प्रश्न 1: बाइबल परमेश्वर के कार्य की गवाही है, यह मानवजाति के लिए अपार लाभदायक रही है। बाइबल पढ़ने के माध्यम से, हम यह समझ जाते हैं कि परमेश्‍वर ही सभी चीजों का सृष्टिकर्ता है, हम परमेश्‍वर के चमत्कारिक और पराक्रमी कर्मों और उनकी सर्वक्षमता को देखते हैं। बाइबल परमेश्वर के वचन और मनुष्‍य की परमेश्वर को गवाही का एक अभिलेख है, तो कोई बाइबल पढ़ने से शाश्‍वत जीवन क्‍यों नहीं प्राप्‍त कर सकता है। ऐसा क्यों है कि शाश्वत जीवन का मार्ग बाइबिल में नहीं पाया जाता है?

उत्तर: बाइबल पढ़ने से हम यह समझ पाए कि परमेश्‍वर सभी चीजों का सृष्टिकर्ता है और हमने उसके चमत्कारिक कर्मों को पहचानना शुरू कर दिया। इसका कारण यह है कि बाइबल परमेश्वर के कार्य के प्रथम दो चरणों की गवाही है। यह परमेश्‍वर के वचनों और कार्य का अभिलेख है और व्यवस्था के युग और अनुग्रह के युग के दौरान मनुष्य की गवाही है। इसलिए, हमारे विश्वास के लिए बाइबल बहुत महत्वपूर्ण है इसके बारे में सोचो, यदि बाइबल नहीं होती, तो मनुष्य कैसे परमेश्‍वर और परमेश्‍वर के वचनों को समझ पाता? और किस तरह से मनुष्‍य परमेश्‍वर के कर्मों की गवाही दे पाता और परमेश्‍वर में सच्‍चा विश्‍वास करना शुरू कर पाता? अगर मनुष्य बाइबल नहीं पढ़े, तो वह हर युग में परमेश्‍वर की आज्ञापालन करने वाले सभी संतों की असली गवाही का और कैसे गवाह बनेगा? इसलिए, विश्वास का अभ्यास करने के लिए बाइबल को पढ़ना आवश्यक है, और प्रभु के किसी भी विश्वासी को कभी भी बाइबिल से नहीं भटकना चाहिए। आप कह सकते हैं, जो बाइबल से भटक जाता है वह प्रभु में विश्वास नहीं कर सकता है। यह सभी युगों के संतों के अनुभवों में सत्यापित होता है। कोई भी विश्‍वास का अभ्यास करने में बाइबल को पढ़ने के मूल्य और अर्थ से इंकार करने की हिम्मत नहीं करता है। इसलिए, सभी युगों भर मे संतों और विश्वासियों ने बाइबल की पढ़ाई को एक महत्‍वपूर्ण विषय के रूप में देखा है। कुछ लोग यहाँ तक कह सकते हैं, कि बाइबल और प्रार्थना पढ़ना उतना ही जरूरी है जितना कि चलने के लिए हमारे दोनों पैर जरूरी हैं, जिसमें से एक के भी बिना हम आगे बढ़ने में विफल रहते हैं। लेकिन प्रभु यीशु ने कहा है: "धर्मग्रन्थ खोजें; क्योंकि तुम सोचते हो कि उनमें शाश्वत जीवन है: और वे वे हैं जो मेरे बारे में गवाही देते हैं। और तुम मेरे पास नहीं आओगे, कि तुम जीवन पा सको" (युहन्ना 5:39-40)। कुछ लोग भ्रमित हैं, उन्हें लगता है, यह देखते हुए कि बाइबल परमेश्‍वर के वचन और मनुष्यों की गवाही का एक अभिलेख है, बाइबल पढ़ने से मनुष्य को शाश्‍वत जीवन मिलना चाहिए! तो ऐसा क्यों है कि प्रभु यीशु ने कहा कि बाइबल में कोई शाश्‍वत जीवन नहीं है? दरअसल, यह ऐसा मुश्किल विचार नहीं है। जब तक हम व्यवस्था के युग और अनुग्रह के युग के दौरान परमेश्‍वर के वचनों और कार्य के अंदर की कहानी और सार को और साथ ही उनके माध्यम से प्राप्त प्रभाव को समझते हैं, तब हम स्वाभाविक रूप से महसूस करेंगे कि ऐसा क्यों है कि कोई बाइबल को पढ़कर शाश्‍वत जीवन प्राप्त नहीं कर सकता है। सबसे