बात नहीं की और न ही अपने खुद के अनुभव साझा किए। समस्याओं को हल करने में लोगों की मदद करते समय भी उनसे सख्ती से पेश आती थीं, मानो स्कूल की मास्टरनी बच्चों को सिखा रही हो, वह किसी की व्यावहारिक समस्याओं को हल नहीं कर पाती थीं। वह हमेशा यही बात करती थीं कि कैसे उन्होंने अपना कर्तव्य पूरा किया और कितने दुख भोगे, ताकि लोग उनकी प्रशंसा करें और उनसे प्यार करें। वह किसी नियम-कायदे को नहीं मानती थीं। एक बहन आस्था में नई थी, ईसाइयों को कम्युनिस्ट पार्टी के हाथों गिरफ़्तार होते देखकर वह डर गई थी। बहन ली ने उस बहन को सहारा देने के लिए सत्य पर कोई सहभागिता नहीं की, बल्कि उसे कर्तव्य से बरखास्त कर दिया। मैंने और कुछ उपयाजकों ने बहुत बार उन्हें सुझाव दिए, पर वह बस बहाने बनातीं और हमसे बहस किया करतीं। सिद्धांतों के आधार पर, जो अगुआ सत्य के सिद्धांतों के अनुसार काम नहीं करता है, जो भाई-बहनों की निगरानी और कांट-छांट को स्वीकार नहीं करता, वह सत्य को स्वीकार करने और उसका पालन करने वाला व्यक्ति नहीं है। बहन ली खुद को नहीं जानती थीं, उनमें जीवन प्रवेश की कमी थी, और वह दूसरों की असली समस्याओं को हल नहीं कर सकती थीं। कलीसिया की ऐसी अगुआ कलीसिया के काम और भाई-बहनों की ज़िंदगी को बस नुकसान ही पहुँचा सकती है। मुझे पूरा यकीन था कि बहन ली एक झूठी अगुआ हैं और वह कलीसिया के काम के योग्य नहीं हैं, मैं उनके बारे में रिपोर्ट करना चाहती थी। पर जब रिपोर्ट लिखने बैठी तो मैं डर गई।

ऐसा क्यों?

मुझे हाल ही में बरखास्त किया गया था। क्योंकि मैं अपना कर्तव्य पूरा नहीं कर रही थी। ऐसे में अगर मैं बहन ली के बारे में रिपोर्ट करती हूँ और दूसरों को मेरी बात सही न लगी, तो बात पलटकर मुझ पर ही आ सकती थी। "ओह, ज़ेंग यी को देखो। हाल ही में बरखास्त हुई है लेकिन शांति से नहीं बैठ सकती। उसे अपने गिरेबान में झाँकना चाहिए, दूसरों पर उँगली नहीं उठानी चाहिए। लगता है कि उसके पास असली आत्म-ज्ञान या पश्चाताप नहीं है।" अगर उन्होंने ऐसा कह दिया तो मैं उनके सामने सिर नहीं उठा पाऊँगी। एक बरखास्त झूठी अगुआ के तौर पर, मुझे लगा कि मुझे बात करने का हक नहीं है। मेरे मन में खास तौर पर यह खयाल आया कि मेरे रिपोर्ट करने से शायद बहन ली नाराज़ हो जाएँगी, और एक ही कलीसिया में होने के कारण हमारा अक्सर आमना-सामना होता रहता है। उसके बाद फिर हम कैसे एक-दूसरे से सहजता से मिलजुल सकेंगे? अगर वह अपने पद पर बनी रहीं और मेरे लिए मुश्किलें खड़ी कर दीं तो? मैं इसके बारे में जितना ज़्यादा सोचती, मेरी घबराहट बढ़ती जाती। मैंने मान लिया कि मेरे रिपोर्ट करने से वह नाराज़ हो जाएँगी और मुझे यह जोखिम नहीं लेना चाहिए। मेरे अपने हालात के मद्देनज़र यह सही नहीं होगा, और कलीसिया में एक झूठी अगुआ होने का मुद्दा केवल मुझ अकेली की ज़िम्मेदारी नहीं है। किसी और को उनकी रिपोर्ट करने दो। मैं चाहती थी कि बस सभाओं में जाती रहूँ और शांति बनी रहे।

मैं भी ऐसा ही सोचती हूँ।

