प्रश्न 13: आप सब परमेश्वर में विश्वास करते हैं; और मैं मार्क्स और लेनिन में। मैंने, तरह-तरह की धार्मिक आस्थाओं पर शोध किया है। अपने कई सालों के शोधकार्य के जरिये, मैंने एक समस्या देखी है। सभी धर्म किसी न किसी, परमेश्वर में विश्वास करते हैं। लेकिन परमेश्वर के तमाम विश्वासियों में से किसी ने भी, परमेश्वर को नहीं देखा है। उनकी आस्था सिर्फ भावनाओं की बुनियाद पर टिकी है। इसलिए, मैं धार्मिक आस्था के बारे में, इस नतीजे पर पहुंचा हूँ: धर्म विशुद्ध रूप से, काल्पनिक और अंधविश्वास है जिसका विज्ञान में, कोई आधार नहीं है। आज के समाज में विज्ञान बहुत विकसित है। गलतियाँ न करें इसके लिए हर चीज़ को, विज्ञान पर आधारित होना चाहिए। कम्युनिस्ट पार्टी इसमें विश्वास करती है। हम परमेश्वर में विश्वास नहीं करते। दी इंटरनेशनेल में लिखा है: "कभी भी दुनिया का उद्धार करनेवाला कोई नहीं हुआ, न देवता, न सम्राट, जिन पर भरोसा किया जा सके। मानवजाति को खुश रहने के लिए, खुद अपने भरोसे रहना होगा!" दी इंटरनेशनेल में साफतौर से लिखा है, "कभी भी दुनिया का उद्धार करनेवाला कोई नहीं हुआ।" हमारे पूर्वज परमेश्वर में जिस वजह से विश्वास करते थे, वह मुख्य रूप से यह है कि उस वक्त वे सूर्य, चंद्रमा और तारे जैसे अजूबों से रूबरू थे, जिनकी कोई वैज्ञानिक व्याख्या नहीं थी। इसलिए उनके दिलो-दिमाग में, अति-प्राकृतिक शक्तियों को लेकर डर और अचरज पैदा हो गया। इस तरह से धर्म की शुरुआती धारणाएं बनीं। यही नहीं, जब इंसान कुदरती तबाहियों और बीमारियों जैसी मुश्किलें हल नहीं कर पाये, तब उन्होंने परमेश्वर को आदर देकर आध्यात्मिक सहूलियत खोजी। यह है धर्म का उद्भव। हम देख सकते हैं कि यह तार्किक, या वैज्ञानिक नहीं था। आजकल हम ज़्यादा विकसित हैं विज्ञान ने बड़ी तरक्की की है। उड़ान और अंतरिक्ष उद्योग, बायोटेक्नॉलॉजी, जेनेटिक इंजिनियरिंग, और चिकित्सा जैसे क्षेत्रों में, मानवजाति ने बहुत तरक्की की है। पहले हम नहीं समझते थे और हमारे पास समस्याएँ हल करने के तरीके नहीं थे। लेकिन अब हम हर चीज़ को विज्ञान के जरिये समझा सकते हैं, और हल के लिए हम विज्ञान पर भरोसा करते हैं। विज्ञान और टेक्नॉलॉजी के इस युग में, परमेश्वर में विश्वास करना, क्या यह अज्ञानी होना, नहीं है? क्या आपको नहीं लगता आप पीछे छूट जाएंगे? हम सिर्फ विज्ञान में विश्वास कर सकते हैं, बस।

