734 जब तुम परमेश्वर से अपेक्षाएं रखते हो तो तुम उसकी अवहेलना भी कर सकते हो

1 किसी भी समस्या का समाधान करना परमेश्वर से लोगों की अपेक्षाओं के समाधान से अधिक मुश्किल नहीं है। अगर परमेश्वर का कोई भी कार्य तुम्हारी सोच के अनुरूप नहीं है और अगर वह तुम्हारी सोच के अनुसार कार्य नहीं करता ह, तो तुम उसका विरोध कर सकते हो—इससे पता चलता है कि अपनी प्रकृति में मनुष्य परमेश्वर विरोधी है। इस समस्या को जानने और इसका समाधान करने के लिये आपको सत्य के अनुसरण का रास्ता अपनाना चाहिये। जो लोग सत्य से रहित हैं वे परमेश्वर से बहुत अधिक अपेक्षाएं रखते हैं, जबकि जो सचमुच सत्य को समझते हैं वे कोई मांग नहीं करते; वे सिर्फ़ यह महसूस करते हैं कि उन्होंने परमेश्वर को अधिक संतुष्ट नहीं किया है, वे उतने आज्ञाकारी नहीं हैं जितने कि होने चाहिये।

2 जब लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, वे हमेशा उससे कुछ न कुछ मांगते हैं, जो उनके भ्रष्ट स्वभाव को दर्शाता है। अगर तुम इसे गंभीर समस्या नहीं मानते, अगर तुम इसे ज़रूरी नहीं मानते, तो तुम्हारे मार्ग में जोखिम और छिपे हुए खतरे होंगे। तुम ज़्यादातर चीज़ों का समाधान कर सकते हो, लेकिन जब इसमें तुम्हारा भाग्य, संभावनाएं और मंज़िल शामिल होते हैं, तो तुम इनका समाधान नहीं कर सकते। उस समय, अगर तुम सत्य से रहित हो, तो फिर से अपने पुराने तरीकों को चुन लोगे और इस तरह नष्ट किए जाने वालों में शामिल हो जाओगे।

3 कई लोगों ने हमेशा इस तरह से अनुसरण किया है; जिस अवधि के दौरान वे अनुसरण कर रहे थे, उन्होंने अच्छा आचरण किया, लेकिन इससे यह तय नहीं होता कि भविष्य में क्या होगा : इसका कारण यह है कि तुम्हें अपनी घातक कमज़ोरी के बारे में कभी पता नहीं चला, या उन चीज़ों का पता नहीं चला जिनका खुलासा तुम्हारी प्रकृति से होता है और तुम परमेश्वर का विरोध कर सकते हो। जब तक तुम पर आपदाएं नहीं आती हैं, तुम अनजान बने रहते हो और पूरी तरह संभव है कि, जब तुम्हारा सफ़र ख़त्म होता है और परमेश्वर का कार्य पूरा होता है, तुम वही करोगे जो परमेश्वर का सबसे अधिक विरोध करता है और उसके ख़िलाफ़ सबसे बड़ी ईश-निंदा है।

— "मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "लोग परमेश्वर से बहुत अधिक माँगें करते हैं" से रूपांतरित

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