मैंने उस मुद्दे को भूल जाने का फैसला किया, फिर भी मन में कुछ बेचैनी सी बनी रही। रात को सोते समय, मन में यही विचार आते कि बहन ली सभाओं में डींगें हांक रही होंगी और रटा-रटाया उपदेश सुना रही होंगी। ऐसा चलता रहा तो उससे भाई-बहनों को नुकसान होगा। अपने चुप्पी साधने पर मुझे बुरा लगने लगा। फिर मैंने परमेश्वर के ये वचन पढ़े : "उदाहरण के लिए, मान लो कि लोगों का एक समूह है जिसकी अगुआई एक व्‍यक्ति कर रहा है; अगर इस व्‍यक्ति को 'अगुआ' या 'कार्यकर्ता' कहा जाता है, तो समूह के अंदर इनका कार्य क्‍या है? (अगुआई का कार्य।) इस व्‍यक्ति की अगुआई का उन लोगों पर जिनकी वह अगुआई कर रहा है और कुल मिलाकर पूरे समूह पर क्‍या प्रभाव पड़ता है? वह समूह की दिशा और उसके मार्ग को प्रभावित करता है। इसका निहितार्थ यह है कि अगर अगुआ के पद पर आसीन यह व्‍यक्ति ग़लत मार्ग पर चलता है, तो इसके कारण, बिल्कुल कम-से-कम, उसके नीचे के लोग और पूरा समूह सही मार्ग से हट जाएगा; इससे भी अधिक, यह आगे बढ़ते हुए उस पूरे समूह की दिशा, साथ ही उसकी गति और चाल को बाधित कर सकता या या पूरी तरह रोक सकता है। इसलिए जब लोगों के इस समूह की बात आती है, तब उनके द्वारा चुने गए मार्ग की दिशा, सत्‍य की उनकी समझ की सीमा और साथ ही परमेश्‍वर में उनका विश्‍वास न सिर्फ़ स्वयं उनको, बल्कि उनकी अगुआई के दायरे के भीतर सभी भाइयों और बहनों को प्रभावित करता है। अगर अगुआ सही व्‍यक्ति है, ऐसा व्‍यक्ति जो सही मार्ग पर चल रहा है और सत्‍य अनुसरण और अभ्‍यास करता है, तो उसकी अगुआई में चल रहे लोग अच्छी तरह खाएँगे और पिएँगे और अच्छी तरह तलाश करेंगे, और, साथ ही साथ, अगुआ की व्यक्तिगत प्रगति दूसरों को निरंतर दिखाई देगी। तो, वह सही मार्ग क्‍या है जिस पर अगुआ को चलना चाहिए? यह है दूसरों को सत्‍य की समझ और सत्‍य में प्रवेश की ओर ले जाने, और दूसरों को परमेश्‍वर के समक्ष ले जाने में समर्थ होना। ग़लत मार्ग क्‍या है? यह है बार-बार स्वयं अपने को ऊँचा उठाना और स्वयं अपनी गवाही देना, प्रतिष्‍ठा, प्रसिद्धि तथा लाभ के पीछे भागना, और कभी भी परमेश्‍वर की गवाही न देना। इसका उनके नीचे के लोगों पर क्‍या प्रभाव पड़ता है? (यह उन लोगों को उनके समक्ष ले आता है।) लोग भटककर परमेश्‍वर से दूर चले जाएँगे और इस अगुआ के नियंत्रण में आ जाएँगे। क्‍या यह ज़ाहिर-सी बात नहीं है कि अपने अगुआ के समक्ष लाए गए लोग उस अगुआ से ही नियंत्रित होंगे? और, निस्संदेह, यह उन्‍हें परमेश्वर से दूर ले जाता है। अगर तुम लोगों को अपने समक्ष ले आने के लिए उनकी अगुआई करते हो, तो तुम उन्‍हें भ्रष्‍ट मनुष्यजाति के समक्ष ले आने के लिए उनकी अगुआई कर रहे हो, और तुम उन्‍हें परमेश्‍वर के समक्ष नहीं, शैतान के समक्ष ले आने के लिए उनकी अगुआई कर रहे हो। लोगों को सत्‍य के समक्ष ले आने के लिए उनकी अगुआई करना ही उन्‍हें परमेश्‍वर के समक्ष ले आने के लिए उनकी अगुआई करना है। यही वे प्रभाव हैं जो उन दो प्रकार के लोगों पर—वे जो सही मार्ग पर चलते हैं और वे जो ग़लत मार्ग पर चलते हैं—पड़ते हैं जिनकी अगुआई की जाती है" (मसीह की बातचीत के अभिलेख)। परमेश्वर के वचनों में मैंने देखा एक अगुआ का रास्ता न केवल उसे व्यक्तिगत रूप से प्रभावित करता है, बल्कि इसका दूसरों के जीवन प्रवेश पर और पूरी