परमेश्वर के कार्य को जानना 1

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 141

इन दिनों परमेश्वर के कार्य को जानना, अधिकांशतः यह जानना है कि अंत के दिनों के देहधारी परमेश्वर की मुख्य सेवकाई क्या है और पृथ्वी पर वह क्या करने के लिए आया है। मैंने पहले अपने वचनों में उल्लेख किया है कि परमेश्वर पृथ्वी पर (अंत के दिनों के दौरान) प्रस्थान से पहले हमारे सामने एक प्रतिमान स्थापित करने के लिए आया है। परमेश्वर यह प्रतिमान कैसे स्थापित करता है? ऐसा वह वचन बोलकर, और धरती पर सर्वत्र कार्य करके और बोलकर करता है। अंत के दिनों में यही परमेश्वर का कार्य है; वह पृथ्वी को वचनों का संसार बनाने के लिए केवल बोलता है, ताकि उसके वचन प्रत्येक व्यक्ति को पोषण दें और प्रबुद्ध करें, और ताकि मनुष्य की आत्मा जाग्रत हो और दर्शनों के बारे में स्पष्टता प्राप्त करे। अंत के दिनों के दौरान देहधारी परमेश्वर पृथ्वी पर मुख्य रूप से वचन बोलने के लिए ही आया है। जब यीशु आया, तो उसने स्वर्ग के राज्य का सुसमाचार फैलाया, और उसने सलीब पर चढ़कर छुटकारा दिलाने का कार्य संपन्न किया। उसने व्यवस्था के युग का अंत किया और उस सबको मिटा दिया, जो पुराना था। यीशु के आगमन से व्यवस्था के युग का अंत हो गया और अनुग्रह का युग आरंभ हुआ; अंत के दिनों के देहधारी परमेश्वर का आगमन अनुग्रह के युग का अंत करने आया है। वह मुख्य रूप से अपने वचन बोलने, मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए वचनों का उपयोग करने, मनुष्य को रोशन और प्रबुद्ध करने, और मनुष्य के हृदय के भीतर से अज्ञात परमेश्वर का स्थान हटाने के लिए आया है। यह कार्य का वह चरण नहीं है, जो यीशु ने तब किया था, जब वह आया था। जब यीशु आया, तब उसने कई चमत्कार किए, उसने बीमारों को चंगा किया और दुष्टात्माओं को बाहर निकाला, और सलीब पर चढ़कर छुटकारा दिलाने का कार्य किया। परिणामस्वरूप, लोग अपनी धारणाओं के अनुसार यह मानते हैं कि परमेश्वर को ऐसा ही होना चाहिए। क्योंकि जब यीशु आया, उसने मनुष्य के हृदय से अज्ञात परमेश्वर की छवि हटाने का कार्य नहीं किया; जब वह आया, उसे सलीब पर चढ़ा दिया गया, उसने बीमारों को चंगा किया और दुष्टात्माओं को बाहर निकाला, और उसने स्वर्ग के राज्य का सुसमाचार फैलाया। एक दृष्टि से, अंत के दिनों के दौरान परमेश्वर का देहधारण मनुष्य की धारणाओं में अज्ञात परमेश्वर द्वारा ग्रहण किए गए स्थान को हटाता है, ताकि मनुष्य के हृदय में अज्ञात परमेश्वर की छवि अब और न रहे। अपने वास्तविक कार्य और वास्तविक वचनों, समस्त देशों में अपने आवागमन, और मनुष्यों के बीच वह जो असाधारण रूप से वास्तविक और सामान्य कार्य करता है, उस सबके माध्यम से वह मनुष्य के लिए परमेश्वर की वास्तविकता जानने का निमित्त बनता है, और मनुष्य के हृदय से अज्ञात परमेश्वर का स्थान हटाता है। दूसरी दृष्टि से, परमेश्वर अपने देह द्वारा कहे गए वचनों का उपयोग मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए, और समस्त कामों को पूरा करने के लिए करता है। अंत के दिनों के दौरान परमेश्वर यही कार्य संपन्न करेगा।

तुम लोगों को क्या पता होना चाहिए :

1. परमेश्वर का कार्य अलौकिक नहीं है, और तुम्हें इसके बारे में धारणाएँ नहीं पालनी चाहिए।

2. तुम लोगों को वह मुख्य कार्य समझना चाहिए, जिसे देहधारी परमेश्वर इस बार करने के लिए आया है।

वह बीमारों को चंगा करने, या दुष्टात्माओं को बाहर निकालने, या चमत्कार दिखाने नहीं आया है, और वह पश्चात्ताप का सुसमाचार फैलाने, या मनुष्य को छुटकारा दिलाने के लिए नहीं आया है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि यीशु यह कार्य पहले ही कर चुका है, और परमेश्वर उसी कार्य को दोहराता नहीं। आज, परमेश्वर अनुग्रह के युग का अंत करने और अनुग्रह के युग की सभी प्रथाओं को बहिष्कृत करने आया है। व्यावहारिक परमेश्वर मुख्य रूप से यह दिखाने के लिए आया है कि वह वास्तविक है। जब यीशु आया, तो उसने कुछ वचन कहे; उसने मुख्य रूप से अचंभे दिखाए, चिह्न और चमत्कार प्रदर्शित किए, और बीमारों को चंगा किया तथा दुष्टात्माओं को बाहर निकाला, या फिर उसने लोगों को विश्वास दिलाने और उन्हें यह दिखाने के लिए कि वह वास्तव में परमेश्वर है, और यह कि वह निष्पक्ष परमेश्वर है, भविष्यवाणियाँ कीं। अंततः उसने सलीब पर चढ़ने का कार्य पूरा किया। आज का परमेश्वर चिह्न और चमत्कार प्रदर्शित नहीं करता, न ही वह बीमारों को चंगा करता और दुष्टात्माओं को बाहर निकालता है। जब यीशु आया, तो उसने जो कार्य किया, वह परमेश्वर के एक भाग का प्रतिनिधित्व करता था, परंतु इस बार परमेश्वर कार्य के उस चरण को करने आया है जो शेष है, क्योंकि परमेश्वर वही कार्य दोहराता नहीं है; वह ऐसा परमेश्वर है जो सदैव नया रहता है और कभी पुराना नहीं पड़ता, और इसलिए तुम आज जो भी देखते हो, वह व्यावहारिक परमेश्वर के वचन और कार्य हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आज परमेश्वर के कार्य को जानना' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 142

अंत के दिनों का देहधारी परमेश्वर मुख्य रूप से अपने वचनों को कहने, वह सब समझाने जो मनुष्य के जीवन के लिए आवश्यक है, वह बताने जिसमें मनुष्य को प्रवेश करना चाहिए, मनुष्य को परमेश्वर के कर्मों को दिखाने, और मनुष्य को परमेश्वर की बुद्धि, सर्वशक्तिमत्ता और चमत्कारिकता दिखाने के लिए आया है। परमेश्वर जिन कई तरीक़ों से बातचीत करता है, उनके माध्यम से मनुष्य परमेश्वर की सर्वोच्चता, परमेश्वर की महत्ता, और इतना ही नहीं, परमेश्वर की विनम्रता और अदृश्यता को निहारता है। मनुष्य देखता है कि परमेश्वर सर्वोच्च है, परंतु वह विनम्र और छिपा हुआ है, और सबसे छोटा हो सकता है। उसके कुछ वचन सीधे पवित्रात्मा के दृष्टिकोण से कहे गए हैं, कुछ सीधे मनुष्य के दृष्टिकोण से, और कुछ तीसरे व्यक्ति के दृष्टिकोण से। इसमें यह देखा जा सकता है कि परमेश्वर के कार्य करने का ढंग बहुत भिन्न-भिन्न है, और वह इसे वचनों के माध्यम से ही मनुष्य को देखने देता है। अंत के दिनों के दौरान परमेश्वर का कार्य सामान्य और वास्तविक दोनों है, और इस प्रकार अंत के दिनों में लोगों के समूह को समस्त परीक्षणों में से सबसे बड़े परीक्षण से गुज़ारा जाता है। परमेश्वर की सामान्यता और वास्तविकता के कारण, सभी लोग ऐसे परीक्षणों में प्रविष्ट हुए हैं; अगर मनुष्य परमेश्वर के परीक्षणों में उतरा है, तो उसका कारण परमेश्वर की सामान्यता और वास्तविकता ही है। यीशु के युग के दौरान कोई धारणाएँ या परीक्षण नहीं थे। चूँकि यीशु द्वारा किया गया अधिकांश कार्य मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप था, इसलिए लोगों ने उसका अनुसरण किया, और उसके बारे में उनकी कोई धारणाएँ नहीं थीं। आज के परीक्षण मनुष्य द्वारा अब तक झेले गए परीक्षणों में सबसे बड़े हैं, और जब यह कहा जाता है कि ये लोग दारुण दुःख से निकल आए हैं, तो उसका अर्थ यही दारुण दुःख है। आज परमेश्वर इन लोगों में विश्वास, प्रेम, पीड़ा की स्वीकृति और आज्ञाकारिता उत्पन्न करने के लिए बोलता है। अंत के दिनों के देहधारी परमेश्वर द्वारा कहे गए वचन मनुष्य की प्रकृति के सार, मनुष्य के व्यवहार, और आज जिसमें मनुष्य को प्रवेश करना चाहिए, उसके अनुरूप हैं। उसके वचन वास्तविक और सामान्य दोनों हैं : वह आने वाले कल की बात नहीं करता है, न ही वह पीछे मुड़कर बीते हुए कल को देखता है; वह केवल उसी की बात करता है जिसमें आज प्रवेश करना चाहिए, जिसे आज अभ्यास में लाना चाहिए और जिसे आज समझना चाहिए। यदि वर्तमान समय में ऐसा कोई व्यक्ति उभरे, जो चिह्न और चमत्कार प्रदर्शित करने, दुष्टात्माओं को निकालने, बीमारों को चंगा करने और कई चमत्कार दिखाने में समर्थ हो, और यदि वह व्यक्ति दावा करे कि वह यीशु है जो आ गया है, तो यह बुरी आत्माओं द्वारा उत्पन्न नकली व्यक्ति होगा, जो यीशु की नकल उतार रहा होगा। यह याद रखो! परमेश्वर वही कार्य नहीं दोहराता। कार्य का यीशु का चरण पहले ही पूरा हो चुका है, और परमेश्वर कार्य के उस चरण को पुनः कभी हाथ में नहीं लेगा। परमेश्वर का कार्य मनुष्य की धारणाओं के साथ मेल नहीं खाता; उदाहरण के लिए, पुराने नियम ने मसीहा के आगमन की भविष्यवाणी की, और इस भविष्यवाणी का परिणाम यीशु का आगमन था। चूँकि यह पहले ही घटित हो चुका है, इसलिए एक और मसीहा का पुनः आना ग़लत होगा। यीशु एक बार पहले ही आ चुका है, और यदि यीशु को इस समय फिर आना पड़ा, तो यह गलत होगा। प्रत्येक युग के लिए एक नाम है, और प्रत्येक नाम में उस युग का चरित्र-चित्रण होता है। मनुष्य की धारणाओं के अनुसार, परमेश्वर को सदैव चिह्न और चमत्कार दिखाने चाहिए, सदैव बीमारों को चंगा करना और दुष्टात्माओं को निकालना चाहिए, और सदैव ठीक यीशु के समान होना चाहिए। परंतु इस बार परमेश्वर इसके समान बिल्कुल नहीं है। यदि अंत के दिनों के दौरान, परमेश्वर अब भी चिह्नों और चमत्कारों को प्रदर्शित करे, और अब भी दुष्टात्माओं को निकाले और बीमारों को चंगा करे—यदि वह बिल्कुल यीशु की तरह करे—तो परमेश्वर वही कार्य दोहरा रहा होगा, और यीशु के कार्य का कोई महत्व या मूल्य नहीं रह जाएगा। इसलिए परमेश्वर प्रत्येक युग में कार्य का एक चरण पूरा करता है। ज्यों ही उसके कार्य का प्रत्येक चरण पूरा होता है, बुरी आत्माएँ शीघ्र ही उसकी नकल करने लगती हैं, और जब शैतान परमेश्वर के बिल्कुल पीछे-पीछे चलने लगता है, तब परमेश्वर तरीक़ा बदलकर भिन्न तरीक़ा अपना लेता है। ज्यों ही परमेश्वर ने अपने कार्य का एक चरण पूरा किया, बुरी आत्माएँ उसकी नकल कर लेती हैं। तुम लोगों को इस बारे में स्पष्ट होना चाहिए। आज परमेश्वर का कार्य यीशु के कार्य से भिन्न क्यों है? आज परमेश्वर चिह्नों और चमत्कारों का प्रदर्शन, पिशाचों का बहिष्करण और बीमारों को चंगा क्यों नहीं करता? यदि यीशु का कार्य व्यवस्था के युग के दौरान किए गए कार्य के समान ही होता, तो क्या वह अनुग्रह के युग के परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर पाता? क्या वह सलीब पर चढ़ने का कार्य पूरा कर पाता? यदि व्यवस्था के युग की तरह यीशु मंदिर में गया होता और उसने सब्त को माना होता, तो उसे कोई नहीं सताता और सब उसे गले लगाते। यदि ऐसा होता, तो क्या उसे सलीब पर चढ़ाया जा सकता था? क्या वह छुटकारे का कार्य पूरा कर सकता था? यदि अंत के दिनों का देहधारी परमेश्वर यीशु के समान चिह्न और चमत्कार दिखाता, तो इसमें भला कौन-सी खास बात होती? यदि परमेश्वर अंत के दिनों के दौरान अपने कार्य का दूसरा भाग करता है, जो उसकी प्रबंधन योजना के भाग का प्रतिनिधित्व करता है, तो केवल तभी मनुष्य परमेश्वर का अधिक गहरा ज्ञान प्राप्त कर सकता है, और केवल तभी परमेश्वर की प्रबंधन योजना पूर्ण हो सकती है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आज परमेश्वर के कार्य को जानना' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 143

अंत के दिनों के दौरान, परमेश्वर मुख्य रूप से अपने वचन बोलने के लिए आया है। वह पवित्रात्मा के दृष्टिकोण से, मनुष्य के दृष्टिकोण से, और तीसरे व्यक्ति के दृष्टिकोण से बोलता है; वह एक समयावधि के लिए एक तरीक़े का प्रयोग करते हुए, भिन्न-भिन्न तरीकों से बोलता है, और वह बोलने की पद्धति का उपयोग मनुष्य की धारणाओं को बदलने और मनुष्य के हृदय से अज्ञात परमेश्वर की छवि हटाने के लिए करता है। यही परमेश्वर द्वारा किया जाने वाला मुख्य कार्य है। चूँकि मनुष्य मानता है कि परमेश्वर बीमारों को चंगा करने, दुष्टात्माओं को निकालने, चमत्कार दिखाने और मनुष्य पर भौतिक आशीष न्योछावर करने के लिए आया है, इसलिए परमेश्वर कार्य का—ताड़ना और न्याय के कार्य का—यह चरण पूरा करता है, ताकि मनुष्य की धारणाओं में से ऐसी बातों को निकाल सके, ताकि मनुष्य परमेश्वर की वास्तविकता और सामान्यता को जान सके, और ताकि उसके हृदय से यीशु की छवि हटाकर उसके स्थान पर परमेश्वर की एक नई छवि स्थापित कर सके। मनुष्यों के हृदयों में परमेश्वर की छवि ज्यों ही पुरानी पड़ती है, त्यों ही वह मूर्ति बन जाती है। जब यीशु आया और उसने कार्य का वह चरण पूरा किया, तब वह परमेश्वर की संपूर्णता का प्रतिनिधित्व नहीं करता था। उसने कुछ चिह्न और चमत्कार प्रदर्शित किए, कुछ वचन बोले, और अंततः सलीब पर चढ़ा दिया गया। उसने परमेश्वर के एक भाग का प्रतिनिधित्व किया। वह परमेश्वर के समग्र रूप का प्रतिनिधित्व नहीं कर सका, बल्कि उसने परमेश्वर के कार्य के एक भाग को करने में परमेश्वर का प्रतिनिधित्व किया। ऐसा इसलिए है, क्योंकि परमेश्वर बहुत महान, बहुत अद्भुत और अथाह है, और वह प्रत्येक युग में अपने कार्य का बस एक भाग ही करता है। इस युग के दौरान परमेश्वर द्वारा किया जाने वाला कार्य मुख्य रूप से मनुष्य के जीवन के लिए वचनों का पोषण देना; मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव और उसकी प्रकृति के सार को उजागर करना; और धर्म संबंधी धारणाओं, सामंती सोच, पुरानी पड़ चुकी सोच, और मनुष्य के ज्ञान और संस्कृति को समाप्त करना है। इन सभी चीजों को परमेश्वर के वचनों द्वारा उजागर करने के माध्यम से शुद्ध किया जाना है। अंत के दिनों में, मनुष्य को पूर्ण करने के लिए परमेश्वर चिह्नों और चमत्कारों का नहीं, वचनों का उपयोग करता है। वह मनुष्य को उजागर करने, उसका न्याय करने, उसे ताड़ना देने और उसे पूर्ण बनाने के लिए वचनों का उपयोग करता है, ताकि परमेश्वर के वचनों में मनुष्य परमेश्वर की बुद्धि और मनोरमता देखने लगे, और परमेश्वर के स्वभाव को समझने लगे, और ताकि परमेश्वर के वचनों के माध्यम से मनुष्य परमेश्वर के कर्मों को निहारे। व्यवस्था के युग के दौरान यहोवा अपने वचनों से मूसा को मिस्र से बाहर ले गया, और उसने इस्राएलियों को कुछ वचन बोले; उस समय, परमेश्वर के कर्मों का अंश प्रकट कर दिया गया था, परंतु चूँकि मनुष्य की क्षमता सीमित थी और कोई भी चीज उसके ज्ञान को पूर्ण नहीं बना सकती थी, इसलिए परमेश्वर बोलता और कार्य करता रहा। अनुग्रह के युग में मनुष्य ने एक बार फिर परमेश्वर के कर्मों का अंश देखा। यीशु चिह्न और चमत्कार दिखा पाया, बीमारों को चंगा कर पाया और दुष्टात्माओं को निकाल पाया, और सलीब पर चढ़ पाया, जिसके तीन दिन बाद वह पुनर्जीवित हुआ और देह में मनुष्य के सामने प्रकट हुआ। परमेश्वर के बारे में मनुष्य इससे अधिक कुछ नहीं जानता। मनुष्य उतना ही जानता है, जितना परमेश्वर उसे दिखाता है, और यदि परमेश्वर मनुष्य को और अधिक न दिखाए, तो यह परमेश्वर के बारे में मनुष्य के परिसीमन की सीमा होगी। इसलिए परमेश्वर कार्य करता रहता है, ताकि उसके बारे में मनुष्य का ज्ञान अधिक गहरा हो सके और वह धीरे-धीरे परमेश्वर के सार को जान जाए। अंत के दिनों में, परमेश्वर मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए अपने वचनों का उपयोग करता है। परमेश्वर के वचनों द्वारा तुम्हारा भ्रष्ट स्वभाव प्रकट किया जाता है, और तुम्हारी धर्म संबंधी धारणाओं को परमेश्वर की वास्तविकता से बदल दिया जाता है। अंत के दिनों का देहधारी परमेश्वर मुख्य रूप से अपने इन वचनों को पूरा करने आया है, "वचन देह बन जाता है, वचन देह में आता है, और वचन देह में प्रकट होता है", और यदि तुम्हें इसका पूरा ज्ञान नहीं है, तो तुम दृढ़ता से खड़े नहीं रह पाओगे। अंत के दिनों के दौरान परमेश्वर की मंशा मुख्य रूप से कार्य के उस चरण को पूरा करने की है, जिसमें वचन देह में प्रकट होता है, और यह परमेश्वर की प्रबंधन योजना का एक भाग है। इसलिए तुम लोगों का ज्ञान स्पष्ट होना चाहिए; परमेश्वर चाहे जैसे कार्य करे, किंतु वह मनुष्य को अपनी सीमा निर्धारित नहीं करने देता। यदि परमेश्वर अंत के दिनों के दौरान यह कार्य न करता, तो उसके बारे में मनुष्य का ज्ञान इससे आगे न जा पाता। तुम्हें बस इतना पता होगा कि परमेश्वर को सलीब पर चढ़ाया जा सकता है और वह सदोम को नष्ट कर सकता है, और यीशु मरकर भी उठ सकता और पतरस के सामने प्रकट हो सकता है...। परंतु तुम यह कभी नहीं कहोगे कि परमेश्वर के वचन सब-कुछ संपन्न कर सकते हैं और मनुष्य को जीत सकते हैं। केवल परमेश्वर के वचनों का अनुभव करके ही तुम ऐसी ज्ञान की बातें बोल सकते हो, और जितना अधिक तुम परमेश्वर के कार्य का अनुभव करोगे, उसके बारे में तुम्हारा ज्ञान उतना ही अधिक विस्तृत हो जाएगा। केवल तभी तुम परमेश्वर को अपनी धारणाओं की सीमाओं में बाँधना बंद करोगे। मनुष्य परमेश्वर के कार्य का अनुभव करके ही उसे जानता है; परमेश्वर को जानने का कोई और सही मार्ग नहीं है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आज परमेश्वर के कार्य को जानना' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 144

आज, तुम सभी लोगों को यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि अंत के दिनों में परमेश्वर द्वारा मुख्य रूप से "वचन देहधारी होता है" का तथ्य साकार किया जाता है। पृथ्वी पर अपने वास्तविक कार्य के माध्यम से वह इस बात का निमित्त बनता है कि मनुष्य उसे जाने, उसके साथ जुड़े और उसके वास्तविक कर्मों को देखे। वह मनुष्य के लिए यह स्पष्ट रूप से देखने का निमित्त बनता है कि वह चिह्न और चमत्कार दिखाने में सक्षम है और ऐसा समय भी आता है, जब वह ऐसा करने में अक्षम होता है; यह युग पर निर्भर करता है। इससे तुम देख सकते हो कि परमेश्वर चिह्न और चमत्कार दिखाने में अक्षम नहीं है, बल्कि इसके बजाय वह अपने कार्य का ढंग, किए जाने वाले कार्य और युग के अनुसार बदल देता है। कार्य के वर्तमान चरण में वह चिह्न और चमत्कार नहीं दिखाता; यीशु के युग में उसने कुछ चिह्न और चमत्कार दिखाए थे, तो वह इसलिए, क्योंकि उस युग में उसका कार्य भिन्न था। परमेश्वर आज वह कार्य नहीं करता, और कुछ लोग मानते हैं कि वह चिह्न और चमत्कार दिखाने में अक्षम है, या फिर वे सोचते हैं कि यदि वह चिह्न और चमत्कार नहीं दिखाता, तो वह परमेश्वर नहीं है। क्या यह एक भ्रांति नहीं है? परमेश्वर चिह्न और चमत्कार दिखाने में सक्षम है, परंतु वह एक भिन्न युग में कार्य कर रहा है, और इसलिए वह ऐसे कार्य नहीं करता। चूँकि यह एक भिन्न युग है, और चूँकि यह परमेश्वर के कार्य का एक भिन्न चरण है, इसलिए परमेश्वर द्वारा प्रकट किए जाने वाले कर्म भी भिन्न हैं। परमेश्वर में मनुष्य का विश्वास चिह्नों और चमत्कारों में विश्वास करना नहीं है, न ही अजूबों पर विश्वास करना है, बल्कि नए युग के दौरान उसके वास्तविक कार्य में विश्वास करना है। मनुष्य परमेश्वर को उसके कार्य करने के ढंग के माध्यम से जानता है, और यही ज्ञान मनुष्य के भीतर परमेश्वर में विश्वास, अर्थात परमेश्वर के कार्य और कर्मों में विश्वास, उत्पन्न करता है। कार्य के इस चरण में परमेश्वर मुख्य रूप से बोलता है। चिह्न और चमत्कार देखने की प्रतीक्षा मत करो, तुम कोई चिह्न और चमत्कार नहीं देखोगे! ऐसा इसलिए है, क्योंकि तुम अनुग्रह के युग में पैदा नहीं हुए थे। यदि हुए होते, तो तुम चिह्न और चमत्कार देख पाते, परंतु तुम अंत के दिनों के दौरान पैदा हुए हो, और इसलिए तुम केवल परमेश्वर की वास्तविकता और सामान्यता देख सकते हो। अंत के दिनों के दौरान अलौकिक यीशु को देखने की अपेक्षा मत करो। तुम केवल व्यावहारिक देहधारी परमेश्वर को ही देखने में सक्षम हो, जो किसी भी सामान्य मनुष्य से भिन्न नहीं है। प्रत्येक युग में परमेश्वर विभिन्न कर्म प्रकट करता है। प्रत्येक युग में वह परमेश्वर के कर्मों का अंश प्रकट करता है, और प्रत्येक युग का कार्य परमेश्वर के स्वभाव के एक भाग का और परमेश्वर के कर्मों के एक भाग का प्रतिनिधित्व करता है। वह जो कर्म प्रकट करता है, वे हर उस युग के साथ बदलते जाते हैं जिसमें वह कार्य करता है, परंतु वे सब मनुष्य को परमेश्वर का अधिक गहरा ज्ञान, परमेश्वर में अधिक सच्चा और अधिक यथार्थपरक विश्वास प्रदान करते हैं। मनुष्य परमेश्वर में उसके समस्त कर्मों के कारण विश्वास करता है, क्योंकि वह इतना चमत्कारी, इतना महान है, क्योंकि वह सर्वशक्तिमान और अथाह है। यदि तुम परमेश्वर में इसलिए विश्वास करते हो, क्योंकि वह चिह्न और चमत्कार प्रदर्शित करने में सक्षम है और बीमारों को चंगा कर सकता और पिशाचों को बाहर निकाल सकता है, तो तुम्हारा विचार ग़लत है, और कुछ लोग तुमसे कहेंगे, "क्या दुष्टात्माएँ भी इस तरह की चीजें करने में सक्षम नहीं हैं?" क्या यह परमेश्वर की छवि को शैतान की छवि के साथ गड्डमड्ड नहीं कर देता? आज, परमेश्वर में मनुष्य का विश्वास परमेश्वर के कई कर्मों और उसके द्वारा किए जा रहे कार्य की विशाल मात्रा और उसके बोलने के अनेक तरीक़ों के कारण है। परमेश्वर अपने कथनों का उपयोग मनुष्य को जीतने और उसे पूर्ण बनाने के लिए करता है। मनुष्य परमेश्वर में उसके कई कर्मों के कारण विश्वास करता है, इसलिए नहीं कि वह चिह्न और चमत्कार दिखाने में सक्षम है; लोग परमेश्वर को केवल उसके कर्मों को देखकर ही जानते हैं। परमेश्वर के वास्तविक कर्मों को जानकर ही—वह कैसे कार्य करता है, कौन-सी बुद्धिमत्तापूर्ण पद्धतियों का उपयोग करता है, कैसे बोलता है और मनुष्य को कैसे पूर्ण बनाता है—केवल इन पहलुओं को जानकर ही तुम परमेश्वर की वास्तविकता को बूझ सकते हो और उसके स्वभाव को समझ सकते हो, यह जानकर कि वह क्या पसंद करता है, किससे घृणा करता है और मनुष्य के ऊपर कैसे कार्य करता है। परमेश्वर की पसंद और नापसंद समझकर तुम सकारात्मक और नकारात्मक के बीच भेद कर सकते हो, और परमेश्वर के बारे में तुम्हारे ज्ञान के माध्यम से तुम्हारे जीवन में प्रगति होती है। संक्षेप में, तुम्हें परमेश्वर के कार्य का ज्ञान प्राप्त करना ही चाहिए, और तुम्हें परमेश्वर में विश्वास करने के बारे में अपने विचारों को दुरुस्त अवश्य कर लेना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आज परमेश्वर के कार्य को जानना' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 145

तुम कैसे भी खोज करो, तुम्हें सर्वोपरि, परमेश्वर द्वारा आज किए जाने वाले कार्य और उसके महत्व को समझना चाहिए। तुम्हें यह अवश्य समझना और जानना चाहिए कि जब परमेश्वर अंत के दिनों में आता है तो वह कौन-सा कार्य लाता है, कैसा स्वभाव लेकर आता है, और मनुष्य में क्या चीज़ पूर्ण की जाएगी। यदि तुम उस कार्य को नहीं जानते या समझते, जिसे करने के लिए वह देह धारण करके आया है, तो तुम उसकी इच्छा कैसे समझ सकते हो, और तुम उसके अंतरंग कैसे बन सकते हो? वास्तव में, परमेश्वर का अंतरंग होना जटिल नहीं है, किंतु यह सरल भी नहीं है। यदि लोग इसे पूरी तरह से समझ सकें और इसे अमल में ला सकें, तो यह सरल बन जाता है; यदि लोग इसे पूरी तरह से न समझ सकें, तो यह बहुत कठिन बन जाता है, और, इतना ही नहीं, वे अपनी खोज द्वारा खुद को अस्पष्टता में ले जाए जाने के लिए प्रवण हो जाते हैं। यदि परमेश्वर की खोज में लोगों की साथ खड़े होने की अपनी स्थिति नहीं है, और वे नहीं जानते कि उन्हें किस सत्य को धारण करना चाहिए, तो इसका अर्थ है कि उनका कोई आधार नहीं है, और इसलिए उनके लिए अडिग रहना आसान नहीं है। आज, ऐसे बहुत लोग हैं जो सत्य को नहीं समझते, जो भले और बुरे के बीच अंतर नहीं कर सकते या यह नहीं बता सकते कि किससे प्रेम या घृणा करें। ऐसे लोग मुश्किल से ही अडिग रह पाते हैं। परमेश्वर में विश्वास की कुंजी सत्य को अभ्यास में लाने, परमेश्वर की इच्छा का ध्यान रखने, और जब परमेश्वर देह में आता है, तब मनुष्य पर उसके कार्य और उन सिद्धांतों को, जिनसे वह बोलता है, जानने में सक्षम होना है। भीड़ का अनुसरण मत करो। तुम्हारे पास इसके सिद्धांत होने चाहिए कि तुम्हें किसमें प्रवेश करना चाहिए, और तुम्हें उन पर अडिग रहना चाहिए। अपने भीतर परमेश्वर की प्रबुद्धता द्वारा लाई गई चीजों पर अडिग रहना तुम्हारे लिए सहायक होगा। यदि तुम ऐसा नहीं करते, तो आज तुम एक दिशा में जाओगे तो कल दूसरी दिशा में, और कभी भी कोई वास्तविक चीज़ प्राप्त नहीं करोगे। ऐसा होना तुम्हारे जीवन के लिए ज़रा भी लाभदायक नहीं है। जो सत्य को नहीं समझते, वे हमेशा दूसरों का अनुसरण करते हैं : यदि लोग कहते हैं कि यह पवित्र आत्मा का कार्य है, तो तुम भी कहते हो कि यह पवित्र आत्मा का कार्य है; यदि लोग कहते हैं कि यह दुष्टात्मा का कार्य है, तो तुम्हें भी संदेह हो जाता है, या तुम भी कहते हो कि यह किसी दुष्टात्मा का कार्य है। तुम हमेशा दूसरों के शब्दों को तोते की तरह दोहराते हो, और स्वयं किसी भी चीज़ का अंतर करने में असमर्थ होते हो, न ही तुम स्वयं सोचने में सक्षम होते हो। ऐसे व्यक्ति का कोई दृष्टिकोण नहीं होता, वह अंतर करने में असमर्थ होता है—ऐसा व्यक्ति बेकार अभागा होता है! तुम हमेशा दूसरों के वचनों को दोहराते हो : आज ऐसा कहा जाता है कि यह पवित्र आत्मा का कार्य है, परंतु संभव है, कल कोई कहे कि यह पवित्र आत्मा का कार्य नहीं है, और कि यह असल में यह मनुष्य के कर्मों के अतिरिक्त कुछ नहीं है—फिर भी तुम इसे समझ नहीं पाते, और जब तुम इसे दूसरों के द्वारा कहा गया देखते हो, तो तुम भी वही बात कहते हो। यह वास्तव में पवित्र आत्मा का कार्य है, परंतु तुम कहते हो कि यह मनुष्य का कार्य है; क्या तुम पवित्र आत्मा के कार्य की ईशनिंदा करने वालों में से एक नहीं बन गए हो? इसमें, क्या तुमने परमेश्वर का इसलिए विरोध नहीं किया है, क्योंकि तुम अंतर नहीं कर सकते? शायद किसी दिन कोई मूर्ख प्रकट होकर कहे कि "यह किसी दुष्टात्मा का कार्य है," और इन शब्दों को सुनकर तुम हैरान रह जाओ, और एक बार फिर तुम दूसरों के शब्दों में बँध जाओगे। हर बार जब कोई गड़बड़ी करता है, तो तुम अपने दृष्टिकोण पर अडिग रहने में असमर्थ हो जाते हो, और यह सब इसलिए होता है क्योंकि तुम्हारे पास सत्य नहीं है। परमेश्वर पर विश्वास करना और परमेश्वर को जानना आसान बात नहीं है। ये चीज़ें एक-साथ इकट्ठे होने और उपदेश सुनने भर से हासिल नहीं की जा सकतीं, और तुम केवल ज़ुनून के द्वारा पूर्ण नहीं किए जा सकते। तुम्हें अपने कार्यों को अनुभव करना और जानना चाहिए, और उनमें सैद्धांतिक होना चाहिए, और पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त करना चाहिए। जब तुम अनुभवों से गुज़र जाओगे, तो तुम कई चीजों में अंतर करने में सक्षम हो जाओगे—तुम भले और बुरे के बीच, धार्मिकता और दुष्टता के बीच, देह और रक्त से संबंधित चीज़ों और सत्य से संबंधित चीज़ों के बीच अंतर करने में सक्षम हो जाओगे। तुम्हें इन सभी चीजों के बीच अंतर करने में सक्षम होना चाहिए, और ऐसा करने में, चाहे कैसी भी परिस्थितियाँ हों, तुम कभी भी नहीं खोओगे। केवल यही तुम्हारा वास्तविक आध्यात्मिक कद है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो परमेश्वर को और उसके कार्य को जानते हैं, केवल वे ही परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हैं' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 146

परमेश्वर के कार्य को जानना कोई आसान बात नहीं है। अपनी खोज में तुम्हारे पास मानक और एक उद्देश्य होना चाहिए, तुम्हें ज्ञात होना चाहिए कि सच्चे मार्ग को कैसे खोजें, यह कैसे मापें कि यह सच्चा मार्ग है या नहीं, और यह परमेश्वर का कार्य है या नहीं। सच्चे मार्ग की खोज करने में सबसे बुनियादी सिद्धांत क्या है? तुम्हें देखना होगा कि इस मार्ग में पवित्र आत्मा का कार्य है या नहीं, ये वचन सत्य की अभिव्यक्ति हैं या नहीं, किसके लिए गवाही देनी है, और यह तुम्हारे लिए क्या ला सकता है। सच्चे मार्ग और झूठे मार्ग के बीच अंतर करने के लिए बुनियादी ज्ञान के कई पहलू आवश्यक हैं, जिनमें सबसे मूलभूत है यह बताना कि इसमें पवित्र आत्मा का कार्य मौजूद है या नहीं। क्योंकि परमेश्वर पर लोगों के विश्वास का सार परमेश्वर के आत्मा पर विश्वास है, और यहाँ तक कि देहधारी परमेश्वर पर उनका विश्वास इसलिए है, क्योंकि यह देह परमेश्वर के आत्मा का मूर्त रूप है, जिसका अर्थ यह है कि ऐसा विश्वास अभी भी पवित्र आत्मा पर विश्वास है। आत्मा और देह के मध्य अंतर हैं, परंतु चूँकि यह देह पवित्रात्मा से आता है और वचन देह बनता है, इसलिए मनुष्य जिसमें विश्वास करता है, वह अभी भी परमेश्वर का अंतर्निहित सार है। अत:, यह पहचानने के लिए कि यह सच्चा मार्ग है या नहीं, सर्वोपरि तुम्हें यह देखना चाहिए कि इसमें पवित्र आत्मा का कार्य है या नहीं, जिसके बाद तुम्हें यह देखना चाहिए कि इस मार्ग में सत्य है या नहीं। सत्य सामान्य मानवता का जीवन-स्वभाव है, अर्थात्, वह जो मनुष्य से तब अपेक्षित था, जब परमेश्वर ने आरंभ में उसका सृजन किया था, यानी, अपनी समग्रता में सामान्य मानवता (मानवीय भावना, अंतर्दृष्टि, बुद्धि और मनुष्य होने के बुनियादी ज्ञान सहित) है। अर्थात्, तुम्हें यह देखने की आवश्यकता है कि यह मार्ग लोगों को एक सामान्य मानवता के जीवन में ले जा सकता है या नहीं, बोला गया सत्य सामान्य मानवता की आवश्यकता के अनुसार अपेक्षित है या नहीं, यह सत्य व्यावहारिक और वास्तविक है या नहीं, और यह सबसे सामयिक है या नहीं। यदि इसमें सत्य है, तो यह लोगों को सामान्य और वास्तविक अनुभवों में ले जाने में सक्षम है; इसके अलावा, लोग हमेशा से अधिक सामान्य बन जाते हैं, उनका मानवीय बोध हमेशा से अधिक पूरा बन जाता है, उनका दैहिक और आध्यात्मिक जीवन हमेशा से अधिक व्यवस्थित हो जाता है, और उनकी भावनाएँ हमेशा से और अधिक सामान्य हो जाती हैं। यह दूसरा सिद्धांत है। एक अन्य सिद्धांत है, जो यह है कि लोगों के पास परमेश्वर का बढ़ता हुआ ज्ञान है या नहीं, और इस प्रकार के कार्य और सत्य का अनुभव करना उनमें परमेश्वर के लिए प्रेम को प्रेरित कर सकता है या नहीं और उन्हें परमेश्वर के हमेशा से अधिक निकट ला सकता है या नहीं। इसमें यह मापा जा सकता है कि यह सही मार्ग है अथवा नहीं। सबसे बुनियादी बात यह है कि क्या यह मार्ग अलौकिक के बजाय यर्थाथवादी है, और यह मनुष्य के जीवन के लिए पोषण प्रदान करने में सक्षम है या नहीं। यदि यह इन सिद्धांतों के अनुरूप है, तो निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि यह मार्ग सच्चा मार्ग है। मैं ये वचन तुम लोगों से तुम्हारे भविष्य के अनुभवों में अन्य मार्गों को स्वीकार करवाने के लिए नहीं कह रहा हूँ, न ही किसी भविष्यवाणी के रूप में कह रहा हूँ कि भविष्य में एक अन्य नए युग का कार्य होगा। मैं इन्हें इसलिए कह रहा हूँ, ताकि तुम लोग निश्चित हो जाओ कि आज का मार्ग ही सच्चा मार्ग है, ताकि आज के कार्य के प्रति अपने विश्वास में तुम लोग केवल आधे-अधूरे ही निश्चित न रहो और इसमें अंतर्दृष्टि प्राप्त करने में असमर्थ न रहो। यहाँ ऐसे कई लोग हैं, जो निश्चित होने के बावजूद अभी भी भ्रम में अनुगमन करते हैं; ऐसी निश्चितता का कोई सिद्धांत नहीं होता, और ऐसे लोगों को देर-सबेर हटा दिया जाना चाहिए। यहाँ तक कि वे भी, जो अपने अनुसरण में विशेष रूप से उत्साही हैं, तीन भाग ही निश्चित हैं और पाँच भाग अनिश्चित हैं, जो दर्शाता है कि उनका कोई आधार नहीं है। चूँकि तुम लोगों की क्षमता बहुत कमज़ोर है और तुम्हारी नींव बहुत सतही है, इसलिए तुम लोगों को अंतर करने की समझ नहीं है। परमेश्वर अपने कार्य को दोहराता नहीं है, वह ऐसा कार्य नहीं करता जो वास्तविक न हो, वह मनुष्य से अत्यधिक अपेक्षाएँ नहीं रखता, और वह ऐसा कार्य नहीं करता जो मनुष्यों की समझ से परे हो। वह जो भी कार्य करता है, वह सब मनुष्य की सामान्य समझ के दायरे के भीतर होता है, और सामान्य मानवता की समझ से परे नहीं होता, और उसका कार्य मनुष्य की सामान्य अपेक्षाओं के अनुसार किया जाता है। यदि यह पवित्र आत्मा का कार्य होता है, तो लोग हमेशा से अधिक सामान्य बन जाते हैं, और उनकी मानवता हमेशा से अधिक सामान्य बन जाती है। लोग अपने शैतानी स्वभाव का, और मनुष्य के सार का बढ़ता हुआ ज्ञान प्राप्त करते हैं, और वे सत्य के लिए हमेशा से अधिक ललक भी प्राप्त करते हैं। अर्थात्, मनुष्य का जीवन अधिकाधिक बढ़ता जाता है और मनुष्य का भ्रष्ट स्वभाव बदलाव में अधिकाधिक सक्षम हो जाता है—जिस सबका अर्थ है परमेश्वर का मनुष्य का जीवन बनना। यदि कोई मार्ग उन चीजों को प्रकट करने में असमर्थ है जो मनुष्य का सार हैं, मनुष्य के स्वभाव को बदलने में असमर्थ है, और, इसके अलावा, लोगों को परमेश्वर के सामने लाने में असमर्थ है या उन्हें परमेश्वर की सच्ची समझ प्रदान करने में असमर्थ है, और यहाँ तक कि उसकी मानवता के हमेशा से अधिक निम्न होने और उसकी भावना के हमेशा से अधिक असामान्य होने का कारण बनता है, तो यह मार्ग सच्चा मार्ग नहीं होना चाहिए, और यह दुष्टात्मा का कार्य या पुराना मार्ग हो सकता है। संक्षेप में, यह पवित्र आत्मा का वर्तमान कार्य नहीं हो सकता। तुम लोगों ने इन सभी वर्षों में परमेश्वर पर विश्वास किया है, फिर भी तुम्हें सच्चे और झूठे मार्ग के मध्य अंतर करने या सच्चे मार्ग की तलाश करने के सिद्धांतों का कोई आभास नहीं है। अधिकतर लोग इन मामलों में दिलचस्पी तक नहीं रखते; वे सिर्फ़ वहाँ चल पड़ते हैं जहाँ बहुसंख्यक जाते हैं, और वह दोहरा देते हैं जो बहुसंख्यक कहते हैं। ऐसा व्यक्ति सत्य की खोज करने वाला कैसे हो सकता है? और ऐसे लोग सच्चा मार्ग कैसे पा सकते हैं? यदि तुम इन अनेक मुख्य सिद्धांतों को समझ लो, तो चाहे कुछ भी हो जाए, तुम धोखा नहीं खाओगे। आज यह महत्वपूर्ण है कि लोग अंतर करने में सक्षम हो जाएँ; यही वह चीज़ है जो सामान्य मानवता के पास होनी चाहिए, और यही वह चीज़ है जो लोगों के अनुभव में आनी चाहिए। यदि आज भी लोग अपने अनुगमन में कुछ भी अंतर नहीं करते, और उनका मानवता-बोध अभी भी नहीं बढ़ा है, तो लोग बहुत मूर्ख हैं, और उनकी खोज ग़लत और भटकी हुई है। आज तुम्हारी खोज में थोड़ा-सा भी विभेदन नहीं है, और जबकि यह सत्य है, जैसा कि तुम कहते हो, कि तुमने सच्चा मार्ग तलाश कर लिया है, क्या तुमने उसे प्राप्त कर लिया है? क्या तुम कुछ भी अंतर करने में समर्थ रहे हो? सच्चे मार्ग का सार क्या है? सच्चे मार्ग में, तुमने सच्चा मार्ग प्राप्त नहीं किया है; तुमने कुछ भी सत्य प्राप्त नहीं किया है। अर्थात्, तुमने वह प्राप्त नहीं किया है, जिसकी परमेश्वर तुमसे अपेक्षा करता है, और इसलिए तुम्हारी भ्रष्टता में कोई परिवर्तन नहीं आया है। यदि तुम इसी तरह खोज करते रहे, तो तुम अंततः हटा दिए जाओगे। आज के दिन तक अनुसरण करके, तुम्हें निश्चित हो जाना चाहिए कि जिस मार्ग को तुमने अपनाया है वह सच्चा मार्ग है, और तुम्हें कोई और संदेह नहीं होने चाहिए। कई लोग हमेशा अनिश्चित रहते हैं और छोटी-छोटी बातों के कारण सत्य की खोज करना बंद कर देते हैं। ये ऐसे लोग हैं, जिन्हें परमेश्वर के कार्य का कोई ज्ञान नहीं है; ये वे लोग हैं, जो भ्रम में परमेश्वर का अनुसरण करते हैं। जो लोग परमेश्वर के कार्य को नहीं जानते, वे उसके अंतरंग होने या उसकी गवाही देने में असमर्थ हैं। जो लोग केवल आशीषों की तलाश करते हैं और केवल उसकी खोज करते हैं जो कि अज्ञात और अमूर्त है, मैं उन्हें यथाशीघ्र सत्य की खोज करने की सलाह देता हूँ, ताकि उनके जीवन का कोई अर्थ हो सके। अपने आपको अब और मूर्ख मत बनाओ!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो परमेश्वर को और उसके कार्य को जानते हैं, केवल वे ही परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हैं' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 147