पहले, हम व्यवस्था के युग पर विचार करें। इस युग के दौरान, यहोवा मुख्‍य तौर पर मनुष्य द्वारा पालन किए जाने के लिये व्यवस्थाओं, आज्ञाओं और अध्‍यादेशों को लागू करने बारे में चिंतित था। उनके वचन ज्यादातर मानवता के पृथ्वी पर रहने के लिए एक प्रकार के मार्गदर्शक थे, जो अभी भी अपनी शैशवावस्था में हैं। इन वचनों में मनुष्य के जीवन स्वभाव को बदलना शामिल नहीं था। इसलिए व्‍यवस्‍था के युग के दौरान परमेश्‍वर के सभी वचनों का उद्देश्य लोगों से कानूनों और आज्ञाओं का पालन करवाना था। यद्यपि ये वचन सत्‍य थे, वे बहुत अल्पविकसित सत्य का प्रतिनिधित्व करते हैं। अनुग्रह के युग के दौरान, प्रभु यीशु के वचन और कार्य छुटकारे के कार्य पर केंद्रित थे। जो वचन उन्होंने दिये वे छुटकारे के सत्‍य के बारे में थे और लोगों को सिखाया कि उन्हें अपने पापों को स्वीकार करना और पश्चाताप करना चाहिये और पाप और दुष्टता करने से दूर रहना चाहिए। इन वचनों ने प्रभु की प्रार्थना करने का उचित तरीका भी लोगों को सिखाया और माँग की कि मनुष्य को अपने समस्त हृदय और आत्मा के साथ प्रभु से प्रेम अवश्य करना चाहिए, अपने पड़ोसी को अपने जैसा प्रेम करना चाहिए सहिष्णु और धैर्यवान बनना चाहिए, और दूसरों को सत्‍तर बार, सात बार माफ कर देना चाहिए। ये सभी पश्चाताप के तरीकों में शामिल हैं। इसलिए, बाइबल पढ़ने के माध्यम से, हम केवल व्‍यवस्‍था के युग और अनुग्रह के युग के दौरान परमेश्‍वर के कार्य को समझ सकते हैं। हमें पता चलता है कि सभी चीजें परमेश्‍वर ने बनाई हैं और यह सीखते हैं कि पृथ्वी पर कैसे रहें और परमेश्‍वर की आराधना कैसे करें। हमें समझते हैं कि पाप क्या है, कौन परमेश्‍वर द्वारा धन्य किए गए हैं और किन्हें परमेश्‍वर ने अभिशाप दिया है। हम जान जाते हैं कि कैसे अपने पापों को स्‍वीकार करें और परमेश्‍वर से पश्चाताप करें। हम मानवता, सहनशीलता और क्षमा करना सीख जाते हैं, और जानते हैं कि हमें प्रभु का अनुसरण करने के लिये क्रॉस उठाना चाहिए। हम प्रभु यीशु की असीमित दया और करुणा स्‍वयं देखते हैं, और समझते हैं कि केवल प्रभु यीशु के सामने विश्वास में आने से ही हम उनके प्रचुर अनुग्रह और सत्‍य का आनंद ले पाएँगे। व्यवस्था के युग और अनुग्रह के युग के दौरान बाइबल में अभिलिखित परमेश्‍वर के वचन और कार्य उस समय मानवजाति को बचाने और मानवजाति की जरूरतों की योजना के अनुसार परमेश्वर के द्वार व्‍यक्‍त किये गये सत्‍य थे। ये सत्‍य मनुष्‍य को केवल कुछ सतही अच्छे व्यवहारों को अपनाने का कारण बनने में सक्षम थे लेकिन मनुष्य के पापों की जड़ों का पूरी तरह से समाधान करने, मनुष्य के जीवन स्वभाव को बदलने, और मनुष्य को शुद्धिकरण, उद्धार, और परिपूर्णता प्राप्त करने की अनुमति देने में असमर्थ थे। इस प्रकार, अनुग्रह के युग के दौरान प्रभु यीशु के द्वारा दिए गये वचन केवल पश्चाताप का मार्ग कहे जा सकते हैं, लेकिन शाश्‍वत जीवन का मार्ग नहीं। तो शाश्‍वत जीवन का मार्ग क्या है? शाश्‍वत जीवन का मार्ग सत्य का वह मार्ग है जो मनुष्य को हमेशा के लिए जीवित रहने