उत्तर: आप कहते हैं कि हमारी आस्था लोगों के विज्ञान को न समझने के कारण है, और अतिप्राकृतिक शक्तियों का सामना करने के डर और अचरज से पैदा होती है और यह अंधविश्वास है। यह सही नहीं है और निराधार है। धर्म और अंधविश्वास, जिसकी आप बात करते हैं दोनों अलग-अलग हैं। आप कम्युनिस्ट, धार्मिक आस्था को सिर्फ अंधविश्वास कह कर उसकी निंदा करते हैं और उस पर बंदिश लगाते हैं। मेरे ख्याल से यह बेतुका है। दुनिया के मुख्य धर्मों में, यहूदी धर्म, कैथोलिक धर्म और ईसाई धर्म, ये सभी परमेश्वर और प्रभु यीशु में विश्वास करते हैं। सिर्फ यही है असली धार्मिक आस्था। तीन हज़ार साल पहले, व्यवस्था के युग में, परमेश्वर के कार्य ने यहूदी धर्म को जन्म दिया। इस्राएली लोगों ने परमेश्वर की वाणी को सुना, और उनका नाम जाना। उन्होंने हमेशा यहोवा परमेश्वर से प्रार्थना की, और यहोवा द्वारा घोषित आदेशों का पालन किया। उन सबने यहोवा परमेश्वर की आराधना की। हम इसकी जांच कर सकते हैं कि यहूदी धर्म व्यवस्था के युग में परमेश्वर के कार्य की वजह से शुरू हुआ। जब अनुग्रह का युग आया, तब परमेश्वर प्रभु यीशु के रूप में देहधारी हुए, और कार्य शुरू किया। सूली पर चढ़ा देने पर, उन्होंने मानवजाति के लिए प्रायश्चित किया। बहुत-से लोगों ने उनमें आस्था प्रकट की और तब प्रभु यीशु की कलीसिया बनी। सैकड़ों साल बाद, ईसाई धर्म, कैथोलिक धर्म, और पूर्वी रूढ़िवादी कलीसिया का विकास हुआ। ये संसार के सबसे बड़े धर्म हैं। ये सभी प्रभु यीशु के छुटकारे के कार्य से पैदा हुए। अंत के दिनों के सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने सत्य व्यक्त किया है और न्याय किया है, और बहुत-से लोगों पर विजय पायी और उन्हें बचाया है। जो लोग सच्चा विश्वास करते हैं, उन्होंने उनकी वाणी को सुना है, और वे परमेश्वर के सिंहासन के समक्ष आये हैं। इस प्रकार सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया का आगमन हुआ। इन सच्चाइयों से साबित होता है कि धार्मिक आस्था पूरी तरह से परमेश्वर के प्रकट होने और कार्य से पैदा हुई। अनगिनत ईसाइयों के जीवन अनुभवों द्वारा परमेश्वर के प्रकटन और कार्य की जांच होती है। कोई भी ताकत, परमेश्वर की कलीसिया, या परमेश्वर के चुने हुए लोगों को, गिरा नहीं सकती या उन्हें रोक नहीं सकती। यह एक तथ्य है। इतिहास की शुरुआत से ही, परमेश्वर इंसानों को रास्ता दिखाने, छुटकारा दिलाने और उन्हें बचाने का कार्य करते रहे हैं। परमेश्वर का प्रकटन और कार्य आगे बढ़ने के लिए हम सबकी अगुवाई करता है। कोई भी इन सच्चाइयों को नकार नहीं सकता। धार्मिक आस्था पर शोध करना आपकी विशेषज्ञता है। आपको ये बातें समझनी चाहिए। आप ये कहकर कि धार्मिक आस्था अज्ञानता से पैदा हुई है, ऐतिहासिक तथ्यों से छेड़छाड़ क्यों कर रहे हैं? क्या ऐसा कहना बेतुका नहीं है?

आपने इतने सालों तक धार्मिक आस्था का अध्ययन किया है। आप तो अंधविश्वास और धर्म में भी फर्क नहीं कर पा रहे हैं। इससे पता चलता है कि आप धर्म को नहीं समझते। इन दिनों, ज़्यादा-से-ज़्यादा लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं। दुनिया की एक-तिहाई आबादी से भी ज़्यादा लोग विश्वास करते हैं। दुनिया के महानतम वैज्ञानिक ईसाई रहे हैं, जैसे कि न्यूटन, गैलीलियो, और कोपरनिकस। क्या आप इन लोगों को अंधविश्वासी कहेंगे? वे विज्ञान में विश्वास नहीं करते थे? विज्ञान भौतिक संसार के अनुसंधान के नतीजे पैदा करता है, लेकिन उसमें आध्यात्मिक क्षेत्र की खोजबीन करने की ताकत नहीं है। परमेश्वर में हमारी आस्था विज्ञान की बुनियाद पर नहीं है। बल्कि हमारी आस्था परमेश्वर के वचनों और कार्य की बुनियाद पर है। पवित्र बाइबल परमेश्वर के कार्य की गवाही है, और परमेश्वर के कार्य के मानवजाति के अनुभव का ऐतिहासिक दस्तावेज है। बाइबल में नबियों ने हज़ारों साल पहले भविष्यवाणी कर दी थी कि अंत के दिनों में क्या होगा। ये भविष्यवाणियाँ सच साबित हो रही हैं, जो हमें दर्शाता है कि परमेश्वर का प्रकटन और कार्य वास्तविक है, और परमेश्वर ही मानवजाति और पूरे ब्रह्मांड पर शासन करते हैं। इसे नकारा नहीं जा सकता।