भिन्न-भिन्न युगों के आने-जाने के साथ छह हज़ार वर्षों के दौरान किए गए कार्य की समग्रता धीरे-धीरे बदलती गई है। इस कार्य में आए बदलाव समस्त संसार की परिस्थितियों और एक इकाई के तौर पर मानवजाति की विकासात्मक प्रवृत्ति पर आधारित रहे हैं। परमेश्वर का प्रबंधन का कार्य इसके अनुसार केवल धीरे-धीरे बदला है। सृष्टि के आरंभ से इस सबकी योजना नहीं बनाई गई थी। संसार का सृजन होने से पहले, या इस सृजन के ठीक बाद तक, यहोवा ने कार्य के प्रथम चरण, व्यवस्था का कार्य; कार्य के दूसरे चरण, अनुग्रह का कार्य; और कार्य के तीसरे चरण, विजय का कार्य की योजना नहीं बनाई थी। विजय के कार्य के दौरान वह पहले मोआब के कुछ वंशजों से शुरुआत करेगा और इसके माध्यम से समस्त ब्रह्मांड को जीतेगा। संसार का सृजन करने के बाद, उसने कभी ये वचन नहीं कहे; न ही उसने ये मोआब के बाद कहे, दरअसल लूत से पहले उसने इन्हें कभी नहीं कहा। परमेश्वर का समस्त कार्य अनायास तरीके से ही किया जाता है। उसका छह-हजार-वर्षों का प्रबंधन कार्य इसी तरह से विकसित हुआ है; किसी भी हाल में, संसार का सृजन करने से पहले उसने "मानवजाति के विकास के लिए सारांश चार्ट" के रूप में कोई योजना नहीं रची थी। परमेश्वर अपने कार्य में, प्रत्यक्ष रूप से व्यक्त करता है कि वह क्या है; वह किसी योजना को बनाने पर मगजपच्ची नहीं करता है। निस्संदेह, बहुत से नबियों ने बहुत सी भविष्यवाणियाँ की हैं, परंतु फिर भी यह नहीं कहा जा सकता है कि परमेश्वर का कार्य सदैव एक सटीक योजना पर आधारित रहा है; वे भविष्यवाणियाँ परमेश्वर के उस समय के कार्य के अनुसार की गई थीं। वह जो भी कार्य करता है वह सब सर्वाधिक वास्तविक कार्य होता है। वह प्रत्येक युग के विकास के अनुसार अपने कार्य को संपन्न करता है, और यह इस बात पर आधारित होता है कि चीज़ें कैसे बदलती हैं। उसके लिए, कार्य को संपन्न करना किसी बीमारी के लिए दवा देने के सदृश है; अपना कार्य करते समय वह अवलोकन करता है और अपने अवलोकनों के अनुसार कार्य जारी रखता है। अपने कार्य के प्रत्येक चरण में, परमेश्वर अपनी प्रचुर बुद्धि और अपनी योग्यता को व्यक्त करने में सक्षम है; वह किसी युग विशेष के कार्य के अनुसार अपनी प्रचुर बुद्धि और अधिकार को प्रकट करता है, और उस युग के दौरान अपने द्वारा वापस लाए गए सभी लोगों को अपना समस्त स्वभाव देखने देता है। प्रत्येक युग में जिस कार्य के किए जाने की आवश्यकता है उसके अनुसार वह लोगों की आवश्यकताओं की आपूर्ति करता है, वह सब कार्य जो उसे करना चाहिए। वह लोगों की आवश्यकताओं की आपूर्ति इस आधार पर करता है कि शैतान ने उन्हें किस हद तक भ्रष्ट कर दिया है। यह उसी तरह है जब यहोवा ने आरंभ में आदम और हव्वा का सृजन किया था, उसने ऐसा इसलिए किया ताकि वे पृथ्वी पर परमेश्वर को अभिव्यक्त करने में समर्थ हों और सृजन के बीच परमेश्वर की गवाही दे सकें। किंतु सर्प द्वारा प्रलोभन दिए जाने के बाद हव्वा ने पाप किया, आदम ने भी वही किया; उन दोनों ने बगीचे से अच्छे और बुरे के ज्ञान के वृक्ष का फल खाया। इस प्रकार, यहोवा के पास उन पर करने के लिए अतिरिक्त कार्य था। उनकी नग्नता देखकर उसने पशुओं की खालों से बने वस्त्रों से उनके शरीर को ढक दिया। इसके बाद उसने आदम से कहा, "तू ने जो अपनी पत्नी की बात सुनी, और जिस वृक्ष के फल के विषय मैं ने तुझे आज्ञा दी थी कि तू उसे न खाना, उसको तू ने खाया है इसलिये भूमि तेरे कारण शापित है ... और अन्त में मिट्टी में मिल जाएगा क्योंकि तू उसी में से निकाला गया है; तू मिट्टी तो है और मिट्टी ही में फिर मिल जाएगा।" स्त्री से उसने कहा, "मैं तेरी पीड़ा और तेरे गर्भवती होने के दु:ख को बहुत बढ़ाऊँगा; तू पीड़ित होकर बालक उत्पन्न करेगी; और तेरी लालसा तेरे पति की ओर होगी, और वह तुझ पर प्रभुता करेगा।" उसके बाद से उसने उन्हें अदन की वाटिका से निर्वासित कर दिया, और उन्हें वाटिका से बाहर रहने पर मजबूर किया, जैसेकि अब आधुनिक मानव पृथ्वी पर रहता है। जब परमेश्वर ने आरंभ में मनुष्य का सृजन किया, तब उसने यह योजना नहीं बनाई थी कि सृजन के बाद मनुष्य साँप द्वारा प्रलोभित हो और फिर वह मनुष्य और साँप को शाप दे। उसकी वास्तव में इस प्रकार की कोई योजना नहीं थी; जिस तरह चीज़ों का विकास हुआ उसी ने उसे अपनी सृष्टि के बीच नया कार्य करने को दिया। यहोवा द्वारा पृथ्वी पर आदम और हव्वा के बीच इस कार्य को संपन्न करने के बाद, मानवजाति कई हजार वर्षों तक विकसित होती रही, तब तक जब, "यहोवा ने देखा कि मनुष्यों की बुराई पृथ्वी पर बढ़ गई है, और उनके मन के विचार में जो कुछ उत्पन्न होता है वह निरन्तर बुरा ही होता है। और यहोवा पृथ्वी पर मनुष्य को बनाने से पछताया, और वह मन में अति खेदित हुआ। ... परन्तु यहोवा के अनुग्रह की दृष्‍टि नूह पर बनी रही।" इस समय यहोवा के पास करने के लिए और नए कार्य थे, क्योंकि जिस मानवजाति का उसने सृजन किया था वह सर्प के द्वारा प्रलोभित किए जाने के बाद बहुत अधिक पापमय हो चुकी थी। इन परिस्थितियों को देखते हुए, यहोवा ने समस्त मानवता में से बचाने के लिए नूह के परिवार का चयन किया, और संसार को जलप्रलय के द्वारा नष्ट करने का अपना कार्य संपन्न किया। मानवजाति आज के दिन तक भी इसी तरीके से विकसित हो रही है, उत्तरोत्तर भ्रष्ट हो रही है, और जब मानवजाति का विकास अपने शिखर पर पहुँच जाएगा, तब इसका अर्थ मानवजाति का अंत होगा। संसार के बिल्कुल आरंभ से लेकर अंत तक परमेश्वर के कार्य का भीतरी सत्य सदैव ऐसा ही रहा है और सदा ऐसा ही रहेगा। यह वैसा ही है जैसे कि मनुष्यों को उनके प्रकार के अनुसार वर्गीकृत किया जाएगा; यह ऐसा मामला नहीं है कि हर एक व्यक्ति को बिल्कुल आरंभ से एक श्रेणी से संबंधित होने के लिए पूर्वनियत कर दिया जाता है, बल्कि इसमें हर एक को केवल विकास की एक प्रक्रिया से गुजरने के बाद ही धीरे-धीरे श्रेणीबद्ध किया जाता है। अंत में, जिस किसी का भी पूरी तरह से उद्धार नहीं किया जा सकता है उसे उसके "पुरखों" के पास लौटा दिया जाएगा। मानवजाति के बीच परमेश्वर का कोई भी कार्य संसार के सृजन के समय पहले से तैयार नहीं किया गया था; बल्कि, यह चीजों का विकास है जिसने परमेश्वर को मानवजाति के बीच अधिक वास्तविक एवं व्यवहारिक रूप से कदम-दर-कदम अपना कार्य करने दिया है। उदाहरण के लिए, यहोवा परमेश्वर ने स्त्री को प्रलोभित करने के लिए साँप का सृजन नहीं किया था। यह उसकी कोई विशिष्ट योजना नहीं थी, न ही यह कुछ ऐसा था जिसे उसने जानबूझकर पूर्वनियत किया था। यह कहा जा सकता है कि यह अनपेक्षित घटना थी। इस प्रकार, इसी कारण से यहोवा ने आदम और हव्वा को अदन की वाटिका से निष्कासित किया और फिर कभी मनुष्य का सृजन न करने की शपथ ली। परंतु लोगों को केवल इसी आधार पर परमेश्वर की बुद्धि का पता चलता है। यह वैसा ही है जैसा मैंने पहले कहा था : "मैं अपनी बुद्धि शैतान के षडयंत्रों के आधार पर प्रयोग में लाता हूँ।" चाहे मानवजाति कितनी भी भ्रष्ट हो जाए या साँप उन्हें कैसे भी प्रलोभित करे, यहोवा के पास तब भी अपनी बुद्धि है; इस तरह, जबसे उसने संसार का सृजन किया है, वह नए-नए कार्य में लगा रहा है और उसके कार्य का कोई भी कदम कभी भी दोहराया नहीं गया है। शैतान ने लगातार षड्यंत्र किए हैं; मानवजाति लगातार शैतान के द्वारा भ्रष्ट की गई है, और यहोवा परमेश्वर ने अपने बुद्धिमत्तापूर्ण कार्य को लगातार संपन्न किया है। वह कभी भी असफल नहीं हुआ है, और संसार के सृजन से लेकर अब तक उसने कार्य करना कभी नहीं रोका है। शैतान द्वारा मानवजाति को भ्रष्ट करने के बाद से, परमेश्वर अपने उस शत्रु को परास्त करने के लिए उनके बीच लगातार कार्य करता रहा है जो भ्रष्टता का स्रोत है। यह लड़ाई आरंभ से शुरू हुई है और संसार के अंत तक चलती रहेगी। यह सब कार्य करते हुए, यहोवा परमेश्वर ने न केवल शैतान द्वारा भ्रष्ट की जा चुकी मनुष्यजाति को अपने द्वारा महान उद्धार को प्राप्त करने की अनुमति दी है, बल्कि उसे अपनी बुद्धि, सर्वशक्तिमत्ता और अधिकार को देखने की अनुमति भी दी है। इसके अलावा, अंत में वह मानवजाति को दुष्टों को दंड, और अच्छों को पुरस्कार देने वाला अपना धार्मिक स्वभाव देखने देगा। उसने आज के दिन तक शैतान के साथ युद्ध किया है और कभी भी पराजित नहीं हुआ है। इसलिए, क्योंकि वह एक बुद्धिमान परमेश्वर है, वह अपनी बुद्धि शैतान के षड्यंत्रों के आधार पर प्रयोग करता है। और इसलिए परमेश्वर न केवल स्वर्ग की सब चीजों से अपने अधिकार का पालन करवाता है; बल्कि वह पृथ्वी की सभी चीज़ों को अपने पाँव रखने की चौकी के नीचे रखवाता है, और एक अन्य महत्वपूर्ण बात है, वह दुष्टों को, जो मानवजाति पर आक्रमण करते हैं और उसे सताते हैं, अपनी ताड़ना के अधीन करता है। इन सभी कार्यों के परिणाम उसकी बुद्धि के कारण प्राप्त होते हैं। उसने मानवजाति के अस्तित्व से पहले कभी भी अपनी बुद्धि को प्रकट नहीं किया था, क्योंकि स्वर्ग में, और पृथ्वी पर, या समस्त ब्रह्मांड में उसके कोई शत्रु नहीं थे, और कोई अंधकार की शक्तियाँ नहीं थीं जो प्रकृति में मौजूद किसी भी चीज पर आक्रमण करती थीं। प्रधान स्वर्गदूत द्वारा उसके साथ विश्वासघात किए जाने के बाद, उसने पृथ्वी पर मानवजाति का सृजन किया, और यह मानवजाति के कारण ही था कि उसने औपचारिक रूप से प्रधान स्वर्गदूत, शैतान के साथ अपना सहस्राब्दी जितना लंबा युद्ध आरंभ किया, ऐसा युद्ध जो हर उत्तरोत्तर चरण के साथ और अधिक घमासान होता जाता है। इनमें से प्रत्येक चरण में उसकी सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि उपस्थित रहती है। केवल तभी स्वर्ग और पृथ्वी में हर चीज परमेश्वर की बुद्धि, सर्वशक्तिमत्ता, और विशेषकर परमेश्वर की यथार्थता को देख सकती है। वह आज भी अपने कार्य को उसी यथार्थवादी तरीके से संपन्न करता है; इसके अतिरिक्त, जब वह अपने कार्य को करता है, तो वह अपनी बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता को भी प्रकट करता है; वह तुम लोगों को प्रत्येक चरण के भीतरी सत्य को देखने की अनुमति देता है, यह देखने की अनुमति देता है कि परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता की आखिर कैसे व्याख्या की जाए, और इससे भी बढ़कर परमेश्वर की वास्तविकता की निर्णायक व्याख्या को देखने देता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम्हें पता होना चाहिए कि समस्त मानवजाति आज के दिन तक कैसे विकसित हुई' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 148

पवित्र आत्मा का कार्य सदैव अनायास किया जाता है; वह किसी भी समय अपने कार्य की योजना बना सकता है, और कभी भी उसे संपन्न कर सकता है। मैं क्यों सदैव कहता हूँ कि पवित्र आत्मा का कार्य यथार्थवादी होता है, और वह सदैव नया होता है, कभी पुराना नहीं होता, और सदैव सबसे अधिक ताजा होता है? जब संसार का सृजन किया गया था, तब उसके कार्य की योजना पहले से नहीं बनाई गई थी; ऐसा बिलकुल भी नहीं हुआ था! कार्य का हर कदम अपने सही समय पर समुचित परिणाम प्राप्त करता है, और वे एक-दूसरे में हस्तक्षेप नहीं करते। बहुत बार तुम्हारे मन की योजनाएँ पवित्र आत्मा के नवीनतम कार्य के साथ बिलकुल मेल नहीं खातीं। उसका कार्य मनुष्य की तर्कबुद्धि जैसा सरल नहीं है, न ही वह मनुष्य की कल्पनाओं जैसा जटिल है—इसमें किसी भी समय और स्थान पर लोगों को उनकी वर्तमान आवश्यकताओं के अनुसार आपूर्ति करना शामिल है। कोई भी मनुष्यों के सार के बारे में उतना स्पष्ट नहीं है, जितना वह है, और ठीक इसी कारण से कोई भी चीज लोगों की यथार्थपरक आवश्यकताओं के उतनी अनुकूल नहीं हो सकती, जितना उसका कार्य है। इसलिए, मनुष्य के दृष्टिकोण से, उसका कार्य कई सहस्राब्दी पूर्व अग्रिम रूप से योजनाबद्ध किया गया प्रतीत होता है। अब जबकि वह तुम लोगों के बीच कार्य करता है, इस पूरे समय में कार्य करते और बोलते हुए जब वह उन स्थितियों को देखता है जिनमें तुम हो, तो हर प्रकार की परिस्थिति से सामना होने पर उसके पास बोलने के लिए बिलकुल सही वचन होते हैं, वह ठीक वे ही वचन बोलता है, जिनकी लोगों को आवश्यकता होती है। उसके कार्य के पहले कदम को लो : ताड़ना का समय। उसके बाद, लोगों ने सभी तरह का व्यवहार प्रदर्शित किया और कुछ तरीकों से विद्रोहपूर्ण ढंग से कार्य किया; विभिन्न सकारात्मक स्थितियाँ उभरीं, वैसे ही कुछ नकारात्मक स्थितियाँ भी उभरीं। वे अपनी नकारात्मकता के एक बिंदु तक पहुँच गए और उन्होंने वे निम्नतम सीमाएँ दिखाईं, जिन तक वे गिर सकते थे। परमेश्वर ने इन सब चीजों के आधार पर अपना कार्य किया, और इस प्रकार अपने कार्य से अधिक बेहतर परिणाम प्राप्त करने के लिए उन्हें पकड़ लिया। अर्थात, वह लोगों के बीच किसी समय-विशेष में उनकी वर्तमान स्थिति के अनुसार चिरस्थायी कार्य करता है; वह अपने कार्य का हर कदम लोगों की वास्तविक स्थितियों के अनुसार संपन्न करता है। समस्त सृष्टि उसके हाथों में है, वह उन्हें कैसे नहीं जान सकता? परमेश्वर लोगों की स्थितियों के अनुसार, किसी भी समय और स्थान पर, कार्य के उस अगले कदम को कार्यान्वित करता है, जो किया जाना चाहिए। यह कार्य किसी भी तरह से हजारों वर्ष पहले से योजनाबद्ध नहीं किया गया था; यह एक मानवीय धारणा है! वह अपने कार्य के परिणाम देखकर कार्य करता है, और उसका कार्य लगातार अधिक गहन और विकसित होता जाता है; प्रत्येक बार, अपने कार्य के परिणामों का अवलोकन करने के बाद वह अपने कार्य के अगले कदम को कार्यान्वित करता है। वह धीरे-धीरे एक स्थिति से दूसरी स्थिति में जाने के लिए और समय के साथ लोगों को अपना नया कार्य दृष्टिगोचर कराने के लिए कई चीजों का उपयोग करता है। कार्य का यह तरीका लोगों की आवश्यकताओं की आपूर्ति करने में समर्थ हो सकता है, क्योंकि परमेश्वर सभी लोगों को बहुत अच्छी तरह से जानता है। वह अपने कार्य को स्वर्ग से इसी तरह संपन्न करता है। इसी प्रकार, देहधारी परमेश्वर भी, वास्तविक परिस्थितियों के अनुसार व्यवस्था करते हुए और मनुष्यों के बीच कार्य करते हुए अपना कार्य इसी तरह संपन्न करता है। उसका कोई भी कार्य संसार के सृजन से पहले व्यवस्थित नहीं किया गया था, न ही उसकी पहले से ध्यानपूर्वक योजना बनाई गई थी। संसार के सृजन के दो हजार वर्षों के बाद, यहोवा ने देखा कि मानवजाति इतनी भ्रष्ट हो गई है कि उसने यह भविष्यवाणी करने के लिए नबी यशायाह के मुख का उपयोग किया कि व्यवस्था के युग का अंत होने के बाद यहोवा अनुग्रह के युग में मानवजाति को छुटकारा दिलाने का अपना कार्य करेगा। निस्संदेह, यह यहोवा की योजना थी, किंतु यह योजना भी उन परिस्थितियों के अनुसार बनाई गई थी जिनका वह उस समय अवलोकन कर रहा था; उसने निश्चित रूप से आदम का सृजन करने के तुरंत बाद इस बारे में नहीं सोचा था। यशायाह ने केवल भविष्यवाणी कही, किंतु यहोवा ने व्यवस्था के युग के दौरान इस कार्य के लिए अग्रिम तैयारियाँ नहीं की थीं; बल्कि उसने अनुग्रह के युग के आरंभ में इस कार्य की शुरुआत की, जब दूत यूसुफ के स्वप्न में उसे इस संदेश से प्रबुद्ध करने के लिए दिखाई दिया कि परमेश्वर देहधारी बनेगा, और केवल तभी देहधारण का उसका कार्य आरंभ हुआ। परमेश्वर ने संसार के सृजन के ठीक बाद अपने देहधारण के कार्य के लिए तैयारी नहीं कर ली थी, जैसा कि लोग कल्पना करते हैं; इसका निर्णय केवल मानवजाति के विकास की मात्रा और शैतान के साथ परमेश्वर के युद्ध की स्थिति के आधार पर लिया गया था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम्हें पता होना चाहिए कि समस्त मानवजाति आज के दिन तक कैसे विकसित हुई' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 149

जब परमेश्वर देह बनता है, तो उसका आत्मा किसी मनुष्य पर उतरता है; दूसरे शब्दों में, परमेश्वर का आत्मा भौतिक शरीर के वस्त्र पहनता है। पृथ्वी पर अपना कार्य करने के लिए वह अपने साथ विभिन्न सीमित कदम लाने के लिए नहीं आता; उसका कार्य पूर्णतया असीमित होता है। पवित्र आत्मा देह में रहकर जो कार्य करता है, वह भी उसके कार्य के परिणामों द्वारा ही निर्धारित होता है और वह इन चीजों का उपयोग उस समयावधि का निर्धारण करने के लिए करता है, जिसमें वह देह में रहते हुए कार्य करेगा। पवित्र आत्मा अपने कार्य में आगे बढ़ते हुए उसकी जाँच करके उसके प्रत्येक चरण को प्रत्यक्ष रूप से प्रकट करता है; यह कार्य ऐसा कुछ अलौकिक नहीं है कि मानवीय कल्पना की सीमाओं को विस्तार दे दे। यह यहोवा द्वारा आकाश और पृथ्वी और अन्य सब वस्तुओं के सृजन के कार्य के समान है; उसने साथ-साथ योजना बनाई और कार्य किया। उसने प्रकाश को अंधकार से अलग किया, और सुबह और शाम अस्तित्व में आ गए—इसमें एक दिन लगा। दूसरे दिन उसने आकाश का सृजन किया, और उसमें भी एक दिन लगा; फिर उसने पृथ्वी, समुद्र और उन्हें आबाद करने वाले सब प्राणी बनाए, जिसमें एक दिन और लगा। यह छठे दिन तक चला, जब परमेश्वर ने मनुष्य का सृजन किया और उससे पृथ्वी पर सभी चीजों का प्रबंधन कराया। तब सातवें दिन, जब उसने सभी चीजों का सृजन पूरा कर लिया, तब उसने विश्राम किया। परमेश्वर ने सातवें दिन को आशीष दिया और उसे पवित्र दिन के रूप में निर्दिष्ट किया। उसने इस पवित्र दिन को स्थापित करने का निर्णय सभी चीजों का सृजन करने के बाद ही लिया, उनका सृजन करने से पहले नहीं। यह कार्य भी अनायास ही किया गया था; सभी चीजों का सृजन करने से पहले उसने छह दिनों में संसार का सृजन करना और सातवें दिन विश्राम करना तय नहीं किया था; यह बिलकुल भी तथ्य के अनुरूप नहीं है। उसने ऐसा कुछ नहीं कहा था, न ही इसकी योजना बनाई थी। उसने यह कदापि नहीं कहा था कि सभी चीजों का सृजन छठे दिन पूरा किया जाएगा और सातवें दिन वह विश्राम करेगा; बल्कि उसे उस समय जो अच्छा लगा, उसके अनुसार उसने सृजन किया। जब उसने सभी चीजों का सृजन समाप्त कर लिया, तो छठा दिन हो चुका था। यदि वह पाँचवाँ दिन रहा होता, जब उसने सभी चीजों का सृजन करना समाप्त किया होता, तो उसने छठे दिन को पवित्र दिन के रूप में निर्दिष्ट किया होता। किंतु वास्तव में उसने सभी चीजों का सृजन करना छह दिनों में समाप्त किया, और इसलिए सातवाँ दिन पवित्र दिन बन गया, जो आज तक चला आ रहा है। इसलिए, उसका वर्तमान कार्य इसी तरीके से संपन्न किया जा रहा है। वह तुम लोगों की स्थितियों के अनुसार तुम लोगों की आवश्यकताओं के लिए आपूर्ति करता है। अर्थात्, पवित्रात्मा लोगों की परिस्थितियों के अनुसार बोलता और कार्य करता है; वह सब पर निगरानी रखता है और किसी भी समय, किसी भी स्थान पर कार्य करता है। मैं जो कुछ करता हूँ, कहता हूँ, तुम लोगों पर रखता हूँ और तुम लोगों को प्रदान करता हूँ, बिना अपवाद के वह वो है जिसकी तुम लोगों को आवश्यकता है। इस प्रकार, मेरा कोई भी कार्य वास्तविकता से अलग नहीं है; वह सब वास्तविक है, क्योंकि तुम सब लोग जानते हो कि "परमेश्वर का आत्मा सब पर निगरानी रखता है।" यदि यह सब समय से पहले तय किया गया होता, तो क्या यह बहुत रूखा-सूखा न होता? यह तो ऐसा लगता है, मानो तुम सोचते हो कि परमेश्वर ने पूरी छह सहस्राब्दियों की योजना बना ली और फिर मानवजाति को विद्रोही, प्रतिरोधी, कुटिल और धोखेबाज होने, देह की भ्रष्टता, शैतानी स्वभाव, आँखों की वासना और व्यक्तिगत भोग-विलासों से युक्त होने के लिए पूर्वनियत किया। इसमें से कुछ भी परमेश्वर द्वारा पूर्वनियत नहीं किया गया था, बल्कि यह सब-कुछ शैतान की भ्रष्टता के परिणामस्वरूप हुआ। कुछ लोग कह सकते हैं, "क्या शैतान भी परमेश्वर की मुट्ठी में नहीं था? परमेश्वर ने पूर्वनियत किया था कि शैतान मनुष्य को इस तरह से भ्रष्ट करेगा, और उसके बाद परमेश्वर ने मनुष्यों के बीच अपना कार्य संपन्न किया।" क्या परमेश्वर वास्तव में मानवजाति को भ्रष्ट करने के लिए शैतान को पूर्वनियत करेगा? परमेश्वर तो केवल मानवजाति को सामान्य रूप से जीने देने के लिए ही अत्यधिक उत्सुक है, तो क्या वह वाकई उसके जीवन में हस्तक्षेप करेगा? अगर ऐसा होता, तो क्या शैतान को हराना और मानवजाति को बचाना एक निरर्थक प्रयास न होता? मानवजाति की विद्रोहशीलता कैसे पूर्वनियत की जा सकती थी? यह शैतान के हस्तक्षेप के कारण पैदा हुई चीज है, तो यह परमेश्वर द्वारा पूर्वनियत कैसे की जा सकती थी? शैतान के परमेश्वर की पकड़ में होने की तुम लोग जिस रूप में कल्पना करते हो, वह शैतान के परमेश्वर की पकड़ में होने को मैं जिस रूप में कहता हूँ, उससे बिलकुल अलग है। तुम लोगों के कथनों के अनुसार कि "परमेश्वर सर्वशक्तिमान है, और शैतान उसके हाथों में है," शैतान उसके साथ कभी विश्वासघात नहीं कर सकता। क्या तुमने यह नहीं कहा कि परमेश्वर सर्वशक्तिमान है? तुम लोगों का ज्ञान अत्यधिक अमूर्त और वास्तविकता से अछूता है; मनुष्य कभी परमेश्वर के विचारों की थाह नहीं पा सकता, न ही वह कभी परमेश्वर की बुद्धि को समझ सकता है! परमेश्वर सर्वशक्तिमान है; यह बिल्कुल भी गलत नहीं है। प्रधान स्वर्गदूत ने परमेश्वर के साथ विश्वासघात किया, क्योंकि परमेश्वर ने आरंभ में उसे अधिकार का एक भाग दिया था। निस्संदेह, यह एक अनपेक्षित घटना थी, जैसे कि हव्वा का साँप के बहकावे में आना। किंतु शैतान चाहे किसी भी तरह से विश्वासघात करे, वह फिर भी उतना सर्वशक्तिमान नहीं है, जितना कि परमेश्वर है। जैसा कि तुम लोगों ने कहा है, शैतान महज शक्तिमान है; वह चाहे जो भी करे, परमेश्वर का अधिकार उसे सदैव पराजित करेगा। "परमेश्वर सर्वशक्तिमान है, और शैतान उसके हाथों में है," कथन के पीछे यही वास्तविक अर्थ है। इसलिए, शैतान के साथ युद्ध को एक बार में एक कदम आगे बढ़ाया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त, परमेश्वर शैतान की चालबाजियों के उत्तर में अपने कार्य की योजना बनाता है—अर्थात् वह मानवजाति के लिए उद्धार उस रूप में लाता है और अपनी बुद्धि एवं सर्वशक्तिमत्ता उस रूप में प्रकट करता है, जो वर्तमान युग के लिए उपयुक्त है। इसी प्रकार, अंत के दिनों का कार्य अनुग्रह के युग से पहले पूर्वनियत नहीं किया गया था; पूर्वनियत करने के काम ऐसे व्यवस्थित ढंग से नहीं किए जाते : पहले, मनुष्य के बाहरी स्वभाव में परिवर्तन करना; दूसरे, मनुष्य को परमेश्वर की ताड़ना और परीक्षणों का भागी बनाना; तीसरे, मनुष्य को मृत्यु के परीक्षण से गुजारना; चौथे, मनुष्य को परमेश्वर से प्रेम करने के समय का अनुभव कराना और एक सृजित प्राणी का संकल्प व्यक्त कराना; पाँचवें, मनुष्य को परमेश्वर की इच्छा दिखाना और परमेश्वर को पूर्णतः जानने देना; और अंततः मनुष्य को पूर्ण करना। इन सब चीजों की योजना उसने अनुग्रह के युग के दौरान नहीं बनाई; बल्कि उसने इनकी योजना वर्तमान युग में बनानी आरंभ की। शैतान कार्य कर रहा है, वैसे ही परमेश्वर भी कार्य कर रहा है। शैतान अपना भ्रष्ट स्वभाव व्यक्त करता है, जबकि परमेश्वर स्पष्ट रूप से बोलता है और कुछ अनिवार्य चीजें प्रकट करता है। आज यही कार्य किया जा रहा है, और कार्य करने का यही सिद्धांत बहुत पहले, संसार के सृजन के बाद उपयोग में लाया गया था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम्हें पता होना चाहिए कि समस्त मानवजाति आज के दिन तक कैसे विकसित हुई' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 150

पहले, परमेश्वर ने आदम और हव्वा का सृजन किया, और उसने साँप का भी सृजन किया। सभी चीज़ों में साँप सर्वाधिक विषैला था; उसकी देह में विष था, जिसका शैतान ने उस विष का लाभ उठाने के लिए उपयोग किया। यह साँप ही था जिसने पाप करने के लिए हव्वा को प्रलोभित किया। हव्वा के बाद आदम ने पाप किया, और तब वे दोनों अच्छे और बुरे के बीच भेद करने में समर्थ हो गए। यदि यहोवा जानता था कि साँप हव्वा को प्रलोभित करेगा और हव्वा आदम को प्रलोभित करेगी, तो उसने उन सबको एक ही वाटिका के भीतर क्यों रखा? यदि वह इन चीज़ों का पूर्वानुमान करने में समर्थ था, तो उसने क्यों साँप की रचना की और उसे अदन की वाटिका के भीतर रखा? अदन की वाटिका में अच्छे और बुरे के ज्ञान के वृक्ष का फल क्यों था? क्या वह चाहता था कि वे उस फल को खाएँ? जब यहोवा आया, तब न आदम को और न हव्वा में उसका सामना करने का साहस हुआ, और तब जाकर यहोवा को पता चला कि उन्होंने अच्छे और बुरे के ज्ञान के वृक्ष का फल खा लिया है और वे साँप के फरेब का शिकार बन गए हैं। अंत में, उसने साँप को शाप दिया, और उसने आदम और हव्वा को भी शाप दिया। जब उन दोनों ने उस वृक्ष के फल को खाया, तब यहोवा को बिल्कुल भी पता नहीं था कि वे ऐसा कर रहे हैं। मानवजाति दुष्टता और यौन स्वच्छंदता की सीमा तक भ्रष्ट हो गई, यहाँ तक कि उनके हृदयों में जो कुछ भी था वह सिर्फ बुरा और अधार्मिक था; यह सिर्फ गंदगी थी। इसलिए, यहोवा को मानवजाति का सृजन करके पछतावा हुआ। उसके बाद उसने संसार को जलप्रलय के द्वारा नष्ट करने का अपना कार्य संपन्न किया, जिसमें नूह और उसके पुत्र बच गए। कुछ चीजें वास्तव में इतनी अधिक उन्नत और अलौकिक नहीं होती हैं जितनी लोग कल्पना कर सकते हैं। कुछ लोग पूछते हैं, "चूँकि परमेश्वर जानता था कि प्रधान स्वर्गदूत उसके साथ विश्वासघात करेगा, तो परमेश्वर ने उसका सृजन क्यों किया?" तथ्य ये हैं : पृथ्वी के अस्तित्व से पहले, प्रधान स्वर्गदूत स्वर्ग के स्वर्गदूतों में सबसे महान था। स्वर्ग के सभी स्वर्गदूतों पर उसका अधिकार था; और यह अधिकार उसे परमेश्वर ने दिया था। परमेश्वर के अपवाद के साथ, वह स्वर्ग के स्वर्गदूतों में सर्वोच्च था। बाद में जब परमेश्वर ने मानवजाति का सृजन किया, तब प्रधान स्वर्गदूत ने पृथ्वी पर परमेश्वर के विरुद्ध और भी बड़ा विश्वासघात किया। मैं इसलिए कहता हूँ कि उसने परमेश्वर के साथ विश्वासघात किया क्योंकि वह मानवजाति का प्रबंधन करना और परमेश्वर के अधिकार से आगे बढ़ना चाहता था। यह प्रधान स्वर्गदूत ही था जिसने हव्वा को पाप करने के लिए प्रलोभित किया; उसने ऐसा इसलिए किया क्योंकि वह पृथ्वी पर अपना राज्य स्थापित करना और मानवजाति द्वारा परमेश्वर से मुख फेरकर अपना आज्ञापालन करवाना चाहता था। उसने देखा कि बहुत-सी चीजें हैं जो उसका आज्ञापालन कर सकती थीं—स्वर्गदूत उसकी आज्ञा मान सकते थे, ऐसे ही पृथ्वी पर लोग भी उसकी आज्ञा मान सकते थे। पृथ्वी पर पक्षी और पशु, वृक्ष और जंगल, पर्वत और नदियाँ और सभी वस्तुएँ मनुष्य—अर्थात, आदम और हव्वा—की देखभाल के अधीन थीं, जबकि आदम और हव्वा प्रधान स्वर्गदूत का आज्ञापालन करते थे। इसलिए प्रधान स्वर्गदूत परमेश्वर के अधिकार से आगे बढ़ना और परमेश्वर के साथ विश्वासघात करना चाहता था। इसके बाद उसने परमेश्वर के साथ विश्वासघात करने के लिए बहुत से स्वर्गदूतों की अगुआई की, जो बाद में विभिन्न अशुद्ध आत्माएँ बन गए। क्या आज के दिन तक मानवजाति का विकास प्रधान स्वर्गदूत की भ्रष्टता के कारण नहीं है? मानवजाति जैसी आज है, केवल इसलिए है क्योंकि प्रधान स्वर्गदूत ने परमेश्वर के साथ विश्वासघात किया और मानवजाति को भ्रष्ट कर दिया। यह कदम-दर-कदम कार्य उतना अमूर्त और आसान नहीं है जितना कि लोग कल्पना कर सकते हैं। शैतान ने एक कारणवश विश्वासघात किया, फिर भी लोग इतनी आसान-सी बात को समझने में असमर्थ हैं। जिस परमेश्वर ने स्वर्ग और पृथ्वी और सब वस्तुओं का सृजन किया, उसने क्यों शैतान का भी सृजन किया? चूँकि परमेश्वर शैतान से बहुत अधिक घृणा करता है, और शैतान परमेश्वर का शत्रु है, तो परमेश्वर ने उसका सृजन क्यों किया? शैतान का सृजन करके, क्या वह एक शत्रु का सृजन नहीं कर रहा था? परमेश्वर ने वास्तव में एक शत्रु का सृजन नहीं किया था; बल्कि उसने एक स्वर्गदूत का सृजन किया था, और बाद में इस स्वर्गदूत ने परमेश्वर के साथ विश्वासघात किया। उसकी हैसियत इतनी बढ़ गई थी कि उसमें परमेश्वर के साथ विश्वासघात करने की इच्छा होने लगी। कहा जा सकता है कि यह मात्र एक संयोग था, परंतु यह अपरिहार्य भी था। यह उस बात के समान है कि कैसे कोई व्यक्ति एक निश्चित आयु तक बढ्ने के बाद अपरिहार्य रूप से मरेगा; चीजें उस स्तर तक विकसित हो चुकी हैं। कुछ बेतुके और मूर्ख लोग कहते हैं : "जब शैतान तुम्हारा शत्रु है, तो तुमने उसका सृजन क्यों किया? क्या तुम नहीं जानते थे कि प्रधान स्वर्गदूत तुम्हारे साथ विश्वासघात करेगा? क्या तुम अनंतकाल से अनंतकाल में नहीं झाँक सकते हो? क्या तुम उसका स्वभाव नहीं जानते थे? जब तुम्हें स्पष्ट रूप से पता था कि वह तुम्हारे साथ विश्वासघात करेगा, तो तुमने उसे प्रधान स्वर्गदूत क्यों बनाया? न सिर्फ़ उसने तुम्हारे साथ विश्वासघात किया, बल्कि उसने कितने ही स्वर्गदूतों की अगुआई करते हुए उन्हें अपने साथ ले लिया और मनुष्यजाति को भ्रष्ट करने के लिए नश्वरों के संसार में उतर आया; फिर भी आज के दिन तक, तुम अपनी छह—हजार—वर्षीय प्रबंधन योजना को पूरा करने में असमर्थ रहे हो।" क्या ये शब्द सही हैं? जब तुम इस तरीके से सोचते हो, तो क्या तुम अपने-आपको आवश्यकता से अधिक संकट में नहीं डाल रहे हो? कुछ अन्य लोग हैं जो कहते हैं : "यदि शैतान ने वर्तमान समय तक मानवजाति को भ्रष्ट नहीं किया होता, तो परमेश्वर ने मानवजाति का इस प्रकार उद्धार नहीं किया होता। इस प्रकार, परमेश्वर की बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता अदृश्य ही रहते; उसकी बुद्धि कहाँ प्रकट होती? इसलिए परमेश्वर ने शैतान के लिए मानवजाति का सृजन किया; ताकि भविष्य में परमेश्वर अपनी सर्वशक्तिमत्ता प्रकट कर सके—अन्यथा मनुष्य परमेश्वर की बुद्धि को कैसे खोज सकता था? यदि मनुष्य ने परमेश्वर का प्रतिरोध नहीं किया और उसके प्रति विद्रोह नहीं किया होता, तो परमेश्वर की क्रियाओं की अभिव्यक्ति अनावश्यक होती। यदि संपूर्ण सृष्टि उसकी आराधना और उसका आज्ञापालन करे, तो परमेश्वर के पास करने के लिए कोई कार्य नहीं होगा।" यह वास्तविकता से और भी दूर है, क्योंकि परमेश्वर में कुछ भी गंदा नहीं है, और इसलिए वह गंदगी का सृजन नहीं कर सकता है। वह अब अपने कार्यों को केवल इसलिए प्रकट करता है ताकि अपने शत्रु को परास्त करे, अपने द्वारा सृजित मानव को बचाए, दुष्ट आत्माओं और शैतान को पराजित करे, जो उससे घृणा करते हैं, विश्वासघात करते हैं, और उसका प्रतिरोध करते हैं, जो बिल्कुल आरंभ में उसके अधिकार क्षेत्र के अधीन थे और उसी से संबंधित थे। वह इन दुष्ट आत्माओं को पराजित करना चाहता है और ऐसा करके वह सभी चीजों पर अपनी सर्वशक्तिमत्ता को प्रकट करता है। मानवजाति और पृथ्वी पर सभी वस्तुएँ अब शैतान के अधिकार क्षेत्र के अधीन हैं और दुष्ट के अधिकार क्षेत्र के अधीन हैं। परमेश्वर अपने कार्यों को सभी चीजों पर प्रकट करना चाहता है ताकि लोग उसे जान सकें, और परिणामस्वरूप शैतान को पराजित और परमेश्वर के शत्रुओं को सर्वथा पस्त कर सकें। इस कार्य की समग्रता परमेश्वर की क्रियाओं के प्रकट होने के माध्यम से संपन्न होती है। उसकी सारी सृष्टि शैतान के अधिकार क्षेत्र में है, और इसलिए वह उन पर अपनी सर्वशक्तिमत्ता प्रकट करना चाहता है, और परिणामस्वरूप शैतान को पराजित करना चाहता है। यदि कोई शैतान नहीं होता, तो उसे अपने कार्यों को प्रकट करने की आवश्यकता नहीं होती। यदि शैतान का उत्पीड़न न होता, तो परमेश्वर ने मानवजाति का सृजन किया होता और अदन की वाटिका में उनके रहने के लिए उनकी अगुवाई की होती। उसने शैतान के विश्वासघात से पहले स्वर्गदूतों या प्रधान स्वर्गदूत के लिए अपने समूचे क्रिया-कलाप को प्रकट क्यों नहीं किया? यदि स्वर्गदूतों और प्रधान स्वर्गदूत ने परमेश्वर को जान लिया होता और उसके अधीन हो गए होते, तो उसने कार्य के उन निरर्थक क्रिया-कलापों को नहीं किया होता। शैतान और दुष्ट आत्माओं के अस्तित्व की वजह से, मनुष्य भी परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं और विद्रोही स्वभाव से लबालब भरे हुए हैं। इसलिए परमेश्वर अपने क्रिया-कलापों को प्रकट करना चाहता है। चूंकि वह शैतान से युद्ध करना चाहता है, इसलिए शैतान को पराजित करने के लिए उसे अवश्य अपने अधिकार का उपयोग करना चाहिए और अपने सभी क्रिया-कलापों का उपयोग करना चाहिए; इस तरह, परमेश्वर द्वारा मनुष्यों के बीच किया गया उद्धार का कार्य उन्हें उसकी बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता को देखने देगा। आज परमेश्वर जो कार्य करता है, वह अर्थपूर्ण है, और किसी भी तरह से वैसा नहीं है जैसाकि कुछ लोग कहते हैं: "क्या तुम जो कार्य करते हो वह विरोधाभासी नहीं है? क्या कार्य का यह सिलसिला अपने आपको परेशानी में डालने के लिए किया गया काम नहीं है? तुमने शैतान का सृजन किया, फिर उसे तुम्हारे साथ विश्वासघात और तुम्हारा प्रतिरोध करने दिया। तुमने मानवजाति का सृजन किया, और फिर उसे शैतान को सौंप दिया, और तुमने आदम और हव्वा को प्रलोभित होने दिया। चूँकि तुमने यह सब कुछ जानबूझकर किया है, तो तुम मानवजाति से नफरत क्यों करते हो? तुम शैतान से नफरत क्यों करते हो? क्या ये चीजें तुम्हारे स्वयं के द्वारा बनाई हुई नहीं हैं? इसमें तुम्हारे लिए घृणा करने वाली क्या बात है?" बहुत से बेहूदा लोग इस तरह की बातें कहते हैं। वे परमेश्वर से प्रेम करना चाहते हैं, परंतु वे अपने हृदयों की गहराई में परमेश्वर के बारे में शिकायत करते हैं। कितनी विरोधाभासी बात है! तुम सत्य को नहीं समझते हो, तुम्हारे पास बहुत-से अलौकिक विचार हैं, और तुम यहाँ तक दावा करते हो कि परमेश्वर ने गलती की है—तुम कितने बेहूदा हो! यह तुम्हीं हो जो सत्य के साथ हेराफेरी करते हो; इसलिए बात यह नहीं है कि परमेश्वर ने गलती की है! कुछ लोग तो बार-बार शिकायत करते हैं: "यह तुम ही थे जिसने शैतान का सृजन किया, और तुमने ही शैतान को मनुष्यों के बीच भेज दिया और उन्हें उसके हवाले कर दिया। मनुष्यों द्वारा शैतानी स्वभाव धारण कर लेने के बाद तुमने उन्हें क्षमा नहीं किया; इसके विपरीत, तुमने उनसे एक हद तक नफरत की। आरंभ में तुमने मनुष्य को एक हद तक प्रेम किया और अब तुम मानवजाति से नफरत करते हो। यह तुम ही हो जो मानवजाति से नफरत करते हो, लेकिन तुम वह भी हो जिसने मानवजाति से प्रेम किया है। आखिर यह क्या हो रहा है? क्या यह एक विरोधाभास नहीं है?" इस बात से फर्क नहीं पड़ता है कि तुम लोग इसे कैसे देखते हो, स्वर्ग में यही हुआ था; प्रधान स्वर्गदूत ने इसी तरीके से परमेश्वर के साथ विश्वासघात किया, और मानवजाति को इसी प्रकार भ्रष्ट किया गया, और आज के दिन तक मनुष्य ऐसे ही चलता रहा है। इस बात से फर्क नहीं पड़ता है कि तुम इसे किन शब्दों में व्यक्त करते हो, पूरी कहानी यही है। फिर भी, तुम लोगों को यह अवश्य समझना चाहिए कि परमेश्वर वर्तमान में जो कार्य कर रहा है, उसका पूरा उद्देश्य तुम लोगों को बचाना और शैतान को पराजित करना है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम्हें पता होना चाहिए कि समस्त मानवजाति आज के दिन तक कैसे विकसित हुई' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 151

परमेश्वर लोगों के प्रबंधन का उपयोग शैतान को पराजित करने के लिए करता है। लोगों को भ्रष्ट करके शैतान लोगों के भाग्य का अंत कर देता है और परमेश्वर के कार्य में व्यवधान उत्पन्न करता है। दूसरी ओर, परमेश्वर का कार्य मनुष्यों का उद्धार करना है। परमेश्वर के कार्य का कौनसा कदम मानवजाति को बचाने के अभिप्राय से नहीं है? कौनसा कदम लोगों को स्वच्छ बनाने, उनसे धार्मिक आचरण करवाने और उनके ऐसी छवि में ढल जाने के लिए नहीं है जिससे प्रेम किया जा सके? पर शैतान ऐसा नहीं करता है। वह मानवजाति को भ्रष्ट करता है; मानवजाति को भ्रष्ट करने के अपने कार्य को सारे ब्रह्मांड में निरंतर करता रहता है। निस्संदेह, परमेश्वर भी अपना स्वयं का कार्य करता है। वह शैतान की ओर जरा भी ध्यान नहीं देता है। इससे फर्क नहीं पड़ता कि शैतान के पास कितना अधिकार है, उसे यह अधिकार परमेश्वर द्वारा ही दिया गया था; परमेश्वर ने उसे अपना पूरा अधिकार नहीं दिया था, और इसलिए वह चाहे जो कुछ करे, वह परमेश्वर से आगे नहीं बढ़ सकता और सदैव परमेश्वर की पकड़ में रहेगा। परमेश्वर ने स्वर्ग में रहने के समय अपने क्रिया-कलाप को प्रकट नहीं किया। उसने शैतान को स्वर्गदूतों पर नियंत्रण रखने की अनुमति देने के लिए उसे अपने अधिकार में से मात्र कुछ हिस्सा ही दिया था। इसलिए वह चाहे जो कुछ करे, वह परमेश्वर के अधिकार से बढ़कर नहीं हो सकता है, क्योंकि परमेश्वर ने मूल रूप से उसे जो अधिकार दिया है वह सीमित है। जब परमेश्वर कार्य करता है, तो शैतान बाधा उत्पन्न करता है। अंत के दिनों में, उसकी बाधाएँ समाप्त हो जाएंगी; उसी तरह, परमेश्वर का कार्य भी पूरा हो जाएगा, और परमेश्वर जिस प्रकार के व्यक्ति को संपूर्ण बनाना चाहता है वह संपूर्ण बना दिया जाएगा। परमेश्वर लोगों को सकारात्मक रूप से निर्देशित करता है; उसका जीवन जीवित जल है, अगाध और असीम है। शैतान ने मनुष्य को एक हद तक भ्रष्ट किया है; अंत में, जीवन का जीवित जल मनुष्य को संपूर्ण बनाएगा, और शैतान के लिए हस्तक्षेप करना और अपना कार्य करना असंभव हो जायेगा। इस प्रकार, परमेश्वर इन लोगों को पूर्णतः प्राप्त करने में समर्थ हो जाएगा। शैतान अब भी इसे मानने से मना करता है; वह लगातार स्वयं को परमेश्वर के विरोध में खड़ा रखता है, परंतु परमेश्वर उस पर कोई ध्यान नहीं देता है। परमेश्वर ने कहा है, "मैं शैतान की सभी अँधेरी शक्तियों के ऊपर और उसके सभी अँधेरे प्रभावों के ऊपर विजय प्राप्त करूंगा।" यही वह कार्य है जो अब देह में अवश्य किया जाना चाहिए, और यही देहधारण को महत्वपूर्ण बनाता है : अर्थात अंत के दिनों में शैतान को पराजित करने के चरण को पूरा करना और शैतान से जुड़ी सभी चीज़ों को मिटाना। परमेश्वर की शैतान पर विजय अपरिहार्य है! वास्तव में शैतान बहुत पहले ही असफल हो चुका है। जब बड़े लाल अजगर के पूरे देश में सुसमाचार फैलने लगा, अर्थात्, जब देहधारी परमेश्वर ने कार्य करना आरंभ किया, और यह कार्य गति पकड़ने लगा, तो शैतान बुरी तरह परास्त हो गया था, क्योंकि देहधारण का मूल उद्देश्य ही शैतान को पराजित करना था। जैसे ही शैतान ने देखा कि परमेश्वर एक बार फिर से देह बन गया और उसने अपना कार्य करना भी आरंभ कर दिया, जिसे कोई भी शक्ति रोक नहीं सकती, तो जब उसने इस कार्य को देखा, तो वह अवाक रह गया और उसने कोई और शरारत करने का साहस नहीं किया। पहले-पहल तो शैतान ने सोचा कि उसके पास भी प्रचुर बुद्धि है, और उसने परमेश्वर के कार्य में बाधा और परेशानियाँ डालीं; लेकिन, उसने यह आशा नहीं की थी कि परमेश्वर एक बार फिर देह बन जाएगा, या अपने कार्य में, परमेश्वर शैतान के विद्रोहीपन को मानवजाति के लिए प्रकटन और न्याय के रूप में काम में लायेगा, और परिणामस्वरूप मानवजाति को जीतेगा और शैतान को पराजित करेगा। परमेश्वर शैतान की अपेक्षा अधिक बुद्धिमान है, और उसका कार्य शैतान के कार्य से बहुत बढ़कर है। इसलिए, जैसा मैंने पहले कहा था : "मैं जिस कार्य को करता हूँ वह शैतान की चालबाजियों के प्रत्युत्तर में किया जाता है; अंत में, मैं अपनी सर्वशक्तिमत्ता और शैतान की सामर्थ्यहीनता को प्रकट करूँगा।" परमेश्वर अपना कार्य सामने आकर करेगा तो शैतान पीछे छूट जाएगा, जब तक कि अंत में वह अंततः नष्ट नहीं हो जाता है—उसे पता भी नहीं चलेगा कि उस पर किसने प्रहार किया! कुचलकर चूर—चूर कर दिए जाने के बाद ही उसे सत्य का ज्ञान होगा; उस समय तक उसे पहले से ही आग की झील में जला दिया गया होगा। तब क्या वह पूरी तरह से विश्वस्त नहीं हो जाएगा? क्योंकि उसके पास चलने के लिए और कोई चालें नहीं होंगी!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम्हें पता होना चाहिए कि समस्त मानवजाति आज के दिन तक कैसे विकसित हुई' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 152

मनुष्यों के बीच परमेश्वर का कार्य मनुष्य से अलग नहीं किया जा सकता, क्योंकि मनुष्य ही इस कार्य का लक्ष्य और परमेश्वर द्वारा रचा गया एकमात्र ऐसा प्राणी है, जो परमेश्वर की गवाही दे सकता है। मनुष्य का जीवन और उसके समस्त क्रियाकलाप परमेश्वर से अलग नहीं किए जा सकते और वे सब परमेश्वर के हाथों से नियंत्रित किए जाते हैं, यहाँ तक कि यह भी कहा जा सकता है कि कोई भी व्यक्ति परमेश्वर से स्वतंत्र होकर अस्तित्व में नहीं रह सकता। कोई भी इसे नकार नहीं सकता, क्योंकि यह एक तथ्य है। परमेश्वर जो कुछ भी करता है, वह सब मानवजाति के लाभ के लिए है, और शैतान के षड्यंत्रों की ओर निर्देशित है। वह सब-कुछ, जिसकी मनुष्य को आवश्यकता होती है, परमेश्वर से आता है, और परमेश्वर ही मनुष्य के जीवन का स्रोत है। इस प्रकार, मनुष्य परमेश्वर से अलग होने में एकदम असमर्थ है। इतना ही नहीं, परमेश्वर का मनुष्य से अलग होने का कभी कोई इरादा भी नहीं रहा। जो कार्य परमेश्वर करता है, वह संपूर्ण मानवजाति के लिए है और उसके विचार हमेशा उदार होते हैं। तो मनुष्य के लिए परमेश्वर का कार्य और परमेश्वर के विचार (अर्थात् परमेश्वर की इच्छा) दोनों ही ऐसे "दर्शन" हैं, जिन्हें मनुष्य को जानना चाहिए। वे दर्शन परमेश्वर का प्रबंधन भी हैं, और यह ऐसा कार्य है, जिसे करने में मनुष्य अक्षम है। इस बीच, परमेश्वर द्वारा अपने कार्य के दौरान मनुष्य से की जाने वाली अपेक्षाएँ मनुष्य का "अभ्यास" कहलाती हैं। दर्शन स्वयं परमेश्वर का कार्य हैं, या वे मानवजाति के लिए उसकी इच्छा हैं या उसके कार्य के लक्ष्य और महत्व हैं। दर्शनों को प्रबंधन का एक हिस्सा भी कहा जा सकता है, क्योंकि यह प्रबंधन परमेश्वर का कार्य है, और मनुष्य की ओर निर्देशित है, जिसका अभिप्राय है कि यह वह कार्य है, जिसे परमेश्वर मनुष्यों के बीच करता है। यह कार्य वह प्रमाण और वह मार्ग है, जिसके माध्यम से मनुष्य परमेश्वर को जान पाता है, और मनुष्य के लिए इसका अत्यधिक महत्व है। यदि परमेश्वर के कार्य के ज्ञान पर ध्यान देने के बजाय लोग केवल परमेश्वर में विश्वास के सिद्धांतों पर या तुच्छ महत्वहीन ब्योरों पर ही ध्यान देते हैं, तो वे परमेश्वर को कभी नहीं जानेंगे, और इसके अतिरिक्त, वे परमेश्वर के हृदय के अनुरूप नहीं होंगे। परमेश्वर का कार्य, जो परमेश्वर के बारे में मनुष्य के ज्ञान के लिए अत्यधिक सहायक है, दर्शन कहलाता है। ये दर्शन परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर की इच्छा और परमेश्वर के कार्य के लक्ष्य और महत्व हैं; वे सब मनुष्य के लाभ के लिए हैं। अभ्यास का तात्पर्य उससे है, जो मनुष्य द्वारा किया जाना चाहिए, जो परमेश्वर का अनुसरण करने वाले प्राणियों द्वारा किया जाना चाहिए, और यह मनुष्य का कर्तव्य भी है। जो मनुष्य को करना चाहिए, वह कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसे मनुष्य द्वारा बिलकुल आरंभ से ही समझ लिया गया था, बल्कि ये वे अपेक्षाएँ हैं जो परमेश्वर अपने कार्य के दौरान मनुष्य से करता है। जैसे-जैसे परमेश्वर कार्य करता जाता है, ये अपेक्षाएँ धीरे-धीरे अधिक गहरी और अधिक उन्नत होती जाती हैं। उदाहरण के लिए, व्यवस्था के युग के दौरान मनुष्य को व्यवस्था का पालन करना था, और अनुग्रह के युग के दौरान मनुष्य को सलीब को सहना था। राज्य का युग भिन्न है : इसमें मनुष्य से की जाने वाली अपेक्षाएँ व्यवस्था के युग और अनुग्रह के युग के दौरान की गई अपेक्षाओं से ऊँची हैं। जैसे-जैसे दर्शन अधिक उन्नत होते जाते हैं, मनुष्य से अपेक्षाएँ भी पहले से अधिक उन्नत, और पहले से अधिक स्पष्ट तथा अधिक वास्तविक होती जाती हैं। इसी प्रकार, दर्शन भी उत्तरोत्तर वास्तविक होते जाते हैं। ये अनेक वास्तविक दर्शन न केवल परमेश्वर के प्रति मनुष्य की आज्ञाकारिता के लिए सहायक हैं, बल्कि इससे भी अधिक, परमेश्वर के बारे में उसके ज्ञान के लिए भी सहायक हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 153