कलीसिया के कार्य पर भी सीधा असर पड़ता है। बहन ली ने आज तक सिर्फ़ खाली शब्दों का प्रचार किया है और वह भाई-बहनों के असल-जीवन की कठिनाइयों को हल नहीं कर सकीं। वह हमेशा दिखावा करती रहती थीं और लोगों को गुमराह कर रही थीं, भाई-बहन उनकी प्रशंसा करते थे। इतना ही नहीं, वह घमंडी और तानाशाह भी थीं और कलीसिया के बहुत सारे कार्यों में केवल उनकी ही चलती थी। उन्होंने सत्य के सिद्धांतों की खोज नहीं की या दूसरों के सुझावों को स्वीकार नहीं किया, बस अपनी ही धारणाओं के आधार पर कार्य करती थीं। वह कलीसिया के कार्य को आगे नहीं बढ़ा रही थीं बल्कि उसमें बाधा डाल रहीं थीं। कलीसिया में ऐसी झूठी अगुआ अपने साथ भाई-बहनों को भी ले डूबेंगी।

यह बिलकुल सच है। एक झूठी अगुआ के पास जिम्मेदारी का होना सच में हानिकारक है!

हाँ। एक झूठी अगुआ को इतने विश्वासियों को धोखा देते देखकर और इस धोखे के कारण उन्हें दुख भोगते देखकर परमेश्वर बहुत उदास होता है। मैं पहले ही समझ चुकी थी कि बहन ली एक झूठी अगुआ थीं, मैंने एक झूठी अगुआ के प्रभार में भाई-बहनों और कलीसिया जीवन को होने वाले नुकसान को देख लिया था। लेकिन सिर्फ़ इसलिए कि मैं उन्हें नाराज़ करने से डरती थी, मैंने खुली आँखों से कलीसिया के कार्य को और दूसरों को जीवन प्रवेश में पिछड़ते हुए देखा। मैंने बहन ली को उजागर करने और उनकी रिपोर्ट करने की हिम्मत नहीं की। मैं बिल्कुल भी धार्मिक नहीं थी, मैं परमेश्वर की इच्छा का ध्यान नहीं रख रही थी। मैं कितनी संवेदनहीन हो गई थी! अपने पिछले कर्तव्य में वास्तविक कार्य न करके मैं कलीसिया के कार्य को पहले ही नुकसान पहुँचा चुकी थी। अब एक झूठी अगुआ को परमेश्वर के चुने हुए लोगों को धोखा देते देखकर, उनकी रिपोर्ट करने की हिम्मत न करना या कलीसिया के हितों की रक्षा न करना मेरे लिए लानत की बात थी! मुझे और ज़्यादा महसूस होने लगा कि मैं परमेश्वर की ऋणी हूँ, और एक सृजित प्राणी के तौर पर, मुझे सही कदम उठाना चाहिए, परमेश्वर की इच्छा का ध्यान रखना चाहिए और कलीसिया के कार्य को कायम रखना चाहिए। यह मेरा कर्तव्य था, और यह एक ज़िम्मेदारी थी जो मुझे पूरी करनी थी! इस विचार से मुझे बल मिला और मैंने अपने आप से कहा, "कलीसिया के हितों के लिए और ताकि परमेश्वर के चुने हुए लोग एक प्रामाणिक कलीसिया जीवन जी सकें, मुझे सत्य को अभ्यास में लाना है और बहन ली की समस्याओं के बारे में बोलना है। मैं एक झूठी अगुआ को भाई-बहनों को और अधिक गुमराह नहीं करने दे सकती!" जब मैं रिपोर्ट लिखने की तैयारी कर रही थी, मैंने सुना कि हाल ही में जब एक बुजुर्ग बहन ने बहन ली का ध्यान की कुछ समस्याओं की ओर आकर्षित किया, तो बहन ली ने उनके साथ सभा करनी बंद कर दी। यह सुनकर मुझे बहुत गुस्सा आया। मुझे लगा उन्होंने सत्य को मानने से इंकार कर दिया। साथ ही, मेरे डर फिर से सिर उठाने लगे। सिर्फ़ कुछ विचार व्यक्त करने पर ही बहन ली ने उस बहन को बाहर कर दिया था। अगर उन्हें पता चला कि मैंने उनकी रिपोर्ट की है, तो क्या वह मुझसे बैर करने लगेंगी और मेरे लिए मुश्किलें खड़ी कर देंगी? अगर उन्होंने मेरे बारे में राय बनानी शुरू कर दी, मुझ पर अगुआओं और कार्यकर्ताओं पर हमला करने का आरोप लगाया, तो दूसरे लोग क्या सोचेंगे? उन्होंने मुझे दबाना शुरू कर दिया तो मुझे अपना कर्तव्य पूरा करने का कोई मौका नहीं मिलेगा, वह तो और भी असहनीय होगा। अगर मैंने उनकी रिपोर्ट नहीं की तो मुझे बहुत ग्लानि महसूस होगी। मेरे अंदर कशमकश चल रही थी—खलबली मची हुई थी।