आपका दावा है, कि अगर लोग परमेश्वर को नहीं देख सकते, तो उनका अस्तित्व नहीं है। लेकिन जब आप नकली पैसे जला कर कब्रिस्तानों में बंदगी करते हैं, तब क्या आपको मरे हुए इंसान की आत्मा नज़र आती है? भविष्य जानने के लिए बुरी आत्माओं के पीछे भागकर, क्या आप मृत आत्माओं की दुनिया देख सकते हैं? अगर नहीं, तो फिर आप नकली पैसे क्यों जलाते हैं, बंदगी करते हैं, और ज्योतिषियों को खोजते-फिरते हैं? आप बार-बार कहते हैं, कि परमेश्वर का अस्तित्व नहीं है, और एक बड़े पैमाने पर नास्तिकता का उपदेश देते हैं, लेकिन निजी ज़िंदगी में, आप नकली परमेश्वरों में विश्वास करते हैं, और बुरी आत्माओं की आराधना करते हैं। क्या आप अपनी इन हरकतों से झूठ फैलाकर अपने लोगों को धोखा नहीं दे रहे हैं? आप साफ़ देखते हैं कि सच्चे परमेश्वर के वचन और कार्य सत्य हैं, और वे मानवजाति को प्रकाश और उद्धार देते हैं। फिर भी आप जिद पर अड़कर नास्तिकता के नाम पर, सच्चे परमेश्वर में आस्था को नकारते, और उसका विरोध करते हैं, और धार्मिक आस्था को दबा, कर ईसाइयों पर अत्याचार करते हैं। आखिरकार, क्या यह एक समस्या नहीं है? परमेश्वर आत्मा हैं; हालांकि हम उनके आध्यात्मिक शरीर को नहीं देख सकते, परंतु हम परमेश्वर को अपने वचन बोलते हुए सुन सकते हैं, और उनके कार्य को देख सकते हैं। इन तथ्यों का खंडन नहीं किया जा सकता। हज़ारों सालों से, परमेश्वर बोलते आ रहे हैं, वो इंसानो को राह दिखा रहे हैं, और उन्हें बचाते आ रहे हैं, और सब इंसानों के भाग्य पर शासन करते आये हैं। परमेश्वर ने बहुत-से कार्य भी प्रकट किये हैं। इंसानी अनुभवों और इन चीज़ों के व्यवहारिक ज्ञान ने, कई कहावतों को जन्म दिया है, जैसे कि "स्वर्ग की इच्छा पर भरोसा करें," "ईश्वर की इच्छा के आगे, मनुष्य दुर्बल है," "इंसान बीज बो सके है, पर फसल ईश्वर भरोसे है," "ईश्वर हमेशा राह दिखाये," "ईश्वर की योजना के आगे हमारी एक न चले," "इंसान का भविष्य सितारों में लिखा होता है," वगैरह। इस सबसे यह साबित होता है, कि एक शासक है, जो हमारी पूरी दुनिया को सजाता, और उसका प्रबंध करता है, मानवजाति की अगुवाई करते हुए, उसे आशीर्वाद, और पोषण देता है। बार-बार, सुनी जानेवाली ऐसी कहावतें भी हैं, "ऊपरवाला देख रहा है," "जैसे लोग काम करें, वैसे ऊपरवाला देखे," और "जैसा काम करोगे वैसा ही फल मिलेगा।" इस सबसे साबित होता है, कि परमेश्वर,सृजन के प्रभु हैं, और परमेश्वर ने हमेशा से सभी चीज़ों पर शासन किया है। परमेश्वर सब पर, निगरानी रखते हैं। परमेश्वर लोगों के कारनामों के मुताबिक़ उन्हें सज़ा देते हैं, और उनकी किस्मत का फैसला करते हैं।