पिछले युगों की तुलना में राज्य के युग के दौरान परमेश्वर का कार्य अधिक व्यावहारिक, मनुष्य के सार और उसके स्वभाव में परिवर्तनों पर अधिक निर्देशित, और उन सभी के लिए स्वयं परमेश्वर की गवाही देने हेतु अधिक समर्थ है, जो उसका अनुसरण करते हैं। दूसरे शब्दों में, राज्य के युग के दौरान जब परमेश्वर कार्य करता है, तो वह मनुष्य को अतीत के किसी भी समय की तुलना में स्वयं को अधिक दिखाता है, जिसका अर्थ है कि वे दर्शन, जो मनुष्य को जानने चाहिए, किसी भी पिछले युग की तुलना में अधिक ऊँचे हैं। चूँकि मनुष्यों के बीच परमेश्वर का कार्य अभूतपूर्व क्षेत्र में प्रवेश कर चुका है, इसलिए राज्य के युग के दौरान मनुष्य द्वारा जाने गए दर्शन संपूर्ण प्रबंधन कार्य में सर्वोच्च हैं। परमेश्वर का कार्य अभूतपूर्व क्षेत्र में प्रवेश कर चुका है, इसलिए मनुष्य द्वारा ज्ञात किए जाने वाले दर्शन सभी दर्शनों में सर्वोच्च बन गए हैं, और इसके परिणामस्वरूप मनुष्य का अभ्यास भी किसी भी पिछले युग की तुलना में उच्चतर है, क्योंकि मनुष्य का अभ्यास दर्शनों के साथ कदम मिलाते हुए बदलता जाता है, और दर्शनों की परिपूर्णता मनुष्य से की जाने वाली अपेक्षाओं की परिपूर्णता को भी चिह्नित करती है। जैसे ही परमेश्वर का संपूर्ण प्रबंधन रुकता है, वैसे ही मनुष्य का अभ्यास भी रुक जाता है, और परमेश्वर के कार्य के बिना मनुष्य के पास अतीत के समयों के सिद्धांत का पालन करने के सिवाय कोई विकल्प नहीं होगा, या फिर उसके पास मुड़ने की कोई जगह नहीं होगी। नए दर्शनों के बिना मनुष्य द्वारा कोई नया अभ्यास नहीं किया जाएगा; संपूर्ण दर्शनों के बिना मनुष्य द्वारा कोई परिपूर्ण अभ्यास नहीं किया जाएगा; उच्चतर दर्शनों के बिना मनुष्य द्वारा कोई उच्चतर अभ्यास नहीं किया जाएगा। मनुष्य का अभ्यास परमेश्वर के पदचिह्नों के साथ-साथ बदलता जाता है, और उसी प्रकार मनुष्य का ज्ञान और अनुभव भी परमेश्वर के कार्य के साथ-साथ बदलता जाता है। मनुष्य चाहे कितना भी सक्षम हो, वह फिर भी परमेश्वर से अलग नहीं हो सकता, और यदि परमेश्वर एक क्षण के लिए भी कार्य करना बंद कर दे, तो मनुष्य तुरंत ही उसके कोप से मर जाएगा। मनुष्य के पास घमंड करने लायक कुछ भी नहीं है, क्योंकि आज मनुष्य का ज्ञान कितना ही ऊँचा क्यों न हो, उसके अनुभव कितने ही गहन क्यों न हों, वह परमेश्वर के कार्य से अलग नहीं किया जा सकता—क्योंकि मनुष्य का अभ्यास, और जो उसे परमेश्वर के प्रति अपने विश्वास में खोजना चाहिए वह, दर्शनों से अलग नहीं किए जा सकते। परमेश्वर के कार्य के प्रत्येक उदाहरण में ऐसे दर्शन हैं, जिन्हें मनुष्य को जानना चाहिए, और इनके बाद, मनुष्य से उचित अपेक्षाएँ की जाती हैं। नींव के रूप में इन दर्शनों के बिना मनुष्य न तो अभ्यास में समर्थ होगा, और न ही वह दृढ़तापूर्वक परमेश्वर का अनुसरण करने में समर्थ होगा। यदि मनुष्य परमेश्वर को नहीं जानता या परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझता, तो वह जो कुछ भी करता है, वह सब व्यर्थ है, और वह परमेश्वर द्वारा अनुमोदित किए जाने के योग्य नहीं है। मनुष्य की प्रतिभा कितनी भी समृद्ध क्यों न हों, वह फिर भी परमेश्वर के कार्य तथा परमेश्वर के मार्गदर्शन से अलग नहीं किया जा सकता। भले ही मनुष्य के कार्य कितने भी अच्छे क्यों न हों, या वह कितने भी कार्य क्यों न करे, फिर भी वे परमेश्वर के कार्य का स्थान नहीं ले सकते। और इसलिए, किसी भी परिस्थिति में मनुष्य का अभ्यास दर्शनों से अलग नहीं किया जा सकता। जो नए दर्शनों को स्वीकार नहीं करते, उनके पास कोई नया अभ्यास नहीं होता। उनके अभ्यास का सत्य के साथ कोई संबंध नहीं होता, क्योंकि वे सिद्धांत का पालन करते हैं और मृत व्यवस्था को बनाए रखते हैं; उनके पास नए दर्शन बिलकुल नहीं होते, और परिणामस्वरूप, वे नए युग से कुछ भी अभ्यास में नहीं लाते। उन्होंने दर्शनों को गँवा दिया है, और ऐसा करके उन्होंने पवित्र आत्मा के कार्य को भी गँवा दिया है, और उन्होंने सत्य को गँवा दिया है। जो लोग सत्य से विहीन हैं, वे बेहूदगी की संतति हैं, वे शैतान के मूर्त रूप हैं। भले ही कोई किसी भी प्रकार का व्यक्ति क्यों न हो, वह परमेश्वर के कार्य के दर्शनों से रहित नहीं हो सकता, और पवित्र आत्मा की उपस्थिति से वंचित नहीं हो सकता; जैसे ही व्यक्ति दर्शनों को गँवा देता है, वह तुरंत अधोलोक में पतित हो जाता है और अंधकार के बीच रहता है। दर्शनों से विहीन लोग वे लोग हैं जो परमेश्वर का अनुसरण मूर्खतापूर्वक करते हैं, वे वो लोग हैं जो पवित्र आत्मा के कार्य से रहित हैं, और वे नरक में रह रहे हैं। ऐसे लोग सत्य की खोज नहीं करते, बल्कि परमेश्वर के नाम को एक तख़्ती के रूप में लटकाए रहते हैं। जो लोग पवित्र आत्मा के कार्य को नहीं जानते, जो देहधारी परमेश्वर को नहीं जानते, जो परमेश्वर के प्रबंधन की संपूर्णता में कार्य के तीन चरणों को नहीं जानते—वे दर्शनों को नहीं जानते, और इसलिए वे सत्य से रहित हैं। और क्या जो लोग सत्य को धारण नहीं करते, वे सभी कुकर्मी नहीं हैं? जो सत्य को अभ्यास में लाने के इच्छुक हैं, जो परमेश्वर के ज्ञान को खोजने के इच्छुक हैं, और जो सच में परमेश्वर के साथ सहयोग करते हैं, वे ऐसे लोग हैं जिनके लिए दर्शन नींव के रूप में कार्य करते हैं। उन्हें परमेश्वर द्वारा अनुमोदित किया जाता है, क्योंकि वे परमेश्वर के साथ सहयोग करते हैं, और यह सहयोग ही है, जिसे मनुष्य द्वारा अभ्यास में लाया जाना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 154

दर्शनों में अभ्यास के अनेक मार्ग समाविष्ट हैं। मनुष्य से की गई व्यावहारिक माँगें भी दर्शनों के भीतर समाविष्ट होती हैं, जैसे परमेश्वर का कार्य समाविष्ट होता है, जिसे मनुष्य को जानना चाहिए। अतीत में, विशेष सभाओं या विशाल सभाओं के दौरान, जो विभिन्न स्थानों पर होती थीं, अभ्यास के मार्ग के केवल एक पहलू के बारे में ही बोला जाता था। इस प्रकार का अभ्यास वह था, जिसे अनुग्रह के युग के दौरान अभ्यास में लाया जाना था, और जिसका परमेश्वर के ज्ञान से शायद ही कोई संबंध था, क्योंकि अनुग्रह के युग का दर्शन केवल यीशु के सलीब पर चढ़ने का दर्शन था, और उससे बड़े कोई दर्शन नहीं थे। मनुष्य से सलीब पर चढ़ने के माध्यम से मानवजाति के छुटकारे के उसके कार्य से अधिक कुछ जानना अपेक्षित नहीं था, और इसलिए अनुग्रह के युग के दौरान मनुष्य के जानने के लिए कोई अन्य दर्शन नहीं थे। इस तरह, मनुष्य के पास परमेश्वर का सिर्फ थोड़ा-सा ही ज्ञान था, और यीशु के प्रेम और करुणा के ज्ञान के अलावा उसके लिए अभ्यास में लाने हेतु केवल कुछ साधारण और दयनीय चीजें ही थीं, ऐसी चीज़ें जो आज से एकदम अलग थीं। अतीत में, मनुष्य की सभा भले ही किसी भी आकार की रही हो, मनुष्य परमेश्वर के कार्य के व्यावहारिक ज्ञान के बारे में बात करने में असमर्थ था, और कोई भी स्पष्ट रूप से यह कहने में समर्थ तो बिलकुल भी नहीं था कि मनुष्य के लिए प्रवेश करने हेतु अभ्यास का सबसे उचित मार्ग कौन-सा है। मनुष्य ने सहनशीलता और धैर्य की नींव में मात्र कुछ सरल विवरण जोड़े; उसके अभ्यास के सार में कोई भी परिवर्तन नहीं आया, क्योंकि उसी युग के भीतर परमेश्वर ने कोई नया कार्य नहीं किया, और मनुष्य से उसने केवल सहनशीलता और धैर्य की, या सलीब वहन करने की ही अपेक्षाएँ कीं। ऐसे अभ्यासों के अलावा, यीशु के सलीब पर चढ़ने की तुलना में कोई ऊँचे दर्शन नहीं थे। अतीत में अन्य दर्शनों का कोई उल्लेख नहीं था, क्योंकि परमेश्वर ने बहुत अधिक कार्य नहीं किया था और उसने मनुष्य से केवल सीमित माँगें ही की थीं। इस तरह से, मनुष्य ने चाहे कुछ भी किया हो, वह इन सीमाओं का अतिक्रमण करने में अक्षम था, ऐसी सीमाएँ जो मनुष्य द्वारा अभ्यास में लाने हेतु मात्र कुछ सरल और सतही चीज़ें थीं। आज मैं अन्य दर्शनों की बात करता हूँ, क्योंकि आज अधिक कार्य किया गया है, कार्य जो व्यवस्था के युग और अनुग्रह के युग से कई गुना अधिक है। मनुष्य से अपेक्षाएँ भी अतीत के युगों की तुलना में कई गुना ऊँची हैं। यदि मनुष्य ऐसे कार्य को पूर्ण रूप से जानने में अक्षम है, तो इसका कोई बड़ा महत्व नहीं होगा; ऐसा कहा जा सकता है कि यदि मनुष्य इसमें अपने पूरे जीवनकाल की कोशिशें नहीं लगाता, तो उसे ऐसे कार्य को पूरी तरह से समझने में कठिनाई होगी। विजय के कार्य में केवल अभ्यास के मार्ग के बारे में बात करना मनुष्य पर विजय को असंभव बना देगा। मनुष्य से कोई अपेक्षा किए बिना केवल दर्शनों की बात करना भी मनुष्य पर विजय को असंभव कर देगा। यदि अभ्यास के मार्ग के अलावा और कुछ नहीं बोला जाता, तो मनुष्य के मर्म पर प्रहार करना या मनुष्य की धारणाओं को दूर करना असंभव होता, और इसलिए भी मनुष्य पर पूर्ण रूप से विजय पाना असंभव होता। दर्शन मनुष्य पर विजय के प्रमुख साधन हैं, किंतु यदि दर्शनों के अलावा अभ्यास का कोई मार्ग नहीं होता, तो मनुष्य के पास अनुसरण करने का कोई मार्ग नहीं होता, और प्रवेश का कोई साधन तो बिलकुल नहीं होता। आरंभ से लेकर अंत तक परमेश्वर के कार्य का सिद्धांत यह रहा है : दर्शनों में वह बात है, जिसे अभ्यास में लाया जा सकता है, इसलिए अभ्यास के अतिरिक्त दर्शन भी हैं। मनुष्य के जीवन और उसके स्वभाव दोनों में होने वाले परिवर्तनों की मात्रा दर्शनों में होने वाले परिवर्तनों के साथ होती है। यदि मनुष्य केवल अपने प्रयासों पर ही निर्भर रहता, तो उसके लिए बड़ी मात्रा में परिवर्तन हासिल करना असंभव होता। दर्शन स्वयं परमेश्वर के कार्य और परमेश्वर के प्रबंधन के बारे में बोलते हैं। अभ्यास मनुष्य के अभ्यास के मार्ग को, और मनुष्य के अस्तित्व के मार्ग को संदर्भित करता है; परमेश्वर के संपूर्ण प्रबंधन में दर्शनों और अभ्यास के बीच का संबंध परमेश्वर और मनुष्य के बीच का संबंध है। यदि दर्शनों को हटा दिया जाता, या यदि अभ्यास के बारे में बात किए बिना ही उन्हें बोला जाता, या यदि केवल दर्शन ही होते और मनुष्य के अभ्यास का उन्मूलन कर दिया जाता, तो ऐसी चीज़ों को परमेश्वर का प्रबंधन नहीं माना जा सकता था, और ऐसा तो बिलकुल भी नहीं कहा जा सकता था कि परमेश्वर का कार्य मानवजाति के लिए है; इस तरह से, न केवल मनुष्य के कर्तव्य को हटा दिया जाता, बल्कि यह परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य का खंडन भी होता। यदि, आरंभ से लेकर अंत तक, परमेश्वर के कार्य को सम्मिलित किए बिना, मनुष्य से मात्र अभ्यास करने की अपेक्षा की जाती, और इसके अतिरिक्त, यदि मनुष्य से परमेश्वर के कार्य को जानने की अपेक्षा न की जाती, तो ऐसे कार्य को परमेश्वर का प्रबंधन बिलकुल भी नहीं कहा जा सकता था। यदि मनुष्य परमेश्वर को न जानता, और परमेश्वर की इच्छा से अनजान होता, और आँख मूँदकर अस्पष्ट और अमूर्त तरीके से अपने अभ्यास को कार्यान्वित करता, तो वह कभी भी पूरी तरह से योग्य प्राणी नहीं बनता। और इसलिए ये दोनों चीज़ें अनिवार्य हैं। यदि केवल परमेश्वर का कार्य ही होता, अर्थात् यदि केवल दर्शन ही होते और मनुष्य द्वारा कोई सहयोग या अभ्यास न होता, तो ऐसी चीज़ों को परमेश्वर का प्रबंधन नहीं कहा जा सकता था। यदि केवल मनुष्य का अभ्यास और प्रवेश ही होता, तो भले ही वह मार्ग कितना भी ऊँचा होता जिसमें मनुष्य ने प्रवेश किया होता, वह भी अस्वीकार्य होता। मनुष्य के प्रवेश को कार्य और दर्शनों के साथ कदम मिलाते हुए धीरे-धीरे परिवर्तित होना चाहिए; वह सनक के आधार पर नहीं बदल सकता। मनुष्य के अभ्यास के सिद्धांत स्वतंत्र और अनियंत्रित नहीं हैं, बल्कि निश्चित सीमाओं के अंतर्गत निर्धारित हैं। वे सिद्धांत कार्य के दर्शनों के साथ कदम मिलाते हुए परिवर्तित होते हैं। इसलिए परमेश्वर का प्रबंधन अंतत: परमेश्वर के कार्य और मनुष्य के अभ्यास में घटित होता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 155

प्रबंधन-कार्य केवल मानवजाति के कारण ही घटित हुआ, जिसका अर्थ है कि वह केवल मानवजाति के अस्तित्व के कारण ही उत्पन्न हुआ। मानवजाति से पहले, या शुरुआत में, जब स्वर्ग और पृथ्वी तथा समस्त वस्तुओं का सृजन किया गया था, कोई प्रबंधन नहीं था। यदि, परमेश्वर के संपूर्ण कार्य में, मनुष्य के लिए लाभकारी कोई अभ्यास न होता, अर्थात् यदि परमेश्वर भ्रष्ट मानवजाति से उचित अपेक्षाएँ न करता (यदि परमेश्वर द्वारा किए गए कार्य में मनुष्य के अभ्यास हेतु कोई उचित मार्ग न होता), तो इस कार्य को परमेश्वर का प्रबंधन नहीं कहा जा सकता था। यदि परमेश्वर के कार्य की संपूर्णता में केवल भ्रष्ट मानवजाति को यह बताना शामिल होता कि वह किस प्रकार अपने अभ्यास को करे, और परमेश्वर अपने किसी भी उद्यम को कार्यान्वित न करता, और अपनी सर्वशक्तिमत्ता या बुद्धि का लेशमात्र भी प्रदर्शन न करता, तो मनुष्य से परमेश्वर की अपेक्षाएँ चाहे कितनी भी ऊँची क्यों न होतीं, चाहे परमेश्वर कितने भी लंबे समय तक मनुष्यों के बीच क्यों न रहता, मनुष्य परमेश्वर के स्वभाव के बारे में कुछ भी नहीं जानता; यदि ऐसा होता, तो इस प्रकार का कार्य परमेश्वर का प्रबंधन कहलाने के योग्य बिलकुल भी नहीं होता। सरल शब्दों में कहें तो, परमेश्वर के प्रबंधन का कार्य, और परमेश्वर के मार्गदर्शन के अंतर्गत उन लोगों द्वारा किया गया संपूर्ण कार्य, जिन्हें परमेश्वर द्वारा प्राप्त कर लिया गया है, ही परमेश्वर द्वारा किया गया कार्य है। ऐसे कार्य को संक्षेप में प्रबंधन कहा जा सकता है। दूसरे शब्दों में, मनुष्यों के बीच परमेश्वर का कार्य, और साथ ही परमेश्वर का अनुसरण करने वाले सभी लोगों द्वारा उसका सहयोग सम्मिलित रूप से प्रबंधन कहा जाता है। यहाँ, परमेश्वर का कार्य दर्शन कहलाता है, और मनुष्य का सहयोग अभ्यास कहलाता है। परमेश्वर का कार्य जितना अधिक ऊँचा होता है (अर्थात् दर्शन जितने अधिक ऊँचे होते हैं), परमेश्वर का स्वभाव मनुष्य के लिए उतना ही अधिक स्पष्ट किया जाता है, उतना ही अधिक वह मनुष्य की धारणाओं के विपरीत होता है, और उतना ही ऊँचा मनुष्य का अभ्यास और सहयोग हो जाता है। मनुष्य से अपेक्षाएँ जितनी अधिक ऊँची होती हैं, उतना ही अधिक परमेश्वर का कार्य मनुष्य की धारणाओं के विपरीत होता है, जिसके परिणामस्वरूप मनुष्य के परीक्षण और वे मानक भी, जिन्हें पूरे करने की उससे अपेक्षा की जाती है, अधिक ऊँचे हो जाते हैं। इस कार्य के समापन पर समस्त दर्शनों को पूरा कर लिया गया होगा, और वह, जिसे अभ्यास में लाने की मनुष्य से अपेक्षा की जाती है, परिपूर्णता की पराकाष्ठा पर पहुँच चुका होगा। यह वह समय भी होगा, जब प्रत्येक प्राणी को उसके प्रकार के अनुसार वर्गीकृत किया जाएगा, क्योंकि जिस बात को जानने की मनुष्य से अपेक्षा की जाती है, उसे मनुष्य को दिखाया जा चुका होगा। इसलिए, जब दर्शन सफलता के अपने चरम बिंदु पर पहुँच जाएँगे, तो कार्य तदनुसार अपने अंत तक पहुँच जाएगा, और मनुष्य का अभ्यास भी अपने चरम पर पहुँच जाएगा। मनुष्य का अभ्यास परमेश्वर के कार्य पर आधारित है, और परमेश्वर का प्रबंधन केवल मनुष्य के अभ्यास और सहयोग के कारण ही पूरी तरह से व्यक्त होता है। मनुष्य परमेश्वर के कार्य की प्रदर्शन-वस्तु और परमेश्वर के संपूर्ण प्रबंधन-कार्य का लक्ष्य है, और साथ ही परमेश्वर के संपूर्ण प्रबंधन का उत्पाद भी है। यदि परमेश्वर ने मनुष्य के सहयोग के बिना अकेले ही कार्य किया होता, तो ऐसा कुछ भी न होता, जो उसके संपूर्ण कार्य को स्फटिक की तरह ठोस बनाने का कार्य करता, और तब परमेश्वर के प्रबंधन का जरा-सा भी महत्व न होता। अपने कार्य के अतिरिक्त, केवल अपने कार्य को व्यक्त करने, और अपनी सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि को प्रमाणित करने के लिए उपयुक्त लक्ष्य चुनकर ही परमेश्वर अपने प्रबंधन का उद्देश्य हासिल कर सकता है, और शैतान को पूरी तरह से हराने के लिए इस संपूर्ण कार्य का उपयोग करने का उद्देश्य प्राप्त कर सकता है। इसलिए मनुष्य परमेश्वर के प्रबंधन के कार्य का एक अपरिहार्य अंग है, और मनुष्य ही वह एकमात्र प्राणी है जो परमेश्वर के प्रबंधन को सफल करवा सकता है और उसके चरम उद्देश्य को प्राप्त करवा सकता है; मनुष्य के अतिरिक्त अन्य कोई जीवन-रूप ऐसी भूमिका नहीं निभा सकता। यदि मनुष्य को परमेश्वर के प्रबंधन-कार्य का सच्चा स्फटिकवत् ठोस रूप बनना है, तो भ्रष्ट मानवजाति की अवज्ञा को पूरी तरह से दूर करना होगा। इसके लिए आवश्यक है कि मनुष्य को विभिन्न समयों के लिए उपयुक्त अभ्यास दिया जाए और परमेश्वर मनुष्यों के बीच तदनुरूप कार्य करे। केवल इसी तरह से अंततः ऐसे लोगों का समूह प्राप्त किया जाएगा, जो प्रबंधन-कार्य का स्फटिकवत् ठोस रूप हैं। मनुष्यों के बीच परमेश्वर का कार्य सिर्फ अकेले परमेश्वर के कार्य के माध्यम से स्वयं परमेश्वर की गवाही नहीं दे सकता; हासिल किए जाने के लिए ऐसी गवाही को जीवित मनुष्यों की भी आवश्यकता होती है जो उसके कार्य के लिए उपयुक्त हों। परमेश्वर पहले इन लोगों पर कार्य करेगा, तब उनके माध्यम से उसका कार्य व्यक्त होगा, और इस प्रकार उसकी इच्छा की ऐसी गवाही प्राणियों के बीच दी जाएगी, और इसमें परमेश्वर अपने कार्य के लक्ष्य को प्राप्त कर लेगा। परमेश्वर शैतान को पराजित करने के लिए अकेले कार्य नहीं करता, क्योंकि वह समस्त प्राणियों के बीच अपने लिए सीधे गवाही नहीं दे सकता। यदि वह ऐसा करता, तो मनुष्य को पूर्ण रूप से आश्वस्त करना असंभव होता, इसलिए मनुष्य को जीतने के लिए परमेश्वर को उस पर कार्य करना होगा, केवल तभी वह समस्त प्राणियों के बीच गवाही प्राप्त करने में समर्थ होगा। यदि मनुष्य के सहयोग के बिना सिर्फ परमेश्वर ही कार्य करता, या मनुष्य को सहयोग करने की आवश्यकता न होती, तो मनुष्य कभी परमेश्वर के स्वभाव को जानने में समर्थ न होता, और वह सदा के लिए परमेश्वर की इच्छा से अनजान रहता; परमेश्वर के कार्य को तब परमेश्वर के प्रबंधन का कार्य न कहा जा सकता। यदि परमेश्वर के कार्य को समझे बिना केवल मनुष्य स्वयं ही प्रयास, खोज और कठिन परिश्रम करता, तो मनुष्य चालबाजी कर रहा होता। पवित्र आत्मा के कार्य के बिना मनुष्य जो कुछ करता है, वह शैतान का होता है, वह विद्रोही और कुकर्मी होता है; भ्रष्ट मानवजाति द्वारा जो कुछ किया जाता है, उस सबमें शैतान प्रदर्शित होता है, और उसमें ऐसा कुछ भी नहीं होता जो परमेश्वर के साथ संगत हो, और जो कुछ मनुष्य करता है, वह शैतान की अभिव्यक्ति होता है। जो कुछ भी कहा गया है, उसमें से कुछ भी दर्शनों और अभ्यास से अलग नहीं है। दर्शनों की बुनियाद पर मनुष्य अभ्यास, और आज्ञाकारिता का मार्ग पाता है, ताकि वह अपनी धारणाओं को एक ओर रख सके और वे चीज़ें प्राप्त कर सके, जो अतीत में उसके पास नहीं थीं। परमेश्वर अपेक्षा करता है कि मनुष्य उसके साथ सहयोग करे, कि मनुष्य उसकी आवश्यकताओं के प्रति पूरी तरह से समर्पित हो जाए, और मनुष्य स्वयं परमेश्वर द्वारा किए गए कार्य को देखने, परमेश्वर के सर्वशक्तिमान सामर्थ्य का अनुभव करने और परमेश्वर के स्वभाव को जानने की माँग करता है। संक्षेप में, ये ही परमेश्वर के प्रबंधन हैं। मनुष्य के साथ परमेश्वर का मिलन ही प्रबंधन है, और यह महानतम प्रबंधन है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 156

जिसमें दर्शन शामिल होते हैं, वह मुख्यतः स्वयं परमेश्वर के कार्य को संदर्भित करता है, और जिसमें अभ्यास शामिल होता है, वह मनुष्य द्वारा किया जाना चाहिए और उसका परमेश्वर से कोई संबंध नहीं है। परमेश्वर का कार्य स्वयं परमेश्वर द्वारा पूरा किया जाता है, और मनुष्य का अभ्यास स्वयं मनुष्य द्वारा प्राप्त किया जाता है। जो स्वयं परमेश्वर द्वारा किया जाना चाहिए, उसे मनुष्य द्वारा किए जाने की आवश्यकता नहीं है, और जिसका मनुष्य द्वारा अभ्यास किया जाना चाहिए, वह परमेश्वर से संबंधित नहीं है। परमेश्वर का कार्य उसकी अपनी सेवकाई है और उसका मनुष्य से कोई संबंध नहीं है। यह कार्य मनुष्य द्वारा किए जाने की आवश्यकता नहीं है, और, इतना ही नहीं, मनुष्य परमेश्वर द्वारा किए जाने वाले कार्य को करने में असमर्थ होगा। जिसका अभ्यास मनुष्य द्वारा किए जाने की आवश्यकता है, उसे मनुष्य द्वारा किया जाना चाहिए, चाहे वह उसके जीवन का बलिदान हो, या गवाही देने के लिए उसे शैतान के सुपुर्द करना हो—ये सब मनुष्य द्वारा पूरे किए जाने चाहिए। स्वयं परमेश्वर वह समस्त कार्य पूरा करता है, जो उसे पूरा करना चाहिए, और जो मनुष्य को करना चाहिए, वह मनुष्य को दिखाया जाता है, और शेष कार्य मनुष्य के करने के लिए छोड़ दिया जाता है। परमेश्वर अतिरिक्त कार्य नहीं करता। वह केवल वही कार्य करता है जो उसकी सेवकाई के अंतर्गत है, और वह मनुष्य को केवल मार्ग दिखाता है, और केवल मार्ग को खोलने का कार्य करता है, और मार्ग प्रशस्त करने का कार्य नहीं करता; इसे सभी को समझ लेना चाहिए। सत्य को अभ्यास में लाने का अर्थ है परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाना, और यह सब मनुष्य का कर्तव्य है, और यह वह है जिसे मनुष्य द्वारा किया जाना चाहिए, और इसका परमेश्वर के साथ कोई लेना-देना नहीं है। यदि मनुष्य माँग करता है कि परमेश्वर भी सत्य में उसी तरह से यंत्रणा और शुद्धिकरण सहन करे जैसे मनुष्य सहन करता है, तो मनुष्य अवज्ञाकारी हो रहा है। परमेश्वर का कार्य अपनी सेवकाई करना है, और मनुष्य का कर्तव्य बिना किसी प्रतिरोध के परमेश्वर के समस्त मार्गदर्शन का पालन करना है। परमेश्वर चाहे किसी भी ढंग से कार्य करे या रहे, मनुष्य को वह करना उचित है, जो उसे प्राप्त करना चाहिए। केवल स्वयं परमेश्वर ही मनुष्य से अपेक्षाएँ कर सकता है, अर्थात् केवल स्वयं परमेश्वर ही मनुष्य से अपेक्षाएँ करने के लिए उपयुक्त है। मनुष्य के पास कोई विकल्प नहीं होना चाहिए और उसे पूरी तरह से समर्पण और अभ्यास करने के सिवा कुछ नहीं करना चाहिए; यही वह समझ है, जो मनुष्य में होनी चाहिए। जब वह कार्य पूरा हो जाता है जो स्वयं परमेश्वर द्वारा किया जाना चाहिए, तो मनुष्य से अपेक्षा की जाती है कि वह कदम-दर-कदम उसका अनुभव करे। यदि, अंत में, जब परमेश्वर का संपूर्ण प्रबंधन पूरा हो जाता है, तब भी मनुष्य वह नहीं करता, जिसकी परमेश्वर द्वारा अपेक्षा की गई है, तो मनुष्य को दंडित किया जाना चाहिए। यदि मनुष्य परमेश्वर की अपेक्षाएँ पूरी नहीं करता, तो यह उसकी अवज्ञा के कारण है; इसका अर्थ यह नहीं है कि परमेश्वर ने अपना कार्य पर्याप्त पूर्णता से नहीं किया है। वे सभी, जो परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में नहीं ला सकते, वे जो परमेश्वर की अपेक्षाएँ पूरी नहीं कर सकते, और वे जो अपनी वफादारी नहीं दे सकते और अपना कर्तव्य पूरा नहीं कर सकते, उन सभी को दंड दिया जाएगा। आज तुम लोगों से जो कुछ हासिल करने की अपेक्षा की जाती है, वे अतिरिक्त माँगें नहीं, बल्कि मनुष्य का कर्तव्य है, जिसे सभी लोगों द्वारा किया जाना चाहिए। यदि तुम लोग अपना कर्तव्य तक निभाने में या उसे भली-भाँति करने में असमर्थ हो, तो क्या तुम लोग अपने ऊपर मुसीबतें नहीं ला रहे हो? क्या तुम लोग मृत्यु को आमंत्रित नहीं कर रहे हो? कैसे तुम लोग अभी भी भविष्य और संभावनाओं की आशा कर सकते हो? परमेश्वर का कार्य मानवजाति के लिए किया जाता है, और मनुष्य का सहयोग परमेश्वर के प्रबंधन के लिए दिया जाता है। जब परमेश्वर वह सब कर लेता है जो उसे करना चाहिए, तो मनुष्य से अपेक्षा की जाती है कि वह अपने अभ्यास में उदार हो और परमेश्वर के साथ सहयोग करे। परमेश्वर के कार्य में मनुष्य को कोई कसर बाकी नहीं रखनी चाहिए, उसे अपनी वफादारी प्रदान करनी चाहिए, और अनगिनत धारणाओं में सलंग्न नहीं होना चाहिए, या निष्क्रिय बैठकर मृत्यु की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। परमेश्वर मनुष्य के लिए स्वयं को बलिदान कर सकता है, तो क्यों मनुष्य परमेश्वर को अपनी वफादारी प्रदान नहीं कर सकता? परमेश्वर मनुष्य के प्रति एक हृदय और मन वाला है, तो क्यों मनुष्य थोड़ा-सा सहयोग प्रदान नहीं कर सकता? परमेश्वर मानवजाति के लिए कार्य करता है, तो क्यों मनुष्य परमेश्वर के प्रबंधन के लिए अपना कुछ कर्तव्य पूरा नहीं कर सकता? परमेश्वर का कार्य इतनी दूर तक आ गया है, पर तुम लोग अभी भी देखते ही हो किंतु करते नहीं, सुनते ही हो किंतु हिलते नहीं। क्या ऐसे लोग तबाही के लक्ष्य नहीं हैं? परमेश्वर पहले ही अपना सर्वस्व मनुष्य को अर्पित कर चुका है, तो क्यों आज मनुष्य ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाने में असमर्थ है? परमेश्वर के लिए उसका कार्य उसकी पहली प्राथमिकता है, और उसके प्रबंधन का कार्य सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। मनुष्य के लिए परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाना और परमेश्वर की अपेक्षाएँ पूरी करना उसकी पहली प्राथमिकता है। इसे तुम सभी लोगों को समझ लेना चाहिए। तुम लोगों से कहे गए वचन तुम लोगों के सार के बिलकुल मूल तक पहुँच गए हैं, और परमेश्वर का कार्य अभूतपूर्व क्षेत्र में प्रवेश कर चुका है। अनेक लोग अभी भी इस मार्ग की सच्चाई या झूठ को नहीं समझते; वे अभी भी प्रतीक्षा कर रहे हैं और देख रहे हैं, और अपना कर्तव्य नहीं निभा रहे। इसके बजाय, वे परमेश्वर द्वारा कहे और किए गए प्रत्येक वचन और कार्य को जाँचते हैं, वे इस बात पर ध्यान केंद्रित करते हैं कि वह क्या खाता है और पहनता है, और उनकी धारणाएँ और भी अधिक दुःखद हो जाती हैं। क्या ऐसे लोग बेवजह बात का बतंगड़ नहीं बना रहे हैं? ऐसे लोग उस तरह के कैसे हो सकते हैं, जो परमेश्वर को खोजते हैं? और वे लोग उस तरह के कैसे हो सकते हैं, जो परमेश्वर के प्रति समर्पण करने का इरादा रखते हैं? वे अपनी वफादारी और अपने कर्तव्य को अपने मस्तिष्क में पीछे रख देते हैं, और इसके बजाय परमेश्वर के पते-ठिकाने पर ध्यान केंद्रित करते हैं। वे एक उपद्रव हैं! यदि मनुष्य ने वह सब-कुछ समझ लिया है जो उसे समझना चाहिए, और वह सब अभ्यास में ला चुका है जो उसे अभ्यास में लाना चाहिए, तो परमेश्वर निश्चित रूप से उसे अपने आशीष प्रदान करेगा, क्योंकि वह मनुष्य से जो अपेक्षा करता है, वह मनुष्य का कर्तव्य है, जिसे मनुष्य द्वारा किया जाना चाहिए। यदि मनुष्य यह समझने में असमर्थ है कि उसे क्या समझना चाहिए, और यदि वह उसे अभ्यास में लाने में असमर्थ है जिसे उसे अभ्यास में लाना चाहिए, तो उसे दंड दिया जाएगा। जो लोग परमेश्वर के साथ सहयोग नहीं करते, वे उसके प्रति शत्रुता रखते हैं, जो लोग नए कार्य को स्वीकार नहीं करते, वे उसके विरुद्ध हैं, भले ही वे ऐसा कुछ न करते हों, जो स्पष्ट रूप से उसके विरुद्ध हो। जो लोग परमेश्वर द्वारा अपेक्षित सत्य को अभ्यास में नहीं लाते, वे सब ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर के वचनों का जानबूझकर विरोध करते हैं और उसके प्रति अवज्ञाकारी हैं, भले ही ऐसे लोग पवित्र आत्मा के कार्य पर विशेष ध्यान देते हों। जो लोग परमेश्वर के वचनों का पालन और परमेश्वर के प्रति समर्पण नहीं करते, वे विद्रोही हैं, और वे परमेश्वर के विरोध में हैं। जो लोग अपना कर्तव्य नहीं निभाते हैं, वे वो लोग हैं जो परमेश्वर के साथ सहयोग नहीं करते, और जो लोग परमेश्वर के साथ सहयोग नहीं करते, वे वो लोग हैं जो पवित्र आत्मा के कार्य को स्वीकार नहीं करते।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 157

जब परमेश्वर का कार्य एक निश्चित बिंदु तक पहुँच जाता है, और उसका प्रबंधन एक निश्चित बिंदु पर पहुँच जाता है, तो जो लोग उसके हृदय के अनुरूप हैं, वे सब उसकी अपेक्षाएँ पूरी करने में सक्षम होते हैं। परमेश्वर अपने मानकों और मनुष्य की क्षमताओं के अनुसार मनुष्य से अपेक्षाएँ करता है। अपने प्रबंधन के बारे में बात करते हुए वह मनुष्य के लिए मार्ग भी बताता है, और मनुष्य को जीवित रहने के लिए एक मार्ग प्रदान करता है। परमेश्वर का प्रबंधन और मनुष्य का अभ्यास दोनों कार्य के एक ही चरण के होते हैं और उन्हें एक-साथ ही कार्यान्वित किया जाता है। परमेश्वर के प्रबंधन की बात मनुष्य के स्वभाव के परिवर्तनों से संबंध रखती है, और उस बारे में बात करती है जो मनुष्य द्वारा किया जाना चाहिए, और मनुष्य के स्वभाव के परिवर्तन परमेश्वर के कार्य से संबंध रखते हैं; ऐसा कोई समय नहीं होता जब इन दोनों को अलग किया जा सके। मनुष्य का अभ्यास कदम-दर-कदम बदल रहा है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि मनुष्य से परमेश्वर की अपेक्षाएँ भी बदल रही हैं, और परमेश्वर का कार्य हमेशा बदल रहा है और प्रगति कर रहा है। यदि मनुष्य का अभ्यास सिद्धांतों के जाल में उलझा रहता है, तो यह साबित करता है कि वह परमेश्वर के कार्य और मार्गदर्शन से वंचित है; यदि मनुष्य का अभ्यास कभी नहीं बदलता या गहराई तक नहीं जाता, तो यह साबित करता है कि मनुष्य का अभ्यास मनुष्य की इच्छानुसार किया जाता है, और वह सत्य का अभ्यास नहीं है; यदि मनुष्य के पास चलने के लिए कोई मार्ग नहीं है, तो वह पहले ही शैतान के हाथों में पड़ चुका है और शैतान द्वारा नियंत्रित होता है, जिसका अर्थ है कि वह दुष्ट आत्माओं द्वारा नियंत्रित है। यदि मनुष्य का अभ्यास अधिक गहराई तक नहीं जाता, तो परमेश्वर का कार्य विकास नहीं करेगा, और यदि परमेश्वर के कार्य में कोई बदलाव नहीं होता, तो मनुष्य का प्रवेश रुक जाएगा; यह अपरिहार्य है। परमेश्वर के संपूर्ण कार्य के दौरान यदि मनुष्य को सदैव यहोवा की व्यवस्था का पालन करना होता, तो परमेश्वर का कार्य प्रगति नहीं कर सकता था, और संपूर्ण युग का अंत करना तो बिलकुल भी संभव न होता। यदि मनुष्य हमेशा सलीब को पकड़े रहता और धैर्य और विनम्रता का अभ्यास करता रहता, तो परमेश्वर के कार्य का प्रगति करते रहना असंभव होता। छह हजार वर्षों का प्रबंधन ऐसे ही उन लोगों के बीच समाप्त नहीं किया जा सकता, जो केवल व्यवस्था का पालन करते हैं, या सिर्फ सलीब थामे रहते हैं और धैर्य और विनम्रता का अभ्यास करते हैं। इसके बजाय, परमेश्वर के प्रबंधन का संपूर्ण कार्य अंत के दिनों के उन लोगों के बीच समाप्त किया जाता है, जो परमेश्वर को जानते हैं, जिन्हें शैतान के चंगुल से छुड़ाया गया है, और जिन्होंने अपने आप को शैतान के प्रभाव से पूरी तरह से मुक्त कर लिया है। यह परमेश्वर के कार्य की अनिवार्य दिशा है। ऐसा क्यों कहा जाता है कि धार्मिक कलीसियाओं के लोगों का अभ्यास पुराना पड़ गया है? वह इसलिए, क्योंकि जिसका वे अभ्यास करते हैं, वह आज के कार्य से असंबद्ध है। अनुग्रह के युग में जिसका वे अभ्यास करते थे वह सही था, किंतु चूँकि युग गुज़र चुका है और परमेश्वर का कार्य बदल चुका है, इसलिए उनका अभ्यास धीरे-धीरे प्रचलन से बाहर हो गया है। उसे नए कार्य और नए प्रकाश ने पीछे छोड़ दिया है। अपनी मूल बुनियाद के आधार पर पवित्र आत्मा का कार्य कई कदम गहरी प्रगति कर चुका है। किंतु वे लोग अभी भी परमेश्वर के कार्य के मूल चरण पर अटके हुए हैं और अभी भी पुराने अभ्यासों और पुराने प्रकाश से चिपके हुए हैं। तीन या पाँच वर्षों में ही परमेश्वर का कार्य बहुत बदल सकता है, तो क्या 2,000 वर्षों के दौरान और भी अधिक बड़े रूपांतरण नहीं हुए होंगे? यदि मनुष्य के पास कोई नया प्रकाश या अभ्यास नहीं है, तो इसका अर्थ है कि वह पवित्र आत्मा के कार्य के साथ बना नहीं रहा है। यह मनुष्य की असफलता है; परमेश्वर के नए कार्य के अस्तित्व को इसलिए नहीं नकारा जा सकता कि जिन लोगों के पास पहले पवित्र आत्मा का कार्य था, वे आज भी प्रचलन से बाहर हो चुके अभ्यासों का पालन करते हैं। पवित्र आत्मा का कार्य हमेशा आगे बढ़ रहा है, और जो लोग पवित्र आत्मा की धारा में हैं, उन्हें भी अधिक गहरे जाना और कदम-दर-कदम बदलना चाहिए। उन्हें एक ही चरण पर रुक नहीं जाना चाहिए। जो लोग पवित्र आत्मा के कार्य को नहीं जानते, केवल वे ही परमेश्वर के मूल कार्य के बीच बने रहेंगे और पवित्र आत्मा के नए कार्य को स्वीकार नहीं करेंगे। जो लोग अवज्ञाकारी हैं, केवल वे ही पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त करने में अक्षम होंगे। यदि मनुष्य का अभ्यास पवित्र आत्मा के नए कार्य के साथ गति बनाए नहीं रखता, तो मनुष्य का अभ्यास निश्चित रूप से आज के कार्य से कटा हुआ है, और वह निश्चित रूप से आज के कार्य के साथ असंगत है। ऐसे पुराने लोग परमेश्वर की इच्छा पूरी करने में एकदम अक्षम होते हैं, और वे ऐसे लोग तो बिलकुल भी नहीं बन सकते, जो अंततः परमेश्वर की गवाही देंगे। इतना ही नहीं, संपूर्ण प्रबंधन-कार्य ऐसे लोगों के समूह के बीच समाप्त नहीं किया जा सकता। क्योंकि जिन लोगों ने किसी समय यहोवा की व्यवस्था थामी थी, और जिन्होंने कभी सलीब का दुःख सहा था, यदि वे अंत के दिनों के कार्य के चरण को स्वीकार नहीं कर सकते, तो जो कुछ भी उन्होंने किया, वह सब व्यर्थ और निष्फल होगा। पवित्र आत्मा के कार्य की स्पष्टतम अभिव्यक्ति अभी वर्तमान को गले लगाने में है, अतीत से चिपके रहने में नहीं। जो लोग आज के कार्य के साथ बने नहीं रहे हैं, और जो आज के अभ्यास से अलग हो गए हैं, वे वो लोग हैं जो पवित्र आत्मा के कार्य का विरोध करते हैं और उसे स्वीकार नहीं करते। ऐसे लोग परमेश्वर के वर्तमान कार्य की अवहेलना करते हैं। यद्यपि वे अतीत के प्रकाश को पकड़े रहते हैं, किंतु इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि वे पवित्र आत्मा के कार्य को नहीं जानते। मनुष्य के अभ्यास में परिवर्तनों के बारे में, अतीत और वर्तमान के बीच के अभ्यास की भिन्नताओं के बारे में, पूर्ववर्ती युग के दौरान किस प्रकार अभ्यास किया जाता था और आज किस प्रकार किया जाता है इस बारे में, यह सब बातचीत क्यों की गई है? मनुष्य के अभ्यास में ऐसे विभाजनों के बारे में हमेशा बात की जाती है, क्योंकि पवित्र आत्मा का कार्य लगातार आगे बढ़ रहा है, इसलिए मनुष्य के अभ्यास का निरंतर बदलना आवश्यक है। यदि मनुष्य एक ही चरण में अटका रहता है, तो यह प्रमाणित करता है कि वह परमेश्वर के नए कार्य और नए प्रकाश के साथ बने रहने में असमर्थ है; इससे यह प्रमाणित नहीं होता कि परमेश्वर की प्रबंधन-योजना नहीं बदली है। जो पवित्र आत्मा की धारा के बाहर हैं, वे सदैव सोचते हैं कि वे सही हैं, किंतु वास्तव में उनके भीतर परमेश्वर का कार्य बहुत पहले ही रुक गया है, और पवित्र आत्मा का कार्य उनमें अनुपस्थित है। परमेश्वर का कार्य बहुत पहले ही लोगों के एक अन्य समूह को हस्तांतरित हो गया था, ऐसे लोगों के समूह को, जिन पर वह अपने नए कार्य को पूरा करने का इरादा रखता है। चूँकि धर्म में मौजूद लोग परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार करने में अक्षम हैं और केवल अतीत के पुराने कार्य को ही पकड़े रहते हैं, इसलिए परमेश्वर ने इन लोगों को छोड़ दिया है, और वह अपना कार्य उन लोगों पर करता है जो इस नए कार्य को स्वीकार करते हैं। ये वे लोग हैं, जो उसके नए कार्य में सहयोग करते हैं, और केवल इसी तरह से उसका प्रबंधन पूरा हो सकता है। परमेश्वर का प्रबंधन सदैव आगे बढ़ रहा है, और मनुष्य का अभ्यास हमेशा ऊँचा हो रहा है। परमेश्वर सदैव कार्य कर रहा है, और मनुष्य हमेशा जरूरतमंद है, इस तरह से दोनों अपने चरम बिंदु पर पहुँच गए हैं, और परमेश्वर और मनुष्य का पूर्ण मिलन हो गया है। यह परमेश्वर के कार्य की पूर्णता की अभिव्यक्ति है, और यह परमेश्वर के संपूर्ण प्रबंधन का अंतिम परिणाम है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 158

