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परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का ज़रूरी रास्ता

I

ईश्वर का भय मानने का अर्थ नहीं

अनजान डर, बच निकलना, मूर्ति पूजन या अंधविश्वास।

बल्कि, ईश्वर का भय मानने का अर्थ है

प्रशंसा, विश्वास, सम्मान, समझ, देखभाल, आज्ञापालन करना।

ये है पवित्रीकरण, प्रेम, पूर्ण आराधना,

प्रतिदान, समर्पण बिन शिकायत के।

II

बिन परमेश्वर के सच्चे ज्ञान के,

मानव नहीं कर सकता विश्वास या प्रशंसा,

न समझ सकता न परवाह या आज्ञापालन कर सकता है,

पर भर जाएगा ख़ौफ़ और बेचैनी से,

भरा होगा संदेह, ग़लतफ़हमी से,

भागने की प्रवृत्ति और टालना चाहने से।

बिन परमेश्वर के सच्चे ज्ञान के

पवित्रीकरण और प्रतिदान नहीं हो सकता,

और मानवता नहीं कर सकेगी आराधना

और समर्पण जो कि है सच्चा,

सिर्फ़ अंधा मूर्ति-पूजन

पूर्ण अंधविश्वास से ज़्यादा कुछ भी नहीं।

III

परमेश्वर के सच्चे ज्ञान से ही,

उसके मार्ग पर चले, भय माने, बदी से दूर रहे इंसान।

उसके बिन, वो जो भी करेगा, भरा होगा

विद्रोह और अवज्ञा से

निंदा के आरोपों से,

उसके बारे में ग़लत राय से,

सत्य और ईश्वर के वचनों के सही अर्थ के ख़िलाफ़

दुष्ट आचरण से।

लेकिन ईश्वर में सच्चे विश्वास के साथ,

वो जानेगा कैसे अनुगमन किया जाए ईश्वर का।

केवल तभी मानव समझ पाएगा,

परमेश्वर को, उसकी परवाह करना शुरू करेगा।

IV

परमेश्वर की सच्ची परवाह के संग ही

मानव सच्ची आज्ञाकारिता पा सकता है।

और आज्ञाकारिता से प्रवाहित होगा

परमेश्वर के लिए पवित्रीकरण,

और ऐसे असली पवित्रीकरण से,

पा सकता है मानव प्रतिदान जो बेशर्त हो।

सिर्फ़ इस तरह मानव ईश्वर का सार,

स्वभाव, और वह कौन है जान सकता है।

जब वो सर्जक को जानेगा,

तब वास्तविक आराधना और समर्पण उमड़ेंगे।

सिर्फ़ जब ये मौजूद हैं तभी

मानव सच में दूर हो सकता है अपने बुरे मार्गों से।

V

और ये चीज़ें "ईश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने" की

पूरी प्रक्रिया का गठन करती हैं

और अपनी सम्पूर्णता में "ईश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने" की

विषयवस्तु भी हैं।

ये मार्ग है जिसपर चलने की ज़रूरत है

वो बनने के लिए जो ईश्वर का भय मानता और बदी से दूर रहता है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से

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