आपका कहना है कि चूंकि परमेश्वर दिखाई नहीं देते, इसलिए उनका अस्तित्व नहीं है। यह सही नहीं है। क्या आपने परमेश्वर के कार्य की खोज की है? क्या आपने पवित्र बाइबल और वचन देह में प्रकट होता है को पढ़ा है? बाइबल में कहा गया है, "आदि में वचन था, और वचन परमेश्वर के साथ था, और वचन परमेश्वर था" (यूहन्ना 1:1)। हालांकि इंसानों ने परमेश्वर के आत्मा को नहीं देखा है, वे परमेश्वर की वाणी को सुन सकते हैं, परमेश्वर द्वारा,व्यक्त वचनों को, देख सकते हैं, और परमेश्वर के कार्यों को अनुभव कर सकते हैं। हज़ारों सालों में, परमेश्वर ने, तीन चरणों में कार्य किया है। इस्राएइल में, उन्होंने व्यवस्था के युग का कार्य किया था, और इस्राएलियों के सामने, अपनी व्यवस्थाओं, और आदेशों की घोषणा की थी। अनुग्रह के युग में, देहधारी परमेश्वर ने, छुटकारे का कार्य किया। आस्था के जरिये बहुत-से लोगों के पाप माफ़ कर दिये गये। उन्होंने परमेश्वर की मौजूदगी में, ज़िंदगी बितायी, और उनकी शांति और खुशी का आनंद लिया। राज्य के युग में, परमेश्वर ने, फिर से देहधारण किया है, सत्य बोलने, और न्याय का कार्य करने शुद्ध करने और बचाने के लिए। परमेश्वर ने बहुत-से काम किये हैं। लोगों को ये काम नज़र क्यों नहीं आते? लोग अभी भी ये दावा कैसे कर सकते हैं, कि परमेश्वर का अस्तित्व नहीं है? परमेश्वर में विश्वास के लिए, हम सिर्फ आँखों के भरोसे नहीं रहते। हमारी आस्था मुख्य रूप से परमेश्वर के कार्य पर आधारित होती है। देहधारी परमेश्वर ने बहुत-से वचन कहे हैं। परमेश्वर के वचन, लोगों के कथनों से अलग होते हैं। कोई इंसान ऐसे वचन नहीं कह सकता। परमेश्वर के वचनों में, अधिकार और सामर्थ्य होता है। वे हर दिन पूरे होते हैं। परमेश्वर के कार्य का प्रत्येक चरण बहुतों को बचाता है, और उन्हें परमेश्वर के समक्ष लाता है, ताकि वे उनके अस्तित्व को समझ सकें, और उनके स्वभाव को जान सकें। इन्हीं कारणों से ज़्यादा-से-ज़्यादा लोग परमेश्वर की शरण में आते हैं। आप इस वास्तविकता को कैसे नहीं समझ पाते? तो मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कुछ वचन साझा करूंगा। जब आप ये वचन सुनेंगे, तब आप परमेश्वर द्वारा हर चीज़ के सृजन, और उस पर शासन के बारे में, बेहतर ढंग से समझ सकेंगे।