परमेश्वर के कार्य के प्रत्येक चरण में मनुष्य से तद्नुरूपी अपेक्षाएँ भी होती हैं। जो लोग पवित्र आत्मा की धारा के भीतर हैं, वे सभी पवित्र आत्मा की उपस्थिति और अनुशासन के अधीन हैं, और जो पवित्र आत्मा की मुख्य धारा में नहीं हैं, वे शैतान के नियंत्रण में और पवित्र आत्मा के किसी भी कार्य से रहित हैं। जो लोग पवित्र आत्मा की धारा में हैं, वे वो लोग हैं जो परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार करते हैं और उसमें सहयोग करते हैं। यदि इस मुख्य धारा में मौजूद लोग सहयोग करने में अक्षम रहते हैं और इस दौरान परमेश्वर द्वारा अपेक्षित सत्य का अभ्यास करने में असमर्थ रहते हैं, तो उन्हें अनुशासित किया जाएगा, और सबसे खराब बात यह होगी कि उन्हें पवित्र आत्मा द्वारा त्याग दिया जाएगा। जो पवित्र आत्मा के नए कार्य को स्वीकार करते हैं, वे पवित्र आत्मा की मुख्य धारा में जीएँगे और पवित्र आत्मा की देखभाल और सुरक्षा प्राप्त करेंगे। जो लोग सत्य को अभ्यास में लाने के इच्छुक हैं, उन्हें पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध किया जाता है, और जो लोग सत्य को अभ्यास में लाने के अनिच्छुक हैं, उन्हें पवित्र आत्मा द्वारा अनुशासित किया जाता है, यहाँ तक कि उन्हें दंड भी दिया जा सकता है। चाहे वे किसी भी प्रकार के व्यक्ति हों, यदि वे पवित्र आत्मा की मुख्य धारा के भीतर हैं, तो परमेश्वर उन सभी लोगों की ज़िम्मेदारी लेगा, जो उसके नाम की खातिर उसके नए कार्य को स्वीकार करते हैं। जो लोग उसके नाम को महिमामंडित करते हैं और उसके वचनों को अभ्यास में लाने के इच्छुक हैं, वे उसके आशीष प्राप्त करेंगे; जो लोग उसकी अवज्ञा करते हैं और उसके वचनों को अभ्यास में नहीं लाते, वे उसका दंड प्राप्त करेंगे। जो लोग पवित्र आत्मा की मुख्य धारा में हैं, वे वो लोग हैं जो नए कार्य को स्वीकार करते हैं, और चूँकि उन्होंने नए कार्य को स्वीकार कर लिया है, इसलिए उन्हें परमेश्वर के साथ उचित सहयोग करना चाहिए, और उन विद्रोहियों के समान कार्य नहीं करना चाहिए, जो अपना कर्तव्य नहीं निभाते। यह मनुष्य से परमेश्वर की एकमात्र अपेक्षा है। यह उन लोगों के लिए नहीं है, जो नए कार्य को स्वीकार नहीं करते : वे पवित्र आत्मा की धारा से बाहर हैं, और पवित्र आत्मा का अनुशासन और फटकार उन पर लागू नहीं होते। पूरे दिन ये लोग देह में जीते हैं, अपने मस्तिष्क के भीतर जीते हैं, और वे जो कुछ भी करते हैं, वह सब उनके अपने मस्तिष्क के विश्लेषण और अनुसंधान से उत्पन्न हुए सिद्धांत के अनुसार होता है। यह वह नहीं है, जो पवित्र आत्मा के नए कार्य द्वारा अपेक्षित है, और यह परमेश्वर के साथ सहयोग तो बिलकुल भी नहीं है। जो लोग परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार नहीं करते, वे परमेश्वर की उपस्थिति से वंचित रहते हैं, और, इससे भी बढ़कर, वे परमेश्वर के आशीषों और सुरक्षा से रहित होते हैं। उनके अधिकांश वचन और कार्य पवित्र आत्मा की पुरानी अपेक्षाओं को थामे रहते हैं; वे सिद्धांत हैं, सत्य नहीं। ऐसे सिद्धांत और विनियम यह साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि इन लोगों का एक-साथ इकट्ठा होना धर्म के अलावा कुछ नहीं है; वे चुने हुए लोग या परमेश्वर के कार्य के लक्ष्य नहीं हैं। उनमें से सभी लोगों की सभा को मात्र धर्म का महासम्मेलन कहा जा सकता है, उन्हें कलीसिया नहीं कहा जा सकता। यह एक अपरिवर्तनीय तथ्य है। उनके पास पवित्र आत्मा का नया कार्य नहीं है; जो कुछ वे करते हैं वह धर्म का द्योतक प्रतीत होता है, जैसा जीवन वे जीते हैं वह धर्म से भरा हुआ प्रतीत होता है; उनमें पवित्र आत्मा की उपस्थिति और कार्य नहीं होता, और वे पवित्र आत्मा का अनुशासन या प्रबुद्धता प्राप्त करने के लायक तो बिलकुल भी नहीं हैं। ये समस्त लोग निर्जीव लाशें और कीड़े हैं, जो आध्यात्मिकता से रहित हैं। उन्हें मनुष्य की विद्रोहशीलता और विरोध का कोई ज्ञान नहीं है, मनुष्य के समस्त कुकर्मों का कोई ज्ञान नहीं है, और वे परमेश्वर के समस्त कार्य और परमेश्वर की वर्तमान इच्छा के बारे में तो बिलकुल भी नहीं जानते। वे सभी अज्ञानी, अधम लोग हैं, और वे कूडा-करकट हैं जो विश्वासी कहलाने के योग्य नहीं हैं! वे जो कुछ भी करते हैं, उसका परमेश्वर के प्रबंधन के कार्य के साथ कोई संबंध नहीं है, और वह परमेश्वर के कार्य को बिगाड़ तो बिलकुल भी नहीं सकता। उनके वचन और कार्य अत्यंत घृणास्पद, अत्यंत दयनीय, और एकदम अनुल्लेखनीय हैं। जो लोग पवित्र आत्मा की धारा में नहीं हैं, उनके द्वारा किए गए किसी भी कार्य का पवित्र आत्मा के नए कार्य के साथ कोई लेना-देना नहीं है। इस वजह से, चाहे वे कुछ भी क्यों न करें, वे पवित्र आत्मा के अनुशासन से रहित होते हैं, और, इससे भी बढ़कर, वे पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता से रहित होते हैं। कारण, वे सभी ऐसे लोग हैं, जिन्हें सत्य से कोई प्रेम नहीं है, और जिन्हें पवित्र आत्मा द्वारा तिरस्कृत और अस्वीकृत कर दिया गया है। उन्हें कुकर्मी कहा जाता हैं, क्योंकि वे देह के अनुसार चलते हैं, और परमेश्वर के नाम की तख्ती के नीचे जो उन्हें अच्छा लगता है, वही करते हैं। जब परमेश्वर कार्य करता है, तो वे जानबूझकर उसके प्रति शत्रुता रखते हैं और उसकी विपरीत दिशा में दौड़ते हैं। परमेश्वर के साथ सहयोग करने में मनुष्य की असफलता अपने आप में चरम रूप से विद्रोही है, इसलिए क्या वे लोग, जो जानबूझकर परमेश्वर के प्रतिकूल चलते हैं, विशेष रूप से अपना उचित प्रतिफल प्राप्त नहीं करेंगे?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 159

तुम लोगों को परमेश्वर के कार्य के दर्शनों को जानना और उसके कार्य के सामान्य निर्देशों को समझना होगा। यह सकारात्मक प्रवेश है। एक बार जब तुम दर्शनों के सत्य में सही ढंग से महारत हासिल कर लोगे, तो तुम्हारा प्रवेश सुरक्षित हो जाएगा; चाहे परमेश्वर का कार्य कैसे भी क्यों न बदले, तुम अपने हृदय में अडिग बने रहोगे, दर्शनों के बारे में स्पष्ट रहोगे, और तुम्हारे पास तुम्हारे प्रवेश और तुम्हारी खोज के लिए एक लक्ष्य होगा। इस तरह से, तुम्हारे भीतर का समस्त अनुभव और ज्ञान अधिक गहरा और विस्तृत हो जाएगा। एक बार जब तुम इन सारे महत्वपूर्ण चरणों को उनकी संपूर्णता में समझ लोगे, तो तुम्हें जीवन में कोई नुकसान नहीं उठाना पड़ेगा, और तुम भटकोगे नहीं। यदि तुम कार्यों के इन चरणों को नहीं जानोगे, तो तुम्हें इनमें से प्रत्येक चरण पर नुकसान उठाना पड़ेगा, और तुम्हें चीजें ठीक करने में कुछ ज्यादा दिन लगेंगे, और तुम कुछ सप्ताह में भी सही मार्ग पकड़ने में सक्षम नहीं हो पाओगे। क्या इससे देरी नहीं होगी? सकारात्मक प्रवेश और अभ्यास के मार्ग में बहुत-कुछ ऐसा है, जिसमें तुम लोगों को महारत हासिल करनी होगी। जहाँ तक परमेश्वर के कार्य के दर्शनों का संबंध है, तुम्हें इन बिंदुओं को अवश्य समझना चाहिए : उसके विजय के कार्य के मायने, पूर्ण बनाए जाने का भावी मार्ग, परीक्षणों और क्लेश के अनुभवों के माध्यम से क्या हासिल किया जाना चाहिए, न्याय और ताड़ना के मायने, पवित्र आत्मा के कार्य के सिद्धांत, तथा पूर्णता और विजय के सिद्धांत। ये सब दर्शनों के सत्य से संबंध रखते हैं। शेष हैं व्यवस्था के युग, अनुग्रह के युग और राज्य के युग के कार्य के तीन चरण, और साथ ही भावी गवाही। ये भी दर्शनों के सत्य हैं, और ये सर्वाधिक मूलभूत होने के साथ-साथ सर्वाधिक महत्वपूर्ण भी हैं। वर्तमान में तुम लोगों के पास अभ्यास में प्रवेश करने के लिए बहुत-कुछ है, और वह अब बहुस्तरीय और अधिक विस्तृत है। यदि तुम्हें इन सत्यों का कोई ज्ञान नहीं है, तो यह साबित होता है कि तुम्हें अभी प्रवेश करना शेष है। अधिकांश समय लोगों का सत्य का ज्ञान बहुत उथला होता है; वे कुछ बुनियादी सत्यों को अभ्यास में लाने में अक्षम होते हैं और नहीं जानते कि तुच्छ मामलों को भी कैसे सँभाला जाए। लोगों के सत्य का अभ्यास करने में अक्षम होने का कारण यह है कि उनका स्वभाव विद्रोही है, और आज के कार्य का उनका ज्ञान बहुत ही सतही और एकतरफ़ा है। इसलिए, लोगों को पूर्ण बनाए जाने का काम आसान नहीं है। तुम बहुत ज्यादा विद्रोही हो, और तुम अपने पुराने अहं को बहुत ज़्यादा बनाए रखते हो; तुम सत्य के पक्ष में खड़े रहने में अक्षम हो, और तुम सबसे स्पष्ट सत्यों तक का अभ्यास करने में असमर्थ हो। ऐसे लोगों को बचाया नहीं जा सकता और ये वे लोग हैं, जिन्हें जीता नहीं गया है। यदि तुम्हारा प्रवेश न तो विस्तृत है और न ही सोद्देश्य, तो तुम्हारा विकास धीमी गति से होगा। यदि तुम्हारे प्रवेश में जरा-सी भी वास्तविकता नहीं हुई, तो तुम्हारी खोज व्यर्थ हो जाएगी। यदि तुम सत्य के सार से अनभिज्ञ हो, तो तुम अपरिवर्तित रहोगे। मनुष्य के जीवन में विकास और उसके स्वभाव में परिवर्तन वास्तविकता में प्रवेश करने, और इससे भी अधिक, विस्तृत अनुभवों में प्रवेश करने से प्राप्त होते हैं। यदि तुम्हारे प्रवेश के दौरान तुम्हारे पास कई विस्तृत अनुभव हैं, और तुम्हारे पास अधिक वास्तविक ज्ञान और प्रवेश है, तो तुम्हारा स्वभाव शीघ्रता से बदल जाएगा। भले ही वर्तमान में तुम अभ्यास के बारे में पूरी तरह से स्पष्ट न हो, तो भी तुम्हें कम से कम परमेश्वर के कार्य के दर्शनों के बारे में स्पष्ट अवश्य होना चाहिए। यदि नहीं, तो तुम प्रवेश करने में अक्षम होगे; प्रवेश केवल तुम्हें सत्य का ज्ञान होने पर ही संभव है। केवल पवित्र आत्मा द्वारा तुम्हें तुम्हारे अनुभव में प्रबुद्ध करने पर ही तुम सत्य की अधिक गहरी समझ प्राप्त करोगे और अधिक गहराई से प्रवेश करोगे। तुम लोगों को परमेश्वर के कार्य को जानना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 160

आरंभ में, मानवजाति के सृजन के बाद, इस्राएलियों ने परमेश्वर के कार्य के आधार के रूप में काम किया। संपूर्ण इस्राएल पृथ्वी पर यहोवा के कार्य का आधार था। यहोवा का कार्य व्यवस्थाओं की स्थापना करके मनुष्य की सीधे अगुआई और चरवाही करना था, ताकि मनुष्य एक उपयुक्त जीवन जी सके और पृथ्वी पर सही तरीके से यहोवा की आराधना कर सके। व्यवस्था के युग में परमेश्वर मनुष्य के द्वारा न तो देखा जा सकता था और न ही उसे छुआ जा सकता था। क्योंकि उसने उन लोगों का मार्गदर्शन किया, जिन्हें शैतान ने सबसे पहले भ्रष्ट किया था, उन्हें शिक्षा दी, उनकी देखभाल की, उसके वचनों में केवल व्यवस्थाओं, विधानों और मानव-व्यवहार के मानदंड थे, उनमें उन लोगों के लिए जीवन के सत्य नहीं थे। उसकी अगुआई में इस्राएली शैतान द्वारा गहराई से भ्रष्ट नहीं किए गए थे। उसका व्यवस्था का कार्य उद्धार के कार्य में केवल पहला चरण था, उद्धार के कार्य का एकदम आरंभ, और वास्तव में उसका मनुष्य के जीवन-स्वभाव में होने वाले परिवर्तनों से कुछ लेना-देना नहीं था। इसलिए, उद्धार के कार्य के आरंभ में उसे इस्राएल में अपने कार्य के लिए देह धारण करने की कोई आवश्यकता नहीं थी। इसीलिए उसे एक माध्यम—एक उपकरण—की आवश्यकता थी, जिसके ज़रिए मनुष्य के साथ संपर्क किया जा सकता। इस प्रकार, सृजित प्राणियों के मध्य से यहोवा की ओर से बोलने और कार्य करने वाले लोग उठ खड़े हुए, और इस तरह से मनुष्य के पुत्र और नबी मनुष्यों के मध्य कार्य करने के लिए आए। मनुष्य के पुत्रों ने यहोवा की ओर से मनुष्यों के मध्य कार्य किया। यहोवा द्वारा उन्हें "मनुष्य के पुत्र" कहे जाने का अर्थ है कि ऐसे लोग यहोवा की ओर से व्यवस्था निर्धारित करते हैं। वे लोग इस्राएलियों के बीच याजक भी थे; ऐसे याजक, जिनका यहोवा द्वारा ध्यान रखा जाता था और जिनकी रक्षा की जाती थी, जिनमें यहोवा का आत्मा कार्य करता था; वे लोगों के मध्य अगुआ थे और सीधे यहोवा की सेवा करते थे। दूसरी ओर, नबी सभी देशों और सभी कबीलों के लोगों के साथ यहोवा की ओर से बोलने का कार्य करते थे। उन्होंने यहोवा के कार्य की भविष्यवाणी भी की। चाहे वे मनुष्य के पुत्र हों या नबी, सभी को स्वयं यहोवा के आत्मा द्वारा ऊपर उठाया गया था और उनमें यहोवा का कार्य था। लोगों के मध्य ये वे लोग थे, जो सीधे यहोवा का प्रतिनिधित्व करते थे; उन्होंने अपना कार्य केवल इसलिए किया, क्योंकि उन्हें यहोवा ने ऊपर उठाया था, इसलिए नहीं कि वे ऐसे देह थे, जिनमें स्वयं पवित्र आत्मा ने देहधारण किया था। इसलिए, हालाँकि वे परमेश्वर की ओर से बोलने और कार्य करने में एक-समान थे, फिर भी व्यवस्था के युग में वे मनुष्य के पुत्र और नबी देहधारी परमेश्वर का देह नहीं थे। अनुग्रह के युग और अंतिम चरण में परमेश्वर का कार्य ठीक विपरीत था, क्योंकि मनुष्य के उद्धार और न्याय का कार्य दोनों स्वयं देहधारी परमेश्वर द्वारा किए गए थे, इसलिए उसकी ओर से कार्य करने के लिए नबियों और मनुष्य के पुत्रों को फिर से ऊपर उठाने की आवश्यकता नहीं थी। मनुष्य की नज़रों में उनके कार्य के सार और पद्धति में कोई महत्वपूर्ण अंतर नहीं है। इसी कारण से लोग लगातार नबियों एवं मनुष्य के पुत्रों के कार्यों को देहधारी परमेश्वर के कार्य समझ रहे हैं। देहधारी परमेश्वर का रंग-रूप मूल रूप से वैसा ही था, जैसा कि नबियों और मनुष्य के पुत्रों का था। देहधारी परमेश्वर तो नबियों की अपेक्षा और भी अधिक साधारण एवं अधिक वास्तविक था। इसलिए मनुष्य उनके मध्य अंतर करने में अक्षम है। मनुष्य केवल रूप-रंग पर ध्यान देता है, इस बात से पूरी तरह से अनजान, कि यद्यपि दोनों काम करने और बोलने में एक-जैसे हैं, फिर भी उनमें मूलभूत अंतर है। चूँकि चीज़ों को अलग-अलग करके बताने की मनुष्य की क्षमता बहुत ख़राब है, इसलिए वह सरल मुद्दों के बीच अंतर करने में भी अक्षम है, जटिल चीज़ों का तो फिर कहना ही क्या। नबियों और पवित्र आत्मा द्वारा इस्तेमाल किए गए लोग बोलते और कार्य करते थे, तो यह मनुष्य के कर्तव्य निभाने के लिए था, यह एक सृजित प्राणी का कार्य करने के लिए था, जिसे मनुष्य को करना चाहिए। किंतु देहधारी परमेश्वर के वचन और कार्य उसकी सेवकाई करने के लिए थे। यद्यपि उसका बाहरी स्वरूप एक सृजित प्राणी का था, किंतु उसका काम अपना कार्य करने के लिए नहीं, बल्कि अपनी सेवकाई करने के लिए था। "कर्तव्य" शब्द सृजित प्राणियों के संबंध में इस्तेमाल किया जाता है, जबकि "सेवकाई" देहधारी परमेश्वर के देह के संबंध में। इन दोनों के बीच एक अनिवार्य अंतर है; इन दोनों की अदला-बदली नहीं की जा सकती। मनुष्य का कार्य केवल अपना कर्तव्य निभाना है, जबकि परमेश्वर का कार्य अपनी सेवकाई का प्रबंधन करना और उसे कार्यान्वित करना है। इसलिए, यद्यपि कई प्रेरित पवित्र आत्मा द्वारा इस्तेमाल किए गए और कई नबी उसके साथ थे, किंतु फिर भी उनका कार्य और उनके वचन केवल सृजित प्राणियों के रूप में अपना कर्तव्य निभाने के लिए थे। हो सकता है, उनकी भविष्यवाणियाँ देहधारी परमेश्वर द्वारा कहे गए जीवन के मार्ग से बढ़कर रही हों, और उनकी मानवता देहधारी परमेश्वर की मानवता का अतिक्रमण करती हो, पर फिर भी वे अपना कर्तव्य ही निभा रहे थे, सेवकाई पूरी नहीं कर रहे थे। मनुष्य का कर्तव्य उसके कार्य को संदर्भित करता है; मनुष्य के लिए केवल यही प्राप्य है। जबकि, देहधारी परमेश्वर द्वारा की जाने वाली सेवकाई उसके प्रबंधन से संबंधित है, और यह मनुष्य द्वारा अप्राप्य है। चाहे देहधारी परमेश्वर बोले, कार्य करे, या चमत्कार करे, वह अपने प्रबंधन के अंतर्गत महान कार्य कर रहा है, इस प्रकार का कार्य उसके बदले मनुष्य नहीं कर सकता। मनुष्य का कार्य केवल सृजित प्राणी के रूप में परमेश्वर के प्रबंधन के कार्य के किसी दिए गए चरण में केवल अपना कर्तव्य पूरा करना है। परमेश्वर के प्रबंधन के बिना, अर्थात्‌, यदि देहधारी परमेश्वर की सेवकाई खो जाती है, तो सृजित प्राणी का कर्तव्य भी खो जाएगा। अपनी सेवकाई करने में परमेश्वर का कार्य मनुष्य का प्रबंधन करना है, जबकि मनुष्य द्वारा अपने कर्तव्य की पूर्ति स्रष्टा की माँगें पूरी करने के लिए अपने दायित्वों की पूर्ति है, और उसे किसी भी तरह से अपनी सेवकाई करना नहीं माना जा सकता। परमेश्वर के अंतर्निहित सार के लिए—उसके पवित्रात्मा के लिए—परमेश्वर का कार्य उसका प्रबंधन है, किंतु देहधारी परमेश्वर के लिए, जो एक सृजित प्राणी का बाहरी रूप धारण करता है, उसका कार्य अपनी सेवकाई करना है। वह जो कुछ भी कार्य करता है, अपनी सेवकाई करने के लिए करता है, और मनुष्य जो अधिकतम कर सकता है, वह है उसके प्रबंधन के क्षेत्र के भीतर और उसकी अगुआई के अधीन अपना सर्वश्रेष्ठ देना।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 161

अनुग्रह के युग में यीशु ने भी कई वचन बोले और बहुत कार्य किया। वह यशायाह से कैसे अलग था? वह दानिय्येल से कैसे अलग था? क्या वह कोई नबी था? ऐसा क्यों कहा जाता है कि वह मसीह है? उनके मध्य क्या भिन्नताएँ हैं? वे सभी मनुष्य थे, जिन्होंने वचन बोले थे, और उनके वचन मनुष्य को लगभग एक-से प्रतीत होते थे। उन सभी ने वचन बोले और कार्य किए। पुराने विधान के नबियों ने भविष्यवाणियाँ कीं, और उसी तरह से, यीशु भी वैसा ही कर सकता था। ऐसा क्यों है? यहाँ भेद कार्य की प्रकृति के आधार पर है। इस मामले को समझने के लिए तुम्हें देह की प्रकृति पर विचार नहीं करना चाहिए, न ही तुम्हें उनके वचनों की गहराई या सतहीपन पर विचार करना चाहिए। तुम्हें हमेशा सबसे पहले उनके कार्य और उसके द्वारा मनुष्य में प्राप्त किए जाने वाले परिणामों पर विचार करना चाहिए। उस समय नबियों द्वारा की गई भविष्यवाणियों ने मनुष्य के जीवन की आपूर्ति नहीं की, यशायाह और दानिय्येल जैसे लोगों द्वारा प्राप्त की गई प्रेरणाएँ मात्र भविष्यवाणियाँ थीं, जीवन का मार्ग नहीं। यदि यहोवा की ओर से प्रत्यक्ष प्रकाशन नहीं होता, तो कोई भी इस कार्य को नहीं कर सकता था, जो नश्वर लोगों के लिए संभव नहीं है। यीशु ने भी कई वचन बोले, परंतु वे वचन जीवन का मार्ग थे, जिनमें से मनुष्य अभ्यास का मार्ग प्राप्त कर सकता था। दूसरे शब्दों में, एक तो वह मनुष्य के जीवन की आपूर्ति कर सकता था, क्योंकि यीशु जीवन है; दूसरे, वह मनुष्यों के विचलनों को उलट सकता था; तीसरे, युग को आगे बढ़ाने के लिए उसका कार्य यहोवा के कार्य का अनुवर्ती हो सकता था; चौथे, वह मनुष्य के भीतर की आवश्यकताएँ जान सकता था और समझ सकता था कि मनुष्य में किस चीज का अभाव है; पाँचवें, वह नए युग का सूत्रपात कर सकता था और पुराने युग का समापन कर सकता था। यही कारण है कि उसे परमेश्वर और मसीह कहा जाता है; वह न केवल यशायाह से भिन्न है, अपितु अन्य सभी नबियों से भी भिन्न है। नबियों के कार्य के लिए तुलना के रूप में यशायाह को लें। पहले तो वह मनुष्य के जीवन की आपूर्ति नहीं कर सकता था; दूसरे, वह नए युग का सूत्रपात नहीं कर सकता था। वह यहोवा की अगुआई के अधीन कार्य कर रहा था, न कि नए युग का सूत्रपात करने के लिए। तीसरे, उसके द्वारा बोले गए शब्द उससे परे थे। वह सीधे परमेश्वर के आत्मा से प्रकाशन प्राप्त कर रहा था, और दूसरे लोग उन्हें सुनकर भी नहीं समझे होंगे। ये कुछ चीज़ें अकेले ही यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं कि उसके वचन भविष्यवाणियों से अधिक और यहोवा के बदले किए गए कार्य के एक पहलू से ज़्यादा कुछ नहीं थे। वह पूरी तरह से यहोवा का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता था। वह यहोवा का सेवक था, यहोवा के काम में एक उपकरण। वह केवल व्यवस्था के युग के भीतर और यहोवा के कार्य-क्षेत्र के भीतर ही कार्य कर रहा था; उसने व्यवस्था के युग से आगे कार्य नहीं किया। इसके विपरीत, यीशु का कार्य भिन्न था। उसने यहोवा के कार्य-क्षेत्र को पार कर लिया; उसने देहधारी परमेश्वर के रूप में कार्य किया और संपूर्ण मानवजाति के छुटकारे के लिए सलीब पर चढ़ गया। दूसरे शब्दों में, उसने यहोवा द्वारा किए गए कार्य के बाहर नया कार्य किया। यह नए युग का सूत्रपात करना था। इसके अतिरिक्त, वह उस बारे में बोलने में सक्षम था, जिसे मनुष्य प्राप्त नहीं कर सकता था। उसका कार्य परमेश्वर के प्रबंधन के भीतर का कार्य था, जो संपूर्ण मानवजाति को समाविष्ट करता था। उसने मात्र कुछ ही मनुष्यों में कार्य नहीं किया, न ही उसका कार्य कुछ सीमित संख्या के लोगों की अगुआई करना था। जहाँ तक इस बात का संबंध है कि कैसे परमेश्वर मनुष्य के रूप में देहधारी हुआ, कैसे उस समय पवित्रात्मा ने प्रकाशन दिए, और कैसे पवित्रात्मा कार्य करने के लिए एक मनुष्य पर उतरा, तो ये ऐसी बातें हैं, जिन्हें मनुष्य देख या छू नहीं सकता। इन सत्यों का इस बात का साक्ष्य होना सर्वथा असंभव है कि वह देहधारी परमेश्वर है। इस प्रकार, अंतर केवल परमेश्वर के वचनों और कार्य में ही किया जा सकता है, जो मनुष्य के लिए दृष्टिगोचर हैं। केवल यही वास्तविक है। इसका कारण यह है कि पवित्रात्मा के मामले तुम्हारे लिए दृष्टिगोचर नहीं हैं और केवल स्वयं परमेश्वर को ही स्पष्ट रूप से ज्ञात हैं, यहाँ तक कि देहधारी परमेश्वर का देह भी सारी चीज़ें नहीं जानता; तुम केवल उसके द्वारा किए गए कार्य से ही सत्यापन कर सकते हो कि वह परमेश्वर है या नहीं? उसके कार्यों से यह देखा जा सकता है कि एक तो वह एक नए युग की शुरुआत करने में सक्षम है; दूसरे, वह मनुष्य के जीवन की आपूर्ति करने और मनुष्य को अनुसरण का मार्ग दिखाने में सक्षम है। यह इस बात को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि वह स्वयं परमेश्वर है। कम से कम, जो कार्य वह करता है, वह पूरी तरह से परमेश्वर के आत्मा का प्रतिनिधित्व कर सकता है, और ऐसे कार्य से यह देखा जा सकता है कि परमेश्वर का आत्मा उसके भीतर है। चूँकि देहधारी परमेश्वर द्वारा किया गया कार्य मुख्य रूप से नए युग का सूत्रपात करना, नए कार्य की अगुआई करना और नया राज्य खोलना था, इसलिए ये कुछ स्थितियाँ अकेले ही यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं कि वह स्वयं परमेश्वर है। इस प्रकार यह उसे यशायाह, दानिय्येल और अन्य महान नबियों से भिन्नता प्रदान करता है। यशायाह, दानिय्येल और अन्य नबी उच्च शिक्षित वर्ग के और सुसंस्कृत मनुष्य थे; वे यहोवा की अगुआई में असाधारण लोग थे। देहधारी परमेश्वर का देह भी ज्ञान-संपन्न था और उसमें विवेक का अभाव नहीं था, किंतु उसकी मानवता विशेष रूप से सामान्य थी। वह एक साधारण मनुष्य था, और नग्न आँखें उसके बारे में कोई विशेष मानवता नहीं देख सकती थीं या उसकी मानवता में दूसरों से भिन्न कोई बात नहीं ढूँढ़ सकती थीं। वह अलौकिक या अद्वितीय बिलकुल नहीं था, और वह उच्चतर शिक्षा, ज्ञान या सिद्धांत से संपन्न भी नहीं था। जिस जीवन के बारे में उसने कहा और जिस मार्ग की उसने अगुआई की, वे सिद्धांत के माध्यम से, ज्ञान के माध्यम से, जीवन के अनुभव के माध्यम से अथवा पारिवारिक पालन-पोषण के माध्यम से प्राप्त नहीं किए गए थे। बल्कि, वे पवित्र आत्मा का प्रत्यक्ष कार्य थे, जो कि देहधारी देह का कार्य है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि परमेश्वर के बारे में मनुष्य महान धारणाएँ रखता है, और विशेष रूप से चूँकि ये धारणाएँ बहुत सारे अस्पष्ट और अलौकिक तत्त्वों से बनी हैं, इसलिए मनुष्य की दृष्टि में मानवीय कमज़ोरियों वाला साधारण परमेश्वर, जो संकेत और चमत्कार प्रदर्शित नहीं कर सकता, वह निश्चित रूप से परमेश्वर नहीं है। क्या ये मनुष्य की गलत धारणाएँ नहीं है? यदि देहधारी परमेश्वर का देह एक सामान्य मनुष्य न होता, तो उसे देह बन जाना कैसे कहा जा सकता था? देह का होना एक साधारण, सामान्य मनुष्य होना है; यदि वह कोई ज्ञानातीत प्राणी होता, तो फिर वह देह का नहीं होता। यह साबित करने के लिए कि वह देह का है, देहधारी परमेश्वर को एक सामान्य देह धारण करने की आवश्यकता थी। यह सिर्फ़ देहधारण के मायने पूरे करने के लिए था। किंतु नबियों और मनुष्य के पुत्रों के साथ यह मामला नहीं था। वे पवित्र आत्मा द्वारा इस्तेमाल किए गए मेधावी मनुष्य थे; मनुष्य की नज़रों में उनकी मानवता विशेष रूप से महान थी, और उन्होंने ऐसे कई कार्य किए, जो सामान्य मानवता से आगे निकल गए। इसी कारण से, मनुष्य ने उन्हें परमेश्वर माना। अब तुम सब लोगों को इसे स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए, क्योंकि यह एक ऐसा मुद्दा रहा है, जिसे पिछले युगों में सभी मनुष्यों द्वारा सर्वाधिक आसानी से गलत समझा गया है। इसके अतिरिक्त, देहधारण सबसे अधिक रहस्यमय चीज़ है, और देहधारी परमेश्वर को स्वीकार करना मनुष्य के लिए सर्वाधिक कठिन है। मैं जो कहता हूँ, वह तुम लोगों को अपना कार्य पूरा करने और देहधारण का रहस्य समझने में सहायक है। यह सब परमेश्वर के प्रबंधन, उसके दर्शनों से संबंधित है। इसके बारे में तुम लोगों की समझ दर्शनों, अर्थात् परमेश्वर के प्रबंधन के कार्य, का ज्ञान प्राप्त करने में अधिक लाभदायक होगी। इस तरह, तुम लोग विभिन्न प्रकार के लोगों द्वारा अवश्य करने योग्य कर्तव्य के बारे में और अधिक समझ प्राप्त करोगे। यद्यपि ये वचन तुम्हें प्रत्यक्ष रूप से मार्ग नहीं दिखाते, फिर भी ये तुम लोगों के प्रवेश के लिए बहुत सहायक हैं, क्योंकि वर्तमान में तुम लोगों के जीवन में दर्शनों का अत्यधिक अभाव है, और यह तुम लोगों के प्रवेश में रुकावट डालने वाली एक महत्वपूर्ण बाधा बन जाएगा। यदि तुम लोग इन मुद्दों को समझने में अक्षम रहते हो, तो तुम लोगों के प्रवेश को प्रेरित करने वाली कोई प्रेरणा नहीं होगी। और इस तरह की खोज तुम लोगों को अपना कर्तव्य पूरा करने में सक्षम कैसे बना सकती है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 162

कुछ लोग पूछेंगे, "देहधारी परमेश्वर के द्वारा किये गए कार्य और अतीत के भविष्यवक्ताओं और प्रेरितों द्वारा किये गए कार्य में क्या अन्तर है? दाऊद को भी प्रभु कहकर पुकारा गया था, और उसी प्रकार यीशु को भी; यद्यपि उन्होंने जो कार्य किया वह भिन्न था, फिर भी उन्हें एक जैसे ही नाम से पुकारा गया था। मुझे बताओ उनकी पहचान एक जैसी क्यों नहीं थी? जिसकी यूहन्ना ने गवाही दी थी वह एक दर्शन था, ऐसा दर्शन जो पवित्र आत्मा से भी आया था, और वह उन वचनों को कहने में समर्थ था जो पवित्र आत्मा ने कहने का इरादा किया था; तो यूहन्ना की पहचान यीशु से भिन्न क्यों है?" यीशु के द्वारा कहे गए वचन परमेश्वर का पूरी तरह से प्रतिनिधित्व करने में समर्थ थे और वे परमेश्वर के कार्य का पूरी तरह से प्रतिनिधित्व करते थे। जो यूहन्ना ने देखा वह एक दर्शन था, और वह परमेश्वर के कार्य का पूरी तरह से प्रतिनिधित्व करने में असमर्थ था। ऐसा क्यों है कि यूहन्ना, पतरस और पौलुस ने बहुत से वचन कहे—जैसे यीशु ने कहे थे—फिर भी उनके पास यीशु के समान पहचान नहीं थी? मुख्य रूप से ऐसा इसलिए है क्योंकि उन्होंने जो कार्य किया वह भिन्न था। यीशु ने परमेश्वर के आत्मा का प्रतिनिधित्व किया, और वह परमेश्वर का आत्मा था जो सीधे तौर पर कार्य कर रहा था। उसने नये युग का कार्य किया, ऐसा कार्य जिसे पहले कभी किसी ने नहीं किया था। उसने एक नया मार्ग प्रशस्त किया, उसने यहोवा का प्रतिनिधित्व किया, और उसने स्वयं परमेश्वर का प्रतिनिधित्व किया जबकि पतरस, पौलुस और दाऊद, इस बात की परवाह किए बिना कि उन्हें क्या कहकर पुकारा जाता था, उन्होंने केवल परमेश्वर के एक प्राणी की पहचान का प्रतिनिधित्व किया था, और उन्हें यीशु या यहोवा द्वारा भेजा गया था। इसलिए भले ही उन्होंने कितना ही काम क्यों न किया हो, भले ही उन्होंने कितने ही बड़े चमत्कार क्यों न किये हों, वे तब भी बस परमेश्वर के प्राणी ही थे, और परमेश्वर के आत्मा का प्रतिनिधित्व करने में असमर्थ थे। उन्होंने परमेश्वर के नाम पर या परमेश्वर द्वारा भेजे जाने के बाद ही कार्य किया था; इससे भी बढ़कर, उन्होंने यीशु या यहोवा द्वारा शुरू किए गए युगों में कार्य किया था, और उन्होंने जो कार्य किया वह पृथक नहीं था। आख़िरकार, वे मात्र परमेश्वर के प्राणी ही थे। पुराने नियम में, बहुत सारे भविष्यवक्ताओं ने भविष्यवाणियाँ की थीं, या भविष्यवाणी की पुस्तकें लिखी थीं। किसी ने भी नहीं कहा था कि वे परमेश्वर हैं, परन्तु जैसे ही यीशु ने कार्य करना आरम्भ किया, परमेश्वर के आत्मा ने उसकी गवाही दी कि वह परमेश्वर है। ऐसा क्यों है? इस बिन्दु पर यह तुम्हें पहले से ही जान लेना चाहिए! इससे पहले, प्रेरितों और भविष्यवक्ताओं ने विभिन्न धर्मपत्र लिखे, और बहुत सी भविष्यवाणियाँ कीं। बाद में, लोगों ने बाइबल में रखने के लिए उनमें से कुछ को चुन लिया और कुछ खो गई थीं। चूँकि ऐसे लोग हैं जो कहते हैं कि उनके द्वारा बोला गया सब कुछ पवित्र आत्मा से आया, तो क्यों इसमें से कुछ को अच्छा माना जाता है, और कुछ को खराब? और क्यों कुछ को चुना गया था और अन्यों को नहीं? यदि वे वाकई में पवित्र आत्मा के द्वारा कहे गए वचन होते, तो क्या लोगों को उनका चयन करने की आवश्यकता होती? क्यों यीशु द्वारा बोले गए वचनों और उसके कार्यों का विवरण चारों सुसमाचारों में से प्रत्येक में भिन्न है? क्या यह उन लोगों का दोष नहीं हैं जिन्होंने इसे दर्ज किया? कुछ लोग पूछेंगे, "चूँकि पौलुस और नए नियम के अन्य लेखकों द्वारा लिखे गए धर्मपत्र और उनके द्वारा किए गए कार्य आंशिक रूप से मनुष्य की इच्छा से आये थे, और मनुष्य की धारणाओं से मिश्रित हो गए थे, तो क्या उन वचनों में कोई मानवीय अशुद्धता नहीं है जिन्हें आज तुम (परमेश्वर) बोलते हो, क्या उनमें वास्तव में कोई भी मानवीय धारणा शामिल नहीं है?" परमेश्वर के द्वारा किये गए कार्य का यह चरण पौलुस और अनेक प्रेरितों और भविष्यवक्ताओं के द्वारा किये गए कार्य से पूरी तरह से भिन्न है। न केवल यहाँ पहचान में अन्तर है, बल्कि, मुख्य रूप से, कार्यान्वित किए गए कार्य में भी अन्तर है। जब पौलुस को नीचे गिराया गया और वह प्रभु के सामने गिर पड़ा उसके पश्चात्, कार्य करने के लिए पवित्र आत्मा के द्वारा उसकी अगुवाई की गई थी, और वह ऐसा बन गया था जिसे भेजा गया था। इसलिए उसने कलीसियाओं को धर्मपत्र लिखे, और इन सभी धर्मपत्रों ने यीशु की शिक्षाओं का अनुसरण किया था। पौलुस को प्रभु यीशु के नाम पर कार्य करने के लिए प्रभु के द्वारा भेजा गया था, परन्तु जब परमेश्वर स्वयं आया, तो उसने किसी नाम से कार्य नहीं किया, तथा अपने कार्य में किसी और का नहीं बल्कि परमेश्वर के आत्मा का प्रतिनिधित्व किया। परमेश्वर अपने कार्य को सीधे तौर पर करने के लिए आया:उसे मनुष्य के द्वारा सिद्ध नहीं बनाया गया था, और उसके कार्य को किसी मनुष्य की शिक्षाओं के आधार पर कार्यान्वित नहीं किया गया था। कार्य के इस चरण में परमेश्वर अपने व्यक्तिगत अनुभवों के बारे में बात करने के द्वारा अगुवाई नहीं करता है, बल्कि जो कुछ उसके पास है उसके अनुसार अपने कार्य को सीधे तौर पर कार्यान्वित करता है। उदाहरण के लिए, सेवा करने वालों की परीक्षा, ताड़ना का समय, मृत्यु की परीक्षा, परमेश्वर से प्रेम करने का समय...। यह सब वह कार्य है जो पहले कभी नहीं किया गया है, और ऐसा कार्य है जो, मनुष्य के अनुभवों के बजाय, वर्तमान युग का है। उन वचनों में जो मैंने कहे है, मनुष्य के अनुभव कौन से हैं? क्या वे सब सीधे तौर पर पवित्रात्मा से नहीं आते हैं, और क्या वे पवित्रात्मा के द्वारा जारी नहीं किये जाते हैं? बस इतना ही है कि तुम्हारी क्षमता इतनी कम है कि तुम सत्य को देखने में असमर्थ हो! जीवन का वह व्यावहारिक तरीका जिसकी मैं बात करता हूँ, पथ के मार्गदर्शन के लिए है, और इसे किसी के द्वारा पहले कभी नहीं कहा गया है, न ही कभी किसी ने इस पथ का अनुभव किया है, या इसकी वास्तविकता को जाना है। इन वचनों को मेरे कहने से पहले, किसी ने कभी नहीं कहा था। किसी ने कभी ऐसे अनुभवों के बारे में बात नहीं की थी, न ही उन्होंने कभी ऐसे विवरणों को कहा था, और, इससे भी बढ़ कर, किसी ने भी इन चीज़ों को प्रकट करने के लिए ऐसी अवस्थाओं की ओर कभी संकेत नहीं किया था। किसी ने कभी भी उस पथ की अगुवाई नहीं की जिसकी अगुवाई आज मैं करता हूँ, और यदि इसकी अगुवाई मनुष्य के द्वारा की जाती, तो यह एक नया मार्ग नहीं होता। उदाहरण के लिए, पौलुस और पतरस को लें। उनके पास यीशु द्वारा पथ की अगुआई किए जाने से पहले अपने स्वयं के कोई व्यक्तिगत अनुभव नहीं थे। जब यीशु ने उस पथ की अगुवाई की केवल उसके बाद ही उन्होंने यीशु के द्वारा बोले गए वचनों का, और उसके द्वारा अगुआई किए गए पथ का अनुभव किया; इससे उन्होंने अनेक अनुभव अर्जित किए, और धर्मपत्रों को लिखा। और इस प्रकार, मनुष्य के अनुभव परमेश्वर के कार्य के समान नहीं हैं, और परमेश्वर का कार्य उस ज्ञान के समान नहीं है जैसा मनुष्य की धारणाओं और अनुभवों के द्वारा वर्णन किया जाता है। मैंने बार-बार कहा है कि मैं एक नए पथ की अगुवाई कर रहा हूँ, और नया कार्य कर रहा हूँ, और मेरा कार्य और मेरे कथन यूहन्ना और अन्य सभी भविष्यवक्ताओं से भिन्न हैं। मैं कभी भी ऐसा नहीं करता हूँ कि पहले अनुभवों को प्राप्त करूँ और फिर उन्हें तुम लोगों से कहूँ—ऐसा मामला तो बिल्कुल भी नहीं है। यदि ऐसा होता, तो क्या इससे तुम लोगों को बहुत पहले ही देर न हो जाती? अतीत में, जिस ज्ञान के बारे में बहुतों ने बात की थी उसे भी ऊँचा उठा दिया जाता, परन्तु उनके सभी वचनों को केवल उन तथाकथित आध्यात्मिक व्यक्तियों के आधार पर बोला गया था। उन्होंने पथ प्रदर्शन नहीं किया, परन्तु वे उनके अनुभवों से आये थे, जो कुछ उन्होंने देखा था उससे, और उनके ज्ञान से आये थे। कुछ उनकी धारणाएँ थीं, और कुछ अनुभव थे जिनका उन्होंने सार प्रस्तुत किया था। आज, मेरे कार्य की प्रकृति उनसे पूरी तरह से भिन्न है। मैंने दूसरों के द्वारा अगुवाई किये जाने का अनुभव नहीं किया है, न ही मैंने दूसरों के द्वारा सिद्ध किये जाने को स्वीकार किया है। इससे भी बढ़ कर, मैंने जो कुछ भी कहा और जिसकी भी संगति की है, वह सब किसी भी अन्य के असदृश है, और किसी अन्य के द्वारा कभी नहीं बोला गया है। आज, इस बात की परवाह किए बिना कि तुम कौन हो, तुम लोगों का कार्य उन वचनों के आधार पर कार्यान्वित किया जाता है जिन्हें मैं बोलता हूँ। इन कथनों और कार्य के बिना, कौन इन चीज़ों का अनुभव करने में सक्षम होता (सेवा करने वालों की परीक्षा, ताड़ना का समय...), और कौन ऐसे ज्ञान को कहने में समर्थ होता? क्या तुम सचमुच इसे देखने में असमर्थ हो? इस बात से फर्क नहीं पड़ता है कि, जैसे ही मेरे वचन कहे जाते हैं, तुम लोग मेरे वचनों के अनुसार कार्य के किस कदम पर संगति करना शुरू करते हो, और उनके अनुसार काम करते हो, और यह ऐसा मार्ग नहीं है जिसके बारे में तुम लोगों में से किसी ने भी सोचा है। इतनी दूर तक आने के बाद, क्या तुम इतने स्पष्ट और सरल प्रश्न को देखने में असमर्थ हो? यह ऐसा मार्ग नहीं है जिसे किसी ने सोचा है, न ही यह किसी आध्यात्मिक व्यक्ति पर आधारित है। यह एक नया पथ है, और यहाँ तक कि बहुत से वचन भी जिन्हें कभी यीशु के द्वारा कहा गया था, वे अब और लागू नहीं होते हैं। जो मैं कहता हूँ वह एक नये युग को शुरू करने का कार्य है, और यह ऐसा कार्य है जो अकेला जारी रहता है; जो कार्य मैं करता हूँ, और जो वचन मैं कहता हूँ, वे सब नए हैं। क्या यह आज का नया कार्य नहीं है? यीशु का कार्य भी इसके जैसा ही था। उसका कार्य भी मन्दिर के लोगों से भिन्न था, और इसलिए यह फरीसियों के कार्य से भी भिन्न था, और न ही यह उस कार्य के समान था जो इस्राएल के सभी लोगों द्वारा किया गया था। इसे देखने के बाद, लोग अपना मन नहीं बना सके: "क्या इसे सचमुच में परमेश्वर के द्वारा किया गया था?" यीशु ने यहोवा की व्यवस्था को नहीं माना; जब वह मनुष्य को सिखाने आया, तो जो कुछ उसने कहा वह उससे नया और भिन्न था जिन्हें प्राचीन संतों और पुराने नियम के भविष्यवक्ताओं के द्वारा कहा गया था, और इस वजह से, लोग अनिश्चित बने रहे। यह वह बात है जिससे मनुष्य के साथ निपटना बहुत ही कठिन हो जाता है। कार्य के इस नये चरण को स्वीकार करने से पहले, वह पथ जिस पर तुम में से अधिकतर लोग चलते थे, वह उन आध्यात्मिक व्यक्तियों की उस नींव का अभ्यास करना और उसमें प्रवेश करना था। परन्तु आज, वह कार्य जिसे मैं करता हूँ वह बहुत ही भिन्न है, और इसलिए तुम लोग यह निर्णय लेने में असमर्थ हो कि यह सही है या नहीं। मैं परवाह नहीं करता हूँ कि पहले तुम किस पथ पर चले थे, न ही मेरी इसमें रुचि है कि तुमने किसका "भोजन" खाया था, या किसे तुमने अपने "पिता" के रूप में अपनाया था। चूँकि मैं आ गया हूँ और मनुष्य का मार्गदर्शन करने के लिए नया कार्य लाया हूँ, इसलिए जो मेरा अनुसरण करते हैं उन सभी को जो कुछ मैं कहता हूँ उसके अनुसार अवश्य कार्य करना चाहिए। तुम चाहे कितने ही सामर्थ्यवान "परिवार" से क्यों न आते हों, तुम्हें मेरा अनुसरण करना ही होगा, तुम्हें अपने पहले के अभ्यासों के अनुसार अवश्य ही काम नहीं करना चाहिए, तुम्हारे "पालक पिता" को पद से हट जाना चाहिए, और अपना न्यायसंगत हिस्सा खोजने के लिए तुम्हें अपने परमेश्वर के सामने आना चाहिए। तुम समग्र रूप से मेरे ही हाथों में हो, और तुम्हें अपने पालक पिता के प्रति बहुत अधिक अंधा विश्वास अर्पित नहीं करना चाहिए; वह तुम्हें पूरी तरह से नियन्त्रित नहीं कर सकता है। आज का कार्य अकेले जारी है। जो कुछ मैं आज कहता हूँ वह सब स्पष्ट रूप से अतीत की किसी बुनियाद पर आधारित नहीं है; यह एक नई शुरुआत है, और यदि तुम कहो कि इसे मनुष्य के हाथ से सृजित किया जाता है, तो तुम ऐसे व्यक्ति हो जो इतना अंधा है कि बचाया नहीं जा सकता है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पदवियों और पहचान के सम्बन्ध में' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 163