तो, मैंने यह बात प्रार्थना और सत्य की खोज में परमेश्वर के सामने रखी। उसके बाद मैंने परमेश्वर के वचनों में यह पढ़ा : "तुम सभी कहते हो कि तुम परमेश्वर के बोझ के प्रति विचारशील हो और कलीसिया की गवाही की रक्षा करोगे, लेकिन वास्तव में तुम में से कौन परमेश्वर के बोझ के प्रति विचारशील रहा है? अपने आप से पूछो : क्या तुम उसके बोझ के प्रति विचारशील रहे हो? क्या तुम उसके लिए धार्मिकता का अभ्यास कर सकते हो? क्या तुम मेरे लिए खड़े होकर बोल सकते हो? क्या तुम दृढ़ता से सत्य का अभ्यास कर सकते हो? क्या तुम में शैतान के सभी दुष्कर्मों के विरूद्ध लड़ने का साहस है? क्या तुम अपनी भावनाओं को किनारे रखकर मेरे सत्य की खातिर शैतान का पर्दाफ़ाश कर सकोगे? क्या तुम मेरी इच्छा को स्वयं में पूरा होने दोगे? सबसे महत्वपूर्ण क्षणों में क्या तुमने अपने दिल को समर्पित किया है? क्या तुम ऐसे व्यक्ति हो जो मेरी इच्छा पर चलता है? स्वयं से ये सवाल पूछो और अक्सर इनके बारे में सोचो" (वचन देह में प्रकट होता है)। मुझे लगा मानो हर शब्द मेरे विवेक के दरवाज़े पर दस्तक दे रहा हो, खास तौर पर "तुम सभी कहते हो कि तुम परमेश्वर के बोझ के प्रति विचारशील हो और कलीसिया की गवाही की रक्षा करोगे, लेकिन वास्तव में तुम में से कौन परमेश्वर के बोझ के प्रति विचारशील रहा है?" मुझे लगा जैसे परमेश्वर मेरी बगल में खड़ा है और मुझसे यह सवाल कर रहा है। मैं जानती थी कि बहन ली झूठी अगुआ हैं और मुझे पता था अगर समय पर इस समस्या को हल न किया गया तो इससे परमेश्वर के चुने हुए लोगों के जीवन प्रवेश को नुकसान होगा, पर मुझे डर था कि वह बुरा मान जाएँगी और मुझसे बैर करने लगेंगी, या फिर मैं अलग-थलग हो जाऊँगी और मुझे कलीसिया से निकाल दिया जाएगा। हर मोड़ पर, मैंने अपने ही हितों का ध्यान रखा, सिद्धांतों की मर्यादा बनाए रखने की और उनकी रिपोर्ट करने की हिम्मत नहीं की। इस आध्यात्मिक लड़ाई में मुझे अहम समय पर गवाही देनी थी, लेकिन मैंने अपने हितों की रक्षा की और लोगों को खुश किया, परमेश्वर को नाराज़ किया। मुझे अपने आप से घिन आने लगी। मैं लोगों को खुश करने वाली चापलूस नहीं बनना चाहती थी। उसके बाद, मैंने शांत मन से आत्मचिंतन किया। मैं बखूबी जानती थी कि वह एक झूठी अगुआ हैं और मैं सिद्धांतों के अनुसार उनकी रिपोर्ट करने को तैयार थी। लेकिन जब मैंने सुना कि उन्होंने कुछ सलाह देने पर किसी को बाहर निकाल दिया है, तो मैंने कलीसिया के काम के लिए खड़े होने के बजाय खुद को बचाने का विकल्प क्यों चुना? मैं हमेशा अपने हितों की रक्षा क्यों करती रही? मैंने इस खास समस्या पर प्रार्थना और सत्य की खोज करनी शुरू कर दी। मैंने एक बार एक धार्मिक कार्य में परमेश्वर के कुछ वचन पढ़े थे। बहन, क्यों न आप उन्हें पढ़ें?

