परमेश्वर के कार्य को जानना 1

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 141

इन दिनों परमेश्वर के कार्यों को जानना, अधिकांशतः, यह जानना है कि अंत के दिनों के देहधारी परमेश्वर की मुख्य सेवकाई क्या है और पृथ्वी पर वह क्या करने के लिए आया है। मैंने पहले अपने वचनों में उल्लेख किया था कि प्रस्थान से पहले हमारे सामने एक उदाहरण स्थापित करने के लिए परमेश्वर पृथ्वी पर (अंत के दिनों के दौरान) आया है। परमेश्वर किस प्रकार यह उदाहरण स्थापित करता है? सम्पूर्ण देशों में कार्य करने और वचनों को बोलने के द्वारा। अंत के दिनों में यही परमेश्वर का कार्य है; वह केवल बोलता है, ताकि पृथ्वी वचनों का संसार बन जाए, ताकि प्रत्येक व्यक्ति को उसके वचनों द्वारा भरण पोषण और प्रबुद्ध किया जाए, और ताकि मनुष्य की आत्मा जागरूक हो जाए और वह स्वप्न के बारे में स्पष्ट हो जाए। अंत के दिनों के दौरान, देहधारी परमेश्वर मुख्य रूप से वचनों को कहने के लिए आया है। जब यीशु आया, उसने स्वर्ग के राज्य के सुसमाचार को फैलाया और सलीब पर चढ़कर छुटकारे का कार्य पूरा किया। वह व्यवस्था के युग का अंत लाया और उसने सभी पुरानी बातों को समाप्त कर दिया। यीशु के आगमन से व्यवस्था के युग का अंत हो गया और अनुग्रह के युग का आरम्भ हुआ। अंत के दिनों के देहधारी परमेश्वर का आगमन अनुग्रह के युग के अंत को लाया है। वह मुख्य रूप से अपने वचनों को कहने, मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए वचनों का उपयोग करने, मनुष्य को रोशन और प्रबुद्ध करने, और मनुष्य के हृदय से अज्ञात परमेश्वर के स्थान को हटाने के लिए आया है। यह कार्य का वह चरण नहीं है जो यीशु ने तब किया था जब वह आया था। जब यीशु आया, तो उसने कई चमत्कार किए, उसने बीमारों को चंगा किया और पिशाचों को निकाला, और सलीब पर चढ़ने का छुटकारे का कार्य पूर्ण किया। परिणामस्वरूप, अपनी धारणाओं में, मनुष्य विश्वास करता है कि परमेश्वर को ऐसा ही होना चाहिए। क्योंकि जब यीशु आया, तो उसने मनुष्य के हृदय से अज्ञात परमेश्वर की छवि को हटाने का कार्य नहीं किया; जब वह आया, तो उसे सलीब पर चढ़ा दिया गया, उसने बीमारों को चंगा किया और पिशाचों को बाहर निकाला, और स्वर्ग के राज्य के सुसमाचार को फैलाया। एक विचार से, अंत के दिनों के दौरान परमेश्वर का देहधारण मनुष्य की धारणाओं में अज्ञात परमेश्वर द्वारा धारण किए गए स्थान को हटाता है, ताकि मनुष्य के हृदय में अज्ञात परमेश्वर की छवि अब और नहीं रहे। अपने वास्तविक कार्य और वचनों का उपयोग करके, वह सम्पूर्ण देशों में जाता है और मनुष्यों के बीच वह जो कार्य करता है वह असाधारण रूप से वास्तविक और सामान्य होता है, इतना कि मनुष्य को परमेश्वर की सच्चाई पता लग जाती है, और मनुष्य के हृदय में अज्ञात परमेश्वर का स्थान समाप्त हो जाता है। दूसरे विचार से, परमेश्वर अपनी देह द्वारा कहे गए वचनों का उपयोग मनुष्य को पूर्ण करने, और सभी बातों को निष्पादित करने के लिए करता है। यही वह कार्य है जो परमेश्वर अंत के दिनों में निष्पादित करेगा।

तुम लोगों को क्या अवश्य जानना चाहिए:

1. परमेश्वर का कार्य अलौकिक नहीं है, और इसके बारे में तुम लोगों को कोई भी अवधारणाएँ नहीं रखनी चाहिए।

2. तुम लोगों को मुख्य कार्य को अवश्य समझना चाहिए जो इस बार देहधारी परमेश्वर करने के लिए आया है।

वह चंगा करने या पिशाचों को निकालने, या चमत्कार करने नहीं आया है और वह पश्चाताप का सुसमाचार फैलाने, या मनुष्य को छुटकारा प्रदान करने के लिए नहीं आया है। ऐसा इसलिए क्योंकि यीशु ने पहले ही इस कार्य को कर दिया है, और परमेश्वर एक ही कार्य को फिर कभी नहीं दोहराता है। आज, परमेश्वर अनुग्रह के युग को समाप्त करने और अनुग्रह के युग की सभी प्रथाओं को बाहर निकालने आया है। व्यावहारिक परमेश्वर मुख्य रूप से यह दिखाने आया है कि वह वास्तविक है। जब यीशु आया, तो उसने कुछ वचन कहे; उसने मुख्य रूप से चिह्न और चमत्कार प्रदर्शित किए और लोगों को चंगा किया तथा दुष्टात्माओं को बाहर निकाला, फिर उसने मनुष्यों को आश्वस्त करने, और मनुष्य को यह दिखाने के लिए कि वह ही वास्तव में परमेश्वर, और एक निष्पक्ष परमेश्वर है, भविष्यवाणियाँ की। अंततः, उसने सलीब पर चढ़ने का कार्य पूर्ण किया। आज का परमेश्वर चिह्न और चमत्कार नहीं करता है, न ही वह चंगा करता और पिशाचों को निकालता है। जब यीशु आया, तो उसने परमेश्वर के एक भाग को प्रकट करने वाला कार्य किया, परन्तु इस समय परमेश्वर कार्य के उस चरण को करने आया है जो बाकी है, क्योंकि परमेश्वर एक ही कार्य को दोहराता नहीं है; वह हमेशा नया रहने वाला परमेश्वर है और कभी भी पुराना नहीं पड़ता है, और इसलिए तुम आज जो कुछ भी देख रहे हो वह व्यावहारिक परमेश्वर के वचन और कार्य हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आज परमेश्वर के कार्य को जानना' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 142

अंत के दिनों का देहधारी परमेश्वर मुख्य रूप से अपने वचनों को कहने, जो कुछ भी मनुष्य के जीवन के लिए आवश्यक है उसे समझाने, जिसमें मनुष्य को प्रवेश चाहिए उसे दिखाने, परमेश्वर के कार्यों को मनुष्य को दिखाने और परमेश्वर की बुद्धि, सर्वशक्तिमत्ता और चमत्कारिकता को दिखाने के लिए आया है। उन कई मार्गों के माध्यम से जिनसे परमेश्वर बातचीत करता है, मनुष्य परमेश्वर की सर्वोच्चता, परमेश्वर की महत्ता, और इसके अलावा, परमेश्वर की विनम्रता और गंभीरता को निहारता है। मनुष्य देखता है कि परमेश्वर सर्वोच्च है, परन्तु वह विनम्र और गंभीर भी है। उसके कुछ वचन प्रत्यक्षतः आत्मा के दृष्टिकोण से कहे गए हैं, कुछ वचन प्रत्यक्षतः मनुष्य के दृष्टिकोण से, और कुछ वचन तीसरे व्यक्ति के दृष्टिकोण से कहे गए हैं। इसमें यह देखा जा सकता है कि परमेश्वर के कार्य करने के तरीके में बहुत भिन्नता होती है और यह वचन के माध्यम से है कि वह मनुष्य को इसे देखने देता है। अंत के दिनों के दौरान परमेश्वर का कार्य सामान्य और वास्तविक दोनों है, और इस प्रकार अंत के दिनों के लोगों का समूह सभी परीक्षणों में से सबसे बड़े परीक्षण के अधीन किया जाता है। परमेश्वर की सादगी और वास्तविकता के कारण, सभी लोगों ने इस प्रकार के परीक्षणों के बीच प्रवेश किया है; और यह कि मनुष्य परमेश्वर की परीक्षाओं में उतर गए हैं, ऐसा परमेश्वर की सादगी और वास्तविकता की वजह से हुआ है। यीशु के युग के दौरान, कोई भी अवधारणाएँ या परीक्षण नहीं थे। क्योंकि यीशु के द्वारा किया गया अधिकांश कार्य मनुष्य की अवधारणाओं के अनुसार था, इसलिए लोगों ने उनका अनुसरण किया, और उसके बारे में कोई अवधारणाएँ नहीं रखी थीं। आज के परीक्षण मनुष्य के द्वारा कभी भी सामना किए गए परीक्षणों में सबसे बड़े परीक्षण हैं और जब यह कहा जाता है कि ये लोग बहुत महान क्लेश से निकल कर आए हैं, तो यही वह क्लेश है जिसके बारे में उल्लेख किया जाता है। आज, परमेश्वर इन लोगों में विश्वास, प्रेम, सहनशीलता और आज्ञाकारिता उत्पन्न करने के लिए बोलता है। अंत के दिनों में देहधारी परमेश्वर के द्वारा कहे गए वचन मनुष्य की प्रकृति के सार, मनुष्य के व्यवहार, तथा आज जिसमें उसे प्रवेश करना चाहिए उसके अनुसार हैं। वचन वास्तविक और सामान्य दोनो हैं: वह आने वाले कल के बारे में नहीं बोलता है, न ही वह बीते हुए कल को पलट कर देखता है; वह केवल उसके बारे में बोलता है जिसमें प्रवेश किया जाना चाहिए, जिसे अभ्यास में लाना और आज ही समझना चाहिए। यदि, वर्तमान समय में, कोई व्यक्ति उभर कर आता है जो चिह्नों और चमत्कारों को प्रदर्शित करने, पिशाचों को निकालने, चंगाई करने में और कई चमत्कारों को करने में समर्थ है, और यदि यह व्यक्ति दावा करता है कि वो यीशु की वापसी है, तो यह दुष्टात्माओं की जालसाजी और उसका यीशु की नकल करना होगा। इस बात को स्मरण रखें! परमेश्वर एक ही कार्य को दोहराता नहीं है। यीशु के कार्य का चरण पहले ही पूर्ण हो चुका है, और परमेश्वर फिर से उस चरण के कार्य को पुनः नहीं दोहराएगा। परमेश्वर का कार्य मनुष्य की सभी अवधारणाओं के असंगत है; उदाहरण के लिए, पुराने नियम में मसीहा के आगमन के बारे में पहले से ही बताया गया है, परन्तु यह पाया गया कि यीशु आया, इसलिए एक अन्य मसीहा का फिर से आना गलत होगा। यीशु एक बार आ चुका है, और इस समय यदि यीशु को फिर से आना होता तो यह गलत होता। प्रत्येक युग के लिए एक नाम है और प्रत्येक नाम युग के द्वारा चिन्हित किया जाता है। मनुष्य की अवधारणाओं में, परमेश्वर को अवश्य हमेशा चिह्न और चमत्कार दिखाने चाहिए, हमेशा चंगा करना और पिशाचों को निकालना चाहिए, और हमेशा यीशु के ही समान अवश्य होना चाहिए, फिर भी इस समय परमेश्वर इन सब के समान बिल्कुल भी नहीं है। यदि अंत के दिनों के दौरान, परमेश्वर अभी भी चिह्नों और चमत्कारों को प्रदर्शित करता है और अभी भी दुष्टात्माओं को निकालता और बीमारों को चंगा करता है—यदि वह यीशु के ही समान करता है—तो परमेश्वर एक ही कार्य को दोहरा रहा होगा, और यीशु के कार्य का कोई महत्व या मूल्य नहीं होगा। इस प्रकार, प्रत्येक युग में परमेश्वर कार्य के एक ही चरण को करता है। एक बार जब उसके कार्य का प्रत्येक चरण पूरा हो जाता है, तो शीघ्र ही इसकी दुष्टात्माओं के द्वारा नकल की जाती है, और शैतान द्वारा परमेश्वर का करीब से पीछा करने के बाद, परमेश्वर एक दूसरा तरीका बदल देता है। एक बार परमेश्वर अपने कार्य का एक चरण पूर्ण कर लेता है, तो इसकी दुष्टात्माओं द्वारा नकल कर ली जाती है। तुम लोगों को इस बारे में अवश्य स्पष्ट हो जाना चाहिए। परमेश्वर का आज का कार्य क्यों यीशु के कार्य से भिन्न है? आज परमेश्वर क्यों चिह्नों और चमत्कारों को प्रदर्शित नहीं करता है, पिशाचों को निकालता नहीं है और बीमारों को चंगा नहीं करता है? यदि यीशु का कार्य व्यवस्था के युग के दौरान किए गए कार्य के समान ही होता, तो क्या वह अनुग्रह के युग के परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकता था? क्या वह सलीब पर चढ़ने के कार्य को पूर्ण कर सकता था? जैसे कि व्यवस्था के युग में, यदि यीशु मंदिर में गया होता और उसने सब्त को मान लिया होता, तो उसे किसी के द्वारा सताया नहीं जाता और सभी के द्वारा अंगीकार कर लिया जाता। यदि ऐसा होता, तो क्या उसे सलीब पर चढ़ाया जा सकता था? क्या वह छुटकारे के कार्य को पूरा कर सकता था? इसमें कौन सी बात होती, यदि अंत के दिनों का देहधारी परमेश्वर यीशु के समान चिह्नों और चमत्कारों को दिखाता? यदि परमेश्वर अंत के दिनों के दौरान केवल अपने कार्य का दूसरा भाग करता है, जो उसकी प्रबंधन योजना के एक भाग को प्रदर्शित करता है, तभी मनुष्य परमेश्वर का गहरा ज्ञान प्राप्त कर सकता है, और केवल तभी परमेश्वर के प्रबंधन का कार्य पूर्ण हो सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आज परमेश्वर के कार्य को जानना' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 143

अंत के दिनों में, परमेश्वर मुख्य रूप से अपने वचन बोलने के लिए आया है। वह आत्मा के दृष्टिकोण से, मनुष्य के दृष्टिकोण से, और तीसरे व्यक्ति के दृष्टिकोण से कहता है; वह कुछ समय के लिए एक प्रकार का उपयोग करते हुए, भिन्न-भिन्न तरीकों से कहता है, और बोलने के तरीकों का मनुष्य की अवधारणाओं को बदलने और मनुष्य के हृदय से अस्पष्ट परमेश्वर की छवि को हटाने के लिए उपयोग करता है। यही मुख्य कार्य परमेश्वर के द्वारा किया गया है। क्योंकि मनुष्य विश्वास करता है कि परमेश्वर चंगा करने, पिशाचों को निकालने, चमत्कारों को करने, और मनुष्य पर भौतिक आशीषें प्रदान करने के लिए आया है, इसलिए परमेश्वर कार्य के इस चरण—ताड़ना और न्याय का कार्य—करता है, ताकि मनुष्य की अवधारणाओं में से इस प्रकार की बातों को निकाल दिया जाए, ताकि मनुष्य परमेश्वर की वास्तविकता और सादगी को जान ले, और ताकि उसके हृदय में यीशु की छवि परमेश्वर की एक नई छवि से प्रतिस्थापित कर दी जाए। जैसे ही परमेश्वर की छवि मनुष्यों के हृदयों में पुरानी हो जाती है, तो वह एक प्रतिमा बन जाती है। जब यीशु ने आकर कार्य के चरण को किया, तो उसने परमेश्वर की सम्पूर्णता का प्रतिनिधित्व नहीं किया। उसने कुछ चिह्नों और चमत्कारों को प्रदर्शित किया, कुछ वचन बोले, और उसे अंत में सलीब पर चढ़ा दिया गया, और उसने परमेश्वर के एक हिस्से का प्रतिनिधित्व किया। वह उस सम्पूर्ण को प्रकट नहीं कर सका जो परमेश्वर का है, बल्कि उसने परमेश्वर के कार्य के एक भाग को करने में परमेश्वर का प्रतिनिधित्व किया। ऐसा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर बहुत महान है, और बहुत चमत्कारिक है, और अथाह है, और क्योंकि परमेश्वर प्रत्येक युग में अपने कार्य के एक भाग को करता है। इस युग के दौरान परमेश्वर द्वारा किया गया कार्य मुख्य रूप से मनुष्य के जीवन के लिए वचनों का प्रावधान करना; मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव और मनुष्य की प्रकृति के सार को उजागर करना; और धार्मिक अवधारणाओं, सामन्ती सोच, पुरानी सोच के साथ ही मनुष्य के ज्ञान और संस्कृति को समाप्त करना है। यह सब कुछ परमेश्वर के वचनों के माध्यम से अवश्य सामने लाया जाना और साफ किया जाना चाहिए। अंत के दिनों में, मनुष्य को पूर्ण करने के लिए परमेश्वर वचनों का उपयोग करता है, न कि चिह्नों और चमत्कारों का। वह मनुष्य को उजागर करने, उसका न्याय करने, उसे ताड़ित करने और पूर्ण बनाने के लिए वचनों का उपयोग करता है, ताकि परमेश्वर के वचनों में, मनुष्य परमेश्वर की बुद्धि और सुन्दरता को देख ले, और परमेश्वर के स्वभाव को समझ जाए, ताकि परमेश्वर के वचनों के माध्यम से, मनुष्य परमेश्वर के कार्यों को निहार ले। व्यवस्था के युग के दौरान, मूसा को यहोवा अपने वचनों के साथ मिस्र से बाहर ले गए, और कुछ वचन इस्राएलियों को बोले; उस समय, परमेश्वर के कर्मों के हिस्से को समझाया गया था, परन्तु क्योंकि मनुष्य की क्षमता सीमित थी और कोई भी चीज उसके ज्ञान को पूर्ण नहीं कर सकती थी, इसलिए परमेश्वर निरंतर बोलता और कार्य करता रहा। अनुग्रह के युग में, मनुष्य ने एक बार और परमेश्वर के कार्यों के हिस्से को देखा। यीशु चिह्नों और चमत्कारों को दिखाने, चंगा करने और दुष्टात्माओं को निकालने और सलीब पर चढ़ने में समर्थ था, जिसके तीन दिन बाद वह पुनर्जीवित हुआ और देह में मनुष्य के सामने प्रकट हुआ। परमेश्वर के बारे में, मनुष्य इससे अधिक और कुछ नहीं जानता है। मनुष्य उतना ही जानता है जितना उसे परमेश्वर के द्वारा दिखाया जाता है, और यदि परमेश्वर को मनुष्य को और अधिक नहीं दिखाना होता, तो यह परमेश्वर के बारे में मनुष्य के परिसीमन की सीमा होती। इस प्रकार, परमेश्वर कार्य करता रहता है, ताकि उसके बारे में मनुष्य का ज्ञान अधिक गहरा हो जाए, और ताकि वह धीरे-धीरे परमेश्वर के सार को जान जाए। अंत के दिनों में, परमेश्वर अपने वचनों को मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए उपयोग में लाता है। परमेश्वर के वचनों के माध्यम से तुम्हारा भ्रष्ट स्वभाव प्रकट होता है, और तुम्हारी धार्मिक अवधारणाएँ परमेश्वर की वास्तविकता के द्वारा प्रतिस्थापित होती हैं। अंत के दिनों का देहधारी परमेश्वर मुख्य रूप से अपने इन वचनों को पूरा करने आया है कि "वचन देहधारी होता है, वचन देह में आता है और वचन देह में प्रकट होता है।" और यदि तुम्हें इसका सम्पूर्ण ज्ञान नहीं है, तो तुम दृढ़ता से खड़े रहने में असमर्थ रहोगे। अंत के दिनों के दौरान, परमेश्वर मुख्य रूप से कार्य के ऐसे चरण को पूरा करने का विचार रखता है जिसमें वचन देह में प्रकट होता है, और यह परमेश्वर के प्रबंधन की योजना का एक भाग है। इस प्रकार, तुम लोगों का ज्ञान अवश्य स्पष्ट होना चाहिए; इस बात की परवाह किए बिना कि परमेश्वर कैसे कार्य करता है, परमेश्वर स्वयं की सीमा निर्धारित करने की मनुष्य को अनुमति नहीं देता है। यदि परमेश्वर अंत के दिनों के दौरान इस कार्य को नहीं करता है, तो मनुष्य का परमेश्वर के प्रति ज्ञान आगे नहीं बढ़ सकता। तुम केवल यह जानोगे कि परमेश्वर को सलीब पर चढ़ाया जा सकता है और परमेश्वर सदोम को नष्ट कर सकता है, और यह कि यीशु मर कर भी जीवित हो सकता है और पतरस के सामने प्रकट हो सकता है...। परन्तु तुम कभी भी नहीं कहोगे कि परमेश्वर के वचन सब कुछ निष्पादित कर सकते हैं, और मनुष्य को जीत सकते हैं। केवल परमेश्वर के वचनों का अनुभव करने के द्वारा ही तुम इस प्रकार के ज्ञान के बारे में बोल सकते हो, और जितना अधिक तुम परमेश्वर के कार्य का अनुभव करोगे, उतना ही अधिक विस्त़ृत तुम्हारा ज्ञान हो जाएगा। केवल तभी तुम अपनी स्वयं की अवधारणाओं की सीमाओं में परमेश्वर को बाँधना समाप्त करोगे। मनुष्य परमेश्वर के कार्यों का अनुभव करने के द्वारा उसे जान लेता है, और परमेश्वर को जानने का कोई अन्य सही मार्ग नहीं है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आज परमेश्वर के कार्य को जानना' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 144

आज, तुम सभी लोगों को यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि अंत के दिनों में, यह मुख्य रूप से "वचन देहधारी हुआ" का तथ्य है जो परमेश्वर के द्वारा निष्पादित हुआ है। पृथ्वी पर परमेश्वर के वास्तविक कार्य के माध्यम से, वह मनुष्य को परमेश्वर को जानने का, उसके साथ संलग्न होने का, और उसके वास्तविक कर्मों को देखने का कारण बनता है। वह मनुष्यों को स्पष्टता से दिखाने का कारण बनता है कि वह चिह्नों और चमत्कारों को दिखाने में सक्षम है और ऐसा समय भी आता है जब वह ऐसा करने में असमर्थ होता है, और यह उस युग पर निर्भर करता है। इससे तुम देख सकते हो कि परमेश्वर चिह्नों और चमत्कारों को दिखाने में अक्षम नहीं है, बल्कि इसके बजाय वह अपने कार्य, और युग के अनुसार कार्यप्रणाली को बदल देता है। कार्य के वर्तमान चरण में, वह चिह्नों और चमत्कारों को नहीं दिखाता है; और यह कि उसने यीशु के युग में कुछ चिह्नों और चमत्कारों को दिखाया था वह इसलिए था क्योंकि उस युग में उसका कार्य भिन्न था। परमेश्वर आज उस कार्य को नहीं करता है, और कुछ लोग विश्वास करते हैं कि वह चिह्नों और चमत्कारों को दिखाने में अक्षम हैं, या फिर वे सोचते हैं कि यदि वह चिह्नों और चमत्कारों को नहीं दिखाता है, तो वह परमेश्वर नहीं है। क्या यह एक भ्रांति नहीं है? परमेश्वर चिह्नों और चमत्कारों को दिखाने में सक्षम है, परन्तु वह एक भिन्न युग में कार्य कर रहा है, और इसलिए वह इस प्रकार का कार्य नहीं करता है। क्योंकि यह भिन्न युग है, और क्योंकि यह परमेश्वर के कार्य का एक भिन्न चरण है, इसलिए परमेश्वर द्वारा समझाए गए कर्म भी भिन्न हैं। मनुष्य का परमेश्वर पर विश्वास चिह्नों और चमत्कारों पर विश्वास करना नहीं है, न ही आश्चर्यों पर विश्वास करना है, बल्कि नए युग में उसके वास्तविक कार्य पर विश्वास करना है। मनुष्य परमेश्वर को उस तरीके के माध्यम से जानता है जिससे परमेश्वर कार्य करता है, और यह ज्ञान मनुष्य में परमेश्वर के प्रति विश्वास उत्पन्न करता है, जिसका अर्थ है, परमेश्वर के कार्य और कर्म पर विश्वास। कार्य के इस चरण में, परमेश्वर मुख्य रूप से बोलता है। चिह्नों और चमत्कारों की प्रतीक्षा मत करो, वह तुम्हें दिखाई नहीं देंगे! क्योंकि तुम अनुग्रह के युग में पैदा नहीं हुए थे। यदि तुम पैदा हुए होते, तो तुम चिह्नों और चमत्कारों को देख सकते थे, परन्तु तुम अंत के दिनों के दौरान पैदा हुए, और इसलिए तुम केवल परमेश्वर की वास्तविकता और सादगी को देख सकते हो। अंत के दिनों में अलौकिक यीशु को देखने की अपेक्षा मत करो। तुम केवल व्यवहारिक देहधारी परमेश्वर को ही देखने में सक्षम हो, जो किसी भी सामान्य मनुष्य से भिन्न नहीं है। प्रत्येक युग में, परमेश्वर विभिन्न कर्मों को समझाता है। प्रत्येक युग में वह परमेश्वर के कर्मों को समझाता है और प्रत्येक युग का कार्य परमेश्वर के स्वभाव के एक भाग का, और परमेश्वर के कर्मों के एक भाग का प्रतिनिधित्व करता है। कर्म जिन्हें वह समझाता है, उस युग के हिसाब से भिन्न-भिन्न होते हैं जिसमें वह कार्य करता है, परन्तु ये सब मनुष्य को परमेश्वर का ऐसा ज्ञान प्रदान करते है जो गहरा होता है, परमेश्वर पर ऐसा विश्वास जो बहुत व्यावहारिक एवं बहुत सच्चा होता है। मनुष्य परमेश्वर के समस्त कर्मों की वजह से परमेश्वर में विश्वास करता है, और इसलिए विश्वास करता है क्योंकि परमेश्वर बहुत चमत्कारिक है, क्योंकि परमेश्वर सर्वशक्तिमान और अथाह है। यदि तुम परमेश्वर पर इसलिए विश्वास करते हो क्योंकि वह चिह्नों और चमत्कारों को प्रदर्शित करने में सक्षम है और बीमारों को चंगा कर सकता है और पिशाचों को बाहर निकाल सकता है, तो तुम्हारा दृष्टिकोण गलत है, और कुछ लोग तुमसे कहेंगे, कि "क्या दुष्टात्माएँ भी इस तरह की चीजें करने में सक्षम नहीं हैं?" क्या यह परमेश्वर की छवि को शैतान की छवि के साथ भ्रमित करना नहीं है? आज, परमेश्वर पर मनुष्य का विश्वास परमेश्वर के कई कर्मों और बड़ी मात्रा में परमेश्वर के द्वारा बड़ी मात्रा में किए गए कार्य और उन कई तरीकों की वजह से है जिनसे वह बोलता है। परमेश्वर अपने कथनों का उपयोग मनुष्य को जीतने और उसे पूर्ण बनाने के लिए करता है। मनुष्य परमेश्वर पर उसके कई कर्मों की वजह से विश्वास करता है, इसलिए नहीं क्योंकि वह चिह्नों और चमत्कारों को दिखाने में सक्षम है, और मनुष्य उन्हें केवल इसलिए समझता है क्योंकि वह उसके कर्मों को देखता है। केवल परमेश्वर के वास्तविक कर्मों को जानकर, यह जान कर कि वह कैसे कार्य करता है, वह कौन से बुद्धिमान तरीकों का उपयोग करता है, वह कैसे बोलता है, और वह मनुष्य को कैसे पूर्ण बनाता है—केवल इन पहलुओं को जानने के बाद ही, तुम परमेश्वर की वास्तविकता को जान और उसके स्वभाव को समझ सकते हो, यह जानकर कि उसे क्या पसंद है, उसे क्या नापसंद है, कैसे वह मनुष्य पर कार्य करता है। परमेश्वर की पसंद और नापसंद को समझने के द्वारा, तुम उसके बीच में भेद कर सकते हो जो सकारात्मक और नकारात्मक है, और परमेश्वर के बारे में तुम्हारे ज्ञान के माध्यम से तुम्हारे जीवन में प्रगति होती है। संक्षेप में, तुम्हें परमेश्वर के कार्य का ज्ञान अवश्य प्राप्त करना चाहिए, और परमेश्वर पर विश्वास के बारे में अपने विचारों को सुधार लेना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आज परमेश्वर के कार्य को जानना' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 145

इस बात की परवाह किए बिना कि तुम कैसे खोज करते हो, तुम्हें, सर्वोपरि, उस कार्य को अवश्य समझना चाहिए जिसे परमेश्वर आज करता है, और उसके कार्य के महत्व को अवश्य समझना चाहिए। तुम को यह अवश्य समझना और जानना चाहिए कि जब परमेश्वर अंत के दिनों में आता है तो वह कौन सा कार्य लाता है, कैसा स्वभाव ले कर आता है, और मनुष्य में क्या वह पूर्ण किया जाएगा। यदि तुम उस कार्य को जानते या समझते नहीं हो जिसे करने के लिए वह देह धारण करके आया है, तो तुम कैसे उसकी इच्छा को समझ सकते हो, और तुम उसके अंतरंग कैसे बन सकते हो? वास्तव में, परमेश्वर का अंतरंग होना जटिल नहीं है, किन्तु यह सरल भी नही है। यदि लोग इसे पूरी तरह से समझ सकते और इसे अमल में ला सकते, तो यह सरल बन जाता है; यदि लोग इसे पूरी तरह से नहीं समझ सकते हैं, तो यह बहुत ही कठिन बन जाता है, और, इसके अलावा, वे अपनी खोज को अस्पष्टता में ले जाने की ओर उन्मुख हो जाते हैं। यदि परमेश्वर की खोज में, मनुष्य की स्थिर रहने की अपनी स्वयं की स्थिति नहीं है, और नहीं जानता है कि उसे किस सत्य को धारण करना चाहिए, तो इसका अर्थ है कि उसका कोई आधार नहीं है, और इसलिए उसके लिए अडिग रहना आसान नहीं है। आज, ऐसे बहुत से लोग हैं जो सत्य को नहीं समझते हैं, जो बुरे और भले के बीच अंतर नहीं कर सकते हैं या नहीं बता सकते हैं कि किससे प्रेम या घृणा करें। इस प्रकार के लोग कठिनता से ही अडिग रह सकते हैं। परमेश्वर पर विश्वास करने की कुंजी सत्य को अभ्यास में लाने, परमेश्वर की इच्छा का ध्यान रखने, जब परमेश्वर देह में आता है तब मनुष्य पर उसके कार्य को और उन सिद्धान्तों को जिनके द्वारा वह बोलता है, को जानने में सक्षम होना है; भीड़ का अनुसरण मत करो, और तुम्हें जिसमें प्रवेश करना चाहिए उसके तुम्हारे स्वयं के सिद्धान्त अवश्य होने चाहिए और उन्हें अवश्य धारण करना चाहिए। परमेश्वर द्वारा प्रबुद्ध की गई उन चीजों को दृढ़ता से अपने अंदर धारण करना तुम्हारी सहायता के लिए है। यदि तुम नहीं करते हो, तो आज तुम एक ही दिशा में जाओगे और कल दूसरी दिशा में जाओगे, और कभी भी कुछ वास्तविक नहीं प्राप्त करोगे। इस प्रकार का होना तुम्हारे स्वयं के जीवन के लिए किसी भी लाभ का नहीं है। जो सत्य को नहीं समझते हैं वे हमेशा दूसरों का अनुसरण करते हैं: यदि लोग कहते हैं कि यह पवित्र आत्मा का कार्य है, तो तुम भी कहते हो कि यह पवित्र आत्मा का कार्य है; यदि लोग कहते हैं कि यह दुष्टात्मा का कार्य है, तो तुम्हें भी संदेह हो जाता है, या तुम भी कहते हो कि यह किसी दुष्टात्मा का कार्य है। तुम हमेशा दूसरों के शब्दों को तोते की तरह कहते हो और स्वयं किसी भी चीज का अंतर करने में असमर्थ होते हो, न ही तुम स्वयं सोचने में सक्षम होते हो। यह कोई बिना स्थिति वाला व्यक्ति है, जो विभेद करने में असमर्थ है—इस प्रकार का व्यक्ति निरर्थक अभागा है! तुम हमेशा दूसरों के वचनों को दोहराते हो: आज ऐसा कहा जाता है कि यह पवित्र आत्मा का कार्य है, परन्तु ऐसी सम्भावना है कि कल कोई कहेगा कि यह पवित्र आत्मा का कार्य नहीं है, और कुछ नहीं बल्कि मनुष्य के कर्म हैं—फिर भी तुम इसे समझ नहीं पाते हो, और जब तुम इसे दूसरों के द्वारा कहा गया देखते हो, तो तुम भी वही बात कहते हो। यह वास्तव में पवित्र आत्मा का कार्य है, परन्तु तुम कहते हो कि यह मनुष्य का कार्य है, क्या तुम पवित्र आत्मा के कार्य की ईशनिंदा करने वालों में से एक नहीं बन गए हो? इसमें, क्या तुमने परमेश्वर का विरोध नहीं किया क्योंकि तुम विभेद नहीं कर सकते हो? कौन जानता है, हो सकता है कि एक दिन कोई मूर्ख दिखाई दे जाए जो कहता हो कि "यह किसी दुष्टात्मा का कार्य है," और जब तुम इन वचनों को सुनोगे तो तुम हैरानी में पड़ जाओगे, और एक बार फिर दूसरों के शब्दों में बँध जाओगे। हर बार जब कोई अशांति मचाता है तो तुम अपनी स्थिति में खड़े रहने में असमर्थ हो जाते हो, और यह सब इसलिए है क्योंकि तुम सत्य को धारण नहीं करते हो। परमेश्वर पर विश्वास करना और परमेश्वर के ज्ञान का अनुसरण करना आसान बात नहीं है। इन्हें केवल एक साथ इकट्ठे होने और उपदेश सुनने के द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता है, और केवल ज़ुनून के द्वारा तुम्हें पूर्ण नहीं किया जा सकता है। तुम्हें अपने कार्यों को अवश्य अनुभव करना और जानना चाहिए, और अपने कार्यों में सैद्धान्तिक होना चाहिए, और पवित्र आत्मा के कार्यों को प्राप्त करना चाहिए। जब तुम इन अनुभवों से गुज़र जाओगे, तो तुम कई चीजों में अंतर करने में सक्षम हो जाओगे—तुम भले और बुरे के बीच, धार्मिकता और दुष्टता के बीच, देह और रक्त क्या है और सत्य क्या है इसके बीच अंतर करने में सक्षम हो जाओगे। तुम्हें इन सभी चीजों के बीच अन्तर करने में सक्षम होना चाहिए, और ऐसा करने में, चाहे कैसी भी परिस्थितियाँ हों, तुम कभी भी नहीं हारोगे। केवल यही तुम्हारी वास्तविक कद-काठी है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो परमेश्वर को और उसके कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर को सन्तुष्ट कर सकते हैं' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 146

परमेश्वर के कार्यों को जानना कोई आसान बात नहीं है। तुम्हारी खोज में तुम्हारा स्तर-मान और उद्देश्य होना चाहिए, तुम्हें ज्ञात होना चाहिए कि सच्चे मार्ग को कैसे खोजें, और कैसे मापें कि क्या यह सच्चा मार्ग है या नहीं, और क्या यह परमेश्वर का कार्य है या नहीं। सच्चे मार्ग की तलाश करने में सबसे बुनियादी सिद्धान्त क्या है? तुम्हें देखना होगा कि क्या इस मार्ग में पवित्र आत्मा का कार्य है कि नहीं, क्या ये वचन सत्य की अभिव्यक्ति हैं या नहीं, किसके लिए गवाही देनी है, और यह तुम्हारे लिए क्या ला सकता है। सच्चे मार्ग और गलत मार्ग के मध्य अंतर करने के लिए बुनियादी ज्ञान के कई पहलुओं की आवश्यकता होती है, जिनमें सबसे बुनियादी है यह बताना कि क्या इसमें पवित्र आत्मा का कार्य है या नहीं। क्योंकि परमेश्वर पर विश्वास का मनुष्य का सार पवित्र आत्मा पर विश्वास है, और यहाँ तक कि देहधारी परमेश्वर पर उसका विश्वास इसलिए है क्योंकि यह देह परमेश्वर के आत्मा का मूर्तरूप है, जिसका अर्थ यह है कि ऐसा विश्वास पवित्र आत्मा पर विश्वास है। आत्मा और देह के मध्य अंतर हैं, परन्तु क्योंकि यह देह पवित्रात्मा से आता है और वचन देहधारी होता है, इसलिए मनुष्य जिस में विश्वास करता है वह अभी भी परमेश्वर का अन्तर्निहित सार है। और इसलिए, इस बात का विभेद करने में कि यह सच्चा मार्ग है या नहीं, सर्वोपरि तुम्हें यह अवश्य देखना चाहिए कि क्या इसमें पवित्र आत्मा का कार्य है या नहीं, जिसके बाद तुम्हें अवश्य देखना चाहिए कि क्या इस मार्ग में सत्य है अथवा नहीं। यह सत्य सामान्य मानवता का जीवन स्वभाव है, अर्थात्, वह जो मनुष्य से तब अपेक्षित था कि जब परमेश्वर ने आरंभ में उसका सृजन किया था, यानि, सभी सामान्य मानवता (मानवीय भावना, अंतर्दृष्टि, बुद्धि और मनुष्य होने का बुनियादी ज्ञान) है। अर्थात्, तुम्हें यह देखने की आवश्यकता है कि क्या यह मार्ग मनुष्य को एक सामान्य मानवता के जीवन में ले जा सकता है या नहीं, क्या बोला गया सत्य सामान्य मानवता की आवश्यकता के अनुसार अपेक्षित है या नहीं, क्या यह सत्य व्यवहारिक और वास्तविक है या नहीं, और क्या यह सबसे सही समय पर है या नहीं। यदि इसमें सत्य है, तो यह मनुष्य को सामान्य और वास्तविक अनुभवों में ले जाने में सक्षम है; इसके अलावा, मनुष्य हमेशा से अधिक सामान्य बन जाता है, मनुष्य का देह में जीवन और आध्यात्मिक जीवन हमेशा से अधिक व्यवस्थित हो जाता है, और मनुष्य की भावनाएँ हमेशा से और अधिक सामान्य हो जाती हैं। यह दूसरा सिद्धान्त है। एक अन्य सिद्धान्त है, जो यह है कि क्या मनुष्य के पास परमेश्वर का बढ़ता हुआ ज्ञान है या नहीं, क्या इस प्रकार के कार्य और सत्य का अनुभव करना उसमें परमेश्वर के लिए प्रेम को प्रेरित कर सकता है या नहीं, और उसे हमेशा से अधिक परमेश्वर के निकट ला सकता है या नहीं। इसमें यह मापा जा सकता है कि क्या यह सच्चा मार्ग है अथवा नहीं। सबसे अधिक बुनियादी बात यह है कि क्या यह मार्ग अलौकिक के बजाए यर्थाथवादी है, और क्या यह मनुष्य का जीवन प्रदान करने में सक्षम है या नहीं। यदि यह इन सिद्धान्तों के अनुरूप है, तो निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि यह मार्ग सच्चा मार्ग है। मैं ये वचन तुम लोगों से तुम लोगों के भविष्य के अनुभवों में अन्य मार्गों को स्वीकार करवाने के लिए नहीं कहता हूँ, न ही किसी भविष्यवाणी के रूप में कहता हूँ कि भविष्य में एक अन्य नए युग का कार्य होगा। मैं इन्हें कहता हूँ ताकि तुम लोगों को निश्चित हो जाए कि आज का मार्ग ही सच्चा मार्ग है, ताकि आज के कार्य के प्रति तुम लोगों के विश्वास में तुम लोग केवल आधा-अधूरा ही निश्चित नहीं रहोगे और इसमें अंतर्दृष्टि प्राप्त करने में असमर्थ नहीं रहोगे। यहाँ ऐसे कई हैं जो, निश्चित होने के बावजूद, अभी भी भ्रम में अनुगमन करते हैं; ऐसी निश्चितता का कोई सिद्धान्त नहीं होता है, और इन्हें कभी न कभी अवश्य हटा दिया जाना चाहिए। यहाँ तक कि वे भी जो अपने अनुसरण में विशेष रूप से उत्साही हैं तीन भाग ही निश्चित हैं और पाँच भाग अनिश्चित हैं, जो दर्शाता है कि उनका कोई आधार नहीं है। क्योंकि तुम लोगों की क्षमता बहुत ही कमज़ोर है और तुम्हारा आधार बहुत ही सतही है, इसलिए तुम लोगों को विभेदन की समझ नहीं है। परमेश्वर अपने कार्य को दोहराता नहीं है, वह ऐसा कार्य नहीं करता है जो वास्तविक न हो, वह मनुष्यों से अत्याधिक अपेक्षाएँ नहीं रखता है और वह ऐसा कार्य नहीं करता है जो मनुष्यों की समझ से परे हो। वह जो कुछ भी कार्य करता है मनुष्य की सामान्य समझ के दायरे के भीतर है, और सामान्य मानवता की समझ से परे नहीं है, और उसका कार्य मनुष्य की सामान्य अपेक्षाओं के अनुसार है। यदि यह पवित्र आत्मा का कार्य है, तो मनुष्य हमेशा से अधिक सामान्य बन जाता है, और उसकी मानवता हमेशा से अधिक सामान्य बन जाती है। मनुष्य को अपने शैतानी स्वभाव का, और मनुष्य के सार का बढ़ता हुआ ज्ञान होता है, और उसकी सत्य के लिए हमेशा से अधिक ललक होती है। अर्थात्, मनुष्य का जीवन अधिकाधिक बढ़ता जाता है और मनुष्य का भ्रष्ट स्वभाव अधिकाधिक बदलावों में सक्षम हो जाता है—जिस सब का अर्थ है परमेश्वर का मनुष्य का जीवन बनना। यदि एक मार्ग उन चीजों को प्रकट करने में असमर्थ है जो मनुष्य का सार हैं, मनुष्य के स्वभाव को बदलने में असमर्थ है, और, इसके अलावा, उसे परमेश्वर के सामने लाने में असमर्थ है या उसे परमेश्वर की सच्ची समझ प्रदान कराने में असमर्थ है, और यहाँ तक कि उसकी मानवता का हमेशा से अधिक निम्न होने और उसकी भावना का हमेशा से अधिक असामान्य होने का कारण बनता है, तो यह मार्ग अवश्य सच्चा मार्ग नहीं होना चाहिए और यह दुष्टात्मा का कार्य, या पुराना मार्ग हो सकता है। संक्षेप में, यह पवित्र आत्मा का वर्तमान का कार्य नहीं हो सकता है। तुम लोगों ने इन सभी वर्षों में परमेश्वर पर विश्वास किया है, फिर भी तुम लोगों को सच्चे और गलत मार्ग के मध्य विभेदन करने या सच्चे मार्ग की तलाश करने के सिद्धान्तों का कोई आभास नहीं है। अधिकांश लोगों की इन मामलों में दिलचस्पी भी नहीं होती है; वे सिर्फ़ वहाँ चल पड़ते हैं जहाँ बहुसंख्यक जाते हैं, और वह दोहरा देते हैं जो बहुसंख्यक कहते हैं। यह कोई कैसा व्यक्ति है जो सत्य की खोज करता है? और इस प्रकार के लोग सच्चा मार्ग कैसे पा सकते हैं? यदि तुम इन अनेक मुख्य नियमों को समझ लो, तो चाहे जो कुछ भी हो जाए तुम धोखा नहीं खाओगे। आज, यह बहुत महत्वपूर्ण है कि मनुष्य विभेदन करने में सक्षम हो जाए; यही है वह जो एक सामान्य मानवता के पास होना चाहिए, और जिसे मनुष्य को अपने अनुभव में अवश्य धारण करना चाहिए। यदि, आज भी, मनुष्य अपने अनुगमन में कुछ भी अंतर नहीं करता है और उसकी मानव भावना अभी भी नहीं बढ़ी है, तो मनुष्य अत्यधिक मूर्ख है, और उसकी खोज ग़लत और भटकी हुई है। आज तुम्हारी खोज में थोड़ा सा भी विभेदन नहीं है, और जब कि यह सत्य है, जैसा कि तुम कहते हो, तुमने सही मार्ग प्राप्त कर लिया है, क्या तुमने इसे प्राप्त कर लिया है? क्या तुम कुछ भी अंतर करने में समर्थ रहे हो? सच्चे मार्ग का सार क्या है? सच्चे मार्ग में, तुमने सही मार्ग प्राप्त नहीं किया है, तुमने कुछ भी सत्य प्राप्त नहीं किया है, अर्थात्, तुमने वह प्राप्त नहीं किया है जो परमेश्वर तुमसे अपेक्षा करता है, और इसलिए तुम्हारी भ्रष्टता में कोई परिवर्तन नहीं आया है। यदि तुम इस मार्ग में ही खोज करते रहते हो, तो तुम अंततः हटा दिए जाओगे। आज के दिन तक अनुसरण करके, तुम्हें निश्चित हो जाना चाहिए कि जिस मार्ग को तुमने अपनाया है वह सच्चा मार्ग है, और तुम्हें कोई और संदेह नहीं होने चाहिए। कई लोग हमेशा अनिश्चित रहते हैं और छोटी-छोटी बातों के कारण सत्य की खोज करना रोक देते हैं। ये ऐसे लोग हैं जिन्हें परमेश्वर के कार्य का कोई ज्ञान नहीं है, ये वे लोग हैं जो भ्रम में परमेश्वर का अनुसरण करते हैं। जो लोग परमेश्वर के कार्य को नहीं जानते हैं वे उसके अंतरंग होने या उसकी गवाही देने में असमर्थ हैं। मैं उन लोगों को यथाशीघ्र सत्य की खोज करने की सलाह देता हूँ जो केवल आशीषों की तलाश करते हैं और केवल उसकी खोज करते हैं जो कि अज्ञात और अमूर्त है, ताकि उनके जीवन में कोई महत्व हो सके। अपने आप को अब और मूर्ख मत बनाओ!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो परमेश्वर को और उसके कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर को सन्तुष्ट कर सकते हैं' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 147