यशायाह, यहेजकेल, मूसा, दाऊद, अब्राहम और दानिय्येल इस्राएल के चुने हुए लोगों में से अगुवे या भविष्यवक्ता थे। उन्हें परमेश्वर क्यों नहीं कहा गया था? क्यों पवित्र आत्मा ने उनकी गवाही नहीं दी? क्यों जैसे ही यीशु ने अपना कार्य प्रारम्भ किया और अपने वचनों को बोलना आरम्भ किया तो पवित्र आत्मा ने यीशु की गवाही दी? और क्यों पवित्र आत्मा ने अन्य लोगों की गवाही नहीं दी? जो मनुष्य हाड़-माँस के थे, उन्हें, "प्रभु" कहकर पुकारा जाता था। इस बात की परवाह किये बिना कि उन्हें क्या कहकर पुकारा जाता था, उनका कार्य उनके अस्तित्व और सार को दर्शाता है, और उनका अस्तित्व और सार उनकी पहचान को दर्शाता है। उनका सार उनकी पदवियों से सम्बंधित नहीं है; जो कुछ वे अभिव्यक्त करते थे, और जैसा जीवन वे जीते थे, इसे उसके द्वारा दर्शाया जाता है। पुराने नियम में, प्रभु कहकर पुकारा जाना सामान्य बात था, और किसी भी व्यक्ति को किसी भी तरह से पुकारा जा सकता था, परन्तु उसका सार और अंतर्निहित पहचान अपरिवर्तनीय रहती थी। उन झूठे मसीहाओं, झूठे भविष्यवक्ताओं और धोखेबाजों के बीच, क्या ऐसे लोग भी नहीं हैं जिन्हें "परमेश्वर" कहा जाता है? और वे परमेश्वर क्यों नहीं हैं? क्योंकि वे परमेश्वर का कार्य करने में असमर्थ हैं। मूलतः वे मनुष्य और लोगों को धोखा देने वाले हैं, न कि परमेश्वर; और इसलिए उनके पास परमेश्वर की पहचान नहीं है। क्या बारह गोत्रों में दाऊद को भी प्रभु कहकर नहीं पुकारा जाता था? यीशु को भी प्रभु कहकर पुकारा गया था; क्यों सिर्फ यीशु को ही देहधारी परमेश्वर कहकर पुकारा गया था? क्या यिर्मयाह को भी मनुष्य के पुत्र के रूप में नहीं जाना जाता था? और क्या यीशु को मनुष्य के पुत्र के रूप में नहीं जाना जाता था? क्यों यीशु को परमेश्वर की ओर से सलीब पर चढ़ाया गया था? क्या ऐसा इसलिए नहीं है क्योंकि उसका सार भिन्न था? क्या ऐसा इसलिए नहीं है क्योंकि जो कार्य उसने किया वह भिन्न था? क्या पद नाम से फर्क पड़ता है? यद्यपि यीशु को भी मनुष्य का पुत्र कहा जाता था, फिर भी वह परमेश्वर का पहला देहधारण था, वह सामर्थ्य ग्रहण करने, और छुटकारे के कार्य को पूरा करने के लिए आया था। यह साबित करता है कि यीशु की पहचान और सार उन दूसरों से भिन्न थे जिन्हें भी मनुष्य का पुत्र कहा जाता था। आज, तुम लोगों में से कौन यह कहने का साहस कर सकता है कि पवित्र आत्मा के द्वारा उपयोग किए गए लोगों द्वारा कहे गए सभी वचन पवित्र आत्मा से आये थे? क्या किसी में ऐसी चीज़ें कहने का साहस है? यदि तुम ऐसी चीज़ें कहते हो, तो फिर क्यों एज्रा की भविष्यवाणी की पुस्तक को नामंज़ूर कर दिया गया था, और क्यों यही उन प्राचीन संतों और भविष्यवक्ताओं की पुस्तकों के साथ किया गया था? यदि वे सभी पवित्र आत्मा से आयी थीं, तो तुम लोग क्यों ऐसे स्वेच्छाचारी चुनाव करने का साहस करते हो? क्या तुम पवित्र आत्मा के कार्य को चुनने के योग्य हो? इस्राएल की बहुत सारी कहानियों को भी नामंज़ूर कर दिया दिया गया था। और यदि तुम मानते हो कि अतीत के ये सभी लेख पवित्र आत्मा से आये, तो फिर क्यों कुछ पुस्तकों को नामंज़ूर क्यों कर दिया गया था? यदि वे सभी पवित्र आत्मा से आये, तो उन सब को सुरक्षित रखा जाना चाहिए था, और पढ़ने के लिए कलीसियाओं के भाइयों और बहनों को भेजा जाना चाहिए था। उन्हें मानवीय इच्छा के अनुसार नहीं चुना या नामंज़ूर किया जाना चाहिए था; ऐसा करना ग़लत है। यह कहना कि पौलुस और यूहन्ना के अनुभव उनकी व्यक्तिगत अंतर्दृष्टियों के साथ घुल-मिल गए थे इसका यह मतलब नहीं है कि उनके अनुभव और ज्ञान शैतान से आये थे, बल्कि बात केवल इतनी है कि उनके पास ऐसी चीज़ें थीं जो उनके व्यक्तिगत अनुभवों और अंतर्दृष्टियों से आई थीं। उनका ज्ञान उस समय के उनके वास्तविक अनुभवों की पृष्ठभूमि के अनुसार था, और कौन आत्मविश्वास के साथ कह सकता था कि यह सब पवित्र आत्मा से आया था। यदि चारों सुसमाचार पवित्र आत्मा से आये, तो ऐसा क्यों था कि मत्ती, मरकुस, लूका और यूहन्ना प्रत्येक ने यीशु के कार्य के बारे कुछ भिन्न कहा? यदि तुम लोग इस पर विश्वास नहीं करते हो, तो फिर तुम बाइबल के विवरणों में देखो कि किस प्रकार पतरस ने प्रभु को तीन बार नकारा था: वे सब भिन्न हैं, और उनमें से प्रत्येक की अपनी विशेषताएँ हैं। बहुत से अज्ञानी लोग कहते हैं, "देहधारी परमेश्वर भी एक मनुष्य है, तो क्या जो वचन वह कहता है, वे पूरी तरह से पवित्र आत्मा से आ सकते हैं? जब पौलुस और यूहन्ना के वचन मानवीय इच्छा के साथ मिले हुए थे, तो क्या जिन वचनों को वो कहता है वे वास्तव में मानवीय इच्छा के साथ मिले हुए नहीं हैं?" जो लोग ऐसी बातें करते हैं वे अन्धे और अज्ञानी हैं! चारों सुसमाचारों को ध्यानपूर्वक पढ़ो; पढ़ो कि उन्होंने उन चीज़ों के बारे में क्या दर्ज किया है जो यीशु ने की थीं, और उन वचनों को पढ़ो जो उसने कहे थे। प्रत्येक विवरण, एकदम सरल रूप में भिन्न है और प्रत्येक का अपना परिप्रेक्ष्य है। यदि इन पुस्तकों के लेखकों के द्वारा जो कुछ लिखा गया था, वह सब पवित्र आत्मा से आया, तो यह सब एक समान और सुसंगत होना चाहिए। तो फिर उनमें विसंगतियाँ क्यों हैं? क्या मनुष्य अत्यंत मूर्ख नहीं है जो इसे देखने में असमर्थ है? यदि तुम्हें परमेश्वर की गवाही देने के लिए कहा जाता है, तो तुम किस प्रकार की गवाही प्रदान कर सकते हो? क्या परमेश्वर को जानने का ऐसा तरीका उसकी गवाही दे सकता है? यदि अन्य लोग तुमसे पूछें, "यदि यूहन्ना और लूका के लेख मानवीय इच्छा के साथ मिश्रित हो गए थे, तो क्या तुम लोगों के परमेश्वर के द्वारा कहे गए वचन मानवीय इच्छा से मिश्रित नहीं हैं?" क्या तुम एक स्पष्ट उत्तर दे पाओगे? लूका और मत्ती द्वारा यीशु के वचनों को सुनने और यीशु के कार्यों को देखने के पश्चात्, उन्होंने यीशु द्वारा किये गए कार्य के कुछ तथ्यों के संस्मरणों का विवरण देने के तरीके से स्वयं के ज्ञान के बारे में बोला था। क्या तुम कह सकते हो कि उनके ज्ञान को पूरी तरह से पवित्र आत्मा के द्वारा प्रकट किया गया था? बाइबल के बाहर, कई आध्यात्मिक व्यक्ति थे जिनके पास उनसे भी अधिक ज्ञान था तो बाद की पीढ़ियों के द्वारा उनके वचनों को क्यों नहीं अपनाया गया था? क्या उनका भी पवित्र आत्मा के द्वारा उपयोग नहीं किया गया था? यह जान लें कि आज के कार्य में, मैं यीशु के कार्य की बुनियाद पर अपनी अंतर्दृष्टियों के बारे में नहीं बोल रहा हूँ, न ही मैं यीशु के कार्य की पृष्ठभूमि में अपने ज्ञान के बारे में बोल रहा हूँ। उस समय यीशु ने कौन सा कार्य किया था? और आज मैं कौन सा कार्य कर रहा हूँ? जो मैं करता और कहता हूँ उसकी कोई मिसाल नहीं है। जिस पथ पर मैं आज चलता हूँ उस पर इससे पहले कभी नहीं चला गया है, इस पर बीते युगों और अतीत की पीढ़ियों के लोगों द्वारा कभी नहीं चला गया था। आज, इसका शुभारंभ कर दिया गया है, और क्या यह पवित्र आत्मा का कार्य नहीं है? यद्यपि यह पवित्र आत्मा का कार्य था, फिर भी अतीत के सभी अगुवाओं ने अपने कार्य को औरों की बुनियाद पर कार्यान्वित किया था; हालाँकि, स्वयं परमेश्वर का कार्य भिन्न होता है। यीशु के कार्य का चरण वही था: उसने एक नया मार्ग प्रशस्त किया। जब वह आया तब उसने स्वर्ग के राज्य के सुसमाचार का उपदेश दिया, और कहा कि मनुष्य को पश्चाताप करना और पाप-स्वीकार करना चाहिए। जब यीशु ने अपना कार्य पूरा किया, उसके बाद पतरस और पौलुस और दूसरों ने यीशु के कार्य को जारी रखना प्रारम्भ किया था। जब यीशु को सलीब पर चढ़ा दिया गया और उसका स्वर्ग में आरोहण हो गया, उसके बाद उन्हें सलीब के मार्ग को फैलाने के लिए पवित्र आत्मा के द्वारा भेजा गया था। यद्यपि पौलुस के वचन उत्कृष्ट थे, फिर भी, वे भी यीशु द्वारा कहे गए की बुनियाद पर आधारित थे, जैसे कि धैर्य, प्रेम, कष्ट, सिर ढकना, बपतिस्मा, या पालन किए जाने वाले अन्य सिद्धान्त। यह सब यीशु के वचनों की बुनियाद पर था। वे एक नया मार्ग खोलने में असमर्थ थे, क्योंकि वे सभी परमेश्वर के द्वारा उपयोग किए गए मनुष्य थे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पदवियों और पहचान के सम्बन्ध में' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 164

उस समय यीशु के कथन और कार्य सिद्धान्त के अनुसार नहीं थे, और उसने अपने कार्य को पुराने नियम की व्यवस्था के कार्य के अनुसार कार्यान्वित नहीं किया था। यह उस कार्य के अनुसार कार्यान्वित किया गया था जो अनुग्रह के युग में किया जाना चाहिए। उसने उस कार्य के अनुसार जो वह सामने लाया था, स्वयं की योजना के अनुसार, और अपने सेवकाई के अनुसार परिश्रम किया; उसने पुराने नियम की व्यवस्था के अनुसार कार्य नहीं किया। उसने जो भी किया उसमें कुछ भी पुराने नियम की व्यवस्था के अनुसार नहीं था, और वह भविष्यवक्ताओं के वचनों को पूरा करने के कार्य को करने के लिए नहीं आया था। परमेश्वर के कार्य का प्रत्येक चरण स्पष्ट रूप से प्राचीन भविष्यवक्ताओं की भविष्यवाणियों को पूरा करने के लिए नहीं किया गया था, वह सिद्धान्त का पालन करने या प्राचीन भविष्यवक्ताओं की भविष्यवाणियों को जान-बूझकर साकार करने के लिए नहीं आया था। फिर भी उसके कार्यों ने प्राचीन भविष्यवक्ताओं की भविष्यवाणियों में व्यावधान नहीं डाला, न ही उन्होंने उसके द्वारा पहले किए गए कार्य में व्यावधान डाला था। उसके कार्य का प्रमुख बिन्दु किसी सिद्धान्त का पालन नहीं करना, और इसके बजाय उस कार्य को करना था जो उसे स्वयं करना चाहिए था। वह कोई भविष्यवक्ता या नबी नहीं था, बल्कि कार्य करने वाला था, जो वास्तव में उस कार्य को करने आया था जिसे करने की अपेक्षा उससे की गई थी, और वह अपने नए युग को शुरू करने और अपने नये कार्य को कार्यान्वित करने के लिए आया था। निस्संदेह, जब यीशु अपना कार्य करने के लिए आया, तो उसने पुराने नियम में प्राचीन भविष्यवक्ताओं के द्वारा कहे गए बहुत से वचनों को भी पूरा किया। इसलिए आज के कार्य ने पुराने नियम के प्राचीन भविष्यवक्ताओं की भविष्यवाणियों को भी पूरा किया है। बस ऐसा है कि मैं उस "पीली पड़ चुकी पुरानी जन्त्री" को पकड़े नहीं रहता हूँ, बस इतना ही। क्योंकि और भी बहुत से कार्य हैं जो मुझे करने हैं, तथा और भी बहुत से वचन हैं जो मुझे तुम लोगों से अवश्य कहने हैं; और यह कार्य और ये वचन बाइबल के अंशों की व्याख्या करने की तुलना में कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि ऐसे कार्य का तुम लोगों के लिए कोई बड़ा महत्व या मूल्य नहीं है, और यह तुम लोगों की सहायता नहीं कर सकता है, या तुम लोगों को बदल नहीं सकता है। मैं नया कार्य करने का इरादा बाइबल के किसी अंश को पूरा करने के वास्ते नहीं करता हूँ। यदि परमेश्वर केवल बाइबल के प्राचीन भविष्यवक्ताओं के वचनों को पूरा करने के लिए पृथ्वी पर आया, तो अधिक बड़ा कौन है, देहधारी परमेश्वर या वे प्राचीन भविष्यवक्ता? आख़िरकार, क्या भविष्यवक्ता परमेश्वर के प्रभारी हैं, या परमेश्वर भविष्यवक्ताओं का प्रभारी है? तुम इन वचनों की व्याख्या कैसे करते हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पदवियों और पहचान के सम्बन्ध में' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 165

परमेश्वर के कार्य का प्रत्येक चरण एक ही धारा का अनुसरण करता है, और इसलिए परमेश्वर की छह-हज़ार-वर्षीय प्रबंधन योजना में, संसार की नींव से लेकर ठीक आज तक, प्रत्येक कदम का अगले कदम के द्वारा नज़दीकी से अनुसरण किया गया है। यदि मार्ग प्रशस्त करने के लिए कोई न होता, तो पीछे चलने के लिए कोई न होता; चूँकि ऐसे लोग हैं जो पीछे चलते हैं, इसलिए ऐसे लोग हैं जो मार्ग प्रशस्त करते हैं। इस तरह से कदम-दर-कदम कार्य को आगे बढ़ाया गया है। एक कदम दूसरे कदम का अनुसरण करता है, और मार्ग प्रशस्त करने वाले किसी व्यक्ति के बिना, कार्य को आरंभ करना असंभव होता, और परमेश्वर के पास अपने कार्य को आगे ले जाने का कोई साधन नहीं होता। कोई भी कदम दूसरे कदम का खण्डन नहीं करता है, और एक धारा बनाने के लिए प्रत्येक कदम दूसरे कदम का क्रम से अनुसरण करता है; यह सब एक ही पवित्रात्मा के द्वारा किया जाता है। परन्तु इस बात पर ध्यान दिए बिना कि कोई व्यक्ति मार्ग खोलता है या नहीं, या दूसरे के कार्य को जारी रखता है या नहीं, यह उनकी पहचान को निर्धारित नहीं करता है। क्या यह सही नहीं है? यूहन्ना ने मार्ग खोला, और यीशु ने उसके कार्य को जारी रखा, तो क्या इससे साबित होता है कि यीशु की पहचान यूहन्ना से निम्नतर थी? यीशु से पहले यहोवा ने अपने कार्य को कार्यान्वित किया, तो क्या तुम कह सकते हो कि यहोवा यीशु से अधिक महान है? यह महत्वपूर्ण नहीं है कि उन्होंने मार्ग प्रशस्त किया या दूसरे के कार्य को जारी रखा; जो सर्वाधिक महत्वपूर्ण है वह उनके कार्य का सार, और वह पहचान जो इसे दर्शाती है। क्या यह सही नहीं है? चूँकि परमेश्वर का मनुष्य के बीच कार्य करने का इरादा था, इसलिए उसे ऐसे लोगों का पोषण करना था जो मार्ग प्रशस्त करने का कार्य कर सकते थे। जब यूहन्ना ने धर्म का उपदेश देना शुरू किया ही था, तो उसने कहा था, "प्रभु का मार्ग तैयार करो, उसकी सड़कें सीधी करो।" "मन फिराओ, क्योंकि स्वर्ग का राज्य निकट आ गया है।" उसने शुरुआत से ही ऐसा कहा, और वह इन वचनों को क्यों कह पाया था? जिस क्रम में इन वचनों को कहा गया था उस लिहाज से, यह यूहन्ना था जिसने सबसे पहले स्वर्ग के राज्य के सुसमाचार को कहा था, और यीशु ने उसके बाद बोला था। मनुष्य की धारणाओं के अनुसार, यह यूहन्ना था जिसने नया पथ प्रशस्त किया था, और इसलिए निस्संदेह यूहन्ना यीशु से अधिक महान था। परन्तु यूहन्ना ने नहीं कहा था कि वह मसीह है, और परमेश्वर ने परमेश्वर के प्रिय पुत्र के रूप में उसकी गवाही नहीं दी थी, बल्कि मार्ग को प्रशस्त करने और प्रभु के लिए मार्ग तैयार करने के लिए मात्र उसका उपयोग किया था। उसने यीशु के लिए मार्ग प्रशस्त किया था, परन्तु वह यीशु की ओर से कार्य नहीं कर सकता था। मनुष्य का समस्त कार्य भी पवित्र आत्मा के द्वारा बनाए रखा जाता है।

पुराने नियम के युग में, यहोवा ने मार्ग की अगुवाई की थी, और यहोवा का कार्य पुराने नियम के सम्पूर्ण युग, और इस्राएल में किये गये समस्त कार्य को दर्शाता था। मूसा ने तो मात्र इस कार्य को पृथ्वी पर कायम रखा था, और उसके परिश्रम को मनुष्य के द्वारा प्रदान किया गया सहयोग माना जाता है। उस समय, यह यहोवा ही था जो बोलता था, मूसा को बुलाता था, और उसने मूसा को इस्राएल के लोगों में से ऊपर उठाया था, और उससे जंगल में और कनान की ओर उनकी अगुवाई करवाई थी। यह स्वयं मूसा का कार्य नहीं था, परन्तु ऐसा कार्य था जिसे यहोवा द्वारा व्यक्तिगत रूप से निर्देशित किया गया था, और इसलिए मूसा को परमेश्वर नहीं कहा जा सकता है। मूसा ने भी व्यवस्था निर्धारित की, परन्तु इस व्यवस्था का आदेश यहोवा के द्वारा व्यक्तिगत रूप से दिया गया था। बस इतना ही था कि उसने उन्हें मूसा से व्यक्त करवाया था। यीशु ने भी आज्ञाएँ दी, और पुराने नियम की व्यवस्था का उन्मूलन किया और नये युग के लिए आज्ञाएँ निर्दिष्ट कीं। यीशु स्वयं परमेश्वर क्यों है? क्योंकि यहाँ एक फ़र्क है। उस समय, मूसा के द्वारा किया गया कार्य युग को नहीं दर्शाता था, न ही उसने कोई नया मार्ग खोला था; उसे यहोवा के द्वारा आगे निर्देशित किया गया था, और वह मात्र ऐसा व्यक्ति था जिसे परमेश्वर के द्वारा उपयोग किया गया था। जब यीशु आया, तब यूहन्ना ने मार्ग प्रशस्त करने के कार्य के एक कदम को कार्यान्वित कर लिया था, और स्वर्ग के राज्य के सुसमाचार को फैलाना शुरू कर दिया था (पवित्र आत्मा ने इसे शुरू किया था)। जब यीशु आया, तो उसने सीधे तौर पर खुद का कार्य किया, परन्तु उसके कार्य और मूसा के कार्य के बीच में एक बहुत बड़ा अन्तर था। यशायाह ने भी बहुत सी भविष्यवाणियाँ कहीं, फिर भी क्यों वह स्वयं परमेश्वर नहीं था? यीशु ने बहुत सी भविष्यवाणियाँ नहीं कही, फिर भी क्यों वह स्वयं परमेश्वर था? किसी ने भी यह कहने का साहस नहीं किया कि उस समय यीशु का समस्त कार्य पवित्र आत्मा की ओर से आया, न ही उन्होंने यह कहने का साहस किया कि यह सब मनुष्य की इच्छा से आया, या यह पूरी तरह स्वयं परमेश्वर का कार्य था। मनुष्य के पास ऐसी बातों का विश्लेषण करने का कोई तरीका नहीं था। यह कहा जा सकता है कि यशायाह ने ऐसा कार्य किया था, और ऐसी भविष्यवाणियाँ कही, और वे सभी पवित्र आत्मा से आयीं; वे सीधे तौर पर स्वयं यशायाह से नहीं आयीं, बल्कि यहोवा की ओर से प्रकाशन थे। यीशु ने बड़ी मात्रा में कार्य नहीं किया, और बहुत सारे वचनों को नहीं कहा, न ही उसने बहुत सारी भविष्यवाणियाँ कहीं। मनुष्य के लिए, उसका उपदेश विशेष रूप से उत्कृष्ट प्रतीत नहीं होता था, फिर भी वह स्वयं परमेश्वर था, और यह मनुष्य के लिए अकथनीय है। किसी ने कभी भी यूहन्ना, या यशायाह, या दाऊद पर विश्वास नहीं किया है; न ही किसी ने कभी उन्हें परमेश्वर कहा, या दाऊद परमेश्वर, या यूहन्ना परमेश्वर कहा; किसी ने कभी भी ऐसा नहीं बोला, और केवल यीशु को ही हमेशा मसीह कहा गया है। यह वर्गीकरण परमेश्वर की गवाही, उस कार्य जिसका उसने उत्तरदायित्व लिया, और उस सेवकाई, जो उसने की, उसके अनुसार किया जाता है। बाइबल के महापुरुषों—अब्राहम, दाऊद, यहोशू, दानिय्येल, यशायाह, यूहन्ना और यीशु—के संबंध में उनके द्वारा किए गए कार्य के माध्यम से तुम कह सकते हो कि स्वयं परमेश्वर कौन है, और किस प्रकार के लोग भविष्यवक्ता हैं, और कौन प्रेरित हैं। किसे परमेश्वर के द्वारा उपयोग किया गया था, और कौन स्वयं परमेश्वर था, यह सार और जिस प्रकार का कार्य उन्होंने किया, उसके द्वारा विभेदित और निर्धारित किया जाता है। यदि तुम अन्तर बताने में असमर्थ हो, तो इससे साबित होता है कि तुम नहीं जानते हो कि परमेश्वर में विश्वास करने का अर्थ क्या होता है। यीशु परमेश्वर है क्योंकि उसने बहुत सारे वचन कहे, और बहुत अधिक कार्य किया, विशेष रूप से उसके द्वारा अनेक चमत्कारों का प्रदर्शन। उसी तरह, यूहन्ना ने भी बहुत अधिक कार्य किया, और बहुत सारे वचनों को बोला, मूसा ने भी ऐसा ही किया था; क्यों उन्हें परमेश्वर नहीं कहा गया था? आदम का सृजन सीधे तौर पर परमेश्वर के द्वारा किया गया था; सिर्फ एक प्राणी कहे जाने के बजाए, क्यों उसे परमेश्वर नहीं कहा गया था? यदि कोई तुमसे कहे, "आज, परमेश्वर ने बहुत अधिक कार्य किया है, और बहुत सारे वचन कहे हैं; वह स्वयं परमेश्वर है। तो, चूँकि मूसा ने बहुत सारे वचन कहे, इसलिए वह भी स्वयं परमेश्वर अवश्य होना चाहिए!" तुम्हें बदले में उनसे पूछना चाहिए, "उस समय, क्यों परमेश्वर ने स्वयं परमेश्वर के रूप में यीशु की गवाही दी, और यूहन्ना की नहीं दी?" क्या यूहन्ना यीशु से पहले नहीं आया था? यूहन्ना का कार्य महान था या यीशु का कार्य? मनुष्य को यूहन्ना का कार्य यीशु के कार्य से अधिक महान प्रतीत होता है, परन्तु क्यों पवित्र आत्मा ने यीशु की गवाही दी, और यूहन्ना की नहीं? आज भी वही चीज़ हो रही है! उस समय, जब मूसा ने इस्राएल के लोगों की अगुवाई की, तो यहोवा ने बादलों में से उससे बात की। मूसा ने सीधे तौर पर बात नहीं की, बल्कि इसके बजाए यहोवा के द्वारा सीधे तौर पर उसका मार्गदर्शन किया गया था। यह पुराने नियम के इस्राएल का कार्य था। मूसा के भीतर पवित्रात्मा, या परमेश्वर का अस्तित्व नहीं था। वह उस कार्य को नहीं कर सकता था, और इसलिए उसके द्वारा और यीशु के द्वारा किए गए कार्य में एक बड़ा अन्तर है। और ऐसा इसलिए है क्योंकि उन्होंने जो कार्य किया वह भिन्न था! किसी व्यक्ति को परमेश्वर के द्वारा उपयोग किया जाता है या नहीं, या वह कोई भविष्यवक्ता, या कोई प्रेरित, या स्वयं परमेश्वर है या नहीं, इसे उसके कार्य की प्रकृति के द्वारा पहचाना जा सकता है, और यह तुम्हारे सन्देहों का अन्त कर देगा। बाइबल में यह लिखा है कि सिर्फ मेमना ही सात मुहरों को खोल सकता है। विभिन्न युगों के दौरान, उन महान व्यक्तियों में पवित्रशास्त्रों के अनेक प्रतिपादक हुए हैं, और इसलिए क्या तुम कह सकते हो कि वे सब मेमने हैं? क्या तुम कह सकते हो कि उनकी सभी व्याख्याएँ परमेश्वर से आई थीं? वे तो मात्र प्रतिपादक हैं; उनके पास मेमने की पहचान नहीं है। वे कैसे सात मोहरों को खोलने के योग्य हो सकते हैं? यह सत्य है कि "सिर्फ मेमना ही सात मोहरों को खोल सकता है," परन्तु वह सिर्फ सात मुहरों को खोलने के लिए ही नहीं आता है; इस कार्य की कोई आवश्यकता नहीं है, यह संयोगवश होता है। वह अपने कार्य के बारे में बिल्कुल स्पष्ट है; क्या पवित्रशास्त्रों की व्याख्या करने में काफ़ी समय बिताना उसके लिए आवश्यक है? क्या "पवित्रशास्त्रों की व्याख्या करते मेमने के युग" को छह हज़ार वर्षों के कार्य के साथ अवश्य जोड़ा जाना चाहिए? वह नया कार्य करने के लिए आता है, परन्तु वह, लोगों को छह हज़ार वर्षों के कार्य के सत्य को समझाते हुए, बीते समयों के कार्य के बारे में भी कुछ प्रकाशनों को प्रदान करता है। बाइबल के बहुत सारे अंशों की व्याख्या करने की कोई आवश्यकता नहीं है; यह आज का कार्य है जो प्रमुख है, जो महत्वपूर्ण है। तुम्हें जानना चाहिए कि परमेश्वर विशेष रूप से सात मुहरों को तोड़ने के लिए नहीं आता है, बल्कि उद्धार के कार्य को करने के लिए आता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पदवियों और पहचान के सम्बन्ध में' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 166

अनुग्रह के युग में यूहन्ना ने यीशु का मार्ग प्रशस्त किया। यूहन्ना स्वयं परमेश्वर का कार्य नहीं कर सकता था और उसने मात्र मनुष्य का कर्तव्य पूरा किया था। यद्यपि यूहन्ना प्रभु का अग्रदूत था, फिर भी वह परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने में असमर्थ था; वह पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किया गया मात्र एक मनुष्य था। यीशु के बपतिस्मा लेने के बाद पवित्र आत्मा कबूतर के समान उस पर उतरा। तब यीशु ने अपना काम शुरू किया, अर्थात् उसने मसीह की सेवकाई करनी प्रारंभ की। इसीलिए उसने परमेश्वर की पहचान अपनाई, क्योंकि वह परमेश्वर से ही आया था। भले ही इससे पहले उसका विश्वास कैसा भी रहा हो—वह कई बार दुर्बल रहा होगा, या कई बार मज़बूत रहा होगा—यह सब अपनी सेवकाई करने से पहले के उसके सामान्य मानव-जीवन से संबंधित था। उसका बपतिस्मा (अभिषेक) होने के पश्चात्, उसके पास तुरंत ही परमेश्वर का सामर्थ्य और महिमा आ गई, और इस प्रकार उसने अपनी सेवकाई करनी आरंभ की। वह चिह्नों का प्रदर्शन और अद्भुत काम कर सकता था, चमत्कार कर सकता था, और उसके पास सामर्थ्य और अधिकार था, क्योंकि वह सीधे स्वयं परमेश्वर की ओर से काम कर रहा था; वह पवित्रात्मा के स्थान पर उसका काम कर रहा था और पवित्रात्मा की आवाज़ व्यक्त कर रहा था। इसलिए, वह स्वयं परमेश्वर था; यह निर्विवाद है। यूहन्ना वह व्यक्ति था, जिसका पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किया गया था। वह परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता था, न ही परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करना उसके लिए संभव था। यदि वह ऐसा करना चाहता, तो पवित्र आत्मा ने इसकी अनुमति नहीं दी होती, क्योंकि वह उस काम को करने में असमर्थ था, जिसे स्वयं परमेश्वर संपन्न करने का इरादा रखता था। कदाचित् उसमें बहुत-कुछ ऐसा था, जो मनुष्य की इच्छा का था, या कुछ ऐसा, जो विचलन भरा था; वह किसी भी परिस्थिति में प्रत्यक्ष रूप से परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता था। उसकी ग़लतियाँ और त्रुटिपूर्णता केवल उसका ही प्रतिनिधित्व करती थीं, किंतु उसका काम पवित्र आत्मा का प्रतिनिधि था। फिर भी, तुम यह नहीं कह सकते कि उसका सब-कुछ परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करता था। क्या उसका विचलन और त्रुटिपूर्णता भी परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकते थे? मनुष्य का प्रतिनिधित्व करने में गलत होना सामान्य है, परंतु यदि कोई परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने में विचलित होता है, तो क्या यह परमेश्वर के प्रति अनादर नहीं होगा? क्या यह पवित्र आत्मा के विरुद्ध ईशनिंदा नहीं होगी? पवित्र आत्मा मनुष्य को आसानी से परमेश्वर के स्थान पर खड़े होने की अनुमति नहीं देता, भले ही दूसरों के द्वारा उसे ऊँचा स्थान दिया गया हो। यदि वह परमेश्वर नहीं है, तो वह अंत में खड़े रहने में असमर्थ होगा। पवित्र आत्मा मनुष्य को, जैसे मनुष्य चाहे वैसे, परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने की अनुमति नहीं देता! उदाहरण के लिए, पवित्र आत्मा ने ही यूहन्ना की गवाही दी और उसी ने उसे यीशु के लिए मार्ग प्रशस्त करने वाले व्यक्ति के रूप में भी प्रकट किया, परंतु पवित्र आत्मा द्वारा उस पर किया गया कार्य अच्छी तरह से मापा हुआ था। यूहन्ना से कुल इतना कहा गया था कि वह यीशु के लिए मार्ग तैयार करने वाला बने, उसके लिए मार्ग तैयार करे। कहने का अभिप्राय यह है कि पवित्र आत्मा ने केवल मार्ग बनाने में उसके कार्य का समर्थन किया और उसे केवल इसी प्रकार का कार्य करने की अनुमति दी—उसे कोई अन्य कार्य करने की अनुमति नहीं दी गई थी। यूहन्ना ने एलिय्याह का प्रतिनिधित्व किया था, और वह उस नबी का प्रतिनिधित्व करता था, जिसने मार्ग तैयार किया था। पवित्र आत्मा ने इसमें उसका समर्थन किया था; जब तक उसका कार्य मार्ग तैयार करना था, तब तक पवित्र आत्मा ने उसका समर्थन किया। किंतु यदि उसने दावा किया होता कि वह स्वयं परमेश्वर है और यह कहा होता कि वह छुटकारे का कार्य पूरा करने के लिए आया है, तो पवित्र आत्मा को उसे अनुशासित करना पड़ता। यूहन्ना का काम चाहे जितना भी बड़ा रहा हो, और चाहे पवित्र आत्मा ने उसे समर्थन दिया हो, फिर भी उसका काम असीम नहीं था। माना कि पवित्र आत्मा द्वारा उसके कार्य का समर्थन किया गया था, परंतु उस समय उसे दिया गया सामर्थ्य केवल उसके द्वारा मार्ग तैयार किए जाने तक ही सीमित था। वह कोई अन्य काम बिलकुल नहीं कर सकता था, क्योंकि वह सिर्फ यूहन्ना था जिसने मार्ग तैयार किया था, वह यीशु नहीं था। इसलिए, पवित्र आत्मा की गवाही महत्वपूर्ण है, किंतु पवित्र आत्मा जो कार्य मनुष्य को करने की अनुमति देता है, वह और भी अधिक महत्वपूर्ण है। क्या यूहन्ना ने उस समय ज़बरदस्त गवाही प्राप्त नहीं की थी? क्या उसका काम भी महान नहीं था? किंतु जो काम उसने किया, वह यीशु के काम से बढ़कर नहीं हो सका, क्योंकि वह पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए गए व्यक्ति से अधिक नहीं था और वह सीधे परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता था, और इसलिए उसने जो काम किया, वह सीमित था। जब उसने मार्ग तैयार करने का काम समाप्त कर लिया, पवित्र आत्मा ने उसके बाद उसकी गवाही बरक़रार नहीं रखी, कोई नया काम उसके पीछे नहीं आया, और स्वयं परमेश्वर का काम शुरू होते ही वह चला गया।

कुछ ऐसे लोग हैं, जो दुष्टात्माओं से ग्रस्त हैं और ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाते रहते हैं, "मैं परमेश्‍वर हूँ!" लेकिन अंत में, उनका भेद खुल जाता है, क्योंकि वे गलत चीज़ का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे शैतान का प्रतिनिधित्व करते हैं, और पवित्र आत्मा उन पर कोई ध्यान नहीं देता। तुम अपने आपको कितना भी बड़ा ठहराओ या तुम कितना भी जोर से चिल्लाओ, तुम फिर भी एक सृजित प्राणी ही रहते हो और एक ऐसा प्राणी, जो शैतान से संबंधित है। मैं कभी नहीं चिल्लाता, "मैं परमेश्वर हूँ, मैं परमेश्वर का प्रिय पुत्र हूँ!" परंतु जो कार्य मैं करता हूँ, वह परमेश्वर का कार्य है। क्या मुझे चिल्लाने की आवश्यकता है? मुझे ऊँचा उठाए जाने की कोई आवश्यकता नहीं है। परमेश्वर अपना काम स्वयं करता है और वह नहीं चाहता कि मनुष्य उसे हैसियत या सम्मानजनक उपाधि प्रदान करे : उसका काम उसकी पहचान और हैसियत का प्रतिनिधित्व करता है। अपने बपतिस्मा से पहले क्या यीशु स्वयं परमेश्वर नहीं था? क्या वह परमेश्वर द्वारा धारित देह नहीं था? निश्चित रूप से यह नहीं कहा जा सकता कि केवल गवाही मिलने के पश्चात् ही वह परमेश्वर का इकलौता पुत्र बना। क्या उसके द्वारा काम शुरू करने से बहुत पहले ही यीशु नाम का कोई व्यक्ति नहीं था? तुम नए मार्ग लाने या पवित्रात्मा का प्रतिनिधित्व करने में असमर्थ हो। तुम पवित्र आत्मा के कार्य को या उसके द्वारा बोले जाने वाले वचनों को व्यक्त नहीं कर सकते। तुम स्वयं परमेश्वर का या पवित्रात्मा का कार्य करने में असमर्थ हो। परमेश्वर की बुद्धि, चमत्कार और अगाधता, और उसके स्वभाव की समग्रता, जिसके द्वारा परमेश्वर मनुष्य को ताड़ना देता है—इन सबको व्यक्त करना तुम्हारी क्षमता के बाहर है। इसलिए परमेश्वर होने का दावा करने की कोशिश करना व्यर्थ होगा; तुम्हारे पास सिर्फ़ नाम होगा और कोई सार नहीं होगा। स्वयं परमेश्वर आ गया है, किंतु कोई उसे नहीं पहचानता, फिर भी वह अपना काम जारी रखता है और ऐसा वह पवित्रात्मा के प्रतिनिधित्व में करता है। चाहे तुम उसे मनुष्य कहो या परमेश्वर, प्रभु कहो या मसीह, या उसे बहन कहो, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। परंतु जो कार्य वह करता है, वह पवित्रात्मा का है और वह स्वयं परमेश्वर के कार्य का प्रतिनिधित्व करता है। वह इस बात की परवाह नहीं करता कि मनुष्य उसे किस नाम से पुकारता है। क्या वह नाम उसके काम का निर्धारण कर सकता है? चाहे तुम उसे कुछ भी कहकर पुकारो, जहाँ तक परमेश्वर का संबंध है, वह परमेश्वर के आत्मा का देहधारी स्वरूप है; वह पवित्रात्मा का प्रतिनिधित्व करता है और उसके द्वारा अनुमोदित है। यदि तुम एक नए युग के लिए मार्ग नहीं बना सकते, या पुराने युग का समापन नहीं कर सकते, या एक नए युग का सूत्रपात या नया कार्य नहीं कर सकते, तो तुम्हें परमेश्वर नहीं कहा जा सकता!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारण का रहस्य (1)' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 167

यहाँ तक कि जिस मनुष्य का पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किया जाता है, वह भी स्वयं परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता। इतना ही नहीं कि ऐसा व्यक्ति परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता, बल्कि उसके द्वारा किया जाने वाला काम भी सीधे तौर पर परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता। दूसरे शब्दों में, मनुष्य के अनुभव को सीधे तौर पर परमेश्वर के प्रबंधन के अंतर्गत नहीं रखा जा सकता, और वह परमेश्वर के प्रबंधन का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता। वह समस्त कार्य, जिसे स्वयं परमेश्वर करता है, ऐसा कार्य है, जिसे वह अपनी स्वयं की प्रबंधन योजना में करने का इरादा करता है और वह बड़े प्रबंधन से संबंध रखता है। मनुष्य द्वारा किए गए कार्य में उसके व्यक्तिगत अनुभव की आपूर्ति शामिल रहती है। उसमें उस मार्ग से भिन्न, जिस पर पहले के लोग चले थे, अनुभव के एक नए मार्ग की खोज, और पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन में अपने भाइयों और बहनों का मार्गदर्शन करना शामिल रहता है। इस तरह के लोग अपने व्यक्तिगत अनुभव या आध्यात्मिक मनुष्यों के आध्यात्मिक लेखन की ही आपूर्ति करते हैं। यद्यपि इन लोगों का पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किया जाता है, फिर भी वे जो कार्य करते हैं, वह छह-हज़ार-वर्षीय योजना के बड़े प्रबंधन-कार्य से संबंध नहीं रखता। वे सिर्फ ऐसे लोग हैं, जिन्हें पवित्र आत्मा द्वारा विभिन्न अवधियों में उभारा गया, ताकि वे तब तक पवित्र आत्मा की धारा में लोगों की अगुआई करें, जब तक कि वे जो कार्य कर सकते हैं, वे पूरे न हो जाएँ या उनके जीवन का अंत न हो जाए। जो कार्य वे करते हैं, वह केवल स्वयं परमेश्वर के लिए एक उचित मार्ग तैयार करना है या पृथ्वी पर स्वयं परमेश्वर की प्रबंधन-योजना का एक निश्चित पहलू जारी रखना है। अपने आप में ये लोग उसके प्रबंधन का महान कार्य करने में सक्षम नहीं होते, न ही वे नए मार्गों की शुरुआत कर सकते हैं, उनमें से कोई पिछले युग के परमेश्वर के समस्त कार्य का समापन तो बिलकुल भी नहीं कर सकता। इसलिए, जो कार्य वे करते हैं, वह केवल अपने कार्य संपन्न करने वाले एक सृजित प्राणी का प्रतिनिधित्व करता है, वह अपनी सेवकाई संपन्न करने वाले स्वयं परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता। ऐसा इसलिए है, क्योंकि जो कार्य वे करते हैं, वह स्वयं परमेश्वर द्वारा किए जाने वाले कार्य के समान नहीं है। एक नए युग की शुरुआत करने का कार्य ऐसा नहीं है, जो परमेश्वर के स्थान पर मनुष्य द्वारा किया जा सकता हो। इसे स्वयं परमेश्वर के अलावा किसी अन्य के द्वारा नहीं किया जा सकता। मनुष्य के द्वारा किया जाने वाला समस्त कार्य एक सृजित प्राणी के रूप में उसके कर्तव्य का निर्वहन है और वह तब किया जाता है, जब पवित्र आत्मा द्वारा उसे प्रेरित या प्रबुद्ध किया जाता है। इन लोगों द्वारा प्रदान किया जाने वाला मार्गदर्शन मनुष्य को बस दैनिक जीवन में अभ्यास का मार्ग दिखाना और यह बताना होता है कि उसे किस प्रकार परमेश्वर की इच्छा के साथ समरसता में कार्य करना चाहिए। मनुष्य के कार्य में न तो परमेश्वर की प्रबंधन योजना सम्मिलित है और न ही वह पवित्रात्मा के कार्य का प्रतिनिधित्व करता है। उदाहरण के लिए, गवाह ली और वॉचमैन नी का कार्य मार्ग की अगुआई करना था। मार्ग चाहे नया हो या पुराना, कार्य बाइबल के सिद्धांतों के भीतर ही बने रहने के आधार पर किया गया था। चाहे स्थानीय कलीसियाओं को पुनर्स्थापित करना हो या स्थानीय कलीसियाओं को बनाना हो, उनका कार्य कलीसियाओं की स्थापना से संबंधित था। उनके द्वारा किए गए कार्य ने उस कार्य को आगे बढ़ाया, जिसे यीशु और उसके प्रेरितों ने समाप्त नहीं किया था या अनुग्रह के युग में आगे विकसित नहीं किया था। उन्होंने अपने कार्य में उस चीज़ को बहाल किया, जिसे यीशु ने अपने प्रारंभिक कार्य में अपने बाद आने वाली पीढ़ियों से करने को कहा था, जैसे कि अपना सिर ढककर रखना, बपतिस्मा लेना, रोटी साझा करना या दाखरस पीना। यह कहा जा सकता है कि उनका कार्य बाइबल का पालन करना था और बाइबल के भीतर ही मार्ग तलाशना था। उन्होंने किसी तरह के कोई नए प्रयास नहीं किए। इसलिए, कोई उनके कार्य में केवल बाइबल के भीतर ही नए मार्गों की खोज और साथ ही बेहतर और अधिक यथार्थवादी अभ्यास ही देख सकता है। किंतु कोई उनके कार्य में परमेश्वर की वर्तमान इच्छा नहीं खोज सकता, और उस कार्य को तो बिलकुल नहीं खोज सकता, जिसे अंत के दिनों में करने की परमेश्वर की योजना है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि जिस मार्ग पर वे चले, वह फिर भी पुराना ही था—उसमें कोई नवीनीकरण और नवीनता नहीं थी। उन्होंने यीशु को सलीब पर चढ़ाए जाने के तथ्य को पकड़े रखना, लोगों को पश्चात्ताप करने और अपने पाप स्वीकार करने के लिए कहने के अभ्यास का पालन करना, और इस तरह की उक्तियों का पालन जारी रखा, जैसे कि, जो अंत तक सहन करता है उसे बचा लिया जाएगा, और कि पुरुष स्त्री का सिर है और स्त्री को अपने पति की आज्ञा का पालन करना चाहिए, यहाँ तक कि उन्होंने इस परंपरागत धारणा को भी बनाए रखा कि बहनें उपदेश नहीं दे सकतीं, वे केवल आज्ञापालन कर सकती हैं। यदि इस तरह की अगुआई जारी रही होती, तो पवित्र आत्मा कभी भी नया कार्य करने, मनुष्यों को सिद्धांत से मुक्त करने, या उन्हें स्वतंत्रता और सुंदरता के राज्य में ले जाने में समर्थ नहीं होता। इसलिए, कार्य का यह चरण, जो युग का परिवर्तन करता है, स्वयं परमेश्वर द्वारा किया और बोला जाना चाहिए, अन्यथा कोई व्यक्ति उसके स्थान पर ऐसा नहीं कर सकता। अभी तक, इस धारा के बाहर पवित्र आत्मा का समस्त कार्य एकदम रुक गया है, और जिन्हें पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किया गया था, वे दिग्भ्रमित हो गए हैं। इसलिए, चूँकि पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए गए मनुष्यों का कार्य स्वयं परमेश्वर द्वारा किए गए कार्य से भिन्न है, इसलिए उनकी पहचान और जिन व्यक्तियों की ओर से वे कार्य करते हैं, वे भी उसी तरह से भिन्न हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि पवित्र आत्मा जिस कार्य को करने का इरादा करता है, वह भिन्न है, और इसलिए समान रूप से कार्य करने वालों को अलग-अलग पहचान और हैसियत प्रदान की जाती है। पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले लोग कुछ नया कार्य भी कर सकते हैं और वे पूर्व युग में किए गए किसी कार्य को हटा भी सकते हैं, किंतु उनके द्वारा किया गया कार्य नए युग में परमेश्वर के स्वभाव और उसकी इच्छा को व्यक्त नहीं कर सकता। वे केवल पूर्व युग के कार्य को हटाने के लिए कार्य करते हैं, और सीधे तौर पर स्वयं परमेश्वर के स्वभाव और उसकी इच्छा का प्रतिनिधित्व करने के उद्देश्य से कोई नया कार्य करने के लिए कुछ नहीं करते। इस प्रकार, चाहे वे पुराने पड़ चुके कितने भी अभ्यासों का उन्मूलन कर दें या वे कितने भी नए अभ्यास आरंभ कर दें, वे फिर भी मनुष्य और सृजित प्राणियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। किंतु जब स्वयं परमेश्वर कार्य करता है, तो वह खुलकर प्राचीन युग के अभ्यासों के उन्मूलन की घोषणा नहीं करता या सीधे तौर पर नए युग की शुरुआत की घोषणा नहीं करता। वह अपने कार्य में स्पष्ट और ईमानदार है। वह उस कार्य को करने में बेबाक है, जिसे करने का वह इरादा रखता है; अर्थात्, वह उस कार्य को सीधे तौर पर व्यक्त करता है जिसे उसने किया है, वह अपने अस्तित्व और स्वभाव को व्यक्त करते हुए अपने मूल इरादे के अनुसार सीधे तौर पर अपना कार्य करता है। जैसा कि मनुष्य देखता है, उसका स्वभाव और कार्य भी पिछले युगों से भिन्न हैं। किंतु स्वयं परमेश्वर के दृष्टिकोण से, यह मात्र उसके कार्य की निरंतरता और आगे का विकास है। जब स्वयं परमेश्वर कार्य करता है, तो वह अपने वचन व्यक्त करता है और सीधे नया कार्य लाता है। इसके विपरीत, जब मनुष्य काम करता है, तो वह विचार-विमर्श एवं अध्ययन के माध्यम से होता है, या वह दूसरों के कार्य की बुनियाद पर निर्मित ज्ञान का विस्तार और अभ्यास का व्यवस्थापन है। कहने का अर्थ है कि मनुष्य द्वारा किए गए कार्य का सार किसी स्थापित व्यवस्था का अनुसरण करना और "नए जूतों से पुराने मार्ग पर चलना" है। इसका अर्थ है कि पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए गए मनुष्यों द्वारा अपनाया गया मार्ग भी स्वयं परमेश्वर द्वारा शुरू किए गए मार्ग पर ही बना है। इसलिए, कुल मिलाकर मनुष्य फिर भी मनुष्य है, और परमेश्वर फिर भी परमेश्वर है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारण का रहस्य (1)' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 168