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं: "ब्रह्मांड और नभमंडल की विशालता में, अनगिनत प्राणी जीते और प्रजनन करते हैं, सृष्टि के चक्रीय नियम का पालन करते हैं, एक स्थायी नियम पर चलते हैं। जो लोग मर जाते हैं वे जीवितों की कहानियों को अपने साथ ले जाते हैं और जो जीवित हैं वे मरे हुओं के वही त्रासदीपूर्ण इतिहास को दोहराते रहते हैं। मानवजाति बेबसी में स्वयं से पूछती हैः हम क्यों जीवित हैं? और हमें मरना क्यों पड़ता है? यह संसार किसके आदेश पर चलता है? मानवजाति को किसने रचा है? क्या वास्तव में मानवजाति प्रकृति के द्वारा ही रची गई है? क्या मानवजाति वास्तव में स्वयं के भाग्य के नियंत्रण में है? ... मनुष्यजाति मात्र नहीं जानती है कि ब्रह्मांड और सभी चीज़ों का अधिपति कौन है, मानवजाति की उत्पत्ति और भविष्य तो वह बिल्कुल नहीं जानती है। मानवजाति सिर्फ मजबूरन इन नियमों के अधीन रहती है। न तो इससे कोई बच सकता है और न ही कोई इसे बदल सकता है, क्योंकि इन सबके मध्य और स्वर्ग में केवल एक ही शाश्वत सत्ता है जो सभी पर अपनी सम्प्रभुता रखती है। और ये वह है जिसे कभी भी मनुष्य ने देखा नहीं है, जिसे मानवजाति ने कभी जाना नहीं है, जिसके अस्तित्व में मनुष्य ने कभी भी विश्वास नहीं किया, फिर भी वही एक है जिसने मानवजाति के पूर्वजों को श्वास दी और मानवजाति को जीवन प्रदान किया। वही मानवजाति के अस्तित्व के लिए आपूर्ति और पोषण प्रदान करता है, और आज तक मानवजाति को मार्गदर्शन प्रदान करता आया है। इसके अलावा, उसी और सिर्फ़ उसी पर मानवजाति अपने अस्तित्व के लिए निर्भर करती है। इस ब्रह्माण्ड में उसी की सत्ता है और हर प्राणी पर उसी का शासन है। वह चारों मौसमों पर उसी का अधिकार है और वही वायु, शीत, बर्फ और बरसात संचालित करता है। वही मानवजाति को धूप प्रदान करता है और रात्रि लेकर आता है। उसी ने स्वर्ग और पृथ्वी की नींव डाली, मनुष्य को पहाड़, झील और नदियां तथा उसमें जीवित प्राणी उपलब्ध कराए। उसके कार्य सभी जगह हैं, उसका सामर्थ्य सभी जगह है, उसका ज्ञान चारों ओर है, और उसका अधिकार भी सभी जगह है। प्रत्येक नियम और व्यवस्था उसी के कार्य का मूर्त रूप है, और उनमें से प्रत्येक उसकी बुद्धि और अधिकार प्रगट करता है। कौन है जो उसके प्रभुत्व से बच सकता है? कौन है जो उसकी रूपरेखा से मुक्त रह सकता है? प्रत्येक चीज़ उसकी निगाह में है और सभी कुछ उसकी अधीनता में है उसके कार्य और शक्ति मनुष्य के पास सिवाय यह मानने के और कोई विकल्प नहीं छोड़ते कि वास्तव में उसका अस्तित्व है और हर चीज़ पर उसी का अधिकार है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल परमेश्वर के प्रबंधन के मध्य ही मनुष्य बचाया जा सकता है')।