"ज़्यादातर लोग सत्य का अनुसरण और अभ्यास करना चाहते हैं, लेकिन अधिकतर समय उनके पास ऐसा करने का कोई संकल्प और इच्छा नहीं होती है; उनके अंदर सत्य का जीवन बिल्कुल भी नहीं होता है। इसके परिणाम स्वरूप, जब लोगों का बुरी शक्तियों से वास्ता पड़ता है या ऐसे दुष्ट या बुरे लोगों से उनका सामना होता है जो बुरे कामों को अंजाम देते हैं, या जब ऐसे झूठे अगुआओं और मसीह विरोधियों से उनका सामना होता है जो अपना काम इस तरह से करते हैं जिससे सिद्धांतों का उल्लंघन होता है—इस तरह परमेश्वर के घर के कार्य को नुकसान उठाना पड़ता है, और परमेश्वर के चुने गए लोगों को हानि पहुँचती है—वे डटे रहने और खुलकर बोलने का साहस खो देते हैं। जब तुम्हारे अंदर कोई साहस नहीं होता, इसका क्या अर्थ है? क्या इसका अर्थ यह है कि तुम डरपोक हो या कुछ भी बोल पाने में अक्षम हो? या फ़िर यह कि तुम अच्छी तरह नहीं समझते और इसलिए तुम में अपनी बात रखने का आत्मविश्वास नहीं है? इनमें से तो कोई नहीं; बात यह है कि तुम कई प्रकार के भ्रष्ट स्वभावों द्वारा नियंत्रित किये जा रहे हो। इन सभी स्वभावों में से एक है, कुटिलता। तुम यह मानते हुए सबसे पहले अपने बारे में सोचते हो, 'अगर मैंने अपनी बात बोली, तो इससे मुझे क्या फ़ायदा होगा? अगर मैंने अपनी बात बोल कर किसी को नाराज़ कर दिया, तो हम भविष्य में एक साथ कैसे काम कर सकेंगे?' यह एक कुटिल मानसिकता है, है ना? क्या यह एक कुटिल स्वभाव का परिणाम नहीं है? एक अन्‍य स्‍वार्थी और कृपण स्‍वभाव होता है। तुम सोचते हो, 'परमेश्‍वर के घर के हित का नुकसान होता है तो मुझे इससे क्‍या लेना-देना है? मैं क्‍यों परवाह करूँ? इससे मेरा कोई ताल्‍लुक नहीं है। अगर मैं इसे होते देखता और सुनता भी हूँ, तो भी मुझे कुछ करने की ज़रूरत नहीं है। यह मेरी ज़ि‍म्‍मेदारी नहीं है—मैं कोई अगुआ नहीं हूँ।' इस तरह की चीज़ें तुम्‍हारे अंदर हैं, जैसे वे तुम्‍हारे अवचेतन मस्तिष्‍क से अचानक बाहर निकल आयी हों, जैसे उन्‍होंने तुम्‍हारे हृदय में स्‍थायी जगहें बना रखी हों—ये मनुष्‍य के भ्रष्‍ट, शैतानी स्‍वभाव हैं। ये भ्रष्‍ट स्‍वभाव तुम्‍हारे विचारों को नियंत्रित करते हैं और तुम्‍हारे हाथ-पैर बाँध देते हैं, और वे तुम्‍हारी ज़ुबान को नियंत्रित करते हैं। जब तुम अपने दिल में कोई बात कहना चाहते हो, तो शब्‍द तो तुम्‍हारे होठों तक पहुँचते हैं लेकिन तुम उन्‍हें बोलते नहीं हो, या, अगर तुम बोलते भी हो, तो तुम्‍हारे शब्‍द गोलमोल होते हैं, और तुम्‍हें चालबाज़ी करने की गुंजाइश देते हैं—तुम बिल्कुल साफ़-साफ़ नहीं कहते। दूसरे लोग तुम्‍हारी बातें सुनने के बाद कुछ भी महसूस नहीं करते, और तुमने जो कुछ भी कहा होता है उससे समस्‍या हल नहीं होती। तुम मन-ही-मन सोचते हो, 'अच्‍छा है, मैंने बोल लिया। मेरा अन्‍त:करण निश्चिंत हुआ। मैंने अपनी ज़ि‍म्‍मेदारी पूरी कर दी।' सचाई यह है कि तुम अपने हृदय में जानते हो कि तुमने वह सब नहीं