देता है, जिसका मतलब है, कि यह वह तरीका है जो मनुष्य को उसकी पापमयी प्रकृति के बंधनों और अवरोधों को त्‍यागने, उसके जीवन स्वभाव को बदलने की अनुमति देता है, और उसे जीवन के रूप में सत्य को प्राप्त करने, पूरी तरह से शैतान के प्रभाव से मुक्त होने और मसीह के अनुकूल होने की अनुमति देता है। यह मनुष्य को जानने, आज्ञापालन करने और परमेश्‍वर का आदर करने की अनुमति देता है ताकि फिर कभी दुबारा परमेश्‍वर का विरोध या उनसे विश्‍वासघात करने का पाप ना करे। केवल वही मार्ग जो ऐसा प्रभाव प्राप्त कर सकता है, उसे ही शाश्‍वत जीवन का मार्ग कहा जा सकता है। मनुष्य, पाप के परिणामस्वरूप मरता है। अगर मनुष्य सत्य को जीवन के रूप में प्राप्त करता है और उन सभी पापों का समाधान कर लेता है जो उसे त्रस्त करते हैं, तो परमेश्‍वर उसे शाश्‍वत जीवन का आशीर्वाद देंगे। तो, केवल अंतिम दिनों में परमेश्‍वर का उद्धार प्राप्त करके हम शाश्‍वत जीवन के उस मार्ग का आनंद ले सकते हैं जो परमेश्‍वर मानवजाति को देते हैं।

"मेरा प्रभु कौन है" फ़िल्म की स्क्रिप्ट से लिया गया अंश

पिछला: प्रश्न 17: आपका दावा है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर अंत के दिनों के परमेश्वर यहाँ पृथ्वी पर हैं। और आप कहती हैं, कि आपकी आस्था सच को जीवन के सही मार्ग को, खोजने की चाह से आयी है। मगर मेरा अनुभव कहता है, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के बहुत-से अनुयायी यीशु की मिशनरियों की तरह हैं जो सुसमाचार को फैलाते हुए परमेश्वर की गवाही देते हैं परमेश्वर को अपनी देह और आत्मा अर्पित करने के लिये, बेझिझक अपने परिवार, अपने करियर को भी त्याग देते हैं, उन लोगों में, बहुत-से युवा लोग हैं जो अंत के दिनों के मसीह का अनुसरण करने की खातिर, शादी नहीं करना चाहते। आप लोगों के सुसमाचार को फैलाने के लिए सारा-कुछ छोड़ देने की वजह से, ज़्यादा-से-ज़्यादा लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं। मान लीजिए दुनिया में सभी लोग परमेश्वर की शरण में चले जाएं, तो फिर कम्युनिस्ट पार्टी के साथ कौन रहेगा? पार्टी में कौन विश्वास करेगा? इसी वजह से सरकार विश्वासियों का, दमन करती है और उन्हें गिरफ्तार करती है। क्या आपको इसमें कोई समस्या नज़र आती है? आपकी ऐसी आस्था के कारण ही इतने सारे लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया है इतने सारे लोग घर छोड़कर भाग गये हैं। इतने सारे दंपत्तियों ने तलाक ले लिया है, और इतने सारे बच्चे बिना मां-बाप के हो गये हैं। बुजुर्गों की देखभाल करनेवाले, कोई नहीं हैं। परमेश्वर में आपकी ऐसी आस्था आपके ही परिवारों को तकलीफ पहुंचा रही है। आप क्या हासिल करना चाहते हैं? क्या यही आपका वो सच्चा मार्ग है जिस पर आपकी अगुवाई हुई है? पारंपरिक चीनी संस्कृति मां-बाप से जुड़ाव को बहुत मूल्यवान मानती है। कहा गया है: "मां-बाप का प्रेम सबसे ऊपर।" कन्फ्यूशियस ने कहा था: "जब आपके मां-बाप जीवित हों, तो बहुत दूर की यात्रा न करें।" मां-बाप के प्रति आदर की भावना मनुष्य के चाल-चलन