727 सृजित प्राणियों को सर्जक की आज्ञा माननी चाहिए

1 सृष्टि के प्रभु का सृजित प्राणियों के साथ व्यवहार करने का एक बुनियादी सिद्धांत है, जो सर्वोच्च सिद्धांत है। वह सृजित प्राणियों के साथ कैसा व्यवहार करता है, यह पूरी तरह से उसकी प्रबंधन योजना और उसकी अपेक्षाओं पर आधारित है; उसे किसी व्यक्ति से सलाह लेने की जरूरत नहीं है, न ही उसे इसकी आवश्यकता है कि कोई व्यक्ति उससे सहमत हो। जो कुछ भी उसे करना चाहिए और जिस भी तरह से उसे लोगों से व्यवहार करना चाहिए, वह करता है, और भले ही वह कुछ भी करता हो और जिस भी तरह से लोगों से व्यवहार करता हो, वह सब उन सिद्धांतों के अनुरूप होता है, जिनके द्वारा सृष्टि का प्रभु कार्य करता है। एक सृजित प्राणी के रूप में करने लायक केवल एक ही चीज़ है और वह है समर्पण करना; इसका कोई और विकल्प नहीं होना चाहिए।

2 सृष्टि का प्रभु हमेशा सृष्टि का प्रभु ही रहेगा; उसके पास किसी भी सृजित प्राणी पर जैसे चाहे वैसे आयोजन और शासन करने की शक्ति और योग्यता है, और ऐसा करने के लिए उसे किसी कारण की आवश्यकता नहीं है। यह उसका अधिकार है। सृजित प्राणियों में से किसी एक में भी, जिस सीमा तक वे सृजित प्राणी हैं, इस बात पर निर्णय देने की शक्ति या योग्यता नहीं है कि सृष्टिकर्ता को कैसे कार्य करना चाहिए या वह जो करता है, वह सही है या गलत है, न ही कोई सृजित प्राणी यह चुनने के योग्य है कि सृष्टि का प्रभु उन पर शासन, आयोजन या उनका निपटान करे या नहीं। इसी तरह, एक भी सृजित प्राणी में यह चुनने की योग्यता नहीं है कि सृष्टि के प्रभु द्वारा उनका शासन या निपटान किस तरह से हो। यह सर्वोच्च सत्य है।

3 सृष्टि के प्रभु ने चाहे सृजित प्राणियों के साथ कुछ भी किया हो या कैसे भी किया हो, उसके द्वारा सृजित मनुष्यों को केवल एक ही काम करना चाहिए : सृष्टि के प्रभु द्वारा प्रस्तुत इस तथ्य को खोजना, इसके प्रति समर्पित होना, इसे जानना और स्वीकार करना। इसका अंतिम परिणाम यह होगा कि सृष्टि के प्रभु ने अपनी प्रबंधन योजना और अपना काम पूरा कर लिया होगा, जिससे उसकी प्रबंधन योजना बिना किसी अवरोध के आगे बढ़ेगी; इस बीच, चूँकि सृजित प्राणियों ने सृष्टिकर्ता के नियम और उसकी व्यवस्थाओं को स्वीकार कर लिया है, और वे उसके प्रति समर्पित हो गए हैं, इसलिए उन्होंने सत्य प्राप्त कर लिया होगा, सृष्टिकर्ता की इच्छा को समझ लिया होगा, और उसके स्वभाव को जान लिया होगा।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य की खोज करके ही व्यक्ति परमेश्वर के कर्मों को जान सकता है' से रूपांतरित

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अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

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