जैसे-जैसे विभिन्न युग आये-गए, उसी के साथ छ: हज़ार वर्षों के दौरान किए गए कार्य की समग्रता धीरे-धीरे बदल गई है। इस कार्य में बदलाव समस्त संसार की परिस्थितियों और एक इकाई के तौर पर मानवजाति के विकासात्मक प्रवृत्ति पर आधारित हैं। परमेश्वर का प्रबंधन का कार्य इसके अनुसार केवल धीरे-धीरे बदला है। सृष्टि के आरंभ से इस सबकी योजना नहीं बनाई गई थी। संसार का सृजन होने से पहले, या इसके सृजन के ठीक बाद, यहोवा ने व्यवस्था के कार्य के प्रथम चरण; अनुग्रह के कार्य के दूसरे चरण; और विजय के कार्य के तीसरे चरण की योजना अब तक नहीं बनायी थी, विजय का कार्य, जिसमें वह पहले मोआब के कुछ वंशजों से शुरुआत करेगा और इसके माध्यम से वह समस्त ब्रह्माण्ड को जीतेगा। संसार का सृजन करने के बाद, उसने कभी ये वचन नहीं कहे; न ही उसने ये मोआब के बाद नहीं कहे, यकीनन, लूत से पहले, उसने इन्हें कभी नहीं कहा। उसका समस्त कार्य स्वाभाविक तरीके से ही किया जाता है। उसका छ:-हजार-वर्षों का प्रबंधन कार्य इसी तरह से विकसित हुआ है; किसी भी हाल में, संसार का सृजन करने से पहले उसने "मानवजाति के विकास के लिए सारांश के मानचित्र" के रूप में कोई योजना नहीं लिखी। परमेश्वर अपने कार्य में, प्रत्यक्ष रूप से व्यक्त करता है कि वह क्या है; वह किसी योजना को बनाने पर अत्यधिक विचार नहीं करता है। निस्संदेह, बहुत से नबियों ने बहुत सी भविष्यवाणियाँ की हैं, परंतु फिर भी यह नहीं कहा जा सकता है कि परमेश्वर का कार्य सदैव ही एक सटीक योजना से युक्त रहा है; वे भविष्यवाणियाँ परमेश्वर के उस समय के कार्य के अनुसार की गई थीं। वह जो भी कार्य करता है वह सब सर्वाधिक वास्तविक कार्य है। वह प्रत्येक युग के विकास के अनुसार अपने कार्य को संपन्न करता है, और इसे इस पर आधारित है कि चीज़ें कैसे बदलती हैं। उसके लिए, कार्य को संपन्न करना किसी बीमारी के लिए दवा देने के सदृश है; अपना कार्य करते समय वह अवलोकन करता है और अपने अवलोकनों के अनुसार कार्य जारी रखता है। अपने कार्य के प्रत्येक चरण में, परमेश्वर अपनी विशाल बुद्धि और अपनी योग्यता को व्यक्त करने में सक्षम है; वह किसी युग विशेष के कार्य के अनुसार अपनी विशाल बुद्धि और अधिकार को प्रकट करता है, और उन युगों के दौरान उसके द्वारा वापस लाए गए सभी लोगों को अपना समस्त स्वभाव देखने देता है। प्रत्येक युग में जिस कार्य के किए जाने की आवश्यकता है उसके अनुसार वह लोगों की आवश्यकताओं की आपूर्ति करता है। वह लोगों की पूर्ति उस हद के आधार पर करता है जिस तक शैतान ने उन्हें भ्रष्ट कर दिया है। यह उस तरह है जब यहोवा ने आरंभ में आदम और हव्वा का सृजन किया था, उन्हें उसने ऐसा इसलिए किया ताकि वे पृथ्वी पर परमेश्वर को अभिव्यक्त करने में समर्थ हों और सृजन के बीच परमेश्वर की गवाही दे सकें। किन्तु सर्प द्वारा प्रलोभन दिए जाने के बाद हव्वा ने पाप किया आदम ने भी वही किया; उन दोनों ने बगीचे से अच्छे और बुरे के ज्ञान के वृक्ष का फल खाया। और इस प्रकार, यहोवा के पास उनके बीच करने के लिए अतिरिक्त कार्य था। उनकी नग्नता देखकर उसने पशुओं की खालों से बने वस्त्रों से उनके शरीर को ढक दिया। इसके बाद उसने आदम से कहा, "तू ने जो अपनी पत्नी की बात सुनी, और जिस वृक्ष के फल के विषय मैं ने तुझे आज्ञा दी थी कि तू उसे न खाना, उसको तू ने खाया है इसलिये भूमि तेरे कारण शापित है ... और अन्त में मिट्टी में मिल जाएगा क्योंकि तू उसी में से निकाला गया है; तू मिट्टी तो है और मिट्टी ही में फिर मिल जाएगा।" स्त्री से उसने कहा, "मैं तेरी पीड़ा और तेरे गर्भवती होने के दु:ख को बहुत बढ़ाऊँगा; तू पीड़ित होकर बालक उत्पन्न करेगी; और तेरी लालसा तेरे पति की ओर होगी, और वह तुझ पर प्रभुता करेगा।" उसके बाद से उसने उन्हें अदन की वाटिका से निर्वासित कर दिया, और उन्हें वाटिका से बाहर रहने पर मजबूर किया जैसे कि अब आधुनिक मानव पृथ्वी पर रहता है। जब परमेश्वर ने आरंभ में मनुष्य का सृजन किया, तब उसने यह योजना नहीं बनाई थी कि सृजन के बाद मनुष्य साँप द्वारा प्रलोभित हो और फिर वह मनुष्य और साँप को शाप दे। उसकी वास्तव में इस प्रकार की कोई योजना नहीं थी; जिस तरह चीज़ों का विकास हुआ उसी ने उसे अपनी सृष्टि के बीच नया कार्य करने को दिया। यहोवा के पृथ्वी पर आदम और हव्वा के बीच इस कार्य को संपन्न करने के बाद, मानवजाति कई हजार वर्षों तक विकसित होती रही जब तक, "यहोवा ने देखा कि मनुष्यों की बुराई पृथ्वी पर बढ़ गई है, और उनके मन के विचार में जो कुछ उत्पन्न होता है वह निरन्तर बुरा ही होता है। और यहोवा पृथ्वी पर मनुष्य को बनाने से पछताया, और वह मन में अति खेदित हुआ। ... परन्तु यहोवा के अनुग्रह की दृष्‍टि नूह पर बनी रही।" इस समय यहोवा के पास करने के लिए और नये कार्य थे, क्योंकि जिस मानवजाति का उसने सृजन किया था वह सर्प के द्वारा प्रलोभित किए जाने के बाद बहुत अधिक पापमय हो चुकी थी। इन परिस्थितियों को देखते हुए, यहोवा ने इन लोगों में से बचाने के लिए नूह के परिवार का चयन किया, और संसार को जलप्रलय के द्वारा नष्ट करने का अपना कार्य संपन्न किया। मानवजाति आज के दिन भी तक इसी तरीके से विकसित हो रही है, उत्तरोत्तर भ्रष्ट हो रही है, और जब मानवजाति का विकास अपने शिखर पर पहुँच जाएगा, तब इसका अर्थ मानवजाति का अंत होगा। संसार के बिल्कुल आरंभ से लेकर अंत तक परमेश्वर के कार्य का भीतरी सत्य सदैव ऐसा ही रहा है और सदा ऐसा ही रहेगा। यह वैसा ही है जैसे कि मनुष्यों को उनके प्रकार के अनुसार वर्गीकृत किया जाएगा; यह उस मामले जैसा नहीं है जिसमें हर एक व्यक्ति को बिल्कुल आरंभ से एक श्रेणी से संबंधित होने के लिए पूर्वनियत कर दिया जाता है, बल्कि इसमें हर एक को को केवल विकास की एक प्रक्रिया से गुजरने के बाद ही धीरे-धीरे श्रेणीबद्ध किया जाता है। अंत में, जिस किसी को भी पूरी तरह से बचाया नहीं जा सकता है उसे उसके "पुरखों" के पास लौटा दिया जाएगा। मानवजाति के बीच परमेश्वर का कोई भी कार्य संसार के सृजन के समय, पहले से तैयार नहीं किया गया था; बल्कि, यह चीज़ों का विकास है जिसने परमेश्वर को मानवजाति के बीच अधिक वास्तविक एवं व्यवहारिक रूप से कदम-दर-कदम अपना कार्य करने दिया है। उदाहरण के लिए यहोवा परमेश्वर ने स्त्री को प्रलोभित करने के लिए साँप का सृजन नहीं किया था। यह उसकी विशिष्ट योजना नहीं थी, न ही यह कुछ ऐसा था जिसे उसने जानबूझकर पूर्वनियत किया था। यह कहा जा सकता है कि यह अनपेक्षित घटना थी। इस प्रकार, इस कारण से यहोवा ने आदम और हव्वा को अदन की वाटिका से निष्कासित किया और फिर कभी मनुष्य का पुनः सृजन नहीं करने की शपथ ली। परंतु परमेश्वर की बुद्धि के बारे में लोगों को केवल इसी आधार पर पता चलता है। यह वैसा ही है जैसा मैंने पहले कहा था : "मेरी बुद्धि शैतान के षडयंत्रों के आधार पर प्रयोग में लायी जाती है।" चाहे मानवजाति कितनी भी भ्रष्ट हो जाये या साँप उन्हें कैसे भी प्रलोभित करे, यहोवा के पास तब भी अपनी बुद्धि है; इस तरह, जब से उसने संसार का सृजन किया है, वह नये-नये कार्य में लगा रहा है और उसके कार्य का कोई भी कदम कभी भी दोहराया नहीं गया है। शैतान ने लगातार षड्यंत्र किये हैं; मानवजाति लगातार शैतान के द्वारा भ्रष्ट की गई है, और यहोवा परमेश्वर ने अपने बुद्धिमत्तापूर्ण कार्य को लगातार संपन्न किया है। वह कभी भी असफल नहीं हुआ है, और संसार के सृजन से अब तक उसने कार्य करना कभी नहीं रोका है। शैतान द्वारा मानवजाति को भ्रष्ट करने के बाद, परमेश्वर ने अपने उस शत्रु को परास्त करने के लिए उनके बीच लगातार कार्य करता रहा है जो भ्रष्टता का स्रोत है। यह लड़ाई आरंभ से शुरू हुई है और संसार के अंत तक चलती रहेगी। यह सब कार्य करते हुए, यहोवा परमेश्वर ने न केवल शैतान के द्वारा भ्रष्ट की जा चुकी मनुष्यजाति को उसके द्वारा महान उद्धार को प्राप्त करने की अनुमति दी है, बल्कि उसे अपनी बुद्धि सर्वशक्तिमत्ता और अधिकार को देखने की अनुमति भी दी है। इसके अलावा, अंत में वह मानवजाति को दुष्टों को दण्ड, और अच्छों को पुरस्कार देने वाला अपना धार्मिक स्वभाव देखने देगा। उसने आज के दिन तक शैतान के साथ युद्ध किया है और कभी भी पराजित नहीं हुआ है। इसलिए क्योंकि वह एक बुद्धिमान परमेश्वर है, और वह अपनी बुद्धि शैतान के षड्यंत्रों के आधार पर प्रयोग करता है। और इसलिए वह न केवल स्वर्ग की सब चीज़ों से अपने अधिकार का पालन करवाता है; बल्कि वह पृथ्वी की सभी चीज़ों को अपने पाँव रखने की चौकी के नीचे रखवाता है, और एक अन्य महत्वपूर्ण बात है, वह दुष्टों को, जो मानवजाति पर आक्रमण करते हैं और उसे सताते हैं, अपनी ताड़ना के अधीन करता है। इन सभी कार्यों के परिणाम उसकी बुद्धि के कारण प्राप्त होते हैं। उसने मानवजाति के अस्तित्व से पहले कभी भी अपनी बुद्धि को प्रकट नहीं किया था, क्योंकि स्वर्ग में, और पृथ्वी पर, या समस्त ब्रह्माण्ड में उसके कोई शत्रु नहीं थे, और कोई अंधकार की शक्तियाँ नहीं थीं जो प्रकृति में से किसी भी चीज़ पर आक्रमण करती थी। प्रधान स्वर्गदूत द्वारा उसके साथ विश्वासघात करने के बाद, उसने पृथ्वी पर मानवजाति का सृजन किया, और यह मानवजाति के कारण ही था कि उसने औपचारिक रूप से प्रधान स्वर्गदूत, शैतान के साथ अपना सहस्राब्दी जितना लंबा युद्ध आरंभ किया, ऐसा युद्ध जो हर उत्तरोत्तर चरण के साथ और अधिक घमासान होता जाता है। इनमें से प्रत्येक चरण में उसकी सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि उपस्थित रहती है। केवल इस समय ही स्वर्ग और पृथ्वी में हर चीज़ परमेश्वर की बुद्धि, सर्वशक्तिमत्ता, और विशेषकर परमेश्वर की यथार्थता को देख सकती है। वह आज भी अपने कार्य को उसी यथार्थ तरीके से संपन्न करता है; इसके अतिरिक्त, जब वह अपने कार्य को करता है, तो वह अपनी बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता को भी प्रकट करता है; वह तुम लोगों को प्रत्येक चरण के भीतरी सत्य को देखने की अनुमति देता है, यह देखने की अनुमति देता है कि परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता को आखिर कैसे समझाया जाए, और इसके अतिरिक्त परमेश्वर की वास्तविकता की निर्णायक व्याख्या को देखने देता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम्हें पता होना चाहिए कि समस्त मानवजाति आज के दिन तक कैसे विकसित हुई' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 148

पवित्र आत्मा का कार्य सदैव अनायास किया जाता है; वह किसी भी समय जब वह अपने कार्य की योजना बना सकता है, और कभी भी उसे संपन्न कर सकता है। मैं क्यों सदैव कहता हूँ कि पवित्र आत्मा का कार्य यथार्थवादी होता है, कि वह सदैव नया होता है, कभी पुराना नहीं होता है, और सदैव सबसे अधिक ताजा होता है? जब संसार का सृजन किया गया था तब उसके कार्य की योजना पहले से नहीं बनायी गई थी; ऐसा बिलकुल भी नहीं हुआ था! कार्य का हर कदम अपने सही समय पर समुचित प्रभाव प्राप्त करता है, और वे एक दूसरे में हस्तक्षेप नहीं करते हैं। ऐसे बहुत से अवसर होते हैं, जब तुम्हारे मन की योजनाएँ पवित्र आत्मा के नवीनतम कार्य के साथ बिलकुल मिलान नहीं खातीं हैं। उसका कार्य लोगों के तर्कबुद्धि के जैसा सरल नहीं है, न ही वह लोगों की कल्पनाओं जैसा जटिल है—इसमें किसी भी समय, किसी भी स्थान पर, लोगों को उनकी वर्तमान आवश्यकताओं के अनुसार आपूर्ति करना शामिल है। कोई भी लोगों के सार के बारे में उतना स्पष्ट नहीं है जितना वह है, और सटीक रूप से इसी कारण कोई भी चीज़ लोगों की यथार्थवादी आवश्यकताओं के उतना अनुकूल होने में समर्थ नहीं है जितने अच्छे तरीके से उसका कार्य समर्थ है। इसलिए, मनुष्य के दृष्टिकोण से, उसका कार्य कई सहस्राब्दी पूर्व अग्रिम में योजनाबद्ध किया गया प्रतीत होता है। जब वह तुम लोगों के बीच, अब कार्य करता है, इस पूरे दौरान तुम जिस स्थिति में हो उसे देखते हुए कार्य करता और बोलता है, तब प्रत्येक परिस्थिति का सामना होने पर उसके पास बोलने के लिए बिलकुल सही वचन होते हैं, वह उन वचनों को कहता है जिसकी सटीक रूप से लोगों को आवश्यकता होती है। उसके काम के पहले कदम को लो : ताड़ना का समय। उसके बाद, लोगों ने सभी तरह के व्यवहार प्रदर्शित किए और निश्चित तरीकों से विद्रोहपूर्ण ढंग से कार्य किया; भिन्न सकारात्मक परिस्थितियाँ उभरीं, वैसे ही कुछ नकारात्मक परिस्थितियाँ भी उभरीं। वे अपनी नकारात्मकता की एक हद तक पहुँच गए और वह न्यूनतम सीमा दिखाई जिस तक वे गिर सकते थे। परमेश्वर ने इन सब बातों के आधार पर अपना कार्य किया, और इस प्रकार अपने कार्य हेतु अधिक बेहतर प्रभाव प्राप्त करने के लिए उन्हें पकड़ लिया। अर्थात, वह लोगों के बीच किसी विशेष समय उनकी वर्तमान स्थितियों के अनुसार आपूर्ति करने का कार्य करता है। वह अपने कार्य का हर कदम लोगों की वास्तविक स्थितियों के अनुसार संपन्न करता है। समस्त सृष्टि उसके हाथों में है, वह उन्हें कैसे नहीं जान सकता? लोगों की स्थितियों के अनुसार, परमेश्वर, किसी भी समय और स्थान पर, कार्य के उस अगले कदम को करता है जो किया जाना चाहिए। यह कार्य किसी भी तरह से हजारों वर्ष पहले से योजनाबद्ध नहीं किया गया था; यह एक मानवीय धारणा है! अपने कार्य के प्रभावों को देखते हुए वह कार्य करता है, और उसका कार्य लगातार अधिक गहरा और विकसित होता जाता है; प्रत्येक बार, जब वह अपने कार्य के परिणामों का अवलोकन करता है, तो वह अपने कार्य के अगले कदम को संपन्न करता है। वह धीरे-धीरे अवस्थांतरण के लिए व समय के साथ लोगों को अपना नया कार्य दृष्टिगोचर कराने हेतु कई चीज़ों का उपयोग करता है। इस प्रकार का कार्य लोगों की आवश्यकताओं की आपूर्ति करने में समर्थ हो सकता है, क्योंकि परमेश्वर सभी लोगों को बहुत अच्छी तरह से जानता है। वह अपने कार्य को इसी तरह से स्वर्ग से संपन्न करता है। इसी प्रकार, देहधारी परमेश्वर भी, वास्तविक परिस्थितियों के अनुसार और मनुष्यों के बीच कार्य करते, व्यवस्था करते हुए, अपने कार्य को इसी प्रकार से संपन्न करता है। उसका कोई भी कार्य संसार के सृजन से पहले व्यवस्थित नहीं किया गया था, और न ही इसकी पहले से ध्यानपूर्वक योजना बनायी गई थी। संसार के सृजन के दो हज़ार वर्षों के बाद, यहोवा ने देखा कि मानवजाति इतनी भ्रष्ट हो गई है कि उसने यह भविष्यवाणी करने के लिए नबी यशायाह के मुख का उपयोग किया कि व्यवस्था के युग का अंत होने के बाद, वह अनुग्रह के युग में मानवजाति को छुटकारा दिलाने के कार्य को करेगा। निस्संदेह, यह यहोवा की योजना थी, किन्तु यह योजना भी उन परिस्थितियों के अनुसार बनाई गयी थी जिसका उसने उस समय अवलोकन किया; उसने निश्चित रूप से आदम का सृजन करने के तुरंत बाद इस बारे में नहीं सोचा। यशायाह ने केवल भविष्यवाणी कही, किन्तु यहोवा ने व्यवस्था के युग के दौरान इस कार्य के लिए अग्रिम तैयारियाँ नहीं की थीं; बल्कि, उसने अनुग्रह के युग के आरंभ में इस कार्य की शुरूआत की, जब दूत यूसुफ के स्वप्न में दिखाई दिया और उसने उसे इस संदेश से प्रबुद्ध किया कि परमेश्वर देहधारी बनेगा, और इस प्रकार उसका देहधारण का कार्य आरंभ हुआ। परमेश्वर ने, जैसा कि लोग कल्पना करते हैं, संसार के सृजन के बाद ही अपने देहधारण के कार्य के लिए तैयारी नहीं की; केवल मनुष्यजाति के विकास के स्तर और शैतान के साथ उसके युद्ध की स्थिति के अनुसार इसका निर्णय लिया गया था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम्हें पता होना चाहिए कि समस्त मानवजाति आज के दिन तक कैसे विकसित हुई' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 149

जब परमेश्वर देह बनता है, तो उसका आत्मा एक मनुष्य पर उतरता है; दूसरे शब्दों में, परमेश्वर का आत्मा खुद को शारीरिक देह से ढँकता है। वह अपना कार्य पृथ्वी पर करने के लिए आता है, न कि अपने साथ विभिन्न प्रतिबंधित कदमों को लाने के लिए; उसका कार्य सर्वथा असीमित होता है। पवित्र आत्मा देह में रह कर जो कार्य करता है वह उसके कार्य के परिणामों के अनुसार ही निर्धारित होता है और वह इन चीज़ों का उपयोग उस समयावधि का निर्धारण करने के लिए करता है जब तक वह शरीर में रहते हुए कार्य को करेगा। पवित्र आत्मा अपने कार्य के प्रत्येक चरण को प्रत्यक्ष रूप से प्रकट करता है; कार्य में आगे बढ़ते हुए वह अपने कार्य को जाँचता है; इसमें इतना कुछ अलौकिक नहीं है जो मानवीय कल्पना की सीमाओं को तान दे। यह यहोवा के द्वारा आकाश और पृथ्वी और अन्य सब वस्तुओं से सृजन के कार्य के समान है; उसने साथ-साथ योजना बनाई और कार्य किया। उसने ज्योति को अंधकार से अलग किया, और सुबह और शाम अस्तित्व में आए—इसमें एक दिन लगा। दूसरे दिन उसने आकाश का सृजन किया, उसमें भी एक दिन लगा, और फिर उसने पृथ्वी, समुद्र और उन सब प्राणियों को बनाया जिन्होंने उन्हें आबाद किया, इसमें भी एक दिन और लगा। यह छठे दिन तक चला, जब परमेश्वर ने मनुष्य का सृजन किया और उसे पृथ्वी पर सभी चीज़ों का प्रबंधन करने दिया। तब सातवें दिन, जब उसने सभी चीज़ों का सृजन कर लिया, तब उसने विश्राम किया। परमेश्वर ने सातवें दिन को आशीष दी और उसे पवित्र दिन के रूप में निर्दिष्ट किया। उसने सभी चीज़ों का सृजन करने के बाद ही इस पवित्र दिन को स्थापित करने का निर्णय लिया, उनका सृजन करने से पहले नहीं। यह कार्य भी अनायास ढंग से किया गया था; सभी चीज़ों का सृजन करने से पहले, उसने छः दिनों में संसार का सृजन करना और सातवें दिन विश्राम करना तय नहीं किया था; यह बिलकुल भी तथ्य के समान नहीं है। उसने ऐसा नहीं कहा, न ही इसकी योजना बनाई थी। उसने किसी भी हाल में यह नहीं कहा कि सभी चीज़ों का सृजन छः दिनों में पूरा किया जाएगा और कि वह सातवें दिन विश्राम करेगा; बल्कि उसे उस समय जो अच्छा लगा उसके अनुसार उसने सृजन किया। एक बार जब उसने सभी चीज़ों का सृजन समाप्त कर लिया, तो पहले ही छठा दिन हो चुका था। यदि यह पाँचवाँ दिन रहा होता जब उसने सभी चीज़ों का सृजन करना समाप्त किया होता, तो वह छठे दिन को पवित्र दिन के रूप में निर्दिष्ट किया। हालाँकि उसने सभी चीज़ों का सृजन करना छः दिनों में समाप्त किया, और इसलिए सातवाँ दिन पवित्र दिन बन गया, जिसे आज के दिन तक भी आगे बढ़ाया गया है। इसलिए, उसका वर्तमान कार्य उसी तरीके से संपन्न किया जाता है। वह तुम लोगों की परिस्थितियों के अनुसार तुम लोगों की आवश्यकताओं की आपूर्ति करता है। अर्थात्, पवित्रात्मा लोगों की परिस्थितियों के अनुसार बोलता और कार्य करता है। पवित्रात्मा सब पर निगरानी रखता है और किसी भी समय, किसी भी स्थान में कार्य करता है। जो कुछ मैं करता हूँ, कहता हूँ, तुम लोगों पर रखता हूँ और तुम लोगों को प्रदान करता हूँ, बिना अपवाद के यह वह है जिसकी तुम लोगों को आवश्यकता है। इसीलिए मेरा कोई भी कार्य वास्तविकता से अलग नहीं है; वह सब वास्तविक हैं, क्योंकि तुम सब लोगों को पता है कि "परमेश्वर का आत्मा सब पर निगरानी रखता है।" यदि यह सब समय से पहले तय किया गया होता, तो क्या यह बहुत अधिक स्पष्ट और निश्चित नहीं होता? ऐसा लगता है मानो तुम सोचते हो कि परमेश्वर ने पूरे छः सहस्राब्दि तक की योजना बना ली और तब मानवजाति को विद्रोही, प्रतिरोधी, धूर्त और चालाक, भ्रष्टता भरी देह वाली, शैतानी स्वभाव, आँखों की वासना और अपने स्वयं के भोग-विलासों वाली होने के रूप में पूर्वनियत किया। इसमें से कुछ भी परमेश्वर द्वारा पूर्वनियत नहीं था, बल्कि यह सब कुछ शैतान की भ्रष्टता के कारण हुआ था। कुछ लोग कहेंगे, "क्या शैतान भी परमेश्वर की पकड़ में नहीं था? परमेश्वर ने पूर्वनियत किया था कि शैतान मनुष्य को इस तरह से भ्रष्ट करेगा, और उसके बाद परमेश्वर ने मनुष्यों के बीच अपना कार्य संपन्न किया।" क्या परमेश्वर वास्तव में मानवजाति को भ्रष्ट करने के लिए शैतान को पूर्वनियत करेगा? परमेश्वर इंसान के सामान्य रूप जीने के लिए तो अत्यधिक उत्सुक है, तो क्या वह इंसान के जीवन में हस्तक्षेप करेगा? अगर ऐसा है तो क्या शैतान को परास्त करना और मानवजाति को बचाना एक व्यर्थ प्रयास नहीं होगा? मानवजाति की विद्रोहीशीलता किस प्रकार से पूर्वनियत की जा सकती थी? यह कुछ ऐसा ह जो शैतान के हस्तक्षेप के कारण हुआ है, तो यह परमेश्वर के द्वारा कैसे पूर्वनियत किया जा सकता था? जिस प्रकार तुम शैतान के परमेश्वर की पकड़ में होने को समझते हो और वह उस प्रकार से शैतान के परमेश्वर की पकड़ में होने में से बिलकुल अलग है जिसके बारे में मैं बोलता हूँ। तुम लोगों के कथनों के अनुसार कि "परमेश्वर सर्वशक्तिमान है, और शैतान उसके हाथों में है," शैतान उसके साथ कभी विश्वासघात नहीं कर सकता। क्या तुमने यह नहीं कहा कि परमेश्वर सर्वशक्तिमान है? तुम लोगों का ज्ञान अत्यधिक अमूर्त है, और यह वास्तविकता से अछूता है; मनुष्य कभी परमेश्वर के विचार की थाह नहीं पा सकता है, न ही कभी मनुष्य परमेश्वर की बुद्धि समझ सकता है! परमेश्वर सर्वशक्तिमान है; यह बिल्कुल भी गलत नहीं है। प्रधान स्वर्गदूत ने परमेश्वर के साथ विश्वासघात किया, क्योंकि परमेश्वर ने आरंभ में उसे अधिकार का एक भाग दिया था। निस्संदेह, यह घटना अनपेक्षित घटना थी, जैसे कि हव्वा का साँप के बहकावे में आना। हालाँकि, इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि शैतान कैसे विश्वासघात करता है, वह अब भी उतना सर्वशक्तिमान नहीं है जितना कि परमेश्वर है। जैसा कि तुम लोगों ने कहा है, शैतान महज शक्तिमान है; वह चाहे जो भी करे, परमेश्वर का अधिकार उसे सदैव पराजित करेगा। "परमेश्वर सर्वशक्तिमान है, और शैतान उसके हाथों में है," इस कथन का यही वास्तविक अर्थ है। इसलिए, शैतान के साथ युद्ध अवश्य एक बार में एक कदम के साथ संपन्न होना चाहिए; इसके अलावा, वह शैतान की चालबाजियों के उत्तर में अपने कार्य की योजना बनाता है। कहने का अर्थ है कि वर्तमान युग के अनुसार, वह इंसान तक उद्धार लाता है और अपनी बुद्धि एवं सर्वशक्तिमत्ता को प्रकट करता है। इसी तरह, अंत के दिनों का कार्य अनुग्रह के युग से पहले पूर्व नियत नहीं किया गया था; पूर्वनियति का काम इस प्रकार इतने व्यवस्थित ढंग से नहीं जाता : सबसे पहले, मनुष्य के बाहरी स्वभाव में परिवर्तन करो; दूसरा, मनुष्य को परमेश्वर की ताड़ना और परीक्षा के अधीन करो, तीसरा मनुष्य को मृत्यु की परीक्षा से गुज़ारो, चौथा मनुष्य को परमेश्वर से प्रेम करने के समय का अनुभव करवाओ, और सृजित प्राणी के संकल्प को व्यक्त करवाओ, पाँचवाँ, मनुष्य को परमेश्वर की इच्छा देखने दो, और परमेश्वर को पूर्णतः जानने दो, और अंततः मनुष्य को संपूर्ण बनाओ। उसने इन सब चीज़ों की योजना अनुग्रह के युग के दौरान नहीं बनाई; बल्कि उसने वर्तमान युग में इन बातों की योजना बनाना आरंभ किया। शैतान कार्य कर रहा है, वैसे ही परमेश्वर भी कार्य कर रहा है। शैतान अपने भ्रष्ट स्वभाव को व्यक्त करता है, जबकि परमेश्वर प्रत्यक्ष रूप से बोलता है और तात्विक चीज़ों को प्रकट करता है। आज यही कार्य किया जा रहा है, और कार्य करने का यही सिद्धांत बहुत पहले संसार के सृजन के बाद, उपयोग में लाया गया था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम्हें पता होना चाहिए कि समस्त मानवजाति आज के दिन तक कैसे विकसित हुई' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 150

पहले, परमेश्वर ने आदम और हव्वा का सृजन किया, और उसने साँप का भी सृजन किया। सभी चीज़ों में साँप सर्वाधिक विषैला था; उसकी देह में विष था, और शैतान ने उस विष का लाभ उठाने के लिए उपयोग किया। यह साँप ही था जिसने पाप करने के लिए हव्वा को प्रलोभित किया। हव्वा के बाद आदम ने पाप किया, और तब वे दोनों अच्छे और बुरे के बीच भेद करने में समर्थ हो गए थे। यदि यहोवा जानता था कि साँप हव्वा को प्रलोभित करेगा और हव्वा आदम को प्रलोभित करेगी, तो उसने उन सबको एक ही वाटिका के भीतर क्यों रखा? यदि वह इन चीज़ों का पूर्वानुमान करने में समर्थ था, तो उसने क्यों साँप की रचना की और उसे अदन की वाटिका के भीतर रखा? अदन की वाटिका में अच्छे और बुरे के ज्ञान के वृक्ष का फल क्यों था? क्या वह चाहता था कि वे उस फल को खाएँ? जब यहोवा आया, तब न आदम को और न हव्वा को उसका सामना करने का साहस हुआ, और तब जाकर यहोवा को पता चला कि उन्होंने अच्छे और बुरे के ज्ञान के वृक्ष का फल खा लिया है और वे साँप के छल-कपट का शिकार बन गए हैं। अंत में, उसने साँप को शाप दिया, और उसने आदम और हव्वा को भी शाप दिया। जब उन दोनों ने उस वृक्ष के फल को खाया, तब यहोवा को बिल्कुल भी पता नहीं था कि वे ऐसा कर रहे हैं। मानवजाति दुष्ट बनने और यौन रूप से स्वच्छंद होने की सीमा तक भ्रष्ट हो गयी, यहाँ तक कि इस स्थिति तक कि उन्होंने जिन चीज़ों को अपने हृदयों में आश्रय दिया हुआ था वे भी बुरी और अधार्मिक थीं; वे सब गंदगियाँ थीं। इसलिए, यहोवा मानवजाति का सृजन करके पछताया। उसके बाद उसने संसार को जलप्रलय के द्वारा नष्ट करने का अपना कार्य संपन्न किया, जिसमें नूह और उसके पुत्र बच गए। कुछ चीज़ें वास्तव में इतनी अधिक उन्नत और अलौकिक नहीं होती हैं जितनी लोग कल्पना कर सकते हैं। कुछ लोग पूछते हैं, "चूँकि परमेश्वर जानता था कि प्रधान स्वर्गदूत उसके साथ विश्वासघात करेगा, तो परमेश्वर ने उसका सृजन क्यों किया?" तथ्य ये हैं : पृथ्वी के अस्तित्व में होने से पहले, प्रधान स्वर्गदूत, स्वर्ग के स्वर्गदूतों में सबसे महान था। स्वर्ग के सभी स्वर्गदूतों पर उसका अधिकार था; और यह अधिकार उसे परमेश्वर ने दिया था। परमेश्वर के अपवाद के साथ, वह स्वर्ग के स्वर्गदूतों में सर्वोच्च था। बाद में जब परमेश्वर ने मानवजाति का सृजन किया तब प्रधान स्वर्गदूत ने पृथ्वी पर परमेश्वर के विरुद्ध और भी बड़ा विश्वासघात किया। मैं इसलिए कहता हूँ कि उसने परमेश्वर के साथ विश्वासघात किया क्योंकि वह मानवजाति का प्रबंधन करना और परमेश्वर के अधिकार से आगे बढ़ना चाहता था। यह प्रधान स्वर्गदूत ही था जिसने हव्वा को पाप करने के लिए प्रलोभित किया; उसने ऐसा इसलिए किया क्योंकि वह पृथ्वी पर अपना राज्य स्थापित करना और मानवजाति द्वारा परमेश्वर से मुख फेरवा कर परमेश्वर के बजाय अपना आज्ञापालन करवाना चाहता था। उसने देखा कि बहुत सी चीज़ें हैं उसका आज्ञापालन कर सकती थीं—स्वर्गदूत उसकी आज्ञा मान सकते थे, ऐसे ही पृथ्वी पर लोग भी उसकी आज्ञा मान सकते थे। पृथ्वी पर पक्षी और पशु, वृक्ष और जंगल, पर्वत और नदियाँ और सभी वस्तुएँ मनुष्य—अर्थात, आदम और हव्वा—की देखभाल के अधीन थे जबकि आदम और हव्वा प्रधान स्वर्गदूत का आज्ञापालन करते थे। इसलिए प्रधान स्वर्गदूत परमेश्वर के अधिकार से अधिक बढ़कर होना और परमेश्वर के साथ विश्वासघात करना चाहता था। बाद में उसने परमेश्वर के साथ विश्वासघात करने के लिए बहुत से स्वर्गदूतों की अगुआई की, जो बाद में विभिन्न अशुद्ध आत्माएँ बन गए। क्या आज के दिन तक मानवजाति का विकास प्रधान स्वर्गदूत की भ्रष्टता के कारण नहीं है? मानवजाति जैसी आज है केवल इसलिए है क्योंकि प्रधान स्वर्गदूत ने परमेश्वर के साथ विश्वासघात किया और मानवजाति को भ्रष्ट कर दिया। यह कदम-दर-कदम कार्य कहीं भी लगभग उतना अमूर्त और आसान नहीं है जैसा लोग कल्पना करते हैं। शैतान ने एक कारणवश विश्वासघात किया, फिर भी लोग इतनी आसान-सी बात को समझने में असमर्थ हैं। जिस परमेश्वर ने स्वर्ग और पृथ्वी और सब वस्तुओं का सृजन किया, उसने क्यों शैतान का भी सृजन किया? चूँकि परमेश्वर शैतान से बहुत अधिक घृणा करता है, और शैतान परमेश्वर का शत्रु है, तो परमेश्वर ने उसका सृजन क्यों किया? शैतान का सृजन करके, क्या वह एक शत्रु का सृजन नहीं कर रहा था? परमेश्वर ने वास्तव में एक शत्रु का सृजन नहीं किया था; बल्कि उसने एक स्वर्गदूत का सृजन किया था, और बाद में इस स्वर्गदूत ने परमेश्वर के साथ विश्वासघात किया। इसकी हैसियत इतनी बढ़ गयी थी कि उसने परमेश्वर के साथ विश्वासघात करने की इच्छा की। कहा जा सकता है कि यह मात्र एक संयोग था, परंतु यह अपरिहार्य भी था। यह उस बात के समान है कि कैसे कोई व्यक्ति एक निश्चित आयु पर अपरिहार्य रूप से मरेगा; चीज़ें उस निश्चित स्तर तक विकसित हो चुकी हैं। कुछ ऐसे बेतुके लोग हैं, जो कहते हैं : "जब शैतान तुम्हारा शत्रु है, तो तुमने उसका सृजन क्यों किया? क्या तुम नहीं जानते थे कि प्रधान स्वर्गदूत तुम्हारे साथ विश्वासघात करेगा? क्या तुम अनंतकाल से अनंतकाल में नहीं झाँक सकते हो? क्या तुम उसका स्वभाव नहीं जानते हो? चूँकि तुम्हें स्पष्ट रूप से पता था कि वह तुम्हारे साथ विश्वासघात करेगा, तो तुमने उसे प्रधान स्वर्गदूत क्यों बनाया? न सिर्फ़ उसने तुम्हारे साथ विश्वासघात किया, बल्कि उसने कितने ही स्वर्गदूतों की अगुआई भी की और मनुष्यजाति को भ्रष्ट करने के लिए नश्वरों के संसार में उतरा; आज के दिन तक, तुम अपनी छः—हजार—वर्षीय प्रबंधन योजना को पूरा करने में असमर्थ रहे हो।" क्या वे शब्द सही हैं? जब तुम इस तरीके से सोचते हो, तो क्या तुम अपने आपको आवश्यकता से अधिक तकलीफों में नहीं डाल रहे हो? कुछ अन्य लोग हैं जो कहते हैं : "यदि शैतान ने वर्तमान समय तक मानवजाति को भ्रष्ट नहीं किया होता, तो परमेश्वर ने मानवजाति को इस प्रकार उद्धार नहीं दिया होता। इस प्रकार, परमेश्वर की बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता अदृश्य हो गए होते; उसकी बुद्धि कहाँ अभिव्यक्त होती? इसलिए परमेश्वर ने शैतान के लिये मानवजाति का सृजन किया; ताकि भविष्य में परमेश्वर अपनी सर्वशक्तिमत्ता प्रकट कर सके—अन्यथा मनुष्य परमेश्वर की बुद्धि को कैसे खोज सकता था? यदि मनुष्य ने परमेश्वर का प्रतिरोध नहीं किया और उसके प्रति विद्रोह नहीं किया होता, तो परमेश्वर की क्रियाओं की अभिव्यक्ति अनावश्यक होती। यदि सम्पूर्ण सृष्टि उसकी आराधना और उसका आज्ञापालन करे, तो परमेश्वर के पास करने के लिए कोई कार्य नहीं होगा।" यह वास्तविकता से और भी दूर है, क्योंकि परमेश्वर में कुछ भी गंदा नहीं है, और इसलिए वह गंदगी का सृजन नहीं कर सकता है। वह अब अपने कार्यों को केवल इसलिए प्रकट करता है ताकि अपने शत्रु को परास्त करे, अपने द्वारा सृजित मानव को बचाये, दुष्टात्माओं और शैतान को पराजित करे, जो उससे घृणा करते हैं, विश्वासघात करते हैं, और उसका प्रतिरोध करते हैं, जो बिल्कुल आरंभ में उसके अधिकार क्षेत्र के अधीन थे और उसी से संबंधित थे। वह इन दुष्टात्माओं को पराजित करना चाहता है और ऐसा करने में वह सभी चीज़ों पर अपनी सर्वशक्तिमत्ता को प्रकट करता है। मानवजाति और पृथ्वी पर सभी वस्तुएँ अब शैतान के अधिकार क्षेत्र के अधीन हैं और दुष्ट के अधिकार क्षेत्र के अधीन हैं। परमेश्वर अपने कार्यों को सभी चीज़ों के ऊपर प्रकट करना चाहता है ताकि लोग उसे जान सकें, और परिणामस्वरूप शैतान को पराजित और परमेश्वर के शत्रुओं को सर्वथा परास्त कर सकें। उसके इस कार्य की समग्रता उसके कार्यों के प्रकट होने के माध्यम से संपन्न होती है। उसकी सारी सृष्टि शैतान के अधिकार क्षेत्र में है, और इसलिए वह उन पर अपनी सर्वशक्तिमत्ता प्रकट करना चाहता है, और परिणामस्वरूप शैतान को पराजित करना चाहता है। यदि कोई शैतान नहीं होता, तो उसे अपने कार्यों को प्रकट करने की आवश्यकता नहीं होती। यदि शैतान का उत्पीड़न नहीं होता, तो परमेश्वर ने मानवजाति का सृजन किया होता और अदन की वाटिका में उनके रहने के लिए अगुवाई की होती। उसने शैतान के विश्वासघात से पहले स्वर्गदूतों या प्रधान स्वर्गदूत के लिए अपने सभी क्रिया-कलापों को प्रकट क्यों नहीं किया? यदि स्वर्गदूतों और प्रधान स्वर्गदूत ने परमेश्वर को जान लिया होता और उसके अधीन हो गए होते, तो उसने कार्य के उन निरर्थक क्रिया-कलापों को नहीं किया होता। शैतान और दुष्टात्माओं के अस्तित्व की वजह से, मनुष्य भी परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं और विद्रोही स्वभाव से लबालब भरे हुए हैं। इसलिए परमेश्वर अपने क्रिया-कलापों को प्रकट करना चाहता है। चूंकि वह शैतान से युद्ध करना चाहता है, इसलिए शैतान को पराजित करने के लिए उसे अवश्य अपने अधिकार का उपयोग करना चाहिए और अपने सभी क्रिया-कलापों का उपयोग करना चाहिए; इस तरह से, उद्धार का कार्य जिसे वह मनुष्यों के बीच संपन्न करता है, वह उन्हें उसकी बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता को देखने देगा। आज परमेश्वर जो कार्य करता है, वह अर्थपूर्ण है, और किसी भी तरह से वैसा नहीं है, जैसा कि कुछ लोग कहते हैं: "क्या तुम जो कार्य करते हो वह विरोधाभासी नहीं है? क्या कार्य का यह सिलसिला अपने आप को थकाने के लिए किया गया काम मात्र नहीं है? तुमने शैतान का सृजन किया, फिर उसे तुम्हारे साथ विश्वासघात करने और तुम्हारा प्रतिरोध करने दिया। तुमने मानवजाति का सृजन किया, और फिर उसे शैतान को सौंप दिया, और तुमने आदम और हव्वा को प्रलोभित होने दिया। चूँकि तुमने यह सब कुछ जानबूझकर किया है, तो तुम मानवजाति से नफ़रत क्यों करते हो? तुम शैतान से नफ़रत क्यों करते हो? क्या ये चीजें तुम्हारे स्वयं के द्वारा नहीं बनायी गई हैं? इसमें तुम्हारे लिए घृणा करने वाली क्या बात है?" बहुत से बेहूदा लोग ऐसा कहते हैं। वे परमेश्वर से प्रेम करना चाहते हैं, परन्तु वे अपने हृदयों की गहराई में परमेश्वर के बारे में शिकायत करते हैं। कितनी विरोधाभासी बात है! तुम सत्य को नहीं समझते हो, तुम्हारे बहुत से अलौकिक विचार हैं, और तुम यहाँ तक दावा करते हो कि परमेश्वर ने गलती की है—तुम कितने बेहूदा हो! यह तुम हो जो सत्य के साथ हेराफेरी करते हो; बात यह नहीं है कि परमेश्वर ने गलती की है! कुछ लोग तो बार-बार शिकायत भी करते हैं: "यह तुम ही थे जिसने शैतान का सृजन किया, और तुमने ही शैतान को मनुष्यों के बीच भेज दिया और उन्हें उसके हवाले कर दिया। मनुष्यों के एक बार शैतानी स्वभाव को धारण कर लेने एक बाद, तुमने उन्हें क्षमा नहीं किया; इसके विपरीत, तुमने उनसे एक हद तक नफ़रत की। आरंभ में तुमने मनुष्य को एक हद तक प्रेम किया और अब तुम मानवजाति से नफरत करते हो। यह तुम ही हो जो मानवजाति से नफ़रत करते हो लेकिन तुम वह भी हो जिसने मानवजाति से प्रेम किया है। आखिर ये क्या हो रहा है? क्या यह एक विरोधाभास नहीं हैं?" इस बात से फर्क नहीं पड़ता है कि तुम लोग इसे कैसे देखते हो, स्वर्ग में यही हुआ था; प्रधान स्वर्गदूत ने इसी तरीके से परमेश्वर के साथ विश्वासघात किया, और मानवजाति को इसी प्रकार भ्रष्ट किया गया, और आज के दिन मनुष्य ऐसे ही चलता रहा है। इस बात से फर्क नहीं पड़ता है कि तुम इसे किन शब्दों में व्यक्त करते हो, पूरी कहानी यही है। हालाँकि, तुम लोगों को यह अवश्य समझना चाहिए कि परमेश्वर वर्तमान में जो कार्य करता है, वह तुम लोगों को बचाने के लिए, और शैतान को पराजित करने के लिए करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम्हें पता होना चाहिए कि समस्त मानवजाति आज के दिन तक कैसे विकसित हुई' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 151

परमेश्वर लोगों के प्रबंधन का उपयोग शैतान को पराजित करने के लिए करता है। लोगों को भ्रष्ट करके शैतान लोगों के भाग्य का अंत कर देता है और परमेश्वर के कार्य में परेशानी उत्पन्न करता है। दूसरी ओर, परमेश्वर का कार्य मनुष्यों का उद्धार करना है। परमेश्वर के कार्य का कौन-सा कदम मानवजाति को बचाने के अभिप्राय से नहीं है? कौन-सा कदम लोगों को स्वच्छ बनाने, उनसे धार्मिक रूप से आचरण करवाने और उनसे ऐसी छवि जिलाने के लिए नहीं है जिससे प्रेम किया जा सके? शैतान, हालाँकि, ऐसा नहीं करता है। वह मानवजाति को भ्रष्ट करता है; मानवजाति को भ्रष्ट करने के अपने कार्य को सारे ब्रह्माण्ड में निरंतर करता रहता है। निस्संदेह, परमेश्वर भी अपना स्वयं का कार्य करता है। वह शैतान की ओर जरा भी ध्यान नहीं देता है। इससे फर्क नहीं पड़ता कि शैतान के पास कितना अधिकार है, उसे यह अधिकार परमेश्वर द्वारा ही दिया गया था; परमेश्वर ने उसे अपना पूरा अधिकार नहीं दे दिया था, और इसलिए वह चाहे जो कुछ करे, वह परमेश्वर से आगे नहीं बढ़ सकता है और सदैव परमेश्वर की पकड़ में है। परमेश्वर ने स्वर्ग में रहने के समय अपने क्रिया-कलापों को प्रकट नहीं किया। उसने शैतान को स्वर्गदूतों के ऊपर नियंत्रण प्रयोग करने की अनुमति देने के लिए उसे अपने अधिकार में से मात्र कुछ हिस्सा ही दिया। इसलिए वह चाहे जो कुछ करे, वह परमेश्वर के अधिकार से बढ़कर नहीं हो सकता है, क्योंकि परमेश्वर ने मूल रूप से उसे जो अधिकार दिया है वह सीमित है। जब परमेश्वर कार्य करता है, तो शैतान बाधा उत्पन्न करता है। अंत के दिनों में, उसकी बाधाएँ समाप्त हो जाएंगी; उसी तरह, परमेश्वर का कार्य भी पूरा हो जाएगा, और परमेश्वर जिस प्रकार के व्यक्ति को संपूर्ण बनाना चाहता है वह संपूर्ण बना दिया जाएगा। परमेश्वर लोगों को सकारात्मक रूप से निर्देशित करता है; उसका जीवन जीवित जल है, अगाध और असीम है। शैतान ने मनुष्य को एक हद तक भ्रष्ट किया है; अंत में, जीवन का जीवित जल मनुष्य को संपूर्ण बनाएगा, और शैतान के लिए हस्तक्षेप करना और उसका कार्य करना असंभव हो जायेगा। इस प्रकार, परमेश्वर इन लोगों को पूर्णतः प्राप्त करने में समर्थ हो जाएगा। शैतान अब भी इसे मानने से मना करता है; वह लगातार स्वयं को परमेश्वर के विरोध में खड़ा करता है, परंतु परमेश्वर उस पर कोई ध्यान नहीं देता है। परमेश्वर ने कहा है, "मैं शैतान की सभी अँधेरी शक्तियों के ऊपर और उसके सभी अँधेरे प्रभावों के ऊपर विजेता बनूँगा।" यही वह कार्य है जो अब देह में अवश्य किया जाना चाहिए, और यही देहधारण को महत्वपूर्ण बनाता है : अर्थात अंत के दिनों में शैतान को पराजित करने के चरण को पूरा करना और शैतान से जुड़ी सभी चीज़ों को मिटाना। परमेश्वर की शैतान पर विजय अपरिहार्य है! वास्तव में शैतान बहुत पहले ही असफल हो चुका है। जब बड़े लाल अजगर के पूरे देश में सुसमाचार फैलने लगा, अर्थात्, जब देहधारी परमेश्वर ने कार्य करना आरंभ किया, और यह कार्य गति पकड़ने लगा, तो शैतान बुरी तरह परास्त हो गया था, क्योंकि देहधारण का मूल उद्देश्य ही शैतान को पराजित करना था। जैसे ही शैतान ने देखा कि परमेश्वर एक बार फिर से देह बन गया और उसने अपना कार्य करना भी आरंभ कर दिया, जिसे कोई भी शक्ति रोक नहीं सकती, तो जब उसने इस कार्य को देखा, तो वह अवाक रह गया तथा कोई और बदमाशी करने का साहस नहीं किया। पहले-पहल तो शैतान ने सोचा कि उसके पास भी प्रचुर बुद्धि है, और उसने परमेश्वर के कार्य में बाधा और परेशानियाँ डालीं; लेकिन, उसने यह आशा नहीं की थी कि परमेश्वर एक बार फिर देह बन जाएगा, या अपने कार्य में, परमेश्वर शैतान की विद्रोहशीलता को मानवजाति के लिए प्रकटन और न्याय के रूप में काम में लायेगा, और परिणामस्वरूप मानवजाति को जीतगा और शैतान को पराजित करेगा। परमेश्वर शैतान की अपेक्षा अधिक बुद्धिमान है, और उसका कार्य शैतान के कार्य से बहुत बढ़कर है। इसलिए, जैसा मैंने पहले कहा था : "मैं जिस कार्य को करता हूँ वह शैतान की चालबाजियों के प्रत्युत्तर में किया जाता है; अंत में, मैं अपनी सर्वशक्तिमत्ता और शैतान की सामर्थ्यहीनता को प्रकट करूँगा।" परमेश्वर अपना कार्य सामने करेगा, तो शैतान पीछे छूट जाएगा, जब तक कि अंत में वह अंततः नष्ट नहीं हो जाता है—उसे पता भी नहीं चलेगा कि उस पर चोट किसने की! कुचले और चूर—चूर कर दिये जाने के बाद ही उसे सत्य का ज्ञान होगा; उस समय तक उसे पहले से ही आग की झील में जला दिया गया होगा। तब क्या वह पूरी तरह से आश्वस्त नहीं हो जाएगा? क्योंकि उसके पास उपयोग में लाने के लिए और कोई योजनाएँ नहीं होंगी!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम्हें पता होना चाहिए कि समस्त मानवजाति आज के दिन तक कैसे विकसित हुई' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 152

मनुष्य के बीच परमेश्वर का कार्य मनुष्य से अवियोज्य है, क्योंकि मनुष्य इस कार्य का लक्ष्य है, और परमेश्वर के द्वारा रचा गया एकमात्र ऐसा प्राणी है जो परमेश्वर की गवाही दे सकता है। मनुष्य का जीवन और मनुष्य के समस्त क्रियाकलाप परमेश्वर से अवियोज्य हैं, और उन सब को परमेश्वर के हाथों के द्वारा नियन्त्रित किया जाता है, और यहाँ तक कि यह भी कहा जा सकता है कि कोई भी व्यक्ति परमेश्वर से स्वाधीन होकर अस्तित्व में नहीं रह सकता है। कोई भी इसे नकार नहीं सकता है, क्योंकि यह एक तथ्य है। वह सब कुछ जो परमेश्वर करता है मनुष्यजाति के लाभ के लिए है, और शैतान के षडयन्त्रों की ओर निर्देशित है। वह सब कुछ जिसकी मनुष्य को आवश्यकता होती है परमेश्वर की ओर से आता है, और परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है। इस प्रकार, मनुष्य परमेश्वर से अलग होने में असमर्थ है। इसके अतिरिक्त, परमेश्वर का मनुष्य से अलग होने का कभी भी कोई इरादा नहीं था। वह कार्य जो परमेश्वर करता है वह सम्पूर्ण मनुष्यजाति के वास्ते है, और उसके विचार हमेशा उदार होते हैं। तो मनुष्य के लिए, परमेश्वर का कार्य और परमेश्वर के विचार (अर्थात्, परमेश्वर की इच्छा) दोनों ही ऐसे "दर्शन" हैं जिन्हें मनुष्य को जानना चाहिए। ऐसे दर्शन परमेश्वर के प्रबंधन भी हैं, और यह ऐसा कार्य है जिसे करने में मनुष्य अक्षम है। इसी बीच, वे अपेक्षाएँ जिन्हें परमेश्वर अपने कार्य के दौरान मनुष्य से करता है मनुष्य का "अभ्यास" कहलाती हैं। दर्शन स्वयं परमेश्वर के कार्य हैं, या मनुष्यजाति के लिए उसकी इच्छा हैं या उसके कार्य के लक्ष्य और महत्व हैं। दर्शनों को प्रबंधन का एक हिस्सा भी कहा जा सकता है, क्योंकि यह प्रबंधन परमेश्वर का कार्य है, और मनुष्य की ओर निर्देशित है, जिसका अभिप्राय है कि यह वह कार्य है जिसे परमेश्वर मनुष्य के बीच करता है। यह कार्य वह प्रमाण और वह मार्ग है जिसके माध्यम से मनुष्य को परमेश्वर का पता चलता है, और यह मनुष्य के लिए अत्यधिक महत्व का है। परमेश्वर के कार्य के ज्ञान पर ध्यान देने के बजाए, यदि लोग केवल परमेश्वर में विश्वास के सिद्धान्तों पर, या तुच्छ महत्वहीन ब्योरों पर ही ध्यान देते हैं, तो वे बस परमेश्वर को नहीं जानेंगे, और इसके अतिरिक्त, वे परमेश्वर के हृदय के समान विचार वाले नहीं होंगे। परमेश्वर का कार्य परमेश्वर के बारे में मनुष्य के ज्ञान के लिए अत्यधिक सहायक है, और दर्शन कहलाता है। ये दर्शन परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर की इच्छा, और परमेश्वर के कार्य के लक्ष्य और महत्व हैं; वे सब मनुष्य के लाभ के लिए हैं। अभ्यास उस ओर संकेत करता है जिसे मनुष्य के द्वारा किया जाना चाहिए, जिसे उन प्राणियों द्वारा किया जाना चाहिए जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं। यह मनुष्य का कर्तव्य भी है। जो मनुष्य को करना चाहिए वह कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसे मनुष्य के द्वारा बिलकुल आरम्भ से ही समझ लिया गया था, बल्कि ये वे अपेक्षाएँ हैं जो परमेश्वर अपने कार्य के दौरान मनुष्य से करता है। जैसे-जैसे परमेश्वर कार्य करता जाता है ये अपेक्षाएँ धीरे-धीरे अधिक गहरी तथा अधिक उन्नत होती जाती हैं। उदाहरण के लिए, व्यवस्था के युग के दौरान, मनुष्य को व्यवस्था का पालन करना था, और अनुग्रह के युग के दौरान, मनुष्य को सलीब को सहना था। राज्य का युग भिन्न हैः मनुष्य से की गई अपेक्षाएँ व्यवस्था के युग और अनुग्रह के युग के दौरान की गई अपेक्षाओं की तुलना में कहीं अधिक ऊँची हैं। जैसे-जैसे दर्शन अधिक उन्नत होते जाते हैं, मनुष्य से की गई अपेक्षाएँ भी और अधिक उन्नत होती जाती हैं, तथा सदा अधिक स्पष्ट तथा अधिक वास्तविक होती जाती हैं। इसी प्रकार, दर्शन भी उत्तरोत्तर वास्तविक होते जाते हैं। ये अनेक वास्तविक दर्शन न केवल परमेश्वर के प्रति मनुष्य की आज्ञाकारिता के लिए सहायक हैं, बल्कि इसके अतिरिक्त, परमेश्वर के बारे में उसके ज्ञान के लिए भी सहायक हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 153