यूहन्ना प्रतिज्ञा द्वारा जन्मा था, बहुत-कुछ वैसे ही, जैसे अब्राहम के यहाँ इसहाक पैदा हुआ था। उसने यीशु के लिए मार्ग तैयार किया और बहुत कार्य किया, किंतु वह परमेश्वर नहीं था। बल्कि, वह नबियों में से एक था, क्योंकि उसने केवल यीशु के लिए मार्ग प्रशस्त किया था। उसका कार्य भी महान था, और केवल उसके द्वारा मार्ग तैयार किए जाने के बाद ही यीशु ने आधिकारिक रूप से अपना कार्य शुरू किया। संक्षेप में, उसने केवल यीशु के लिए श्रम किया, और उसके द्वारा किया गया कार्य यीशु के कार्य की सेवा में था। उसके द्वारा मार्ग प्रशस्त किए जाने के बाद यीशु ने अपना कार्य शुरू किया, कार्य जो नया, अधिक ठोस और अधिक विस्तृत था। यूहन्ना ने कार्य का केवल शुरुआती अंश किया; नए कार्य का ज्यादा बड़ा भाग यीशु द्वारा किया गया था। यूहन्ना ने भी नया कार्य किया, किंतु उसने नए युग का सूत्रपात नहीं किया था। यूहन्ना प्रतिज्ञा द्वारा जन्मा था, और उसका नाम स्वर्गदूत द्वारा दिया गया था। उस समय, कुछ लोग उसका नाम उसके पिता जकरयाह के नाम पर रखना चाहते थे, परंतु उसकी माँ ने कहा, "इस बालक को उस नाम से नहीं पुकारा जा सकता। उसे यूहन्ना के नाम से पुकारा जाना चाहिए।" यह सब पवित्र आत्मा के आदेश से हुआ था। यीशु का नाम भी पवित्र आत्मा के आदेश से रखा गया था, उसका जन्म पवित्र आत्मा से हुआ था, और पवित्र आत्मा द्वारा उसकी प्रतिज्ञा की गई थी। यीशु परमेश्वर, मसीह और मनुष्य का पुत्र था। किंतु, यूहन्ना का कार्य भी महान होने के बावजूद उसे परमेश्वर क्यों नहीं कहा गया? यीशु द्वारा किए गए कार्य और यूहन्ना द्वारा किए गए कार्य में ठीक-ठीक क्या अंतर था? क्या सिर्फ यही एक कारण था कि यूहन्ना वह व्यक्ति था, जिसने यीशु के लिए मार्ग तैयार किया था? या इसलिए, क्योंकि इसे परमेश्वर द्वारा पहले से ही नियत कर दिया गया था? यद्यपि यूहन्ना ने भी कहा था, "मन फिराओ, क्योंकि स्वर्ग का राज्य निकट आ गया है," और उसने स्वर्ग के राज्य के सुसमाचार का भी उपदेश दिया था, किंतु उसका कार्य आगे नहीं बढ़ा और उसने मात्र शुरुआत की। इसके विपरीत, यीशु ने एक नए युग का सूत्रपात करने के साथ-साथ पुराने युग का अंत भी किया, किंतु उसने पुराने विधान की व्यवस्था भी पूरी की। उसके द्वारा किया गया कार्य यूहन्ना के कार्य से अधिक महान था, और इतना ही नहीं, वह समस्त मानवजाति को छुटकारा दिलाने के लिए आया—उसने कार्य के इस चरण को पूरा किया। जबकि यूहन्ना ने बस मार्ग तैयार किया। यद्यपि उसका कार्य महान था, उसके वचन बहुत थे, और उसका अनुसरण करने वाले चेले भी बहुत थे, फिर भी उसके कार्य ने लोगों के लिए एक नई शुरुआत लेकर आने से बढ़कर कुछ नहीं किया। मनुष्य ने उससे कभी जीवन, मार्ग या गहरे सत्य प्राप्त नहीं किए, न ही मनुष्य ने उसके जरिये परमेश्वर की इच्छा की समझ प्राप्त की। यूहन्ना एक बहुत बड़ा नबी (एलिय्याह) था, जिसने यीशु के कार्य के लिए नई ज़मीन खोली और चुने हुओं को तैयार किया; वह अनुग्रह के युग का अग्रदूत था। ऐसे मामले केवल उनके सामान्य मानवीय स्वरूप देखकर नहीं पहचाने जा सकते। यह इसलिए भी उचित है, क्योंकि यूहन्ना ने भी काफ़ी उल्लेखनीय काम किया; और इतना ही नहीं, पवित्र आत्मा द्वारा उसकी प्रतिज्ञा की गई थी, और उसके कार्य को पवित्र आत्मा द्वारा समर्थन दिया गया था। ऐसा होने के कारण, केवल उनके द्वारा किए जाने वाले कार्य के माध्यम से व्यक्ति उनकी पहचान के बीच अंतर कर सकता है, क्योंकि किसी मनुष्य के बाहरी स्वरूप से उसके सार के बारे में बताने का कोई उपाय नहीं है, न ही कोई ऐसा तरीका है जिससे मनुष्य यह सुनिश्चित कर सके कि पवित्र आत्मा की गवाही क्या है। यूहन्ना द्वारा किया गया कार्य और यीशु द्वारा किया गया कार्य भिन्न प्रकृतियों के थे। इसी से व्यक्ति यह निर्धारित कर सकता है कि यूहन्ना परमेश्वर था या नहीं। यीशु का कार्य शुरू करना, जारी रखना, समापन करना और सफल बनाना था। उसने इनमें से प्रत्येक चरण पूरा किया था, जबकि यूहन्ना का कार्य शुरुआत से अधिक और कुछ नहीं था। आरंभ में, यीशु ने सुसमाचार फैलाया और पश्चात्ताप के मार्ग का उपदेश दिया, और फिर वह मनुष्य को बपतिस्मा देने लगा, बीमारों को चंगा करने लगा, और दुष्टात्माओं को निकालने लगा। अंत में, उसने मानवजाति को पाप से छुटकारा दिलाया और संपूर्ण युग के अपने कार्य को पूरा किया। उसने लगभग हर स्थान पर जाकर मनुष्य को उपदेश दिया और स्वर्ग के राज्य का सुसमाचार फैलाया। इस दृष्टि से यीशु और यूहन्ना समान थे, अंतर यह था कि यीशु ने एक नए युग का सूत्रपात किया और वह मनुष्य के लिए अनुग्रह का युग लाया। उसके मुँह से वह वचन निकला जिसका मनुष्य को अभ्यास करना चाहिए, और वह मार्ग निकला जिसका मनुष्य को अनुग्रह के युग में अनुसरण करना चाहिए, और अंत में उसने छुटकारे का कार्य पूरा किया। यूहन्ना यह कार्य कभी नहीं कर सकता था। और इसलिए, वह यीशु ही था जिसने स्वयं परमेश्वर का कार्य किया, और वही है जो स्वयं परमेश्वर है और सीधे परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करता है। मनुष्य की धारणाएँ कहती हैं कि वे सभी जो प्रतिज्ञा द्वारा जन्मे थे, पवित्र आत्मा से जन्मे थे, जिनका पवित्र आत्मा ने समर्थन किया था, और जिन्होंने नए मार्ग खोले, वे परमेश्वर हैं। इस तर्क के अनुसार, यूहन्ना भी परमेश्वर होगा, और मूसा, अब्राहम और दाऊद ..., ये सब भी परमेश्वर होंगे। क्या यह निरा मज़ाक नहीं है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारण का रहस्य (1)' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 169

कुछ लोग आश्चर्य कर सकते हैं, "युग का सूत्रपात स्वयं परमेश्वर द्वारा क्यों किया जाना चाहिए? क्या उसके स्थान पर कोई सृजित प्राणी नहीं खड़ा हो सकता?" तुम सब लोग जानते हो कि एक नए युग का सूत्रपात करने के खास उद्देश्य से ही परमेश्वर देह बनता है, और, निस्संदेह, जब वह नए युग का सूत्रपात करता है, तो उसी समय वह पूर्व युग का समापन भी कर देता है। परमेश्वर आदि और अंत है; स्वयं वही है, जो अपने कार्य को गति प्रदान करता है और इसलिए स्वयं उसी को पिछले युग का समापन करने वाला भी होना चाहिए। यही उसके द्वारा शैतान को पराजित करने और संसार को जीतने का प्रमाण है। हर बार जब स्वयं वह मनुष्य के बीच कार्य करता है, तो यह एक नए युद्ध की शुरुआत होती है। नए कार्य की शुरुआत के बिना स्वाभाविक रूप से पुराने कार्य का समापन नहीं होगा। और पुराने का समापन न होना इस बात का प्रमाण है कि शैतान के साथ युद्ध अभी तक समाप्त नहीं हुआ है। केवल स्वयं परमेश्वर के मनुष्यों के बीच आने और एक नया कार्य करने पर ही मनुष्य शैतान के अधिकार-क्षेत्र को तोड़कर पूरी तरह से स्वतंत्र हो सकता है और एक नया जीवन तथा एक नई शुरुआत प्राप्त कर सकता है। अन्यथा, मनुष्य सदैव पुराने युग में जीएगा और हमेशा शैतान के पुराने प्रभाव के अधीन रहेगा। परमेश्वर द्वारा लाए गए प्रत्येक युग के साथ मनुष्य के एक भाग को मुक्त किया जाता है, और इस प्रकार परमेश्वर के कार्य के साथ-साथ मनुष्य एक नए युग की ओर बढ़ता है। परमेश्वर की विजय का अर्थ उन सबकी विजय है, जो उसका अनुसरण करते हैं। यदि सृजित मानवजाति को युग के समापन का कार्यभार दिया जाता, तब चाहे यह मनुष्य के दृष्टिकोण से हो या शैतान के, यह परमेश्वर के विरोध या परमेश्वर के साथ विश्वासघात के कार्य से बढ़कर न होता, यह परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता का कार्य न होता, और मनुष्य का कार्य शैतान का साधन बन जाता। केवल जब मनुष्य स्वयं परमेश्वर द्वारा सूत्रपात किए गए युग में परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन और उसका अनुसरण करता है, तभी शैतान पूरी तरह से आश्वस्त हो सकता है, क्योंकि यह सृजित प्राणी का कर्तव्य है। इसलिए मैं कहता हूँ कि तुम लोगों को केवल अनुसरण और आज्ञापालन कंरने की आवश्यकता है, और इससे अधिक तुम लोगों से किसी बात की अपेक्षा नहीं की जाती। प्रत्येक व्यक्ति के द्वारा अपने कर्तव्य का पालन करने और अपने कार्य को क्रियान्वित करने का यही अर्थ है। परमेश्वर अपना काम करता है और उसे कोई आवश्यकता नहीं है कि मनुष्य उसके स्थान पर काम करे, और न ही वह सृजित प्राणियों के काम में भाग लेता है। मनुष्य अपना कर्तव्य निभाता है और परमेश्वर के कार्य में हस्तक्षेप नहीं करता। केवल यही सच्ची आज्ञाकारिता और शैतान की पराजय का सबूत है। स्वयं परमेश्वर द्वारा नए युग के सूत्रपात का कार्य पूरा कर देने के पश्चात्, वह मानवों के बीच अब और कार्य करने नहीं आता। केवल तभी एक सृजित प्राणी के रूप में मनुष्य अपना कर्तव्य और ध्येय पूरा करने के लिए आधिकारिक रूप से नए युग में कदम रखता है। ये वे सिद्धांत हैं, जिनके द्वारा परमेश्वर कार्य करता है, जिनका उल्लंघन किसी के द्वारा नहीं किया जा सकता। केवल इस तरह से कार्य करना ही विवेकपूर्ण और तर्कसंगत है। परमेश्वर का कार्य स्वयं परमेश्वर द्वारा किया जाना है। वही है, जो अपने कार्य को गति प्रदान करता है, और वही है, जो अपने कार्य का समापन करता है। वही है, जो कार्य की योजना बनाता है, और वही है, जो उसका प्रबंधन करता है, और इतना ही नहीं, वही है, जो उस कार्य को सफल बनाता है। जैसा कि बाइबल में कहा गया है, "मैं ही आदि और अंत हूँ; मैं ही बोनेवाला और काटनेवाला हूँ।" वह सब-कुछ, जो उसके प्रबंधन के कार्य से संबंधित है, स्वयं परमेश्वर द्वारा किया जाता है। वह छह-हज़ार-वर्षीय प्रबंधन योजना का शासक है; कोई भी उसके स्थान पर उसका काम नहीं कर सकता और कोई भी उसके कार्य का समापन नहीं कर सकता, क्योंकि वही है, जो सब-कुछ अपने हाथ में रखता है। संसार का सृजन करने के कारण वह संपूर्ण संसार को अपने प्रकाश में रखने के लिए उसकी अगुआई करेगा, और वह संपूर्ण युग का समापन भी करेगा और इस प्रकार अपनी संपूर्ण योजना को सफल बनाएगा!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारण का रहस्य (1)' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 170

परमेश्वर का संपूर्ण स्वभाव छह हज़ार वर्षीय प्रबंधन-योजना के दौरान प्रकट किया गया है। वह सिर्फ अनुग्रह के युग में प्रकट नहीं किया गया है, न ही सिर्फ व्यवस्था के युग में, सिर्फ अंत के दिनों की इस अवधि में तो बिलकुल भी नहीं। अंत के दिनों में किया जा रहा कार्य न्याय, कोप और ताड़ना को दर्शाता है। अंत के दिनों में किया जा रहा कार्य व्यवस्था के युग के कार्य या अनुग्रह के युग के कार्य का स्थान नहीं ले सकता। किंतु तीनों चरण आपस में जुड़कर एक इकाई बनते हैं, और वे सभी एक ही परमेश्वर के कार्य हैं। स्वाभाविक रूप से, इस कार्य का क्रियान्वयन तीन अलग-अलग युगों में विभाजित है। अंत के दिनों में किया जा रहा कार्य हर चीज़ को समाप्ति की ओर ले जाता है; व्यवस्था के युग में किया गया कार्य आरंभ करने का कार्य था; और अनुग्रह के युग में किया गया कार्य छुटकारे का कार्य था। जहाँ तक इस संपूर्ण छह हज़ार वर्षीय प्रबंधन-योजना के कार्य के दर्शनों की बात है, कोई भी व्यक्ति उनके बारे में अंर्तदृष्टि या समझ प्राप्त करने में समर्थ नहीं है, और ये दर्शन पहेली बने हुए हैं। अंत के दिनों में, राज्य के युग का सूत्रपात करने के लिए केवल वचन का कार्य किया जाता है, परंतु यह सभी युगों का प्रतिनिधि नहीं है। अंत के दिन अंत के दिनों से बढ़कर नहीं हैं और राज्य के युग से बढ़कर नहीं हैं, और वे अनुग्रह के युग या व्यवस्था के युग का प्रतिनिधित्व नहीं करते। बात यह है कि अंत के दिनों के दौरान छह हज़ार वर्षीय प्रबंधन योजना का समस्त कार्य तुम लोगों पर प्रकट किया जा रहा है। यह रहस्य का अनावरण है। यह ऐसा रहस्य है, जिसे किसी भी मनुष्य द्वारा अनावृत नहीं किया जा सकता। चाहे मनुष्य को बाइबल की कितनी भी अधिक समझ क्यों न हो, वह वचनों से बढ़कर नहीं है, क्योंकि मनुष्य बाइबल के सार को नहीं समझता। बाइबल पढ़ने से मनुष्य कुछ सत्य समझ सकता है, कुछ वचनों की व्याख्या कर सकता है या कुछ प्रसिद्ध अंशों और अध्यायों को अपनी क्षुद्र जाँच का भागी बना सकता है, परंतु वह उन वचनों के भीतर निहित अर्थ निकालने में कभी समर्थ नहीं होगा, क्योंकि मनुष्य जो कुछ देखता है, वह सब मृत वचन हैं, यहोवा और यीशु के कार्य के दृश्य नहीं हैं, और मनुष्य के पास इस कार्य के रहस्य को सुलझाने का कोई उपाय नहीं है। इसलिए, छह हज़ार वर्षीय प्रबंधन-योजना का रहस्य सबसे बड़ा रहस्य है, अत्यधिक छिपा हुआ, और मनुष्य के लिए सर्वथा अबूझ। कोई भी सीधे तौर पर परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझ सकता, जब तक कि स्वयं परमेश्वर उसे मनुष्य को न समझाए और प्रकट न करे; अन्यथा ये चीज़ें मनुष्य के लिए हमेशा पहेली बनी रहेंगी, हमेशा मुहरबंद रहस्य बनी रहेंगी। धार्मिक जगत के लोगों की तो बात छोड़ो; यदि तुम लोगों को भी आज न बताया जाता, तो तुम लोग भी इसे न समझ पाते। छह हज़ार वर्षों का यह कार्य नबियों की सभी भविष्यवाणियों से अधिक रहस्यमय है। यह दुनिया के सृजन से लेकर अब तक का सबसे बड़ा रहस्य है, और समस्त युगों का कोई भी नबी कभी भी इसकी थाह पाने में सक्षम नहीं हुआ है, क्योंकि यह रहस्य केवल अंतिम युग में ही खोला जा रहा है और पहले कभी प्रकट नहीं किया गया है। यदि तुम लोग इस रहस्य को समझ सकते हो, और यदि तुम इसे इसकी समग्रता में प्राप्त करने में समर्थ हो, तो सभी धार्मिक व्यक्तियों को इस रहस्य से जीत लिया जाएगा। केवल यही सबसे बड़ा दर्शन है; यही है जिसे समझने के लिए मनुष्य सबसे अधिक लालायित रहता है, किंतु यह उसके लिए सबसे अधिक अस्पष्ट भी है। जब तुम लोग अनुग्रह के युग में थे, तो तुम नहीं जानते थे कि यीशु द्वारा किया गया कार्य क्या था या यहोवा ने क्या कार्य किया था। लोगों को समझ में नहीं आता था कि यहोवा ने क्यों व्यवस्थाएँ निर्धारित कीं, उसने क्यों लोगों को व्यवस्थाओं का पालन करने के लिए कहा अथवा मंदिर क्यों बनाने पड़े थे, और लोगों को यह तो बिलकुल भी समझ में नहीं आया कि क्यों इस्राएलियों को मिस्र से बीहड़ में और फिर कनान में ले जाया गया। ये मामले आज तक प्रकट नहीं किए गए थे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारण का रहस्य (4)' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 171

ऐसे लोगों के अतिरिक्त जिन्हें पवित्र आत्मा का विशेष निर्देश और अगुवाई प्राप्त है, कोई भी स्वतंत्र रूप से जीवन जीने में सक्षम नहीं है, क्योंकि उन्हें परमेश्वर द्वारा प्रयुक्त लोगों की सेवकाई और उनके मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है। इस प्रकार, परमेश्वर हर युग में अलग-अलग लोगों को तैयार करता है, जो उसके कार्य के लिए कलीसिया का मार्गदर्शन करने में व्यस्त और कार्यरत रहते हैं। कहने का अर्थ यह है कि परमेश्वर का कार्य उन लोगों द्वारा होना चाहिए जिन पर वह अनुग्रह करता है और जिनको वह अनुमोदित करता है; पवित्र आत्मा को कार्य करने के लिए उनके भीतर के उस भाग का इस्तेमाल करना चाहिए जो उपयोग के योग्य है, पवित्र आत्मा उन्हें पूर्ण करके परमेश्वर द्वारा इस्तेमाल किए जाने के उपयुक्त बनाती है। चूँकि मनुष्य की समझने की क्षमता बेहद कम है, इसलिए मनुष्य का मार्गदर्शन परमेश्वर द्वारा प्रयुक्त लोगों को करना चाहिए; परमेश्वर द्वारा मूसा के इस्तेमाल में भी ऐसा ही था, जिसमें उसने उस समय इस्तेमाल के लिए बहुत कुछ उपयुक्त पाया, और जो उसने उस चरण में परमेश्वर का कार्य करने के लिए इस्तेमाल किया। इस चरण में, परमेश्वर मनुष्य का इस्तेमाल करता है, साथ ही उस भाग का लाभ भी उठाता है जो कि पवित्र आत्मा द्वारा कार्य करने के लिए उपयोग किया जा सकता है और पवित्र आत्मा उसे निर्देश भी देता है और साथ ही बचे हुए अंश को जिसका इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, पूर्ण बनाता है।

जिस कार्य को परमेश्वर द्वारा प्रयुक्त व्यक्ति करता है, वह मसीह या पवित्र आत्मा के कार्य से सहयोग करने के लिए है। परमेश्वर इस मनुष्य को लोगों के बीच से ही तैयार करता है, उसका काम परमेश्वर के चुने हुए लोगों का नेतृत्व करना है। परमेश्वर उसे मानवीय सहयोग का कार्य करने के लिए भी तैयार करता है। इस तरह का व्यक्ति जो मानवीय सहयोग का कार्य करने में सक्षम है, उसके माध्यम से, मनुष्य से परमेश्वर की अनेक अपेक्षाओं को और उस कार्य को जो पवित्र आत्मा द्वारा मनुष्यों के बीच किया जाना चाहिए, पूरा किया जा सकता है। इसे दूसरे शब्दों में यूँ कहा जा सकता है : ऐसे मनुष्य का इस्तेमाल करने का परमेश्वर का उद्देश्य यह है कि जो लोग परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, वे परमेश्वर की इच्छा को अच्छी तरह से समझ सकें, और परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा कर सकें। चूँकि लोग परमेश्वर के वचन को या परमेश्वर की इच्छा को सीधे तौर पर समझने में असमर्थ हैं, इसलिए परमेश्वर ने किसी ऐसे व्यक्ति को तैयार किया है जो इस तरह का कार्य करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। परमेश्वर द्वारा प्रयुक्त ऐसे व्यक्ति को माध्यम भी कहा जा सकता है जिसके ज़रिए परमेश्वर लोगों का मार्गदर्शन करता है, एक "दुभाषिया" जो परमेश्वर और लोगों के बीच में संप्रेषण बनाए रखता है। ऐसा व्यक्ति परमेश्वर के घर में काम करने वालों लोगों से या प्रेरित से अलग होता है। उन्हीं की तरह उसे परमेश्वर का सेवाकर्मी कहा जा सकता है, लेकिन उसके बावजूद, उसके कार्य के सार और परमेश्वर द्वारा उसके उपयोग की पृष्ठभूमि में, वह दूसरे कर्मियों और प्रेरितों से बिलकुल अलग होता है। परमेश्वर द्वारा प्रयुक्त व्यक्ति अपने कार्य के सार और अपने उपयोग की पृष्ठभूमि के संबंध में, परमेश्वर द्वारा तैयार किया जाता है, उसे परमेश्वर के कार्य के लिए परमेश्वर ही तैयार करता है, और वह स्वयं परमेश्वर के कार्य में सहयोग करता है। कोई भी व्यक्ति उसकी जगह उसका कार्य नहीं कर सकता—दिव्य कार्य के साथ मनुष्य का सहयोग अपरिहार्य होता है। इस दौरान, दूसरे कर्मियों या प्रेरितों द्वारा किया गया कार्य हर अवधि में कलीसियाओं के लिए व्यवस्थाओं के कई पहलुओं का वहन और कार्यान्वयन है, या फिर कलीसियाई जीवन को बनाए रखने के लिए जीवन के सरल प्रावधान का कार्य करना है। इन कर्मियों और प्रेरितों को परमेश्वर नियुक्त नहीं करता, न ही यह कहा जा सकता है कि वे पवित्र आत्मा द्वारा इस्तेमाल किए जाते हैं। वे कलीसिया में से ही चुने जाते हैं और कुछ समय तक प्रशिक्षण एवं तौर-तरीके सिखाने के बाद, जो उपयुक्त होते हैं उन्हें रख लिया जाता है, और जो उपयुक्त नहीं होते, उन्हें वहीं वापस भेज दिया जाता है जहाँ से वे आए थे। चूँकि ये लोग कलीसियाओं में से ही चुने जाते हैं, कुछ लोग अगुवा बनने के बाद अपना असली रंग दिखाते हैं, और कुछ लोग बुरे काम करने पर निकाल दिए जाते हैं। दूसरी ओर, परमेश्वर द्वारा प्रयुक्त लोग परमेश्वर द्वारा तैयार किए जाते हैं, उनमें एक विशिष्ट योग्यता और मानवता होती है। ऐसे व्यक्ति को पहले ही पवित्र आत्मा द्वारा तैयार और पूर्ण कर दिया जाता है और पूर्णरूप से पवित्र आत्मा द्वारा मार्गदर्शन दिया जाता है, विशेषकर जब उसके कार्य की बात आती है, तो उसे पवित्र आत्मा द्वारा निर्देश और आदेश दिए जाते हैं—परिणामस्वरुप परमेश्वर के चुने हुए लोगों की अगुवाई के मार्ग में कोई भटकाव नही आता, क्योंकि परमेश्वर निश्चित रूप से अपने कार्य का उत्तरदायित्व लेता है और हर समय कार्य करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर द्वारा मनुष्य को इस्तेमाल करने के विषय में' से

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 172

पवित्र आत्मा की मुख्य धारा में जो कार्य है वह पवित्र आत्मा का कार्य है, चाहे यह परमेश्वर का अपना कार्य हो या उपयोग किए जा रहे मनुष्यों का कार्य। स्वयं परमेश्वर का सार आत्मा है, जिसे पवित्र आत्मा या सात गुना सघन आत्मा भी कहा जा सकता है। कुल मिलाकर, वे परमेश्वर के आत्मा हैं, हालाँकि भिन्न-भिन्न युगों में परमेश्वर के आत्मा को भिन्न-भिन्न नामों से पुकारा गया है। परन्तु उनका सार तब भी एक ही है। इसलिए, स्वयं परमेश्वर का कार्य पवित्र आत्मा का कार्य है, जबकि देहधारी परमेश्वर का कार्य, पवित्र आत्मा के कार्य से ज़रा-भी कम नहीं है। जिन मनुष्यों का उपयोग किया जाता है उनका कार्य भी पवित्र आत्मा का कार्य है। फिर भी परमेश्वर का कार्य पवित्र आत्मा की पूर्ण अभिव्यक्ति है, जो सर्वथा सत्य है, जबकि उपयोग किए जा रहे लोगों का कार्य बहुत-सी मानवीय चीज़ों के साथ मिश्रित होता है, और वह पवित्र आत्मा की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति नहीं होता, परमेश्वर की पूर्ण अभिव्यक्ति होने की तो बात ही छोड़ो। पवित्र आत्मा का कार्य विविध होता है और यह किसी परिस्थिति द्वारा सीमित नहीं होता। भिन्न-भिन्न लोगों में पवित्र आत्मा का कार्य भिन्न-भिन्न होता है; इससे भिन्न-भिन्न सार अभिव्यक्त होते हैं, और यह भिन्न-भिन्न युगों और देशों में भी अलग-अलग होता है। निस्संदेह, यद्यपि पवित्र आत्मा कई भिन्न-भिन्न तरीकों से और कई सिद्धांतों के अनुसार कार्य करता है, इसका सार हमेशा भिन्न होता है, फिर चाहे कार्य जैसे भी किया जाए या जिस भी प्रकार के लोगों पर किया जाए; भिन्न-भिन्न लोगों पर किए गए सभी कार्यों के अपने सिद्धांत होते हैं और सभी अपने लक्ष्यों के सार का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं। इसकी वजह यह है कि पवित्र आत्मा का कार्य दायरे में काफी विशिष्ट और काफी नपा-तुला होता है। देहधारी शरीर में किया गया कार्य उस कार्य के समान नहीं होता जो लोगों पर किया जाता है, और जिन लोगों पर यह कार्य किया जाता है, उनकी क्षमता के आधार पर वह कार्य भी भिन्न-भिन्न होता है। देहधारी शरीर में किया गया कार्य लोगों पर नहीं किया जाता, और यह वही कार्य नहीं होता जो लोगों पर किया जाता है। संक्षेप में, इससे फर्क नहीं पड़ता है कि कार्य कैसे किया जाता है, विभिन्न लक्ष्यों पर किया गया कार्य कभी एक समान नहीं होता, और जिन सिद्धांतों के द्वारा वह कार्य करता है वे भिन्न-भिन्न लोगों की अवस्था और प्रकृति के अनुसार भिन्न-भिन्न होते हैं। पवित्र आत्मा भिन्न-भिन्न लोगों पर उनके अंतर्निहित सार के आधार पर कार्य करता है और उनसे उनके अंतर्निहित सार से अधिक की माँग नहीं करता, न ही वह उन पर उनकी अंतर्निहित क्षमता से ज़्यादा कार्य करता है। इसलिए, मनुष्य पर पवित्र आत्मा का कार्य लोगों को कार्य के लक्ष्य के सार को देखने देता है। मनुष्य का अंतर्निहित सार परिवर्तित नहीं होता; मनुष्य की अंतर्निहित क्षमता सीमित है। पवित्र आत्मा लोगों की क्षमता के अनुसार उनका उपयोग या उन पर कार्य करता है, ताकि वे इससे लाभान्वित हो सकें। जब पवित्र आत्मा उपयोग किए जा रहे मनुष्यों पर कार्य करता है, तो उनकी प्रतिभा और अंतर्निहित क्षमता को उन्मुक्त कर दिया जाता है, उन्हें रोककर नहीं रखा जाता। उनकी अंतर्निहित क्षमता को कार्य के लिए काम में लाया जाता है। ऐसा कहा जा सकता है कि वह अपने कार्य में परिणाम हासिल करने के लिए, इंसान के उन हिस्सों का उपयोग करता है, जिनका उसके कार्य में इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके विपरीत, देहधारी शरीर में किया गया कार्य सीधे तौर पर पवित्रात्मा के कार्य को व्यक्त करता है और इसमें मानवीय मन और विचारों की मिलावट नहीं होती; इस तक न तो इंसान की प्रतिभा की, न उसके अनुभव या उसकी सहज स्थिति की पहुँच होती है। पवित्र आत्मा के समस्त असंख्य कार्यों का लक्ष्य इंसान को लाभ पहुँचाना और शिक्षित करना होता है। हालाँकि, कुछ लोगों को पूर्ण बनाया जा सकता है जबकि अन्य लोग पूर्ण बनने की अवस्था में नहीं होते, जिसका तात्पर्य है कि उन्हें पूर्ण नहीं किया जा सकता और उन्हें शायद ही बचाया जा सकता है, और भले ही उनमें पवित्र आत्मा का कार्य रहा हो, फिर भी अंततः उन्हें निष्कासित कर दिया जाता है। कहने का अर्थ है कि यद्यपि पवित्र आत्मा का कार्य लोगों को शिक्षित करना है, फिर भी इसका यह अर्थ नहीं है कि वे सभी लोग जिनमें पवित्र आत्मा का कार्य रहा है, उन्हें पूरी तरह से पूर्ण बनाया जाएगा, क्योंकि बहुत से लोग अपनी खोज में जिस मार्ग का अनुसरण करते हैं, वह पूर्ण बनाए जाने का मार्ग नहीं है। उनमें पवित्र आत्मा का केवल एकतरफ़ा कार्य है, आत्मपरक मानवीय सहयोग या सही मानवीय खोज नहीं है। इस तरह, इन लोगों पर पवित्र आत्मा का कार्य उन लोगों की सेवा के लिए आता है जिन्हें पूर्ण बनाया जा रहा है। पवित्र आत्मा के कार्य को लोग सीधे तौर पर न तो देख सकते हैं, न ही उसे स्पर्श कर सकते हैं। इसे केवल कार्य करने की प्रतिभा वाले लोग ही व्यक्त कर सकते हैं, इसका अर्थ यह है कि अनुयायियों को पवित्र आत्मा का कार्य लोगों की अभिव्यक्तियों के माध्यम से प्रदान किया जाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 173

पवित्र आत्मा के कार्य को कई प्रकार के लोगों और अनेक भिन्न-भिन्न परिस्थितियों के माध्यम से संपन्न और पूरा किया जाता है। यद्यपि देहधारी परमेश्वर का कार्य एक संपूर्ण युग के कार्य का प्रतिनिधित्व कर सकता है, और एक संपूर्ण युग में लोगों के प्रवेश का प्रतिनिधित्व कर सकता है, फिर भी लोगों के प्रवेश के विस्तृत विवरण पर कार्य अभी भी उन लोगों द्वारा किए जाने की आवश्यकता है जिनका उपयोग पवित्र आत्मा द्वारा किया जाता है, न कि इसे देहधारी परमेश्वर द्वारा किए जाने की आवश्यकता है। इसलिए, परमेश्वर का कार्य, या परमेश्वर की अपनी सेवकाई, देहधारी परमेश्वर के देह का कार्य है, इसे परमेश्वर के बदले मनुष्य नहीं कर सकता। पवित्र आत्मा का कार्य विभिन्न प्रकार के मनुष्यों द्वारा पूरा किया जाता है; और इसे केवल एक ही व्यक्ति-विशेष द्वारा पूरा नहीं किया जा सकता या एक ही व्यक्ति-विशेष के माध्यम से पूरी तरह से व्यक्त नहीं किया जा सकता। जो लोग कलीसियाओं की अगुवाई करते हैं, वे भी पूरी तरह से पवित्र आत्मा के कार्य का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते; वे केवल अगुआई का कुछ कार्य ही कर सकते हैं। इस तरह, पवित्र आत्मा के कार्य को तीन हिस्सों में विभाजित किया जा सकता है : परमेश्वर का अपना कार्य, प्रयुक्त लोगों का कार्य, और उन सभी लोगों पर किया गया कार्य जो पवित्र आत्मा की धारा में हैं। परमेश्वर का अपना कार्य संपूर्ण युग की अगुवाई करना है; प्रयुक्त लोगों का कार्य, परमेश्वर के अपने कार्य कर लेने के पश्चात् भेजे जाने या आज्ञा प्राप्त करने के द्वारा परमेश्वर के सभी अनुयायियों की अगुवाई करना है, और यही वे लोग हैं जो परमेश्वर के कार्य में सहयोग करते हैं; पवित्र आत्मा द्वारा धारा में मौजूद लोगों पर किया गया कार्य उसके अपने कार्य को बनाए रखने के लिए है, अर्थात्, संपूर्ण प्रबंधन को और अपनी गवाही को बनाए रखने के लिए है, साथ ही उन लोगों को पूर्ण बनाने के लिए है जिन्हें पूर्ण बनाया जा सकता है। ये तीनों हिस्से मिलकर, पवित्र आत्मा का पूर्ण कार्य हैं, किन्तु स्वयं परमेश्वर के कार्य के बिना, संपूर्ण प्रबंधन कार्य रूक जाएगा। स्वयं परमेश्वर के कार्य में संपूर्ण मनुष्यजाति का कार्य समाविष्ट है, और यह संपूर्ण युग के कार्य का भी प्रतिनिधित्व करता है, कहने का तात्पर्य है कि परमेश्वर का अपना कार्य पवित्र आत्मा के सभी कार्य की गतिक और रुझान का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि प्रेरितों का कार्य परमेश्वर के अपने कार्य के बाद आता है और वहाँ से उसका अनुसरण करता है, वह न तो युग की अगुवाई करता है, न ही वह पूरे युग में पवित्र आत्मा के कार्य के रुझान का प्रतिनिधित्व करता है। वे केवल वही कार्य करते हैं जो मनुष्य को करना चाहिए, जिसका प्रबंधन कार्य से कोई लेना-देना नहीं है। परमेश्वर का अपना कार्य प्रबंधन कार्य के भीतर ही एक परियोजना है। मनुष्य का कार्य केवल वही कर्तव्य है जिसका निर्वहन प्रयुक्त लोग करते हैं, और उसका प्रबंधन कार्य से कोई संबंध नहीं है। कार्य की विभिन्न पहचान और कार्य के विभिन्न निरूपणों के कारण, इस तथ्य के बावजूद कि वे दोनों पवित्र आत्मा के कार्य हैं, परमेश्वर के कार्य और मनुष्य के कार्य के बीच स्पष्ट और सारभूत अंतर हैं। इसके अतिरिक्त, पवित्र आत्मा द्वारा किए गए कार्य की सीमा विभिन्न पहचानों वाली वस्तुओं के अनुसार भिन्न होती है। ये पवित्र आत्मा के कार्य के सिद्धांत और दायरे हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 174

मनुष्य का कार्य उसके अनुभव और उसकी मानवता केतात्पर्य को सूचित करता है। मनुष्य जो कुछ मुहैया कराता है और जो कार्य करता है, वह उसका प्रतिनिधित्व करता है। मनुष्य की अंतर्दृष्टि, उसकी विवेक-बुद्धि, उसकी तर्कशक्ति और उसकी समृद्ध कल्पना, सभी उसके कार्य में शामिल होते हैं। मनुष्य का अनुभव, विशेष रूप से उसके कार्य के तात्पर्य को सूचित करने में समर्थ होता है, और व्यक्ति के अनुभव उसके कार्य के घटक बन जाते हैं। मनुष्य का कार्य उसके अनुभव को व्यक्त कर सकता है। जब कुछ लोग नकारात्मक तरीके से अनुभव करते हैं, तो उनकी संगति की अधिकांश भाषा नकारात्मक तत्वों से ही युक्त होती है। यदि कुछ समयावधि तक उनका अनुभव सकारात्मक है और उनके पास विशेष रूप से, सकारात्मक पहलू में एक मार्ग होता है, तो उनकी संगति बहुत प्रोत्साहन देने वाली होती है, और लोग उनसे सकारात्मक आपूर्ति प्राप्त कर सकते हैं। यदि कोई कर्मी कुछ समयावधि तक नकारात्मक हो जाता है, तो उसकी संगति में हमेशा नकारात्मक तत्व होंगे। इस प्रकार की संगति निराशाजनक होती है, और अन्य लोग अनजाने में ही उसकी संगति के बाद निराश हो जाएँगे। अगुआ की अवस्था के आधार पर अनुयायियों की अवस्था बदलती है। एक कर्मी भीतर से जैसा होता है, वह वैसा ही व्यक्त करता है, और पवित्र आत्मा का कार्य प्रायः मनुष्य की अवस्था के साथ बदल जाता है। वह मनुष्य के अनुभव के अनुसार कार्य करता है और उसे बाध्य नहीं करता, बल्कि लोगों के अनुभव के सामान्य क्रम के अनुसार उनसे माँग करता है। कहने का तात्पर्य है कि मनुष्य की संगति परमेश्वर के वचन से भिन्न होती है। लोग जो संगति करते हैं वह उनकी व्यक्तिगत अंतर्दृष्टि और अनुभव को बताती है, और परमेश्वर के कार्य के आधार पर उनकी अंतर्दृष्टि और अनुभव को व्यक्त करती है। उनकी ज़िम्मेदारी यह है कि परमेश्वर के कार्य करने या बोलने के पश्चात्, वे पता लगायें कि उन्हें इसमें से किसका अभ्यास करना चाहिए, या किसमें प्रवेश करना चाहिए, और फिर इसे अनुयायियों को सौंप दें। इसलिए, मनुष्य का कार्य उसके प्रवेश और अभ्यास का प्रतिनिधित्व करता है। निस्संदेह, ऐसा कार्य मानवीय सबक और अनुभव या कुछ मानवीय विचारों के साथ मिश्रित होता है। पवित्र आत्मा चाहे जैसे कार्य करे, चाहे वह मनुष्य में कार्य करे या देहधारी परमेश्वर में, कर्मी हमेशा वही व्यक्त करते हैं जो वे होते हैं। यद्यपि कार्य पवित्र आत्मा ही करता है, फिर भी मनुष्य अंतर्निहित रूप से जैसा होता है कार्य उसी पर आधारित होता है, क्योंकि पवित्र आत्मा बिना आधार के कार्य नहीं करता। दूसरे शब्दों में, कार्य शून्य में से नहीं आता, बल्कि वह हमेशा वास्तविक परिस्थितियों और असली स्थितियों के अनुसार किया जाता है। केवल इसी तरह से मनुष्य के स्वभाव को रूपान्तरित किया जा सकता है और उसकी पुरानीधारणाओं एवं पुराने विचारों को बदला जा सकता है। जो कुछ मनुष्य देखता है, अनुभव करता है, और कल्पना कर सकता है, वह उसी को अभिव्यक्त करता है, और यह मनुष्य के विचारों द्वारा प्राप्य होता है, भले ही ये सिद्धांत या धारणाएँ ही क्यों न हों। चाहे मनुष्य के कार्य का आकार कुछ भी हो, यह उसके अनुभव के दायरे से परे नहीं जा सकता, न ही जो वह देखता है, या जिसकी वह कल्पना या जिसका विचार कर सकता है, उससे बढ़कर हो सकता है। परमेश्वर वही सब प्रकट करता है जो वह स्वयं है, और यह मनुष्य की पहुँच से परे है, अर्थात्, मनुष्य की सोच से परे है। वह संपूर्ण मानवजाति की अगुवाई करने के अपने कार्य को व्यक्त करता है, इसका मानवीय अनुभव के विवरणों से कोई लेना-देना नहीं है, बल्कि यह उसके अपने प्रबंधन से संबंधित है। मनुष्य जो व्यक्त करता है वह उसका अपना अनुभव है, जबकि परमेश्वर अपने स्वरूप को व्यक्त करता है, जो कि उसका अंतर्निहित स्वभाव है और मनुष्य की पहुँच से परे है। मनुष्य का अनुभव उसकी अंतर्दृष्टि और वह ज्ञान है जो उसने परमेश्वर द्वारा अपने स्वरूप की अभिव्यक्ति के आधार पर प्राप्त किया है। ऐसी अंतर्दृष्टि और ज्ञान मनुष्य का स्वरूप कहलाता है, और उनकी अभिव्यक्ति का आधार मनुष्य का अंतर्निहित स्वभाव और उसकी क्षमता होते हैं—इसलिए इन्हें मनुष्य का अस्तित्व भी कहा जाता है। जो कुछ मनुष्य देखता और अनुभव करता है वह उसकी संगति कर पाता है। अत: कोई भी व्यक्ति उस पर संगति नहीं कर सकता जिसका उसने अनुभव नहीं किया है या देखा नहीं है या जिस तक उसका मन नहीं पहुँच पाता है, वे ऐसी चीज़ें हैं जो उसके भीतर नहीं हैं। यदि जो कुछ मनुष्य व्यक्त करता है वह उसके अनुभव से नहीं आया है, तो यह उसकी कल्पना या सिद्धांत है। सीधे-सीधे कहें तो, उसके वचनों में कोई वास्तविकता नहीं होती। यदि तुम समाज की चीज़ों से कभी संपर्क में न आते, तो तुम समाज के जटिल संबंधों की स्पष्टता से संगति करने में समर्थ नहीं होते। यदि तुम्हारा कोई परिवार न होता परन्तु अन्य लोग परिवारिक मुद्दों के बारे में बात करते, तो तुम उनकी अधिकांश बातों को नहीं समझ पाते। इसलिए, जो कुछ मनुष्य संगति करता है और जिस कार्य को वह करता है, वे उसके भीतरी अस्तित्व का प्रतिनिधित्व करते हैं। यदि किसी ने ताड़ना और न्याय के बारे में अपनी समझ की संगति की, परन्तु तुम्हारे पास उसका कोई अनुभव नहीं है, तो तुम उसके ज्ञान को नकारने का साहस नहीं करोगे उसके बारे में सौ प्रतिशत निश्चित होने का साहस तो बिलकुल भी नहीं करोगे। क्योंकि उसकी संगति ऐसी चीज़ है जिसका तुमने कभी अनुभव नहीं किया है, जिसके बारे में तुमने कभी जाना नहीं है, तुम्हारा मन उसकी कल्पना भी नहीं कर सकता। तुम उसके ज्ञान से बस भविष्य में ताड़ना और न्याय से गुज़रने का एक मार्ग पा सकते हो। परन्तु यह मार्ग केवल एक सैद्धांतिक ज्ञान ही हो सकता है; यह तुम्हारी समझ का स्थान नहीं ले सकता, तुम्हारे अनुभव का स्थान तो बिलकुल भी नहीं ले सकता। शायद तुम सोचते हो कि जो कुछ वह कहता है वह काफी सही है, परन्तु अपने अनुभव में, तुम इसे अनेक बातों में अव्यावहारिक पाते हो; उस समय तुम इसके बारे मेंधारणाएँ पाल लेते हो, तुम इसे स्वीकार तो करते हो, लेकिन केवल अनिच्छा से। परन्तु जब तुम अनुभव करते हो, तो वह ज्ञान जिससे तुमने धारणाएँ बनायी थीं, तुम्हारे अभ्यास का मार्ग बन जाता है। जितना अधिक तुम अभ्यास करते हो, उतना ही अधिक तुम उन वचनों के सही मूल्य और अर्थ को समझते हो जो तुमने सुने हैं। स्वयं अनुभव प्राप्त कर लेने के पश्चात्, तुम उस ज्ञान के बारे में बात कर पाते हो जो तुम्हारे पास उन चीज़ों के बारे में होना चाहिए जो तुमने अनुभव की हैं। इसके साथ, तुम ऐसे लोगों के बीच अंतर कर सकते हो जिनका ज्ञान वास्तविक और व्यावहारिक है और ऐसे लोग जिनका ज्ञान सिद्धांत पर आधारित है और बेकार है। इसलिए, वह ज्ञान जिसकी तुम चर्चा करते हो वह सत्य के अनुरूप है या नहीं, यह मुख्य रूप से इस बात पर निर्भर करता है कि तुम्‍हारे पास उसका व्यावहारिक अनुभव है या नहीं। जहाँ तुम्हारे अनुभवों में सच्चाई होगी, वहाँ तुम्हारा ज्ञान व्यावहारिक और मूल्यवान होगा। तुम अपने अनुभव के माध्यम से, विवेक और अंतर्दृष्टि भी प्राप्त कर सकते हो, अपने ज्ञान को गहरा कर सकते हो, तुम्हें कैसा आचरण करना चाहिए, इस बारे में अपनी बुद्धि और सामान्यबोध बढ़ा सकते हो। जिन लोगों में सत्य नहीं होता, उनके द्वारा व्यक्त ज्ञान मात्र सिद्धांत होता है, फिर भले ही वह ज्ञान कितना ही ऊँचा क्यों न हो। जब देह के मामलों की बात आती है तो हो सकता है कि इस प्रकार का व्यक्ति बहुत बुद्धिमान हो, परन्तु जब आध्यात्मिक मामलों की बात आती है तो वह अंतर नहीं कर पाता। क्योंकि आध्यात्मिक मामलों में ऐसे लोगों को कोई अनुभव नहीं होता। ऐसे लोग आध्यात्मिक मामलों में प्रबुद्ध नहीं होते और आध्यात्मिक मामलों को बिल्कुल नहीं समझते। चाहे तुम किसी भी तरह का ज्ञान व्यक्त करो, अगर यह तुम्हारा अस्तित्व है, तो यह तुम्हारा व्यक्तिगत अनुभव है, तुम्हारा वास्तविक ज्ञान है। जो लोग केवल सिद्धांत की ही बात करते हैं—जिनमें सत्य या वास्तविकता नहीं होती—वे जिस बारे में बात करते हैं, उसे उनका अस्तित्व भी कहा जा सकता है, क्योंकि उनका सिद्धांत गहरे चिंतन से ही आया है और यह उनके गहरे मनन का परिणाम है। परन्तु यह केवल सिद्धांत ही है, यह कल्पना से अधिक कुछ नहीं है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 175

विभिन्न प्रकार के लोगों के अनुभव उनकी आंतरिक चीज़ों का प्रतिनिधित्व करते हैं। आध्यात्मिक अनुभव के बिना कोई सत्य के ज्ञान पर बात नहीं कर सकता, न ही विभिन्न आध्यात्मिक चीज़ों के सही ज्ञान के बारे में बात कर सकता है। इंसान वही व्यक्त करता है जो वह भीतर से होता है—यह निश्चित है। यदि कोई आध्यात्मिक चीज़ों और सत्य का ज्ञान पाना चाहता है, तो उसके पास वास्तविक अनुभव होना चाहिए। यदि तुम मानवीय जीवन में सामान्य बोध के बारे में स्पष्ट रूप से बात नहीं कर सकते, तो तुम आध्यात्मिक चीज़ों के बारे में तो कितना कम बात कर पाओगे? जो लोग कलीसिया की अगुवाई कर सकते हैं, लोगों को जीवन प्रदान कर सकते हैं, और लोगों के लिए एक प्रेरित हो सकते हैं, उनके पास वास्तविक अनुभव होने ही चाहिए; उन्हें आध्यात्मिक चीज़ों की सही समझ, सत्य की सही समझ और अनुभव होना चाहिए। ऐसे ही लोग कलीसिया की अगुवाई करने वाले कर्मी या प्रेरित होने के योग्य हैं। अन्यथा, वे न्यूनतम रूप में केवल अनुसरण ही कर सकते हैं, अगुवाई नहीं कर सकते, वे लोगों को जीवन प्रदान करने में समर्थ प्रेरित तो बिलकुल भी नहीं हो सकते। क्योंकि प्रेरित का कार्य भाग-दौड़ करना या लड़ना नही है; बल्कि जीवन की सेवकाई का कार्य करना और लोगों के स्वभाव में परिवर्तन लाने के लिए उनकी अगुवाई करना है। इस कार्य को करने वालों को बड़ा दायित्व दिया जाता है जिसे हर कोई नहीं कर सकता है। इस प्रकार का कार्य का बीड़ा केवल ऐसे लोगों द्वारा ही उठाया जा सकता है जिन्हें जीवन की समझ है, अर्थात जिन्हें सत्य का अनुभव है। इसे बस यों ही ऐसा कोई व्यक्ति नहीं कर सकता है जो त्याग कर सकता हो, भाग-दौड़ कर सकता हो या जो खुद को खपाने की इच्छा रखता हो; जिन्हें सत्य का कोई अनुभव नहीं है, जिनकी काट-छाँट या जिनका न्याय नहीं किया गया है, वे इस प्रकार का कार्य करने में असमर्थ होते हैं। ऐसे लोग जिनके पास कोई अनुभव नहीं है, लोग जिनके पास कोई वास्तविकता नहीं है, वे वास्तविकता को स्पष्ट रूप से नहीं देख पाते, क्योंकि उनके पास ऐसा अस्तित्व नहीं होता। इसलिए, इस प्रकार का व्यक्ति न केवल अगुवाई का कार्य नहीं कर पाता, बल्कि यदि उसमें लम्बी अवधि तक कोई सत्य न हो, तो वह निष्कासन की वस्तु बन जाएगा। जो अंतर्दृष्टि तुम व्यक्त करते हो, वह उन कठिनाइयों का प्रमाण बन सकती है जिनका तुमने जीवन में अनुभव किया है, जिन चीज़ों के लिए तुम्हें ताड़ना दी गई है और जिन मामलों में तुम्हारा न्याय किया गया है। यह बात परीक्षणों पर भी लागू होती है : जहाँ एक व्यक्ति शुद्ध है, जहाँ एक व्यक्ति कमज़ोर है—इन क्षेत्रों में मनुष्य को अनुभव होता है, इनमें मनुष्य के पास मार्ग होता है। उदाहरण के लिए, यदि कोई विवाह में कुंठाओं से पीड़ित है, तो वह अक्सर ऐसी संगति करेगा, "परमेश्वर का धन्यवाद, परमेश्वर की स्तुति हो, मुझे परमेश्वर के हृदय की इच्छा को संतुष्ट करना चाहिए और अपना संपूर्ण जीवन उसे अर्पित कर देना चाहिए, अपने विवाह को पूरी तरह से परमेश्वर के हाथों में सौंप देना चाहिए। मैं अपना संपूर्ण जीवन परमेश्वर को देने की प्रतिज्ञा करने को तैयार हूँ।" संगति के माध्यम से मनुष्य के भीतर की सभी चीज़ें यह दर्शा सकती हैं कि वह क्या है। किसी व्यक्ति के बोलने की गति, वह ज़ोर से बोलता है या धीमे से—ऐसे मामले अनुभव के मामले नहीं हैं और वे उन बातों का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते जो उसके पास है और जो वह है। ये चीज़ें केवल इतना ही बता सकती हैं कि उसका चरित्र अच्छा है या बुरा, या उसकी प्रकृति अच्छी है या बुरी, परन्तु यह इस बात के बराबर नहीं कहा जा सकता कि उसके पास अनुभव हैया नहीं। बोलते समय स्वयं को व्यक्त करने की योग्यता, या बोलने की कुशलता या गति, सिर्फ अभ्यास की बातें हैं, ये चीज़ें उसके अनुभव का स्थान नहीं ले सकतीं। जब तुम व्यक्तिगत अनुभवों के बारे में बात करते हो, तो तुम उन सभी चीज़ों की संगति करते हो जिन्हें तुम महत्वपूर्ण मानते हो और जो तुम्हारे भीतर हैं। मेरा व्याख्यान मेरे अस्तित्व को दर्शाता है, परन्तु जो मैं कहता हूँ वह मनुष्य की पहुँच से परे होता है। मैं जो कहता हूँ, वह वो नहीं है जिसका मनुष्य अनुभव करता है, वह कुछ ऐसा नहीं है जिसे मनुष्य देख सकता है; न ही वो है जिसे वह स्पर्श कर सकता है; बल्कि यह वो है जो मैं हूँ। कुछ लोग केवल इतना ही स्वीकार करते हैं कि जो मैं संगति करता हूँ वह मैंने अनुभव किया है, परन्तु वे इस बात को नहीं पहचानते कि यह पवित्रात्मा की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है। निस्संदेह, जो मैं कहता हूँ वह मैंने अनुभव किया है। मैंने ही छः हजार वर्षों से प्रबंधन का कार्य किया है। मैंने मनुष्यजाति के सृजन के आरम्भ से लेकर आज तक हर चीज़ का अनुभव किया है; कैसे मैं इसके बारे में बात नहीं कर पाऊँगा? जब मनुष्य की प्रकृति की बात आती है, तो मैंने इसे स्पष्ट रूप से देखा है; मैंने बहुत पहले ही इसका अवलोकन कर लिया था। कैसे मैं इसके बारे में स्पष्ट रूप से बात नहीं कर पाऊँगा? चूँकि मैंने मनुष्य के सार को स्पष्टता से देखा है, इसलिए मैं मनुष्य को ताड़ना देने और उसका न्याय करने के योग्य हूँ, क्योंकि सभी मनुष्य मुझ से ही आए हैं परन्तु उन्हें शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है। निस्संदेह, मैं उस कार्य का आकलन करने के भी योग्य हूँ जो मैंने किया है। यद्यपि यह कार्य मेरे देह द्वारा नहीं किया जाता, फिर भी यह पवित्रात्मा की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है, और यही मेरा स्वरूप है। इसलिए, मैं इसे व्यक्त करने और उस कार्य को करने के योग्य हूँ जो मुझे करना चाहिए। जो कुछ लोग कहते हैं उसका उन्होंने अनुभव किया होता है। वही उन्होंने देखा है, जहाँ तक उनका दिमाग पहुँच सकता है और जिसे उनकी इंद्रियाँ महसूस कर सकती हैं। उसी की वे संगति कर सकते हैं। देहधारी परमेश्वर द्वारा कहे गए वचन पवित्रात्मा की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति हैं और वे उस कार्य को अभिव्यक्त करते हैं जो पवित्रात्मा द्वारा किया गया है, जिसे देह ने अनुभव नहीं किया है या देखा नहीं है, लेकिन फिर भी अपने अस्तित्व को व्यक्त करता है, क्योंकि देह का सार पवित्रात्मा है, और वह पवित्रात्मा के कार्य को व्यक्त करता है। यद्यपि यह देह की पहुँच से परे है, फिर भी इस कार्य को पवित्रात्मा द्वारा पहले ही कर लिया गया है। देहधारण के पश्चात्, देह की अभिव्यक्ति के माध्यम से, वह लोगों को परमेश्वर के अस्तित्व को जानने में सक्षम बनाता है और लोगों को परमेश्वर के स्वभाव और उस कार्य को देखने देता है जो उसने किया है। मनुष्य का कार्य लोगों को इस बारे में अधिक स्पष्ट होने में सक्षम बनाता है कि उन्हें किसमें प्रवेश करना चाहिए और उन्हें क्या समझना चाहिए; इसमें लोगों को सत्य को समझने और उसका अनुभव करने की ओर ले जाना शामिल है। मनुष्य का कार्य लोगों को पोषण देना है; परमेश्वर का कार्य मानवजाति के लिए नए मार्गों और नए युगों को प्रशस्त करना है, और लोगों के सामने वह प्रकट करना है जिसे नश्वर लोग नहीं जानते, जिससे वे परमेश्वर के स्वभाव को जानने में सक्षम हो जाएँ। परमेश्वर का कार्य सम्पूर्ण मानवजाति की अगुवाई करना है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 176