"जिस दिन से मनुष्य अस्तित्व में आया है, परमेश्वर ने ब्रह्मांड का प्रबंधन करते हुए, सभी चीज़ों के लिए परिवर्तन के नियमों और और उनकी गतिविधियों के पथ को निर्देशित करते हुए हमेशा ऐसे ही काम किया है। सभी चीज़ों की तरह मनुष्य भी चुपचाप और अनजाने में परमेश्वर से मिठास और बारिश और ओस द्वारा पोषित होता है; सभी चीज़ों की तरह मनुष्य भी अनजाने में परमेश्वर के हाथ के आयोजन के अधीन रहता है। मनुष्य का हृदय और आत्मा परमेश्वर के हाथ में हैं, उसके जीवन की हर चीज़ परमेश्वर की दृष्टि में रहती है। चाहे तुम यह मानो या न मानो, कोई भी और सभी चीज़ें, चाहे जीवित हों या मृत, परमेश्वर के विचारों के अनुसार ही जगह बदलेंगी, परिवर्तित, नवीनीकृत और गायब होंगी। परमेश्वर सभी चीज़ों को इसी तरीके से संचालित करता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है')।

"यद्यपि मानवजाति यह नहीं मानती है कि परमेश्वर अस्तित्व में है, इस तथ्य को स्वीकार नहीं करती है कि सृजनकर्ता ने हर एक चीज़ को बनाया है और व‍ह हर चीज़ पर प्रभुत्व रखता है, और इसके अतिरिक्त सृजनकर्ता के अधिकार के अस्तित्व को नहीं पहचानती है, फिर भी मानव-विज्ञानी, खगोलशास्त्री, और भौतिक-विज्ञानी उत्तरोत्तर अधिक खोज कर रहे हैं कि इस विश्व में सभी चीज़ों का अस्तित्व, और वे सिद्धान्त और साँचे जो उनकी गतिविधियों को आदेश देते हैं, उन सभी पर एक विशाल और अदृश्य अंधकारमय ऊर्जा के द्वारा शासन और नियंत्रण किया जाता है। यह तथ्य मनुष्य को बाध्य करता है कि वह इस बात का सामना करे और स्वीकार करे कि इन गतियों के तरतीबों के बीच एकमात्र शक्तिशाली परमेश्वर ही है, जो हर एक चीज़ का आयोजन करता है। उसका सामर्थ्य असाधारण है, और यद्यपि उसके असली चेहरे को कोई नहीं देख सकता है, फिर भी वह हर क्षण हर एक चीज़ पर शासन और नियन्त्रण करता है। कोई भी व्यक्ति या ताक़त उसकी संप्रभुता से परे नहीं जा सकती है। इस सत्य का सामना करते हुए, मनुष्य को यह अवश्य पहचानना चाहिए कि वे नियम जो सभी चीज़ों के अस्तित्व पर शासन करते हैं उन्हें मनुष्यों के द्वारा नियन्त्रित नहीं किया जा सकता है, किसी के द्वारा बदला नहीं जा सकता है; और साथ ही स्वीकार अवश्य करना चाहिए कि मानवजाति इन नियमों को पूरी तरह से नहीं समझ सकती है। और वे प्राकृतिक रूप से घटित होने वाली नहीं हैं, बल्कि एक प्रभु और स्वामी के द्वारा आदेशित की जाती हैं" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III')।

"साम्यवाद का झूठ" फ़िल्म की स्क्रिप्ट से लिया गया अंश

पिछला: प्रश्न 12: सरकार की प्रचार सामग्री के अनुसार, सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया को पूर्वोत्तर चीन में किसी झाहो नाम के व्यक्ति ने स्थापित किया था। यह व्यक्ति सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया में सबसे बड़ा पादरी है। यह कलीसिया का प्रमुख है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया में विश्वास करने वाले दावा करते हैं कि पवित्र आत्मा ने उसे इस काम के लिए चुना है। वे अक्सर पवित्र आत्मा द्वारा चुने गए इस व्यक्ति के उपदेशों को सुनते हैं, और वे कलीसिया के आधिकारिक कार्यों के लिए भी उसका कहा मानते हैं। हालांकि, तुम सभी सर्वशक्तिमान परमेश्वर के विश्वासी, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों को पढ़ते हो, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के नाम पर प्रार्थना करते हो, सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा बताये गए वचन देह में प्रकट होता है को एक प्रामाणिक मत के रूप में मानते हो, और सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों पर अपनी सभाओं में संवाद करते हो, किसी भी मामले में, यही एक व्यक्ति है जिसे सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया में अंतिम निर्णय लेने का अधिकार प्राप्त है। इसलिए हमें इस बात का विश्वास है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया इसी व्यक्ति ने बनाई गयी है। चीनी कम्युनिस्ट सरकार और धार्मिक समुदाय दोनों ही, सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया को मनुष्य द्वारा बनाये गए एक संगठन के रूप में देखते हैं। और मुझे लगता है यह सच है। क्या तुम्हें यह समझ आ रहा है?