पूर्ववर्ती युगों की तुलना में, राज्य के युग के दौरान परमेश्वर का कार्य अधिक व्यावहारिक है, मनुष्य के सार और उसके स्वभाव में परिवर्तनों पर अधिक निर्देशित है, और उन सभी के लिए स्वयं परमेश्वर की गवाही देने हेतु अधिक समर्थ है जो उसका अनुसरण करते हैं। दूसरे शब्दों में, जब राज्य के युग के दौरान परमेश्वर कार्य करता है, तो वह अतीत के किसी भी समय की तुलना में मनुष्य पर स्वयं को अधिक प्रकट करता है, जिसका अर्थ है कि वे दर्शन जो मनुष्य को जान लेने चाहिए किसी भी पूर्ववर्ती युग की तुलना में कहीं अधिक ऊँचे हैं। क्योंकि मनुष्य के बीच परमेश्वर का कार्य अभूतपूर्व क्षेत्र में प्रवेश कर चुका है, इसलिए राज्य के युग के दौरान मनुष्य के द्वारा जाने गए दर्शन सम्पूर्ण प्रबंधन कार्य के बीच सर्वोच्च हैं। परमेश्वर का कार्य अभूतपूर्व क्षेत्र में प्रवेश कर चुका है, और इसलिए मनुष्य के द्वारा ज्ञात किए जाने वाले दर्शन सभी दर्शनों में सर्वोच्च बन गए हैं, और इसके परिणामस्वरूप मनुष्य का अभ्यास किसी भी पूर्ववर्ती युग की तुलना में उच्चतर है, क्योंकि मनुष्य का अभ्यास दर्शनों के साथ कदम मिलाते हुए बदलता जाता है, और दर्शनों की परिपूर्णता मनुष्य से की गई अपेक्षाओं की पूर्णता को भी चिह्नित करती है। जैसे ही परमेश्वर का सम्पूर्ण प्रबंधन रुक जाता है, वैसे ही मनुष्य का अभ्यास भी रुक जाता है, और परमेश्वर के कार्य के बिना, मनुष्य के पास अतीत के समयों के सिद्धान्त का पालन करने के सिवाए कोई विकल्प नहीं होगा, या अन्यथा मनुष्य के पास बस वापस मुड़ने की कोई जगह नहीं होगी। नए दर्शनों के बिना, मनुष्य के द्वारा कोई नया अभ्यास नहीं किया जाएगा; सम्पूर्ण दर्शनों के बिना, मनुष्य के द्वारा कोई परिपूर्ण अभ्यास नहीं किया जाएगा; उच्चतर दर्शनों के बिना, मनुष्य के द्वारा कोई उच्चतर अभ्यास नहीं किया जाएगा। परमेश्वर के पदचिह्नों के साथ-साथ मनुष्य का अभ्यास बदलता जाता है, और, उसी प्रकार, परमेश्वर के कार्य के साथ-साथ मनुष्य का ज्ञान और अनुभव भी बदलता जाता है। इस बात की परवाह किए बिना कि मनुष्य कितना सक्षम है, वह तब भी परमेश्वर से अवियोज्य है, और यदि परमेश्वर एक क्षण के लिए भी कार्य करना बंद कर दे, तो मनुष्य तुरन्त ही उसके कोप से मर जाएगा। मनुष्य के पास घमण्ड करने के लिए कुछ भी नहीं है, क्योंकि आज मनुष्य का ज्ञान कितना ही ऊँचा क्यों न हो, उसके अनुभव कितने ही गहन क्यों न हों, क्योंकि वह परमेश्वर के कार्य से अवियोज्य है—क्योंकि मनुष्य का अभ्यास, और जो उसे परमेश्वर के प्रति अपने विश्वास में खोजना चाहिए, वे दर्शनों से अवियोज्य हैं। परमेश्वर के कार्य के प्रत्येक उदाहरण में ऐसे दर्शन हैं जिन्हें मनुष्य को जानना चाहिए, और इनके बाद, मनुष्य से उचित अपेक्षाएँ की जाती हैं। बुनियादी रूप में इन दर्शनों के बिना, मनुष्य न अभ्यास में समर्थ होगा, और न ही मनुष्य दृढ़तापूर्वक परमेश्वर का अनुसरण करने में समर्थ होगा। यदि मनुष्य परमेश्वर को नहीं जानता है या परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझता, तो मनुष्य जो कुछ भी करता है वह व्यर्थ है, और परमेश्वर के द्वारा अनुमोदित किए जाने के योग्य नहीं है। भले ही मनुष्य की प्रतिभाएँ कितनी ही समृद्ध क्यों न हों, वह तब भी परमेश्वर के कार्य तथा परमेश्वर के मार्गदर्शन से अवियोज्य है। भले ही मनुष्य के कार्य कितने ही अच्छे या अनेक क्यों न हों, क्योंकि वे तब भी परमेश्वर के कार्य का स्थान नहीं ले सकते हैं। और इसलिए, किसी भी परिस्थिति में मनुष्य का अभ्यास दर्शनों से वियोज्य नहीं है। जो नए दर्शनों को स्वीकार नहीं करते हैं उनके पास कोई नया अभ्यास नहीं होता है। उनके अभ्यास का सत्य के साथ कोई रिश्ता नहीं होता है क्योंकि वे सिद्धान्त का पालन करते हैं और मृत व्यवस्था को बनाए रखते हैं; उनके पास बिल्कुल भी नए दर्शन नहीं होते हैं, और परिणामस्वरूप, वे नए युग में कुछ भी अभ्यास में नहीं लाते हैं। उन्होंने दर्शनों को गँवा दिया है, और ऐसा करने में उन्होंने पवित्र आत्मा के कार्य को भी गँवा दिया है, और सत्य को गँवा दिया है। ऐसे लोग जो सत्य से विहीन हैं वे बेहूदगी की संतति हैं, वे शैतान के मूर्त रूप हैं। भले ही कोई किसी भी प्रकार का व्यक्ति क्यों न हो, वह परमेश्वर के कार्य के दर्शनों से रहित नहीं हो सकता है, और पवित्र आत्मा की उपस्थिति से वंचित नहीं हो सकता है; जैसे ही कोई व्यक्ति दर्शनों को गँवा देता है, वह तुरन्त ही अधोलोक में पतित हो जाता है और अंधकार के बीच निवास करता है। दर्शनों से विहीन लोग वे लोग हैं जो मूर्खता से परमेश्वर अनुसरण करते हैं, वे लोग हैं जो पवित्र आत्मा के कार्य से रहित हैं, और वे नरक में निवास कर रहे हैं। ऐसे लोग सत्य की खोज नहीं करते हैं, और परमेश्वर के नाम को एक नामपट्टी के रूप में लटकाए रहते हैं। जो लोग पवित्र आत्मा के कार्य को नहीं जानते हैं, जो देहधारी परमेश्वर को नहीं जानते हैं, जो परमेश्वर के प्रबंधन की सम्पूर्णता में कार्य के तीनों चरणों को नहीं जानते हैं—वे दर्शनों को नहीं जानते हैं, और इसलिए वे सत्य से रहित हैं। और क्या ऐसे लोग जो सत्य को धारण नहीं करते हैं वे सभी कुकर्मी नहीं हैं? जो सत्य को अभ्यास में लाने के इच्छुक हैं, जो परमेश्वर के ज्ञान को खोजने के इच्छुक हैं, और जो सच में परमेश्वर के साथ सहयोग करते हैं वे ऐसे लोग हैं जिनके लिए दर्शन नींव के रूप में कार्य करते हैं। उन्हें परमेश्वर के द्वारा अनुमोदित किया जाता है क्योंकि वे परमेश्वर के साथ सहयोग करते हैं, और यह वह सहयोग है जिसे मनुष्य द्वारा अभ्यास में लाया जाना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 154

दर्शनों में अभ्यास के अनेक मार्ग समाविष्ट हैं। मनुष्य से की गई व्यावहारिक माँगें भी दर्शनों के भीतर समाविष्ट होती हैं, जैसे कि परमेश्वर का कार्य, जिसे मनुष्य को जानना चाहिए। अतीत में, विशेष सभाओं या विशाल सभाओं के दौरान जो विभिन्न स्थानों में होती थीं, अभ्यास के मार्ग के केवल एक पहलू के बारे में ही बोला जाता था। इस प्रकार का अभ्यास ऐसा था जिसे अनुग्रह के युग के दौरान अभ्यास में लाया जाना था, और इसका परमेश्वर के ज्ञान से शायद ही कोई सम्बन्ध था, क्योंकि अनुग्रह के युग का दर्शन केवल यीशु के सलीब पर चढ़ने का दर्शन था, और उससे बड़े कोई दर्शन नहीं थे। मनुष्य से अपेक्षा की गई थी कि वह सलीब पर चढ़ने के माध्यम से मनुष्यजाति के लिए परमेश्वर के छुटकारे के कार्य से अधिक कुछ न जाने, और इसलिए अनुग्रह के युग के दौरान मनुष्य के जानने के लिए कोई अन्य दर्शन नहीं थे। इस तरह, मनुष्य के पास परमेश्वर का सिर्फ थोड़ा सा ही ज्ञान था, और यीशु के प्रेम और अनुकम्पा के ज्ञान के अलावा, उसके लिए अभ्यास में लाने हेतु केवल कुछ साधारण और दयनीय चीजें ही थीं, ऐसी चीज़ें जो आज की अपेक्षा एकदम अलग थीं। अतीत में, उसकी सभा भले ही कोई भी रूप क्यों न ले, मनुष्य परमेश्वर के कार्य के व्यावहारिक ज्ञान के बारे में बात करने में असमर्थ था, और कोई भी स्पष्ट रूप से यह कहने के योग्य तो बिलकुल नहीं था कि मनुष्य के लिए प्रवेश करने हेतु अभ्यास का सबसे उचित मार्ग कौन सा है। उसने सहनशीलता और धैर्य की एक नींव में मात्र कुछ साधारण विवरणों को जोड़ दिया; उसके अभ्यास के सार में बस कोई परिवर्तन नहीं था, क्योंकि उसी युग के भीतर परमेश्वर ने कोई और नया कार्य नहीं किया था, और जो अपेक्षाएँ उसने मनुष्य की थीं वे मात्र सहनशीलता और धैर्य थीं, या सलीब को वहन करना था। ऐसे अभ्यासों के अलावा, यीशु के सलीब पर चढ़ने की तुलना में कोई ऊँचे दर्शन नहीं थे। अतीत में, अन्य दर्शनों का कोई उल्लेख नहीं था क्योंकि परमेश्वर ने अत्यधिक कार्य नहीं किया था, और क्योंकि उसने मनुष्य से केवल सीमित माँगें ही की थीं। इस तरह से, चाहे मनुष्य ने जो कुछ भी किया उसके बावजूद, वह इन सीमाओं का उल्लंघन करने में अक्षम था, ऐसी सीमाएँ जो मनुष्य के लिए अभ्यास में लाने हेतु मात्र कुछ साधारण और सतही चीज़ें थीं। आज मैं अन्य दर्शनों की बात करता हूँ क्योंकि आज, अधिक कार्य किया गया है, ऐसा कार्य जो व्यवस्था के युग और अनुग्रह के युग से कई गुना अधिक है। मनुष्य से की गई अपेक्षाएँ भी अतीत के युगों की तुलना में कई गुना अधिक ऊँची हैं। यदि मनुष्य ऐसे कार्य को पूर्ण रूप से जानने में अक्षम है, तो यह कोई बड़ा महत्व नहीं रखेगा; ऐसा कहा जा सकता है कि यदि मनुष्य इसके प्रति अपने सम्पूर्ण जीवनकाल की कोशिशों का समर्पण न करे तो उसे ऐसे कार्य को पूरी तरह से समझने में कठिनाई होगी। विजय के कार्य में, केवल अभ्यास के मार्ग के बारे में ही बात करना मनुष्य पर विजय को असंभव बना देगा। मनुष्य से कोई अपेक्षा किए बिना मात्र दर्शनों की बात करना भी मनुष्य पर विजय को असंभव कर देगा। यदि अभ्यास के मार्ग के अलावा और कुछ नहीं बोला जाता, तो मनुष्य की दुःखती रग पर चोट करना, या मनुष्य की अवधारणाओं को दूर करना असंभव होता, और इसलिए भी मनुष्य पर पूर्ण रूप से विजय पाना असंभव होता। दर्शन मनुष्य की विजय के प्रमुख साधन हैं, फिर भी यदि दर्शनों के अलावा अभ्यास का कोई मार्ग नहीं होता, तो मनुष्य के पास अनुसरण करने का कोई मार्ग नहीं होता, और प्रवेश का कोई माध्यम तो बिलकुल नहीं होता। आरम्भ से लेकर अंत तक यह परमेश्वर के कार्य का सिद्धान्त रहा है: दर्शनों में वह बात है जिसे अभ्यास में लाया जा सकता है, इसलिए अभ्यास के अतिरिक्त दर्शन भी हैं। मनुष्य के जीवन और उसके स्वभाव दोनों में हुए परिवर्तनों की मात्रा दर्शनों में हुए परिवर्तनों के साथ होती है। यदि मनुष्य केवल अपने स्वयं के प्रयासों पर ही भरोसा करता, तो उसके लिए बड़ी मात्रा में परिवर्तन प्राप्त करना असंभव होता। दर्शन स्वयं परमेश्वर के कार्य और परमेश्वर के प्रबंधन के बारे में बोलते हैं। अभ्यास मनुष्य के अभ्यास के मार्ग की ओर, तथा मनुष्य के अस्तित्व के मार्ग की ओर संकेत करता है; परमेश्वर के सम्पूर्ण प्रबंधन में, दर्शनों और अभ्यास के बीच सम्बन्ध ही परमेश्वर और मनुष्य के बीच का सम्बन्ध है। यदि दर्शनों को हटा दिया जाता, या यदि अभ्यास के बारे में बात किए बिना ही उन्हें बोला जाता, या यदि केवल दर्शन ही होते और मनुष्य के अभ्यास का उन्मूलन कर दिया जाता, तो ऐसी चीज़ों को परमेश्वर का प्रबंधन नहीं माना जा सकता था, और ऐसा तो बिलकुल भी नहीं कहा जा सकता था कि परमेश्वर का कार्य मनुष्यजाति के लिए है; इस तरह से, न केवल मनुष्य के कर्तव्य को हटाया जाता, बल्कि यह परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य का खण्डन भी होता। यदि, आरम्भ से लेकर अंत तक, परमेश्वर के कार्य को सम्मिलित किये बिना, मनुष्य से मात्र अभ्यास करने की अपेक्षा की जाती, और, इसके अतिरिक्त, यदि मनुष्य से यह अपेक्षा न की जाती कि वह परमेश्वर के कार्य को जाने, तो ऐसे कार्य को परमेश्वर का प्रबंधन बिलकुल भी नहीं कहा जा सकता था। यदि मनुष्य परमेश्वर को नहीं जानता, और परमेश्वर की इच्छा से अनजान होता, और आँख बंद करके अस्पष्ट और काल्पनिक तरीके से अपने अभ्यास को कार्यान्वित करता, तो वह कभी भी पूरी तरह से योग्य प्राणी नहीं बनता। और इसलिए ये दोनों चीज़ें अनिवार्य हैं। यदि केवल परमेश्वर का कार्य ही होता, कहने का तात्पर्य है कि, यदि केवल दर्शन ही होते और यदि मनुष्य के द्वारा कोई सहयोग या अभ्यास नहीं होता, तो ऐसी चीज़ों को परमेश्वर का प्रबंधन नहीं कहा जा सकता था। यदि केवल मनुष्य का अभ्यास और प्रवेश ही होता, तो इसके बावजूद कि वह पथ कितना भी ऊँचा हो जिसमें मनुष्य ने प्रवेश किया, यह भी अस्वीकार्य होता। कार्य और दर्शनों के साथ कदम मिलाते हुए मनुष्य का प्रवेश धीरे-धीरे परिवर्तित अवश्य होना चाहिए; यह सनक से बदल नहीं सकता है। मनुष्य के अभ्यास के सिद्धान्त स्वतंत्र और असंयमित नहीं है, बल्कि निश्चित सीमाओं के अंतर्गत हैं। ऐसे सिद्धान्त कार्य के दर्शनों के साथ कदम मिलाते हुए परिवर्तित होते हैं। अतः परमेश्वर का प्रबंधन आख़िरकार परमेश्वर के कार्य और मनुष्य के अभ्यास पर आता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 155

प्रबंधन कार्य केवल मनुष्यजाति के कारण ही घटित हुआ, जिसका अर्थ है कि इसे केवल मनुष्यजाति के अस्तित्व के द्वारा ही उत्पन्न किया गया था। मनुष्यजाति से पहले, या शुरुआत में कोई प्रबंधन नहीं था, जब स्वर्ग और पृथ्वी तथा समस्त वस्तुओं का सृजन किया गया था। यदि, परमेश्वर के सम्पूर्ण कार्य में, मनुष्य के लिए लाभकारी कोई अभ्यास नहीं होता, कहने का तात्पर्य है कि, यदि परमेश्वर भ्रष्ट मनुष्यजाति से उचित अपेक्षाएँ नहीं करता (यदि, परमेश्वर द्वारा किए गए कार्य में, मनुष्य के अभ्यास हेतु कोई उचित मार्ग नहीं होता), तो इस कार्य को परमेश्वर का प्रबंधन नहीं कहा जा सकता था। यदि परमेश्वर के कार्य की सम्पूर्णता में केवल भ्रष्ट मनुष्यजाति को यह बताना शामिल होता कि किस प्रकार अपने अभ्यास को करे, और परमेश्वर अपने किसी भी उद्यम को कार्यान्वित नहीं करता, और अपनी सर्वशक्तिमत्ता या बुद्धि का लेशमात्र भी प्रदर्शन न करता, तो चाहे मनुष्य से की गई परमेश्वर की अपेक्षाएँ कितनी ऊँची क्यों न होतीं, चाहे परमेश्वर कितने लम्बे समय तक मनुष्य के बीच क्यों न रहता, मनुष्य परमेश्वर के स्वभाव के बारे में कुछ भी नहीं जानता; यदि ऐसा मामला होता, तब इस प्रकार का कार्य परमेश्वर का प्रबंधन कहलाने के योग्य तो बिलकुल भी नहीं होता। सरल भाषा में कहें, तो परमेश्वर के प्रबंधन का कार्य ही परमेश्वर के द्वारा किया गया कार्य है, और सम्पूर्ण कार्य को परमेश्वर के मार्गदर्शन के अंतर्गत उन लोगों के द्वारा कार्यान्वित किया गया जिन्हें परमेश्वर के द्वारा प्राप्त कर लिया गया है। ऐसे कार्य को संक्षेप में प्रबंधन कहा जा सकता है। दूसरे शब्दों में, मनुष्य के बीच परमेश्वर के कार्य, और साथ ही परमेश्वर के साथ उन सभी लोगों के सहयोग को जो उसका अनुसरण करते हैं सामूहिक रूप से प्रबंधन कहा जाता है। यहाँ, परमेश्वर का कार्य दर्शन कहलाते हैं, और मनुष्य का सहयोग अभ्यास कहलाता है। परमेश्वर का कार्य जितना अधिक ऊँचा होता है (अर्थात्, दर्शन जितने अधिक ऊँचे होते हैं), परमेश्वर के स्वभाव को मनुष्य के लिए उतना ही अधिक स्पष्ट किया जाता है, और उतना ही अधिक वह मनुष्य की धारणाओं से विषम होता है, और उतना ही ऊँचा मनुष्य का अभ्यास और सहयोग होता है। मनुष्य से की गई अपेक्षाएँ जितनी ऊँची होती हैं, उतना ही अधिक परमेश्वर का कार्य मनुष्य की धारणाओं से विषम होता है, जिसके परिणामस्वरूप मनुष्य की परीक्षाएँ, और वे स्तर जिन तक पहुँचने की उससे अपेक्षा की जाती है, वे भी अधिक ऊँचे हो जाते हैं। इस कार्य के समापन पर, समस्त दर्शनों को पूरा कर लिया गया होगा, और जिन्हें अभ्यास में लाने की मनुष्य से अपेक्षा की जाती है वे परिपूर्णता की पराकाष्ठा पर पहुँच चुके होंगे। यह ऐसा समय भी होगा जब प्रत्येक को उसके प्रकार के अनुसार वर्गीकृत किया जाएगा, क्योंकि जिस बात को जानने के लिए मनुष्य से अपेक्षा की जाती है उन्हें मनुष्य को दिखाया जा चुका होगा। इसलिए, जब दर्शन सफलता के अपने चरम बिंदु पर पहुँच जाएँगे, तो कार्य तदनुसार अपने अंत तक पहुँच जाएगा, और मनुष्य का अभ्यास भी अपने शिरोबिन्दु पर पहुँच जाएगा। मनुष्य का अभ्यास परमेश्वर के कार्य पर आधारित है, और परमेश्वर का प्रबंधन मनुष्य के अभ्यास और मनुष्य के सहयोग के कारण ही केवल पूरी तरह से व्यक्त होता है। मनुष्य परमेश्वर के कार्य की प्रदर्शन वस्तु है, और परमेश्वर के सम्पूर्ण प्रबंधन के कार्य का लक्ष्य है, और साथ ही परमेश्वर के सम्पूर्ण प्रबंधन का परिणाम भी है। यदि परमेश्वर ने मनुष्य के सहयोग के बिना अकेले ही कार्य किया होता, तो ऐसा कुछ भी नहीं होता जो उसके सम्पूर्ण कार्य को साकार करने के रूप में कार्य करता, और इस तरह से परमेश्वर के प्रबंधन का जरा सा भी महत्व नहीं होता। परमेश्वर के कार्य के अलावा, केवल परमेश्वर के अपने कार्य को व्यक्त करने, और उसकी सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि को प्रमाणित करने के लिए उपयुक्त लक्ष्य को चुनने के द्वारा ही, परमेश्वर के प्रबंधन के उद्देश्य को प्राप्त करना संभव है, और शैतान को पूरी तरह से हराने के लिए इस सम्पूर्ण कार्य का उपयोग करने के उद्देश्य को प्राप्त करना संभव है। और इसलिए, मनुष्य परमेश्वर के प्रबंधन के कार्य का एक अपरिहार्य हिस्सा है, और मनुष्य ही वह एकमात्र प्राणी है जो परमेश्वर के प्रबंधन को सफल करवा सकता है और इसके चरम उद्देश्य को प्राप्त करवा सकता है; मनुष्य के अतिरिक्त, अन्य कोई प्राणी रूप ऐसी भूमिका नहीं निभा सकता है। यदि मनुष्य को प्रबंधन कार्य का सच्चा साकार रूप बनना है, तो भ्रष्ट मनुष्यजाति की अवज्ञा को पूरी तरह से दूर करना होगा। इसके लिए आवश्यक है कि मनुष्य को विभिन्न समयों के लिए उपयुक्त अभ्यास दिया जाए, और यह कि परमेश्वर मनुष्य के बीच तदनुरूप कार्य करे। केवल इसी तरह से अंततः ऐसे लोगों का समूह प्राप्त किया जा सकता है जो प्रबंधन कार्य का साकार रूप हैं। मनुष्य के बीच परमेश्वर का कार्य सिर्फ अकेले परमेश्वर के कार्य के माध्यम से स्वयं परमेश्वर की गवाही नहीं दे सकता है; ऐसी गवाही को जीवित मनुष्यों की भी आवश्यकता होती है जो प्राप्त किए जाने के लिए उसके कार्य के लिए उपयुक्त होते हैं। परमेश्वर पहले इन लोगों पर कार्य करेगा, तब उनके माध्यम से उसका कार्य व्यक्त होगा, और इस प्रकार उसकी इच्छा की ऐसी गवाही प्राणियों के बीच दी जाएगी। और इसमें, परमेश्वर अपने कार्य के लक्ष्य को प्राप्त कर लेगा। परमेश्वर शैतान को पराजित करने के लिए अकेले कार्य नहीं करता है क्योंकि वह समस्त प्राणियों के बीच सीधे तौर पर स्वयं के लिए गवाही नहीं दे सकता है। यदि वह ऐसा करता, तो मनुष्य को पूर्ण रूप से आश्वस्त करना असंभव होता, इसलिए परमेश्वर को मनुष्य को जीतने के लिये उसमें कार्य करना होगा, और केवल तभी वह समस्त प्राणियों के बीच गवाही प्राप्त करने में समर्थ होगा। यदि परमेश्वर अकेले ही कार्य करता, और मनुष्य का कोई सहयोग नहीं होता, या यदि मनुष्य से सहयोग की कोई आवश्यकता नहीं होती, तो मनुष्य कभी भी परमेश्वर के स्वभाव को जानने में समर्थ नहीं होता, और वह सदा के लिए परमेश्वर की इच्छा से अनजान रहता; इस तरह से, इसे परमेश्वर का प्रबंधन का कार्य नहीं कहा जा सकता था। यदि केवल मनुष्य स्वयं ही संघर्ष, और खोज, और कठिन परिश्रम करता, किन्तु यदि वह परमेश्वर के कार्य को नहीं समझता, तो मनुष्य धृष्टताएँ कर रहा होता। पवित्र आत्मा के कार्य के बिना, मनुष्य जो कुछ करता है वह शैतान का होता है, वह विद्रोहशील और एक कुकर्मी होता; वह सब जो भ्रष्ट मनुष्यजाति के द्वारा किया जाता है उनमें शैतान प्रदर्शित होता है, और उनमें ऐसा कुछ भी नहीं होता है जो परमेश्वर के संगत हो, और सब कुछ शैतान की अभिव्यक्ति होता है। जो कुछ भी कहा गया है उसमें से कुछ भी दर्शनों और अभ्यास से अलग नहीं है। दर्शनों की बुनियाद पर, मनुष्य अभ्यास, और आज्ञाकारिता के पथ को ढूँढ लेता है, ताकि वह अपनी अवधारणाओं को एक ओर रख सके और उन चीज़ों को अर्जित कर सके जिन्हें उसने अतीत में धारण नहीं किया था। परमेश्वर अपेक्षा करता है कि मनुष्य उसके साथ सहयोग करे, कि मनुष्य उसकी अपेक्षाओं के प्रति समर्पण करे, और मनुष्य स्वयं परमेश्वर द्वारा किए गए कार्य को देखने, परमेश्वर के सर्वशक्तिमान सामर्थ्य का अनुभव करने, और परमेश्वर के स्वभाव को जानने की माँग करता है। संक्षेप में, ये ही परमेश्वर के प्रबंधन हैं। मनुष्य के साथ परमेश्वर का मिलाप ही प्रबंधन, और महानतम प्रबंधन है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 156

जिसमें दर्शन शामिल होते हैं वह मुख्यतः स्वयं परमेश्वर के कार्य की ओर संकेत करता है, और जिसमें अभ्यास शामिल होता है उसे मनुष्य के द्वारा किया जाना चाहिए, और इसका परमेश्वर से कोई सम्बन्ध नहीं है। परमेश्वर का कार्य स्वयं परमेश्वर के द्वारा पूर्ण किया जाता है, और मनुष्य का अभ्यास स्वयं मनुष्य के द्वारा प्राप्त किया जाता है। जो स्वयं परमेश्वर द्वारा किया जाना चाहिए उसे मनुष्य के द्वारा किए जाने की आवश्यकता नहीं है, और जिसका मनुष्य के द्वारा अभ्यास किया जाना चाहिए वह परमेश्वर सम्बन्धित नहीं है। परमेश्वर का कार्य उसकी स्वयं की सेवकाई है, और इसका मनुष्य से कोई सम्बन्ध नहीं है। इस कार्य को मनुष्य के द्वारा किए जाने की कोई आवश्यकता नहीं है, और, इसके अलावा, मनुष्य उस कार्य को करने में असमर्थ है जिसे परमेश्वर के द्वारा किया जाना है। जिसका अभ्यास करने के लिए मनुष्य से अपेक्षा की जाती है उसे मनुष्य के द्वारा अवश्य पूरा किया जाना चाहिए, चाहे यह उसके जीवन का बलिदान हो, या गवाही देने के लिए उसे शैतान के सुपुर्द करना हो—इन सब को मनुष्य के द्वारा पूरा अवश्य किया जाना चाहिए। स्वयं परमेश्वर उस समस्त कार्य को पूरा करता है जिसे उसे पूरा करना चाहिए, और जिसे मनुष्य को करना चाहिए उसे मनुष्य को दिखाया जाता है, तथा शेष कार्य को मनुष्य पर छोड़ दिया जाता है। परमेश्वर अतिरिक्त कार्य नहीं करता है। वह केवल उसी कार्य को करता है जो उसकी सेवकाई के अंतर्गत है, और मनुष्य को केवल मार्ग दिखाता है, तथा केवल मार्ग को खोलने का ही कार्य करता है, और मार्ग प्रशस्त करने का कार्य नहीं करता है; इसे मनुष्य के द्वारा समझ लिया जाना चाहिए। सत्य को अभ्यास में लाने का अर्थ है परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाना, और यह सब मनुष्य का कर्तव्य है, और यह वह है जिसे मनुष्य के द्वारा किया जाना चाहिए, और इसका परमेश्वर के साथ कोई लेना देना नहीं है। यदि मनुष्य माँग करता है कि परमेश्वर भी सत्य में उसी तरह से यंत्रणा और शुद्धिकरण सहन करे जैसे मनुष्य सहन करता है, तो मनुष्य अवज्ञाकारी हो रहा है। परमेश्वर का कार्य अपनी सेवकाई क्रियान्वित करना है, तथा बिना किसी प्रतिरोध के परमेश्वर के सभी मार्गदर्शनों को मानना मनुष्य का कर्तव्य है। वह जिसे मनुष्य को अवश्य प्राप्त करना चाहिए वह उसे पूरा करने के योग्य है, उस तरीके पर ध्यान दिए बिना जिसमें परमेश्वर कार्य करता और रहता है। केवल स्वयं परमेश्वर ही मनुष्य से अपेक्षाएँ कर सकता है, कहने का तात्पर्य है कि, केवल स्वयं परमेश्वर ही मनुष्य से अपेक्षाएँ करने के लिए उपयुक्त है। मनुष्य के पास कोई विकल्प नहीं होना चाहिए, उसे पूरी तरह से समर्पण और अभ्यास करने के सिवाए कुछ नहीं करना चाहिए; यही वह समझ है जो मनुष्य के द्वारा धारण की जानी चाहिए। जब एक बार वह कार्य पूरा हो जाता है जिसे स्वयं परमेश्वर के द्वारा किया जाना चाहिए, तो मनुष्य से अपेक्षा की जाती है कि वह कदम दर कदम इसका अनुभव करे। यदि, अंत में, परमेश्वर का सम्पूर्ण प्रबंधन पूरा हो जाने पर, मनुष्य ने अभी तक वह नहीं किया है जिसकी अपेक्षा परमेश्वर के द्वारा की गई है, तो मनुष्य को दण्डित किया जाना चाहिए। यदि मनुष्य परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा नहीं करता है, तो यह मनुष्य की अवज्ञा के कारण है; इसका अर्थ यह नहीं है कि परमेश्वर ने अपने कार्य को पर्याप्त पूर्णता से नहीं किया है। वे सभी जो परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में नहीं ला सकते हैं, वे जो परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर सकते हैं, और वे जो अपनी वफादारी नहीं दे सकते हैं और अपने कर्तव्य को पूरा नहीं कर सकते हैं—उन सभी को दण्ड दिया जाएगा। आज, तुम लोगों से जो कुछ प्राप्त करने की अपेक्षा की जाती है वे अतिरिक्त माँगे नहीं हैं, बल्कि मनुष्य का कर्तव्य है, और जिसे सभी लोगों के द्वारा किया जाना चाहिए। यदि तुम लोग अपने कर्तव्य को निभाने में, या इसे भली-भाँति करने में भी असमर्थ हो, तो क्या तुम लोग अपने ऊपर मुसीबतें नहीं ला रहे हो? क्या तुम लोग मृत्यु की याचना नहीं कर रहे हो? कैसे तुम लोग तब भी भविष्य और संभावनाओं की आशा कर सकते हो? परमेश्वर का कार्य मनुष्यजाति के वास्ते है, तथा मनुष्य का सहयोग परमेश्वर के प्रबंधन के वास्ते है। जब परमेश्वर ने वह सब कुछ कर लिया जिसे करने की उससे अपेक्षा की जाती है, उसके पश्चात्, मनुष्य से अपेक्षा की जाती है कि वह अपने अभ्यास में उदार हो, और परमेश्वर के साथ सहयोग करे। परमेश्वर के कार्य में, मनुष्य को कोई कसर बाकी नहीं रखनी चाहिए, उसे अपनी वफादारी अर्पित करनी चाहिए, और अनगिनत अवधारणाओं में सलंग्न नहीं होना चाहिए, या निष्क्रिय बैठ कर मृत्यु की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। परमेश्वर मनुष्य के लिए स्वयं को बलिदान कर सकता है, तो क्यों मनुष्य परमेश्वर के प्रति अपनी वफादारी अर्पित नहीं कर सकता है? परमेश्वर मनुष्य के प्रति एक हृदय और मन वाला है, तो क्यों मनुष्य थोड़ा सा भी सहयोग अर्पित नहीं कर सकता है? परमेश्वर मनुष्यजाति के लिए कार्य करता है, तो क्यों मनुष्य परमेश्वर के प्रबंधन के वास्ते अपने कुछ कर्तव्य पूरा नहीं कर सकता है? परमेश्वर का कार्य इतनी दूर तक आ गया है, फिर भी तुम लोग तब भी देखते हो किन्तु कार्य नहीं करते हो, तुम लोग सुनते तो हो किन्तु हिलते नहीं हो। क्या ऐसे लोग तबाही के लक्ष्य नहीं हैं? परमेश्वर ने पहले ही अपना सर्वस्व मनुष्य को अर्पित कर दिया है, तो क्यों आज मनुष्य ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाने में असमर्थ है? परमेश्वर के लिए, उसका कार्य उसकी प्राथमिकता है, और उसके प्रबंधन का कार्य अत्यंत महत्वपूर्ण है। मनुष्य के लिए, परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाना और परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा करना उसकी पहली प्राथमिकता है। इसे तुम सभी लोगों को समझ लेना चाहिए। तुम लोगों से कहे गए वचन तुम्हारे सार के बिल्कुल मूल तक पहुँच गए हैं, और परमेश्वर का कार्य अभूतपूर्व क्षेत्र में प्रवेश कर चुका है। अनेक लोग अभी भी इस मार्ग के सच्चा या झूठा होने को नहीं समझते हैं; वे अभी भी प्रतीक्षा कर रहे हैं और देख रहे हैं, और अपने कर्तव्य को नहीं कर रहे हैं। इसके बजाए, वे परमेश्वर के द्वारा कहे गए प्रत्येक वचन और कार्य को जाँचते हैं, वे इस बात पर ध्यान केन्द्रित करते हैं कि वह क्या खाता है और पहनता है, तथा उनकी धारणाएँ और भी अधिक दुःखद हो गई हैं। क्या ऐसे लोग बेवजह का बतंगड़ नहीं बना रहे हैं? इस प्रकार के लोग कैसे ऐसे मनुष्य हो सकते हैं जो परमेश्वर को खोजते हैं? और वे कैसे ऐसे लोग हो सकते हैं जिनका परमेश्वर के प्रति समर्पण करने का इरादा है? वे अपनी वफादारी और अपने कर्तव्य के बारे में विचार करने का प्रयास नहीं करते हैं, और इसके बजाए परमेश्वर के पते ठिकाने पर ध्यान केन्द्रित करते हैं। वे एक उपद्रव हैं! यदि मनुष्य ने वह सब कुछ समझ लिया है जिसे समझने की अपेक्षा उससे की जाती है, और यदि वह उन सब को अभ्यास में ला चुका है जिसे अभ्यास में लाने की अपेक्षा उससे की जाती है, तो परमेश्वर निश्चित रूप से अपने आशीष मनुष्य को प्रदान करेगा, क्योंकि जो अपेक्षा परमेश्वर मनुष्य से करता है वह मनुष्य का कर्तव्य है, और यह वह है जिसे मनुष्य के द्वारा किया जाना चाहिए। यदि मनुष्य यह समझने में असमर्थ है कि किस बात को समझने की उससे अपेक्षा की जाती है, और यदि वह उसे अभ्यास में लाने में असमर्थ है जिसे उसे अभ्यास में लाना चाहिए, तो मनुष्य को दण्ड दिया जाएगा। जो लोग परमेश्वर के साथ सहयोग नहीं करते हैं वे परमेश्वर के प्रति शत्रुता रखते हैं, जो लोग नए कार्य को स्वीकार नहीं करते हैं वे इसके विरुद्ध हैं, भले ही ऐसे लोग ऐसा कुछ नहीं करते हैं जो स्पष्ट रूप से इसके विरुद्ध हो। वे सभी जो सत्य को अभ्यास में नहीं लाते है जिसकी अपेक्षा परमेश्वर के द्वारा की जाती है ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर के वचनों का जानबूझकर विरोध करते हैं और उसके प्रति अवज्ञाकारी हैं, भले ही ऐसे लोग पवित्र आत्मा के कार्य का विशेष ध्यान रखते हों। जो लोग परमेश्वर के वचनों का पालन नहीं करते हैं और परमेश्वर के प्रति समर्पण नहीं करते हैं वे विद्रोही हैं, तथा वे परमेश्वर के विरोध में हैं। जो लोग अपने कर्तव्य को नहीं निभाते हैं वे ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर के साथ सहयोग नहीं करते हैं, और जो लोग परमेश्वर के साथ सहयोग नहीं करते हैं वे ऐसे लोग हैं जो पवित्र आत्मा के कार्य को स्वीकार नहीं करते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 157

जब परमेश्वर का कार्य एक निश्चित स्तर तक पहुँच जाता है, और उसका प्रबंधन एक निश्चित स्तर पर पहुँच जाता है, तो जो लोग उसके हृदय के अनुसार हैं वे उसकी अपेक्षाओं को पूरा करने में सक्षम होते हैं। परमेश्वर अपने स्वयं के मानकों के अनुसार और उसके अनुसार मनुष्य से अपेक्षाएँ करता है जिसे प्राप्त करने में मनुष्य सक्षम है। अपने प्रबंधन के बारे में बात करते हुए, वह मनुष्य के लिए मार्ग की ओर संकेत करता है, और मनुष्य को जीवित बचे रहने के लिए एक मार्ग प्रदान करता है। परमेश्वर का प्रबंधन और मनुष्य का अभ्यास दोनों एक ही चरण के कार्य हैं, और उन्हें एक साथ ही कार्यान्वित किया जाता है। परमेश्वर के प्रबंधन की बात मनुष्य के स्वभाव के परिवर्तनों को, और उस बात को स्पर्श करती है जो मनुष्य द्वारा की जानी चाहिए, तथा मनुष्य के स्वभाव के परिवर्तन, परमेश्वर के कार्य को स्पर्श करते हैं; ऐसा कोई समय नहीं होता है जब इन दोनों को अलग किया जा सके। मनुष्य का अभ्यास कदम दर कदम बदल रहा है। ऐसा इसलिए है क्योंकि मनुष्य के बारे में परमेश्वर की अपेक्षाएँ भी बदल रही हैं, और क्योंकि परमेश्वर का कार्य हमेशा बदल रहा है और प्रगति कर रहा है। यदि मनुष्य का अभ्यास सिद्धान्तों के जाल में उलझा रहता है, तो इससे साबित होता है कि वह परमेश्वर के कार्य और मार्गदर्शन से वंचित है; यदि मनुष्य का अभ्यास कभी नहीं बदलता है या गहराई तक नहीं जाता है, तो इससे साबित होता है कि मनुष्य का अभ्यास मनुष्य की इच्छानुसार कार्यान्वित होता है, और यह सत्य का अभ्यास नहीं है; यदि मनुष्य के पास कदम रखने के लिए कोई मार्ग नहीं है, तो वह पहले से ही शैतान के हाथों में पड़ चुका है, और शैतान के द्वारा नियन्त्रित किया जा चुका है, जिसका अर्थ है कि उसे दुष्ट आत्मा के द्वारा नियन्त्रित कर लिया गया है। यदि मनुष्य का अभ्यास अधिक गहराई तक नहीं जाता है, तो परमेश्वर का कार्य विकास नहीं करेगा, और यदि परमेश्वर के कार्य में कोई बदलाव नहीं होता है, तो मनुष्य का प्रवेश रुक जाएगा; यह अपरिहार्य है। परमेश्वर के सम्पूर्ण कार्य के दौरान, यदि मनुष्य सदैव यहोवा की व्यवस्था में बना रहता, तो परमेश्वर का कार्य प्रगति नहीं कर सकता था, और सम्पूर्ण युग को एक अंत तक पहुँचाना तो बिलकुल भी संभव नहीं होता। यदि मनुष्य हमेशा क्रूस को पकड़े रहता और धैर्य और विनम्रता का अभ्यास करता रहता, तो परमेश्वर के कार्य के लिए निरन्तर प्रगति करना असंभव होता। छः हजार वर्षों के प्रबंधन को ऐसे ही उन लोगों के बीच से समाप्त नहीं किया जा सकता है जो केवल व्यवस्था का पालन करते हैं, या सिर्फ क्रूस को थामे रहते हैं और धैर्य तथा विनम्रता का अभ्यास करते हैं। इसके बजाए, परमेश्वर के प्रबंधन का सम्पूर्ण कार्य अंत के दिनों के उन लोगों के बीच समाप्त होता है, जो परमेश्वर को जानते हैं, और जिन्हें शैतान के चंगुल से छुड़ाकर वापस लाया गया है, और जिन्होंने शैतान के प्रभाव से अपने आप को पूरी तरह से वंचित कर दिया है। यह परमेश्वर के कार्य की अनिवार्य दिशा है। ऐसा क्यों कहा जाता है कि धार्मिक कलीसियाओं के लोगों का अभ्यास प्रचलन से बाहर है? ऐसा इसलिए है क्योंकि जिसे वे अभ्यास में लाते हैं वह आज के कार्य से अलग है। अनुग्रह के युग में, जिसे वे अभ्यास में लाते थे वह सही था, किन्तु चूँकि युग गुज़र चुका है और परमेश्वर का कार्य बदल चुका है, इसलिए उनका अभ्यास धीरे-धीरे प्रचलन से बाहर हो गया है। इसे नए कार्य और नए प्रकाश के द्वारा पीछे छोड़ दिया गया है। अपनी मूल बुनियाद के आधार पर, पवित्र आत्मा का कार्य कई कदम गहराई तक प्रगति कर चुका है। मगर वे लोग अभी भी परमेश्वर के कार्य के मूल चरण पर अटके हुए हैं, और अभी भी पुराने अभ्यासों और पुराने प्रकाश पर अटके हुए हैं। तीन या पाँच वर्षों में परमेश्वर का कार्य बहुत बदल सकता है, अतः क्या 2,000 वर्षों के दौरान और भी अधिक बड़े रूपान्तरण नहीं हुए होंगे? यदि मनुष्य के पास कोई नया प्रकाश या अभ्यास नहीं है, तो इसका अर्थ है कि वह पवित्र आत्मा के कार्य के साथ-साथ बना नहीं रहा है। यह मनुष्य की असफलता है; परमेश्वर के नए कार्य के अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता है क्योंकि, आज, ऐसे लोग जिनके पास पहले पवित्र आत्मा का कार्य था वे अभी भी प्रचलन से बाहर हो चुके अभ्यासों का पालन करते हैं। पवित्र आत्मा का कार्य हमेशा आगे बढ़ रहा है, और वे सभी जो पवित्र आत्मा की धारा में हैं उन्हें भी अधिक गहराई तक बढ़ना और कदम दर कदम बदलना चाहिए। उन्हें एक ही चरण पर रूकना नहीं चाहिए। जो लोग पवित्र आत्मा के कार्य को नहीं जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर के मूल कार्य के बीच बने रहेंगे, और वे पवित्र आत्मा के नए कार्य को स्वीकार नहीं करेंगे। जो लोग अवज्ञाकारी हैं केवल वे ही पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त करने में अक्षम होंगे। यदि मनुष्य का अभ्यास पवित्र आत्मा के नए कार्य के साथ गति बना कर नहीं रखता है, तो मनुष्य का अभ्यास निश्चित रूप से आज के कार्य से पृथक है, और यह निश्चित रूप से आज के कार्य के असंगत है। ऐसे पुराने लोग चूँकि बस परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने में अक्षम होते हैं, इसलिए वे ऐसे लोग तो बिलकुल भी नहीं बन सकते हैं जो अंततः परमेश्वर की गवाही देंगे। इसके अतिरिक्त, सम्पूर्ण प्रबंधन का कार्य ऐसे लोगों के समूह के बीच में समाप्त नहीं किया जा सकता है। क्योंकि जिन लोगों ने किसी समय यहोवा की व्यवस्था को थामा था, और जिन्होंने कभी सलीब के दुःख को सहा था, यदि वे अन्त के दिनों के कार्य के चरण को स्वीकार नहीं कर सकते हैं, तो जो कुछ भी उन्होंने किया वह सब बेकार और व्यर्थ होगा। पवित्र आत्मा के कार्य की स्पष्टतम अभिव्यक्ति यहीं और अभी को सम्मिलित करने में है, और अतीत से चिपके रहने में नहीं है। जो लोग आज के कार्य के साथ नहीं बने रहते हैं, और जो आज के अभ्यास से अलग हो गए हैं, ये वे लोग हैं जो पवित्र आत्मा के कार्य का विरोध करते हैं और उसे स्वीकार नहीं करते हैं। ऐसे लोग परमेश्वर के वर्तमान कार्य की अवहेलना करते हैं। यद्यपि वे अतीत के प्रकाश को पकड़े रहते हैं, फिर भी इसका अर्थ यह नहीं है कि इस बात को नकारना संभव है कि वे पवित्र आत्मा के कार्य को नहीं जानते हैं। मनुष्य के अभ्यास में परिवर्तनों के बारे में, अतीत और वर्तमान के बीच के अभ्यास की भिन्नताओं के बारे में, पूर्ववर्ती युग के दौरान किस प्रकार अभ्यास किया जाता था इस बारे में, और इसे आज किस प्रकार किया जाता है इस बारे में यह सब बातचीत क्यों रही है? मनुष्य के अभ्यास में ऐसे विभाजनों के बारे में हमेशा बात की जाती है क्योंकि पवित्र आत्मा का कार्य लगातार आगे बढ़ रहा है, और इसलिए मनुष्य के अभ्यास के निरंतर बदलते रहने की अपेक्षा की जाती है। यदि मनुष्य एक ही चरण में अटका रहता है, तो इससे प्रमाणित होता है कि वह परमेश्वर के नए कार्य और नए प्रकाश के साथ-साथ बने रहने में असमर्थ है; इससे यह प्रमाणित नहीं होता है कि प्रबंधन की परमेश्वर की योजना परिवर्तित नहीं हुई है। जो पवित्र आत्मा की धारा के बाहर हैं वे सदैव सोचते हैं कि वे सही हैं, किन्तु वास्तव में, उनके भीतर परमेश्वर का कार्य बहुत पहले ही रूक गया है, और पवित्र आत्मा का कार्य उनमें अनुपस्थित है। परमेश्वर का कार्य बहुत पहले ही लोगों के एक अन्य समूह को हस्तान्तरित हो गया था, ऐसे लोगों का समूह जिन पर वह अपने नए कार्य को पूरा करने का इरादा करता है। क्योंकि जो लोग किसी धर्म में हैं वे परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार करने में अक्षम हैं, और वे केवल अतीत के पुराने कार्य को ही पकड़े रहते हैं, इसलिए परमेश्वर ने इन लोगों को छोड़ दिया है, और अपना कार्य उन लोगों पर करता है जो इस नए कार्य को स्वीकार करते हैं। ये वे लोग हैं जो उसके नए कार्य में सहयोग करते हैं, और केवल इसी तरह से ही उसके प्रबंधन को पूरा किया जा सकता है। परमेश्वर का प्रबंधन सदैव आगे बढ़ रहा है, तथा मनुष्य का अभ्यास हमेशा से ऊँचा हो रहा है। परमेश्वर सदैव कार्य कर रहा है, और मनुष्य हमेशा अभावग्रस्त है, कुछ इस तरह से कि दोनों अपने शिरोबिन्दु पर पहुँचते हैं, परमेश्वर और मनुष्य पूर्ण एकता में होते हैं। यह परमेश्वर के कार्य की पूर्णता की अभिव्यक्ति है, और यह परमेश्वर के सम्पूर्ण प्रबंधन का अन्तिम परिणाम है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 158