की बुनियाद है। आप जिस प्रकार से परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, कि जिन्होंने आपको जीवन और पोषण दिया, उन्हीं की देखभाल न कर पायें, तो यह इंसानों द्वारा अनुसरण के लिए सही मार्ग कैसे हो सकता है? मैं अक्सर लोगों को यह कहते हुए सुनती हूँ, कि विश्वासी सबसे अच्छे लोग होते हैं। यह गलत नहीं है। लेकिन परमेश्वर की आराधना करनेवाले और उन्हें सबसे ऊपर माननेवाले आप सभी लोग, यह कम्युनिस्ट पार्टी को आग-बबूला कर देती है यह उनमें नफ़रत भर देती है। आप जगह-जगह जाकर सुसमाचार फैलाते हैं, और फिर भी आप अपने ही परिवार की देखभाल नहीं कर सकते। इसे अच्छा चाल-चलन कैसे माना जा सकता है? क्या ऐसा नहीं लगता कि आपकी आस्था आपको अपने रास्ते से एक गलत मोड़ पर घुमाकर ले जाती है? आप जो-कुछ भी कर रहे हैं, उससे क्या आप हमारे समाज में सद्भाव और संतुलन को नष्ट नहीं कर रहे हैं? मेरी आपको सलाह है यह गलती करते न रहें। आपको अपनी आस्था छोड़कर, अपने घर, अपने परिवार में लौट जाना चाहिए, उनकी देखभाल करनी चाहिए, और एक सामान्य जीवन जीना चाहिए। संतान और माँ–बाप होने के नाते यह आपका कर्तव्य है। इंसानों को यही करना चाहिए यही व्यावहारिक है।

अगला: प्रश्न 2: परमेश्‍वर में अपना विश्वास रखते हुए और उनका अनुसरण करते हुए, हम शाश्‍वत जीवन प्राप्त कर सकते हैं। परमेश्‍वर के वचन इस बात का समर्थन करते हैं: प्रभु यीशु ने कहा था: "मैं ही पुनरुज्जीवन, और जीवन हूँ: जो कोई भी मुझमें विश्वास करता है, चाहे उसकी मृत्यु क्यों न हो जाएं, वह जीवित रहेगा: और जो कोई भी मुझमें जीता और विश्वास करता है, वह कभी नहीं मरता है" (यूहन्ना 11:25-26)। "परंतु जो कोई भी मेरे द्वारा दिए गये जल को पीता है, उसे प्यास फिर कभी नहीं सताएगी; परंतु जो पानी मैं उसे दूँगा वह उसमें एक कुएं का निर्माण करेगी जिससे उसे चिरस्थायी जीवन प्राप्त होगा" (यूहन्ना 4:14)। ये अंश प्रभु यीशु के वादे हैं। प्रभु यीशु हमें शाश्‍वत जीवन प्रदान कर सकते हैं, प्रभु यीशु का मार्ग शाश्‍वत जीवन का मार्ग है। बाइबल कहती है, "वह जो पुत्र पर विश्वास करता है, वह शाश्वत जीवन प्राप्त करता है: और जो पुत्र पर विश्वास नहीं करता है, उसे जीवन का प्रकाश नहीं दिखेगा; बल्कि उसे परमेश्वर का क्रोध झेलना पड़ेगा" (यूहन्ना 3:36)। क्‍या प्रभु यीशु मनुष्य का पुत्र नहीं हैं, क्या वह मसीह नहीं है? प्रभु यीशु में विश्वास करके, हमें, इस प्रकार, शाश्‍वत जीवन का मार्ग भी मिलना चाहिए। लेकिन आप लोग इस बात की गवाही देते हैं कि अंतिम दिनों में मसीह के आसन के समक्ष न्‍याय और शुद्धिकरण का अनुभव कर सकें, और अंतिम दिनों में परमेश्‍वर से उद्धार प्राप्‍त कर सकें। हमारे लिये शाश्वत जीवन का मार्ग लाएँगे। मैं यह बिल्कुल नहीं समझ पा रहा हूँ, कि हम सभी प्रभु यीशु मसीह के अनुयायी हैं। यह शाश्‍वत जीवन के मार्ग को प्राप्त करने के लिए पर्याप्त क्यों नहीं है? तो हमें अंतिम दिनों के मसीह के वचनों और कार्य को क्यों स्वीकार करना है?

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