पवित्र आत्मा का सारा कार्य लोगों को लाभ पहुँचाने के लिए किया जाता है। यह पूर्ण रूप से लोगों को शिक्षित करने के बारे में है; ऐसा कोई कार्य नहीं है जो लोगों को लाभान्वित न करता हो। चाहे सत्य गहरा हो या उथला, चाहे सत्य को स्वीकार करने वाले लोगों की क्षमता कैसी भी क्यों न हो, जो कुछ भी पवित्र आत्मा करता है, यह सब लोगों के लिए लाभदायक है। परन्तु पवित्र आत्मा का कार्य सीधे तौर पर नहीं किया जा सकता; इसे पवित्र आत्मा के साथ सहयोग करने वाले लोगों के ज़रिए व्यक्त किया जाना चाहिए। तभी पवित्र आत्मा के कार्य के परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं। निस्संदेह, जब पवित्र आत्मा प्रत्यक्ष तौर पर कार्य करता है, तो उसमें कोई मिलावट नहीं होती; परन्तु जब पवित्र आत्मा मनुष्य के माध्यम से कार्य करता है, तो यह कलुषित हो जाता है और पवित्र आत्मा का मूल कार्य नहीं रह जाता। इस तरह से, सत्य विभिन्न अंशों तक बदल जाता है। अनुयायी पवित्र आत्मा के मूल इरादे को न पा कर, पवित्र आत्मा के कार्य और मनुष्य के अनुभव एवं ज्ञान के संयोजन को प्राप्त करते हैं। अनुयायियों के द्वारा जो प्राप्त किया जाता है उसका जो भाग पवित्र आत्मा का कार्य है, सही होता है, जबकि उनके द्वारा प्राप्त मनुष्य का अनुभव और ज्ञान भिन्न-भिन्न होते हैं क्योंकि कर्मी भिन्न-भिन्न होते हैं। जिन कर्मियों को पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता और मार्गदर्शन प्राप्त हो जाता है, वे प्रबुद्धता और मार्गदर्शन के आधार पर अनुभव पाते जाएँगे। इन अनुभवों में मनुष्य का मन और अनुभव, और साथ ही मानवता का अस्तित्व मिला हुआ होता है, उसके बाद वे वह ज्ञान या अंतर्दृष्टि प्राप्त करते हैं जो उनमें होनी चाहिए। सत्य का अनुभव कर लेने पर, यह मनुष्य के अभ्यास का मार्ग होता है। अभ्यास का यह मार्ग हमेशा वही नहीं रहता क्योंकि लोगों के अनुभव भिन्न-भिन्न होते हैं और जिन चीज़ों का लोग अनुभव करते हैं, वे भी भिन्न-भिन्न होती हैं। इस तरह, पवित्र आत्मा की वही प्रबुद्धता भिन्न-भिन्न ज्ञान और अभ्यास में परिणत होती है, क्योंकि प्रबुद्धता प्राप्त करने वाले लोग भिन्न-भिन्न होते हैं। कुछ लोग अभ्यास के दौरान मामूली गलतियाँ करते हैं जबकि कुछ लोग बड़ी गलतियाँ करते हैं, और कुछ लोग तो सिर्फ गलतियाँ ही करते हैं। क्योंकि लोगों की समझने की क्षमता भिन्न होती हैं और उनकी अंतर्निहित क्षमता भी भिन्न होती है। कुछ लोग किसी सन्देश को सुनकर उसे एक तरह से समझते हैं, जबकि कुछ लोग किसी सत्य को सुनकर उसे दूसरी तरह से समझते हैं। कुछ लोग जरा-सा भटक जाते हैं; जबकि कुछ लोग सत्य के अर्थ को बिल्कुल भी नहीं समझते। इसलिए, इंसान की समझ ही तय करती है कि वह दूसरों की अगुवाई कैसे करेगा; यह बिल्कुल सत्य है, क्योंकि इंसान का कार्य उसके अस्तित्व की अभिव्यक्ति ही है। जो लोग सत्य की समझ रखने वाले लोगों की अगुवाई में होते हैं, उनकी भी सत्य की समझ सही होगी। अगर ऐसे लोग हैं भी जिनकी समझ में त्रुटियाँ हैं, तो भी ऐसे लोग बहुत कम हैं, और सभी में त्रुटियाँ नहीं होंगी। यदि किसी की सत्य की समझ में त्रुटियाँ हैं, तो निस्संदेह उनमें भी त्रुटियाँ होंगी जो उसका अनुसरण करते हैं। ऐसे लोग हर तरह से गलत होंगे। अनुयायियों की सत्य की समझ की मात्रा मुख्य रूप से कर्मियों पर निर्भर करती है। निस्संदेह, परमेश्वर से आया सत्य सही और त्रुटिहीन है, और इसमें कोई संदेह नहीं है। परन्तु, कर्मी पूरी तरह से सही नहीं होते और उन्हें पूरी तरह से विश्वसनीय नहीं कहा जा सकता। यदि कर्मियों के पास सत्य का अभ्यास करने का बहुत व्यावहारिक तरीका है, तो अनुयायियों के पास भी अभ्यास का तरीका होगा। यदि कर्मियों के पास सत्य का अभ्यास करने का कोई तरीका न होकर, केवल सिद्धांत है, तो अनुयायियों में कोई वास्तविकता नहीं होगी। अनुयायियों की क्षमता और स्वभाव जन्म से ही निर्धारित होते हैं और वे कार्यकर्ताओं के साथ संबद्ध नहीं होते, परन्तु अनुयायियों के सत्य को समझने और परमेश्वर को जानने की सीमा कर्मियों पर निर्भर करती है (यह बात केवल कुछ लोगों पर ही लागू होती है)। जैसा कर्मी होगा, वैसे ही उसके अनुयायी होंगे जिनकी वह अगुवाई करता है। कर्मी पूरी तरह से अपने ही अस्तित्व को व्यक्त करता है। वह जिन चीज़ों की अपेक्षा अपने अनुयायियों से करता है, उन्हीं चीज़ों को वह स्वयं प्राप्त करना चाहता है या प्राप्त करने में समर्थ होता है। अधिकांश कर्मी जो कुछ स्वयं करते हैं, उसी के आधार पर अपने अनुयायियों से अपेक्षाएँ करते हैं, इसके बावजूद कि उनके अनुयायी बहुत-सी चीज़ों को बिल्कुल भी प्राप्त नहीं कर पाते—और जिस चीज़ को इंसान प्राप्त नहीं कर पाता, वह उसके प्रवेश में बाधा बन जाती है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 177

उन लोगों के कार्य में बहुत कम विचलन होता है, जो काट-छाँट, निपटे जाने, न्याय और ताड़ना से होकर गुज़र चुके होते हैं, और उनके कार्य की अभिव्यक्ति भी कहीं अधिक सटीक होती है। जो लोग कार्य करने की अपनी स्वाभाविकता पर निर्भर करते हैं, वे काफी बड़ी गलतियाँ करते हैं। अपूर्ण लोगों के कार्य में उनकी स्वाभाविकता बहुत अधिक अभिव्यक्त होती है, जो पवित्र आत्मा के कार्य में बड़ा अवरोध उत्पन्न करती है। किसी व्यक्ति की क्षमता कितनी ही अच्छी क्यों न हो, उसे भी परमेश्वर के आदेश का कार्य करने से पहले काट-छाँट, निपटे जाने और न्याय से गुज़रना ही चाहिए। यदि वह ऐसे न्याय से होकर नहीं गुज़रा है, तो उसका कार्य, चाहे कितनी भी अच्छी तरह से क्यों न किया गया हो, सत्य के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं हो सकता, वह हमेशा उसकी अपनी स्वाभाविकता और मानवीय भलाई का परिणाम होता है। काट-छाँट, निपटे जाने और न्याय से होकर गुज़र चुके लोगों का कार्य उन लोगों के कार्य से कहीं अधिक सटीक होता है, जिनकी काट-छाँट, निपटारा और न्याय नहीं किया गया है। जो लोग न्याय से होकर नहीं गुज़रे हैं, वे मानव-देह और विचारों के सिवाय और कुछ भी व्यक्त नहीं करते, जिनमें बहुत सारी मानव-बुद्धि और जन्मजात प्रतिभा मिली होती है। यह मनुष्य द्वारा परमेश्वर के कार्य की सटीक अभिव्यक्ति नहीं है। जो लोग ऐसे लोगों का अनुसरण करते हैं, वे अपनी जन्मजात क्षमता द्वारा उनके सामने लाए जाते हैं। चूँकि वे मनुष्य की अंतर्दृष्टि और अनुभव को बहुत अधिक व्यक्त करते हैं, जो परमेश्वर के मूल इरादे से लगभग कटे हुए और उससे बहुत भटके हुए होते हैं, इसलिए इस प्रकार के व्यक्ति का कार्य लोगों को परमेश्वर के सम्मुख नहीं ला पाता, बल्कि वह उन्हें मनुष्य के सामने ले आता है। इसलिए, जो लोग न्याय और ताड़ना से होकर नहीं गुज़रे हैं, वे परमेश्वर के आदेश के कार्य को क्रियान्वित करने योग्य नहीं हैं। योग्य कर्मी का कार्य लोगों को सही मार्ग पर लाकर उन्हें सत्य में बेहतर प्रवेश प्रदान कर सकता है। उसका कार्य लोगों को परमेश्वर के सम्मुख ला सकता है। इसके अतिरिक्त, जो कार्य वह करता है, वह भिन्न-भिन्न व्यक्तियों के लिए भिन्न-भिन्न हो सकता है, और वह नियमों से बँधा हुआ नहीं होता, उन्हें मुक्ति और स्वतंत्रता तथा जीवन में क्रमश: आगे बढ़ने और सत्य में अधिक गहन प्रवेश करने की क्षमता प्रदान करता है। अयोग्य कर्मी का कार्य कम पड़ जाता है। उसका कार्य मूर्खतापूर्ण होता है। वह लोगों को केवल नियमों के अधीन ला सकता है; और लोगों से उसकी अपेक्षाएँ हर व्यक्ति के लिए भिन्न-भिन्न नहीं होतीं; वह लोगों की वास्तविक आवश्यकताओं के अनुसार कार्य नहीं करता। इस प्रकार के कार्य में बहुत अधिक नियम और सिद्धांत होते हैं, और वह लोगों को वास्तविकता में नहीं ला सकता, न ही वह उन्हें जीवन में विकास के सामान्य अभ्यास में ला सकता है। वह लोगों को केवल कुछ बेकार नियमों का पालन करने में ही सक्षम बना सकता है। ऐसा मार्गदर्शन लोगों को केवल भटका सकता है। वह तुम्हें अपने जैसा बनाने में तुम्हारी अगुआई करता है; वह तुम्हें अपने स्वरूप में ला सकता है। इस बात को समझने के लिए कि अगुआ योग्य हैं या नहीं, अनुयायियों को अगुवाओं के उस मार्ग को जिस पर वे लोगों को ले जा रहे हैं और उनके कार्य के परिणामों को देखना चाहिए, और यह भी देखना चाहिए कि अनुयायी सत्य के अनुसार सिद्धांत पाते हैं या नहीं और अपने रूपांतरण के लिए उपयुक्त अभ्यास के तरीके प्राप्त करते हैं या नहीं। तुम्हें विभिन्न प्रकार के लोगों के विभिन्न कार्यों के बीच भेद करना चाहिए; तुम्हें मूर्ख अनुयायी नहीं होना चाहिए। यह लोगों के प्रवेश के मामले पर प्रभाव डालता है। यदि तुम यह भेद करने में असमर्थ हो कि किस व्यक्ति की अगुआई में एक मार्ग है और किसकी अगुआई में नहीं है, तो तुम आसानी से धोखा खा जाओगे। इस सबका तुम्हारे अपने जीवन के साथ सीधा संबंध है। अपूर्ण लोगों के कार्य में बहुत अधिक स्वाभाविकता होती है; उसमें बहुत अधिक मानवीय इच्छा मिली हुई होती है। उनका अस्तित्व स्वाभाविकता है—जिसके साथ वे पैदा हुए हैं। वह निपटे जाने के बाद का जीवन या रूपांतरित किए जाने के बाद की वास्तविकता नहीं है। ऐसा व्यक्ति उन्हें सहारा कैसे दे सकता हैं, जो जीवन की खोज कर रहे हैं? मनुष्य का जीवन मूलत: उसकी जन्मजात बुद्धि या प्रतिभा है। इस प्रकार की बुद्धि या प्रतिभा मनुष्य से परमेश्वर की सटीक अपेक्षाओं से काफी दूर होती है। यदि किसी मनुष्य को पूर्ण नहीं किया गया है और उसके भ्रष्ट स्वभाव की काट-छाँट नहीं की गई है और उससे निपटा नहीं गया है, तो उसकी अभिव्यक्ति और सत्य के बीच एक बहुत बड़ा अंतर होगा; उसकी अभिव्यक्ति में उसकी कल्पना और एकतरफा अनुभव जैसी अस्पष्ट चीज़ों का मिश्रण होगा। इतना ही नहीं, वह कैसे भी कार्य क्यों न करे, लोग यही महसूस करते हैं कि उसमें ऐसा कोई समग्र लक्ष्य और ऐसा कोई सत्य नहीं है, जो सभी लोगों के प्रवेश के लिए उपयुक्त हो। लोगों से जो अपेक्षाएँ की जाती हैं, उनमें से अधिकांश उनकी योग्यता से परे होती हैं, मानो वे मचान पर बैठने के लिए मजबूर की जा रही बतख़ें हों। यह मनुष्य की इच्छा का कार्य है। मनुष्य का भ्रष्ट स्वभाव, उसके विचार और उसकी धारणाएँ उसके शरीर के सभी अंगों में व्याप्त हैं। मनुष्य सत्य का अभ्यास करने की प्रवृत्ति के साथ पैदा नहीं होता, न ही उसमें सीधे तौर पर सत्य को समझने की प्रवृत्ति होती है। उसमें मनुष्य का भ्रष्ट स्वभाव जोड़ दो—जब इस प्रकार का स्वाभाविक व्यक्ति कार्य करता है, तो क्या इससे व्यवधान नहीं उत्पन्न होते? परंतु जो मनुष्य पूर्ण किया जा चुका है, उसके पास सत्य का अनुभव होता है जिसे लोगों को समझना चाहिए, और उसके पास अपने भ्रष्ट स्वभाव का ज्ञान होता है, जिससे उसके कार्य की अस्पष्ट और अवास्तविक चीज़ें धीरे-धीरे कम हो जाती हैं, मानवीय मिलावटें पहले से कम हो जाती हैं, और उसका काम और सेवा परमेश्वर द्वारा अपेक्षित मानकों के अधिक करीब पहुँच जाता है। इस प्रकार, उसका काम सत्य-वास्तविकता में प्रवेश कर गया है और वह वास्तविक भी बन गया है। मनुष्य के मन के विचार विशेष रूप से पवित्र आत्मा के कार्य को अवरुद्ध कर देते हैं। मनुष्य के पास समृद्ध कल्पना और उचित तर्क होते हैं, और उसके पास मामलों से निपटने का लंबा अनुभव होता है। यदि मनुष्य के ये पहलू काट-छाँट और सुधार से होकर नहीं गुज़रते, तो वे सभी कार्य की बाधाएँ हैं। इसलिए मनुष्य का कार्य सटीकता के सर्वोच्च स्तर तक नहीं पहुँच सकता, विशेषकर अपूर्ण लोगों का कार्य।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 178

मनुष्य का कार्य एक विस्तार और सीमा के भीतर रहता है। एक व्यक्ति केवल किसी निश्चित चरण के कार्य को करने में ही समर्थ होता है, वह संपूर्ण युग का कार्य नहीं कर सकता—अन्यथा, वह लोगों को नियमों के भीतर ले जाएगा। मनुष्य के कार्य को केवल एक विशेष समय या चरण पर ही लागू किया जा सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि मनुष्य के अनुभव का एक दायरा होता है। परमेश्वर के कार्य की तुलना मनुष्य के कार्य से नहीं की जा सकती। मनुष्य के अभ्यास करने के तरीके और सत्य का उसका ज्ञान, ये सभी एक विशेष दायरे में लागू होते हैं। तुम यह नहीं कह सकते कि जिस मार्ग पर मनुष्य चलता है वह पूरी तरह से पवित्र आत्मा की इच्छा है, क्योंकि मनुष्य को केवल पवित्र आत्मा द्वारा ही प्रबुद्ध किया जा सकता है और उसे पवित्र आत्मा से पूरी तरह से नहीं भरा जा सकता। जिन चीज़ों को मनुष्य अनुभव कर सकता है, वे सभी सामान्य मानवता के दायरे के भीतर हैं और वे सामान्य मानवीय बुद्धि में मौजूद विचारों की सीमाओं से आगे नहीं बढ़ सकतीं। वे सभी लोग, जो सत्य-वास्तविकता को जी सकते हैं, इस सीमा के भीतर अनुभव करते हैं। जब वे सत्य का अनुभव करते हैं, तो यह हमेशा पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध सामान्य मानवीय जीवन का अनुभव होता है; यह उस तरह से अनुभव करना नहीं है जो सामान्य मानवीय जीवन से भटक जाता है। वे अपने मानवीय जीवन को जीने की बुनियाद पर पवित्र आत्मा के द्वारा प्रबुद्ध किए गए सत्य का अनुभव करते हैं। इसके अतिरिक्त, यह सत्य हर व्यक्ति के लिए अलग होता है, और इसकी गहराई उस व्यक्ति की अवस्था से संबंधित होती है। यह कहा जा सकता है कि जिस मार्ग पर वे चलते हैं वह ऐसे व्यक्ति का सामान्य मानवीय जीवन है जो सत्य की खोज कर रहा है, और इसे ऐसा मार्ग कहा जा सकता है जिस पर पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध कोई सामान्य व्यक्ति चल चुका है। कोई यह नहीं कह सकता कि जिस मार्ग पर वे चलते हैं वह ऐसा मार्ग है जिस पर पवित्र आत्मा चलता है। सामान्य मानवीय अनुभव में, क्योंकि जो लोग अनुसरण करते हैं वे एक समान नहीं होते, इसलिए पवित्र आत्मा का कार्य भी समान नहीं होता। इसके अतिरिक्त, क्योंकि जिन परिवेशों का लोग अनुभव करते हैं और उनके अनुभव की सीमाएँ एक समान नहीं होतीं, इसलिए उनके मन और विचारों के मिश्रण की वजह से, उनका अनुभव विभिन्न अंशों तक मिश्रित हो जाता है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी भिन्न व्यक्तिगत परिस्थितियों के अनुसार ही किसी सत्य को समझता है। सत्य के वास्तविक अर्थ की उसकी समझ पूर्ण नहीं होती और यह उसका केवल एक या कुछ ही पहलू होते हैं। मनुष्य सत्य के जिस दायरे का अनुभव करता है, वह प्रत्येक इंसान की परिस्थितियों के अनुरूप बदलता है। इस तरह, एक ही सत्य के बारे में विभिन्न लोगों द्वारा व्यक्त ज्ञान एक समान नहीं होता। कहने का तात्पर्य है कि मनुष्य के अनुभव की हमेशा सीमाएँ होती हैं और यह पवित्र आत्मा की इच्छा को पूरी तरह से नहीं दर्शा सकता, और न ही मनुष्य के कार्य को परमेश्वर का कार्य समझा जा सकता, फिर भले ही जो कुछ मनुष्य द्वारा व्यक्त किया गया है, वह परमेश्वर की इच्छा से बहुत बारीकी से मेल क्यों न खाता हो, भले ही मनुष्य का अनुभव पवित्र आत्मा द्वारा किए जाने वाले पूर्ण करने के कार्य के बेहद करीब ही क्यों न हो। मनुष्य केवल परमेश्वर का सेवक हो सकता है, जो केवल वही कार्य करता है जो परमेश्वर उसे सौंपता है। मनुष्य केवल पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध ज्ञान और व्यक्तिगत अनुभवों से प्राप्त सत्यों को ही व्यक्त कर सकता है। मनुष्य अयोग्य है और पवित्र आत्मा का निर्गम बनने की शर्तों को पूरा नहीं करता। वह यह कहने का हकदार नहीं है कि उसका कार्य परमेश्वर का कार्य है। मनुष्य के पास मनुष्य के कार्य करने के सिद्धांत हैं, सभी लोगों के अनुभव अलग होते हैं और उनकी स्थितियाँ अलग होती हैं। मनुष्य के कार्य में पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता के अंतर्गत उसके सभी अनुभव शामिल होते हैं। ये अनुभव केवल मनुष्य के अस्तित्व का ही प्रतिनिधित्व कर सकते हैं, ये परमेश्वर के अस्तित्व का या पवित्र आत्मा की इच्छा का प्रतिनिधित्व नहीं करते। इसलिए, यह नहीं कहा जा सकता कि मनुष्य जिस मार्ग पर चलता है, उसी पर पवित्र आत्मा भी चलता है क्योंकि मनुष्य का कार्य परमेश्वर के कार्य का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता, मनुष्य के कार्य और अनुभव पवित्र आत्मा की संपूर्ण इच्छा नहीं हैं। मनुष्य का कार्य नियमों के चक्कर में पड़ सकता है, और उसकी कार्य-पद्धति आसानी से एक दायरे में सीमित हो जाती है और यह लोगों की स्वतंत्र मार्ग पर अगुवाई करने में असमर्थ होती है। अधिकांश अनुयायी एक सीमित दायरे में जीवन जीते हैं, और उनके अनुभव करने का तरीका भी अपने दायरे में सीमित होता है। मनुष्य का अनुभव हमेशा सीमित होता है; उसकी कार्य-पद्धति भी कुछ प्रकारों तक ही सीमित होती है और इसकी तुलना पवित्र आत्मा के कार्य से या स्वयं परमेश्वर के कार्य से नहीं की जा सकती—क्योंकि अंततः मनुष्य का अनुभव सीमित होता है। परमेश्वर अपना कार्य चाहे जिस तरह करे, वह किसी नियम से बंधा नहीं होता; इसे जैसे भी किया जाए, यह किसी एक पद्धति तक सीमित नहीं होता। परमेश्वर के कार्य के किसी प्रकार के कोई नियम नहीं होते—उसका समस्त कार्य मुक्त और स्वतंत्र होता है। भले ही मनुष्य परमेश्वर का अनुसरण करते हुए कितना ही समय क्यों न बिताए, वह उसके निचोड़कर ऐसे नियम नहीं निकाल सकता जो परमेश्वर के कार्य करने के तरीके का संचालन करते हों। यद्यपि उसके कार्य के सिद्धांत हैं, फिर भी वह कार्य हमेशा नए-नए तरीकों से किया जाता है और उसमें नये-नये विकास होते रहते हैं, और यह मनुष्य की पहुँच से परे होता है। एक ही समयावधि के दौरान, परमेश्वर के पास भिन्न-भिन्न प्रकार के कार्य और लोगों की अगुवाई करने के भिन्न-भिन्न तरीके हो सकते हैं, ताकि लोगों के पास हमेशा नए-नए प्रवेश और नए-नए परिवर्तन हों। तुम उसके कार्य के नियमों का पता नहीं लगा सकते क्योंकि वह हमेशा नए तरीकों से कार्य करता है, और केवल इस तरह परमेश्वर के अनुयायी नियमों से नहीं बंधते। स्वयं परमेश्वर का कार्य हमेशा लोगों की धारणाओं से परहेज करता है और उनका विरोध करता है। जो लोग सच्चे हृदय से उसका अनुसरण और उसकी खोज करते हैं, केवल वही अपने स्वभाव में बदलाव लाकर स्वतंत्रता से जी सकते हैं, वे किसी नियम या किसी भी धार्मिक धारणा के बंधन में नहीं बंधते। मनुष्य का कार्य लोगों से उसके अपने अनुभव और और जो वह स्वयं हासिल कर सकता है, उसके आधार पर माँगें करता है। इन अपेक्षाओं का स्तर एक निश्चित दायरे के भीतर सीमित होता है, और अभ्यास के तरीके भी बहुत सीमित होते हैं। इसलिए अनुयायी अनजाने में ही सीमित दायरे के भीतर जीवन जीते हैं; जैसे-जैसे समय गुज़रता है, ये बातें नियम और रिवाज बन जाती हैं। यदि एक अवधि के कार्य की अगुवाई कोई ऐसा व्यक्ति करता है जो परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से पूर्ण किए जाने से नहीं गुज़रा है और जिसने न्याय प्राप्त नहीं किया है, तो उसके सभी अनुयायी धर्मावलम्बी बन जाएँगे और परमेश्वर का विरोध करने में माहिर हो जाएँगे। इसलिए, यदि कोई योग्य अगुवा है, तो उसने अवश्य ही न्याय से गुज़रकर, पूर्ण किया जाना स्वीकार किया होगा। जो लोग न्याय से नहीं गुज़रे हैं, उनमें भले ही पवित्र आत्मा का कार्य हो, वे केवल अस्पष्ट और अवास्तविक चीज़ों को ही व्यक्त करते हैं। समय के साथ, वे लोगों को अस्पष्ट और अलौकिक नियमों में ले जाएँगे। परमेश्वर का कार्य मनुष्य की देह से मेल नहीं खाता; वह मनुष्य के विचारों से मेल नहीं खाता, बल्कि मनुष्य की धारणाओं का विरोध करता है; यह अस्पष्ट धार्मिक रंग से कलंकित नहीं होता। परमेश्वर के कार्य के परिणामों को ऐसा व्यक्ति प्राप्त नहीं कर सकता है जो उसके द्वारा पूर्ण नहीं किया गया है; वे मनुष्य की सोच से परे होते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 179

जो कार्य मनुष्य के मन में होता है उसे वह बहुत आसानी से प्राप्त कर सकता है। उदाहरण के लिए, धार्मिक संसार के पादरी और अगुवे अपना कार्य करने के लिए अपनी प्रतिभाओं और पदों पर भरोसा रखते हैं। जो लोग लम्बे समय तक उनका अनुसरण करते हैं वे उनकी प्रतिभाओं से संक्रमित होकर उनके अस्तित्व के कुछ हिस्से से प्रभावित हो जाते हैं। वे लोगों की प्रतिभा, योग्यता और ज्ञान को निशाना बनाते हैं, वे अलौकिक चीज़ों और अनेक गहन और अवास्तविक सिद्धांतों पर ध्यान देते हैं (निस्संदेह, ये गहन सिद्धांत अप्राप्य हैं)। वे लोगों के स्वभाव में बदलाव पर ध्यान न देकर, लोगों को उपदेश देने और कार्य करने का प्रशिक्षण देने, लोगों के ज्ञान और उनके भरपूर धार्मिक सिद्धांतों को सुधारने पर ध्यान देते हैं। वे इस बात पर ध्यान नहीं देते कि लोगों के स्वभाव में कितना परिवर्तन हुआ है, न ही इस बात पर ध्यान देते हैं कि लोग कितना सत्य समझते हैं। उन्हें लोगों के सार से कोई लेना-देना नहीं होता, वे लोगों की सामान्य और असामान्य दशा को जानने की कोशिश तो बिल्कुल नहीं करते। वे लोगों की धारणाओं का विरोध नहीं करते, न ही वे अपनी धारणाओं को प्रकट करते हैं, वे लोगों की कमियों या भ्रष्टता के लिए उनकी काट-छाँट तो बिल्कुल भी नहीं करते। उनका अनुसरण करने वाले अधिकांश लोग अपनी प्रतिभा से सेवा करते हैं, और जो कुछ वे प्रदर्शित करते हैं, वह धार्मिक धारणाएँ और धर्म-संबंधी सिद्धांत होते हैं, जिनका वास्तविकता से कोई नाता नहीं होता और वे लोगों को जीवन प्रदान करने में पूरी तरह से असमर्थ होते हैं। वास्तव में, उनके कार्य का सार प्रतिभाओं का पोषण करना, प्रतिभाहीन व्यक्ति का पोषण करके उसे एक योग्य सेमेनरी स्नातक बनाना है जो बाद में कार्य और अगुवाई करता है। क्या तुम परमेश्वर के छः हज़ार वर्षों के कार्य में किसी नियम का पता लगा सकते हो? मनुष्य के कार्य में बहुत से नियम और प्रतिबन्ध होते हैं, और मानवीय मस्तिष्क बहुत ही रूढ़िवादी होता है। इसलिए मनुष्य जो कुछ व्यक्त करता है, वह उसके अनुभव के दायरे में मौजूद उसका ज्ञान और एहसास होता है। मनुष्य इसके अलावा कुछ भी व्यक्त करने में असमर्थ है। मनुष्य के अनुभव या उसका ज्ञान, उसकी जन्मजात प्रतिभाओं या सहज-प्रवृत्ति से उत्पन्न नहीं होते; वे परमेश्वर के मार्गदर्शन और उसकी प्रत्यक्ष चरवाही की वजह से उत्पन्न होते हैं। मनुष्य के पास केवल इस चरवाही को स्वीकार करने का गुण होता है और उसके पास वह गुण नहीं होता जिससे वह सीधे तौर पर यह अभिव्यक्त करे कि दिव्यता क्या है। मनुष्य स्रोत बनने में असमर्थ है; वह केवल ऐसा पात्र हो सकता है जो स्रोत से पानी को स्वीकार करता है; यह मनुष्य की सहज-प्रवृत्ति है, ऐसा गुण है जो मनुष्य होने के नाते उसमें होना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर के वचन को ग्रहण करने वाले उस गुण को गँवा देता है और मानवीय सहज-प्रवृत्ति को गँवा देता है, तो वह व्यक्ति उसे भी खो देता है जो अत्यंत बहुमूल्य है, और सृजित मनुष्य के कर्तव्य को भी गँवा देता है। यदि किसी मनुष्य में परमेश्वर के वचन या कार्य का ज्ञान या अनुभव नहीं है, तो वह व्यक्ति अपना कर्तव्य, ऐसा कर्तव्य जो उसे एक सृजित प्राणी के रूप में निभाना चाहिए, गँवा देता है, और वह सृजित प्राणी के रूप में अपनी गरिमा गँवा देता है। यह व्यक्त करना परमेश्वर की सहज-प्रवृत्ति है कि दिव्यता क्या है, फिर चाहे इसे देह में व्यक्त किया जाए या सीधे तौर पर पवित्रात्मा द्वारा व्यक्त किया जाए; यह परमेश्वर की सेवकाई है। मनुष्य परमेश्वर के कार्य के दौरान या उसके बाद अपना अनुभव या ज्ञान व्यक्त करता है (अर्थात्, जो वह है उसे व्यक्त करता है); यह मनुष्य की सहज-प्रवृत्ति और कर्तव्य है, और वही मनुष्य को प्राप्त करना चाहिए। यद्यपि मनुष्य की अभिव्यक्ति परमेश्वर की अभिव्यक्ति से बहुत ही कम होती है, हालाँकि मनुष्य की अभिव्यक्ति बहुत से नियमों से बंधी होती है, फिर भी मनुष्य को अपना कर्तव्य निभाना चाहिए और उसे वह कार्य करना चाहिए जो उसे करना है। मनुष्य को अपना कर्तव्य निभाने के लिए हर संभव प्रयास करना चाहिए, और उसे कोई भी संदेह नहीं होना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 180

तुम लोगों को पता होना चाहिए कि परमेश्वर के कार्य और मनुष्य के कार्य में भेद कैसे करना है। तुम मनुष्य के कार्य में क्या देख सकते हो? मनुष्य के कार्य में उसके अनुभव के बहुत से तत्व होते हैं; मनुष्य वही व्यक्त करता है जैसा वह होता है। परमेश्वर का अपना कार्य भी वही अभिव्यक्त करता है जो वह है, परंतु उसका अस्तित्व मनुष्य से भिन्न है। मनुष्य का अस्तित्व मनुष्य के अनुभव और जीवन का प्रतिनिधि है (जो कुछ मनुष्य अपने जीवन में अनुभव करता या जिससे सामना होता है, या जो उसके जीने के फलसफे हैं), और भिन्न-भिन्न परिवेशों में रहने वाले लोग भिन्न-भिन्न अस्तित्व व्यक्त करते हैं। क्या तुम्हारे पास सामाजिक अनुभव है और तुम वास्तव में किस प्रकार अपने परिवार में रहते और उसके भीतर कैसे अनुभव करते हो, इसे तुम्हारी अभिव्यक्ति में देखा जा सकता है, जबकि तुम देहधारी परमेश्वर के कार्य से यह नहीं देख सकते कि उसके पास सामाजिक अनुभव हैं या नहीं। वह मनुष्य के सार से अच्छी तरह से अवगत है, वह सभी प्रकार के लोगों से संबंधित हर तरह के अभ्यास प्रकट कर सकता है। वह मानव के भ्रष्ट स्वभाव और विद्रोही व्यवहार को भी बेहतर ढंग से प्रकट करता है। वह सांसारिक लोगों के बीच नहीं रहता, परंतु वह नश्वर लोगों की प्रकृति और सांसारियों की समस्त भ्रष्टता से अवगत है। यही उसका अस्तित्व है। यद्यपि वह संसार के साथ व्यवहार नहीं करता, लेकिन वह संसार के साथ व्यवहार करने के नियम जानता है, क्योंकि वह मानवीय प्रकृति को पूरी तरह से समझता है। वह पवित्रात्मा के आज के और अतीत के, दोनों कार्यों के बारे में जानता है जिन्हें मनुष्य की आँखें नहीं देख सकतीं और कान नहीं सुन सकते। इसमें बुद्धि शामिल है जो कि जीने का फलसफा और चमत्कार नहीं है जिनकी थाह पाना मनुष्य के लिए कठिन है। यही उसका अस्तित्व है, लोगों के लिए खुला भी और उनसे छिपा हुआ भी है। वह जो कुछ वह व्यक्त करता है, वह असाधारण मनुष्य का अस्तित्व नहीं है, बल्कि पवित्रात्मा के अंतर्निहित गुण और अस्तित्व हैं। वह दुनिया भर में यात्रा नहीं करता परंतु उसकी हर चीज़ को जानता है। वह "वन-मानुषों" के साथ संपर्क करता है जिनके पास कोई ज्ञान या अंतर्दृष्टि नहीं होती, परंतु वह ऐसे वचन व्यक्त करता है जो ज्ञान से ऊँचे और महान लोगों से ऊपर होते हैं। वह मंदबुद्धि और संवेदनशून्य लोगों के समूह में रहता है जिनमें न तो मानवीयता होती है और न ही वे मानवीय परंपराओं और जीवन को समझते हैं, परंतु वह लोगों से सामान्य मानवता का जीवन जीने के लिए कह सकता है, साथ ही वह इंसान की नीच और अधम मानवता को भी प्रकट करता है। यह सब-कुछ उसका अस्तित्व ही है, किसी भी रक्त-माँस के इंसान के अस्तित्व की तुलना में कहीं अधिक ऊँचा है। उसके लिए, यह आवश्यक नहीं है कि वह उस कार्य को करने के लिए जो उसे करना है और भ्रष्ट मनुष्य के सार को पूरी तरह से प्रकट करने के लिए जटिल, बोझिल और पतित सामाजिक जीवन का अनुभव करे। पतित सामाजिक जीवन उसके देह को कुछ नहीं सिखाता। उसके कार्य और वचन केवल मनुष्य की अवज्ञा को प्रकट करते हैं, वे संसार के साथ निपटने के लिए मनुष्य को अनुभव और सबक प्रदान नहीं करते। जब वह मनुष्य को जीवन की आपूर्ति करता है तो उसे समाज या मनुष्य के परिवार की जाँच-पड़ताल करने की आवश्यकता नहीं होती। मनुष्य को उजागर करना और न्याय करना उसके देह के अनुभवों की अभिव्यक्ति नहीं है; यह लम्बे समय तक मनुष्य की अवज्ञा को जानने के बाद, उसका मनुष्य की अधार्मिकता को प्रकट करना और मनुष्य की भ्रष्टता से घृणा करना है। परमेश्वर के सारे कार्य का तात्पर्य मनुष्य के सामने अपने स्वभाव को प्रकट करना और अपने अस्तित्व को व्यक्त करना है। केवल वही इस कार्य को कर सकता है; इस कार्य को रक्त-माँस का व्यक्ति नहीं कर सकता।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 181

जिस कार्य को परमेश्वर करता है वह उसके देह के अनुभव का प्रतिनिधित्व नहीं करता; जिस कार्य को मनुष्य करता है वह मनुष्य के अनुभव का प्रतिनिधित्व करता है। हर कोई अपने व्यक्तिगत अनुभव की बात करता है। परमेश्वर सीधे तौर पर सत्य व्यक्त कर सकता है, जबकि मनुष्य केवल सत्य का अनुभव करने के पश्चात् तदनुरूप अनुभव को व्यक्त कर सकता है। परमेश्वर के कार्य में कोई नियम नहीं होते और वह समय या भौगोलिक सीमाओं से मुक्त है। वह जो है उसे वह किसी भी समय, कहीं पर भी प्रकट कर सकता है। उसे जैसा अच्छा लगता है वह वैसा ही करता है। मनुष्य के कार्य में परिस्थितियाँ और सन्दर्भ होते हैं; उनके बिना, वह कार्य करने में असमर्थ होता है और वह परमेश्वर के बारे में अपने ज्ञान को व्यक्त करने या सत्य के बारे में अपने अनुभव को व्यक्त करने में भी असमर्थ होता है। यह बताने के लिए कि यह परमेश्वर का कार्य है या मनुष्य का, तुम्हें बस उनके बीच अन्तर की तुलना करनी है। यदि कोई कार्य स्वयं परमेश्वर द्वारा नहीं किया गया है और वह केवल मनुष्य का ही कार्य है, तो तुम्हें आसानी से पता चल जाएगा कि मनुष्य की शिक्षाएँ ऊँची हैं, जो किसी की भी क्षमता से परे हैं; उसके बोलने का अंदाज़, चीज़ों को सँभालने का उसका सिद्धांत और कार्य करने का उसका अनुभवी और सधा हुआ तरीका दूसरों की पहुँच से बाहर होते हैं। तुम सभी इन अच्छी क्षमता और उत्कृष्ट ज्ञान वाले लोगों की सराहना करते हो, परंतु तुम परमेश्वर के कार्य और वचनों से यह नहीं देख पाते कि उसकी मानवता कितनी ऊँची है। इसके बजाए, वह साधारण है, और कार्य करते समय, वह सामान्य और वास्तविक होता है, फिर भी नश्वर इंसान के लिए वह असीमित भी है, जिसकी वजह से लोग उसके प्रति एक श्रद्धा का भाव रखते हैं। शायद किसी व्यक्ति का अपने कार्य में अनुभव विशेष रूप से ऊँचा हो, या उसकी कल्पना और तर्कशक्ति विशेष रूप से ऊँची हो, और उसकी मानवता विशेष रूप से अच्छी हो; ये चीज़ें केवल लोगों की प्रशंसा ही अर्जित कर सकती हैं, परंतु उनके अंदर श्रद्धा या भय जागृत नहीं कर सकतीं। सभी लोग ऐसे लोगों की प्रशंसा करते हैं जो अच्छी तरह कार्य कर सकते हैं, विशेष रुप से जिनका अनुभव गहरा होता है और जो सत्य का अभ्यास कर सकते हैं, परंतु ऐसे लोग कभी भी श्रद्धा प्राप्त नहीं कर सकते, केवल प्रशंसा और ईर्ष्या प्राप्त कर सकते हैं। परंतु जिन लोगों ने परमेश्वर के कार्य का अनुभव कर लिया है वे परमेश्वर की प्रशंसा नहीं करते; बल्कि उन्हें लगता है कि परमेश्वर का कार्य मनुष्य की पहुँच से परे है और यह मनुष्य के लिए अथाह है, यह तरोताज़ा और अद्भुत है। जब लोग परमेश्वर के कार्य का अनुभव करते हैं, तो उसके बारे में उनका पहला ज्ञान यह होता है कि वह अथाह, बुद्धिमान और अद्भुत है, और वे अनजाने में उसका आदर करते हैं और उस कार्य के रहस्य को महसूस करते हैं जो वह करता है, जो कि मनुष्य के दिमाग की पहुँच से परे है। लोग केवल परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा करने, उसकी इच्छाओं को संतुष्ट करने में समर्थ होना चाहते हैं; वे उससे बढ़कर होने की इच्छा नहीं करते, क्योंकि जो कार्य परमेश्वर करता है वह मनुष्य की सोच और कल्पना से परे होता है और वह परमेश्वर के बदले उस कार्य को नहीं कर सकता। यहाँ तक कि मनुष्य खुद अपनी कमियों को नहीं जानता, फिर भी परमेश्वर ने एक नया मार्ग प्रशस्त किया है और वह मनुष्य को एक अधिक नए और अधिक खूबसूरत संसार में ले जाने के लिए आया है, जिससे मनुष्य ने नई प्रगति और एक नई शुरुआत की है। लोगों के मन में परमेश्वर के लिए जो भाव है वो प्रशंसा का भाव नहीं है, या सिर्फ प्रशंसा नहीं है। उनका गहनतम अनुभव श्रद्धा और प्रेम है; और उनकी भावना यह है कि परमेश्वर वास्तव में अद्भुत है। वह ऐसा कार्य करता है जिसे करने में मनुष्य असमर्थ है, और ऐसी बातें कहता है जिसे कहने में मनुष्य असमर्थ है। जिन लोगों ने परमेश्वर के कार्य का अनुभव किया है उन्हें हमेशा एक अवर्णनीय एहसास होता है। पर्याप्त गहरे अनुभव वाले लोग परमेश्वर के लिए प्रेम को समझ सकते हैं; वे हमेशा उसकी मनोरमता को महसूस कर सकते हैं, महसूस कर सकते हैं कि उसका कार्य बहुत बुद्धिमत्तापूर्ण और बहुत अद्भुत है, और परिणामस्वरूप उनके बीच असीमित सामर्थ्य उपजती है। यह भय या कभी-कभार का प्रेम और श्रद्धा नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के लिए परमेश्वर की करुणा और सहिष्णुता की गहरी भावना है। हालाँकि, जिन लोगों ने उसकी ताड़ना और न्याय का अनुभव किया है, उन्हें बोध है कि वह प्रतापी है और अपमान सहन नहीं करता। यहाँ तक कि जिन लोगों ने उसके अधिकांश कार्य का अनुभव किया है, वे भी उसकी थाह पाने में असमर्थ हैं; जो लोग सचमुच उसका आदर करते हैं, जानते हैं कि उसका कार्य लोगों की धारणाओं से मेल नहीं खाता बल्कि हमेशा उनकी धारणाओं के विरुद्ध होता है। उसे लोगों की संपूर्ण प्रशंसा की आवश्यकता नहीं है या वे उसके प्रति समर्पण-भाव का दिखावा करें; बल्कि वह चाहता है कि उनके अंदर सच्ची श्रद्धा और सच्चा समर्पण हो। उसके इतने सारे कार्य में, सच्चे अनुभव वाला कोई भी व्यक्ति उसके प्रति श्रद्धा रखता है, जो प्रशंसा से बढ़कर है। लोगों ने ताड़ना और न्याय के उसके कार्य के कारण उसके स्वभाव को देखा है, और इसलिए वे हृदय से उसका आदर करते हैं। परमेश्वर श्रद्धेय और आज्ञापालन करने योग्य है, क्योंकि उसका अस्तित्व और उसका स्वभाव सृजित प्राणियों के समान नहीं है, ये सृजित प्राणियों से ऊपर हैं। परमेश्वर स्व-अस्तित्वधारी, चिरकालीन और गैर-सृजित प्राणी है, और केवल परमेश्वर ही श्रद्धा और समर्पण के योग्य है; मनुष्य इसके योग्य नहीं है। इसलिए, जिन लोगों ने उसके कार्य का अनुभव किया है और जिन्होंने सचमुच में उसे जाना है, वे उसके प्रति श्रद्धा रखते हैं। लेकिन, जो लोग उसके बारे में अपनी धारणाएँ नहीं छोड़ते—जो उसे परमेश्वर मानते ही नहीं—उनके अंदर उसके प्रति कोई श्रद्धा नहीं है, हालाँकि वे उसका अनुसरण करते हैं फिर भी उन्हें जीता नहीं जाता; वे प्रकृति से ही अवज्ञाकारी लोग हैं। वह ऐसे परिणाम को प्राप्त करने के लिए इस कार्य को करता है ताकि सभी सृजित प्राणी सृजनकर्ता का आदर करें, उसकी आराधना करें, और बिना किसी शर्त के उसके प्रभुत्व के अधीन हो सकें। उसके समस्त कार्य का लक्ष्य इसी अंतिम परिणाम को हासिल करना है। यदि जिन लोगों ने ऐसे कार्य का अनुभव कर लिया है, वे परमेश्वर का जरा-सा भी आदर नहीं करते हैं, यदि अतीत की उनकी अवज्ञा बिल्कुल भी नहीं बदलती है, तो उन्हें निश्चित ही हटा दिया जाएगा। यदि परमेश्वर के प्रति किसी व्यक्ति की प्रवृत्ति केवल दूर से ही प्रशंसा करना या सम्मान प्रकट करना है और जरा-सा भी प्रेम करना नहीं है, तो यह वो परिणाम है जिस पर वह व्यक्ति आ पहुँचा है जिसके पास परमेश्वर से प्रेम करने वाला हृदय नहीं है, और उस व्यक्ति में पूर्ण किए जाने की शर्तों का अभाव है। यदि इतना अधिक कार्य भी किसी व्यक्ति के सच्चे प्रेम को प्राप्त करने में असमर्थ है, तो इसका अर्थ है उस व्यक्ति ने परमेश्वर को प्राप्त नहीं किया है और वह असल में सत्य की खोज नहीं कर रहा। जो व्यक्ति परमेश्वर से प्रेम नहीं करता, वह सत्य से भी प्रेम नहीं करता और इस तरह वह परमेश्वर को प्राप्त नहीं कर सकता, वह परमेश्वर की स्वीकृति तो बिलकुल भी प्राप्त नहीं कर सकता। ऐसे लोग, पवित्र आत्मा के कार्य का अनुभव चाहे जैसे कर लें, और न्याय का चाहे जैसे अनुभव कर लें, वे परमेश्वर के प्रति श्रद्धा नहीं रख सकते। ऐसे लोगों की प्रकृति अपरिवर्तनीय होती है, और उनका स्वभाव अत्यंत दुष्ट होता है। जो लोग परमेश्वर पर श्रद्धा नहीं रखते, उन्हें हटा दिया जाएगा, वे दण्ड के पात्र बनेंगे, और उन्हें उसी तरह दण्ड दिया जाएगा जैसे दुष्टों को दिया जाता है, और ऐसे लोग उनसे भी अधिक कष्ट सहेंगे जिन्होंने अधार्मिक दुष्कर्म किए हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 182