परमेश्वर के कार्य के प्रत्येक चरण में मनुष्य से तद्नुरूपी अपेक्षाएँ भी होती हैं। जो पवित्र आत्मा की धारा के भीतर हैं वे सभी पवित्र आत्मा की उपस्थिति और अनुशासन के अधीन हैं, और जो पवित्र आत्मा की मुख्य धारा में नहीं हैं वे शैतान के नियन्त्रण में हैं, और वे पवित्र आत्मा के किसी भी कार्य से रहित हैं। जो लोग पवित्र आत्मा की धारा में हैं ये वे लोग हैं जो परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार करते हैं, ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर के नए कार्य में सहयोग करते हैं। यदि इस मुख्य धारा के लोग सहयोग करने में अक्षम रहते हैं, और इस समय के दौरान परमेश्वर के द्वारा अपेक्षित सत्य का अभ्यास करने में असमर्थ रहते हैं, तो उन्हें अनुशासित किया जाएगा, और बहुत खराब स्थिति में उन्हें पवित्र आत्मा के द्वारा छोड़ दिया जाएगा। जो पवित्र आत्मा के नए कार्य को स्वीकार करते हैं, वे पवित्र आत्मा की मुख्य धारा में जीवन बिताएँगे, पवित्र आत्मा की देखभाल और सुरक्षा प्राप्त करेंगे। जो लोग सत्य को अभ्यास रूप में लाने के इच्छुक हैं उन्हें पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध किया जाता है, और जो लोग सत्य को अभ्यास में लाने के अनिच्छुक हैं, उन्हें पवित्र आत्मा के द्वारा अनुशासित किया जाता है, और यहाँ तक कि उन्हें दण्ड भी दिया जा सकता है। इस बात की परवाह न करते हुए कि वे किस प्रकार के व्यक्ति हैं, बशर्ते कि वे पवित्र आत्मा की मुख्य धारा के भीतर हों, परमेश्वर उन सभी लोगों की ज़िम्मेदारी लेगा जो उसके नाम के वास्ते उसके नए कार्य को स्वीकार करते हैं। जो लोग उसके नाम की महिमा करते हैं और उसके वचनों को अभ्यास में लाने के इच्छुक हैं वे उसके आशीषों को प्राप्त करेंगे; जो लोग उसकी अवज्ञा करते हैं और उसके वचनों को अभ्यास में नहीं लाते हैं वे उसके दण्ड को प्राप्त करेंगे। जो लोग पवित्र आत्मा की मुख्य धारा में हैं वे ऐसे लोग हैं जो नए कार्य को स्वीकार करते हैं, और चूँकि उन्होंने उस नए कार्य को स्वीकार कर लिया है, तो उनका परमेश्वर के साथ उचित सहयोग होना चाहिए, और उन्हें ऐसे विद्रोहियों के समान कार्य नहीं करना चाहिए जो अपने कर्तव्य को नहीं निभाते हैं। यह मनुष्य से की गई परमेश्वर की एकमात्र अपेक्षा है। यह उन लोगों के लिए नहीं है जो नए कार्य को स्वीकार नहीं करते हैं: वे पवित्र आत्मा की धारा से बाहर हैं, और पवित्र आत्मा का अनुशासन और झिड़की उन पर लागू नहीं होते हैं। पूरा दिन, ये लोग देह में जीवन बिताते रहते हैं, वे अपने मन के भीतर जीवन बिताते हैं, और वे जो कुछ भी करते हैं वह सब उनके स्वयं के मस्तिष्क के विश्लेषण और अनुसंधान के द्वारा उत्पन्न हुए सिद्धान्त के अनुसार होता है। यह पवित्र आत्मा के नए कार्य की अपेक्षाएँ नहीं हैं, और यह परमेश्वर के साथ सहयोग तो बिलकुल भी नहीं है। जो लोग परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार नहीं करते हैं वे परमेश्वर की उपस्थिति से वंचित रहते हैं, और, इसके अतिरिक्त, वे परमेश्वर के आशीषों और सुरक्षा से रहित होते हैं। उनके अधिकांश वचन और कार्य पवित्र आत्मा की पुरानी अपेक्षाओं को थामे रहते हैं; वे सिद्धान्त हैं, सत्य नहीं। ऐसे सिद्धान्त और विनियमन यह साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि इन लोगों का एक साथ इकट्ठा होना धर्म के अलावा और कुछ नहीं है; वे चुने हुए लोग, परमेश्वर के कार्य के लक्ष्य नहीं हैं। उनमें से सभी लोगों की सभा को मात्र धर्म का महासम्मलेन कहा जा सकता है, और उन्हें कलीसिया नहीं कहा जा सकता है। यह एक अपरिवर्तनीय तथ्य है। उनके पास पवित्र आत्मा का नया कार्य नहीं है; जो कुछ वे करते हैं वह धर्म का द्योतक प्रतीत होता है, जैसा जीवन वे जीते हैं वह धर्म से भरा हुआ प्रतीत होता है; उनमें पवित्र आत्मा की उपस्थिति और कार्य नहीं होता है, और वे पवित्र आत्मा से अनुशासन या प्रबुद्धता प्राप्त करने के लायक तो बिलकुल भी नहीं हैं। ऐसे समस्त लोग निर्जीव लाशों और कीड़ों के समान हैं जो आध्यात्मिकता से रहित हैं। उन्हें मनुष्य की विद्रोहशीलता और विरोध का कोई ज्ञान नहीं है, मनुष्य के समस्त कुकर्मों का कोई ज्ञान नहीं है, और वे परमेश्वर के समस्त कार्य और परमेश्वर की वर्तमान इच्छा के बारे में बिलकुल भी नहीं जानते हैं। वे सभी अज्ञानी और अधम लोग हैं, वे कूडा करकट हैं जो विश्वासी कहलाने के योग्य नहीं हैं! वे ऐसा कुछ भी नहीं करते हैं जिसका परमेश्वर के प्रबंधन के कार्य के साथ कोई सम्बन्ध हो, और यह परमेश्वर के कार्य को तो बिलकुल भी नहीं बिगाड़ सकता है। उनके वचन और कार्य अत्यंत घृणास्पद, अत्यंत दयनीय, और उल्लेख करने के लायक मात्र भी नहीं होते हैं। ऐसे लोग जो पवित्र आत्मा की धारा में नहीं हैं उनके द्वारा किए गए किसी भी कार्य का पवित्र आत्मा के नए कार्य के साथ कोई लेना-देना नहीं होता है। इस वजह से, चाहे वे कुछ भी क्यों न करें, वे पवित्र आत्मा के अनुशासन से रहित होते हैं, और, इसके अतिरिक्त, वे पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता से रहित होते हैं। क्योंकि वे सभी ऐसे लोग हैं जिन्हें सत्य से कोई प्रेम नहीं है, और वे पवित्र आत्मा के द्वारा घृणा और अस्वीकृत किए जाते हैं। उन्हें कुकर्मी कहा जाता हैं क्योंकि वे देह के अनुसार चलते हैं, और परमेश्वर के नामपट्ट के अधीन जो उन्हें अच्छा लगता है वे वही करते हैं। जब परमेश्वर कार्य करता है, तो वे जानबूझकर उसके विरोध में हो जाते हैं, और उसकी विपरीत दिशा में दौड़ते हैं। परमेश्वर के साथ सहयोग करने में मनुष्य की असफलता अपने आप में चरम रूप से विद्रोही है, इसलिए क्या ऐसे लोग, जो जानबूझकर परमेश्वर के प्रतिकूल चलते हैं, विशेष रूप से प्रतिफल प्राप्त नहीं करेंगे?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 159

तुम लोगों को परमेश्वर के कार्य के दर्शनों को जानना और उसके कार्य के सामान्य निर्देशों को समझना होगा। यह सकारात्मक प्रवेश है। एक बार जब तुम दर्शनों के सत्य में सही ढंग से महारत हासिल कर लोगे, तो तुम्हारा प्रवेश सुरक्षित हो जाएगा; चाहे परमेश्वर का कार्य कैसे भी क्यों न बदले, तुम अपने हृदय में अडिग बने रहोगे, दर्शनों के बारे में स्पष्ट रहोगे, और तुम्हारे पास तुम्हारे प्रवेश और तुम्हारी खोज के लिए एक लक्ष्य होगा। इस तरह से, तुम्हारे भीतर का समस्त अनुभव और ज्ञान अधिक गहरा और विस्तृत हो जाएगा। एक बार जब तुम इन सारे महत्वपूर्ण चरणों को उनकी संपूर्णता में समझ लोगे, तो तुम्हें जीवन में कोई नुकसान नहीं उठाना पड़ेगा, और तुम भटकोगे नहीं। यदि तुम कार्यों के इन चरणों को नहीं जानोगे, तो तुम्हें इनमें से प्रत्येक चरण पर नुकसान उठाना पड़ेगा, और तुम्हें चीजें ठीक करने में कुछ ज्यादा दिन लगेंगे, और तुम कुछ सप्ताह में भी सही मार्ग पकड़ने में सक्षम नहीं हो पाओगे। क्या इससे देरी नहीं होगी? सकारात्मक प्रवेश और अभ्यास के मार्ग में बहुत-कुछ ऐसा है, जिसमें तुम लोगों को महारत हासिल करनी होगी। जहाँ तक परमेश्वर के कार्य के दर्शनों का संबंध है, तुम्हें इन बिंदुओं को अवश्य समझना चाहिए : उसके विजय के कार्य के मायने, पूर्ण बनाए जाने का भावी मार्ग, परीक्षणों और क्लेश के अनुभवों के माध्यम से क्या हासिल किया जाना चाहिए, न्याय और ताड़ना के मायने, पवित्र आत्मा के कार्य के सिद्धांत, तथा पूर्णता और विजय के सिद्धांत। ये सब दर्शनों के सत्य से संबंध रखते हैं। शेष हैं व्यवस्था के युग, अनुग्रह के युग और राज्य के युग के कार्य के तीन चरण, और साथ ही भावी गवाही। ये भी दर्शनों के सत्य हैं, और ये सर्वाधिक मूलभूत होने के साथ-साथ सर्वाधिक महत्वपूर्ण भी हैं। वर्तमान में तुम लोगों के पास अभ्यास में प्रवेश करने के लिए बहुत-कुछ है, और वह अब बहुस्तरीय और अधिक विस्तृत है। यदि तुम्हें इन सत्यों का कोई ज्ञान नहीं है, तो यह साबित होता है कि तुम्हें अभी प्रवेश करना शेष है। अधिकांश समय लोगों का सत्य का ज्ञान बहुत उथला होता है; वे कुछ बुनियादी सत्यों को अभ्यास में लाने में अक्षम होते हैं और नहीं जानते कि तुच्छ मामलों को भी कैसे सँभाला जाए। लोगों के सत्य का अभ्यास करने में अक्षम होने का कारण यह है कि उनका स्वभाव विद्रोही है, और आज के कार्य का उनका ज्ञान बहुत ही सतही और एकतरफ़ा है। इसलिए, लोगों को पूर्ण बनाए जाने का काम आसान नहीं है। तुम बहुत ज्यादा विद्रोही हो, और तुम अपने पुराने अहं को बहुत ज़्यादा बनाए रखते हो; तुम सत्य के पक्ष में खड़े रहने में अक्षम हो, और तुम सबसे स्पष्ट सत्यों तक का अभ्यास करने में असमर्थ हो। ऐसे लोगों को बचाया नहीं जा सकता और ये वे लोग हैं, जिन्हें जीता नहीं गया है। यदि तुम्हारा प्रवेश न तो विस्तृत है और न ही सोद्देश्य, तो तुम्हारा विकास धीमी गति से होगा। यदि तुम्हारे प्रवेश में जरा-सी भी वास्तविकता नहीं हुई, तो तुम्हारी खोज व्यर्थ हो जाएगी। यदि तुम सत्य के सार से अनभिज्ञ हो, तो तुम अपरिवर्तित रहोगे। मनुष्य के जीवन में विकास और उसके स्वभाव में परिवर्तन वास्तविकता में प्रवेश करने, और इससे भी अधिक, विस्तृत अनुभवों में प्रवेश करने से प्राप्त होते हैं। यदि तुम्हारे प्रवेश के दौरान तुम्हारे पास कई विस्तृत अनुभव हैं, और तुम्हारे पास अधिक वास्तविक ज्ञान और प्रवेश है, तो तुम्हारा स्वभाव शीघ्रता से बदल जाएगा। भले ही वर्तमान में तुम अभ्यास के बारे में पूरी तरह से स्पष्ट न हो, तो भी तुम्हें कम से कम परमेश्वर के कार्य के दर्शनों के बारे में स्पष्ट अवश्य होना चाहिए। यदि नहीं, तो तुम प्रवेश करने में अक्षम होगे; प्रवेश केवल तुम्हें सत्य का ज्ञान होने पर ही संभव है। केवल पवित्र आत्मा द्वारा तुम्हें तुम्हारे अनुभव में प्रबुद्ध करने पर ही तुम सत्य की अधिक गहरी समझ प्राप्त करोगे और अधिक गहराई से प्रवेश करोगे। तुम लोगों को परमेश्वर के कार्य को जानना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 160

आरंभ में, मानवजाति के सृजन के बाद, इस्राएलियों ने परमेश्वर के कार्य के आधार के रूप में काम किया। संपूर्ण इस्राएल पृथ्वी पर यहोवा के कार्य का आधार था। यहोवा का कार्य व्यवस्थाओं की स्थापना करके मनुष्य की सीधे अगुआई और चरवाही करना था, ताकि मनुष्य एक उपयुक्त जीवन जी सके और पृथ्वी पर सही तरीके से यहोवा की आराधना कर सके। व्यवस्था के युग में परमेश्वर मनुष्य के द्वारा न तो देखा जा सकता था और न ही उसे छुआ जा सकता था। क्योंकि उसने उन लोगों का मार्गदर्शन किया, जिन्हें शैतान ने सबसे पहले भ्रष्ट किया था, उन्हें शिक्षा दी, उनकी देखभाल की, उसके वचनों में केवल व्यवस्थाओं, विधानों और मानव-व्यवहार के मानदंड थे, उनमें उन लोगों के लिए जीवन के सत्य नहीं थे। उसकी अगुआई में इस्राएली शैतान द्वारा गहराई से भ्रष्ट नहीं किए गए थे। उसका व्यवस्था का कार्य उद्धार के कार्य में केवल पहला चरण था, उद्धार के कार्य का एकदम आरंभ, और वास्तव में उसका मनुष्य के जीवन-स्वभाव में होने वाले परिवर्तनों से कुछ लेना-देना नहीं था। इसलिए, उद्धार के कार्य के आरंभ में उसे इस्राएल में अपने कार्य के लिए देह धारण करने की कोई आवश्यकता नहीं थी। इसीलिए उसे एक माध्यम—एक उपकरण—की आवश्यकता थी, जिसके ज़रिए मनुष्य के साथ संपर्क किया जा सकता। इस प्रकार, सृजित प्राणियों के मध्य से यहोवा की ओर से बोलने और कार्य करने वाले लोग उठ खड़े हुए, और इस तरह से मनुष्य के पुत्र और नबी मनुष्यों के मध्य कार्य करने के लिए आए। मनुष्य के पुत्रों ने यहोवा की ओर से मनुष्यों के मध्य कार्य किया। यहोवा द्वारा उन्हें "मनुष्य के पुत्र" कहे जाने का अर्थ है कि ऐसे लोग यहोवा की ओर से व्यवस्था निर्धारित करते हैं। वे लोग इस्राएलियों के बीच याजक भी थे; ऐसे याजक, जिनका यहोवा द्वारा ध्यान रखा जाता था और जिनकी रक्षा की जाती थी, जिनमें यहोवा का आत्मा कार्य करता था; वे लोगों के मध्य अगुआ थे और सीधे यहोवा की सेवा करते थे। दूसरी ओर, नबी सभी देशों और सभी कबीलों के लोगों के साथ यहोवा की ओर से बोलने का कार्य करते थे। उन्होंने यहोवा के कार्य की भविष्यवाणी भी की। चाहे वे मनुष्य के पुत्र हों या नबी, सभी को स्वयं यहोवा के आत्मा द्वारा ऊपर उठाया गया था और उनमें यहोवा का कार्य था। लोगों के मध्य ये वे लोग थे, जो सीधे यहोवा का प्रतिनिधित्व करते थे; उन्होंने अपना कार्य केवल इसलिए किया, क्योंकि उन्हें यहोवा ने ऊपर उठाया था, इसलिए नहीं कि वे ऐसे देह थे, जिनमें स्वयं पवित्र आत्मा ने देहधारण किया था। इसलिए, हालाँकि वे परमेश्वर की ओर से बोलने और कार्य करने में एक-समान थे, फिर भी व्यवस्था के युग में वे मनुष्य के पुत्र और नबी देहधारी परमेश्वर का देह नहीं थे। अनुग्रह के युग और अंतिम चरण में परमेश्वर का कार्य ठीक विपरीत था, क्योंकि मनुष्य के उद्धार और न्याय का कार्य दोनों स्वयं देहधारी परमेश्वर द्वारा किए गए थे, इसलिए उसकी ओर से कार्य करने के लिए नबियों और मनुष्य के पुत्रों को फिर से ऊपर उठाने की आवश्यकता नहीं थी। मनुष्य की नज़रों में उनके कार्य के सार और पद्धति में कोई महत्वपूर्ण अंतर नहीं है। इसी कारण से लोग लगातार नबियों एवं मनुष्य के पुत्रों के कार्यों को देहधारी परमेश्वर के कार्य समझ रहे हैं। देहधारी परमेश्वर का रंग-रूप मूल रूप से वैसा ही था, जैसा कि नबियों और मनुष्य के पुत्रों का था। देहधारी परमेश्वर तो नबियों की अपेक्षा और भी अधिक साधारण एवं अधिक वास्तविक था। इसलिए मनुष्य उनके मध्य अंतर करने में अक्षम है। मनुष्य केवल रूप-रंग पर ध्यान देता है, इस बात से पूरी तरह से अनजान, कि यद्यपि दोनों काम करने और बोलने में एक-जैसे हैं, फिर भी उनमें मूलभूत अंतर है। चूँकि चीज़ों को अलग-अलग करके बताने की मनुष्य की क्षमता बहुत ख़राब है, इसलिए वह सरल मुद्दों के बीच अंतर करने में भी अक्षम है, जटिल चीज़ों का तो फिर कहना ही क्या। नबियों और पवित्र आत्मा द्वारा इस्तेमाल किए गए लोग बोलते और कार्य करते थे, तो यह मनुष्य के कर्तव्य निभाने के लिए था, यह एक सृजित प्राणी का कार्य करने के लिए था, जिसे मनुष्य को करना चाहिए। किंतु देहधारी परमेश्वर के वचन और कार्य उसकी सेवकाई करने के लिए थे। यद्यपि उसका बाहरी स्वरूप एक सृजित प्राणी का था, किंतु उसका काम अपना कार्य करने के लिए नहीं, बल्कि अपनी सेवकाई करने के लिए था। "कर्तव्य" शब्द सृजित प्राणियों के संबंध में इस्तेमाल किया जाता है, जबकि "सेवकाई" देहधारी परमेश्वर के देह के संबंध में। इन दोनों के बीच एक अनिवार्य अंतर है; इन दोनों की अदला-बदली नहीं की जा सकती। मनुष्य का कार्य केवल अपना कर्तव्य निभाना है, जबकि परमेश्वर का कार्य अपनी सेवकाई का प्रबंधन करना और उसे कार्यान्वित करना है। इसलिए, यद्यपि कई प्रेरित पवित्र आत्मा द्वारा इस्तेमाल किए गए और कई नबी उसके साथ थे, किंतु फिर भी उनका कार्य और उनके वचन केवल सृजित प्राणियों के रूप में अपना कर्तव्य निभाने के लिए थे। हो सकता है, उनकी भविष्यवाणियाँ देहधारी परमेश्वर द्वारा कहे गए जीवन के मार्ग से बढ़कर रही हों, और उनकी मानवता देहधारी परमेश्वर की मानवता का अतिक्रमण करती हो, पर फिर भी वे अपना कर्तव्य ही निभा रहे थे, सेवकाई पूरी नहीं कर रहे थे। मनुष्य का कर्तव्य उसके कार्य को संदर्भित करता है; मनुष्य के लिए केवल यही प्राप्य है। जबकि, देहधारी परमेश्वर द्वारा की जाने वाली सेवकाई उसके प्रबंधन से संबंधित है, और यह मनुष्य द्वारा अप्राप्य है। चाहे देहधारी परमेश्वर बोले, कार्य करे, या चमत्कार करे, वह अपने प्रबंधन के अंतर्गत महान कार्य कर रहा है, इस प्रकार का कार्य उसके बदले मनुष्य नहीं कर सकता। मनुष्य का कार्य केवल सृजित प्राणी के रूप में परमेश्वर के प्रबंधन के कार्य के किसी दिए गए चरण में केवल अपना कर्तव्य पूरा करना है। परमेश्वर के प्रबंधन के बिना, अर्थात्‌, यदि देहधारी परमेश्वर की सेवकाई खो जाती है, तो सृजित प्राणी का कर्तव्य भी खो जाएगा। अपनी सेवकाई करने में परमेश्वर का कार्य मनुष्य का प्रबंधन करना है, जबकि मनुष्य द्वारा अपने कर्तव्य की पूर्ति स्रष्टा की माँगें पूरी करने के लिए अपने दायित्वों की पूर्ति है, और उसे किसी भी तरह से अपनी सेवकाई करना नहीं माना जा सकता। परमेश्वर के अंतर्निहित सार के लिए—उसके पवित्रात्मा के लिए—परमेश्वर का कार्य उसका प्रबंधन है, किंतु देहधारी परमेश्वर के लिए, जो एक सृजित प्राणी का बाहरी रूप धारण करता है, उसका कार्य अपनी सेवकाई करना है। वह जो कुछ भी कार्य करता है, अपनी सेवकाई करने के लिए करता है, और मनुष्य जो अधिकतम कर सकता है, वह है उसके प्रबंधन के क्षेत्र के भीतर और उसकी अगुआई के अधीन अपना सर्वश्रेष्ठ देना।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 161

अनुग्रह के युग में यीशु ने भी कई वचन बोले और बहुत कार्य किया। वह यशायाह से कैसे अलग था? वह दानिय्येल से कैसे अलग था? क्या वह कोई नबी था? ऐसा क्यों कहा जाता है कि वह मसीह है? उनके मध्य क्या भिन्नताएँ हैं? वे सभी मनुष्य थे, जिन्होंने वचन बोले थे, और उनके वचन मनुष्य को लगभग एक-से प्रतीत होते थे। उन सभी ने वचन बोले और कार्य किए। पुराने विधान के नबियों ने भविष्यवाणियाँ कीं, और उसी तरह से, यीशु भी वैसा ही कर सकता था। ऐसा क्यों है? यहाँ भेद कार्य की प्रकृति के आधार पर है। इस मामले को समझने के लिए तुम्हें देह की प्रकृति पर विचार नहीं करना चाहिए, न ही तुम्हें उनके वचनों की गहराई या सतहीपन पर विचार करना चाहिए। तुम्हें हमेशा सबसे पहले उनके कार्य और उसके द्वारा मनुष्य में प्राप्त किए जाने वाले परिणामों पर विचार करना चाहिए। उस समय नबियों द्वारा की गई भविष्यवाणियों ने मनुष्य के जीवन की आपूर्ति नहीं की, यशायाह और दानिय्येल जैसे लोगों द्वारा प्राप्त की गई प्रेरणाएँ मात्र भविष्यवाणियाँ थीं, जीवन का मार्ग नहीं। यदि यहोवा की ओर से प्रत्यक्ष प्रकाशन नहीं होता, तो कोई भी इस कार्य को नहीं कर सकता था, जो नश्वर लोगों के लिए संभव नहीं है। यीशु ने भी कई वचन बोले, परंतु वे वचन जीवन का मार्ग थे, जिनमें से मनुष्य अभ्यास का मार्ग प्राप्त कर सकता था। दूसरे शब्दों में, एक तो वह मनुष्य के जीवन की आपूर्ति कर सकता था, क्योंकि यीशु जीवन है; दूसरे, वह मनुष्यों के विचलनों को उलट सकता था; तीसरे, युग को आगे बढ़ाने के लिए उसका कार्य यहोवा के कार्य का अनुवर्ती हो सकता था; चौथे, वह मनुष्य के भीतर की आवश्यकताएँ जान सकता था और समझ सकता था कि मनुष्य में किस चीज का अभाव है; पाँचवें, वह नए युग का सूत्रपात कर सकता था और पुराने युग का समापन कर सकता था। यही कारण है कि उसे परमेश्वर और मसीह कहा जाता है; वह न केवल यशायाह से भिन्न है, अपितु अन्य सभी नबियों से भी भिन्न है। नबियों के कार्य के लिए तुलना के रूप में यशायाह को लें। पहले तो वह मनुष्य के जीवन की आपूर्ति नहीं कर सकता था; दूसरे, वह नए युग का सूत्रपात नहीं कर सकता था। वह यहोवा की अगुआई के अधीन कार्य कर रहा था, न कि नए युग का सूत्रपात करने के लिए। तीसरे, उसके द्वारा बोले गए शब्द उससे परे थे। वह सीधे परमेश्वर के आत्मा से प्रकाशन प्राप्त कर रहा था, और दूसरे लोग उन्हें सुनकर भी नहीं समझे होंगे। ये कुछ चीज़ें अकेले ही यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं कि उसके वचन भविष्यवाणियों से अधिक और यहोवा के बदले किए गए कार्य के एक पहलू से ज़्यादा कुछ नहीं थे। वह पूरी तरह से यहोवा का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता था। वह यहोवा का सेवक था, यहोवा के काम में एक उपकरण। वह केवल व्यवस्था के युग के भीतर और यहोवा के कार्य-क्षेत्र के भीतर ही कार्य कर रहा था; उसने व्यवस्था के युग से आगे कार्य नहीं किया। इसके विपरीत, यीशु का कार्य भिन्न था। उसने यहोवा के कार्य-क्षेत्र को पार कर लिया; उसने देहधारी परमेश्वर के रूप में कार्य किया और संपूर्ण मानवजाति के छुटकारे के लिए सलीब पर चढ़ गया। दूसरे शब्दों में, उसने यहोवा द्वारा किए गए कार्य के बाहर नया कार्य किया। यह नए युग का सूत्रपात करना था। इसके अतिरिक्त, वह उस बारे में बोलने में सक्षम था, जिसे मनुष्य प्राप्त नहीं कर सकता था। उसका कार्य परमेश्वर के प्रबंधन के भीतर का कार्य था, जो संपूर्ण मानवजाति को समाविष्ट करता था। उसने मात्र कुछ ही मनुष्यों में कार्य नहीं किया, न ही उसका कार्य कुछ सीमित संख्या के लोगों की अगुआई करना था। जहाँ तक इस बात का संबंध है कि कैसे परमेश्वर मनुष्य के रूप में देहधारी हुआ, कैसे उस समय पवित्रात्मा ने प्रकाशन दिए, और कैसे पवित्रात्मा कार्य करने के लिए एक मनुष्य पर उतरा, तो ये ऐसी बातें हैं, जिन्हें मनुष्य देख या छू नहीं सकता। इन सत्यों का इस बात का साक्ष्य होना सर्वथा असंभव है कि वह देहधारी परमेश्वर है। इस प्रकार, अंतर केवल परमेश्वर के वचनों और कार्य में ही किया जा सकता है, जो मनुष्य के लिए दृष्टिगोचर हैं। केवल यही वास्तविक है। इसका कारण यह है कि पवित्रात्मा के मामले तुम्हारे लिए दृष्टिगोचर नहीं हैं और केवल स्वयं परमेश्वर को ही स्पष्ट रूप से ज्ञात हैं, यहाँ तक कि देहधारी परमेश्वर का देह भी सारी चीज़ें नहीं जानता; तुम केवल उसके द्वारा किए गए कार्य से ही सत्यापन कर सकते हो कि वह परमेश्वर है या नहीं? उसके कार्यों से यह देखा जा सकता है कि एक तो वह एक नए युग की शुरुआत करने में सक्षम है; दूसरे, वह मनुष्य के जीवन की आपूर्ति करने और मनुष्य को अनुसरण का मार्ग दिखाने में सक्षम है। यह इस बात को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि वह स्वयं परमेश्वर है। कम से कम, जो कार्य वह करता है, वह पूरी तरह से परमेश्वर के आत्मा का प्रतिनिधित्व कर सकता है, और ऐसे कार्य से यह देखा जा सकता है कि परमेश्वर का आत्मा उसके भीतर है। चूँकि देहधारी परमेश्वर द्वारा किया गया कार्य मुख्य रूप से नए युग का सूत्रपात करना, नए कार्य की अगुआई करना और नया राज्य खोलना था, इसलिए ये कुछ स्थितियाँ अकेले ही यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं कि वह स्वयं परमेश्वर है। इस प्रकार यह उसे यशायाह, दानिय्येल और अन्य महान नबियों से भिन्नता प्रदान करता है। यशायाह, दानिय्येल और अन्य नबी उच्च शिक्षित वर्ग के और सुसंस्कृत मनुष्य थे; वे यहोवा की अगुआई में असाधारण लोग थे। देहधारी परमेश्वर का देह भी ज्ञान-संपन्न था और उसमें विवेक का अभाव नहीं था, किंतु उसकी मानवता विशेष रूप से सामान्य थी। वह एक साधारण मनुष्य था, और नग्न आँखें उसके बारे में कोई विशेष मानवता नहीं देख सकती थीं या उसकी मानवता में दूसरों से भिन्न कोई बात नहीं ढूँढ़ सकती थीं। वह अलौकिक या अद्वितीय बिलकुल नहीं था, और वह उच्चतर शिक्षा, ज्ञान या सिद्धांत से संपन्न भी नहीं था। जिस जीवन के बारे में उसने कहा और जिस मार्ग की उसने अगुआई की, वे सिद्धांत के माध्यम से, ज्ञान के माध्यम से, जीवन के अनुभव के माध्यम से अथवा पारिवारिक पालन-पोषण के माध्यम से प्राप्त नहीं किए गए थे। बल्कि, वे पवित्र आत्मा का प्रत्यक्ष कार्य थे, जो कि देहधारी देह का कार्य है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि परमेश्वर के बारे में मनुष्य महान धारणाएँ रखता है, और विशेष रूप से चूँकि ये धारणाएँ बहुत सारे अस्पष्ट और अलौकिक तत्त्वों से बनी हैं, इसलिए मनुष्य की दृष्टि में मानवीय कमज़ोरियों वाला साधारण परमेश्वर, जो संकेत और चमत्कार प्रदर्शित नहीं कर सकता, वह निश्चित रूप से परमेश्वर नहीं है। क्या ये मनुष्य की गलत धारणाएँ नहीं है? यदि देहधारी परमेश्वर का देह एक सामान्य मनुष्य न होता, तो उसे देह बन जाना कैसे कहा जा सकता था? देह का होना एक साधारण, सामान्य मनुष्य होना है; यदि वह कोई ज्ञानातीत प्राणी होता, तो फिर वह देह का नहीं होता। यह साबित करने के लिए कि वह देह का है, देहधारी परमेश्वर को एक सामान्य देह धारण करने की आवश्यकता थी। यह सिर्फ़ देहधारण के मायने पूरे करने के लिए था। किंतु नबियों और मनुष्य के पुत्रों के साथ यह मामला नहीं था। वे पवित्र आत्मा द्वारा इस्तेमाल किए गए मेधावी मनुष्य थे; मनुष्य की नज़रों में उनकी मानवता विशेष रूप से महान थी, और उन्होंने ऐसे कई कार्य किए, जो सामान्य मानवता से आगे निकल गए। इसी कारण से, मनुष्य ने उन्हें परमेश्वर माना। अब तुम सब लोगों को इसे स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए, क्योंकि यह एक ऐसा मुद्दा रहा है, जिसे पिछले युगों में सभी मनुष्यों द्वारा सर्वाधिक आसानी से गलत समझा गया है। इसके अतिरिक्त, देहधारण सबसे अधिक रहस्यमय चीज़ है, और देहधारी परमेश्वर को स्वीकार करना मनुष्य के लिए सर्वाधिक कठिन है। मैं जो कहता हूँ, वह तुम लोगों को अपना कार्य पूरा करने और देहधारण का रहस्य समझने में सहायक है। यह सब परमेश्वर के प्रबंधन, उसके दर्शनों से संबंधित है। इसके बारे में तुम लोगों की समझ दर्शनों, अर्थात् परमेश्वर के प्रबंधन के कार्य, का ज्ञान प्राप्त करने में अधिक लाभदायक होगी। इस तरह, तुम लोग विभिन्न प्रकार के लोगों द्वारा अवश्य करने योग्य कर्तव्य के बारे में और अधिक समझ प्राप्त करोगे। यद्यपि ये वचन तुम्हें प्रत्यक्ष रूप से मार्ग नहीं दिखाते, फिर भी ये तुम लोगों के प्रवेश के लिए बहुत सहायक हैं, क्योंकि वर्तमान में तुम लोगों के जीवन में दर्शनों का अत्यधिक अभाव है, और यह तुम लोगों के प्रवेश में रुकावट डालने वाली एक महत्वपूर्ण बाधा बन जाएगा। यदि तुम लोग इन मुद्दों को समझने में अक्षम रहते हो, तो तुम लोगों के प्रवेश को प्रेरित करने वाली कोई प्रेरणा नहीं होगी। और इस तरह की खोज तुम लोगों को अपना कर्तव्य पूरा करने में सक्षम कैसे बना सकती है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 162

कुछ लोग पूछेंगे, "देहधारी परमेश्वर के द्वारा किये गए कार्य और अतीत के भविष्यद्वक्ताओं और प्रेरितों के द्वारा किये गए कार्य में क्या अन्तर है?" दाऊद को भी प्रभु कहकर पुकारा गया था, और उसी प्रकार यीशु को भी; यद्यपि उन्होंने जो कार्य किया वह भिन्न था, फिर भी उन्हें एक जैसे ही नाम से पुकारा गया था। तुम क्यों कहते हो कि उनकी पहचान एक जैसी नहीं थी? जिसकी यूहन्ना ने गवाही दी थी वह एक दर्शन था, ऐसा दर्शन जो पवित्र आत्मा से भी आया था, और वह उन वचनों को कहने में समर्थ था जो पवित्र आत्मा ने कहने का इरादा किया था; तो यूहन्ना की पहचान यीशु से भिन्न क्यों है? यीशु के द्वारा कहे गए वचन परमेश्वर का पूरी तरह से प्रतिनिधित्व करने, और परमेश्वर के कार्य का पूरी तरह से प्रतिनिधित्व करने में समर्थ थे। जो यूहन्ना ने देखा वह एक दर्शन था, और वह परमेश्वर के कार्य का पूरी तरह से प्रतिनिधित्व करने में असमर्थ था। ऐसा क्यों है कि यूहन्ना, पतरस, और पौलुस ने बहुत से वचन कहे—जैसे यीशु ने कहे थे—फिर भी उनके पास यीशु के समान पहचान नहीं थी? मुख्य रूप से ऐसा इसलिए है क्योंकि उन्होंने जो कार्य किया वह भिन्न था। यीशु ने परमेश्वर के आत्मा का प्रतिनिधित्व किया, और वह परमेश्वर का आत्मा था जो सीधे तौर पर कार्य कर रहा था। उसने नये युग का कार्य किया, ऐसा कार्य जिसे पहले कभी किसी ने नहीं किया था। उसने एक नया मार्ग प्रशस्त किया, उसने यहोवा का प्रतिनिधित्व किया, और उसने स्वयं परमेश्वर का प्रतिनिधित्व किया। जबकि पतरस, पौलुस और दाऊद, इस बात की परवाह किए बिना कि उन्हें क्या कहकर पुकारा जाता था, उन्होंने केवल परमेश्वर के एक प्राणी की पहचान का प्रतिनिधित्व किया था, और उन्हें सिर्फ यीशु या यहोवा के द्वारा भेजा गया था। इसलिए भले ही उन्होंने कितना ही काम क्यों न किया हो, भले ही उन्होंने कितने ही बड़े चमत्कार क्यों न किये हों, वे तब भी बस परमेश्वर के प्राणी ही थे, और परमेश्वर के आत्मा का प्रतिनिधित्व करने में असमर्थ थे। उन्होंने परमेश्वर के नाम पर या परमेश्वर के द्वारा भेजे जाने के बाद ही कार्य किया था; इससे भी बढ़कर, उन्होंने यीशु या यहोवा के द्वारा शुरू किए गए युगों में कार्य किया था, और उन्होंने जो कार्य किया वह पृथक नहीं था। आख़िरकार, वे मात्र परमेश्वर के प्राणी ही थे। पुराने नियम में, बहुत सारे भविष्यद्वक्ताओं ने भविष्यवाणियाँ की थीं, या भविष्यवाणी की पुस्तकें लिखी थीं। किसी ने भी नहीं कहा था कि वे परमेश्वर हैं, परन्तु जैसे ही यीशु ने कार्य करना आरम्भ किया, परमेश्वर के आत्मा ने उसकी गवाही दी कि वह परमेश्वर है। ऐसा क्यों है? इस बिन्दु पर तुम्हें पहले से ही जान लेना चाहिए! इससे पहले, प्रेरितों और भविष्यद्वक्ताओं ने विभिन्न धर्मपत्र लिखे, और बहुत सी भविष्यवाणियाँ कीं। बाद में, लोगों ने बाइबल में रखने के लिए उनमें से कुछ को चुन लिया, और कुछ खो गई थीं। चूँकि ऐसे लोग हैं जो कहते हैं कि उनके द्वारा बोला गया सब कुछ पवित्र आत्मा से आया, तो क्यों इसमें से कुछ को अच्छा माना जाता है, और इसमें से कुछ को खराब माना जाता है? और क्यों कुछ को चुना गया था, और अन्यों को नहीं? यदि वे वाकई में पवित्र आत्मा के द्वारा कहे गए वचन होते, तो क्या लोगों को उनका चयन करने की आवश्यकता होती? क्यों यीशु के द्वारा बोले गए वचनों और उस कार्य का विवरण जो उसने किया चारों सुसमाचारों में से प्रत्येक में भिन्न-भिन्न है? क्या यह उन लोगों का दोष नहीं हैं जिन्होंने इसे दर्ज किया? कुछ लोग पूछेंगे, "चूँकि पौलुस और नए नियम के लेखकों द्वारा लिखे गए धर्मपत्र और वह कार्य जो उन्होंने किया था वे आंशिक रूप से मनुष्य की इच्छा से आये थे, और मनुष्य की धारणाओं के साथ मिश्रित हो गए थे, तो क्या उन वचनों में कोई मानवीय अशुद्धता नहीं है जिन्हें आज तुम (परमेश्वर) बोलते हो, क्या उनमें वास्तव में कोई भी मानवीय धारणा शामिल नहीं है?" परमेश्वर के द्वारा किये गए कार्य का यह चरण पौलुस और अनेक प्रेरितों और भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा किये गए कार्य से पूरी तरह से भिन्न है। न केवल यहाँ पहचान में अन्तर है, बल्कि, मुख्य रूप से, कार्यान्वित किए गए कार्य में भी अन्तर है। जब पौलुस को नीचे गिराया गया और वह प्रभु के सामने गिर पड़ा उसके पश्चात्, कार्य करने के लिए पवित्र आत्मा के द्वारा उसकी अगुवाई की गई थी, और वह एक भेजा हुआ बन गया था। और इसलिए उसने कलीसियाओं को धर्मपत्र लिखे, और इन सभी धर्मपत्रों ने यीशु की शिक्षाओं का अनुसरण किया था। पौलुस को प्रभु यीशु के नाम पर कार्य करने के लिए प्रभु के द्वारा भेजा गया था, परन्तु जब परमेश्वर स्वयं आया, तो उसने किसी नाम में कार्य नहीं किया, तथा अपने कार्य में किसी और का नहीं बल्कि परमेश्वर के आत्मा का प्रतिनिधित्व किया। परमेश्वर अपने कार्य को सीधे तौर पर करने के लिए आया: उसे मनुष्य के द्वारा सिद्ध नहीं बनाया गया था, और उसके कार्य को किसी मनुष्य की शिक्षाओं के आधार पर कार्यान्वित नहीं किया गया था। कार्य के इस चरण में परमेश्वर अपने व्यक्तिगत अनुभवों के बारे में बात करने के द्वारा अगुवाई नहीं करता है, बल्कि इसके बजाए जो कुछ उसके पास है उसके अनुसार अपने कार्य को सीधे तौर पर कार्यान्वित करता है। उदाहरण के लिए, सेवा करने वालों की परीक्षा, ताड़ना का समय, मृत्यु का कार्य, और मृत्यु की परीक्षा, परमेश्वर से प्रेम करने का समय...। यह सब वह कार्य है जो पहले कभी नहीं किया गया है, और ऐसा कार्य है जो, मनुष्य के अनुभवों के बजाय, वर्तमान युग का है। उन वचनों में जो मैंने कहे है, मनुष्य के अनुभव कौन से हैं? क्या वे सब सीधे तौर पर पवित्रात्मा से नहीं आते हैं, और क्या वे पवित्रात्मा के द्वारा जारी नहीं किये जाते हैं? बस इतना ही है कि तुम्हारी क्षमता इतनी कम है कि तुम सत्य की सही प्रकृति को देखने में असमर्थ हो! जीवन का वह व्यावहारिक तरीका जिसके बारे में मैं कहता हूँ पथ के मार्गदर्शन के लिए है, और इसे किसी के द्वारा पहले कभी नहीं कहा गया है, न ही कभी किसी ने इस पथ का अनुभव किया है, या इसकी वास्तविकता को जाना है। इन वचनों को मेरे कहने से पहले, किसी ने कभी उन्हें नहीं कहा था। किसी ने कभी ऐसे अनुभवों के बारे में बात नहीं की थी, न ही उन्होंने कभी ऐसे विवरणों को कहा था, और, इससे भी बढ़ कर, किसी ने भी इन चीज़ों को प्रकट करने के लिए ऐसी अवस्थाओं की ओर कभी संकेत नहीं किया था। किसी ने कभी भी उस पथ की अगुवाई नहीं की जिसकी अगुवाई आज मैं करता हूँ, और यदि इसकी अगुवाई मनुष्य के द्वारा की जाती, तो यह एक नया मार्ग नहीं होता। उदाहरण के लिए, पौलुस और पतरस को लें। उनके पास यीशु द्वारा पथ की अगुआई किए जाने से पहले अपने स्वयं के कोई व्यक्तिगत अनुभव नहीं थे। जब यीशु ने उस पथ की अगुवाई की केवल उसके बाद ही उन्होंने यीशु के द्वारा बोले गए वचनों का, और उसके द्वारा अगुआई किए गए पथ का अनुभव किया; इससे उन्होंने अनेक अनुभव अर्जित किए, और धर्मपत्रों को लिखा। और इस प्रकार, मनुष्य के अनुभव उसके समान नहीं हैं जैसा परमेश्वर का कार्य है, और परमेश्वर का कार्य उस ज्ञान के समान नहीं है जैसा मनुष्य की धारणाओं और अनुभवों के द्वारा वर्णन किया जाता है। मैंने बार-बार कहा है कि मैं एक नए पथ की अगुवाई कर रहा हूँ, और नया कार्य कर रहा हूँ, और मेरा कार्य और मेरे कथन यूहन्ना और अन्य सभी भविष्यद्वक्ताओं से भिन्न हैं। मैं कभी भी ऐसा नहीं करता हूँ कि पहले अनुभवों को प्राप्त करूँ और फिर उन्हें तुम लोगों से कहूँ—ऐसा मामला तो बिल्कुल भी नहीं है। यदि ऐसा होता, तो क्या इससे तुम लोगों को बहुत पहले ही देर न हो जाती? अतीत में, जिस ज्ञान के बारे में बहुतों ने बात की थी उसे भी ऊँचा उठा दिया जाता, परन्तु उनके सभी वचनों को केवल उन तथाकथित आध्यात्मिक व्यक्तियों के आधार पर बोला गया था। उन्होंने मार्ग का मार्गदर्शन नहीं किया, परन्तु वे उनके अनुभवों से आये थे, जो कुछ उन्होंने देखा था उससे, और उनके ज्ञान से आये थे। कुछ उनकी धारणाएँ थीं, और कुछ अनुभव थे जिनका उन्होंने सार प्रस्तुत किया था। आज, मेरे कार्य का स्वभाव उनसे पूरी तरह से भिन्न है। मैंने दूसरों के द्वारा अगुवाई किये जाने का अनुभव नहीं किया है, न ही मैंने दूसरों के द्वारा सिद्ध किये जाने को स्वीकार किया है। इससे भी बढ़ कर, मैंने जो कुछ भी कहा और जिसकी भी संगति की है वह सब किसी भी अन्य के असदृश है, और किसी अन्य के द्वारा कभी नहीं बोला गया है। आज, इस बात की परवाह किए बिना कि तुम कौन हो, तुम लोगों का कार्य उन वचनों के आधार पर कार्यान्वित किया जाता है जिन्हें मैं बोलता हूँ। इन कथनों और कार्य के बिना, कौन इन चीज़ों का अनुभव करने में सक्षम होता (सेवा करने वालों की परीक्षा, ताड़ना का समय...), और कौन ऐसे ज्ञान को कहने में समर्थ होता? क्या तुम सचमुच इसे देखने में असमर्थ हो? इस बात से फर्क नहीं पड़ता है कि, जैसे ही मेरे वचन कहे जाते हैं, तुम लोग मेरे वचनों के अनुसार कार्य के किस कदम पर संगति करना शुरू करते हो, और उनके अनुसार काम करते हो, और यह ऐसा मार्ग नहीं है जिसके बारे में तुम लोगों में से किसी ने भी सोचा है। इतनी दूर तक आने के बाद, क्या तुम इतने स्पष्ट और सरल प्रश्न को देखने में असमर्थ हो? यह ऐसा मार्ग नहीं है जिसे किसी ने सोचा है, न ही यह किसी आध्यात्मिक व्यक्ति पर आधारित है। यह एक नया पथ है, और यहाँ तक कि बहुत से वचन भी जिन्हें कभी यीशु के द्वारा कहा गया था वे अब और लागू नहीं होते हैं। जो मैं कहता हूँ वह एक नये युग को शुरू करने का कार्य है, और यह ऐसा कार्य है जो अकेला जारी रहता है; जो कार्य मैं करता हूँ, और जो वचन मैं कहता हूँ, वे सब नए हैं। क्या यह आज का नया कार्य नहीं है? यीशु का कार्य भी इसके जैसा ही था। उसका कार्य भी मन्दिर के लोगों से भिन्न था, और इसलिए यह फरीसियों के कार्य से भी भिन्न था, और न ही यह उस कार्य के समान था जो इस्राएल के सभी लोगों के द्वारा किया गया था। इसे देखने के बाद, लोग अपने मन नहीं बना सके: क्या इसे सचमुच में परमेश्वर के द्वारा किया गया था? यीशु ने यहोवा की व्यवस्था को नहीं माना; जब वह मनुष्य को सिखाने आया, तो जो कुछ उसने कहा वह उससे नया और भिन्न था जिन्हें प्राचीन संतों और पुराने नियम के भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा कहा गया था, और इस वजह से, लोग अनिश्चित बने रहे। यह वह बात है जिससे मनुष्य के साथ निपटना बहुत ही कठिन हो जाता है। कार्य के इस नये चरण को स्वीकार करने से पहले, वह पथ जिस पर तुम में से अधिकतर लोग चलते थे वह उन आध्यात्मिक व्यक्तियों की उस नींव का अभ्यास करना और उसमें प्रवेश करना था। परन्तु आज, वह कार्य जिसे मैं करता हूँ वह बहुत ही भिन्न है, और इसलिए तुम लोग यह निर्णय लेने में असमर्थ हो कि यह सही है या नहीं। मैं परवाह नहीं करता हूँ कि पहले तुम किस पथ पर चले थे, न ही मेरी इसमें रुचि है कि तुमने किसका "भोजन" खाया था, या किसे तुमने अपने "पिता" के रूप में अपनाया था। चूँकि मैं आ गया हूँ और मनुष्य का मार्गदर्शन करने के लिए नया कार्य लाया हूँ, इसलिए जो मेरा अनुसरण करते हैं उन सभी को जो कुछ मैं कहता हूँ उसके अनुसार अवश्य कार्य करना चाहिए। तुम चाहे कितने ही सामर्थ्यवान "परिवार" से क्यों न आते हो, तुम्हें मेरा अनुसरण करना ही होगा, तुम्हें अपने पहले के अभ्यासों के अनुसार काम नहीं करना चाहिए, तुम्हारे "पालक पिता" को पद से हट जाना चाहिए, और अपना न्यायसंगत हिस्सा खोजने के लिए तुम्हें अपने परमेश्वर के सामने आना चाहिए। तुम समग्र रूप से मेरे ही हाथों में हो, और तुम्हें अपने पालक पिता के प्रति बहुत अधिक अंधा विश्वास अर्पित नहीं करना चाहिए; वह तुम्हें पूरी तरह से नियन्त्रित नहीं कर सकता है। आज का कार्य अकेले जारी है। जो कुछ मैं आज कहता हूँ वह सब स्पष्ट रुप से अतीत की किसी बुनियाद पर आधारित नहीं है; यह एक नई शुरुआत है, और यदि तुम कहो कि इसे मनुष्य के हाथ से सृजित किया जाता है, तो तुम ऐसे व्यक्ति हो जो इतना अंधा है कि बचाया नहीं जा सकता है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'उपाधियों और पहचान के सम्बन्ध में' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 163