कहा है जो तुम्‍हें कहना चाहिए, कि तुमने जो कहा है उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा और परमेश्‍वर के घर के कार्य का अहित ज्‍यों-का-त्‍यों बना हुआ है। तुमने अपनी ज़ि‍म्‍मेदारी पूरी नहीं की, फिर भी तुम खुल्‍लमखुल्‍ला कहते हो कि तुमने अपनी ज़ि‍म्‍मेदारी पूरी कर दी है, या जो कुछ भी हो रहा था वह तुम्‍हारे लिए स्‍पष्‍ट नहीं था। क्‍या तुम पूरी तरह अपने भ्रष्‍ट, शैतानी स्‍वभाव के वश में नहीं हो?" (मसीह की बातचीत के अभिलेख)।

परमेश्वर के वचनों से मुझे एहसास हुआ कि समस्या आने पर मैंने केवल अपने बारे में सोचा। मैं खुदगर्ज़ और धोखेबाज थी। मैंने इस तरह के शैतानी फलसफे का अनुसरण किया जैसे "स्वर्ग उन लोगों को नष्ट कर देता है जो स्वयं के लिए नहीं हैं," "ज्ञानी लोग आत्म-रक्षा में अच्छे होते हैं वे बस गलतियाँ करने से बचते हैं," "जब पता हो कि कुछ गड़बड़ है, तो चुप रहना ही बेहतर है," और "कभी मुफ़्त में तिनका भी न तोड़ो।" ये फलसफे मेरी प्रकृति में निहित थे, मुझे मज़बूती से जकड़े हुए थे जिससे सत्य को अभ्यास में लाना दुष्कर हो गया था। मैं जानती थी कि सिद्धांतों के अनुसार कलीसिया के कार्य की खातिर मुझे उनकी रिपोर्ट करनी चाहिए, पर जब मैं ऐसा करने वाली थी, तभी मेरे मन में उन्हें नाराज़ करने और मेरे प्रति उनकी राय और उनके दुर्व्यवहार का डर पैदा हो गया। इस डर से, मेरी दायित्व, ज़िम्मेदारी और कर्तव्य की भावना गायब हो गई और मुझे लगा कि कलीसिया में एक झूठी अगुआ का होना मेरी निजी समस्या नहीं थी। मैं कोई हंगामा नहीं करना चाहती थी ताकि उन्हें नाराज़ करने से बच सकूँ और अपनी रक्षा कर सकूँ। मैंने पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता के खिलाफ़ इतना अधिक चिंतन किया कि अपराधबोध की भावना ही खत्म हो गई। मैं अपनी शैतानी भ्रष्टता से पूरी तरह जकड़ी हुई थी। शैतानी फलसफे के अनुसार जीवन जी कर, मैं अपने कर्तव्य में पहले ही ऐसा एक अपराध कर चुकी थी। मुझे सत्य की विकृत समझ वाली एक घमंडी अगुआ का पता चला जिसे बरखास्त कर दिया जाना चाहिए। लेकिन फिर मैंने देखा कि उसमें कुछ क्षमता है, वह शाब्दिक सिद्धांत का प्रचार करने और लोगों को धोखा देने में अच्छी है। यह देखकर कि बहुत से भाई-बहनों ने उन्हें नहीं पहचाना, मैं डर रही थी कि अगर बहन ली को हटा दिया गया तो वे मेरे बारे में अपनी राय बनाएँगे और कहेंगे कि मैं बेरहम हूँ। तो उन्हें बरखास्त करवाने से पहले मैं दो महीने टाल-मटोल करती रही। इससे कलीसिया के कार्य को भारी नुकसान हुआ। मैंने कलीसिया में एक झूठी अगुआ को देखा लेकिन मैंने वही पुरानी गलती दोहराई। मैं झमेले में नहीं पड़ना चाहती थी। जिस तरीके से मैंने अपने कर्तव्य को पूरा किया उससे पता चला कि मैं वास्तव में स्वार्थी और धोखेबाज थी और जब सत्य ने मेरे निजी हितों को प्रभावित किया, तो मैं उसे अभ्यास में न ला सकी। मैंने बार-बार सत्य का उल्लंघन किया और अपनी गवाही खो दी। यह मेरे माथे का कलंक था। इसका एहसास होने पर, मैंने परमेश्वर के सामने दंडवत किया और प्रार्थना की : "हे परमेश्वर! मैंने देख लिया कि शैतान ने मुझे कितनी गहराई से भ्रष्ट कर दिया है। मैं स्वार्थी, घृणित चापलूस इंसान हूँ। मैं नीच और गंदी हूँ। परमेश्वर, कृपया मुझे मेरे भ्रष्ट स्वभाव के बंधन से बचाओ।"