आखिरकार, परमेश्वर का कार्य इंसान के कार्य से अलग है और, इसके अलावा, उसकी अभिव्यक्तियाँ इंसानों की अभिव्यक्तियों के समान कैसे हो सकती हैं? परमेश्वर का अपना विशेष स्वभाव है, जबकि इंसानों के ऐसे कर्तव्य हैं जिनका उन्हें निर्वहन करना चाहिए। परमेश्वर का स्वभाव उसके कार्य में व्यक्त होता है, जबकि इंसान का कर्तव्य इंसान के अनुभवों में समाविष्ट होता है और इंसान के अनुसरण में व्यक्त होता है। इसलिए यह किए गए कार्य से स्पष्ट हो जाता है कि कोई चीज़ परमेश्वर की अभिव्यक्ति है या इंसान की अभिव्यक्ति। इसे स्वयं परमेश्वर द्वारा बताने की आवश्यकता नहीं है, न ही इंसान को गवाही देने के लिए प्रयास करने की आवश्यकता है; इसके अलावा, स्वयं परमेश्वर को किसी व्यक्ति का दमन करने की आवश्यकता है। यह सब सहज प्रकटन के रूप में आता है; न तो यह जबरन होता है, न ही इंसान इसमें हस्तक्षेप कर सकता है। इंसान के कर्तव्य को उसके अनुभवों से जाना जा सकता है, और इसके लिए लोगों को कोई अतिरिक्त अनुभवजन्य कार्य करने की आवश्यकता नहीं है। इंसान जब अपना कर्तव्य निभाता है तो उसका समस्त सार प्रकट हो सकता है, जबकि परमेश्वर अपना कार्य करते समय अपना अंतर्निहित स्वभाव प्रकट कर सकता है। अगर यह इंसान का कार्य है, तो इसे छिपाया नहीं जा सकता। अगर यह परमेश्वर का कार्य है, तो किसी के लिए भी परमेश्वर के स्वभाव को छिपाना और भी असंभव है, इसे इंसान द्वारा नियंत्रित करना तो बिल्कुल ही संभव नहीं। किसी भी इंसान को परमेश्वर नहीं कहा जा सकता, न ही उसके काम और शब्दों को पवित्र या अपरिवर्तनीय माना जा सकता है। परमेश्वर को इंसान कहा जा सकता है क्योंकि उसने देहधारण किया, लेकिन उसके कार्य को इंसान का कार्य या इंसान का कर्तव्य नहीं माना जा सकता। इसके अलावा, परमेश्वर के कथन और पौलुस के पत्रों को समान नहीं माना जा सकता, न ही परमेश्वर के न्याय और ताड़ना को और इंसान के अनुदेशों के शब्दों को समान दर्जा दिया जा सकता है। इसलिए, ऐसे सिद्धांत हैं जो परमेश्वर के कार्य को इंसान के काम से अलग करते हैं। इन्हें उनके सारों के अनुसार अलग किया जाता है, न कि कार्य के विस्तार या उसकी अस्थायी कार्यकुशलता के आधार पर। इस विषय पर, अधिकतर लोग सिद्धांतों की गलती करते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि इंसान बाह्य स्वरूप को देखता है, जिसे वह हासिल कर सकता है, जबकि परमेश्वर सार को देखता है, जिसे इंसान की भौतिक आँखों से नहीं देखा जा सकता। अगर तुम परमेश्वर के वचनों और कार्य को औसत इंसान के कर्तव्य मानते हो, और इंसान के बड़े पैमाने के काम को उसका कर्तव्य-निर्वहन मानने के बजाय देहधारी परमेश्वर का कार्य मानते हो, तो क्या तुम सैद्धांतिक रूप से गलत नहीं हो? इंसान के पत्र और जीवनियाँ आसानी से लिखी जा सकती हैं, मगर केवल पवित्र आत्मा के कार्य की बुनियाद पर। लेकिन परमेश्वर के कथनों और कार्य को इंसान आसानी से संपन्न नहीं कर सकता या उन्हें मानवीय बुद्धि और सोच द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता, न ही लोग उनकी जाँच-पड़ताल करने के बाद पूरी तरह से उनकी व्याख्या कर सकते हैं। यदि सिद्धांत के ये मामले तुम लोगों के अंदर कोई प्रतिक्रिया उत्पन्न नहीं करते हैं, तो तुम लोगों की आस्था स्पष्टत: बहुत सच्ची या शुद्ध नहीं है। केवल यही कहा जा सकता है कि तुम लोगों की आस्था अस्पष्टता से भरी हुई है, और उलझी हुई तथा सिद्धांतविहीन है। परमेश्वर और इंसान के सर्वाधिक मौलिक अनिवार्य मसलों को समझे बिना, क्या इस प्रकार की आस्था पूरी तरह से प्रत्यक्षबोध से रहित नहीं है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तेरह धर्मपत्रों पर तुम्हारा दृढ़ मत क्या है?' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 183

यीशु पृथ्वी पर साढ़े तेंतीस साल तक रहा था, वह सलीब पर चढ़ने का कार्य करने के लिए आया था, और सलीब पर चढ़ने के माध्यम से परमेश्वर ने अपनी महिमा का एक भाग प्राप्त किया। जब परमेश्वर देह में आया, तो वह विनम्र और छिपा रहने में समर्थ था और ज़बरदस्त पीड़ा सहन कर सकता था। यद्यपि वह स्वयं परमेश्वर था, फिर भी उसने हर अपमान और हर दुर्वचन सहन किया और छुटकारे का कार्य पूरा करने के लिए सलीब पर चढ़ाए जाने का भयानक दर्द सहा। कार्य के इस चरण का समापन हो जाने के बाद, यद्यपि लोगों ने देखा कि परमेश्वर ने महान महिमा प्राप्त कर ली है, फिर भी यह उसकी महिमा की संपूर्णता नहीं थी; यह उसकी महिमा का केवल एक भाग था, जिसे उसने यीशु से प्राप्त किया था। यद्यपि यीशु हर कठिनाई सहने, विनम्र और छिपे रहने, परमेश्वर के लिए सलीब पर चढ़ाए जाने में समर्थ था, फिर भी परमेश्वर ने अपनी महिमा का केवल एक भाग ही प्राप्त किया, और उसकी महिमा इस्राएल में प्राप्त हुई थी। परमेश्वर के पास अभी भी महिमा का एक अन्य भाग है : पृथ्वी पर व्यावहारिक रूप से कार्य करने के लिए आना और लोगों के एक समूह को पूर्ण बनाना। यीशु के कार्य के चरण के दौरान, उसने कुछ अलौकिक चीज़ें की, लेकिन कार्य का वह चरण किसी भी तरह से सिर्फ चिह्न और चमत्कार दिखाने के लिए नहीं था। यह मुख्य रूप से यह दिखाने के लिए था कि यीशु पीड़ा सहन कर सकता था और परमेश्वर के लिए सलीब पर चढ़ाया जा सकता था, कि यीशु भयानक पीड़ा सहन करने में समर्थ था, क्योंकि वह परमेश्वर से प्रेम करता था, और कि यद्यपि परमेश्वर ने उसे त्याग दिया था, लेकिन फिर भी वह परमेश्वर की इच्छा के लिए अपना जीवन बलिदान करने का इच्छुक था। जब परमेश्वर ने इस्राएल में अपना कार्य समाप्त कर लिया और यीशु को सलीब पर चढ़ा दिया गया, तो उसके बाद परमेश्वर की महिमा हुई और परमेश्वर ने शैतान के सामने गवाही दी। तुम लोग न तो जानते हो और न ही तुम लोगों ने देखा है कि परमेश्वर चीन में कैसे देहधारी बन गया, तो फिर तुम लोग यह कैसे देख सकते हो कि परमेश्वर की महिमा हुई है? जब परमेश्वर तुम लोगों में विजय का बहुत-सा कार्य करता है और तुम लोग अडिग रहते हो, तब इस चरण का परमेश्वर का कार्य सफल होता है और यह परमेश्वर की महिमा का एक भाग है। तुम लोग केवल इसे ही देखते हो और तुम लोगों को परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जाना अभी बाक़ी है, और तुम्हें अभी अपना हृदय पूर्णतः परमेश्वर को देना है। तुम लोगों को अभी इस महिमा की संपूर्णता को देखना शेष है; तुम लोग सिर्फ यह देखते हो कि परमेश्वर ने पहले ही तुम लोगों के हृदय को जीत लिया है, और तुम लोग उसे कभी नहीं छोड़ सकते और तुम बिल्कुल अंत तक परमेश्वर का अनुसरण करोगे और तुम लोगों का हृदय नहीं बदलेगा, और कि यही परमेश्वर की महिमा है। तुम लोग किस चीज में परमेश्वर की महिमा देखते हो? लोगों में उसके कार्य के प्रभावों में। लोग देखते हैं कि परमेश्वर बहुत प्यारा है, परमेश्वर उनके हृदय में है और वे उसे छोड़ने को तैयार नहीं हैं, और यह परमेश्वर की महिमा है। जब कलीसिया में भाई-बहनों की संख्या बढ़ती है, और वे अपने हृदय से परमेश्वर से प्रेम कर सकते हैं, परमेश्वर द्वारा किए गए कार्य की सर्वोच्च शक्ति और उसके वचनों के अतुलनीय पराक्रम को देख सकते हैं, जब वे देखते हैं कि उसके वचनों में अधिकार है और कि वह चीन की मुख्य भूमि के भुतहा नगर में अपने कार्य की शुरुआत कर सकता है, जब लोगों के कमज़ोर होने के बावजूद उनके हृदय परमेश्वर के सामने झुक जाते हैं और वे परमेश्वर के वचनों को स्वीकार करने को तैयार होते हैं, और जब कमज़ोर और अयोग्य होने के बावजूद वे इस बात को देखने में समर्थ होते हैं कि परमेश्वर के वचन बहुत प्यारे हैं और इसलिए उनके द्वारा सँजोए जाने योग्य हैं, तो यह परमेश्वर की महिमा है। जब वह दिन आता है, जब लोग परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाते हैं, और वे उसके सामने आत्मसमर्पण करने में समर्थ होते हैं, और वे पूरी तरह से परमेश्वर का आज्ञापालन कर सकते हैं, और अपने भविष्य की संभावनाओं और भाग्य को परमेश्वर के हाथों में छोड़ सकते हैं, तब परमेश्वर की महिमा का दूसरा भाग पूरी तरह से प्राप्त कर लिया गया होगा। कहने का अर्थ है कि जब व्यावहारिक परमेश्वर के कार्य को सर्वथा पूरा कर लिया जाएगा, तो चीन की मुख्य भूमि में उसका कार्य समाप्त हो जाएगा। दूसरे शब्दों में, जब परमेश्वर द्वारा पूर्व-नियत किए और चुने गए लोग पूर्ण बना दिए जाएँगे, तो परमेश्वर की महिमा होगी। परमेश्वर ने कहा कि वह अपनी महिमा के दूसरे भाग को पूर्व दिशा में ले आया है, किंतु यह आँखों के लिए अदृश्य है। परमेश्वर अपने कार्य को पूर्व दिशा में ले आया है : वह पहले ही पूर्व दिशा में आ चुका है और यह परमेश्वर की महिमा है। आज यद्यपि उसका कार्य अभी पूरा किया जाना बाकी है, लेकिन चूँकि परमेश्वर ने कार्य करने का निर्णय लिया है, इसलिए वह निश्चित रूप से पूरा होगा। परमेश्वर ने निर्णय लिया है कि वह इस कार्य को चीन में पूरा करेगा, और उसने तुम लोगों को पूर्ण करने का संकल्प किया है। इस प्रकार वह तुम लोगों को कोई बचाव का रास्ता नहीं देता—उसने पहले ही तुम्हारे हृदय जीत लिए हैं और भले ही तुम चाहो या न चाहो, तुम्हें आगे बढ़ना है, और जब तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त कर लिए जाते हो, तो परमेश्वर की महिमा होती है। आज परमेश्वर की संपूर्ण महिमा होनी अभी बाकी है, क्योंकि तुम लोगों को अभी पूर्ण बनाया जाना बाकी है। यद्यपि तुम लोगों के हृदय परमेश्वर की ओर लौट चुके हैं, फिर भी तुम्हारी देह में अभी भी कई कमजोरियाँ हैं, तुम परमेश्वर को संतुष्ट करने में अक्षम हो, तुम परमेश्वर की इच्छा के प्रति सचेत रहने में असमर्थ हो, और तुम्हारे भीतर अभी भी बहुत-सी नकारात्मक चीज़ें हैं, जिनसे तुम लोगों को छुटकारा पाना होगा और तुम्हें अभी भी कई परीक्षणों और शुद्धिकरणों से गुज़रना होगा। केवल इसी तरह से तुम्हारे जीवन-स्वभाव परिवर्तित हो सकते हैं और तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जा सकते हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "'सहस्राब्दि राज्य आ चुका है' के बारे में एक संक्षिप्त वार्ता" से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 184

उस समय यीशु का कार्य समस्त मानवजाति को छुटकारा दिलाना था। उन सभी के पापों को क्षमा कर दिया गया था जो उसमें विश्वास करते थे; अगर तुम उस पर विश्वास करते हो, तो वह तुम्हें छुटकारा दिलाएगा; यदि तुम उस पर विश्वास करते, तो तुम पापी नहीं रह जाते, तुम अपने पापों से मुक्त हो जाते हो। यही बचाए जाने और विश्वास द्वारा उचित ठहराए जाने का अर्थ है। फिर विश्वासियों के अंदर परमेश्वर के प्रति विद्रोह और विरोध का भाव था, और जिसे अभी भी धीरे-धीरे हटाया जाना था। उद्धार का अर्थ यह नहीं था कि मनुष्य पूरी तरह से यीशु द्वारा प्राप्त कर लिया गया है, बल्कि यह था कि मनुष्य अब पापी नहीं रह गया है, उसे उसके पापों से मुक्त कर दिया गया है। अगर तुम विश्वास करते हो, तो तुम फिर कभी भी पापी नहीं रहोगे। उस समय, यीशु ने बहुत से ऐसे कार्य किये जो उसके शिष्यों की समझ से बाहर थे, और ऐसी बहुत-सी बातें कहीं जो लोगों की समझ में नहीं आयीं। इसका कारण यह है कि उस समय उसने कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया। इस प्रकार, यीशु के जाने के कई वर्ष बाद, मत्ती ने उसकी एक वंशावली बनायी और अन्य लोगों ने भी बहुत से ऐसे कार्य किये जो मनुष्य की इच्छा के अनुसार थे। यीशु मनुष्य को पूर्ण करने और प्राप्त करने के लिए नहीं, बल्कि कार्य का एक चरण संपन्न करने के लिए आया था: जो कि स्वर्ग के राज्य के सुसमाचार को आगे बढ़ाने और सूली पर चढ़ने का कार्य था। इसलिए, एक बार जब यीशु को सूली पर चढ़ा दिया गया, तो उसके कार्य का पूरी तरह से अंत हो गया। किन्तु वर्तमान चरण में जो कि विजय का कार्य है, अधिक वचन बोले जाने चाहिए, अधिक कार्य किया जाना चाहिए और कई प्रक्रियाएँ होनी चाहिए। उसी तरह, यीशु और यहोवा के कार्यों के रहस्य भी प्रकट होने चाहिए, ताकि लोगों को अपने विश्वास में समझ और स्पष्टता मिल जाए, क्योंकि यह अंत के दिनों का कार्य है, और अंत के दिन परमेश्वर के कार्य की समाप्ति के दिन हैं, इस कार्य के समापन का समय है। कार्य का यह चरण तुम्हारे लिए यहोवा की व्यवस्था और यीशु द्वारा छुटकारे को स्पष्ट करेगा। यह मुख्य रूप से इसलिए है ताकि तुम परमेश्वर की छह हज़ार-वर्षीय प्रबंधन योजना के पूरे कार्य को समझ सको, इस छह हज़ार-वर्षीय प्रबंधन योजना की महत्ता और सार का मूल्यांकन कर सको, और यीशु द्वारा किए गए सभी कार्यों और उसके द्वारा बोले गए वचनों के प्रयोजन और बाइबल में अपने अंधविश्वास और श्रद्धा को समझ सको। यह सब तुम्हें पूरी तरह से समझने में मदद करेगा। तुम यीशु द्वारा किए गए कार्य और परमेश्वर के आज के कार्य, दोनों को समझ जाओगे; तुम समस्त सत्य, जीवन और मार्ग को समझ लोगे और देख लोगे। यीशु द्वारा किए गए कार्य के चरण में, यीशु समापन कार्य किए बिना क्यों चला गया? क्योंकि यीशु के कार्य का चरण समापन का कार्य नहीं था। जब उसे सूली पर चढ़ाया गया, तब उसके वचनों का भी अंत हो गया था; उसके सूली पर चढ़ने के बाद, उसका कार्य पूरी तरह समाप्त हो गया। वर्तमान चरण भिन्न है : वचनों के अंत तक बोले जाने और परमेश्वर के समस्त कार्य का उपसंहार हो जाने के बाद ही उसका कार्य समाप्त हुआ होगा। यीशु के कार्य के चरण के दौरान, ऐसे बहुत-से वचन थे जो अनकहे रह गए थे, या जो स्पष्ट रूप से नहीं बोले गए थे। फिर भी यीशु ने इस बात की परवाह नहीं की कि उसने क्या कहा और क्या नहीं कहा, क्योंकि उसकी सेवकाई कोई वचनों की सेवकाई नहीं थी, इसलिए सूली पर चढ़ाये जाने के बाद वह चला गया। कार्य का वह चरण मुख्यतः सूली पर चढ़ने के वास्ते था और वह वर्तमान चरण से भिन्न है। कार्य का यह चरण मुख्य रूप से पूरा करने, शुद्ध करने और समस्त कार्य का समापन करने के लिए है। यदि अंत तक वचन नहीं बोले गए, तो इस कार्य का समापन करना असंभव होगा, क्योंकि कार्य के इस चरण में समस्त कार्य का समापन और उसे पूरा करने का काम वचनों के उपयोग से किया जाता है और यह किया जाना है। उस समय यीशु ने ऐसा बहुत-सा कार्य किया, जो मनुष्य की समझ से बाहर था। वह चुपचाप चला गया और आज भी ऐसे बहुत से लोग हैं जो उसके वचनों को नहीं समझते, जिनकी समझ त्रुटिपूर्ण है, मगर फिर भी जो उसे सही मानते हैं, जो नहीं जानते कि वे गलत हैं। अंत में, यह वर्तमान चरण पूरी तरह से परमेश्वर के कार्य का अंत और इसका उपसंहार करेगा। सभी लोग परमेश्वर की प्रबंधन योजना को समझ और जान लेंगे। मनुष्य की अवधारणाएँ, उसके इरादे, उसकी त्रुटिपूर्ण समझ, यहोवा और यीशु के कार्यों के प्रति उसकी अवधारणाएँ, अन्यजातियों के बारे में उसके विचार और उसके अन्य विचलन और सभी त्रुटियाँ ठीक कर दी जाएँगी। जीवन के सभी सही मार्ग, परमेश्वर द्वारा किया गया समस्त कार्य और संपूर्ण सत्य मनुष्य की समझ में आ जाएँगे। जब ऐसा होगा, तो कार्य का यह चरण समाप्त हो जाएगा। यहोवा का कार्य दुनिया का सृजन था, वह आरंभ था; कार्य का यह चरण कार्य का अंत है, और यह समापन है। आरंभ में, परमेश्वर का कार्य इस्राएल के चुने हुए लोगों के बीच किया गया था और यह सभी जगहों में से सबसे पवित्र जगह पर एक नए युग का उद्भव था। कार्य का अंतिम चरण दुनिया का न्याय करने और युग को समाप्त करने के लिए सभी देशों में से सबसे अशुद्ध देश में किया जा रहा है। पहले चरण में, परमेश्वर का कार्य सबसे प्रकाशमान स्थान पर किया गया था और अंतिम चरण सबसे अंधकारमय स्थान पर किया जा रहा है, और इस अंधकार को बाहर निकालकर प्रकाश को प्रकट किया जाएगा और सभी लोगों पर विजय प्राप्त की जाएगी। जब इस सबसे अशुद्ध और सबसे अंधकारमय स्थान के लोगों पर विजय प्राप्त कर ली जाएगी और समस्त आबादी स्वीकार कर लेगी कि परमेश्वर है, जो कि सच्चा परमेश्वर है और हर व्यक्ति को पूरी तरह से विश्वास हो जाएगा, तब समस्त ब्रह्मांड में विजय का कार्य करने के लिए इस तथ्य का उपयोग किया जाएगा। कार्य का यह चरण प्रतीकात्मक है : एक बार इस युग का कार्य समाप्त हो गया, तो प्रबंधन का छह हजार वर्षों का कार्य पूरी तरह से समाप्त हो जाएगा। एक बार सबसे अंधकारमय स्थान के लोगों को जीत लिया गया, तो कहने की आवश्यकता नहीं कि अन्य जगह पर भी ऐसा ही होगा। इस तरह, केवल चीन में ही विजय का कार्य सार्थक प्रतीकात्मकता रखता है। चीन अंधकार की सभी शक्तियों का मूर्त रूप है और चीन के लोग उन सभी लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं जो देह के हैं, शैतान के हैं, मांस और रक्त के हैं। चीनी लोग ही बड़े लाल अजगर द्वारा सबसे ज़्यादा भ्रष्ट किए गए हैं, वही परमेश्वर के सबसे कट्टर विरोधी हैं, उन्हीं की मानवता सर्वाधिक अधम और अशुद्ध है, इसलिए वे समस्त भ्रष्ट मानवता के मूल आदर्श हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि अन्य देशों में कोई समस्या नहीं है; मनुष्य की अवधारणाएँ समान हैं, यद्यपि इन देशों के लोग अच्छी क्षमता वाले हो सकते हैं, किन्तु यदि वे परमेश्वर को नहीं जानते, तो वे अवश्य ही उसके विरोधी होंगे। यहूदियों ने भी परमेश्वर का विरोध और उसकी अवहेलना क्यों की? फ़रीसियों ने भी उसका विरोध क्यों किया? यहूदा ने यीशु के साथ विश्वासघात क्यों किया? उस समय, बहुत-से अनुयायी यीशु को नहीं जानते थे। यीशु को सूली पर चढ़ाये जाने और उसके फिर से जी उठने के बाद भी, लोगों ने उस पर विश्वास क्यों नहीं किया? क्या मनुष्य की अवज्ञा पूरी तरह से समान नहीं है? बात बस इतनी है कि चीन के लोग इसके एक उदाहरण के रूप में पेश किए जाते हैं, जब उन पर विजय प्राप्त कर ली जाएगी तो वे एक आदर्श और नमूना बन जाएँगे और दूसरों के लिए संदर्भ का काम करेंगे। मैंने हमेशा क्यों कहा है कि तुम लोग मेरी प्रबंधन योजना के सहायक हो? चीन के लोगों में भ्रष्टता, अशुद्धता, अधार्मिकता, विरोध और विद्रोहशीलता पूरी तरह से व्यक्त और विविध रूपों में प्रकट होते हैं। एक ओर, वे खराब क्षमता के हैं और दूसरी ओर, उनका जीवन और उनकी मानसिकता पिछडी हुई है, उनकी आदतें, सामाजिक वातावरण, जिस परिवार में वे जन्में हैं—सभी गरीब और सबसे पिछड़े हुए हैं। उनकी हैसियत भी निम्न है। इस स्थान में कार्य प्रतीकात्मक है, एक बार जब यह परीक्षा-कार्य पूरी तरह से संपन्न हो जाएगा, तो परमेश्वर का बाद का कार्य बहुत बेहतर तरीके से आगे बढ़ेगा। यदि कार्य के इस चरण को पूरा किया जा सका, तो इसके बाद का कार्य अच्छी तरह से आगे बढ़ेगा। एक बार जब कार्य का यह चरण सम्पन्न हो जायेगा, तो बड़ी सफलता प्राप्त हो जाएगी और समस्त ब्रह्माण्ड में विजय का कार्य पूरी तरह समाप्त हो जायेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के कार्य का दर्शन (2)' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 185

अब मोआब के वंशजों पर कार्य करना उन लोगों को बचाना है, जो सबसे गहरे अँधेरे में गिर गए हैं। यद्यपि वे शापित थे, फिर भी परमेश्वर उनसे महिमा पाने का इच्छुक है, क्योंकि पहले वे सभी ऐसे लोग थे, जिनके हृदयों में परमेश्वर की कमी थी; केवल उन लोगों को, जिनके हृदयों में परमेश्वर नहीं है, परमेश्वर की आज्ञा का पालन करने और उससे प्रेम करने के लिए तैयार करना ही सच्ची विजय है, और ऐसे कार्य का फल सबसे मूल्यवान और सबसे ठोस है। केवल यही महिमा प्राप्त कर रहा है—यही वह महिमा है, जिसे परमेश्वर अंत के दिनों में हासिल करना चाहता है। बावजूद इसके कि ये लोग कम दर्जे के हैं, अब इनका ऐसे महान उद्धार को प्राप्त करने में सक्षम होना वास्तव में परमेश्वर द्वारा एक उन्नयन है। यह काम बहुत ही सार्थक है, और वह न्याय के माध्यम से ही इन लोगों को प्राप्त करता है। उसका इरादा इन लोगों को दंडित करने का नहीं, बल्कि बचाने का है। यदि, अंत के दिनों में, वह अभी भी इस्राएल में विजय प्राप्त करने का काम कर रहा होता, तो वह बेकार होता; यदि वह फलदायक भी होता, तो उसका कोई मूल्य या कोई बड़ा अर्थ न होता, और वह समस्त महिमा प्राप्त करने में सक्षम न होता। वह तुम लोगों पर कार्य कर रहा है, अर्थात् उन लोगों पर, जो सबसे अंधकारमय स्थानों में गिर चुके हैं, जो सबसे अधिक पिछड़े हैं। ये लोग यह नहीं मानते कि परमेश्वर है और वे कभी नहीं जान पाए हैं कि परमेश्वर है। इन प्राणियों को शैतान ने इस हद तक भ्रष्ट किया है कि वे परमेश्वर को भूल गए हैं। वे शैतान द्वारा अंधे बना दिए गए हैं और वे बिलकुल नहीं जानते कि स्वर्ग में एक परमेश्वर है। अपने दिलों में तुम सब लोग मूर्तियों और शैतान की पूजा करते हो, क्या तुम सबसे अधम, सबसे पिछड़े लोग नहीं हो? देह से तुम लोग निम्नतम हो, किसी भी निजी स्वतंत्रता से विहीन, और तुम लोग कष्टों से पीड़ित भी हो। तुम लोग इस समाज में सबसे निम्न स्तर पर भी हो, जिन्हें विश्वास की स्वतंत्रता तक नहीं है। तुम सब पर कार्य करने का यही अर्थ है। आज मोआब के तुम वंशजों पर कार्य करना जानबूझकर तुम लोगों को अपमानित करने के लिए नहीं है, बल्कि कार्य के अर्थ को प्रकट करने के लिए है। तुम लोगों के लिए यह एक महान उत्थान है। अगर व्यक्ति में विवेक और अंतर्दृष्टि हो, तो वह कहेगा : "मैं मोआब का वंशज हूँ, आज परमेश्वर द्वारा ऐसा महान उत्थान या ऐसे महान आशीष पाने के सचमुच अयोग्य। अपनी समस्त करनी और कथनी में, और अपनी हैसियत और मूल्य के अनुसार, मैं परमेश्वर से ऐसे महान आशीष पाने के बिलकुल भी योग्य नहीं हूँ। इस्राएलियों को परमेश्वर से बहुत प्रेम है, और जिस अनुग्रह का वे आनंद उठाते हैं, वह उन्हें परमेश्वर द्वारा ही दिया जाता है, लेकिन उनकी हैसियत हमसे बहुत ऊँची है। अब्राहम यहोवा के प्रति बहुत समर्पित था, और पतरस यीशु के प्रति बहुत समर्पित था—उनकी भक्ति हमसे सौ गुना अधिक थी। और अपने कार्यों के आधार पर हम परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद लेने के बिलकुल अयोग्य हैं।" चीन में इन लोगों की सेवा परमेश्वर के सामने बिलकुल नहीं लाई जा सकती। यह पूरा बूचड़खाना है; अब तुम जो परमेश्वर के अनुग्रह का इतना आनंद लेते हो, तो वह केवल परमेश्वर का उत्थान है! तुम लोगों ने कब परमेश्वर के कार्य की माँग की है? तुमने कब अपना जीवन परमेश्वर के लिए बलिदान किया है? तुमने कब अपने परिवार, अपने माता-पिता और अपने बच्चों का आसानी से त्याग किया है? तुममें से किसी ने भी कोई बड़ी कीमत नहीं चुकाई है! यदि पवित्र आत्मा तुम्हें बाहर नहीं लाता, तो तुममें से कितने सब-कुछ बलिदान करने में सक्षम होते? तुमने आज तक केवल बल और दबाव के तहत अनुसरण किया है। तुम लोगों की भक्ति कहाँ है? तुम लोगों की आज्ञाकारिता कहाँ है? तुम्हारे कर्मों के आधार पर तुम्हें बहुत पहले ही नष्ट कर दिया जाना चाहिए था—तुम लोगों का पूरी तरह सफाया होना चाहिए था। ऐसे महान आशीषों का आनंद लेने की तुम लोगों में क्या योग्यता है? तुम ज़रा भी योग्य नहीं हो! तुम लोगों में से किसने अपना स्वयं का मार्ग बनाया है? तुममें से किसने खुद सच्चा रास्ता खोजा है? तुम सभी आलसी, लोभी, आराम-तलब अभागे हो! क्या तुम लोग समझते हो कि तुम महान हो? तुम लोगों के पास शेखी बघारने के लिए क्या है? इसे अनदेखा करने पर भी कि तुम लोग मोआब के वंशज हो, क्या तुम लोगों की प्रकृति या तुम लोगों के जन्मस्थान सबसे ऊँची किस्म के हैं? इसे अनदेखा करने पर भी कि तुम लोग मोआब के वंशज हो, क्या तुम सभी पूरी तरह से मोआब के वंशज नहीं हो? क्या तथ्यों की सच्चाई बदली जा सकती है? क्या तुम लोगों की प्रकृति उजागर करने से अब तथ्यों की सच्चाई गलत हो जाती है? अपनी चापलूसी, अपने जीवन और अपने चरित्र देखो—क्या तुम लोग नहीं जानते कि तुम मानवजाति में निम्नतम हो? तुम लोगों के पास क्या है, जिसकी तुम शेखी बघार सकते हो? समाज में अपने दर्जे को देखो। क्या तुम लोग उसके सबसे निचले स्तर पर नहीं हो? क्या तुम लोगों को लगता है कि मैंने गलत कहा है? अब्राहम ने इसहाक को बलिदान किया—तुमने किसे बलिदान किया है? अय्यूब ने सब-कुछ बलिदान किया—तुमने क्या बलिदान किया है? इतने सारे लोगों ने अपना जीवन दिया है, अपने सिर कुर्बान किए हैं, अपना खून बहाया है, सही राह तलाशने के लिए। क्या तुम लोगों ने वह कीमत चुकाई है? उनकी तुलना में तुम इस महान अनुग्रह का आनंद लेने के बिलकुल भी योग्य नहीं हो। तो क्या आज यह कहना तुम्हारे साथ अन्याय करना है कि तुम लोग मोआब के वंशज हो? तुम लोग खुद को बहुत ऊँचा मत समझो। तुम्हारे पास शेखी बघारने के लिए कुछ नहीं है। ऐसा महान उद्धार, ऐसा महान अनुग्रह तुम लोगों को मुफ्त में दिया जा रहा है। तुम लोगों ने कुछ भी बलिदान नहीं किया है, फिर भी तुम अनुग्रह का मुफ्त आनंद उठा रहे हो। क्या तुम लोगों को शर्म नहीं आती? क्या यह सच्चा मार्ग तुम लोगों ने स्वयं खोजा और पाया था? क्या पवित्र आत्मा ने तुम लोगों को इसे स्वीकार करने के लिए मजबूर नहीं किया? तुम लोगों के पास कभी भी एक खोजने वाला दिल नहीं था, सत्य की खोज करने वाला और उसकी लालसा रखने वाला दिल तो बिलकुल भी नहीं था। तुम बस बैठे-बिठाए इसका आनंद ले रहे हो; तुमने इस सत्य को ज़रा भी प्रयास किए बिना पाया है। तुम्हें शिकायत करने का क्या अधिकार है? क्या तुम्हें लगता है कि तुम्हारा मोल सबसे बड़ा है? उन लोगों की तुलना में, जिन्होंने अपने जीवन का बलिदान किया और अपना रक्त बहाया, तुम लोगों के पास शिकायत करने को क्या है? अब तुम लोगों को नष्ट करना सही और स्वाभाविक होगा! तुम्हारे पास आज्ञा का पालन और अनुसरण करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। तुम लोग बस योग्य नहीं हो! तुम्हारे बीच में से अधिकतर लोगों को बुलाया गया था, लेकिन अगर तुम्हें तुम्हारे परिवेश ने मजबूर नहीं किया होता या अगर तुम्हें बुलाया नहीं गया होता, तो तुम लोग बाहर आने के लिए पूरी तरह से अनिच्छुक होते। ऐसे त्याग को लेने के लिए कौन तैयार है? देह का सुख छोड़ने के लिए कौन तैयार है? तुम सब वे लोग हो, जो लालच के साथ आराम से ऐश करते हैं और एक विलासी जीवन की चाह रखते हैं! तुम लोगों को इतने बड़े आशीष मिल गए हैं—तुम्हें और क्या कहना है? तुम्हें क्या शिकायतें हैं? तुम लोगों को स्वर्ग में सबसे बड़े आशीषों और सबसे बड़े अनुग्रह का आनंद लेने दिया गया है, और जो कार्य पृथ्वी पर पहले कभी नहीं किया गया था, उसे आज तुम पर प्रकट किया गया है, क्या यह एक आशीष नहीं है? आज तुम्हारी इसलिए इतनी ताड़ना की गई है, क्योंकि तुम लोगों ने परमेश्वर का विरोध किया है और उसके खिलाफ विद्रोह किया है। इस ताड़ना के कारण तुम लोगों ने परमेश्वर की दया और प्रेम देखा है, और उससे भी अधिक तुमने उसकी धार्मिकता और पवित्रता देखी है। इस ताड़ना की वजह से और मानव की गंदगी के कारण, तुम लोगों ने परमेश्वर की महान शक्ति देखी है, और उसकी पवित्रता और महानता देखी है। क्या यह एक दुर्लभतम सत्य नहीं है? क्या यह एक अर्थपूर्ण जीवन नहीं है? परमेश्वर जो कार्य करता है, वह अर्थ से भरा है! अतः जितनी निम्न तुम लोगों की स्थिति है, उतना अधिक वह यह साबित करती है कि परमेश्वर ने तुम्हारा उत्थान किया है, और उतना ही अधिक आज तुम लोगों पर उसके कार्य का महान मूल्य साबित होता है। यह बस एक अनमोल खजाना है, जो कहीं और नहीं पाया जा सकता! युगों तक किसी ने भी ऐसे महान उद्धार का आनंद नहीं लिया है। यह तथ्य कि तुम्हारी स्थिति निम्न है, यह दर्शाता है कि परमेश्वर का उद्धार कितना महान है, और यह दर्शाता है कि परमेश्वर मानवजाति के प्रति वफादार है—वह बचाता है, नष्ट नहीं करता।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मोआब के वंशजों को बचाने का अर्थ' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 186

जब परमेश्वर पृथ्वी पर आया, तो वह संसार का नहीं था, और संसार का सुख भोगने के लिए वह देह नहीं बना था। जिस स्थान पर कार्य करना सबसे अच्छी तरह से उसके स्वभाव को प्रकट करता और जो सबसे अर्थपूर्ण होता, वह वही स्थान है, जहाँ वह पैदा हुआ। चाहे वह स्थल पवित्र हो या गंदा, और चाहे वह कहीं भी काम करे, वह पवित्र है। दुनिया में हर चीज़ उसके द्वारा बनाई गई थी, हालाँकि शैतान ने सब-कुछ भ्रष्ट कर दिया है। फिर भी, सभी चीजें अभी भी उसकी हैं; वे सभी चीजें उसके हाथों में हैं। वह अपनी पवित्रता प्रकट करने के लिए एक गंदे देश में आता है और वहाँ कार्य करता है; वह केवल अपने कार्य के लिए ऐसा करता है, अर्थात् वह इस दूषित भूमि के लोगों को बचाने के लिए ऐसा कार्य करने में बहुत अपमान सहता है। यह पूरी मानवजाति की खातिर, गवाही के लिए किया जाता है। ऐसा कार्य लोगों को परमेश्वर की धार्मिकता दिखाता है, और वह परमेश्वर की सर्वोच्चता प्रदर्शित करने में अधिक सक्षम है। उसकी महानता और शुचिता उन नीच लोगों के एक समूह के उद्धार के माध्यम से व्यक्त होती है, जिनका अन्य लोग तिरस्कार करते हैं। एक मलिन भूमि में पैदा होना यह बिलकुल साबित नहीं करता कि वह दीन-हीन है; यह तो केवल सारी सृष्टि को उसकी महानता और मानवजाति के लिए उसका सच्चा प्यार दिखाता है। जितना अधिक वह ऐसा करता है, उतना ही अधिक यह मनुष्य के लिए उसके शुद्ध प्रेम, उसके दोषरहित प्रेम को प्रकट करता है। परमेश्वर पवित्र और धर्मी है। यद्यपि वह एक गंदी भूमि में पैदा हुआ था, और यद्यपि वह उन लोगों के साथ रहता है जो गंदगी से भरे हुए हैं, ठीक वैसे ही जैसे यीशु अनुग्रह के युग में पापियों के साथ रहता था, फिर भी क्या उसका हर कार्य संपूर्ण मानवजाति के अस्तित्व की खातिर नहीं किया जाता? क्या यह सब इसलिए नहीं है कि मानवजाति महान उद्धार प्राप्त कर सके? दो हजार साल पहले वह कई वर्षों तक पापियों के साथ रहा। वह छुटकारे के लिए था। आज वह गंदे, नीच लोगों के एक समूह के साथ रह रहा है। यह उद्धार के लिए है। क्या उसका सारा कार्य तुम मनुष्यों के लिए नहीं है? यदि यह मानवजाति को बचाने के लिए न होता, तो क्यों वह एक नाँद में पैदा होने के बाद कई सालों तक पापियों के साथ रहता और कष्ट उठाता? और यदि यह मानवजाति को बचाने के लिए न होता, तो क्यों वह दूसरी बार देह में लौटकर आता, इस देश में पैदा होता जहाँ दुष्ट आत्माएँ इकट्ठी होती हैं, और इन लोगों के साथ रहता जिन्हें शैतान ने गहराई से भ्रष्ट कर रखा है? क्या परमेश्वर वफ़ादार नहीं है? उसके कार्य का कौन-सा भाग मानवजाति के लिए नहीं रहा है? कौन-सा भाग तुम लोगों की नियति के लिए नहीं रहा है? परमेश्वर पवित्र है—यह अपरिवर्तनीय है। वह गंदगी से प्रदूषित नहीं है, हालाँकि वह एक गंदे देश में आया है; इस सबका मतलब केवल यह हो सकता है कि मानवजाति के लिए परमेश्वर का प्रेम अत्यंत निस्वार्थ है और जो पीड़ा और अपमान वह सहता है, वह अत्यधिक है! क्या तुम लोग यह नहीं जानते कि वह तुम सभी के लिए, और तुम लोगों की नियति के लिए जो अपमान सहता है, वह कितना बड़ा है? वह बड़े लोगों या अमीर और शक्तिशाली परिवारों के पुत्रों को बचाने के बजाय विशेष रूप से उनको बचाता है, जो दीन-हीन हैं और नीची निगाह से देखे जाते हैं। क्या यह सब उसकी पवित्रता नहीं है? क्या यह सब उसकी धार्मिकता नहीं है? समस्त मानवजाति के अस्तित्व के लिए वह एक दूषित भूमि में पैदा होगा और हर अपमान सहेगा। परमेश्वर बहुत वास्तविक है—वह कोई मिथ्या कार्य नहीं करता। क्या उसके कार्य का हर चरण इतने व्यावहारिक रूप से नहीं किया गया है? यद्यपि सब लोग उसकी निंदा करते हैं और कहते हैं कि वह पापियों के साथ मेज पर बैठता है, यद्यपि सब लोग उसका मज़ाक उड़ाते हैं और कहते हैं कि वह गंदगी के पुत्रों के साथ रहता है, कि वह सबसे अधम लोगों के साथ रहता है, फिर भी वह निस्वार्थ रूप से अपने आपको समर्पित करता है, और वह अभी भी मानवजाति के बीच इस तरह नकारा जाता है। क्या जो कष्ट वह सहता है, वह तुम लोगों के कष्टों से बड़ा नहीं है? क्या जो कार्य वह करता है, वह तुम लोगों द्वारा चुकाई गई कीमत से ज्यादा नहीं है? तुम लोग गंदे देश में पैदा हुए, फिर भी तुमने परमेश्वर की पवित्रता प्राप्त की है। तुम लोग उस देश में पैदा हुए, जहाँ राक्षस एकत्र होते हैं, फिर भी तुम्हें महान सुरक्षा प्राप्त हुई है। तुम्हारे पास विकल्प क्या है? तुम्हारी शिकायतें क्या हैं? क्या जो पीड़ा उसने सही है, वह तुम लोगों द्वारा सही गई पीड़ा से अधिक नहीं है? वह पृथ्वी पर आया है और उसने मानव-जगत के सुखों का कभी आनंद नहीं उठाया। वह ऐसी चीज़ों से घृणा करता है। परमेश्वर मनुष्य से भौतिक चीज़ें पाने के लिए पृथ्वी पर नहीं आया, न ही वह मनुष्य के भोजन, कपड़ों और गहनों का आनंद उठाने के लिए आया है। वह इन चीज़ों पर कोई ध्यान नहीं देता। वह धरती पर मनुष्य की खातिर दुःख उठाने के लिए आया, न कि सांसारिक ऐश्वर्य का आनंद उठाने के लिए। वह पीड़ित होने, काम करने और अपनी प्रबंधन योजना पूरी करने के लिए आया। उसने किसी अच्छे स्थान का चयन नहीं किया, रहने के लिए कोई दूतावास या महँगा होटल पसंद नहीं किया, और न ही उसकी सेवा में कई नौकर खड़े थे। तुम लोगों ने जो देखा है, क्या उससे तुम्हें पता नहीं चलता कि वह काम करने के लिए आया या सुख भोगने के लिए? क्या तुम लोगों की आँखें नहीं देखतीं? तुम लोगों को उसने कितना दिया है? यदि वह किसी आरामदायक स्थान पर पैदा हुआ होता, तो क्या वह महिमा पाने में सक्षम होता? क्या वह कार्य करने में सक्षम होता? क्या उसके ऐसा करने का कोई अर्थ होता? क्या वह मानवजाति को पूरी तरह से जीत पाता? क्या वह लोगों को गंदगी की भूमि से बचा सकता? अपनी धारणाओं के अनुसार लोग पूछते हैं, "चूँकि परमेश्वर पवित्र है, तो वह हमारे इस गंदे स्थान में क्यों पैदा हुआ? तुम हम गंदे मनुष्यों से घृणा करते हो और हमारा तिरस्कार करते हो; तुम हमारे प्रतिरोध और विद्रोह से घृणा करते हो, तो तुम हमारे साथ क्यों रहते हो? तुम सर्वोच्च परमेश्वर हो। तुम कहीं भी पैदा हो सकते थे, तो तुम्हें इस गंदे देश में क्यों पैदा होना पड़ा? तुम प्रतिदिन हमारा न्याय करते हो और हमें ताड़ना देते हो, और तुम स्पष्ट रूप से जानते हो कि हम मोआब के वंशज हैं, तो फिर भी तुम हमारे बीच क्यों रहते हो? तुम मोआब के वंशजों के परिवार में क्यों पैदा हुए? तुमने ऐसा क्यों किया?" तुम लोगों के इस तरह के विचार पूर्णत: विवेकरहित हैं! केवल इसी तरह का कार्य लोगों को उसकी महानता, उसकी विनम्रता और उसका छिपाव दिखाता है। वह अपने कार्य की खातिर सब-कुछ बलिदान करने को तैयार है, और उसने समस्त कष्ट अपने कार्य के लिए सहे हैं। ऐसा वह मानव-जाति की खातिर करता है, और इससे भी बढ़कर, शैतान को जीतने के लिए करता है, ताकि सभी जीव उसके प्रभुत्व के अंतर्गत आ सकें। केवल यही सार्थक, मूल्यवान कार्य है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मोआब के वंशजों को बचाने का अर्थ' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 187

जिस समय यीशु ने यहूदिया में कार्य किया था, तब उसने खुलकर ऐसा किया, परंतु अब, मैं तुम लोगों के बीच गुप्त रूप से काम करता और बोलता हूँ। अविश्वासी लोग इस बात से पूरी तरह से अनजान हैं। तुम लोगों के बीच मेरा कार्य बाहर के लोगों के लिए बंद है। इन वचनों, इन ताड़नाओं और न्यायों को केवल तुम लोग ही जानते हो, और कोई नहीं। यह समस्त कार्य तुम लोगों के बीच ही किया जाता है और केवल तुम लोगों के लिए ही प्रकट किया जाता है; अविश्वासियों में से कोई भी इसे नहीं जानता, क्योंकि अभी समय नहीं आया है। यहाँ ये लोग ताड़ना सहने के बाद पूर्ण बनाए जाने के समीप हैं, परंतु बाहर के लोग इस बारे में कुछ नहीं जानते। यह कार्य बहुत अधिक छिपा हुआ है! उनके लिए परमेश्वर का देह बन जाना छिपा हुआ है, परंतु जो इस धारा में हैं, उनके लिए कहा जा सकता है कि वह खुला है। यद्यपि परमेश्वर में सब-कुछ खुला है, सब-कुछ प्रकट है और सब-कुछ मुक्त है, लेकिन यह केवल उनके लिए सही है, जो उसमें विश्वास करते हैं; जहाँ तक शेष लोगों का, अविश्वासियों का संबंध है, उन्हें कुछ भी ज्ञात नहीं करवाया जाता। वर्तमान में तुम्हारे बीच और चीन में जो कार्य किया जा रहा है, वह एकदम छिपाया हुआ है, ताकि उन्हें इसके बारे में पता न चले। यदि उन्हें इस कार्य का पता चल गया, तो वे सिवाय उसकी निंदा और उत्पीड़न के, कुछ नहीं करेंगे। वे उसमें विश्वास नहीं करेंगे। बड़े लाल अजगर के देश में, इस सबसे अधिक पिछड़े इलाके में, कार्य करना कोई आसान बात नहीं है। यदि इस कार्य को खुले तौर पर किया जाता, तो इसे जारी रखना असंभव होता। कार्य का यह चरण इस स्थान में किया ही नहीं जा सकता। यदि इस कार्य को खुले तौर पर किया जाता, तो वे इसे कैसे आगे बढ़ने दे सकते थे? क्या यह कार्य को और अधिक जोखिम में नहीं डाल देता? यदि इस कार्य को छिपाया नहीं जाता, बल्कि यीशु के समय के समान ही किया जाता, जब उसने असाधारण ढंग से बीमारों को चंगा किया और दुष्टात्माओं को निकाला था, तो क्या इसे बहुत पहले ही दुष्टात्माओं द्वारा "बंदी" नहीं बना लिया गया होता? क्या वे परमेश्वर के अस्तित्व को बरदाश्त कर पाते? यदि मुझे अब मनुष्य को उपदेश और व्याख्यान देने के लिए उपासना-गृहों में प्रवेश करना होता, तो क्या मुझे बहुत पहले ही टुकड़े-टुकड़े नहीं कर दिया गया होता? और यदि ऐसा होता, तो मेरा कार्य कैसे जारी रह पाता? चिह्न और चमत्कार खुले तौर पर बिलकुल भी अभिव्यक्त न करने का कारण अपने को छिपाना ही है। इसलिए, मेरा कार्य अविश्वासियों द्वारा देखा, खोजा या जाना नहीं जा सकता। यदि कार्य के इस चरण को अनुग्रह के युग में यीशु के तरीके से ही किया जाता, तो यह उतना सुस्थिर नहीं हो सकता था, जितना अब है। इसलिए, इस तरह गुप्त रूप से कार्य करना तुम लोगों के और समग्र कार्य के लाभ के लिए है। जब पृथ्वी पर परमेश्वर का कार्य समाप्त हो जाएगा, अर्थात् जब यह गुप्त कार्य पूरा हो जाएगा, तब कार्य का यह चरण एक झटके से प्रकट हो जाएगा। सब जान जाएँगे कि चीन में विजेताओं का एक समूह है; सब जान जाएँगे कि परमेश्वर ने चीन में देहधारण किया है और उसका कार्य समाप्ति पर आ गया है। केवल तभी मनुष्य पर यह प्रकट होगा : चीन ने अभी तक ह्रास या पतन का प्रदर्शन क्यों नहीं किया है? इससे पता चलता है कि परमेश्वर चीन में व्यक्तिगत रूप से अपना कार्य कर रहा है और उसने लोगों के एक समूह को विजेताओं के रूप में पूर्ण बना दिया है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारण का रहस्य (2)' से उद्धृत

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