यशायाह, यहेजकेल, मूसा, दाऊद, अब्राहम और दानिय्येल इस्राएल के चुने हुए लोगों में से अगुवे या भविष्यद्वक्ता थे। उन्हें परमेश्वर क्यों नहीं कहा गया था? क्यों पवित्र आत्मा ने उनकी गवाही नहीं दी? क्यों जैसे ही यीशु ने अपना कार्य प्रारम्भ किया और अपने वचनों को बोलना आरम्भ किया तो पवित्र आत्मा ने यीशु की गवाही दी? और क्यों पवित्र आत्मा ने अन्य लोगों की गवाही नहीं दी? जो मनुष्य हाड़-माँस के थे, उन्हें, "प्रभु" कहकर पुकारा जाता था। इस बात की परवाह किये बिना कि उन्हें क्या कहकर पुकारा जाता था, उनका कार्य उनके अस्तित्व और सार को दर्शाता है, और उनका अस्तित्व और सार उनकी पहचान को दर्शाता है। उनका सार उनकी पदवियों से सम्बंधित नहीं है; जो कुछ वे अभिव्यक्त करते थे, और जैसा जीवन वे जीते थे उसके द्वारा इसे दर्शाया जाता है। पुराने नियम में, प्रभु कहकर पुकारा जाना सामान्य बात से बढ़कर और कुछ नहीं था, और किसी भी व्यक्ति को किसी भी तरह से पुकारा जा सकता था, परन्तु उसका सार और अंतर्निहित पहचान अपरिवर्तनीय रहती थी। उन झूठे मसीहाओं, झूठे भविष्यद्वक्ताओं और धोखेबाजों के बीच, क्या ऐसे लोग भी नहीं हैं जिन्हें "परमेश्वर" कहा जाता है? और क्यों वे परमेश्वर नहीं हैं? क्योंकि वे परमेश्वर का कार्य करने में असमर्थ हैं। मूलतः वे मनुष्य, लोगों को धोखा देने वाले हैं, न कि परमेश्वर; और इसलिए उनके पास परमेश्वर की पहचान नहीं है। क्या बारह गोत्रों में दाऊद को भी प्रभु कहकर नहीं पुकारा जाता था? यीशु को भी प्रभु कहकर पुकारा गया था; क्यों सिर्फ यीशु को ही देहधारी परमेश्वर कहकर पुकारा गया था? क्या यिर्मयाह को भी मनुष्य के पुत्र के रूप में नहीं जाना जाता था? और क्या यीशु को मनुष्य के पुत्र के रूप में नहीं जाना जाता था? क्यों यीशु को परमेश्वर की ओर से सलीब पर चढ़ाया गया था? क्या ऐसा इसलिए नहीं है क्योंकि उसका सार भिन्न था? क्या ऐसा इसलिए नहीं है क्योंकि जो कार्य उसने किया वह भिन्न था? क्या पद नाम से फर्क पड़ता है? यद्यपि यीशु को भी मनुष्य का पुत्र कहा जाता था, फिर भी वह परमेश्वर का पहला देहधारण था, वह सामर्थ्य ग्रहण करने, और छुटकारे के कार्य को पूरा करने के लिए आया था। यह साबित करता है कि यीशु की पहचान और सार उन दूसरों से भिन्न थे जिन्हें भी मनुष्य का पुत्र कहा जाता था। आज, तुम लोगों में से कौन यह कहने का साहस कर सकता है कि सभी वचन जिन्हें उन लोगों के द्वारा कहा गया था जिन्हें पवित्र आत्मा के द्वारा उपयोग किया गया था, पवित्र आत्मा से आये थे? क्या किसी में ऐसी चीज़ें कहने का साहस है? यदि तुम ऐसी चीज़ें कहते हो, तो फिर क्यों एज्रा की भविष्यवाणी की पुस्तक को अलग छोड़ दिया गया था, और क्यों यही चीज़ उन प्राचीन संतों और भविष्यद्वक्ताओं की पुस्तकों के साथ की गई थी? यदि वे सभी पवित्र आत्मा से आयी थीं, तो तुम लोग क्यों ऐसे स्वेच्छाचारी चुनाव करने का साहस करते हो? क्या तुम पवित्र आत्मा के कार्य को चुनने के योग्य हो? इस्राएल की बहुत सारी कहानियों को भी अलग छोड़ दिया गया था। और यदि तुम मानते हो कि अतीत के ये सभी लेख पवित्र आत्मा से आये, तो फिर क्यों कुछ पुस्तकों को अलग छोड़ दिया गया था? यदि वे सभी पवित्र आत्मा से आये, तो उन सब को सुरक्षित रखा जाना चाहिए, और पढ़ने के लिए कलीसियाओं के भाइयों और बहनों को भेजा जाना चाहिए। उन्हें मानवीय इच्छा के अनुसार नहीं चुना या अलग छोड़ा जाना चाहिए; ऐसा करना ग़लत है। यह कहना कि पौलुस और यूहन्ना के अनुभव उनके व्यक्तिगत अवलोकनों के साथ घुल-मिल गए थे इसका यह मतलब नहीं है कि उनके अनुभव और ज्ञान शैतान से आये थे, बल्कि बात केवल इतनी है कि उनके पास ऐसी चीज़ें थीं जो उनके व्यक्तिगत अनुभवों और अवलोकनों से आई थीं। उनका ज्ञान उस समय के वास्तविक अनुभवों की पृष्ठभूमि के अनुसार था, और कौन आत्मविश्वास के साथ कह सकता था कि यह सब पवित्र आत्मा से आया था। यदि चारों सुसमाचार पवित्र आत्मा से आये, तो ऐसा क्यों था कि मत्ती, मरकुस, लूका और यूहन्ना प्रत्येक ने यीशु के कार्य के बारे कुछ भिन्न कहा? यदि तुम लोग इस पर विश्वास नहीं करते हो, तो फिर तुम बाइबल के विवरणों में देखो कि किस प्रकार पतरस ने यीशु को तीन बार नकारा था: वे सब भिन्न हैं, और उनमें से प्रत्येक की अपनी विशेषताएँ हैं। बहुत से लोग जो अज्ञानी हैं वे कहते हैं, "देहधारी परमेश्वर भी एक मनुष्य था, तो क्या जो वचन वह कहता है पूरी तरह से पवित्र आत्मा से आ सकते हैं? जब पौलुस और यूहन्ना के वचन मानवीय इच्छा के साथ मिले हुए थे, तो क्या जिन वचनों को वो कहता है वे वास्तव में मानवीय इच्छा के साथ मिले हुए नहीं हैं?" जो लोग ऐसी बातें करते हैं वे अन्धे, और अज्ञानी हैं! चारों सुसमाचारों को ध्यानपूर्वक पढ़ो; पढ़ो कि उन्होंने उन चीज़ों के बारे में क्या दर्ज किया है जो यीशु ने की थीं, और उन वचनों को पढ़ो जो उसने कहे थे। प्रत्येक विवरण, एकदम सरल रूप में, भिन्न था, और प्रत्येक का उसका अपना परिप्रेक्ष्य था। यदि इन पुस्तकों के लेखकों के द्वारा जो कुछ लिखा गया था वह सब पवित्र आत्मा से आया, तो यह सब एक समान और सुसंगत होना चाहिए। तो फिर क्यों उनमें विसंगतियाँ हैं? क्या मनुष्य अत्यंत मूर्ख नहीं है जो इसे देखने में असमर्थ है? यदि तुम्हें परमेश्वर की गवाही देने के लिए कहा जाता, तो तुम किस प्रकार की गवाही प्रदान कर सकते हो? क्या परमेश्वर को जानने का ऐसा तरीका उसकी गवाही दे सकता है? यदि अन्य लोग तुमसे पूछें, "यदि यूहन्ना और लूका के लेख मानवीय इच्छा के साथ मिश्रित हो गए थे, तो क्या तुम लोगों के परमेश्वर के द्वारा कहे गए वचन मानवीय इच्छा से मिश्रित नहीं हो जाते हैं?" क्या तुम एक स्पष्ट उत्तर दे पाओगे? लूका और मत्ती ने यीशु के वचनों को सुना, और यीशु के कार्यों को देखा उसके पश्चात्, उन्होंने यीशु के द्वारा किये गए कुछ तथ्यों के संस्मरणों का विवरण देने के तरीके से अपने स्वयं के ज्ञान के बारे में बोला था। क्या तुम कह सकते हो कि उनके ज्ञान को पूरी तरह से पवित्र आत्मा के द्वारा प्रकट किया गया था? बाइबल के बाहर, कई आध्यात्मिक व्यक्ति थे जिनके पास उनसे भी अधिक ज्ञान था; क्यों बाद की पीढ़ियों के द्वारा उनके वचनों को नहीं अपनाया गया था? क्या उनका भी पवित्र आत्मा के द्वारा उपयोग नहीं किया गया था? यह जान लें कि आज के कार्य में, मैं यीशु के कार्य की बुनियाद के आधार पर अपने स्वयं के देखने के बारे में नहीं बोल रहा हूँ, और न ही मैं यीशु के कार्य की पृष्ठभूमि के सामने अपने स्वयं के ज्ञान के बारे में बोल रहा हूँ। उस समय यीशु ने कौन सा कार्य किया था? और आज मैं कौन सा कार्य कर रहा हूँ? जो मैं करता और कहता हूँ उसकी कोई मिसाल नहीं है। जिस पथ पर मैं आज चलता हूँ उस पर इससे पहले कभी नहीं गया गया है, इस पर युगों-युगों से लोगों और अतीत की पीढ़ियों के द्वारा कभी नहीं चला गया था। आज, इसे खोल दिया गया है, और क्या यह पवित्र आत्मा का कार्य नहीं है? यद्यपि यह पवित्र आत्मा का कार्य था, फिर भी अतीत के सभी अगुवाओं ने अपने कार्य को औरों की बुनियाद पर कार्यान्वित किया था; हालाँकि, स्वयं परमेश्वर का कार्य भिन्न होता है। यीशु के कार्य का चरण वही था: उसने एक नया मार्ग प्रशस्त किया। जब वह आया तब उसने स्वर्ग के राज्य के सुसमाचार का उपदेश दिया, और कहा कि मनुष्य को पश्चाताप करना, और पाप-स्वीकार करना चाहिए। जब यीशु ने अपना कार्य पूरा किया उसके बाद, पतरस और पौलुस और दूसरों ने यीशु के कार्य को करना प्रारम्भ किया था। जब यीशु को सलीब पर चढ़ा दिया गया और उसे स्वर्ग में उठा लिया गया उसके बाद, उन्हें क्रूस के मार्ग को फैलाने के लिए पवित्र आत्मा के द्वारा भेजा गया था। यद्यपि पौलुस के वचन उत्कृष्ट थे, फिर भी वे भी यीशु ने जो कहा था उसके द्वारा डाली गई बुनियाद पर आधारित थे, जैसे कि धैर्य, प्रेम, कष्ट, सिर ढकना, बपतिस्मा, या पालन किए जाने वाले अन्य सिद्धान्त। यह सब यीशु के वचनों की बुनियाद पर था। वे एक नया मार्ग खोलने में असमर्थ थे, क्योंकि वे सभी परमेश्वर के द्वारा उपयोग किए गए मनुष्य थे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'उपाधियों और पहचान के सम्बन्ध में' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 164

उस समय यीशु के कथन और कार्य सिद्धान्त के अनुसार नहीं थे, और उसने अपने कार्य को पुराने नियम की व्यवस्था के कार्य के अनुसार कार्यान्वित नहीं किया था। यह उस कार्य के अनुसार था जो अनुग्रह के युग में किया जाना चाहिए। उसने उस कार्य के अनुसार, अपनी स्वयं की योजनाओं के अनुसार, और अपने सेवकाई के अनुसार परिश्रम किया जो उसने प्रकट किए थे; उसने पुराने नियम की व्यवस्था के अनुसार कार्य नहीं किया। उसने जो भी किया उसमें कुछ भी पुराने नियम की व्यवस्था के अनुसार नहीं था, और वह भविष्यद्वक्ताओं के वचनों को पूरा करने के कार्य को करने के लिए नहीं आया था। परमेश्वर के कार्य का प्रत्येक चरण स्पष्ट रूप से प्राचीन भविष्यद्वक्ताओं की भविष्यवाणियों को पूरा करने के लिए नहीं था, वह सिद्धान्त का पालन करने या प्राचीन भविष्यद्वक्ताओं की भविष्यवाणियों को जान-बूझकर साकार करने के लिए नहीं आया था। फिर भी उसके कार्यों ने प्राचीन भविष्यद्वक्ताओं की भविष्यवाणियों में व्यवधान नहीं डाला, न ही उन्होंने उस कार्य में व्यवधान डाला था जो उसने पहले किया था। उसके कार्य का प्रमुख बिन्दु किसी सिद्धान्त का पालन नहीं करना, और उस कार्य को करना था जो उसे स्वयं करना चाहिए था। वह कोई भविष्यद्वक्ता या नबी नहीं था, बल्कि कार्य करने वाला था, जो वास्तव में उस कार्य को करने आया था जिसे करने की अपेक्षा उससे की गई थी, और वह अपने नए युग को शुरू करने और अपने नये कार्य को कार्यान्वित करने के लिए आया था। निस्संदेह, जब यीशु अपना कार्य करने के लिए आया, तो उसने पुराने नियम में प्राचीन भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा कहे गए बहुत से वचनों को भी पूरा किया। इसलिए आज के कार्य ने पुराने नियम के प्राचीन भविष्यद्वक्ताओं की भविष्यवाणियों को भी पूरा किया है। बस ऐसा है कि मैं उस "पीली पड़ चुकी पुरानी जन्त्री" को पकड़े नहीं रहता हूँ, बस इतना ही। क्योंकि और भी बहुत से कार्य हैं जो मुझे करने हैं, तथा और भी बहुत से वचन हैं जो मुझे तुम लोगों से अवश्य कहने हैं; और यह कार्य और ये वचन बाइबल के अंशों की व्याख्या करने की तुलना में कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि ऐसे कार्य का तुम लोगों के लिए कोई बड़ा महत्व या मूल्य नहीं है, और यह तुम लोगों की सहायता नहीं कर सकता है, या तुम लोगों को बदल नहीं सकता है। मैं नया कार्य करने का इरादा बाइबल के किसी अंश को पूरा करने के वास्ते नहीं करता हूँ। यदि परमेश्वर केवल बाइबल के प्राचीन भविष्यद्वक्ताओं के वचनों को पूरा करने के लिए पृथ्वी पर आया, तो अधिक बड़ा कौन है, देहधारी परमेश्वर या वे प्राचीन भविष्यद्वक्ता? आख़िरकार, क्या भविष्यवक्ता परमेश्वर के प्रभारी हैं, या परमेश्वर भविष्यद्वक्ताओं का प्रभारी है? तुम इन वचनों की व्याख्या कैसे करते हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'उपाधियों और पहचान के सम्बन्ध में' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 165

परमेश्वर के कार्य का प्रत्येक चरण एक ही धारा का अनुसरण करता है, और इसलिए परमेश्वर की छह-हज़ार-वर्षीय प्रबंधन योजना में, संसार की नींव से लेकर ठीक आज तक, प्रत्येक कदम का अगले कदम के द्वारा नज़दीकी से अनुसरण किया गया है। यदि मार्ग प्रशस्त करने के लिए कोई न होता, तो बाद में आने के लिए कोई न होता; चूँकि ऐसे लोग हैं जो बाद में आते हैं, इसलिए ऐसे लोग हैं जो मार्ग प्रशस्त करते हैं। इस तरह से कदम-दर-कदम कार्य को आगे पहुँचाया गया है। एक कदम दूसरे कदम का अनुसरण करता है, और मार्ग प्रशस्त करने वाले किसी व्यक्ति के बिना, कार्य को आरंभ करना असंभव होता, और परमेश्वर के पास अपने कार्य को आगे ले जाने का कोई साधन नहीं होता। कोई भी कदम दूसरे कदम का खण्डन नहीं करता है, और एक धारा बनाने के लिए प्रत्येक कदम दूसरे कदम का क्रम से अनुसरण करता है; यह सब एक ही पवित्रात्मा के द्वारा किया जाता है। परन्तु इस बात पर ध्यान दिए बिना कि कोई व्यक्ति मार्ग खोलता है या नहीं, या दूसरे के कार्य को जारी रखता है या नहीं, यह उनकी पहचान को निर्धारित नहीं करता है। क्या यह सही नहीं है? यूहन्ना ने मार्ग खोला, और यीशु ने उसके कार्य को जारी रखा, तो क्या इससे साबित होता है कि यीशु की पहचान यूहन्ना से निम्नतर थी? यीशु से पहले यहोवा ने अपने कार्य को कार्यान्वित किया, तो क्या तुम कह सकते हो कि यहोवा यीशु से अधिक महान है? यह महत्वपूर्ण नहीं है कि उन्होंने मार्ग प्रशस्त किया या दूसरे के कार्य को जारी रखा; जो सर्वाधिक महत्वपूर्ण है वह उनके कार्य का सार, और वह पहचान है जो इसे दर्शाता है। क्या यह सही नहीं है? चूँकि परमेश्वर का मनुष्य के बीच कार्य करने का इरादा था, इसलिए उसे ऐसे लोगों को ऊपर उठाना था जो मार्ग प्रशस्त करने का कार्य कर सकते थे। जब यूहन्ना ने प्रचार करना शुरू किया ही था, तो उसने कहा, "प्रभु का मार्ग तैयार करो, उसकी सड़कें सीधी करो।" "मन फिराओ, क्योंकि स्वर्ग का राज्य निकट आ गया है।" उसने शुरुआत से ही ऐसा कहा, और वह क्यों इन वचनों को कह पाया था? जिस क्रम में इन वचनों को कहा गया था उसके संबंध में, यह यूहन्ना था जिसने सबसे पहले स्वर्ग के राज्य के सुसमाचार को कहा था, और वह यीशु था जो उसके बाद बोला। मनुष्य की धारणाओं के अनुसार, यह यूहन्ना था जिसने नया पथ प्रशस्त किया था, और निस्संदेह यूहन्ना यीशु से अधिक महान था। परन्तु यूहन्ना ने नहीं कहा था कि वह मसीह है, और परमेश्वर ने परमेश्वर के प्रिय पुत्र के रूप में उसकी गवाही नहीं दी थी, बल्कि मार्ग को प्रशस्त करने और प्रभु के लिए मार्ग तैयार करने के लिए मात्र उसका उपयोग किया था। उसने यीशु के लिए मार्ग प्रशस्त किया था, परन्तु यीशु की ओर से कार्य नहीं कर सकता था। मनुष्य का समस्त कार्य भी पवित्र आत्मा के द्वारा बनाए रखा जाता है।

पुराने नियम के युग में, वह यहोवा ही था जो मार्ग की अगुवाई करता था, और यहोवा का कार्य पुराने नियम के सम्पूर्ण युग, और इस्राएल में किये गये समस्त कार्य को दर्शाता था। मूसा ने तो मात्र इस कार्य को पृथ्वी पर कायम रखा था, और उसके परिश्रम को मनुष्य के द्वारा प्रदान किया गया सहयोग माना जाता है। उस समय, यह यहोवा ही था जो बोलता था, मूसा को बुलाता था, और उसने मूसा को इस्राएल के लोगों में से ऊपर उठाया था, और उससे जंगल में और कनान की ओर उनकी अगुवाई करवाई थी। यह स्वयं मूसा का कार्य नहीं था, परन्तु ऐसा कार्य था जिसे यहोवा के द्वारा व्यक्तिगत रूप से निर्देशित किया गया था, और इसलिए मूसा को परमेश्वर नहीं कहा जा सकता है। मूसा ने भी व्यवस्था निर्धारित की, परन्तु इस व्यवस्था का आदेश यहोवा के द्वारा व्यक्तिगत रूप से दिया गया था। बस इतना ही था कि उसने उन्हें मूसा से व्यक्त करवाया था। यीशु ने भी आज्ञाएँ दी, और पुराने नियम की व्यवस्था का उन्मूलन किया और नये युग के लिए आज्ञाएँ निर्दिष्ट कीं। क्यों यीशु स्वयं परमेश्वर है? क्योंकि ये एक समान चीज़ें नहीं हैं। उस समय, मूसा के द्वारा किया गया कार्य युग को नहीं दर्शाता था, न ही इसने कोई नया मार्ग खोला था; उसे यहोवा के द्वारा आगे निर्देशित किया गया था, और वह मात्र ऐसा व्यक्ति था जिसे परमेश्वर के द्वारा उपयोग किया गया था। जब यीशु आया, तब यूहन्ना ने मार्ग प्रशस्त करने के कार्य के एक कदम को कार्यान्वित कर लिया था, और स्वर्ग के राज्य के सुसमाचार को फैलाना शुरू कर दिया था (पवित्र आत्मा ने इसे शुरू किया था)। जब यीशु आया, तो उसने सीधे तौर पर अपना खुद का कार्य किया, परन्तु उसके कार्य और मूसा के कार्य के बीच में एक बहुत बड़ा अन्तर था। यशायाह ने भी बहुत सी भविष्यवाणियाँ कही, फिर भी क्यों वह स्वयं परमेश्वर नहीं था? यीशु ने बहुत सी भविष्यवाणियाँ नहीं कही, फिर भी क्यों वह स्वयं परमेश्वर था? किसी ने भी यह कहने का साहस नहीं किया कि उस समय यीशु का समस्त कार्य पवित्र आत्मा की ओर से आया, न ही उन्होंने यह कहने का साहस किया कि यह सब मनुष्य की इच्छा से आया, या यह पूरी तरह स्वयं परमेश्वर का कार्य था। मनुष्य के पास ऐसी बातों का विश्लेषण करने का कोई तरीका नहीं था। यह कहा जा सकता है कि यशायाह ने ऐसा कार्य किया था, और ऐसी भविष्यवाणियाँ कही, और वे सभी पवित्र आत्मा से आयीं; वे सीधे तौर पर स्वयं यशायाह से नहीं आयीं, बल्कि यहोवा की ओर से प्रकाशन थे। यीशु ने बड़ी मात्रा में कार्य नहीं किया, और बहुत सारे वचनों को नहीं कहा, न ही उसने बहुत सारी भविष्यवाणियाँ कही। मनुष्य के लिए, उसका उपदेश विशेष रूप से उत्कृष्ट प्रतीत नहीं होता था, फिर भी वह स्वयं परमेश्वर था, और यह मनुष्य के लिए अकथनीय है। किसी ने कभी भी यूहन्ना, या यशायाह, या दाऊद पर विश्वास नहीं किया है; न ही किसी ने कभी उन्हें परमेश्वर कहा, या दाऊद परमेश्वर, या यूहन्ना परमेश्वर कहा; किसी ने कभी भी ऐसा नहीं बोला, और केवल यीशु को ही हमेशा मसीह कहा गया है। यह वर्गीकरण परमेश्वर की गवाही, उस कार्य जिसका उसने उत्तरदायित्व लिया, और उस सेवकाई जो उसने की, उसके अनुसार किया जाता है। बाइबल के महापुरुषों—अब्राहम, दाऊद, यहोशू, दानिय्येल, यशायाह, यूहन्ना और यीशु—के संबंध में उस कार्य के माध्यम से जो उन्होंने किया था, तुम कह सकते हो कि स्वयं परमेश्वर कौन है, और किस प्रकार के लोग भविष्यद्वक्ता हैं, और कौन प्रेरित हैं। किसे परमेश्वर के द्वारा उपयोग किया गया था, और कौन स्वयं परमेश्वर था, यह सार और जिस प्रकार का कार्य उन्होंने किया उसके द्वारा विभेदित और निर्धारित किया जाता है। यदि तुम अन्तर बताने में असमर्थ हो, तो इससे साबित होता है कि तुम नहीं जानते हो कि परमेश्वर में विश्वास करने का अर्थ क्या होता है। यीशु परमेश्वर है क्योंकि उसने बहुत सारे वचन कहे, और बहुत अधिक कार्य किया, विशेषरूप से अनेक चमत्कारों का उसका प्रदर्शन। उसी तरह, यूहन्ना ने भी बहुत अधिक कार्य किया, और बहुत सारे वचनों को बोला, मूसा ने भी ऐसा ही किया था; क्यों उन्हें परमेश्वर नहीं कहा गया था? आदम का सृजन सीधे तौर पर परमेश्वर के द्वारा किया गया था; सिर्फ एक प्राणी कहे जाने के बजाए, क्यों उसे परमेश्वर नहीं कहा गया था? यदि कोई तुमसे कहे, "आज, परमेश्वर ने बहुत अधिक कार्य किया है, और बहुत सारे वचन कहे हैं; वह स्वयं परमेश्वर है। तो, चूँकि मूसा ने बहुत सारे वचन कहे, इसलिए वह भी स्वयं परमेश्वर अवश्य होना चाहिए!" तुम्हें बदले में उनसे पूछना चाहिए, "उस समय, क्यों परमेश्वर ने स्वयं परमेश्वर के रूप में यीशु की गवाही दी, और यूहन्ना की नहीं दी?" क्या यूहन्ना यीशु से पहले नहीं आया था? कौन सा महान था, यूहन्ना का कार्य या यीशु का कार्य? मनुष्य को यूहन्ना का कार्य यीशु के कार्य से अधिक महान प्रतीत होता है, परन्तु क्यों पवित्र आत्मा ने यीशु की गवाही दी, और यूहन्ना की नहीं? आज भी वही चीज़ हो रही है! शुरुआत में, जब मूसा ने इस्राएल के लोगों की अगुवाई की, तो यहोवा ने बादलों में से उससे बात की। मूसा ने सीधे तौर पर बात नहीं की, बल्कि इसके बजाए यहोवा के द्वारा सीधे तौर पर उसका मार्गदर्शन किया गया था। यह पुराने नियम के इस्राएल का कार्य था। मूसा के भीतर पवित्रात्मा, या परमेश्वर का अस्तित्व नहीं था। वह उस कार्य को नहीं कर सकता था, और इसलिए उसके द्वारा और यीशु के द्वारा किए गए कार्य में एक बड़ा अन्तर था। और ऐसा इसलिए है क्योंकि उन्होंने जो कार्य किया वह भिन्न है! किसी व्यक्ति को परमेश्वर के द्वारा उपयोग किया जाता है या नहीं, या वह कोई भविष्यद्वक्ता, या कोई प्रेरित, या स्वयं परमेश्वर है या नहीं, इसे उसके कार्य की प्रकृति के द्वारा पहचाना जा सकता है, और यह तुम्हारे सन्देहों का अन्त कर देगा। बाइबल में यह लिखा है कि सिर्फ मेम्ना ही सात मुहरों को खोल सकता है। युगों के दौरान, उन महान व्यक्तियों के बीच पवित्रशास्त्रों के अनेक प्रतिपादक हुए हैं, और इसलिए क्या तुम कह सकते हो कि वे सब मेम्ने हैं? क्या तुम कह सकते हो कि उनकी सभी व्याख्याएँ परमेश्वर से आई थीं? वे तो मात्र प्रतिपादक हैं; उनके पास मेम्ने की पहचान नहीं है। वे कैसे सात मोहरों को खोलने के योग्य हो सकते हैं? यह सत्य है कि "सिर्फ मेम्ना ही सात मोहरों को खोल सकता है," परन्तु वह सिर्फ सात मोहरों को खोलने के लिए ही नहीं आता है; इस कार्य की कोई आवश्यकता नहीं है, यह संयोगवश होता है। वह अपने स्वयं के कार्य के बारे में बिल्कुल स्पष्ट है; क्या पवित्रशास्त्रों का अनुवाद करने में अधिक समय बिताना उसके लिए आवश्यक है? क्या "पवित्रशास्त्रों का अनुवाद करते हुए मेमने के युग" को छह हज़ार वर्षों के कार्य के साथ अवश्य जोड़ा जाना चाहिए? वह नया कार्य करने के लिए आता है, परन्तु वह, लोगों को छह हज़ार वर्षों के कार्य के सत्य को समझाते हुए, बीते समयों के कार्य के बारे में भी कुछ प्रकाशनों को प्रदान करता है। बाइबल के बहुत सारे अंशों की व्याख्या करने की कोई आवश्यकता नहीं है; यह आज का कार्य है जो प्रमुख है, जो महत्वपूर्ण है। तुम्हें जानना चाहिए कि परमेश्वर विशेष रूप से सात मुहरों को तोड़ने के लिए नहीं आता है, बल्कि उद्धार के कार्य को करने के लिए आता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'उपाधियों और पहचान के सम्बन्ध में' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 166

अनुग्रह के युग में, यूहन्ना ने यीशु का मार्ग प्रशस्त किया। वह स्वयं परमेश्वर का कार्य नहीं कर सकता था और उसने मात्र मनुष्य का कर्तव्य पूरा किया था। यद्यपि यूहन्ना प्रभु का अग्रदूत था, फिर भी वह परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने में असमर्थ था; वह पवित्र आत्मा के द्वारा उपयोग किया गया मात्र एक मनुष्य था। यीशु के बपतिस्मा के बाद पवित्र आत्मा कबूतर के समान उस पर उतरा। तब यीशु ने अपना काम आरम्भ किया, अर्थात्, उसने मसीह की सेवकाई करना प्रारम्भ किया। इसीलिए उसने परमेश्वर की पहचान को अपनाया, क्योंकि वह परमेश्वर से आया था। इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि इससे पहले उसका विश्वास कैसा था—कदाचित् कभी-कभी यह दुर्बल रहा हो, या कभी-कभी यह मज़बूत—यह सब अपनी सेवकाई को करने से पहले के उसके सामान्य मानव जीवन से संबंधित था। उसका बपतिस्मा (अभिषेक) होने के पश्चात्, उसके पास तुरन्त ही परमेश्वर की सामर्थ्य और महिमा आ गयी थी, और इस प्रकार उसने अपनी सेवकाई आरंभ की। वह चिह्न का प्रदर्शन और अद्भुत काम कर सकता था, चमत्कार कर सकता था, उसके पास सामर्थ्य और अधिकार था, क्योंकि वह सीधे स्वयं परमेश्वर की ओर से काम कर रहा था; उसने पवित्र आत्मा के बदले में उसका काम किया और पवित्रात्मा की आवाज़ को व्यक्त किया; इसलिए वह स्वयं परमेश्वर था। यह निर्विवादित है। पवित्र आत्मा के द्वारा यूहन्ना का उपयोग किया गया था। वह परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता था, न ही परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करना उसके लिए सम्भव था। यदि उसने ऐसा करने की इच्छा की होती, तो पवित्र आत्मा ने इसकी अनुमति नहीं दी होती, क्योंकि वह उस काम को नहीं कर सकता था जिसे स्वयं परमेश्वर ने सम्पन्न करने का इरादा रखता था। कदाचित् उसमें बहुत कुछ ऐसा था जो मनुष्यों की इच्छा का था, या उसमें कुछ विसामान्य था; वह किसी भी परिस्थिति में प्रत्यक्ष रूप से परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता था। उसकी अशुद्धि और ग़लतियाँ केवल उसका ही प्रतिनिधित्व करती थीं, किन्तु उसका काम पवित्र आत्मा का प्रतिनिधि था। फिर भी, तुम नहीं कह सकते हो कि उसका सर्वस्व परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करता था। क्या उसकी विसामान्यता और त्रुटियुक्त होना परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकता है? मनुष्य का प्रतिनिधित्व करने में त्रुटि होना सामान्य है, परन्तु यदि कोई परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने में विसामान्य होता है, तो क्या वह परमेश्वर के प्रति अनादर नहीं होगा? क्या वह पवित्र आत्मा के विरुद्ध ईशनिंदा नहीं होगी? पवित्र आत्मा मनुष्य को आसानी से परमेश्वर के स्थान पर खड़े होने की अनुमति नहीं देता है, भले ही दूसरों के द्वारा उसे बड़ा ठहराया गया हो। यदि वह परमेश्वर नहीं है, तो वह अंत में खड़े रहने में असमर्थ होगा। पवित्र आत्मा मनुष्य को जैसा मनुष्य चाहे वैसे परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने की अनुमति नहीं देता है! उदाहरण के लिए, पवित्र आत्मा ने यूहन्ना की गवाही दी और उसे यीशु के लिए मार्ग प्रशस्त करने वाले व्यक्ति के रूप में भी प्रकट किया, परन्तु पवित्र आत्मा के द्वारा उसमें किए गए कार्य को अच्छी तरह से नपा-तुला था। यूहन्ना से कुल इतना कहा गया था कि वह यीशु के लिए मार्ग तैयार करने वाला बने, उसके लिए मार्ग तैयार करे। कहने का अभिप्राय है, कि पवित्र आत्मा ने केवल मार्ग बनाने में उसके कार्य का समर्थन किया था और केवल इसी प्रकार के कार्य को करने की उसे अनुमति दी, अन्य किसी कार्य के लिए नहीं। यूहन्ना ने एलिय्याह का प्रतिनिधित्व किया था, उस भविष्यद्वक्ता का प्रतिनिधत्व करता था जिसने मार्ग प्रशस्त किया था। पवित्र आत्मा के द्वारा इसमें उसका समर्थन किया गया था; जब तक उसका कार्य मार्ग प्रशस्त करने का था, तब तक पवित्र आत्मा ने उसका समर्थन किया। हालाँकि, यदि उसने दावा किया होता कि वह स्वयं परमेश्वर है और छुटकारे के कार्य को पूरा करने के लिए आया है, तो पवित्र आत्मा को अवश्य उसे अनुशासित करना पड़ता। यूहन्ना का काम चाहे जितना भी बड़ा था, और चाहे पवित्र आत्मा ने उसे समर्थन दिया था, फिर भी उसका काम सीमाओं के अंतर्गत था। यह वास्तव में सत्य है कि पवित्र आत्मा के द्वारा उसके कार्य का समर्थन किया गया था, परन्तु उस समय उसे जो सामर्थ्य दी गई थी वह केवल उसके मार्ग तैयार करने तक ही सीमित थी। वह अन्य कोई काम बिल्कुल नहीं कर सकता था, क्योंकि वह सिर्फ यूहन्ना था जो मार्ग प्रशस्त करता था, वह यीशु नहीं था। इसलिए, पवित्र आत्मा की गवाही मुख्य है, किन्तु वह कार्य जिसको करने के लिए पवित्र आत्मा मनुष्य को अनुमति देता है वह और भी अधिक महत्वपूर्ण है। क्या यूहन्ना के लिए उस समय बड़ी गवाही नहीं दी गई थी? क्या उसका काम भी महान नहीं था? किन्तु जो काम उसने किया वह यीशु के काम से बढ़ कर नहीं हो सका, क्योंकि वह पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति से अधिक नहीं था और वह सीधे परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता था, और इस तरह उसने जो काम किया वह सीमित था। उसके मार्ग प्रशस्त करने का काम समाप्त करने के बाद, पवित्र आत्मा अब उसकी गवाही का समर्थन नहीं करता था, कोई भी नया काम फिर उसके पास नहीं आया, और जब परमेश्वर स्वयं का काम शुरू हुआ तो वह चला गया।

कुछ ऐसे लोग हैं जो दुष्टात्माओं के द्वारा ग्रसित हैं और लगातार ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाते रहते हैं, "मैं परमेश्‍वर हूँ!" फिर भी अंत में, उन पर से पर्दा हट जाता है, क्योंकि वे गलत चीज़ का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे शैतान का प्रतिनिधित्व करते हैं और पवित्र आत्मा उन पर कोई ध्यान नहीं देता है। तुम अपने आपको कितना भी बड़ा ठहराओ या तुम कितनी भी ताकत से चिल्लाओ, तुम अभी भी एक सृजित प्राणी ही हो और एक ऐसे प्राणी हो जो शैतान से सम्बन्धित है। मैं कभी नहीं चिल्लाता हूँ, "मैं ईश्वर हूँ, मैं परमेश्वर का प्रिय पुत्र हूँ!" परन्तु जो कार्य मैं करता हूँ वह परमेश्वर का कार्य है। क्या मुझे चिल्लाने की आवश्यकता है? ऊँचा उठाये जाने की कोई आवश्यकता नहीं है। परमेश्वर अपना काम स्वयं करता है और उसे मनुष्य से ऐसी कोई अपेक्षा नहीं है कि वह उसे हैसियत या सम्मानसूचक पदवी प्रदान करे: उसकी पहचान और हैसियत को दर्शाने के लिए उसका काम ही पर्याप्त है। अपने बपतिस्मा से पहले, क्या यीशु स्वयं परमेश्वर नहीं था? क्या वह परमेश्वर का देहधारी देह नहीं था? निश्चित रूप से यह नहीं कहा जा सकता है कि केवल उसके लिए गवाही दिए जाने के पश्चात् ही वह परमेश्वर का इकलौता पुत्र बना? क्या उसके द्वारा काम आरम्भ करने से बहुत पहले ही यीशु नाम का कोई व्यक्ति नहीं था? तुम नए मार्ग नहीं ला सकते हो या पवित्रात्मा का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते हो। तुम पवित्र आत्मा के कार्य को या उन वचनों को व्यक्त नहीं कर सकते हो जिन्हें वह कहता है। तुम परमेश्वर स्वयं के या पवित्रात्मा के कार्य को नहीं कर सकते हो। तुम परमेश्वर की बुद्धि, अद्भुतता, और अगाधता को, या उस सम्पूर्ण स्वभाव को व्यक्त नहीं कर सकते हो जिसके द्वारा परमेश्वर मनुष्य को ताड़ना देता है: इन सबको व्यक्त करना तुन्हारी क्षमता के बाहर है। अतः परमेश्वर होने के तुम्हारे दावों से कोई फर्क नहीं पड़ता है; तुम्हारे पास सिर्फ़ नाम होगा और सार में से कुछ भी नहीं होगा। परमेश्वर स्वयं आ गया है, किन्तु कोई भी उसे नहीं पहचाता है, फिर भी वह अपना काम जारी रखता है और पवित्र आत्मा के प्रतिनिधित्व में ऐसा करता है। चाहे तुम उसे मनुष्य कहो या परमेश्वर, प्रभु कहो या मसीह, या उसे बहन कहो, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता है। परन्तु जिस कार्य को वह करता है वह पवित्रात्मा का है और स्वयं परमेश्वर के कार्य का प्रतिनिधित्व करता है। वह उस नाम के बारे में परवाह नहीं करता है जिससे मनुष्य उसे पुकारते है। क्या वह नाम उसके काम का निर्धारण कर सकता है? इचाहे तुम उसे कुछ भी कहकर पुकारो, परमेश्वर के दृष्टिकोण से, वह परमेश्वर के आत्मा का देहधारी देह है; वह पवित्रात्मा का प्रतिनिधित्व करता है और उसके द्वारा अनुमोदित है। यदि तुम एक नए युग के लिए मार्ग नहीं बना सकते हो, और तुम पुराने युग का समापन नहीं कर सकते हो और एक नए युग का सूत्रपात या नया कार्य नहीं कर सकते हो तो, तुम्हें परमेश्वर नहीं कहा जा सकता है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारण का रहस्य (1)' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 167

यहाँ तक कि कोई मनुष्य जिसे पवित्र आत्मा के द्वारा उपयोग किया जाता है वह भी परमेश्वर स्वयं का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है। अर्थात न केवल यह व्यक्ति परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है, बल्कि उसका काम भी सीधे तौर पर परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है। दूसरे शब्दों में, मनुष्य के अनुभव को सीधे तौर पर परमेश्वर के प्रबंधन के अंतर्गत नहीं रखा जा सकता है, और यह परमेश्वर के प्रबंधन का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है। वह समस्त कार्य जिसे परमेश्वर स्वयं करता है वह ऐसा कार्य है जिसे वह अपनी स्वयं की प्रबंधन योजना में करने का इरादा करता है और जो बड़े प्रबंधन से संबंधित है। मनुष्य के द्वारा किया गया कार्य उसके व्यक्तिगत अनुभव की आपूर्ति करने से युक्त होता है। वह अनुभव का एक नया मार्ग खोजता है जिस पर उससे पहले के लोग नहीं चले थे और पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन के अधीन अपने भाईयों और बहनों की अगुवाई करता है। इस तरह के लोग अपना व्यक्तिगत अनुभव या आध्यात्मिक मनुष्यों की आध्यात्मिक रचनाएँ प्रदान करते हैं। यद्यपि पवित्र आत्मा के द्वारा उनका उपयोग किया जाता है, फिर भी ऐसे मनुष्यों का कार्य छ:-हज़ार-वर्षों की योजना के बड़े प्रबंधन कार्य से असम्बद्ध है। वे सिर्फ ऐसे लोग हैं जिन्हें विभिन्न अवधियों में पवित्र आत्मा के द्वारा उभारा गया ताकि वे तब तक पवित्र आत्मा की मुख्यधारा में लोगों की अगुवाई करें जब तक कि वे अपने कार्य को पूरा न कर लें या उनकी ज़िन्दगियों का अंत न हो जाए। जिस कार्य को वे करते हैं वह केवल परमेश्वर स्वयं के लिए एक उचित मार्ग तैयार करने के लिए है या पृथ्वी पर परमेश्वर स्वयं की प्रबंधन योजना में एक अंश को निरन्तर जारी रखने के लिए है। ऐसे मनुष्य उसके प्रबंधन में बड़े-बड़े कार्य करने में असमर्थ होते हैं, और वे नए मार्गों की शुरुआत भी नहीं कर सकते हैं, और वे पूर्व युग के परमेश्वर के सभी कार्यों का समापन तो बिल्कुल भी नहीं कर सकते हैं। इसलिए, जिस कार्य को वे करते हैं वह केवल एक सृजित प्राणी का प्रतिनिधित्व करता है जो अपने कार्यों को क्रियान्वित कर रहा है और स्वयं परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है जो अपनी सेवकाई को कार्यान्वित कर रहा हो। ऐसा इसलिए है क्योंकि जिस कार्य को वे करते हैं वह परमेश्वर स्वयं के द्वारा किए जाने वाले कार्य के असदृश है। एक नए युग के सूत्रपात का कार्य परमेश्वर के स्थान पर मनुष्य के द्वारा नहीं किया जा सकता है। इसे परमेश्वर स्वयं के अलावा किसी अन्य के द्वारा नहीं किया जा सकता है। मनुष्य के द्वारा किया गया समस्त कार्य सृजित प्राणी के रूप में उसके कर्तव्य का निर्वहन है और तब किया जाता है जब पवित्र आत्मा के द्वारा उसे प्रेरित या प्रबुद्ध किया जाता है। ऐसे मनुष्य द्वारा प्रदान किया जाने वाला समस्त मार्गदर्शन यह होता है कि मनुष्य को दैनिक जीवन में किस प्रकार अभ्यास करना चाहिए और उसको किस प्रकार परमेश्वर की इच्छा के साथ समरसता में कार्य करना चाहिए। मनुष्य का कार्य न तो परमेश्वर की प्रबंधन योजना को सम्मिलित करता है और न ही पवित्रात्मा के कार्य का प्रतिनिधित्व करता है। एक उदाहरण के रूप में, गवाह ली और वॉचमैन नी का कार्य मार्ग की अगुआई करना था। चाहे मार्ग नया हो या पुराना, कार्य बाइबल के सिद्धांतों के भीतर ही बने रहने के आधार पर किया गया था। चाहे स्थानीय कलीसियाओं को पुनर्स्थापित करना हो अथवा उसे बनाना हो, उनका कार्य कलीसियाओं की स्थापना से संबंधित था। जो कार्य उन्होंने किया उसने उस कार्य को आगे बढ़ाया जिसे यीशु और उसके प्रेरितों ने समाप्त नहीं किया था या अनुग्रह के युग में आगे विकसित नहीं किया था। उन्होंने अपने कार्य में जो कुछ किया, वह उसे बहाल करना था जिसे यीशु ने अपने प्रारम्भिक कार्य में अपने बाद की पीढ़ियों से करने को कहा था, जैसे कि अपने सिरों को ढक कर रखना, बपतिस्मा ग्रहण करना, रोटी साझा करना या दाखरस पीना। यह कहा जा सकता है कि उनका कार्य केवल बाइबल का पालन करना था और केवल बाइबल के भीतर मार्ग तलाशना था। उन्होंने कोई नई प्रगति बिल्कुल नहीं की। इसलिए, कोई उनके कार्य में केवल बाइबल के भीतर ही नए मार्गों की खोज, और साथ ही बेहतर और अधिक यथार्थवादी अभ्यासों को ही देख सकता है। किन्तु कोई उनके कार्य में परमेश्वर की वर्तमान इच्छा को नहीं खोज सकता है, उस कार्य को तो बिल्कुल नहीं खोज सकता है जिसे परमेश्वर अंत के दिनों में करेगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि जिस मार्ग पर वे चलते थे वह पुराना ही था; उसमें कोई प्रगति नहीं थी और कुछ नया नहीं था। उन्होंने, यीशु को सलीब पर चढ़ाए जाने की वास्तविकता को जकड़े रखना, लोगों को पश्चाताप करने और अपने पापों को स्वीकार करने के लिए कहने के अभ्यास का पालन करना, और इस तरह की उक्तियों जैसे कि, जो अन्त तक सहन करता है बचा लिया जाएगा, पुरुष स्त्री का सिर है और स्त्री को अपने पति का आज्ञापालन करना चाहिए का अभ्यास करना जारी रखा। इसके अलावा, उन्होंने इस परंपरागत धारणा को बनाए रखा कि बहनें उपदेश नहीं दे सकती हैं, वे केवल आज्ञापालन कर सकती हैं। यदि इस तरह की अगुआई जारी रही होती, तो पवित्र आत्मा कभी भी नए कार्य को करने, मनुष्यों को सिद्धांत से मुक्त करने, या मनुष्यों को स्वतंत्रता और सुंदरता के क्षेत्र में ले जाने में समर्थ नहीं होता। इसलिए, युगों के परिवर्तन करने वाला कार्य का यह चरण स्वयं परमेश्वर के द्वारा किया और बोला जाना चाहिए, अन्यथा कोई भी व्यक्ति उसके स्थान पर ऐसा नहीं कर सकता है। अभी तक, इस धारा के बाहर पवित्र आत्मा का समस्त कार्य एकदम रुक गया है, और जिन्हें पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किया गया था वे दिग्भ्रमित हो गए हैं। इसलिए, चूँकि पवित्र आत्मा के द्वारा उपयोग किए गए मनुष्यों का कार्य परमेश्वर स्वयं के द्वारा किए गए कार्य के असदृश है, इसलिए उनकी पहचान और वे जिनकी ओर से कार्य करते हैं वे भी उसी तरह से भिन्न हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि पवित्र आत्मा जिस कार्य को करने का इरादा करता है वह भिन्न है, फलस्वरूप कार्य करने वाले सभी को अलग-अलग पहचानें और हैसियतें प्रदान की जाती है। पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए गए लोग कुछ ऐसे कार्य भी कर सकते हैं जो नये हों और वे पूर्व युग में किये गए कुछ कार्यों को हटा भी सकते हैं, किन्तु उनका कार्य नए युग में परमेश्वर के स्वभाव और इच्छा को व्यक्त नहीं कर सकता है। वे केवल पूर्व युग के कार्य को हटाने के लिए कार्य करते हैं, और सीधे तौर पर परमेश्वर स्वयं के स्वभाव का प्रतिनिधित्व करने के उद्देश्य से कोई नया कार्य करने के लिए नहीं करते हैं। इस प्रकार, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वे पुराने पड़ चुके कितने अभ्यासों का उन्मूलन करते हैं या वे कितने नए अभ्यासों को आरंभ करते हैं, वे तब भी मनुष्य और सृजित प्राणियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। जबकि परमेश्वर स्वयं जब कार्य को करता है, तो वह प्राचीन युग के अभ्यासों के उन्मूलन की खुलकर घोषणा नहीं करता है या सीधे तौर पर नए युग की शुरुआत की घोषणा नहीं करता है। वह अपने कार्य में प्रत्यक्ष और स्पष्ट है। वह उस कार्य को करने में निष्कपट है जिसका उसने इरादा किया है; अर्थात्, वह उस कार्य को सीधे तौर पर व्यक्त करता है जिसे उसने साकारकिया है, वह सीधे तौर पर अपना कार्य करता है जैसा उसने मूलतः इरादा किया था, और अपने अस्तित्व एवं स्वभाव को व्यक्त करता है। जैसा मनुष्य इसे देखता है, उसका स्वभाव और उसी प्रकार उसका कार्य भी बीते युगोंके असदृश है। हालाँकि, परमेश्वर स्वयं के दृष्टिकोण से, यह मात्र उसके कार्य की निरन्तरता और आगे का विकास है। जब परमेश्वर स्वयं कार्य करता है, तो वह अपने वचन को व्यक्त करता है और सीधे तौर पर नया कार्य लाता है। इसके विपरीत, जब मनुष्य काम करता है, तो यह विचार-विमर्श एवं अध्ययन के माध्यम से होता है, या यह दूसरों के कार्य की बुनियाद पर निर्मित ज्ञान का विकास और अभ्यास का व्यवस्थापन है। कहने का अर्थ है, कि मनुष्य के द्वारा किए गए कार्य का सार पहले से स्थापित व्यवस्था को बनाए रखना और "नए जूतों में पुराने मार्ग पर चलना" है। इसका अर्थ है कि पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए गए मनुष्यों द्वारा चला गया मार्ग भी उस पर बना है जिसे स्वयं परमेश्वर के द्वारा खोला गया था। अंततः मनुष्य आख़िरकर मनुष्य है, और परमेश्वर परमेश्वर है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारण का रहस्य (1)' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 168

यूहन्ना प्रतिज्ञा द्वारा जन्मा था, बहुत कुछ जैसे अब्राहम के लिए इसहाक पैदा हुआ था। उसने यीशु के लिए मार्ग प्रशस्त किया और बहुत कार्य किया, किन्तु वह परमेश्वर नहीं था। बल्कि, वह भविष्यद्वक्ताओं में से एक है क्योंकि उसने यीशु के लिए केवल मार्ग प्रशस्त किया था। उसका कार्य भी महान था, और केवल उसके मार्ग प्रशस्त करने के बाद ही यीशु ने आधिकारिक रूप से अपना कार्य शुरू किया। सार में, उसने केवल यीशु के लिए श्रम किया, और उसका कार्य यीशु के कार्य की सेवा में था। उसके मार्ग प्रशस्त करने के बाद, यीशु ने अपना कार्य शुरू किया, वह कार्य जो नया, अधिक यथार्थपूर्ण, और अधिक विस्तृत था। यूहन्ना ने केवल शुरुआत का कार्य किया; अधिकतर नया कार्य यीशु के द्वारा किया गया था। यूहन्ना ने भी नया कार्य किया, किन्तु वह वो नहीं था जिसने नए युग का सूत्रपात किया था। यूहन्ना प्रतिज्ञा के द्वारा जन्मा था, और उसका नाम स्वर्गदूत के द्वारा दिया गया था। उस समय, कुछ लोग उसके पिता जकरयाह के नाम पर उसका नाम रखना चाहते थे, परन्तु उसकी माँ ने कहा, "इस बालक को उस नाम से नहीं पुकारा जा सकता है। उसे यूहन्ना के नाम से पुकारा जाना चाहिए।" यह सब पवित्र आत्मा के द्वारा निर्देशित किया गया था। यीशु का नाम भी पवित्र आत्मा के आदेश से था, और उसका जन्म पवित्र आत्मा से हुआ था, और पवित्र आत्मा द्वारा उसकी प्रतिज्ञा की गयी थी। यीशु परमेश्वर, मसीह, और मनुष्य का पुत्र था। यूहन्ना का कार्य भी महान था, किन्तु उसे परमेश्वर क्यों नहीं कहा गया? यीशु के द्वारा किए गए कार्य और यूहन्ना के द्वारा किए गए कार्य के बीच वास्तव में क्या अंतर था? क्या यही एकमात्र कारण था कि यूहन्ना वह व्यक्ति था जिसने यीशु के लिए मार्ग प्रशस्त किया था? या इसलिए क्योंकि इसे परमेश्वर के द्वारा पहले से ही नियत कर दिया गया था? यद्यपि यूहन्ना ने भी कहा था, "मन फिराओ, क्योंकि स्वर्ग का राज्य निकट आ गया है," और स्वर्ग के राज्य के सुसमाचार का भी उपदेश दिया, उसका कार्य को आगे नहीं बढ़ाया गया था और उसने मात्र एक आरम्भ का गठन किया था। इसके विपरीत, यीशु ने एक नए युग का सूत्रपात किया, और पुराने युग का अंत किया, किन्तु उसने पुराने विधान की व्यवस्था को भी पूरा किया। जो कार्य उसने किया था वह यूहन्ना की अपेक्षा अधिक महान था, और वह समस्त मानवजाति को छुटकारा दिलाने के लिए आया—उसने कार्य के इस चरण को पूर्ण किया। जबकि यूहन्ना ने बस मार्ग तैयार किया। यद्यपि उसका कार्य महान था, उसके वचन बहुत थे, और वे चेले जो उसका अनुसरण करते थे वे बहुतेरे थे, फिर भी उसके कार्य ने लोगों तक एक नई शुरुआत को पहुँचाने से बढ़कर और कुछ नहीं किया। न ही कभी लोगों ने उससे जीवन, मार्ग, या गहरे सत्यों को प्राप्त किया, और न ही उन्होंने उसके जरिए परमेश्वर की इच्छा की समझ को प्राप्त किया। यूहन्ना एक बहुत बड़ा भविष्यद्वक्ता (एलिय्याह) था जिसने यीशु के कार्य के लिए नई भूमि को सामने लाया और चुने हुओं को तैयार किया; वह अनुग्रह के युग का अग्रदूत था। ऐसे मुद्दों को साधारण तौर पर उनके सामान्य मानवीय प्रकटन को देखकर नहीं जाना जा सकता है। विशेष रूप से इस कारण कि यूहन्ना ने भी बहुत बड़ा काम किया; इसके अतिरिक्त, वह पवित्र आत्मा की प्रतिज्ञा के द्वारा जन्मा था, और उसके कार्य को पवित्र आत्मा के द्वारा समर्थन दिया गया था। उसी प्रकार, केवल उनके कार्य के माध्यम से उनकी अपनी-अपनी अपनी पहचान के बीच अन्तर किया जा सकता है, क्योंकि किसी मनुष्य का बाहरी प्रकटन उसके सार के बारे में नहीं बताता है, न ही कोई ऐसा तरीका है जिससे मनुष्य पवित्र आत्मा की सच्ची गवाही को सुनिश्चित करने में समर्थ हो। यूहन्ना के द्वारा किया गया कार्य और यीशु के द्वारा किया गया कार्य समान नहीं थे साथ ही अलग-अलग प्रकृतियों के थे। इसी से यह निर्धारित करना चाहिए कि वह परमेश्वर है या नहीं। यीशु का कार्य शुरूआत करना, जारी रखना, समापन करना और सफल बनाना था। इनमें से प्रत्येक चरण यीशु के द्वारा सम्पन्न किया गया था, जबकि यूहन्ना का कार्य शुरुआत से अधिक और कुछ नहीं था। आरम्भ में, यीशु ने सुसमाचार को फैलाया और पश्चाताप के मार्ग का उपदेश दिया, फिर वह मनुष्य को बपतिस्मा देने लगा, बीमारों को चंगा करने लगा, और दुष्टात्माओं को निकालने लगा। अंत में, उसने मानवजाति को पाप से छुटकारा दिलाया और सम्पूर्ण युग के अपने कार्य को पूरा किया। उसने सभी स्थानों में मनुष्य को स्वर्ग के राज्य के सुसमाचार का उपदेश दिया और उसे फैलाया। इस लिहाज से यीशु और यूहन्ना समान थे, अन्तर यह था कि यीशु ने एक नए युग का सूत्रपात किया और वह मनुष्य के लिए अनुग्रह का युग लाया। उसके मुँह से वह वचन निकला जिसका मनुष्य को अभ्यास करना चाहिए और वह मार्ग निकला जिसका मनुष्य को अनुग्रह के युग में अनुसरण करना चाहिए, और अंत में, उसने छुटकारे के कार्य को पूरा किया। ऐसा कार्य यूहन्ना के द्वारा कभी सम्पन्न नहीं किया जा सकता थ। और इसलिए, यह यीशु ही था जिसने परमेश्वर स्वयं के कार्य को किया, और वही है जो परमेश्वर स्वयं है और जो प्रत्यक्ष रूप से परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करता है। मनुष्य की धारणाएँ कहती हैं कि वे सभी जो प्रतिज्ञा द्वारा जन्मे थे, पवित्र आत्मा से जन्मे थे, पवित्र आत्मा द्वारा सँभाले गए थे और जिन्होंने नए मार्ग खोले वे परमेश्वर हैं। इस तर्क के अनुसार, यूहन्ना भी परमेश्वर होगा, और मूसा, अब्राहम और दाऊद..., ये भी परमेश्वर होंगे। क्या यह पूरी तरह एक मज़ाक नहीं है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारण का रहस्य (1)' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 169

