552 बचाये जा सकते हो, अगर सत्य को न त्यागो तुम

अपनी परेशानियों को ठीक से न समझे इंसान,

तो प्रभावित होगा उसका ईश्वर-ज्ञान।

कुछ को एहसास होता अपनी दुर्बल योग्यता का,

या अपने गंभीर अपराधों का।

तब वे छोड़ देते उम्मीद, मान लेते हैं हार,

सत्य के लिये दुख उठाने को होते नहीं तैयार।

कोशिश नहीं करते बदलने की अपना स्वभाव,

सोचकर कि कभी वो नहीं बदले।


बदले तो हैं कुछ लोग मगर,

देख नहीं पाते वो ख़ुद इस बदलाव को।

वे बस देखते हैं अपनी परेशानियाँ,

परमेश्वर से सहयोग का संकल्प छोड़ देते वो।

इससे देरी होगी उनके सामान्य प्रवेश में,

बढ़ेगी उनकी भ्रांति परमेश्वर के बारे में।

बल्कि उनकी मंज़िल पर भी

पड़ता है इसका असर।


कमज़ोर होने पर भी,

सत्य-खोजी निभाते हैं फ़र्ज़ निष्ठा से,

सोचते नहीं अपनी नियति के बारे में।

देखती बदलाव मैं, अगर देखो तुम गौर से,

अपनी भ्रष्टता के एक हिस्से को बदला हुआ तुम पाओगे।

मगर मापने के लिये अपने विकास को,

जब प्रयोग करते हो उच्चतम पैमाने तुम,

न सिर्फ़ नाकाम होते हो,

पहुँचने में ऊँचाइयों तक,

ख़ुद में आये बदलाव को भी नकारते हो तुम—

यही है इंसान की भूल।

अगर तुम सही-गलत में अंतर कर सको,

तो जाँच सकते हो खुद के बदलाव को तुम।

न सिर्फ़ देखोगे अपने बदलाव को तुम,

बल्कि पा लोगे अभ्यास के मार्ग को भी तुम।

जान लोगे, अगर मेहनत करोगे,

बचाये जाने की उम्मीद है।

कहती हूँ तुमसे इसी वक्त मैं

देख सकें जो अपनी परेशानियाँ,

उम्मीद है उनके लिये,

आ जाएंगे बाहर वे अपनी मायूसियों से।

न त्यागो सत्य को,

समझो ख़ुद को सही ढंग से।


"मसीह की बातचीतों के अभिलेख" से रूपांतरित

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