फिर मैंने एक सहभागिता में पढ़ा कि दुनिया में शैतान का राज है, मगर कलीसिया में परमेश्वर और सत्य का राज है, ये दोनों अलग जहान हैं, परमेश्वर के घर में, भले ही कोई बुरा या निम्न मानवता वाला व्यक्ति अगुआ चुन लिया गया हो, वह सत्य की वास्तविकता के बिना ज़्यादा देर तक नहीं टिकेगा। इससे सिद्ध होता है कि परमेश्वर के घर में सत्य का राज है। शैतान दुनिया को अंधकार में रखता है और लोगों को इसके फलसफे के आधार पर ही बोलना और कार्य करना पड़ता है। खुशामद ही आगे बढ़ने का एकमात्र तरीका है। ईमानदार बनने और किसी को नाराज़ करने से दंड मिलता है। साधारण लोग हों या ताकतवर ईमानदार होने पर उन्हें तंग किया जाता है और बहिष्कृत कर दिया जाता है, बहुत से लोग अपनी जान भी गँवा बैठते हैं। पर परमेश्वर के घर में सत्य और धार्मिकता राज करती है। परमेश्वर सत्य का अनुसरण करने वाले और न्याय की भावना रखने वाले ईमानदार लोगों को आशीष देता है और पसंद करता है। जो कलीसिया के हितों और परमेश्वर के चुने हुए लोगों की रक्षा करते हैं, झूठे अगुआओं और मसीह-विरोधियों को उजागर करने की हिम्मत करते हैं, उन लोगों को ही परमेश्वर स्वीकार कर सकता है, बचा सकता है और पूर्ण बना सकता है। उन्हें दूसरों का अनुमोदन और समर्थन भी मिलता है। जो लोग सत्य के सामने समर्पण नहीं करते बल्कि उसका विरोध करते हैं, उनके नाम या रुतबे चाहे कितने ही बुलंद हों, पवित्र आत्मा उन्हें त्याग देगा और खत्म कर देगा, ठीक मसीह-विरोधी यैंग की तरह जिसे पिछले साल कलीसिया से निकाल दिया गया था। जब वह अगुआ थी, तो उसने अपने खिलाफ़ आवाज़ उठाने वाले हर किसी को दबाया और बाहर कर दिया था, महत्वपूर्ण पदों पर अपने परिवार के लोगों और दोस्तों को बिठा दिया था। उसने परमेश्वर के ख़िलाफ़ अपना साम्राज्य खड़ा करने की कोशिश की और चढ़ावे की भी चोरी की। उसने सोचा कि उसके इर्द-गिर्द उसका परिवार और दोस्त ही हैं तो उसके बुरे कर्म उजागर नहीं होंगे। परमेश्वर से कुछ भी छुपा हुआ नहीं है, अपनी बुद्धि से, वह शैतान के दाँव-पेंच का उपयोग अपने लाभ के लिए करता है। उसने ऐसा माहौल पैदा कर दिया कि न्याय की भावना रखने वाले लोग रिपोर्ट करें और उसकी बुराई को उजागर करें। कलीसिया की जाँच-पड़ताल के बाद, न केवल उसे चोरी की गई हर चीज़ को वापस करना पड़ा, बल्कि उसे हमेशा-हमेशा के लिए कलीसिया से भी निकाल दिया गया। इससे पता चलता है कि चाहे किसी का कोई भी कर्तव्य या रुतबा हो, बुराई करने वाला या सत्य का अनुसरण न करने वाला परमेश्वर के धार्मिक न्याय से नहीं बच सकता! परमेश्वर