कुछ लोग आश्चर्य कर सकते हैं, युग का सूत्रपात स्वयं परमेश्वर के द्वारा क्यों किया जाना चाहिए? क्या उसके स्थान पर कोई सृजित प्राणी नहीं खड़ा हो सकता है? तुम लोग अच्छी तरह से अवगत हो कि एक नए युग का सूत्रपात करने के खास उद्देश्य से परमेश्वर देह बनता है, और, वास्तव में, जब वह नए युग का सूत्रपात करेगा, तो वह उसके साथ-साथ ही पूर्व युग का समापन भी करेगा। परमेश्वर आदि और अंत है; वह स्वयं ही है जो अपने कार्य को चलाता है और इसलिए वह स्वयं ही वो होना चाहिए जो पहले के युग का समापन करता है। यही प्रमाण है कि वह शैतान को पराजित करता है और संसार को जीत लेता है। प्रत्येक बार जब वह स्वयं मनुष्य के बीच कार्य करता है, तो यह एक नए युद्ध की शुरुआत होती है। नए कार्य की शुरुआत के बिना, स्वाभाविक रूप से पुराने का कोई समापन नहीं होगा। और पुराने का समापन न होना इस बात का प्रमाण है कि शैतान के साथ युद्ध अभी तक समाप्त नहीं हुआ है। यदि स्वयं परमेश्वर मनुष्यों के बीच में आता है और एक नया कार्य करता है, केवल तभी मनुष्य शैतान के अधिकार क्षेत्र को तोड़कर पूरी तरह से स्वतन्त्र हो सकता है और एक नया जीवन एवं नई शुरुआत प्राप्त कर सकता है। अन्यथा, मनुष्य सदैव ही पुराने युग में जीएगा और हमेशा शैतान के पुराने प्रभाव के अधीन रहेगा। परमेश्वर के द्वारा अगुवाई किए गए प्रत्येक युग के साथ, मनुष्य के एक भाग को स्वतन्त्र किया जाता है, और इस प्रकार परमेश्वर के कार्य के साथ-साथ मनुष्य एक नए युग की ओर आगे बढ़ता है। परमेश्वर की विजय उन सबकी विजय है जो उसका अनुसरण करते हैं। यदि सृजित मानवजाति को युग के समापन का कार्यभार दिया जाता, तब चाहे यह मनुष्य के दृष्टिकोण से हो या शैतान के, यह एक ऐसे कार्य से बढ़कर नहीं होता जो परमेश्वर का विरोध या परमेश्वर के साथ विश्वासघात करता है, न कि परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता का एक कार्य होता, और इस प्रकार मनुष्य का कार्य शैतान का साधन बन जाता। केवल जब मनुष्य परमेश्वर के द्वारा सूत्रपात किए गए एक युग में परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन और अनुसरण करता है, तभी शैतान पूरी तरह से आश्वस्त होगा, क्योंकि यह सृजित प्राणी का कर्तव्य है। और इसलिए मैं कहता हूँ कि तुम लोगों को केवल अनुसरण और आज्ञापालन कंरने की आवश्यकता है, और इससे अधिक तुम लोगों से किसी बात की अपेक्षा नहीं की जाती है। प्रत्येक व्यक्ति के द्वारा अपने कर्तव्य का पालन करने और अपने कार्य को क्रियान्वित करने का अर्थ यही है। परमेश्वर स्वयं अपना काम करता है और उसे कोई आवश्यकता नहीं है कि मनुष्य उसके स्थान पर काम करे, और न ही वह सृजित प्राणियों के काम में भाग लेता है। मनुष्य अपना स्वयं का कर्तव्य करता है और परमेश्वर के कार्य में हस्तक्षेप नहीं करता है। केवल यही सच्ची आज्ञाकारिता है और शैतान की पराजय का सबूत है। जब परमेश्वर स्वयं ने नए युग का आरम्भ कर दिया उसके पश्चात्, वह मानवों के बीच अब और कार्य करने नहीं आएगा। तभी एक सृजित प्राणी के रूप में मनुष्य अपने कर्तव्य को करने और अपने ध्येय को सम्पन्न करने के लिए आधिकारिक रूप से नए युग में कदम रखेगा। कार्य करने के सिद्धान्त ऐसे ही हैं जिनका उल्लंघन किसी के द्वारा नहीं किया जा सकता है। केवल इस तरह से कार्य करना ही विवेकपूर्ण और तर्कसंगत है। परमेश्वर का कार्य परमेश्वर स्वयं के द्वारा किया जाना है। वही अपने कार्य को चलाता है, और साथ ही उसका समापन करता है। वही है जो कार्य की योजना बनाता है, और साथ ही उसका प्रबंधन करता है, और उससे भी बढ़कर, वही उस कार्य को सफल बनाता है। जैसा बाइबल में कहा गया है, "मैं ही आदि और अंत हूँ; मैं ही बोनेवाला और काटनेवाला हूँ।" वो सब कुछ जो उसके प्रबंधन के कार्य से संबंधित है स्वयं परमेश्वर के द्वारा किया जाता है। वह छ:-हज़ार-वर्षों की प्रबंधन योजना का शासक है; कोई भी उसके स्थान पर उसका काम नहीं कर सकता है या उसके कार्य का समापन नहीं कर सकता है, क्योंकि यह वही है जो सबको अपने हाथों में रखता है। चूँकि उसने संसार का सृजन किया है, वह संपूर्ण संसार की अगुवाई करेगा ताकि सब उसके प्रकाश में जीवन जीएँ, और संपूर्ण युग का समापन करने के परिणामस्वरूप अपनी सम्पूर्ण योजना को सफल करेगा!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारण का रहस्य (1)' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 170

परमेश्वर के सम्पूर्ण स्वभाव को छ: हज़ार वर्षों की प्रबंधन योजना के दौरान प्रकट किया गया है। इसे सिर्फ अनुग्रह के युग में, सिर्फ व्यवस्था के युग में प्रकट नहीं किया जाता है, ऐसा तो बिल्कुल नहीं है की इसे सिर्फ अंत के दिनों की इस समयावधि में प्रकट किया जाता है। अंत के दिनों में किया गया कार्य न्याय, कोप और ताड़ना का प्रतिनिधित्व करता है। अंत के दिनों में किया गया कार्य व्यवस्था के युग या अनुग्रह के युग के कार्य का स्थान नहीं ले सकता है। हालाँकि, तीनों चरण आपस में एक दूसरे से जुड़कर एक सत्त्व बन जाते हैं और सभी एक ही परमेश्वर के द्वारा किये गए कार्य हैं। स्वाभाविक रूप में, इस कार्य का क्रियान्वयन तीन अलग-अलग युगों में विभाजित है। अंत के दिनों में किया गया कार्य हर चीज़ को समाप्ति की ओर ले जाता है; जो कुछ व्यवस्था के युग में किया गया वह आरम्भ का कार्य है; और जो अनुग्रह के युग में किया गया वह छुटकारे का कार्य है। जहाँ तक इस सम्पूर्ण छ: हज़ार वर्षों की प्रबंधन योजना में कार्य के दर्शनों की बात है, तो किसी को भी अंर्तदृष्टि या समझ प्राप्त करने में समर्थ नहीं है। ऐसे दर्शन हमेशा से ही रहस्य रहे हैं। अंत के दिनों में, राज्य के युग का सूत्रपात करने के लिए केवल वचन का कार्य किया जाता है, परन्तु यह सभी युगों का प्रतिनिधि नहीं है। अंत के दिन अंत के दिनों से बढ़कर नहीं हैं और राज्य के युग से बढ़कर नहीं हैं, जो अनुग्रह के युग या व्यवस्था के युग का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं। अंत के दिन मात्र वह समय है जिसमें छ: हज़ार वर्षों की प्रबंधन योजना के समस्त कार्य को तुम लोगों पर प्रकट किया जाता है। यह रहस्य से पर्दा उठाना है। ऐसे रहस्य को किसी भी मनुष्य के द्वारा अनावृत नहीं किया जा सकता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि मनुष्य के पास बाइबल की कितनी अधिक समझ है, यह वचनों से बढ़कर और कुछ नहीं है, क्योंकि मनुष्य बाइबल के सार को नहीं समझता है। जब मनुष्य बाइबल को पढ़ता है, तो वह कुछ सत्यों को प्राप्त कर सकता है, कुछ वचनों की व्याख्या कर सकता है या कुछ प्रसिद्ध अंशों या उद्धरणों का तुच्छ परीक्षण कर सकता है, परन्तु वह उन वचनों के भीतर निहित अर्थ को निकालने में कभी भी समर्थ नहीं होगा, क्योंकि मनुष्य जो कुछ देखता है वे मृत वचन हैं, यहोवा और यीशु के कार्य के दृश्य नहीं हैं, और मनुष्य ऐसे कार्य के रहस्य को सुलझाने में असमर्थ है। इसलिए, छ: हज़ार वर्षों की प्रबंधन योजना का रहस्य सबसे बड़ा रहस्य है, एक ऐसा रहस्य जो मनुष्य से बिलकुल छिपा हुआ और उसके लिए सर्वथा अबूझ है। कोई भी सीधे तौर पर परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझ सकता है, जब तक कि वह मनुष्य को स्वयं न समझाए और खुल कर न कहे, अन्यथा, वे सर्वदा मनुष्य के लिए पहेली बने रहेंगे और सर्वदा मुहरबंद रहस्य बने रहेंगे। जो धार्मिक जगत में हैं उनकी तो बात ही छोड़ो; यदि तुम लोगों को भी आज नहीं बताया जाता, तो तुम लोग भी समझने में समर्थ होते। भविष्यद्वक्ताओं की सभी भविष्यवाणियों की तुलना में छः हज़ार वर्षों का यह कार्य अधिक रहस्यमय है। यह सृजन के बाद से अब तक का सबसे बड़ा रहस्य है, और पहले का कोई भी भविष्यद्वक्ता कभी भी इसकी थाह पाने में सफल नहीं हुआ है, क्योंकि इस रहस्य को केवल अंत के युग में ही खोला जाता है और पहले कभी प्रकट नहीं किया गया है। यदि तुम लोग इस रहस्य को समझ लेते हो और इसे पूरी तरह से प्राप्त करने में समर्थ हो, तो उन सभी धार्मिक व्यक्तियों को इस रहस्य से जीत लिया जाएगा। केवल यही सबसे बड़ा दर्शन है, जिसे समझने के लिए मनुष्य सबसे अधिक लालायित रहता है किन्तु जो उसके लिए सबसे अधिक अस्पष्ट भी है। जब तुम लोग अनुग्रह के युग में थे, तो तुम लोगों को न तो यीशु के द्वारा किए गए और न ही यहोवा के द्वारा किए गए कार्य का पता था। लोगों को समझ में नहीं आता था कि यहोवा ने क्यों व्यवस्थाएँ निर्धारित की, उसने क्यों लोगों को व्यवस्थाओं का पालन करने के लिए कहा अथवा मंदिर क्यों बनाने पड़े थे, और लोगों को यह तो बिल्कुल भी समझ में नहीं आया कि क्यों इस्राएलियों को मिस्र से बीहड़ में और फिर कनान देश में ले जाया गया। आज के दिन से पहले इन मामलों को प्रकट नहीं किया गया था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारण का रहस्य (4)' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 171

ऐसे लोगों के अतिरिक्त जिन्हें पवित्र आत्मा का विशेष निर्देश और अगुवाई प्राप्त है, कोई भी स्वतंत्र रूप से जीवन जीने में सक्षम नहीं है, क्योंकि उन्हें परमेश्वर द्वारा इस्तेमाल किए गए लोगों की सेवकाई और उनके मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है। इस प्रकार, परमेश्वर हर पीढ़ी में अलग-अलग लोगों को खड़ा करता है, जो उसके कार्य के लिए कलीसिया का मार्गदर्शन करने में व्यस्त और कार्यरत रहते हैं। कहने का अर्थ यह है कि परमेश्वर का कार्य उन लोगों द्वारा होना चाहिए जिन पर वह अनुग्रह करता है और जिनको वह अनुमोदित करता है; पवित्र आत्मा को कार्य करने के लिए उनके भीतर के उस भाग का इस्तेमाल करना होगा जो उपयोग के योग्य है, और पवित्र आत्मा द्वारा पूर्ण किए जाने से वे परमेश्वर के द्वारा इस्तेमाल करने के लिए उपयुक्त बनाए जाते हैं। चूँकि मनुष्य की समझने की क्षमता बेहद कम है, मनुष्य का उन लोगों द्वारा मार्गदर्शन होना चाहिए जिन्हें परमेश्वर इस्तेमाल करता है; परमेश्वर द्वारा मूसा के इस्तेमाल में भी ऐसा ही था, जिसमें उसने उस समय इस्तेमाल के लिए बहुत कुछ उचित पाया, और जो उसने उस चरण में परमेश्वर का कार्य करने के लिए इस्तेमाल किया। इस चरण में, परमेश्वर मनुष्य का इस्तेमाल करता है साथ ही उस भाग का लाभ भी उठाता है जो कि पवित्र आत्मा द्वारा कार्य करने के लिए उपयोग किया जा सकता है और पवित्र आत्मा उसे निर्देश भी देता है और साथ ही बचे हुए अंश को जिसका इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, पूर्ण बनाता है।

परमेश्वर के द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले व्यक्ति के द्वारा किए जाने वाले कार्य, मसीह या पवित्र आत्मा के कार्य के साथ सहयोग के लिए है। यह मनुष्य परमेश्वर के द्वारा अन्य मनुष्यों के बीच में ऊँचा उठाया गया है, वह परमेश्वर के चुने हुए सभी लोगों का नेतृत्व करने के लिए है, और परमेश्वर ने उसे मानवीय सहयोग का कार्य करने के लिए भी उठाया है। इस तरह का व्यक्ति, जो मानवीय सहयोग का कार्य करने में सक्षम है, उसके माध्‍यम से, मनुष्य से परमेश्वर की अपेक्षाओं और जो कार्य पवित्र आत्मा के द्वारा मनुष्यों के बीच किया जाना चाहिए, वह अधिक से अधिक पूरा किया जा सकता है। इसे दूसरे शब्दों में यूँ कहा जा सकता है : इस मनुष्य को इस्तेमाल करने में परमेश्वर का उद्देश्य यह है कि वे सब जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, परमेश्वर की इच्छा को अच्छी तरह समझ सकें, और परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा कर सकें। क्योंकि लोग परमेश्वर के वचन को या परमेश्वर की इच्छा को स्वयं समझने में असमर्थ हैं, इसलिए परमेश्वर ने किसी ऐसे को खड़ा किया है जो इस तरह का कार्य करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। यह व्यक्ति जो परमेश्वर के द्वारा इस्तेमाल किया गया है, उसका वर्णन एक ऐसे माध्यम के रूप में किया जा सकता है जिसके द्वारा परमेश्वर लोगों का मार्गदर्शन करता है, एक "अनुवादक" जो परमेश्वर और लोगों के बीच में संप्रेषण बनाए रखता है। इस प्रकार, यह व्यक्ति उनकी तरह नहीं है जो परमेश्वर के घराने में काम करते हैं या जो उसके प्रेरित हैं। यह कहा जा सकता है कि वह उनकी ही तरह परमेश्वर की सेवा करता है, फिर भी परमेश्वर के द्वारा उसके उपयोग की पृष्ठभूमि में और उसके कार्य के सार के विषय में, वह दूसरे कार्यकर्ताओं और प्रेरितों से बिलकुल अलग है। जो व्यक्ति परमेश्वर द्वारा इस्तेमाल किया जाता है, वह अपने कार्य के सार और अपने उपयोग की पृष्ठभूमि के विषय में परमेश्वर के द्वारा खड़ा किया जाता है, वह परमेश्वर के कार्य के लिए परमेश्वर के द्वारा तैयार किया जाता है, और वह स्वयं परमेश्वर के कार्य में सहयोग करता है। कोई भी व्यक्ति उसकी जगह उसका कार्य नहीं कर सकता—यह मनुष्य का सहयोग है जो दिव्य कार्य के साथ अपरिहार्य है। इस दौरान, दूसरे कार्यकर्ताओं या प्रेरितों द्वारा किया गया कार्य, कुछ और नहीं बल्कि हर अवधि के दौरान कलीसियाओं के लिए व्यवस्थाओं के कई पहलुओं को लाना और उन्हें पूरा करना है, या फिर कलीसियाई जीवन को बनाए रखने के लिए जीवन के सरल प्रावधान का कार्य करना है। ये कार्यकर्ता और प्रेरित परमेश्वर द्वारा नियुक्त नहीं किए जाते हैं, न ही यह कहा जा सकता है कि वे पवित्र आत्मा द्वारा इस्तेमाल किए जाते हैं। वे कलीसिया में से चुने जाते हैं और, कुछ समय तक प्रशिक्षण और तौर-तरीके सिखाने के बाद, जो उपयुक्त होते हैं उन्हें रखा जाता है, जबकि जो उपयुक्त नहीं होते हैं उन्हें वहीं वापस भेज दिया जाता है जहाँ से वे आए थे। क्योंकि ये लोग कलीसियाओं में से चुने जाते हैं, कुछ अपना असली रंग अगुवा बनने के बाद दिखाते हैं, और कुछ तो बहुत बुरे काम करते हैं और अंत में निकाल दिए जाते हैं। दूसरी ओर, जो मनुष्य परमेश्वर के द्वारा इस्तेमाल किया जाता है, वह परमेश्वर के द्वारा तैयार किया जाता है, और उसके भीतर निश्चित योग्यता और मानवता होती है। उसे पहले से ही पवित्र आत्मा द्वारा तैयार और पूर्ण कर दिया जाता है और पूर्णरूप से पवित्र आत्मा द्वारा चलाया जाता है, और विशेषकर तब जब उसके कार्य की बारी आती है, उसे पवित्र आत्मा द्वारा निर्देश और आदेश दिए जाते हैं—परिणामस्वरुप परमेश्वर के चुने हुए लोगों की अगुवाई के मार्ग में कोई भटकाव नही आता, क्योंकि परमेश्वर निश्चित रूप से अपने कार्य का उत्तरदायित्व लेता है, और परमेश्वर हर समय अपना कार्य करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर द्वारा मनुष्य को इस्तेमाल करने के विषय में' से

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 172

पवित्र आत्मा की मुख्य धारा का कार्य, इससे फर्क नहीं पड़ता है कि यह परमेश्वर का स्वयं का कार्य है या उपयोग किए जा रहे मनुष्यों का कार्य है, यह पवित्र आत्मा का कार्य है। स्वयं परमेश्वर का सार पवित्रात्मा है, जिसे पवित्र आत्मा या सात गुना तेज पवित्रात्मा भी कहा जा सकता है। कुल मिला कर, वह परमेश्वर का आत्मा है। केवल इतना ही है कि भिन्न-भिन्न युगों के दौरान परमेश्वर के आत्मा को भिन्न-भिन्न नामों से पुकारा जाता है। परन्तु उनका सार तब भी एक ही है। इसलिए, स्वयं परमेश्वर का कार्य ही पवित्र आत्मा का कार्य है; देहधारी परमेश्वर का कार्य पवित्र आत्मा के कार्य से कम नहीं है। जिन मनुष्यों का उपयोग किया जाता है उनका कार्य भी पवित्र आत्मा का कार्य है। फिर भी परमेश्वर का कार्य पवित्र आत्मा की पूर्ण अभिव्यक्ति है, जो सर्वथा सत्य है, जबकि उपयोग किए जा रहे लोगों का कार्य बहुत-सी मानवीय चीज़ों के साथ मिश्रित होता है, और वह पवित्र आत्मा की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति नहीं होता, परमेश्वर की पूर्ण अभिव्यक्ति होने की तो बात ही छोड़ो। पवित्र आत्मा का कार्य विविध होता है और यह किसी परिस्थिति से सीमित नहीं है। भिन्न-भिन्न लोगों में यह कार्य भिन्न-भिन्न होता है, और कार्य करने के भिन्न-भिन्न सारों को सूचित करता है। भिन्न-भिन्न युगों में भी कार्य भिन्न होता है, वैसे ही भिन्न-भिन्न देशों में कार्य भिन्न होता है। निस्संदेह, यद्यपि पवित्र आत्मा कई भिन्न-भिन्न तरीकों से और कई सिद्धान्तों के अनुसार कार्य करता है, फिर भी इससे फर्क नहीं पड़ता है कि कार्य किस प्रकार किया जाता है या किस प्रकार के लोगों पर किया जाता है, सार हमेशा भिन्न होता है, और जो कार्य वह भिन्न-भिन्न लोगों पर करता है उन सबके सिद्धान्त होते हैं और वे सभी उस कार्य के उद्देश्य के सार को प्रदर्शित कर सकते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि पवित्र आत्मा का कार्य दायरे में काफी विशिष्ट और काफी नपा-तुला होता है। देहधारी देह में किया गया कार्य उस कार्य के समान नहीं है जो लोगों पर किया जाता है, और लोगों की भिन्न-भिन्न क्षमता के आधार पर वह कार्य भी भिन्न-भिन्न होता है। देहधारी देह में किया गया कार्य लोगों पर नहीं किया जाता है, और देहधारी देह में वह उसी कार्य को नहीं करता है जैसा कि लोगों पर किया जाता है। एक शब्द में, इससे फर्क नहीं पड़ता है कि वह किस प्रकार कार्य करता है, विभिन्न व्यक्तियों पर किया गया कार्य कभी एक समान नहीं होता है, और जिन सिद्धान्तों के द्वारा वह कार्य करता है वे भिन्न-भिन्न लोगों की अवस्था और प्रकृति के अनुसार भिन्न-भिन्न होते हैं। पवित्र आत्मा भिन्न-भिन्न लोगों पर उनके अंतर्निहित सार के आधार पर कार्य करता है और उनके अंतर्निहित सार से बाहर उनसे माँग नहीं करता है, न ही वह उन पर उनकी वास्तविक क्षमता से बाहर कार्य करता है। इसलिए, मनुष्य पर पवित्र आत्मा का कार्य लोगों को कार्य के लक्ष्य के सार को देखने देता है। मनुष्य का अंतर्निहित सार परिवर्तित नहीं होता है; मनुष्य की वास्तविक क्षमता सीमित है। चाहे पवित्र आत्मा लोगों का उपयोग करे या लोगों पर कार्य करे, कार्य हमेशा मनुष्यों की क्षमता की सीमाओं के अनुसार होता है ताकि वे इससे लाभान्वित हो सकें। जब पवित्र आत्मा उपयोग किए जा रहे मनुष्यों पर कार्य करता है, तो उनकी प्रतिभा और वास्तविक क्षमता को काम में लाया जाता है और उन्हें बचाकर नहीं रखा जाता है। उनकी समस्त वास्तविक क्षमता को कार्य की सेवा के लिए काम में लाया जाता है। ऐसा कहा जा सकता है कि वह कार्यकारी परिणाम को प्राप्त करने के लिए मनुष्यों के उपलब्ध गुणों का उपयोग करके कार्य करता है। इसके विपरीत, देहधारी देह में किया गया कार्य सीधे तौर पर पवित्रात्मा के कार्य को व्यक्त करने के लिए है और यह मानवीय मन और विचारों के साथ मिश्रित नहीं होता है, और मनुष्यों की प्रतिभाओं, मनुष्य के अनुभव या मनुष्य की स्वाभाविक दशा के द्वारा यह अगम्य है। पवित्र आत्मा के समस्त असंख्य कार्य मनुष्यों को लाभ पहुँचाने और शिक्षित करने की ओर लक्षित हैं। परन्तु कुछ लोगों को सिद्ध बनाया जा सकता है जबकि अन्य लोग सिद्धता की स्थितियाँ नहीं रखते हैं, कहने का तात्पर्य है कि, उन्हें सिद्ध नहीं किया जा सकता है और उन्हें मुश्किल से ही बचाया जा सकता है, और यद्यपि उनके पास पवित्र आत्मा का कार्य हो सकता है, फिर भी अंततः उन्हें निष्कासित कर दिया जाता है। कहने का अर्थ है कि यद्यपि पवित्र आत्मा का कार्य लोगों को शिक्षित करना है, फिर भी इसका यह अर्थ नहीं है कि वे सभी लोग जिनके पास पवित्र आत्मा का कार्य है उन्हें पूरी तरह से सिद्ध बनाया जाना है, क्योंकि बहुत से लोगों के द्वारा खोजा जा रहा मार्ग सिद्ध बनाए जाने का मार्ग नहीं है। उनके पास केवल पवित्र आत्मा का एकतरफ़ा कार्य है, और आत्मपरक मानवीय सहयोग या सही मानवीय खोज नहीं है। इस तरह, इन लोगों पर पवित्र आत्मा का कार्य उन लोगों का सेवा कार्य बन जाता है जिन्हें सिद्ध बनाया जा रहा है। पवित्र आत्मा के कार्य को स्वयं लोगों के द्वारा सीधे तौर पर देखा या सीधे तौर पर छुआ नहीं जा सकता है। इसे केवल कार्य करने की प्रतिभा वाले मनुष्यों की सहायता के माध्यम से व्यक्त किया जा सकता है, इसका अर्थ है कि पवित्र आत्मा के कार्य को मनुष्यों के द्वारा अभिव्यक्ति के माध्यम से अनुयायियों को प्रदान किया जाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 173

पवित्र आत्मा के कार्य को कई प्रकार के लोगों और अनेक भिन्न-भिन्न परिस्थितियों के माध्यम से सम्पन्न और पूरा किया जाता है। यद्यपि देहधारी परमेश्वर का कार्य एक संपूर्ण युग के कार्य का प्रतिनिधित्व कर सकता है, और एक संपूर्ण युग में लोगों के प्रवेश का प्रतिनिधित्व कर सकता है, फिर भी मनुष्यों के विस्तृत प्रवेश के कार्य को अभी भी पवित्र आत्मा के द्वारा उपयोग किए गए मनुष्यों के द्वारा किए जाने की आवश्यकता है, न कि देहधारी परमेश्वर के द्वारा किए जाने की आवश्यकता है। इसलिए, परमेश्वर का कार्य, या परमेश्वर की स्वयं की सेवकाई, देहधारी परमेश्वर के देह का कार्य है और इसे उसके बदले में मनुष्य के द्वारा नहीं किया जा सकता है। पवित्र आत्मा का कार्य विभिन्न प्रकार के मनुष्यों के द्वारा पूरा किया जाता है और इसे केवल एक ही व्यक्ति विशेष के द्वारा पूर्ण नहीं किया जा सकता है या एक ही व्यक्ति विशेष के माध्यम से पूरी तरह से स्पष्ट नहीं किया जा सकता है। जो लोग कलीसियाओं की अगुवाई करते हैं वे भी पूरी तरह से पवित्र आत्मा के कार्य का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते हैं; वे केवल कुछ प्रमुख कार्य ही कर सकते हैं। इस तरह, पवित्र आत्मा के कार्य को तीन हिस्सों में विभाजित जा सकता हैः परमेश्वर का स्वयं का कार्य, उपयोग में लाए जा रहे मनुष्यों का कार्य, और उन सभी लोगों पर किया गया कार्य जो पवित्र आत्मा की मुख्य धारा में हैं। इन तीनों में से, परमेश्वर का स्वयं का कार्य सम्पूर्ण युग की अगुवाई करना है; जिन्हें उपयोग में लाया जाता है उन मनुष्यों का कार्य परमेश्वर के स्वयं के कार्य के पश्चात् भेजे जाने या महान आदेशों को प्राप्त करने के द्वारा सभी अनुयायियों की अगुवाई करना है, और ये वे मनुष्य हैं जो परमेश्वर के कार्य के साथ सहयोग करते हैं; पवित्र आत्मा के द्वारा उन लोगों पर किया गया कार्य जो इस मुख्य धारा में हैं अपने स्वयं के कार्य को बनाए रखना है, अर्थात्, सम्पूर्ण प्रबंधन को बनाए रखना है और अपनी गवाही को बनाए रखना है, जबकि साथ ही उन लोगों को सिद्ध बनाना है जिन्हें सिद्ध किया जा सकता है। ये तीनों हिस्से पवित्र आत्मा का पूर्ण कार्य हैं, किन्तु स्वयं परमेश्वर के कार्य के बिना, सम्पूर्ण प्रबंधन कार्य रूक जाएगा। स्वयं परमेश्वर के कार्य में सम्पूर्ण मनुष्यजाति का कार्य समाविष्ट है, और यह सम्पूर्ण युग के कार्य का भी प्रतिनिधित्व करता है। कहने का तात्पर्य है कि, परमेश्वर का स्वयं का कार्य पवित्र आत्मा के सभी कार्य की चाल और प्रवृत्ति का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि प्रेरितों का कार्य परमेश्वर के स्वयं के कार्य का अनुसरण करता है और युग की अगुवाई नहीं करता है, न ही यह पूरे युग में पवित्र आत्मा के कार्य की प्रवृत्ति का प्रतिनिधित्व करता है। वे केवल वही कार्य करते हैं जो मनुष्य को अवश्य करना चाहिए, जो प्रबंधन कार्य को बिलकुल भी समाविष्ट नहीं करता है। परमेश्वर का स्वयं का कार्य प्रबंधन कार्य के भीतर एक परियोजना है। मनुष्य का कार्य केवल उपयोग किए जा रहे मनुष्यों का कर्तव्य है और इसका प्रबंधन कार्य से कोई सम्बन्ध नहीं है। कार्य की विभिन्न पहचान और कार्य के विभिन्न प्रतिनिधित्वों के कारण, इस तथ्य के बावजूद कि वे दोनों पवित्र आत्मा के कार्य हैं, परमेश्वर के कार्य और मनुष्य के कार्य के बीच स्पष्ट और सारभूत अन्तर हैं। इसके अतिरिक्त, विभिन्न पहचानों वाली कार्य वस्तुओं पर पवित्र आत्मा के द्वारा किए गए कार्य की सीमा भिन्न होती है। ये पवित्र आत्मा के कार्य के सिद्धान्त और दायरे हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 174

मनुष्य का कार्य उसके अनुभव और उसकी मानवता का प्रतिनिधित्व करता है। जो कुछ मनुष्य प्रदान करता है और मनुष्य जिस कार्य को करता है वह उसका प्रतिनिधित्व करता है। मनुष्य का देखना, मनुष्य की विवेक-बुद्धि, मनुष्य का तर्क और उसकी समृद्ध कल्पना सभी उसके कार्य में शामिल होते हैं। विशेष रूप में, मनुष्य का अनुभव उसके कार्य का प्रतिनिधित्व करने में अधिक समर्थ है, और जो कुछ किसी व्यक्ति ने अनुभव किए हैं वे उसके कार्य के घटक होंगे। मनुष्य का कार्य उसके अनुभव को व्यक्त कर सकता है। जब कुछ लोग निष्क्रिय अवस्था में अनुभव कर रहे होते हैं, तो उनकी अधिकांश संगति नकारात्मक तत्वों से युक्त होती है। यदि कुछ समयावधि तक उनका अनुभव सकारात्मक है और विशेष रूप से उनका मार्ग सकारात्मक पक्ष पर है, तो जिसकी वे संगति करते हैं वह अत्यंत प्रोत्साहक होता है, और लोग उनसे सकारात्मक आपूर्ति को प्राप्त कर पाएँगे। यदि कोई कार्यकर्ता कुछ समयावधि तक निष्क्रिय हो जाता है, तो उसकी संगति हमेशा नकारात्मक तत्वों को वहन करेगी। इस प्रकार की संगति निराशाजनक होती है, और अन्य लोग उसकी संगति का अनुसरण करके अवचेतन रूप से निराश हो जाएँगे। अगुवे के आधार पर अनुयायियों की अवस्था बदलती है। एक कार्यकर्ता भीतर से वैसा होता है जैसा वह व्यक्त करता है, और पवित्र आत्मा का कार्य प्रायः मनुष्य की अवस्था के साथ बदल जाता है। वह मनुष्य के अनुभव के आधार पर कार्य करता है और उसे बाध्य नहीं करता है बल्कि मनुष्य के अनुभव के सामान्य मार्ग के अनुसार उससे माँग करता है। कहने का तात्पर्य है कि मनुष्य की संगति परमेश्वर के वचन से भिन्न होती है। जो कुछ मनुष्य संगति करते हैं वह उनके व्यक्तिगत देखने और अनुभव को सूचित करती है, और परमेश्वर के कार्य के आधार पर जो कुछ उन्होंने देखा और अनुभव किया है उन्हें व्यक्त करती है। उनकी ज़िम्मेदारी, परमेश्वर के कार्य करने या बोलने के पश्चात्, यह पता लगाना है कि उन्हें किसका अभ्यास करना चाहिए, या किसमें प्रवेश करना चाहिए, और तब इसे अनुयायियों को सौंपना है। इसलिए, मनुष्य का कार्य उसके प्रवेश और अभ्यास का प्रतिनिधित्व करता है। निस्संदेह, ऐसा कार्य मानवीय सबकों और अनुभव या कुछ मानवीय विचारों के साथ मिश्रित होता है। चाहे पवित्र आत्मा किसी भी तरह से कार्य क्यों न करे, चाहे वह मनुष्यों में कार्य करे या देहधारी परमेश्वर में, ये हमेशा कार्यकर्ता ही होते हैं जो व्यक्त करते हैं कि वे क्या हैं। यद्यपि यह पवित्र आत्मा ही होता है जो कार्य करता है, फिर भी मनुष्य अंतर्निहित रूप से जैसा होता है कार्य उस पर आधारित होता है, क्योंकि पवित्र आत्मा बिना आधार के कार्य नहीं करता है। दूसरे शब्दों में, कार्य को शून्य में से नहीं किया जाता है, बल्कि यह हमेशा वास्तविक परिस्थितियों और वास्तविक स्थितियों के अनुसार होता है। केवल इसी तरह से ही मनुष्य के स्वभाव को रूपान्तरित किया जा सकता है, कि उसकी पुरानी अवधारणाओं और पुराने विचारों को बदला जा सकता है। जो कुछ मनुष्य देखता, अनुभव करता, और कल्पना कर सकता है वह उसे अभिव्यक्त करता है। भले ही ये सिद्धान्त या अवधारणाएँ हों, इन सभी तक मनुष्य की सोच पहुँच सकती है। भले ही मनुष्य के कार्य का आकार कुछ भी हो, यह मनुष्य के अनुभव के दायरे, जो मनुष्य देखता है, या जिसकी मनुष्य कल्पना या जिसका विचार कर सकता है, उनसे बढ़कर नहीं हो सकता है। जो कुछ परमेश्वर प्रकट करता है परमेश्वर स्वयं वही है, और यह मनुष्य की पहुँच से परे, अर्थात्, मनुष्य की सोच से परे है। वह सम्पूर्ण मानवजाति की अगुवाई करने के अपने कार्य को व्यक्त करता है, और यह मानव अनुभव के विवरणों के प्रासंगिक नहीं है, बल्कि इसके बजाए यह उसके अपने प्रबंधन से सम्बन्धित है। मनुष्य अपने अनुभव को व्यक्त करता है, जबकि परमेश्वर अपने अस्तित्व को व्यक्त करता है—यह अस्तित्व उसका अंतर्निहित स्वभाव है और यह मनुष्य की पहुँच से परे है। मनुष्य का अनुभव उसका देखना और परमेश्वर की अपने अस्तित्व की अभिव्यक्ति के आधार पर प्राप्त किया गया उसका ज्ञान है। ऐसा देखना और ज्ञान मनुष्य का अस्तित्व कहलाता है। ये मनुष्य के अंतर्निहित स्वभाव और उसकी वास्तविक क्षमता के आधार पर व्यक्त होते हैं; इसलिए इन्हें मनुष्य का अस्तित्व भी कहा जाता है। जो कुछ मनुष्य देखता और अनुभव करता है वह उसकी संगति कर पाता है। जो कुछ उसने अनुभव नहीं किया है या देखा नहीं है या जिस तक उसका मन नहीं पहुँच सकता है, अर्थात्, ऐसी चीज़ें जो उसके भीतर नहीं हैं, वह उसकी संगति करने में असमर्थ है। यदि जो कुछ मनुष्य व्यक्त करता है वह उसका अनुभव नहीं है, तो यह उसकी कल्पना या सिद्धान्त है। एक शब्द में, उसके वचनों में कोई वास्तविकता नहीं होती है। यदि तुमने समाज की चीज़ों से कभी संपर्क नहीं किया है, तो तुम समाज के जटिल सम्बन्धों की स्पष्टता से संगति करने में समर्थ नहीं होगे। यदि तुम्हारा कोई परिवार नहीं है परन्तु अन्य लोग परिवारिक मुद्दों के बारे में बात कर रहे हैं, तो जो कुछ वे कह रहे हैं तुम उनकी अधिकांश बातों को नहीं समझ सकते हो। इसलिए, जो कुछ मनुष्य संगति करता है और जिस कार्य को वह करता है वह उसके भीतरी अस्तित्व का प्रतिनिधित्व करता है। यदि कोई ताड़ना और न्याय के बारे में अपनी समझ की संगति करता है, परन्तु तुम्हारे पास इसका कोई अनुभव नहीं है, तो तुम उसके ज्ञान को नकारने का साहस नहीं करते हो, और इसके बारे में सौ प्रतिशत निश्चित होने का साहस तो बिलकुल भी नहीं करते हो। ऐसा इसलिए है क्योंकि जिसके बारे में वह संगति करता है वह कुछ ऐसी चीज़ है जिसका तुमने कभी अनुभव नहीं किया है, कुछ ऐसी चीज़ जिसे तुमने कभी नहीं जाना है, और तुम्हारा मन इसकी कल्पना नहीं कर सकता है। तुम उसके ज्ञान से केवल ताड़ना और न्याय से संबंधित भविष्य का एक मार्ग ले सकते हो। परन्तु यह मार्ग केवल सिद्धान्त पर आधारित समझ के रूप में ही कार्य कर सकता है और तम्हारी अपनी समझ का स्थान नहीं ले सकता है, और तुम्हारे अनुभव का स्थान तो बिलकुल भी नहीं ले सकता है। कदाचित् तुम सोचते हो कि जो कुछ वह कहता है वह बिल्कुल सही है, परन्तु जब तुम अनुभव करते हो, तो तुम इसे अनेक चीज़ों में अव्यावहारिक पाते हो। कदाचित् तुम महसूस करते हो कि कुछ ज्ञान जिसे तुम सुनते हो वह पूरी तरह से अव्यावहारिक है; उस समय तुम इसके बारे में अवधारणाओं को आश्रय देते हो, और यद्यपि तुम इसे स्वीकार करते हो, फिर भी तुम केवल अनिच्छा से ही ऐसा करते हो। परन्तु जब तुम अनुभव करते हो, तो वह ज्ञान जो तुम्हें अवधारणाएँ देता है वह तुम्हारे अभ्यास का मार्ग बन जाता है। और जितना अधिक तुम अभ्यास करते हैं, उतना ही अधिक तुम उसके वचनों के सही मूल्य और अर्थ को समझते हो। तुम्हारे अनुभव प्राप्त कर लेने के पश्चात्, तब तुम उस ज्ञान के बारे में बात कर सकते हो जो तुम्हारे पास उन चीज़ों के बारे में होना चाहिए जो तुमने अनुभव की हैं। इसके साथ, तुम ऐसे लोगों के बीच अन्तर कर सकते हो जिनका ज्ञान वास्तविक और व्यावहारिक है और ऐसे लोग जिनका ज्ञान सिद्धान्त पर आधारित है और बेकार है। इसलिए, वह ज्ञान जिसकी तुम चर्चा कर रहे हो वह सत्य के अनुरूप है या नहीं यह मुख्य रूप से इस बात पर निर्भर करता है कि तुम्‍हारे पास व्यावहारिक अनुभव है या नहीं। जहाँ तुम्हारे अनुभवों में सच्चाई है, वहाँ तुम्हारा ज्ञान व्यावहारिक और मूल्यवान होगा। अपने अनुभव के माध्यम से, तुम विवेक और अंतर्दृष्टि भी प्राप्त कर सकते हो, अपने ज्ञान को और गहरा कर सकते हो, और अपना आचरण करने में अपनी बुद्धि और सामान्यबोध को बढ़ा सकते हो। ऐसे लोगों के द्वारा बोला गया ज्ञान जो सत्य को धारण नहीं करते हैं मात्र सिद्धान्त है, भले ही कितना ही ऊँचा क्यों न हो। जब देह के मामलों की बात आती है तो हो सकता है कि इस प्रकार का व्यक्ति बहुत बुद्धिमान हो परन्तु जब आध्यात्मिक मामलों की बात आती है तो वह विभेद नहीं कर सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि ऐसे लोगों का आध्यात्मिक मामलों में बिलकुल भी अनुभव नहीं होता है। ये ऐसे लोग हैं, जो आध्यात्मिक मामलों में प्रबुद्ध नहीं हैं और जो आध्यात्मिक मामलों को नहीं समझते। चाहे तुम ज्ञान के किसी भी पहलू के बारे में बात करो, अगर यह तुम्हारा अस्तित्व है, तो यह तुम्हारा व्यक्तिगत अनुभव है, और तुम्हारा वास्तविक ज्ञान है। जो लोग केवल सिद्धान्त की ही बात करते हैं, अर्थात्, जो लोग सत्य या वास्तविकता को धारण नहीं करते हैं, तो वे जिस बारे में बात करते हैं उसे भी उनका अस्तित्व कहा जा सकता है, क्योंकि उनका सिद्धान्त केवल गहरे चिंतन से आया है और यह गहराई से मनन करने वाले उनके मन का परिणाम है, परन्तु यह केवल सिद्धान्त ही है, यह कल्पना से अधिक कुछ नहीं है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 175

विभिन्न प्रकार के लोगों के अनुभव उनके भीतर की चीज़ों का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे सभी जिनके पास आध्यात्मिक अनुभव नहीं है वे सत्य के ज्ञान, या भिन्न-भिन्न प्रकार की आध्यात्मिक चीज़ों के सही ज्ञान के बारे में बात नहीं कर सकते हैं। जो कुछ मनुष्य व्यक्त करता है वह भीतर से वैसा ही होता है—यह निश्चित है। यदि कोई आध्यात्मिक चीज़ों और सत्य का ज्ञान पाने की इच्छा करता है, तो उसके पास वास्तविक अनुभव अवश्य होना चाहिए। यदि तुम मानवीय जीवन के सम्बन्ध में सामान्य बोध के बारे में स्पष्ट रूप से बात नहीं कर सकते हो, तो तुम आध्यात्मिक चीज़ों के बारे में तो कितना कम बात कर पाओगे? जो लोग कलीसिया की अगुवाई कर सकते हैं, लोगों को जीवन प्रदान कर सकते हैं, और लोगों के लिए एक प्रेरित हो सकते हैं, उनके पास वास्तविक अनुभव अवश्य होने चाहिए, उन्हें आध्यात्मिक चीज़ों की सही समझ, सत्य की सही समझ और अनुभव अवश्य होना चाहिए। केवल ऐसे मनुष्य ही कलीसिया की अगुवाई करने वाले कार्यकर्ता या प्रेरित होने के योग्य हैं। अन्यथा, वे न्यूनतम रूप में केवल अनुसरण ही कर सकते हैं और अगुवाई नहीं कर सकते हैं, और वे लोगों को जीवन प्रदान करने में समर्थ प्रेरित तो बिलकुल भी नहीं हो सकते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि प्रेरित का कार्य दौड़ना या लड़ना नही है; बल्कि जीवन की सेवकाई करना और लोगों के स्वभावोंव में परिवर्तन लाने के लिए उनकी अगुवाई करना है। यह ऐसा कार्य है जो उनके द्वारा किया जाता है जिन्हें भारी ज़िम्मेदारियों को कंधों पर उठाने के लिए अधिकृत किया जाता है और यह कुछ ऐसा नहीं है जिसे प्रत्येक व्यक्ति कर सकता है। इस प्रकार का कार्य केवल ऐसे लोगों के द्वारा आरम्भ किया जा सकता है जिनके पास जीवन का अस्तित्व है, अर्थात्, ऐसे लोग जिनके पास सत्य का अनुभव है। इसे ऐसे हर किसी के द्वारा आरम्भ नहीं किया जा सकता है जो छोड़ सकता है, भाग सकता है या जो खर्च करने की इच्छा रखता है; जिन लोगों के पास सत्य का कोई अनुभव नहीं है, जिनकी काट-छाँट या जिनका न्याय नहीं किया गया है, वे इस प्रकार का कार्य करने में असमर्थ हैं। ऐसे लोग जिनके पास कोई अनुभव नहीं है, अर्थात्, ऐसे लोग जिनके पास कोई वास्तविकता नहीं है, वे वास्तविकता को स्पष्ट रूप से नहीं देख पाते हैं क्योंकि वे इस पहलू में अस्तित्व को धारण नहीं करते हैं। इसलिए, इस प्रकार का व्यक्ति न केवल अगुवाई का कार्य नहीं कर पाता है, बल्कि वह निष्कासन की एक वस्तु हो जाएगा यदि उसके पास लम्बी अवधि तक कोई सत्य नहीं होता है। जिस देखने के बारे में तुम बोलते हो यह उन कठिनाईयों को प्रमाणित कर सकता है जिनका तुमने जीवन में अनुभव किया है, जिन मामलों पर तुम्हें ताड़ना दी गई है और जिन मामलों में तुम्हारा न्याय किया गया है। यह परीक्षाओं में भी सत्य हैः जिन चीज़ों में किसी मनुष्य को शुद्ध किया जाता है, जिन चीज़ों में कोई मनुष्य कमज़ोर होता है, ये ऐसी चीज़ें हैं जिसमें किसी मनुष्य को अनुभव होते हैं, ऐसी चीज़ें जिसमें किसी मनुष्य के पास मार्ग होते हैं। उदाहरण के लिए, यदि कोई विवाह में कुंठाओं से पीड़ित है, तो वह अधिकांश समय संगति करेगा, "परमेश्वर का धन्यवाद, परमेश्वर की स्तुति हो, मुझे अवश्य परमेश्वर के हृदय की इच्छा को संतुष्ट करना चाहिए और अपना संपूर्ण जीवन अर्पित करना चाहिए, अपने विवाह को पूरी तरह से परमेश्वर के हाथों में सौंप देना चाहिए। मैं अपना सम्पूर्ण जीवन परमेश्वर को देने का वचन देता हूँ।" संगति के माध्यम से मनुष्य के भीतर की सभी चीज़ें दर्शा सकती हैं कि वह क्या है। किसी व्यक्ति के बोलने की गति, चाहे वह जोर से बोलता हो या धीमे से, ऐसे मामले जो अनुभव के मामले नहीं हैं वे उन बातों का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते हैं जो उसके पास है और जो वह है। वे केवल इतना ही बता सकते हैं कि उसका चरित्र अच्छा है या बुरा, या उसका स्वभाव अच्छा है या बुरा, परन्तु उनकी इस बात के साथ बराबरी नहीं की जा सकती है कि उसके पास अनुभव हैं या नहीं। बोलते समय स्वयं को व्यक्त करने की योग्यता, या बोलने की कुशलता या गति, सिर्फ अभ्यास की बातें हैं और उसके अनुभव का स्थान नहीं ले सकती हैं। जब तुम अपने-अपने अनुभवों के बारे में बात करते हो, तो तुम उस चीज़ की, जिसे तुम महत्व देते हो और उन सभी चीज़ों की जो तुम्हारे भीतर हैं संगति करते हो। मेरी बोली मेरे अस्तित्व को दर्शाती है, परन्तु जो मैं कहता हूँ वह मनुष्य की पहुँच से परे है। जो मैं कहता हूँ यह वह नहीं है जिसका मनुष्य अनुभव करता है, और यह कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसे मनुष्य देख सकता है, यह कोई ऐसी चीज़ भी नहीं है जिसे मनुष्य स्पर्श कर सकता है, बल्कि यह वह है जो मैं हूँ। कुछ लोग केवल इतना ही स्वीकार करते हैं कि जो मैं संगति करता हूँ यह वह है जिसका मैंने अनुभव किया है, परन्तु वे इस बात को नहीं पहचानते हैं कि यह पवित्रात्मा की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है। निस्संदेह, जो मैं कहता हूँ वह मैंने अनुभव किया है। यह मैं ही हूँ जिसने छः हजार वर्षों से प्रबंधन का कार्य किया है। मैंने मनुष्यजाति के सृजन के आरम्भ से लेकर अभी तक हर चीज़ का अनुभव किया है; कैसे मैं इसके बारे में बात नहीं कर पाऊँगा? जब मनुष्य की प्रकृति की बात आती है, तो मैंने इसे स्पष्ट रूप से देखा है, और मैंने लम्बे समय से इसका अवलोकन किया है; कैसे मैं इसके बारे में स्पष्ट रूप से बात नहीं कर पाऊँगा? चूँकि मैंने मनुष्य के सार को स्पष्टता से देखा है, इसलिए मैं मनुष्य को ताड़ना देने और उसका न्याय करने के योग्य हूँ, क्योंकि सभी मनुष्य मुझ से ही आए हैं परन्तु उन्हें शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है। निस्संदेह, मैं उस कार्य का आँकलन करने के भी योग्य हूँ जिसे मैंने किया है। यद्यपि इस कार्य को मेरी देह के द्वारा नहीं किया जाता है, फिर भी यह पवित्रात्मा की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है, और यह मेरा स्वरूप है। इसलिए, मैं इसे व्यक्त करने और उस कार्य को करने के योग्य हूँ जो मुझे अवश्य करना चाहिए। जो कुछ मनुष्य कहते हैं यह वही है जिसे उन्होंने अनुभव किया है। यह वही है जो उन्होंने देखा है, जिस तक उनके दिमाग पहुँच सकते हैं और जो उनकी इंद्रियाँ महसूस कर सकती हैं। यह वही है जिसकी वे संगति कर सकते हैं। देहधारी परमेश्वर के देह द्वारा कहे गए वचन पवित्रात्मा की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति हैं और उस कार्य को अभिव्यक्त करते हैं जो पवित्रात्मा के द्वारा किया गया है। देह ने इसे अनुभव किया या देखा नहीं है, परन्तु तब भी उसके अस्तित्व को व्यक्त करता है क्योंकि देह का सार पवित्रात्मा है, और वह पवित्रात्मा के कार्य को व्यक्त करता है। यद्यपि देह इस तक पहुँचने में असमर्थ है, फिर भी यह ऐसा कार्य है जिसे पवित्रात्मा के द्वारा पहले से ही किया गया है। देहधारण के पश्चात्, देह की अभिव्यक्ति के माध्यम से, वह लोगों को परमेश्वर के अस्तित्व को जानने में सक्षम बनाता है और लोगों को परमेश्वर के स्वभाव और उस कार्य को देखने देता है जो उसने किया है। मनुष्य का कार्य लोगों को इस बारे में अधिक स्पष्ट होने में सक्षम बनाता है कि उन्हें किसमें प्रवेश करना चाहिए और उन्हें क्या समझना चाहिए; इसमें लोगों की सत्य को समझने और अनुभव करने के लिए अगुवाई करना शामिल है। मनुष्य का कार्य लोगों को बनाए रखना है; परमेश्वर का कार्य मानवजाति के लिए नए मार्गों को प्रशस्त करना और नए युगों को प्रशस्त करना, और लोगों को परमेश्वर के स्वभाव को जानने में सक्षम बनाते हुए, उनके सामने वह प्रकट करना है जिसे नश्वर मनुष्यों के द्वारा नहीं जाना जाता है। परमेश्वर का कार्य सम्पूर्ण मानवजाति की अगुवाई करना है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 176