अगला: प्रश्न 14: परमेश्वर में अपनी आस्था को लेकर सबके अपने विचार और राय हैं। मुझे ऐसा लगता है कि आपके विचार और सिद्धांत आपकी अपनी समझ के अनुसार हैं, और ये सब सिर्फ भ्रम हैं। हम साम्यवादियों को यकीन है भौतिकवाद और विकासवाद के सिद्धांत ही सत्य हैं क्योंकि वे, विज्ञान के मुताबिक़ हैं। हमारा देश, प्राथमिक शिक्षा से लेकर विश्वविद्यालय तक उपयुक्त शिक्षा देता है। ऐसा किसलिए? इसलिए कि सभी बच्चों में छोटी उम्र से ही, नास्तिकता और विकासवाद, की सोच घर कर जाए, ताकि वे धर्म और अंधविश्वास से, दूर रहें, ताकि वे हर सवाल का तर्कसंगत जवाब दे सकें। उदहारण के लिए, जीवन के उद्भव को ले लें। पहले के वक्त में, हम अनजान थे, और किस्से-कहानियों में, यकीन करते थे, जैसे कि स्वर्ग और पृथ्वी का अलग होना और नुवा द्वारा इंसान को बनाया जाना। पश्चिमी लोग विश्वास करते हैं कि परमेश्वर ने हम सबकी रचना की। दरअसल, ये सब मिथक और किस्से हैं, और विज्ञान के मुताबिक़ नहीं हैं। विकासवाद के, सिद्धांत के आने के बाद से जिसने मानवजाति के उद्भव के बारे में समझाया था, कि किस तरह, मनुष्य बंदरों से विकसित हुए, तब से, परमेश्वर द्वारा मनुष्य की रचना की कहानियाँ पूरी तरह निराधार साबित हो गयी हैं। हर चीज़ का विकास पूरी तरह से प्रकृति में हुआ है। यही सत्य है। इसलिए, हमें विज्ञान में विश्वास करना होगा और विकासवाद में। आप सभी लोग पढ़े-लिखे जानकार लोग हैं। आप परमेश्वर में कैसे विश्वास कर सकते हैं? क्या आप अपने विचार हमसे साझा कर सकेंगे?

क्या आप जानना चाहते हैं कि सच्चा प्रायश्चित करके परमेश्वर की सुरक्षा कैसे प्राप्त करनी है? इसका तरीका खोजने के लिए हमारे ऑनलाइन समूह में शामिल हों।
WhatsApp पर हमसे संपर्क करें
Messenger पर हमसे संपर्क करें

संबंधित सामग्री

3. धार्मिक दुनिया को लगता है कि परमेश्वर में विश्वास करना बाइबिल में विश्वास करना है, और बाइबिल से हटना परमेश्वर में विश्वास करना नहीं है; यह समझ गलत क्यों है

संदर्भ के लिए बाइबल के पद:"तुम पवित्रशास्त्र में ढूँढ़ते हो, क्योंकि समझते हो कि उसमें अनन्त जीवन तुम्हें मिलता है; और यह वही है जो मेरी...

4. देहधारी परमेश्वर और परमेश्वर द्वारा उपयोग में लाए जाने वाले लोगों के बीच मूलभूत अंतर

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:देहधारी परमेश्वर मसीह कहलाता है, तथा मसीह परमेश्वर के आत्मा के द्वारा धारण किया गया देह है। यह देह किसी भी मनुष्य...

43. किसी व्यक्ति के अंत का निर्णय परमेश्वर किस बात पर आधारित करता है?

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:अब वह समय है जब मैं प्रत्येक व्यक्ति का अंत करने का निश्चय करता हूँ, उस चरण का नहीं जिस पर मैंने मनुष्यों पर...

वचन देह में प्रकट होता है न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का संकलन मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ जीवन में प्रवेश पर उपदेश और वार्तालाप अंत के दिनों के मसीह—उद्धारकर्ता का प्रकटन और कार्य राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं (नये विश्वासियों के लिए अनिवार्य चीजें) परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर (संकलन) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवों की गवाहियाँ विजेताओं की गवाहियाँ (खंड I) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

सेटिंग्स

  • इबारत
  • कथ्य

ठोस रंग

कथ्य

फ़ॉन्ट

फ़ॉन्ट आकार

लाइन स्पेस

लाइन स्पेस

पृष्ठ की चौड़ाई

विषय-वस्तु

खोज

  • यह पाठ चुनें
  • यह किताब चुनें