का घर दुनिया की तरह नहीं है। परमेश्वर के घर में सत्य के विपरीत कुछ भी नहीं पनप सकता। सत्य के खिलाफ़ किसी को कुछ दिखता है, तो वह उसे उजागर करने और रोकने के लिए खड़ा हो सकता है। इससे पता चलता है कि परमेश्वर के घर में सत्य का राज होता है। जहाँ तक बहन ली के बारे में रिपोर्ट करने की बात थी, मैंने परमेश्वर की धार्मिकता को समझा नहीं था या मुझे एहसास नहीं हुआ था कि वह सब कुछ देखता है और सब पर राज करता है। परमेश्वर के घर में झूठे अगुआ और मसीह-विरोधी नहीं टिक सकते। मुझे करने के लिए कोई कर्तव्य मिलेगा या नहीं, मेरा भाग्य कैसा होगा और क्या नतीजा निकलेगा, यह सब परमेश्वर के हाथ में है, न कि किसी अगुआ के। अब मैं उनके रोके नहीं रुक सकती थी। तो, मैंने बहन ली की समस्याओं के बारे में एक तथ्यपरक रिपोर्ट बनाई। उसके फ़ौरन बाद एक अगुआ मामले की जाँच करने हमारी कलीसिया में आये। फिर पता चला कि सिद्धांतों के आधार पर बहन ली एक झूठी अगुआ थीं, और उन्हें बरखास्त कर दिया गया। उसके बाद, बहन ली ने धार्मिक कार्यों और आत्म-चिंतन के ज़रिए कुछ आत्म-ज्ञान प्राप्त किया, वह पश्चाताप करना और बदलना चाहती थीं। चुनी गई अगली अगुआ सत्य का अनुसरण करने वाली बहन थीं और कलीसिया के सभी काम धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगे। मैंने परमेश्वर की धार्मिकता भी देखी और देखा कि परमेश्वर के घर में सत्य का राज होता है।

परमेश्वर का धन्यवाद! यह सहभागिता मेरे लिए सच में प्रबोधक है। परमेश्वर हमारे स्वार्थ और कपट को उजागर करता है और हमारे ज़रिए झूठे अगुआओं की रिपोर्ट करवाकर हमारी भ्रष्टता को शुद्ध करता है। इस तरह परमेश्वर हमें बचाता और पूर्ण बनाता है! "ज्ञानी लोग आत्म-रक्षा में अच्छे होते हैं वे बस गलतियाँ करने से बचते हैं" और "चीजों को प्रवाहित होने दें यदि वे किसी को व्यक्तिगत रूप से प्रभावित न करती हों" मेरे जीवन के मूल मंत्र रहे हैं। मैं कलीसिया के काम के लिए खड़े होने और एक झूठी अगुआ की रिपोर्ट करने से डर रही थी। यह मेरी खुदगर्ज़ी थी। मैंने परमेश्वर के घर को दुनिया के बराबर समझा, इस बात पर यकीन नहीं किया कि यहाँ धार्मिकता और सत्य की सत्ता है। मुझे परमेश्वर में सच्ची आस्था नहीं थी, एक सीधी सरल ईमानदार बात कहने से डरती रही। परमेश्वर के वचनों से सब कुछ स्पष्ट हो गया। यदि मुझे अक्ल नहीं आई और मैंने एक झूठी अगुआ की रिपोर्ट नहीं की, तो परमेश्वर बहुत निराश होगा। न केवल मैं गवाह बनने में नाकाम रहूँगी, बल्कि यह मेरे माथे पर कलंक भी होगा।

अब मैं समझ गई हूँ कि मैं इतनी स्वार्थी नहीं हो सकती कि केवल अपने हितों के लिए जिऊँ। मुझे सत्य को अभ्यास में लाना है, सिद्धांतों का पालन करना है और न्याय की भावना रखनी है। बहन ज़ोऊ की रिपोर्ट को और नहीं टाल सकती। इस सभा के फ़ौरन बाद मैं अपनी रिपोर्ट लिखूँगी।

हाँ, मैं भी लिखूँगी।

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