पवित्र आत्मा का कार्य कुल मिलाकर लोगों को लाभ प्राप्त करने में सक्षम बनाना है; यह कुल मिलाकर लोगों को शिक्षित करने के बारे में है; ऐसा कोई कार्य नहीं है जो लोगों को लाभान्वित न करता हो। चाहे सत्य गहरा या उथला क्यों न हो, और चाहे सत्य को स्वीकार करने वाले उन लोगों की क्षमता किसी के समान ही क्यों न हो, जो कुछ भी पवित्र आत्मा करता है, यह सब लोगों के लिए लाभदायक है। परन्तु पवित्र आत्मा का कार्य सीधे तौर पर नहीं किया जा सकता है; इसे उन मनुष्यों से होकर गुज़रना होगा जो उसके साथ सहयोग करते हैं। केवल इसी तरह से ही पवित्र आत्मा के कार्य के परिणामों को प्राप्त किया जा सकता है। निस्संदेह, जब यह पवित्र आत्मा का प्रत्यक्ष कार्य होता है, तो इसमें मिलावट बिलकुल भी नहीं होती है; परन्तु जब यह मनुष्य के माध्यम का उपयोग करता है, तो यह बहुत मिश्रित हो जाता है और यह पवित्र आत्मा का मूल कार्य नहीं होता है। इस तरह से, सच्चाई विभिन्न अंशों तक बदल जाती है। अनुयायी पवित्र आत्मा के मूल इरादे को प्राप्त नहीं करते हैं बल्कि पवित्र आत्मा के कार्य और मनुष्य के अनुभव और ज्ञान के संयोजन को प्राप्त करते हैं। पवित्र आत्मा के कार्य का वह भाग जो अनुयायियों के द्वारा प्राप्त किया जाता है, सही होता है। मनुष्य का अनुभव और ज्ञान जो प्राप्त किए जाते हैं वे भिन्न-भिन्न होते हैं क्योंकि कार्यकर्ता भिन्न-भिन्न होते हैं। जब एक बार कार्यकर्ताओं को पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता और मार्गदर्शन प्राप्त हो जाता है, तो वे इसके बाद इसे प्रबुद्धता और मार्गदर्शन के आधार पर अनुभव करते हैं। इन अनुभवों के भीतर मनुष्य का मन और अनुभव, और साथ ही मानवता का अस्तित्व मिला हुआ होता है, जिसके बाद वे उस ज्ञान या देखने को प्राप्त करते हैं जो उन्हें प्राप्त होना चाहिए। जब मनुष्य सत्य का अनुभव कर लेता है उसके पश्चात् यह अभ्यास का मार्ग है। अभ्यास का यह मार्ग हमेशा एक समान नहीं होता है क्योंकि लोगों के भिन्न-भिन्न अनुभव होते हैं और जिन चीज़ों का लोग अनुभव करते हैं वे भिन्न-भिन्न होती हैं। इस तरह से, पवित्र आत्मा की वही प्रबुद्धता भिन्न-भिन्न ज्ञान और अभ्यास में परिणत होती है क्योंकि प्रबुद्धता प्राप्त करने वाले लोग भिन्न-भिन्न हैं। कुछ लोग अभ्यास के दौरान मामूली ग़लतियाँ करते हैं जबकि कुछ लोग बड़ी ग़लतियाँ करते हैं, और कुछ लोग और कुछ नहीं सिर्फ ग़लतियाँ ही करते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि लोगों की समझने की योग्यताएँ भिन्न होती हैं और क्योंकि उनकी वास्तविक क्षमता भी भिन्न होती है। कुछ लोग किसी सन्देश को सुनने के बाद उसे इस तरह से समझते हैं, और कुछ लोग किसी सच्चाई को सुनने के बाद उसे उस तरह से समझते हैं। कुछ लोग जरा सा भटक जाते हैं; और कुछ लोग सत्य के अर्थ को बिल्कुल भी नहीं समझते हैं। इसलिए, कोई इसे जिस भी तरह से समझेगा वह उसी प्रकार ही दूसरों की अगुवाई करेगा; यह बिल्कुल सत्य है, क्योंकि उसका कार्य मात्र उसके अस्तित्व को व्यक्त करना है। सत्य की समझ वाले लोगों के द्वारा अगुवाई किए जा रहे लोगों के पास भी सत्य की सही समझ होगी। भले ही ऐसे लोग हैं जिनकी समझ में त्रुटियाँ होती हैं, फिर भी उनमें से बहुत कम लोगों में, और न कि सभी लोगों में त्रुटियाँ होती हैं। यदि किसी की सत्य से जुड़ी समझ में त्रुटियाँ होती हैं, तो वे लोग निस्संदेह त्रुटिपूर्ण होंगे जो उसका अनुसरण करते हैं। ये लोग प्रत्येक वचन की समझ में त्रुटिपूर्ण होंगे। अनुयायियों के बीच सत्य को समझने की मात्रा मुख्य रूप से कार्यकर्ताओं पर निर्भर करती है। निस्संदेह, जो सत्य परमेश्वर से है वह सही और त्रुटिहीन है, और नितांत असंदिग्ध है। परन्तु, कार्यकर्ता पूरी तरह से सही नहीं होते हैं और उन्हें पूरी तरह से विश्वसनीय नहीं कहा जा सकता है। यदि कार्यकर्ताओं के पास सत्य का अभ्यास करने के लिए ऐसा तरीका हो जो बहुत व्यावहारिक है, तो अनुयायियों के पास भी अभ्यास का एक तरीका होगा। यदि कार्यकर्ताओं के पास सत्य का अभ्यास करने का कोई तरीका नहीं है परन्तु केवल सिद्धान्त ही हैं, तो अनुयायियों के पास कोई वास्तविकता नहीं होगी। अनुयायियों की क्षमता और स्वभाव जन्म से ही निर्धारित होते हैं और वे कार्यकर्ताओं के साथ सम्बद्ध नहीं होते हैं। परन्तु जिस हद तक अनुयायी सत्य को समझते हैं और परमेश्वर को जानते हैं यह उन कार्यकर्ताओं पर निर्भर करता है (यह केवल कुछ लोगों के लिए ही ऐसा है)। कोई कार्यकर्ता जिसके भी समान होता है, वे अनुयायी जिनकी वह अगुवाई करता है उसी के समान होंगे। जो एक कार्यकर्ता व्यक्त करता है वह उसका स्वयं का अस्तित्व होता है, और यह बिना किसी सन्देह के है। जो माँगें वह अपने अनुयायियों से करता है वे ऐसी चीज़ें हैं जिन्हें वह स्वयं प्राप्त करना चाहता है या जिसे प्राप्त करने में वह समर्थ होता है। अधिकांश कार्यकर्ता जो कुछ वे स्वयं करते हैं उसके आधार पर अपने अनुयायियों से माँगें करते हैं, ऐसी बहुत सी चीज़ें होने के बावजूद जिन्हें लोग बिल्कुल भी प्राप्त नहीं कर सकते हैं। जिसे लोग प्राप्त नहीं कर सकते हैं वह उनके प्रवेश में बाधा बन जाती है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 177

ऐसे लोगों के कार्य में बहुत कम विचलन होता है, जो काट-छाँट, निपटने, न्याय, और ताड़ना से होकर गुज़र चुके हैं, और उनके कार्य की अभिव्यक्ति बहुत अधिक सटीक होती है। जो लोग कार्य करने के लिए अपनी स्वाभाविकता पर निर्भर होते हैं वे काफी बड़ी ग़लतियाँ करते हैं। जो लोग सिद्ध नहीं हैं उनके कार्य में बहुत अधिक स्वाभाविकता होती है, जो पवित्र आत्मा के कार्य में बड़ा अवरोध उत्पन्न करती है। किसी व्यक्ति की क्षमता कितनी ही अच्छी क्यों न हो, उसे परमेश्वर के आदेश का कार्य करने से पहले काट-छाँट, व्यवहार और न्याय का अनुभव अवश्य करना चाहिए। यदि वे ऐसे न्याय से होकर नहीं गुज़रे हैं, तो चाहे वे कितना ही अच्छा करें, यह सत्य के सिद्धान्तों के अनुरूप नहीं हो सकता है और यह पूरी तरह से स्वाभाविकता और मानवीय भलाई है। काट-छाँट, निपटने और न्याय से होकर गुज़र चुके लोगों का कार्य उन लोगों के कार्य से कहीं अधिक सटीक होता है, जिनकी काट-छाँट, निपटना और न्याय नहीं किया गया है। जो लोग न्याय से होकर नहीं गुज़रे हैं वे मानवीय देह और विचारों के सिवाए और कुछ भी व्यक्त नहीं करते हैं, जिसमें बहुत सारी मानवीय बुद्धि और जन्मजात प्रतिभाएँ मिली हुई होती हैं। यह परमेश्वर के कार्य की मनुष्य की परिशुद्ध अभिव्यक्ति नहीं है। जो लोग उनका अनुसरण करते हैं उन्हें उनकी जन्मजात क्षमता के द्वारा उनके सामने लाया जाता है। क्योंकि वे मनुष्य के बहुत दृष्टि-बोधों और अनुभवों को व्यक्त करते हैं, जो परमेश्वर के मूल इरादे से लगभग वियोजित हैं, और इससे बहुत दूर भटक जाते हैं, इसलिए इस प्रकार के व्यक्ति का कार्य लोगों को परमेश्वर के सम्मुख लाने में असमर्थ है, परन्तु अपने सामने लाने में समर्थ है। इसलिए जो लोग न्याय और ताड़ना से होकर नहीं गुज़रे हैं वे परमेश्वर के आदेश के कार्य को कार्यान्वित करने में असमर्थ हैं। एक योग्य कार्यकर्ता का कार्य लोगों को सही मार्ग पर ला सकता है और उन्हें सत्य की गहराई में जाने दे सकता है। जो कार्य वह करता है वह लोगों को परमेश्वर के सम्मुख ला सकता है। इसके अतिरिक्त, जो कार्य वह करता है वह, लोगों को मुक्ति और स्वतंत्रता प्रदान करते हुए, भिन्न-भिन्न व्यक्तियों पर भिन्न-भिन्न होता है और यह नियमों से बँधा हुआ नहीं होता है। इसके अतिरिक्त, वे धीरे-धीरे जीवन में आगे बढ़ सकते हैं, और वे उत्तरोत्तर सत्य में अधिक गहरे जा सकते हैं। एक अयोग्य कार्यकर्ता का कार्य कम पड़ता है; उसका कार्य मूर्खतापूर्ण होता है। वह लोगों को केवल नियमों में ला सकता है; वह लोगों से जो माँग करता है वह भिन्न-भिन्न व्यक्तियों पर भिन्न-भिन्न नहीं होती है; वह लोगों की वास्तविक आवश्यकताओं के अनुसार कार्य नहीं करता है। इस प्रकार के कार्य में, बहुत से नियम और बहुत से सिद्धान्त होते हैं, और यह लोगों को वास्तविकता में या जीवन में बढ़ोत्तरी के सामान्य अभ्यास में नहीं ला सकता है। यह लोगों को केवल कुछ बेकार नियमों को निभाने में सक्षम बना सकता है। इस प्रकार का मार्गदर्शन लोगों को केवल भटका सकता है। वह तुम्हारी अगुवाई करता है ताकि तुम उसके समान बन जाओ; वह तुम्हें उसी में ला सकता है जो उसके पास है और जो वह है। अनुयायियों के लिए यह समझने के लिए कि अगुवा योग्य हैं या नहीं, मुख्य बात है उस मार्ग को जिसकी वे अगुवाई करते हैं और उनके कार्य के परिणामों को देखना, और यह देखना कि अनुयायी सत्य के अनुसार सिद्धान्तों को प्राप्त करते हैं या नहीं, और वे उनके रूपान्तरण के लिए उपयुक्त अभ्यास के मार्गों को प्राप्त करते हैं या नहीं। तुम्हें भिन्न-भिन्न प्रकार के लोगों के भिन्न-भिन्न कार्यों के बीच विभेद करना चाहिए; तुम्हें एक मूर्ख अनुयायी नहीं होना चाहिए। यह तुम्हारे प्रवेश के मामले में बुरा प्रभाव डाल सकता है। यदि तुम यह विभेद करने में असमर्थ हो कि किस व्यक्ति की अगुवाई के पास एक मार्ग है और किसके पास नहीं है, तो तुम आसानी से धोखा खाओगे। इन सबका तुम्हारे स्वयं के जीवन से सीधा सम्बन्ध है। ऐसे लोग जो सिद्ध नहीं बनाए गए हैं उनके कार्य में ऐसा बहुत कुछ है जो स्वाभाविक है; इसमें बहुत अधिक मानवीय इच्छा मिली हुई है। उनका अस्तित्व स्वाभाविकता है, जिसके साथ वे पैदा हुए हैं, व्यवहार किए जाने के पश्चात् का जीवन या रूपान्तरित किए जाने के पश्चात् की वास्तविकता नहीं है। इस प्रकार का व्यक्ति किस प्रकार उनका भरण-पोषण कर सकता हैं जो जीवन की खोज कर रहे हैं? मनुष्य का मूल जीवन उसकी जन्मजात बुद्धिमत्ता या प्रतिभा है। इस प्रकार की बुद्धिमत्ता या प्रतिभा मनुष्य से परमेश्वर की सटीक माँगों से काफी दूर है। यदि किसी मनुष्य को सिद्ध नहीं किया गया है और उसके भ्रष्ट स्वभाव की काट-छाँट नहीं की गई है और उसके साथ निपटा नहीं गया है, तो जो कुछ वह व्यक्त करता है और सच्चाई के बीच एक बहुत बड़ा अन्तराल होगा; यह उसकी कल्पना और एक-तरफा अनुभव, इत्यादि जैसी अस्पष्ट चीज़ों के साथ घुल मिल जाएगा। इसके अतिरिक्त, भले ही वह किसी भी प्रकार से कार्य करे, लोग महसूस करते हैं कि यहाँ कुल मिला कर ऐसा कोई लक्ष्य और कोई सत्य नहीं है जो सभी लोगों के प्रवेश के लिए उपयुक्त हो। लोगों पर डाली गई माँगें अपेक्षा करती हैं कि वे वह करें जो उनके बस के बाहर है, यह एक बत्तख को उसके मचान में हाँकना है। यह मनुष्य की इच्छा-शक्ति का कार्य है। मनुष्य का भ्रष्ट स्वभाव, उसके विचार और उसकी अवधारणाएँ उसके शरीर के सभी अंगों में व्याप्त हैं। मनुष्य सत्य का अभ्यास करने के सहज-ज्ञान के साथ पैदा नहीं होता है, न ही उसके पास सीधे तौर पर सत्य को समझने का सहज-ज्ञान होता है। इसे मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव के साथ जोड़ने पर, जब इस प्रकार का प्राकृतिक व्यक्ति कार्य करता है, तो क्या इससे व्यवधान नहीं होते? परन्तु ऐसा मनुष्य जिसे सिद्ध किया जा चुका है उसके पास सत्य का अनुभव होता है जिसे लोगों को समझना चाहिए, और उनके भ्रष्ट स्वभाव का ज्ञान होता है, ताकि उसके कार्य की अस्पष्ट और अवास्तविक चीज़ें धीरे-धीरे कम हो जाती हैं, मानवीय मिलावटें कम हो जाती हैं और उसका काम और सेवा परमेश्वर द्वारा अपेक्षित मानकों के और भी करीब पहुँच जाता है। इस प्रकार, उसका काम सत्य की वास्तविकता में प्रवेश कर गया है और वास्तविक भी बन गया है। मनुष्य के मन के विचार विशेष रूप से पवित्र आत्मा के कार्य को अवरुद्ध करते हैं। मनुष्य के पास एक समृद्ध कल्पना और न्यायसंगत तर्क और मामलों से निपटने के पुराने अनुभव होते हैं। यदि ये काट-छाँट और सुधार से होकर नहीं गुज़रते हैं, तो कार्य में वे सभी बाधाएँ हैं। इसलिए मनुष्य का कार्य सबसे परिशुद्ध स्तर तक नहीं पहुँच सकता है, विशेष रूप से ऐसे लोगों का कार्य जो सिद्ध नहीं हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 178

मनुष्य के कार्य का एक विस्तार और सीमाएँ हैं। एक व्यक्ति केवल किसी निश्चित चरण के कार्य को करने में समर्थ होता है और सम्पूर्ण युग के कार्य को नहीं कर सकता हैं—अन्यथा, वह लोगों को नियमों के भीतर ले जाएगा। मनुष्य के कार्य को केवल एक विशेष समय या चरण पर ही लागू किया जा सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि मनुष्य के अनुभव का एक दायरा होता है। कोई व्यक्ति परमेश्वर के कार्य के साथ मनुष्य के कार्य की तुलना नहीं कर सकता है। मनुष्य के अभ्यास करने के तरीके और सत्य का उसका ज्ञान ये सभी एक विशेष दायरे में लागू होते हैं। तुम नहीं कह सकते हो कि जिस मार्ग पर मनुष्य चलता है वह पूरी तरह से पवित्र आत्मा की इच्छा है, क्योंकि मनुष्य को केवल पवित्र आत्मा के द्वारा ही प्रबुद्ध किया जा सकता है और उसे पवित्र आत्मा से पूरी तरह से भरा नहीं जा सकता है। जिन चीज़ों को मनुष्य अनुभव कर सकता है वे सभी सामान्य मानवता के दायरे के भीतर हैं और वे सामान्य मानवीय मन में विचारों की सीमाओं से आगे नहीं बढ़ सकती हैं। वे सभी लोग, जो सत्य की वास्तविकता को जी सकते हैं, इस सीमा के भीतर अनुभव करते हैं। जब वे सत्य का अनुभव करते हैं, तो यह हमेशा पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता के अधीन सामान्य मानवीय जीवन का एक अनुभव होता है, उस तरह से अनुभव करना नहीं है जो सामान्य मानवीय जीवन से भटक जाता है। वे अपने मानवीय जीवन को जीने की बुनियाद पर पवित्र आत्मा के द्वारा प्रबुद्ध किए गए सत्य का अनुभव करते हैं। इसके अतिरिक्त, यह सत्य अलग-अलग व्यक्तियों पर अलग-अलग होता है, और इसकी गहराई उस व्यक्ति की अवस्था से सम्बन्धित होती है। कोई केवल इतना ही कह सकता है कि जिस मार्ग पर वे चलते हैं वह ऐसे मनुष्य का सामान्य जीवन है जो सत्य की खोज कर रहा है, और यह कि यह किसी ऐसे सामान्य व्यक्ति के द्वारा चला गया मार्ग है जिसके पास पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता है। तुम नहीं कह सकते हो कि जिस मार्ग पर वे चलते हैं वह ऐसा मार्ग है जिसे पवित्र आत्मा द्वारा लिया गया है। सामान्य मानवीय अनुभव में, क्योंकि जो लोग अनुसरण करते हैं वे एक समान नहीं होते हैं, इसलिए पवित्र आत्मा का कार्य भी एक समान नहीं होता है। इसके अतिरिक्त, क्योंकि जिन परिवेशों का वे अनुभव करते हैं और उनके अनुभव की सीमाएँ एक समान नहीं होती हैं, इसलिए उनके मन और विचारों के मिश्रण की वजह से, उनका अनुभव विभिन्न अंशों तक मिश्रित हो जाता है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत विभिन्न परिस्थितियों के अनुसार ही किसी सच्चाई को समझता है। सत्य के वास्तविक अर्थ की उनकी समझ पूर्ण नहीं होती है और यह इसका केवल एक या कुछ ही पहलू होते हैं। जिस दायरे के द्वारा मनुष्य के द्वारा सत्य का अनुभव किया जाता है वह हमेशा ही व्यक्तित्वों की विभिन्न परिस्थितियों पर आधारित होता है और इसलिए यह एक समान नहीं होता है। इस तरह, एक ही सत्य के बारे में विभिन्न लोगों के द्वारा व्यक्त किया गया ज्ञान एक समान नहीं होता है। कहने का तात्पर्य है कि, मनुष्य के अनुभव में हमेशा सीमाएँ होती हैं और यह पवित्र आत्मा की इच्छा को पूरी तरह से नहीं दर्शा सकता है, और मनुष्य के कार्य का परमेश्वर के कार्य के समान अर्थ नहीं लगाया जा सकता है, भले ही जो कुछ मनुष्य के द्वारा व्यक्त किया जाता है वह बहुत नज़दीक से परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप हो, भले ही मनुष्य का अनुभव पवित्र आत्मा के द्वारा किए जाने वाले सिद्ध करने के कार्य के बेहद करीब हो। मनुष्य केवल परमेश्वर का सेवक हो सकता है, केवल उस कार्य को कर सकता है जो परमेश्वर उसे सौंपता है। मनुष्य केवल पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता के अधीन ही ज्ञान को और अपने व्यक्तिगत अनुभवों से अर्जित सच्चाईयों को व्यक्त कर सकता है। मनुष्य अयोग्य है और उसके पास पवित्र आत्मा का अभिव्यक्ति-मार्ग बनने की स्थितियाँ नहीं हैं। वह यह कहने का हक़दार नहीं है कि मनुष्य का कार्य परमेश्वर का कार्य है। मनुष्य के पास मनुष्य के कार्य करने के सिद्धान्त हैं, और सभी मनुष्यों के पास भिन्न-भिन्न अनुभव होते हैं और उनकी अलग-अलग स्थितियाँ होती हैं। मनुष्य के कार्य में पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता के अधीन उसके सभी अनुभव शामिल होते हैं। ये अनुभव केवल मनुष्य के अस्तित्व का प्रतिनिधित्व करते हैं और परमेश्वर के अस्तित्व या पवित्र आत्मा की इच्छा का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं। इसलिए, मनुष्य के द्वारा चले गए मार्ग को पवित्र आत्मा के द्वारा चला गया मार्ग नहीं कहा जा सकता है क्योंकि मनुष्य का कार्य परमेश्वर के कार्य का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता और मनुष्य का कार्य और मनुष्य का अनुभव पवित्र आत्मा की सम्पूर्ण इच्छा नहीं हैं। मनुष्य के कार्य का झुकाव नियम में पड़ने की ओर होता है, और उसके कार्य करने की पद्धति आसानी से एक सीमित दायरे में सीमित हो जाती है और यह लोगों की स्वतंत्र मार्ग में अगुवाई करने में असमर्थ है। अधिकांश अनुयायी एक सीमित दायरे में जीवन बिताते हैं, और उनके अनुभव करने का तरीका भी अपने आप के दायरे में सीमित होता है। मनुष्य का अनुभव हमेशा सीमित होता है; उसके कार्य करने की पद्धति भी कुछ प्रकारों तक ही सीमित होती है और पवित्र आत्मा के कार्य से या स्वयं परमेश्वर के कार्य से इसकी तुलना नहीं की जा सकती है—ऐसा इसलिए है क्योंकि अंततः मनुष्य का अनुभव सीमित होता है। परमेश्वर अपना कार्य जिस भी तरह से करता है, इसके लिए कोई नियम नहीं है; इसे किसी भी तरह से किया जाता है, यह एक तरीके तक सीमित नहीं है। परमेश्वर के कार्य के लिए किसी भी प्रकार के कोई नियम नहीं हैं—उसका समस्त कार्य मुक्त और स्वतंत्र होता है। भले ही मनुष्य उसका अनुसरण करते हुए कितना ही समय क्यों न बिताएँ, वे उसके कार्य करने के किसी भी नियम का सार नहीं निकाल सकते हैं। यद्यपि उसका कार्य सैद्धांतिक है, फिर भी इसे हमेशा नए तरीकों से किया जाता है और इसमें हमेशा नये-नये विकास होते रहते हैं, जो मनुष्य की पहुँच से परे है। एक समयावधि के दौरान, परमेश्वर के पास भिन्न-भिन्न प्रकार के कार्य और भिन्न-भिन्न तरीकों की अगुवाई हो सकती है, जो लोगों को अनुमति देती हो कि उनके पास हमेशा नए-नए प्रवेश और नए-नए परिवर्तन हों। तुम उसके कार्य के नियमों का पता नहीं लगा सकते हो क्योंकि वह हमेशा नए तरीकों से कार्य कर रहा है। केवल इस तरह से ही परमेश्वर के अनुयायी नियमों में नहीं पड़ते हैं। स्वयं परमेश्वर का कार्य हमेशा लोगों की अवधारणाओं से परहेज करता है और उनकी अवधारणाओं का विरोध करता है। केवल ऐसे लोग ही अपने स्वभावों को रूपान्तरित करवा सकते हैं और किसी भी प्रकार के नियमों के अधीन किए गए बिना या किसी भी धार्मिक अवधारणाओं के द्वारा अवरुद्ध किए गए बिना स्वतन्त्रता से जीवन जी पाते हैं जो एक सच्चे हृदय से उसका अनुसरण करते हैं और उसकी खोज करते हैं। जो माँगें मनुष्य का कार्य लोगों से करता है वे उसके स्वयं के अनुभव और उस चीज़ पर आधारित होती हैं जिन्हें वह स्वयं प्राप्त कर सकता है। इन अपेक्षाओं का स्तर एक निश्चित दायरे के भीतर सीमित होता है, और अभ्यास के तरीके भी बहुत सीमित होते हैं। इसलिए अनुयायी सीमित दायरे के भीतर अवचेतन रूप से जीवन बिताते हैं; जैसे-जैसे समय गुज़रता है, वे नियम और रिवाज़ बन जाते हैं। यदि एक अवधि के कार्य की अगुवाई ऐसे व्यक्ति के द्वारा की जाती है जो परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से सिद्ध किए जाने से होकर नहीं गुज़रा है और जिसने न्याय प्राप्त नहीं किया है, तो उसके सभी अनुयायी कट्टर धर्मावलम्बी बन जाएँगे और परमेश्वर का विरोध करने में माहिर हो जाएँगे। इसलिए, यदि कोई योग्य अगुवा है, तो उसे न्याय से होकर अवश्य गुज़रा होना और सिद्ध किए जाने को अवश्य स्वीकार किया होना चाहिए। जो लोग न्याय से होकर नहीं गुज़रे हैं, भले ही उनमें पवित्र आत्मा का कार्य हो, वे केवल अस्पष्ट और अवास्तविक चीज़ों को ही व्यक्त करते हैं। समय के साथ, वे लोगों को अस्पष्ट और अलौकिक नियमों की ओर ले जाएँगे। जो कार्य परमेश्वर क्रियान्वित करता है वह मनुष्य की देह के साथ मेल नहीं खाता है; यह मनुष्य के विचारों के साथ मेल नहीं खाता है बल्कि मनुष्य की अवधारणाओं का विरोध करता है; यह अस्पष्ट धार्मिक रंग के साथ मिश्रित नहीं होता है। उसके कार्य के परिणामों को ऐसे व्यक्ति के द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता है जो उसके द्वारा सिद्ध नहीं किया गया है और वे मनुष्य की सोच से परे होते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 179

जो कार्य मनुष्य के मन में होता है उसे बहुत ही आसानी से मनुष्य के द्वारा प्राप्त किया जाता है। उदाहरण के लिए, धार्मिक संसार के पादरी और अगुवे अपने कार्य को करने के लिए अपनी प्रतिभाओं और पदों पर भरोसा रखते हैं। जो लोग लम्बे समय तक उनका अनुसरण करेंगे वे उनकी प्रतिभाओं के द्वारा संक्रमित हो जाएँगे और जो वे हैं उसमें से कुछ के द्वारा प्रभावित हो जाएँगे। वे लोगों की प्रतिभाओं, योग्यताओं और ज्ञान पर ध्यान केन्द्रित करते हैं, और वे कुछ अलौकिक चीज़ों और अनेक गम्भीर अवास्तविक सिद्धान्तों पर ध्यान देते हैं (निस्संदेह, ये गम्भीर सिद्धान्त अप्राप्य हैं)। वे लोगों के स्वभाव में परिवर्तनों पर ध्यान केन्द्रित नहीं करते हैं, बल्कि इसके बजाए वे लोगों के उपदेश देने और कार्य करने की योग्यताओं को प्रशिक्षित करने, लोगों के ज्ञान और उनके प्रचुर धार्मिक सिद्धांतों को सुधारने पर ध्यान केन्द्रित करते हैं। वे इस बात पर ध्यान केन्द्रित नहीं करते हैं कि लोगों के स्वभाव में कितना परिवर्तन हुआ है या लोग सत्य को कितना समझते हैं। वे लोगों के सार के साथ अपने आपको नहीं जोड़ते हैं, और वे लोगों की सामान्य और असामान्य दशाओं को जानने की कोशिश तो बिल्कुल भी नहीं करते हैं। वे लोगों की धारणाओं का विरोध नहीं करते, न ही वे अपनी धारणाओं को प्रकट करते हैं, और वे लोगों की कमियों या भ्रष्टताओं के लिए उनकी काट-छाँट तो बिल्कुल भी नहीं करते। अनुसरण करने वाले अधिकांश लोग अपनी प्रतिभाओं के द्वारा सेवा करते हैं, और जो कुछ वे प्रदर्शित करते हैं वह ज्ञान धार्मिक धारणाएँ और धर्मविधि-संबंधी सिद्धान्त हैं, जिनका वास्तविकता के साथ कोई नाता नहीं है और वे लोगों को जीवन प्रदान करने में पूरी तरह से असमर्थ हैं। वास्तव में, उनके कार्य का सार प्रतिभाओं का पोषण करना, शून्य वाले किसी व्यक्ति का पोषण करके उसे एक योग्य सेमेनरी स्नातक बनना है जो बाद में कार्य और अगुवाई करने के लिए जाता है। परमेश्वर के छः हज़ार वर्षों के कार्य में क्या तुम इसके किसी नियम का पता लगा सकते हो? मनुष्य जिस कार्य को करता है उसमें बहुत से नियम और प्रतिबन्ध होते हैं, और मानवीय मस्तिष्क बहुत ही कट्टर है। इसलिए जो कुछ मनुष्य व्यक्त करता है वह उसके समस्त अनुभवों के भीतर उसका थोड़ा सा ज्ञान और एहसास होता है। मनुष्य इसके अलावा कुछ भी व्यक्त करने में असमर्थ है। मनुष्य के अनुभव या उसका ज्ञान उसकी जन्मजात प्रतिभाओं या सहज प्रवृत्ति से उत्पन्न नहीं होते हैं; वे परमेश्वर के मार्गदर्शन और परमेश्वर की प्रत्यक्ष चरवाही की वजह से उत्पन्न होते हैं। मनुष्य के पास केवल इस चरवाही को स्वीकार करने का अंग है और उसके पास वह अंग नहीं है जिससे वह सीधे तौर पर यह अभिव्यक्त करे कि दिव्यता क्या है। मनुष्य स्रोत बनने में असमर्थ है, वह केवल ऐसा पात्र हो सकता है जो स्रोत से पानी को स्वीकार करता है; यह मनुष्य की सहज प्रवृत्ति है, ऐसा अंग है जो मनुष्य होने के नाते उसके पास होना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर के वचन को ग्रहण करने वाले उस अंग को गँवा देता है और मानवीय सहज प्रवृत्ति को गँवा देता है, तो वह व्यक्ति उसे भी खो देता है जो अत्यंत बहुमूल्य है, और सृजित किए गए मनुष्य के कर्तव्य को गँवा देता है। यदि किसी मनुष्य के पास परमेश्वर के वचन या कार्य का ज्ञान या अनुभव नहीं है, तो वह व्यक्ति अपने कर्तव्य को, ऐसे कर्तव्य को जो उसे एक सृजित किए गए प्राणी के रूप में निभाना चाहिए, गँवा देता है, और वह एक सृजित किए गए प्राणी के रूप में अपनी गरिमा को गँवा देता है। यह व्यक्त करना परमेश्वर की सहज प्रवृत्ति है कि दिव्यता क्या है, इसे देह में या सीधे तौर पर पवित्रात्मा के द्वारा व्यक्त किया जाता है; यह परमेश्वर की सेवकाई है। मनुष्य परमेश्वर के कार्य के दौरान या उसके बाद अपने स्वयं के अनुभवों या ज्ञान (अर्थात्, जो वह है उसे व्यक्त करता है) को व्यक्त करता है; यह मनुष्य की सहज प्रवृत्ति और मनुष्य का कर्तव्य है, यह वही है जिसे मनुष्य को प्राप्त करना चाहिए। यद्यपि मनुष्य की अभिव्यक्ति उससे बहुत कम पड़ती है जो परमेश्वर व्यक्त करता है, और जो कुछ मनुष्य व्यक्त करता है उसमें बहुत से नियम होते हैं, फिर भी मनुष्य को उसके द्वारा निभाए जाने वाले कर्तव्य को अवश्य निभाना चाहिए और उसे उस कार्य को करना चाहिए जो उसे अवश्य करना है। मनुष्य को अपने कर्तव्य को निभाने के लिए हर उस चीज़ को करना चाहिए जो मानवीय रूप से सम्भव है, और उसमें थोड़ा सा भी सन्देह नहीं होना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 180

तुम लोगों को जानना होगा कि कैसे परमेश्वर के कार्य और मनुष्य के कार्य में विभेद किया जाए। तुम मनुष्य के कार्य से क्या देख सकते हो? मनुष्य के कार्य में मनुष्य के अनुभव के बहुत से तत्व होते हैं; मनुष्य जैसा व्यक्त करता है वह वैसा ही होता है। परमेश्वर का स्वयं का कार्य भी वही अभिव्यक्त करता है जो वह है, परन्तु जो वह है वह उससे भिन्न है जो मनुष्य है। जो कुछ मनुष्य है वह मनुष्य के अनुभव और जीवन का प्रतिनिधि है (जो कुछ मनुष्य अपने जीवन में अनुभव और सामना करता है, या जो उसके जीने के फ़लसफ़े हैं), और भिन्न-भिन्न परिवेशों में रहने वाले लोग भिन्न-भिन्न प्राणियों को व्यक्त करते हैं। तुम्हारे पास सामाजिक अनुभव हैं या नहीं और तुम वास्तव में किस प्रकार अपने परिवार में रहते और अनुभव करते हो इसे जो कुछ तुम व्यक्त करते हैं उसमें देखा जा सकता है, जबकि तुम देहधारी परमेश्वर के कार्य से यह नहीं देख सकते हो कि उसके पास सामाजिक अनुभव हैं या नहीं। वह मनुष्य के सार से अच्छी तरह से अवगत है, वह सभी प्रकार के लोगों से सम्बन्धित सभी प्रकार के अभ्यासों को प्रकट कर सकता है। वह मानव के भ्रष्ट स्वभाव और विद्रोही व्यवहार को भी बेहतर ढंग से प्रकट करता है। वह सांसारिक लोगों के बीच नहीं रहता है, परन्तु वह नश्वरों की प्रकृति और सांसारिक लोगों की समस्त भ्रष्टता से अवगत है। यही वह है। यद्यपि वह संसार के साथ निपटता नहीं है, फिर भी वह संसार के साथ निपटने के नियमों को जानता है, क्योंकि वह मानवीय प्रकृति को पूरी तरह से समझता है। वह पवित्रात्मा के आज और अतीत दोनों के कार्य के बारे में जानता है जिसे मनुष्य की आँखें नहीं देख सकती हैं और जिसे मनुष्य के कान नहीं सुन सकते हैं। इसमें बुद्धि शामिल है जो कि जीने का फ़लसफ़ा और करामातें नहीं है जिनकी थाह पाना मनुष्य के लिए कठिन है। यही वह है, लोगों के लिए खुला और लोगों से छिपा हुआ भी। जो कुछ वह व्यक्त करता है वह ऐसा नहीं है जैसा एक असाधारण मनुष्य होता है, बल्कि पवित्रात्मा के अंतर्निहित गुण और अस्तित्व हैं। वह दुनिया भर में यात्रा नहीं करता है परन्तु उसकी हर चीज़ को जानता है। वह "वन-मानुषों" के साथ सम्पर्क करता है जिनके पास कोई ज्ञान या अंतर्दृष्टि नहीं होती है, परन्तु वह ऐसे वचनों को व्यक्त करता है जो ज्ञान से ऊँचे और महान मनुष्यों से ऊपर होते हैं। वह मंदबुद्धि और संवेदनशून्य लोगों के समूह के बीच रहता है जिनमें मानवता नहीं है और जो मानवीय परम्पराओं और जीवनों को नहीं समझते हैं, परन्तु वह मनुष्यजाति से सामान्य मानवता का जीवन जीने के लिए कह सकता है, साथ ही मनुष्यजाति की नीच और अधम मानवता को प्रकट करता है। यह सब कुछ वही है जो वह है, किसी भी माँस और लहू के व्यक्ति की अपेक्षा अधिक ऊँचा है। उसके लिए, यह अनावश्यक है कि वह उस कार्य को करने के लिए जिसे उसे करने की आवश्यकता है और भ्रष्ट मनुष्यजाति के सार को पूरी तरह से प्रकट करने के लिए जटिल, बोझिल और पतित सामाजिक जीवन का अनुभव करे। पतित सामाजिक जीवन उसकी देह को शिक्षित नहीं करता है। उसके कार्य और वचन मनुष्य की अवज्ञा को ही प्रकट करते हैं और संसार के साथ निपटने के लिए मनुष्य को अनुभव और सबक प्रदान नहीं करते हैं। जब वह मनुष्य को जीवन की आपूर्ति करता है तो उसे समाज या मनुष्य के परिवार की जाँच-पड़ताल करने की आवश्यकता नहीं होती है। मनुष्य को उजागर करना और उसका न्याय करना उसकी देह के अनुभवों की अभिव्यक्ति नहीं है; यह लम्बे समय तक मनुष्य की अवज्ञा को जानने के बाद मनुष्य की अधार्मिकता को प्रकट करने और मनुष्यजाति की भ्रष्टता से घृणा करने के लिए है। जिस कार्य को परमेश्वर करता है वह सब मनुष्य के सामने अपने स्वभाव को प्रकट करने और अपने अस्तित्व को व्यक्त करने के लिए है। केवल वही इस कार्य को कर सकता है, यह कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसे माँस और लहू का व्यक्ति प्राप्त कर सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 181

जिस कार्य को परमेश्वर करता है वह उसके देह के अनुभव का प्रतिनिधित्व नहीं करता है; जिस कार्य को मनुष्य करता है वह मनुष्य के अनुभव का प्रतिनिधित्व करता है। हर कोई अपने व्यक्तिगत अनुभव के बारे में बात करता है। परमेश्वर सीधे तौर पर सत्य को व्यक्त कर सकता है, जबकि मनुष्य केवल सत्य का अनुभव करने के पश्चात् ही तदनुरूप अनुभव को व्यक्त कर सकता है। परमेश्वर के कार्य में कोई नियम नहीं हैं और यह समय या भौगोलिक अवरोधों के अधीन नहीं है। वह जो है उसे वह किसी भी समय, कहीं पर भी प्रकट कर सकता है। जो वह है उसे वह किसी भी समय और किसी भी स्थान पर व्यक्त कर सकता है। उसे जैसा अच्छा लगता है वह वैसा ही करता है। मनुष्य के कार्य में परिस्थितियाँ और सन्दर्भ होते हैं; अन्यथा, वह कार्य करने में असमर्थ होता है और वह परमेश्वर के बारे में अपने ज्ञान को व्यक्त करने या सत्य के बारे में अपने अनुभव को व्यक्त करने में असमर्थ होता है। यह बताने के लिए कि क्या यह परमेश्वर का अपना कार्य है या मनुष्य का कार्य है तुम्हें बस उनके बीच अन्तर की तुलना करनी है। यदि स्वयं परमेश्वर के द्वारा किया गया कोई कार्य नहीं है और केवल मनुष्य का कार्य ही है, तो तुम्हें आसानी से पता चल जाएगा कि मनुष्य की शिक्षाएँ ऊँची हैं, किसी की भी क्षमता से परे हैं; उनके बोलने के अन्दाज़, चीज़ों को सँभालने में उनके सिद्धान्त और कार्य करने में उनका अनुभवी और स्थिर तरीका दूसरों की पहुँच से बाहर हैं। तुम सभी अच्छी क्षमता और उत्कृष्ट ज्ञान वाले इन लोगों की सराहना करते हो, परन्तु तुम परमेश्वर के कार्य और वचनों से यह नहीं देख सकते हो कि उसकी मानवता कितनी उच्च है। इसके बजाए, वह साधारण है, और कार्य करते समय, वह सामान्य और वास्तविक है परन्तु नश्वरों के लिए अथाह भी है, जो लोगों को उसके बारे में एक प्रकार का आदर भाव महसूस कराता है। कदाचित् अपने कार्य में किसी व्यक्ति का अनुभव विशेष रूप से ऊँचा हो, या उसकी कल्पना और तर्कशक्ति विशेष रूप से ऊँची हो, और उसकी मानवता विशेष रूप से अच्छी हो; ये चीज़ें केवल लोगों की प्रशंसा ही अर्जित कर सकती हैं, परन्तु उनके भय-मिश्रित आदर या डर को जागृत नहीं कर सकती हैं। सभी लोग ऐसे लोगों की प्रशंसा करते हैं जिनमें कार्य करने की क्षमता होती है और जिनके पास विशेष रुप से गहरा अनुभव होता है और जो सत्य का अभ्यास कर सकते हैं, परन्तु वे कभी भी भय-मिश्रित आदर नहीं, बस प्रशंसा और ईर्ष्या प्राप्त कर सकते हैं। परन्तु जिन लोगों ने परमेश्वर के कार्य का अनुभव कर लिया है वे परमेश्वर की प्रशंसा नहीं करते हैं, इसके बजाय वे महसूस करते हैं कि उसका कार्य मनुष्य की पहुँच से परे है और यह मनुष्य के लिए अथाह है, और यह कि यह तरोताज़ा और अद्भुत है। जब लोग परमेश्वर के कार्य का अनुभव करते हैं, तो उसके बारे में उनका पहला ज्ञान यह होता है कि वह अथाह, बुद्धिमान और अद्भुत है, और वे अवचेतन रूप से उसका आदर करते हैं और उस कार्य के रहस्य को महसूस करते हैं जो वह करता है, जो कि मनुष्य के दिमाग की पहुँच से परे है। लोग बस परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा करने, उसकी इच्छाओं को संतुष्ट करने में समर्थ होना चाहते हैं; वे उससे बढ़कर होने की इच्छा नहीं करते हैं, क्योंकि जो कार्य परमेश्वर करता है वह मनुष्य की सोच और कल्पना से परे जाता है और उसके बदले मनुष्य के द्वारा नहीं किया जा सकता है। यहाँ तक कि मनुष्य अपनी स्वयं की कमियों को भी नहीं जानता है, जबकि परमेश्वर ने एक नया मार्ग प्रशस्त किया है और वह मनुष्य को एक अधिक नए और अधिक खूबसूरत संसार में ले जाने के लिए आया है, जिससे मनुष्यजाति ने नई प्रगति की है और उसकी एक नई शुरुआत की है। जो कुछ मनुष्य परमेश्वर के लिए महसूस करता है वह प्रशंसा नहीं है, या बल्कि, यह सिर्फ सराहना नहीं है। उनका गहनतम अनुभव भय-मिश्रित आदर और प्रेम है, और उनकी भावना यह है कि परमेश्वर वास्तव में अद्भुत है। वह ऐसा कार्य करता है जिसे करने में मनुष्य असमर्थ है, वह ऐसी बातें कहता है जिसे कहने में मनुष्य असमर्थ है। जिन लोगों ने परमेश्वर के कार्य का अनुभव किया है उन्हें हमेशा एक अवर्णनीय एहसास होता है। पर्याप्त गहरे अनुभव वाले लोग परमेश्वर के लिए प्रेम को समझ सकते हैं; वे हमेशा उसकी मनोरमता को महसूस कर सकते हैं, महसूस कर सकते हैं कि उसका कार्य बहुत बुद्धिमत्तापूर्ण, और बहुत अद्भुत है, और परिणामस्वरूप यह उनके बीच उपजी असीमित सामर्थ्य है। यह डर या कभी कभार का प्रेम और आदर नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के लिए परमेश्वर की करुणा और सहिष्णुता की गहरी भावना है। हालाँकि, जिन लोगों ने उसकी ताड़ना और उसके न्याय का अनुभव किया है वे महसूस करते हैं कि वह प्रतापी और अपमान नहीं किए जाने योग्य है। यहाँ तक कि जिन लोगों ने उसके बहुत सारे कार्य का अनुभव किया है वे भी उसकी थाह पाने में असमर्थ हैं; सभी लोग जो सचमुच में उसका आदर करते हैं, जानते हैं कि उसका कार्य लोगों की अवधारणाओं से मेल नहीं खाता है बल्कि हमेशा उनकी अवधारणाओं के विरुद्ध जाता है। उसे इस बात की आवश्यकता नहीं है कि लोगों के पास सम्पूर्ण प्रशंसा हो या वे उसके प्रति समर्पण के भाव का दिखावा करें, बल्कि वह चाहता है कि उनके अंदर सच्चा आदर और सच्चा समर्पण हो। उसके इतने सारे कार्य में, सच्चे अनुभव वाला कोई भी व्यक्ति उसके लिए आदर महसूस करता है, जो प्रशंसा से बढ़कर है। लोगों ने ताड़ना और न्याय के उसके कार्य के कारण उसके स्वभाव को देखा है, और इसलिए वे अपने हृदय से उसका आदर करते हैं। परमेश्वर श्रद्धेय और आज्ञापालन करने योग्य है, क्योंकि उसका अस्तित्व और उसका स्वभाव सृजित किए गए प्राणियों के समान नहीं है, और वे सृजित किए गए प्राणियों से ऊपर हैं। परमेश्वर स्वयं अस्तित्व में रहने वाला, चिरकालीन और गैर-सृजित प्राणी है, और केवल परमेश्वर ही आदर और समर्पण के योग्य है; मनुष्य इसके योग्य नहीं है। इसलिए, सभी लोग जिन्होंने उसके कार्य का अनुभव किया है और जिन्होंने सचमुच में उसे जाना है वे उसके प्रति आदर महसूस करते हैं। हालाँकि, जो लोग उसके बारे में अपनी अवधारणाओं को नहीं छोड़ते हैं, अर्थात्, जो उसे परमेश्वर ही नहीं मानते हैं, जिनके अंदर उसके प्रति कोई श्रद्धा नहीं है, और भले वे उसका अनुसरण करते हों फिर भी उन्हें जीता नहीं जाता है; वे प्रकृति से ही अवज्ञाकारी लोग हैं। वह ऐसे परिणाम को प्राप्त करने के लिए इस कार्य को करता है ताकि सभी सृजित किए गए प्राणी सृजनकर्ता का आदर कर सकें, उसकी आराधना कर सकें, और बिना किसी शर्त के उसके प्रभुत्व के अधीन हो सकें। यही वह अंतिम परिणाम है जिसे प्राप्त करना उसके समस्त कार्य का लक्ष्य है। यदि जिन लोगों ने ऐसे कार्य का अनुभव कर लिया है वे परमेश्वर का जरा सा भी आदर नहीं करते हैं, यदि अतीत की उनकी अवज्ञा बिल्कुल भी नहीं बदलती है, तो इन लोगों को निष्कासित कर दिया जाना निश्चित है। यदि परमेश्वर के प्रति किसी व्यक्ति की प्रवृत्ति केवल दूर से ही प्रशंसा करना या सम्मान प्रकट करना है और जरा सा भी प्रेम करना नहीं है, तो यह वही स्तर है जहाँ ऐसा व्यक्ति पहुँचता है जिसके पास परमेश्वर से प्रेम करने वाला हृदय नहीं है, और उस व्यक्ति में सिद्ध किए जाने की स्थितियों का अभाव होता है। यदि इतना अधिक कार्य किसी व्यक्ति के सच्चे प्रेम को प्राप्त करने में असमर्थ है, तो इसका अर्थ है उस व्यक्ति ने परमेश्वर को प्राप्त नहीं किया है और वह असल में सत्य की खोज नहीं करता है। जो व्यक्ति परमेश्वर से प्रेम नहीं करता है वह सत्य से प्रेम नहीं करता है और इसलिए वह परमेश्वर को प्राप्त नहीं कर सकता है, और परमेश्वर की स्वीकृति को तो बिलकुल भी प्राप्त नहीं कर सकता है। ऐसे लोग, इस बात पर ध्यान दिए बिना कि वे किस प्रकार पवित्र आत्मा के कार्य का अनुभव करते हैं, और इस बात पर ध्यान दिए बिना कि वे किस प्रकार न्याय का अनुभव करते हैं, वे अभी भी परमेश्वर का आदर करने में असमर्थ हैं। ये ऐसे लोग हैं जिनका स्वभाव अपरिवर्तनीय है, जिनका स्वभाव अत्यंत दुष्ट है। वे सभी जो परमेश्वर का आदर नहीं करते हैं, उन्हें निष्कासित कर दिया जाना है, उन्हें दण्ड की वस्तु होना है, और उन्हें ठीक उनके समान ही दण्ड दिया जाना है जो दुष्टता करते हैं, और वे उन लोगों से भी अधिक कष्ट सहते हैं जिन्होंने अधार्मिक चीज़ों को किया है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 182

आखिरकार, परमेश्वर का कार्य इंसान के कार्य से अलग है और, इसके अलावा, उसकी अभिव्यक्तियाँ इंसानों की अभिव्यक्तियों के समान कैसे हो सकती हैं? परमेश्वर का अपना विशेष स्वभाव है, जबकि इंसानों के ऐसे कर्तव्य हैं जिनका उन्हें निर्वहन करना चाहिए। परमेश्वर का स्वभाव उसके कार्य में व्यक्त होता है, जबकि इंसान का कर्तव्य इंसान के अनुभवों में समाविष्ट होता है और इंसान के अनुसरण में व्यक्त होता है। इसलिए यह किए गए कार्य से स्पष्ट हो जाता है कि कोई चीज़ परमेश्वर की अभिव्यक्ति है या इंसान की अभिव्यक्ति। इसे स्वयं परमेश्वर द्वारा बताने की आवश्यकता नहीं है, न ही इंसान को गवाही देने के लिए प्रयास करने की आवश्यकता है; इसके अलावा, स्वयं परमेश्वर को किसी व्यक्ति का दमन करने की आवश्यकता है। यह सब सहज प्रकटन के रूप में आता है; न तो यह जबरन होता है, न ही इंसान इसमें हस्तक्षेप कर सकता है। इंसान के कर्तव्य को उसके अनुभवों से जाना जा सकता है, और इसके लिए लोगों को कोई अतिरिक्त अनुभवजन्य कार्य करने की आवश्यकता नहीं है। इंसान जब अपना कर्तव्य निभाता है तो उसका समस्त सार प्रकट हो सकता है, जबकि परमेश्वर अपना कार्य करते समय अपना अंतर्निहित स्वभाव प्रकट कर सकता है। अगर यह इंसान का कार्य है, तो इसे छिपाया नहीं जा सकता। अगर यह परमेश्वर का कार्य है, तो किसी के लिए भी परमेश्वर के स्वभाव को छिपाना और भी असंभव है, इसे इंसान द्वारा नियंत्रित करना तो बिल्कुल ही संभव नहीं। किसी भी इंसान को परमेश्वर नहीं कहा जा सकता, न ही उसके काम और शब्दों को पवित्र या अपरिवर्तनीय माना जा सकता है। परमेश्वर को इंसान कहा जा सकता है क्योंकि उसने देहधारण किया, लेकिन उसके कार्य को इंसान का कार्य या इंसान का कर्तव्य नहीं माना जा सकता। इसके अलावा, परमेश्वर के कथन और पौलुस के पत्रों को समान नहीं माना जा सकता, न ही परमेश्वर के न्याय और ताड़ना को और इंसान के अनुदेशों के शब्दों को समान दर्जा दिया जा सकता है। इसलिए, ऐसे सिद्धांत हैं जो परमेश्वर के कार्य को इंसान के काम से अलग करते हैं। इन्हें उनके सारों के अनुसार अलग किया जाता है, न कि कार्य के विस्तार या उसकी अस्थायी कार्यकुशलता के आधार पर। इस विषय पर, अधिकतर लोग सिद्धांतों की गलती करते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि इंसान बाह्य स्वरूप को देखता है, जिसे वह हासिल कर सकता है, जबकि परमेश्वर सार को देखता है, जिसे इंसान की भौतिक आँखों से नहीं देखा जा सकता। अगर तुम परमेश्वर के वचनों और कार्य को औसत इंसान के कर्तव्य मानते हो, और इंसान के बड़े पैमाने के काम को उसका कर्तव्य-निर्वहन मानने के बजाय देहधारी परमेश्वर का कार्य मानते हो, तो क्या तुम सैद्धांतिक रूप से गलत नहीं हो? इंसान के पत्र और जीवनियाँ आसानी से लिखी जा सकती हैं, मगर केवल पवित्र आत्मा के कार्य की बुनियाद पर। लेकिन परमेश्वर के कथनों और कार्य को इंसान आसानी से संपन्न नहीं कर सकता या उन्हें मानवीय बुद्धि और सोच द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता, न ही लोग उनकी जाँच-पड़ताल करने के बाद पूरी तरह से उनकी व्याख्या कर सकते हैं। यदि सिद्धांत के ये मामले तुम लोगों के अंदर कोई प्रतिक्रिया उत्पन्न नहीं करते हैं, तो तुम लोगों की आस्था स्पष्टत: बहुत सच्ची या शुद्ध नहीं है। केवल यही कहा जा सकता है कि तुम लोगों की आस्था अस्पष्टता से भरी हुई है, और उलझी हुई तथा सिद्धांतविहीन है। परमेश्वर और इंसान के सर्वाधिक मौलिक अनिवार्य मसलों को समझे बिना, क्या इस प्रकार की आस्था पूरी तरह से प्रत्यक्षबोध से रहित नहीं है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तेरह धर्मपत्रों पर तुम्हारा दृढ़ मत क्या है?' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 183

यीशु पृथ्वी पर साढ़े तैंतीस साल तक रहा था, वह सलीब पर चढ़ने के कार्य को करने के लिए आया था, और सलीब पर चढ़ने के माध्यम से परमेश्वर ने एक भाग की महिमा प्राप्त की है। जब परमेश्वर देह में आया तो वह विनम्र और छुपा रहने में ही समर्थ था और भयानक पीड़ा सहन कर सकता था। यद्यपि वह परमेश्वर स्वयं था, तब भी उसने हर अपमान और हर दुर्वचन को सहन किया और छुटकारे के कार्य को पूरा करने के लिए सलीब पर चढ़ाए जाने में भयानक दर्द सहा। कार्य के इस चरण का समापन हो जाने के बाद, यद्यपि लोगों ने देखा कि परमेश्वर ने महान महिमा प्राप्त कर ली थी, फिर भी यह उसकी महिमा की सम्पूर्णता नहीं थी; यह उसकी महिमा का केवल एक भाग था, जिसे उसने यीशु से प्राप्त किया था। यद्यपि यीशु हर प्रकार की कठिनाई को सहने में, विनम्र और छुपे रहने में, परमेश्वर के लिए सलीब पर चढ़ाए जाने में समर्थ था, फिर भी परमेश्वर ने अपनी महिमा के केवल एक भाग को ही प्राप्त किया और उसकी महिमा इस्राएल में प्राप्त हुई थी। अभी भी परमेश्वर के पास महिमा का एक अन्य भाग हैः पृथ्वी पर वास्तव में कार्य करने के लिए आना और लोगों के एक समूह को पूर्ण बनाना। यीशु के कार्य के चरण के दौरान, उसने कुछ अलौकिक चीज़ें की, लेकिन कार्य का वह चरण किसी भी तरह में सिर्फ चिन्हों और चमत्कारों को दिखाने के लिए नहीं था। यह प्राथमिक रूप से इस बात को दिखाने के लिए था कि यीशु पीड़ा सहन कर सकता था और परमेश्वर के लिए सलीब पर चढ़ाया जा सकता था, यह कि यीशु भयानक पीड़ा को सहन करने में समर्थ था क्योंकि वह परमेश्वर से प्रेम करता था और यह कि यद्यपि परमेश्वर ने उसे त्याग दिया, तब भी वह परमेश्वर की इच्छा के लिए अपना जीवन बलिदान करने का इच्छुक था। इस्राएल में जब परमेश्वर ने अपने कार्य को समाप्त कर लिया और यीशु को सलीब पर चढ़ा दिया गया, उसके बाद परमेश्वर की महिमा हुई और परमेश्वर ने शैतान के सामने गवाही दी। तुम लोग न तो जानते हो और न ही तुम लोगों ने देखा है कि परमेश्वर चीन में कैसे देहधारी बन गया, तो तुम लोग कैसे देख सकते हो कि परमेश्वर की महिमा की गई है? जब परमेश्वर तुम लोगों में विजय का बहुत सा कार्य करता है और तुम लोग अडिग रहते हो, तब इस चरण का परमेश्वर का कार्य सफल होता है और यह परमेश्वर की महिमा का एक भाग है। तुम लोग केवल इसे ही देखते हो और तुम लोगों को परमेश्वर द्वारा अभी पूर्ण बनाया जाना है और अभी अपना हृदय पूर्णतः परमेश्वर को देना है। तुम लोगों को अभी उसकी महिमा की सम्पूर्णता को देखना है; तुम लोग सिर्फ यह देखते हो कि परमेश्वर ने पहले से ही तुम लोगों के हृदय को जीत लिया है, यह कि तुम लोग उसे कभी नहीं छोड़ सकते हो और तुम लोग बिल्कुल अंत तक परमेश्वर का अनुसरण करोगे और तुम लोगों का हृदय नहीं बदलेगा, और परमेश्वर की महिमा यही है। तुम लोग किस चीज में परमेश्वर की महिमा देखते हो? लोगों में उसके कार्य के प्रभावों में। लोग यह देखते हैं कि परमेश्वर बहुत प्यारा है, परमेश्वर उनके हृदय में है तथा वे उसको छोड़ने को तैयार नहीं हैं, और यह परमेश्वर की महिमा है। जब कलीसिया में भाई-बहनों की संख्या बढ़ती है, और वे अपने हृदयों से परमेश्वर से प्रेम कर सकते हैं, परमेश्वर के द्वारा किए गए कार्य की सर्वोच्च शक्ति को और उसके वचनों की अतुलनीय शक्ति को देख सकते हैं, जब वे देखते हैं कि उसके वचनों में अधिकार है और यह कि वह चीन की मुख्य भूमि के भुतहा नगर में अपने कार्य की शुरुआत कर सकता है, जब, यद्यपि लोग कमज़ोर हैं, उनके हृदय परमेश्वर के सामने झुक जाते हैं और वे परमेश्वर के वचनों को स्वीकार करने को तैयार हैं और जब, यद्यपि वे कमज़ोर और अयोग्य हैं, वे इस बात को देखने में समर्थ हैं कि परमेश्वर के वचन बहुत प्यारे हैं और उनके पालन पोषण के लिए बहुत योग्य हैं, तब यही परमेश्वर की महिमा है। जब वह दिन आता है जब लोग परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाते हैं और उसके सामने आत्मसमर्पण करने में समर्थ होते हैं, और पूरी तरह से परमेश्वर का आज्ञापालन कर सकते हैं, और अपने भविष्य की संभावनाओं और भाग्य को परमेश्वर के हाथों में छोड़ सकते हैं, तब परमेश्वर की महिमा के दूसरे भाग को पूरी तरह से प्राप्त कर लिया गया होगा। कहने का अर्थ है कि जब व्यावहारिक परमेश्वर के कार्य को पूर्णतः पूरा कर लिया जाता है, तो चीन की मुख्य भूमि में उसका कार्य समाप्त हो जाएगा; दूसरे शब्दों में, जब जो परमेश्वर के द्वारा पूर्व-नियत किए और चुने गये थे, उन्हें पूर्ण बना लिया जाता है, तो परमेश्वर की महिमा होगी। परमेश्वर ने कहा कि वह अपनी महिमा के दूसरे भाग को पूर्व दिशा में ले आया है, फिर भी यह नंगी आँखों के लिए अदृश्य है। परमेश्वर अपने कार्य को पूर्व दिशा में ले आया हैः वह पहले से ही पूर्व दिशा में आ चुका है और यह परमेश्वर की महिमा है। आज, यद्यपि उसके कार्य को अभी भी पूरा किया जाना है, क्योंकि परमेश्वर ने कार्य करने का निर्णय लिया है, इसलिए इसे निश्चित रूप से पूरा किया जाएगा। परमेश्वर ने निर्णय लिया है कि वह इस कार्य को चीन में पूरा करेगा और उसने तुम लोगों को पूर्ण करने का संकल्प किया है। इस प्रकार वह तुम लोगों को बाहर निकलने का कोई मार्ग नहीं देता है—उसने पहले से ही तुम्हारे हृदयों को जीत लिया है और भले ही तुम चाहो या न चाहो तुम्हें आगे बढ़ना है और जब तुम परमेश्वर के द्वारा प्राप्त कर लिए जाते हो, तो परमेश्वर की महिमा होती है। आज, परमेश्वर की सम्पूर्ण महिमा अभी होनी है, क्योंकि तुम लोगों को अभी पूर्ण बनाया जाना है। यद्यपि तुम लोगों के हृदय परमेश्वर की ओर लौट चुके हैं, फिर भी तुम्हारी देह में अभी भी कई कमजोरियाँ हैं, तुम लोग परमेश्वर को संतुष्ट करने में अक्षम हो, तुम लोग परमेश्वर की इच्छा के प्रति ध्यान देने में असमर्थ हो, और अभी भी बहुत सी नकारात्मक चीज़ें हैं जिनसे तुम लोगों को छुटकारा पाना है और तुम्हें अभी भी कई परीक्षणों और शुद्धिकरणों से गुजरना होगा। केवल इस तरह से ही तुम्हारे जीवन स्वभाव परिवर्तित हो सकते हैं और तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जा सकते हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "'सहस्राब्दि राज्य आ चुका है' के बारे में एक संक्षिप्त वार्ता" से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 184

उस समय यीशु का कार्य समस्त मानव जाति के छुटकारा का था। उन सभी के पापों को क्षमा कर दिया गया था जो उसमें विश्वास करते थे; जितने समय तक तुम उस पर विश्वास करते थे, उतने समय तक वह तुम्हें छुटकारा देगा; यदि तुम उस पर विश्वास करते थे, तो तुम अब और पापी नहीं थे, तुम अपने पापों से मुक्त हो गए थे। यही है बचाए जाने, और विश्वास द्वारा उचित ठहराए जाने का अर्थ। फिर भी जो विश्वास करते थे उन लोगों के बीच, वह रह गया था जो विद्रोही था और परमेश्वर का विरोधी था, और जिसे अभी भी धीरे-धीरे हटाया जाना था। उद्धार का अर्थ यह नहीं था कि मनुष्य पूरी तरह से यीशु द्वारा प्राप्त कर लिया गया था, लेकिन यह कि मनुष्य अब और पापी नहीं था, कि उसे उसके पापों से क्षमा कर दिया गया था: बशर्ते कि तुम विश्वास करते थे कि तुम कभी भी अब और पापी नहीं बनोगे। उस समय, यीशु ने बहुतायत से ऐसे कार्य किये जो उसके शिष्यों की समझ से बाहर थे, और बहुतायत से ऐसी बातें कहीं जो लोगों की समझ में नहीं आयीं। इसका कारण यह है कि, उस समय, उसने व्याख्या नहीं की। इस प्रकार, उसके जाने के कई वर्ष बाद, मत्ती ने उसकी वंशावली बनायी, और अन्य लोगों ने भी बहुतायत से कार्य किये जो मनुष्य की इच्छा के थे। यीशु मनुष्य को पूर्ण करने और प्राप्त करने के लिए नहीं, बल्कि कार्य का एक चरण करने के लिए आया था: स्वर्ग के राज्य के सुसमाचार को आगे बढ़ाना और क्रूसीकरण के कार्य को पूरा करना—और इसलिए एक बार जब यीशु को सलीब पर चढ़ा दिया गया, तो उसके कार्य का पूरी तरह से अंत हो गया। किन्तु वर्तमान चरण में—विजय के कार्य—में अधिक वचन अवश्य बोले जाने चाहिए, अधिक कार्य अवश्य किया जाना चाहिए, कई प्रक्रियाएँ अवश्य होनी चाहिए। इसलिए भी यीशु और यहोवा के कार्यों के रहस्य अवश्य प्रकट किये जाने चाहिए, ताकि सभी लोगों को अपने विश्वास में समझ और स्पष्टता मिल जाए, क्योंकि यह अंत के दिनों का कार्य है, और अंत के दिन परमेश्वर के कार्य की समाप्ति है, इस कार्य के समापन का समय है। कार्य का यह चरण तुम्हारे लिए यहोवा की व्यवस्था और यीशु द्वारा छुटकारे को स्पष्ट करेगा, और मुख्य रूप से इसलिए है ताकि तुम परमेश्वर की छ्ह हजार-वर्षीय प्रबंधन योजना के पूरे कार्य को समझ सको, और इस छ: हज़ार-वर्ष कि प्रबंधन योजना के महत्व और सार की सराहना कर सको, और यीशु द्वारा किए गए सभी कार्यों और उसके द्वारा बोले गए वचनों के प्रयोजन, और यहाँ तक कि बाइबल में अपने अंध विश्वास और श्रद्धा को समझ सको। यह सब तुम्हें पूरी तरह से समझने की अनुमति देगा। यीशु द्वारा किया गया कार्य और परमेश्वर का आज का कार्य दोनों तुम्हारी समझ में आ जाएँगे; तुम समस्त सत्य, जीवन और मार्ग को समझ जाओगे और देख लोगे। यीशु द्वारा किए गए कार्य के चरण में, यीशु समापन कार्य किए बिना क्यों चला गया? क्योंकि यीशु के कार्य का चरण समापन का कार्य नहीं था। जब उसे सलीब पर ठोका गया था, तब उसके वचनों का भी अंत हो गया था; उसके सलीब पर चढ़ने के बाद, उसका कार्य पूरी तरह समाप्त हो गया। वर्तमान चरण भिन्न है: केवल वचनों के अंत तक बोले जाने और परमेश्वर के समस्त कार्य का उपसंहार हो जाने के बाद ही उसका कार्य समाप्त हुआ होगा। यीशु के कार्य के चरण के दौरान, बहुत से वचन थे जो अनकहे रह गए थे, या जो पूरी तरह स्पष्ट नहीं थे। फिर भी यीशु ने जो कहा या जो नहीं कहा उसकी परवाह नहीं की, क्योंकि उसकी सेवकाई वचन की सेवकाई नहीं थी, और इसलिए सलीब पर ठोके जाने के बाद, वह चला गया। कार्य का वह चरण मुख्यतः सलीब पर चढ़ने के वास्ते था, और आज के चरण से भिन्न है। कार्य का यह चरण मुख्य रूप से पूर्णता, स्वच्छ करने, और समस्त कार्य का समापन करने के लिए है। यदि वचनों को उनके बिल्कुल अंत तक नहीं कहा जाता है, तो इस कार्य का समापन करने का कोई तरीका नहीं होगा, क्योंकि कार्य के इस चरण में समस्त कार्य को अंत तक लाया जाता है और वचनों का उपयोग करके सम्पन्न किया जाता है। उस समय, यीशु ने बहुतायत से कार्य किया जो मनुष्य के लिए समझ से बाहर था। वह चुपचाप चला गया, और आज भी ऐसे कई लोग हैं जो उसके वचनों को नहीं समझते हैं, जिनकी समझ त्रुटिपूर्ण है, मगर फिर भी उनके द्वारा सही मानी जाती है, जो नहीं जानते हैं कि वे गलत हैं। अंत में, यह वर्तमान चरण परमेश्वर के कार्य का पूर्णतः अंत करेगा, और इसका उपसंहार प्रदान करेगा। परमेश्वर की प्रबंधन योजना सभी की समझ और सभी के ज्ञान में आ जाएगी। मनुष्य के भीतर धारणाएँ, उसके इरादे, उसकी त्रुटिपूर्ण समझ, यहोवा और यीशु के कार्यों के प्रति उसकी धारणाएँ, अन्य जातियों के बारे में उसके विचार और उसके अन्य विचलन और उसकी सभी त्रुटियाँ ठीक कर दी जाएँगी। और जीवन के सभी सही मार्ग, और परमेश्वर द्वारा किया गया समस्त कार्य और संपूर्ण सत्य मनुष्य की समझ में आ जाएँगे। जब ऐसा होगा, तो कार्य का यह चरण समाप्त हो जाएगा। यहोवा का कार्य दुनिया का सृजन था, यह आरंभ था; कार्य का यह चरण, कार्य का अंत है, और यह समापन है। आरंभ में, परमेश्वर का कार्य इस्राएल के चुने हुए लोगों के बीच किया गया था, और यह सभी जगहों में से सबसे पवित्र में एक नए युग का उद्भव था। कार्य का अंतिम चरण, दुनिया का न्याय करने और युग को समाप्त करने के लिए, सभी देशों में से सबसे अशुद्ध में किया जाता है। पहले चरण में, परमेश्वर का कार्य सबसे प्रकाशमान स्थान में किया गया था, और अंतिम चरण सबसे अंधकारमय स्थान में किया जाता है, और इस अंधकार को बाहर निकाल दिया जाएगा, प्रकाश को प्रकट किया जाएगा, और सभी लोगों पर विजय प्राप्त की जाएगी। जब सभी जगहों में इस सबसे अशुद्ध और सबसे अंधकारमय स्थान के लोगों पर विजय प्राप्त कर ली जाएगी, और समस्त आबादी स्वीकार कर लेगी कि एक परमेश्वर है, जो सच्चा परमेश्वर है, और हर व्यक्ति सर्वथा आश्वस्त हो जाएगा, तब समस्त जगत में विजय का कार्य करने के लिए इस तथ्य का उपयोग किया जाएगा। कार्य का यह चरण प्रतीकात्मक है: एक बार इस युग का कार्य समाप्त हो गया, तो प्रबंधन का 6,000 वर्षों का कार्य पूरा हो जाएगा। एक बार सबसे अंधकारमय स्थान के लोगों को जीत लिया, तो कहने की आवश्यकता नहीं कि हर अन्य जगह पर भी ऐसा ही होगा। वैसे तो, केवल चीन में विजय का कार्य सार्थक प्रतीकात्मकता रखता है। चीन अंधकार की सभी शक्तियों का मूर्तरूप है, और चीन के लोग उन सभी लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं जो देह के हैं, शैतान के हैं, मांस और रक्त के हैं। ये चीनी लोग हैं जो बड़े लाल अजगर द्वारा सबसे ज़्यादा भ्रष्ट किए गए हैं, जिनका परमेश्वर के प्रति सबसे मज़बूत विरोध है, जिनकी मानवता सर्वाधिक अधम और अशुद्ध है, और इसलिए वे समस्त भ्रष्ट मानवता के मूलरूप आदर्श हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि अन्य देशों में कोई भी समस्या नहीं है; मनुष्य की धारणाएँ पूरी तरह से समान हैं, और यद्यपि इन देशों के लोग अच्छी क्षमता वाले हो सकते हैं, किन्तु यदि वे परमेश्वर को नहीं जानते हैं, तो यह अवश्य होगा कि वे उसका विरोध करते हैं। यहूदियों ने भी क्यों परमेश्वर का विरोध किया और उसकी अवहेलना की? फ़रीसियों ने भी क्यों उसका विरोध किया? यहूदा ने क्यों यीशु के साथ विश्वासघात किया? उस समय, बहुत से अनुयायी यीशु को नहीं जानते थे। क्यों यीशु को सलीब पर चढ़ाये जाने और उसके फिर से जी उठने के बाद भी, लोगों ने फिर भी उस पर विश्वास नहीं किया? क्या मनुष्य की अवज्ञा पूरी तरह से समान नहीं है? बात बस इतनी है कि चीन के लोग इसका एक उदाहरण बनाए जाते हैं, और जब उन पर विजय प्राप्त कर ली जाएगी तो वे एक नमूना और प्रतिदर्श बन जाएँगे, और दूसरों के लिए संदर्भ के रूप में कार्य करेंगे। मैंने हमेशा क्यों कहा है कि तुम लोग मेरी प्रबंधन योजना के सहायक हो? चीन के लोगों में भ्रष्टाचार, अशुद्धता, अधार्मिकता, विरोध और विद्रोहशीलता सर्वाधिक पूर्णता से व्यक्त होते हैं और अपने सभी विविध रूपों में प्रकट होते हैं। एक ओर, वे खराब क्षमता के हैं, और दूसरी ओर, उनके जीवन और उनकी मानसिकता पिछड़े हुए हैं, और उनकी आदतें, सामाजिक वातावरण, जन्म का परिवार—सभी गरीब और सबसे पिछड़े हुए हैं। इस स्थान में कार्य प्रतीकात्मक है। उनकी हैसियत भी कम है, और इस परीक्षा के कार्य के इसकी संपूर्णता में पूरा कर दिए जाने के बाद, उसका बाद का कार्य बहुत बेहतर तरीके से होगा। यदि कार्य के इस चरण को पूरा किया जा सकता है, तो इसके बाद का कार्य ज़ाहिर तौर पर होगा ही। एक बार कार्य का यह चरण सम्पन्न हो जाता है, तो बड़ी सफलता पूर्णतः प्राप्त कर ली गई होगी, और समस्त विश्व में विजय का कार्य पूर्णतः पूरा हो गया होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के कार्य का दर्शन (2)' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 185

अब मोआब के वंशजों पर कार्य करना उन लोगों को बचाना है, जो सबसे गहरे अँधेरे में गिर गए हैं। यद्यपि वे शापित थे, फिर भी परमेश्वर उनसे महिमा पाने का इच्छुक है, क्योंकि पहले वे सभी ऐसे लोग थे, जिनके हृदयों में परमेश्वर की कमी थी; केवल उन लोगों को, जिनके हृदयों में परमेश्वर नहीं है, परमेश्वर की आज्ञा का पालन करने और उससे प्रेम करने के लिए तैयार करना ही सच्ची विजय है, और ऐसे कार्य का फल सबसे मूल्यवान और सबसे ठोस है। केवल यही महिमा प्राप्त कर रहा है—यही वह महिमा है, जिसे परमेश्वर अंत के दिनों में हासिल करना चाहता है। बावजूद इसके कि ये लोग कम दर्जे के हैं, अब इनका ऐसे महान उद्धार को प्राप्त करने में सक्षम होना वास्तव में परमेश्वर द्वारा एक उन्नयन है। यह काम बहुत ही सार्थक है, और वह न्याय के माध्यम से ही इन लोगों को प्राप्त करता है। उसका इरादा इन लोगों को दंडित करने का नहीं, बल्कि बचाने का है। यदि, अंत के दिनों में, वह अभी भी इस्राएल में विजय प्राप्त करने का काम कर रहा होता, तो वह बेकार होता; यदि वह फलदायक भी होता, तो उसका कोई मूल्य या कोई बड़ा अर्थ न होता, और वह समस्त महिमा प्राप्त करने में सक्षम न होता। वह तुम लोगों पर कार्य कर रहा है, अर्थात् उन लोगों पर, जो सबसे अंधकारमय स्थानों में गिर चुके हैं, जो सबसे अधिक पिछड़े हैं। ये लोग यह नहीं मानते कि परमेश्वर है और वे कभी नहीं जान पाए हैं कि परमेश्वर है। इन प्राणियों को शैतान ने इस हद तक भ्रष्ट किया है कि वे परमेश्वर को भूल गए हैं। वे शैतान द्वारा अंधे बना दिए गए हैं और वे बिलकुल नहीं जानते कि स्वर्ग में एक परमेश्वर है। अपने दिलों में तुम सब लोग मूर्तियों और शैतान की पूजा करते हो, क्या तुम सबसे अधम, सबसे पिछड़े लोग नहीं हो? देह से तुम लोग निम्नतम हो, किसी भी निजी स्वतंत्रता से विहीन, और तुम लोग कष्टों से पीड़ित भी हो। तुम लोग इस समाज में सबसे निम्न स्तर पर भी हो, जिन्हें विश्वास की स्वतंत्रता तक नहीं है। तुम सब पर कार्य करने का यही अर्थ है। आज मोआब के तुम वंशजों पर कार्य करना जानबूझकर तुम लोगों को अपमानित करने के लिए नहीं है, बल्कि कार्य के अर्थ को प्रकट करने के लिए है। तुम लोगों के लिए यह एक महान उत्थान है। अगर व्यक्ति में विवेक और अंतर्दृष्टि हो, तो वह कहेगा : "मैं मोआब का वंशज हूँ, आज परमेश्वर द्वारा ऐसा महान उत्थान या ऐसे महान आशीष पाने के सचमुच अयोग्य। अपनी समस्त करनी और कथनी में, और अपनी हैसियत और मूल्य के अनुसार, मैं परमेश्वर से ऐसे महान आशीष पाने के बिलकुल भी योग्य नहीं हूँ। इस्राएलियों को परमेश्वर से बहुत प्रेम है, और जिस अनुग्रह का वे आनंद उठाते हैं, वह उन्हें परमेश्वर द्वारा ही दिया जाता है, लेकिन उनकी हैसियत हमसे बहुत ऊँची है। अब्राहम यहोवा के प्रति बहुत समर्पित था, और पतरस यीशु के प्रति बहुत समर्पित था—उनकी भक्ति हमसे सौ गुना अधिक थी। और अपने कार्यों के आधार पर हम परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद लेने के बिलकुल अयोग्य हैं।" चीन में इन लोगों की सेवा परमेश्वर के सामने बिलकुल नहीं लाई जा सकती। यह पूरा बूचड़खाना है; अब तुम जो परमेश्वर के अनुग्रह का इतना आनंद लेते हो, तो वह केवल परमेश्वर का उत्थान है! तुम लोगों ने कब परमेश्वर के कार्य की माँग की है? तुमने कब अपना जीवन परमेश्वर के लिए बलिदान किया है? तुमने कब अपने परिवार, अपने माता-पिता और अपने बच्चों का आसानी से त्याग किया है? तुममें से किसी ने भी कोई बड़ी कीमत नहीं चुकाई है! यदि पवित्र आत्मा तुम्हें बाहर नहीं लाता, तो तुममें से कितने सब-कुछ बलिदान करने में सक्षम होते? तुमने आज तक केवल बल और दबाव के तहत अनुसरण किया है। तुम लोगों की भक्ति कहाँ है? तुम लोगों की आज्ञाकारिता कहाँ है? तुम्हारे कर्मों के आधार पर तुम्हें बहुत पहले ही नष्ट कर दिया जाना चाहिए था—तुम लोगों का पूरी तरह सफाया होना चाहिए था। ऐसे महान आशीषों का आनंद लेने की तुम लोगों में क्या योग्यता है? तुम ज़रा भी योग्य नहीं हो! तुम लोगों में से किसने अपना स्वयं का मार्ग बनाया है? तुममें से किसने खुद सच्चा रास्ता खोजा है? तुम सभी आलसी, लोभी, आराम-तलब अभागे हो! क्या तुम लोग समझते हो कि तुम महान हो? तुम लोगों के पास शेखी बघारने के लिए क्या है? इसे अनदेखा करने पर भी कि तुम लोग मोआब के वंशज हो, क्या तुम लोगों की प्रकृति या तुम लोगों के जन्मस्थान सबसे ऊँची किस्म के हैं? इसे अनदेखा करने पर भी कि तुम लोग मोआब के वंशज हो, क्या तुम सभी पूरी तरह से मोआब के वंशज नहीं हो? क्या तथ्यों की सच्चाई बदली जा सकती है? क्या तुम लोगों की प्रकृति उजागर करने से अब तथ्यों की सच्चाई गलत हो जाती है? अपनी चापलूसी, अपने जीवन और अपने चरित्र देखो—क्या तुम लोग नहीं जानते कि तुम मानवजाति में निम्नतम हो? तुम लोगों के पास क्या है, जिसकी तुम शेखी बघार सकते हो? समाज में अपने दर्जे को देखो। क्या तुम लोग उसके सबसे निचले स्तर पर नहीं हो? क्या तुम लोगों को लगता है कि मैंने गलत कहा है? अब्राहम ने इसहाक को बलिदान किया—तुमने किसे बलिदान किया है? अय्यूब ने सब-कुछ बलिदान किया—तुमने क्या बलिदान किया है? इतने सारे लोगों ने अपना जीवन दिया है, अपने सिर कुर्बान किए हैं, अपना खून बहाया है, सही राह तलाशने के लिए। क्या तुम लोगों ने वह कीमत चुकाई है? उनकी तुलना में तुम इस महान अनुग्रह का आनंद लेने के बिलकुल भी योग्य नहीं हो। तो क्या आज यह कहना तुम्हारे साथ अन्याय करना है कि तुम लोग मोआब के वंशज हो? तुम लोग खुद को बहुत ऊँचा मत समझो। तुम्हारे पास शेखी बघारने के लिए कुछ नहीं है। ऐसा महान उद्धार, ऐसा महान अनुग्रह तुम लोगों को मुफ्त में दिया जा रहा है। तुम लोगों ने कुछ भी बलिदान नहीं किया है, फिर भी तुम अनुग्रह का मुफ्त आनंद उठा रहे हो। क्या तुम लोगों को शर्म नहीं आती? क्या यह सच्चा मार्ग तुम लोगों ने स्वयं खोजा और पाया था? क्या पवित्र आत्मा ने तुम लोगों को इसे स्वीकार करने के लिए मजबूर नहीं किया? तुम लोगों के पास कभी भी एक खोजने वाला दिल नहीं था, सत्य की खोज करने वाला और उसकी लालसा रखने वाला दिल तो बिलकुल भी नहीं था। तुम बस बैठे-बिठाए इसका आनंद ले रहे हो; तुमने इस सत्य को ज़रा भी प्रयास किए बिना पाया है। तुम्हें शिकायत करने का क्या अधिकार है? क्या तुम्हें लगता है कि तुम्हारा मोल सबसे बड़ा है? उन लोगों की तुलना में, जिन्होंने अपने जीवन का बलिदान किया और अपना रक्त बहाया, तुम लोगों के पास शिकायत करने को क्या है? अब तुम लोगों को नष्ट करना सही और स्वाभाविक होगा! तुम्हारे पास आज्ञा का पालन और अनुसरण करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। तुम लोग बस योग्य नहीं हो! तुम्हारे बीच में से अधिकतर लोगों को बुलाया गया था, लेकिन अगर तुम्हें तुम्हारे परिवेश ने मजबूर नहीं किया होता या अगर तुम्हें बुलाया नहीं गया होता, तो तुम लोग बाहर आने के लिए पूरी तरह से अनिच्छुक होते। ऐसे त्याग को लेने के लिए कौन तैयार है? देह का सुख छोड़ने के लिए कौन तैयार है? तुम सब वे लोग हो, जो लालच के साथ आराम से ऐश करते हैं और एक विलासी जीवन की चाह रखते हैं! तुम लोगों को इतने बड़े आशीष मिल गए हैं—तुम्हें और क्या कहना है? तुम्हें क्या शिकायतें हैं? तुम लोगों को स्वर्ग में सबसे बड़े आशीषों और सबसे बड़े अनुग्रह का आनंद लेने दिया गया है, और जो कार्य पृथ्वी पर पहले कभी नहीं किया गया था, उसे आज तुम पर प्रकट किया गया है, क्या यह एक आशीष नहीं है? आज तुम्हारी इसलिए इतनी ताड़ना की गई है, क्योंकि तुम लोगों ने परमेश्वर का विरोध किया है और उसके खिलाफ विद्रोह किया है। इस ताड़ना के कारण तुम लोगों ने परमेश्वर की दया और प्रेम देखा है, और उससे भी अधिक तुमने उसकी धार्मिकता और पवित्रता देखी है। इस ताड़ना की वजह से और मानव की गंदगी के कारण, तुम लोगों ने परमेश्वर की महान शक्ति देखी है, और उसकी पवित्रता और महानता देखी है। क्या यह एक दुर्लभतम सत्य नहीं है? क्या यह एक अर्थपूर्ण जीवन नहीं है? परमेश्वर जो कार्य करता है, वह अर्थ से भरा है! अतः जितनी निम्न तुम लोगों की स्थिति है, उतना अधिक वह यह साबित करती है कि परमेश्वर ने तुम्हारा उत्थान किया है, और उतना ही अधिक आज तुम लोगों पर उसके कार्य का महान मूल्य साबित होता है। यह बस एक अनमोल खजाना है, जो कहीं और नहीं पाया सकता! युगों तक किसी ने भी ऐसे महान उद्धार का आनंद नहीं लिया है। यह तथ्य कि तुम्हारी स्थिति निम्न है, यह दर्शाता है कि परमेश्वर का उद्धार कितना महान है, और यह दर्शाता है कि परमेश्वर मानवजाति के प्रति वफादार है—वह बचाता है, नष्ट नहीं करता।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मोआब के वंशजों को बचाने का अर्थ' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 186

जब परमेश्वर पृथ्वी पर आया, तो वह संसार का नहीं था, और संसार का सुख भोगने के लिए वह देह नहीं बना था। जिस स्थान पर कार्य करना सबसे अच्छी तरह से उसके स्वभाव को प्रकट करता और जो सबसे अर्थपूर्ण होता, वह वही स्थान है, जहाँ वह पैदा हुआ। चाहे वह स्थल पवित्र हो या गंदा, और चाहे वह कहीं भी काम करे, वह पवित्र है। दुनिया में हर चीज़ उसके द्वारा बनाई गई थी, हालाँकि शैतान ने सब-कुछ भ्रष्ट कर दिया है। फिर भी, सभी चीजें अभी भी उसकी हैं; वे सभी चीजें उसके हाथों में हैं। वह अपनी पवित्रता प्रकट करने के लिए एक गंदे देश में आता है और वहाँ कार्य करता है; वह केवल अपने कार्य के लिए ऐसा करता है, अर्थात् वह इस दूषित भूमि के लोगों को बचाने के लिए ऐसा कार्य करने में बहुत अपमान सहता है। यह पूरी मानवजाति की खातिर, गवाही के लिए किया जाता है। ऐसा कार्य लोगों को परमेश्वर की धार्मिकता दिखाता है, और वह परमेश्वर की सर्वोच्चता प्रदर्शित करने में अधिक सक्षम है। उसकी महानता और शुचिता उन नीच लोगों के एक समूह के उद्धार के माध्यम से व्यक्त होती है, जिनका अन्य लोग तिरस्कार करते हैं। एक मलिन भूमि में पैदा होना यह बिलकुल साबित नहीं करता कि वह दीन-हीन है; यह तो केवल सारी सृष्टि को उसकी महानता और मानवजाति के लिए उसका सच्चा प्यार दिखाता है। जितना अधिक वह ऐसा करता है, उतना ही अधिक यह मनुष्य के लिए उसके शुद्ध प्रेम, उसके दोषरहित प्रेम को प्रकट करता है। परमेश्वर पवित्र और धर्मी है। यद्यपि वह एक गंदी भूमि में पैदा हुआ था, और यद्यपि वह उन लोगों के साथ रहता है जो गंदगी से भरे हुए हैं, ठीक वैसे ही जैसे यीशु अनुग्रह के युग में पापियों के साथ रहता था, फिर भी क्या उसका हर कार्य संपूर्ण मानवजाति के अस्तित्व की खातिर नहीं किया जाता? क्या यह सब इसलिए नहीं है कि मानवजाति महान उद्धार प्राप्त कर सके? दो हजार साल पहले वह कई वर्षों तक पापियों के साथ रहा। वह छुटकारे के लिए था। आज वह गंदे, नीच लोगों के एक समूह के साथ रह रहा है। यह उद्धार के लिए है। क्या उसका सारा कार्य तुम मनुष्यों के लिए नहीं है? यदि यह मानवजाति को बचाने के लिए न होता, तो क्यों वह एक नाँद में पैदा होने के बाद कई सालों तक पापियों के साथ रहता और कष्ट उठाता? और यदि यह मानवजाति को बचाने के लिए न होता, तो क्यों वह दूसरी बार देह में लौटकर आता, इस देश में पैदा होता जहाँ दुष्ट आत्माएँ इकट्ठी होती हैं, और इन लोगों के साथ रहता जिन्हें शैतान ने गहराई से भष्ट कर रखा है? क्या परमेश्वर वफ़ादार नहीं है? उसके कार्य का कौन-सा भाग मानवजाति के लिए नहीं रहा है? कौन-सा भाग तुम लोगों की नियति के लिए नहीं रहा है? परमेश्वर पवित्र है—यह अपरिवर्तनीय है। वह गंदगी से प्रदूषित नहीं है, हालाँकि वह एक गंदे देश में आया है; इस सबका मतलब केवल यह हो सकता है कि मानवजाति के लिए परमेश्वर का प्रेम अत्यंत निस्वार्थ है और जो पीड़ा और अपमान वह सहता है, वह अत्यधिक है! क्या तुम लोग यह नहीं जानते कि वह तुम सभी के लिए, और तुम लोगों की नियति के लिए जो अपमान वह सहता है, वह कितना बड़ा है? वह बड़े लोगों या अमीर और शक्तिशाली परिवारों के पुत्रों को बचाने के बजाय विशेष रूप से उनको बचाता है, जो दीन-हीन हैं और नीची निगाह से देखे जाते हैं। क्या यह सब उसकी पवित्रता नहीं है? क्या यह सब उसकी धार्मिकता नहीं है? समस्त मानवजाति के अस्तित्व के लिए वह एक दूषित भूमि में पैदा होगा और हर अपमान सहेगा। परमेश्वर बहुत वास्तविक है—वह कोई मिथ्या कार्य नहीं करता। क्या उसके कार्य का हर चरण इतने व्यावहारिक रूप से नहीं किया गया है? यद्यपि सब लोग उसकी निंदा करते हैं और कहते हैं कि वह पापियों के साथ मेज पर बैठता है, यद्यपि सब लोग उसका मज़ाक उड़ाते हैं और कहते हैं कि वह गंदगी के पुत्रों के साथ रहता है, कि वह सबसे अधम लोगों के साथ रहता है, फिर भी वह निस्वार्थ रूप से अपने आपको समर्पित करता है, और वह अभी भी मानवजाति के बीच इस तरह नकारा जाता है। क्या जो कष्ट वह सहता है, वह तुम लोगों के कष्टों से बड़ा नहीं है? क्या जो कार्य वह करता है, वह तुम लोगों द्वारा चुकाई गई कीमत से ज्यादा नहीं है? तुम लोग गंदे देश में पैदा हुए, फिर भी तुमने परमेश्वर की पवित्रता प्राप्त की है। तुम लोग उस देश में पैदा हुए, जहाँ राक्षस एकत्र होते हैं, फिर भी तुम्हें महान सुरक्षा प्राप्त हुई है। तुम्हारे पास विकल्प क्या है? तुम्हारी शिकायतें क्या हैं? क्या जो पीड़ा उसने सही है, वह तुम लोगों द्वारा सही गई पीड़ा से अधिक नहीं है? वह पृथ्वी पर आया है और उसने मानव-जगत के सुखों का कभी आनंद नहीं उठाया। वह ऐसी चीज़ों से घृणा करता है। परमेश्वर मनुष्य से भौतिक चीज़ें पाने के लिए पृथ्वी पर नहीं आया, न ही वह मनुष्य के भोजन, कपड़ों और गहनों का आनंद उठाने के लिए आया है। वह इन चीज़ों पर कोई ध्यान नहीं देता। वह धरती पर मनुष्य की खातिर दुःख उठाने के लिए आया, न कि सांसारिक ऐश्वर्य का आनंद उठाने के लिए। वह पीड़ित होने, काम करने और अपनी प्रबंधन योजना पूरी करने के लिए आया। उसने किसी अच्छे स्थान का चयन नहीं किया, रहने के लिए कोई दूतावास या महँगा होटल पसंद नहीं किया, और न ही उसकी सेवा में कई नौकर खड़े थे। तुम लोगों ने जो देखा है, क्या उससे तुम्हें पता नहीं चलता कि वह काम करने के लिए आया या सुख भोगने के लिए? क्या तुम लोगों की आँखें नहीं देखतीं? तुम लोगों को उसने कितना दिया है? यदि वह किसी आरामदायक स्थान पर पैदा हुआ होता, तो क्या वह महिमा पाने में सक्षम होता? क्या वह कार्य करने में सक्षम होता? क्या उसके ऐसा करने का कोई अर्थ होता? क्या वह मानवजाति को पूरी तरह से जीत पाता? क्या वह लोगों को गंदगी की भूमि से बचा सकता? अपनी धारणाओं के अनुसार लोग पूछते हैं, "चूँकि परमेश्वर पवित्र है, तो वह हमारे इस गंदे स्थान में क्यों पैदा हुआ? तुम हम गंदे मनुष्यों से घृणा करते हो और हमारा तिरस्कार करते हो; तुम हमारे प्रतिरोध और विद्रोह से घृणा करते हो, तो तुम हमारे साथ क्यों रहते हो? तुम सर्वोच्च परमेश्वर हो। तुम कहीं भी पैदा हो सकते थे, तो तुम्हें इस गंदे देश में क्यों पैदा होना पड़ा? तुम प्रतिदिन हमारा न्याय करते हो और हमें ताड़ना देते हो, और तुम स्पष्ट रूप से जानते हो कि हम मोआब के वंशज हैं, तो फिर भी तुम हमारे बीच क्यों रहते हो? तुम मोआब के वंशजों के परिवार में क्यों पैदा हुए? तुमने ऐसा क्यों किया?" तुम लोगों के इस तरह के विचार पूर्णत: विवेकरहित हैं! केवल इसी तरह का कार्य लोगों को उसकी महानता, उसकी विनम्रता और उसका छिपाव दिखाता है। वह अपने कार्य की खातिर सब-कुछ बलिदान करने को तैयार है, और उसने समस्त कष्ट अपने कार्य के लिए सहे हैं। ऐसा वह मानव-जाति की खातिर करता है, और इससे भी बढ़कर, शैतान को जीतने के करता है, लिए ताकि सभी जीव उसके प्रभुत्व के अंतर्गत आ सकें। केवल यही सार्थक, मूल्यवान कार्य है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मोआब के वंशजों को बचाने का अर्थ' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 187

उस समय जब यीशु ने यहूदिया में कार्य किया था, तब उसने खुलकर ऐसा किया, परन्तु अब, मैं तुम लोगों के बीच गुप्त रूप से काम करता और बोलता हूँ। अविश्वासी लोग इस बात से पूरी तरह से अनजान हैं। तुम लोगों के बीच मेरा कार्य उन लोगों के लिए बंद है जो बाहर हैं। इन वचनों, इन ताड़नाओं और न्यायों को केवल तुम लोग ही जानते हो और कोई नहीं। यह समस्त कार्य तुम लोगों बीच में कार्यान्वित किया जाता है और केवल तुम लोगों के लिए प्रकट किया जाता है; अविश्वासियों में से कोई भी इसे नहीं जानता है, क्योंकि समय अभी तक नहीं आया है। यहाँ ये लोग ताड़नाओं को सहने के बाद पूर्ण बनाए जाने के समीप हैं, परन्तु जो लोग बाहर हैं वे इस बारे में कुछ नहीं जानते हैं। यह कार्य बहुत अधिक छिपा हुआ है! उनके लिए, परमेश्वर का देह बन जाना गोपनीय बात है, परन्तु जो इस धारा में हैं उनके लिए, कोई कह सकता है कि वह स्पष्ट है। यद्यपि परमेश्वर में सब कुछ स्पष्ट है, सब कुछ प्रकट है, और सब कुछ मुक्त है, फिर भी यह केवल उनके लिए सही है जो उसमें विश्वास करते हैं; और जहाँ तक शेष, अविश्वासियों का संबंध है, कुछ भी ज्ञात नहीं करवाया जाता है। अभी तुम्हारे बीच और चीन में जो कार्य वह कड़ाई से बंद किया गया है, ताकि वे इसके बारे में जान न सकें। यदि वे इस कार्य से अवगत हो जाते हैं, तो वे जो कुछ भी करेंगे वह इसकी निंदा होगी और वे इसे उत्पीड़न के अधीन करेंगे। वे इसमें विश्वास नहीं करेंगे। बड़े लाल अजगर के देश, इस सबसे अधिक पिछड़े हुए इलाके, में कार्य करना कोई आसान काम नहीं है। यदि इस कार्य को खुले में रखा गया होता, तब इसे जारी रखना असम्भव होता। कार्य का यह चरण बस इस स्थान में कार्यान्वित नहीं किया जा सकता है। यदि इस कार्य को खुले तौर पर किया जाता, तो वे इसे कैसे आगे जाने दे सकते थे? क्या यह कार्य को और अधिक जोखिम में नहीं डाल देता? यदि इस कार्य को छिपा कर नहीं रखा जाता, बल्कि इसके बजाए यीशु के समय के समान ही कार्यान्वित किया जाता, जब उसने असाधारण ढंग से बीमारों को चंगा किया और दुष्टात्माओं को निकाला था, तो क्या इसे बहुत पहले ही दुष्टात्माओं के द्वारा "बंदी बना" नहीं लिया गया होता? क्या वे परमेश्वर के अस्तित्व को बर्दाश्त करने में समर्थ होते? यदि मुझे मनुष्य को उपदेश और व्याख्यान देने के लिए अब बड़े कक्षों में प्रवेश करना होता, तो क्या मुझे बहुत पहले ही टुकड़े-टुकड़े नहीं कर दिया गया होता? और यदि ऐसा होता, तो मेरा कार्य किया जाना कैसे जारी रखा जा सकता था? चिह्नों और अद्भुत कामों को खुले तौर पर अभिव्यक्त नहीं किया जाता है इसका कारण प्रच्छन्नता के वास्ते है। इसलिए, मेरा कार्य अविश्वासियों के द्वारा देखा, जाना या खोजा नहीं जा सकता है। यदि कार्य के इस चरण को उसी तरीके के समान किया जाना होता जैसा कि अनुग्रह के युग में यीशु का था, तो यह इतना सुस्थिर नहीं हो सकता था जितना यह अब है। इसलिए, इस तरह से गुप्त रूप से कार्य करना तुम लोगों के और समस्त कार्य के लाभ के लिए है। जब पृथ्वी पर परमेश्वर का कार्य समाप्त होता है, अर्थात्, जब इस गुप्त कार्य का समापन हो जाता है, तब कार्य का यह चरण झटके से प्रकट हो जाएगा। सब जान जाएँगे कि चीन में विजेताओं का एक समूह है; सब जान जाएँगे कि परमेश्वर ने चीन में देहधारण किया है और यह कि उसका कार्य समाप्ति पर आ गया है। केवल तभी मनुष्य पर प्रकटन होगा: ऐसा क्यों है कि चीन ने अभी तक ह्रास या पतन का प्रदर्शन नहीं किया है? इससे पता चलता है कि परमेश्वर चीन में व्यक्तिगत रूप से अपना कार्य कर रहा है और उसने लोगों के एक समूह को विजाताओं के रूप में सिद्ध बना दिया है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारण का रहस्य (2)' से उद्धृत

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